।।18.1।। व्याख्या -- संन्यासस्य महाबाहो ৷৷. पृथक्केशिनिषूदन -- यहाँ महाबाहो सम्बोधन सामर्थ्यका सूचक है। अर्जुनद्वारा इस सम्बोधनका प्रयोग करनेका भाव यह है कि आप सम्पूर्ण विषयोंको कहनेमें समर्थ हैं अतः मेरी जिज्ञासाका समाधान आप इस प्रकार करें? जिससे मैं विषयको सरलतासे समझ सकूँ।हृषीकेश सम्बोधन अन्तर्यामीका वाचक है। इसके प्रयोगमें अर्जुनका भाव यह है कि मैं संन्यास और त्यागका तत्त्व जानना चाहता हूँ अतः इस विषयमें जोजो आवश्यक बातें हों? उनको आप (मेरे पूछे बिना भी) कह दें।केशिनिषूदन सम्बोधन विघ्नोंको दूर करनेवालेका सूचक है। इसके प्रयोगमें अर्जुनका भाव यह है कि जिस प्रकार आप अपने भक्तोंके सम्पूर्ण विघ्नोंको दूर कर देते हैं? उसी प्रकार मेरे भी सम्पूर्ण विघ्नोंको अर्थात् शङ्काओँ और संशयोंको दूर कर दें।जिज्ञासा प्रायः दो प्रकारसे प्रकट की जाती है --,(1) अपने आचरणमें लानेके लिये और (2) सिद्धान्तको समझनेके लिये। जो केवल पढ़ाई करनेके लिये (सीखनेके लिये) सिद्धान्तको समझते हैं? वे केवल पुस्तकोंके विद्वान् बन सकते हैं और नयी पुस्तक भी बना सकते हैं? पर अपना कल्याण नहीं कर सकते (टिप्पणी प0 869)। अपना कल्याण तो वे ही कर सकते हैं? जो सिद्धान्तको समझकर उसके अनुसार अपना जीवन बनानेके लिये तत्पर हो जाते हैं।यहाँ अर्जुनकी जिज्ञासा भी केवल सिद्धान्तको जाननेके लिये ही नहीं है? प्रत्युत सिद्धान्तको जानकर उसके अनुसार अपना जीवन बनानेके लिये है।एषा तेऽभिहिता सांख्ये (गीता 2। 39) में आये सांख्य पदको ही यहाँ संन्यास पदसे कहा गया है। भगवान्ने भी सांख्य और संन्यासको पर्यायवाची माना है जैसे -- पाँचवें अध्यायके दूसरे श्लोकमें संन्यासः? चौथे श्लोकमें सांख्ययोगौ? पाँचवें श्लोकमें यत्सांख्यैः और छठे श्लोकमें संन्यासस्तु पदोंका एक ही अर्थमें प्रयोग हुआ है। इसलिये यहाँ अर्जुनने सांख्यको ही संन्यास कहा है।इसी प्रकार बुद्धिर्योगे त्विमां श्रृणु (गीता 2। 39) में आये योग पदको ही यहाँ त्याग पदसे कहा गया है। भगवान्ने भी योग (कर्मयोग) और त्यागको पर्यायवाची माना है जैसे -- दूसरे अध्यायके अड़तालीसवें श्लोकमें सङ्गं त्यक्त्वा तथा इक्यावनवें श्लोकमें फलं त्यक्त्वा? तीसरे अध्यायके तीसरे श्लोकमें कर्मयोगेन योगिनाम्? चौथे अध्यायके बीसवें श्लोकमें त्यक्त्वा कर्मफलासङ्गम्? पाँचवें श्लोकमें तद्योगैरपि गम्यते? ग्यारहवें श्लोकमें सङ्गं त्यक्त्वा तथा बारहवें श्लोकमें त्यागात् पदोंका एक ही अर्थमें प्रयोग हुआ है। इसलिये यहाँ अर्जुनने कर्मयोगको ही त्याग कहा है।अच्छी तरहसे रखनेका नाम संन्यास है -- सम्यक् न्यासः संन्यासः। तात्पर्य है कि प्रकृतिकी चीज सर्वथा प्रकृतिमें देने (छोड़ देने) और विवेकद्वारा प्रकृतिसे अपना सर्वथा सम्बन्धविच्छेद कर लेनेका नाम संन्यास है।कर्म और फलकी आसक्तिको छोड़नेका नाम त्याग है। छठे अध्यायके चौथे श्लोकमें आया है कि जो कर्म और फलमें आसक्त नहीं होता? वह योगारूढ़ हो जाता है। सम्बन्ध -- अर्जुनकी जिज्ञासाके उत्तरमें पहले भगवान् आगेके दो श्लोकोंमें अन्य दार्शनिक विद्वानोंके चार मत बताते हैं।
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।।18.1।। अर्जुन बोले -- हे महाबाहो ! हे हृषीकेश ! हे केशिनिषूदन ! मैं संन्यास और त्यागका तत्त्व अलग-अलग जानना चाहता हूँ।
Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas।।18.2।। व्याख्या -- दार्शनिक विद्वानोंके चार मत हैं --,1 -- काम्यानां कर्मणां न्यासं संन्यासं कवयो विदुः -- कई विद्वान् कहते हैं कि काम्यकर्मोंके त्यागका नाम संन्यास है अर्थात् इष्टकी प्राप्ति और अनिष्टकी निवृत्तिके लिये जो कर्म किये जाते हैं? उनका त्याग करनेका नाम संन्यास है।
2 -- सर्वकर्मफलत्यागं प्राहुस्त्यागं विचक्षणाः -- कई विद्वान् कहते हैं कि सम्पूर्ण कर्मोंके फलकी इच्छाका त्याग करनेका नाम त्याग है अर्थात् फल न चाहकर कर्तव्यकर्मोंको करते रहनेका नाम त्याग है।
3 -- त्याज्यं दोष (टिप्पणी प0 870.1) वदित्येके कर्म प्राहुर्मनीषिणः -- कई विद्वान् कहते हैं कि सम्पूर्ण कर्मोंको दोषकी तरह छोड़ देना चाहिये।
4 -- यज्ञदानतपःकर्म न त्याज्यमिति चापरे -- अन्य विद्वान् कहते हैं कि दूसरे सब कर्मोंका भले ही त्याग कर दें? पर यज्ञ? दान और तपरूप कर्मोंका त्याग नहीं करना चाहिये।उपर्युक्त चारों मतोंमें दो विभाग दिखायी देते हैं -- पहला और तीसरा मत संन्यास(सांख्ययोग) का है तथा दूसरा और चौथा मत त्याग(कर्मयोग) का है। इन दो विभागोंमें भी थोड़ाथोड़ा अन्तर है। पहले मतमें केवल काम्यकर्मोंका त्याग है और तीसरे मतमें कर्ममात्रका त्याग है। ऐसे ही दूसरे मतमें कर्मोंके फलका त्याग है और चौथे मतमें यज्ञ? दान और तपरूप कर्मोंके त्यागका निषेध है।दार्शनिकोंके उपर्युक्त चार मतोंमें क्याक्या कमियाँ हैं और उनकी अपेक्षा भगवान्के मतमें क्याक्या विलक्षणताएँ हैं? इसका विवेचन इस प्रकार है --,1 -- काम्यानां कर्मणां न्यासं संन्यासम् -- संन्यासके इस पहले मतमें केवल काम्यकर्मोंका त्याग बताया गया है परन्तु इसके अलावा भी नित्य? नैमित्तिक आदि आवश्यक कर्तव्यकर्म बाकी रह जाते हैं (टिप्पणी प0 870.2)। अतः यह मत पूर्ण नहीं है क्योंकि इसमें न तो कर्तृत्वका त्याग बताया है और न स्वरूपमें स्थिति ही बतायी है। परन्तु भगवान्के मतमें कर्मोंमें कर्तृत्वाभिमान नहीं रहता और स्वरूपमें स्थिति हो जाती है जैसे -- इसी अध्यायके सत्रहवें श्लोकमें जिसमें अहंकृतभाव नहीं है और जिसकी बुद्धि कर्मफलमें लिप्त नहीं होती -- ऐसा कहकर कर्तृत्वाभिमानका त्याग बताया है और अगर वह सम्पूर्ण प्राणियोंको मार दे? तो भी न मारता है? न बँधता है -- ऐसा कहकर स्वरूपमें स्थिति बतायी है।
2 -- त्याज्यं दोषवदित्येके -- संन्यासके इस दूसरे मतमें सब कर्मोंको दोषकी तरह छोड़नेकी बात है। परन्तु सम्पूर्ण कर्मोंका त्याग कोई कर ही नहीं सकता (गीता 3। 5) और कर्ममात्रका त्याग करनेसे जीवननिर्वाह भी नहीं हो सकता (गीता 3। 8)। इसलिये भगवान्ने नित्य कर्मोंका स्वरूपसे त्याग करनेको राजसतामस त्याग बताया है (18। 78)।
3 -- सर्वकर्मफलत्यागम् -- त्यागके इस पहले मतमें केवल फलका त्याग बताया है। यहाँ फलत्यागके अन्तर्गत केवल कामनाके त्यागकी ही बात आयी है (टिप्पणी प0 871.1)। ममताआसक्तिके त्यागकी बात इसके अन्तर्गत नहीं ले सकते क्योंकि ऐसा लेनेपर दार्शनिकों और भगवान्के मतोंमें कोई अन्तर नहीं रहेगा। भगवान्के मतमें कर्मकी आसक्ति और फलकी आसक्ति -- दोनोंके ही त्यागकी बात आयी है -- सङ्गं त्यक्त्वा फलानि च (गीता 18। 6)।
4 -- यज्ञदानतपःकर्म न त्याज्यम् -- त्याग अर्थात् कर्मयोगके इस दूसरे मतमें यज्ञ? दान और तपरूप कर्मोंका त्याग न करनेकी बात है। परन्तु इन तीनोंके अलावा वर्ण? आश्रम? परिस्थिति आदिको लेकर जितने कर्म आते हैं? उनको करने अथवा न करनेके विषयमें कुछ नहीं कहा गया है -- यह इसमें अधूरापन है। भगवान्के मतमें इन कर्मोंका केवल त्याग ही नहीं करना चाहिये? प्रत्युत इनको न करते हों? तो जरूर करना चाहिये और इनके अतिरिक्त तीर्थ? व्रत आदि कर्मोंको भी फल एवं आसक्तिका त्याग करके करना चाहिये (18। 56)।
सम्बन्ध -- पीछेके दो श्लोकोंमें दार्शनिक विद्वानोंके चार मत बतानेके बाद अब भगवान् आगेके तीन श्लोकोंमें पहले त्यागके विषयमें अपना मत बताते हैं।
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Hindi Translation By Swami Ramsukhdas।।18.2।।श्रीभगवान् बोले -- कई विद्वान् काम्यकर्मोंके त्यागको संन्यास कहते हैं और कई विद्वान् सम्पूर्ण कर्मोंके फलके त्यागको त्याग कहते हैं। कई विद्वान् कहते हैं कि कर्मोंको दोषकी तरह छोड़ देना चाहिये और कई विद्वान् कहते हैं कि यज्ञ? दान और तपरूप कर्मोंका त्याग नहीं करना चाहिये।
त्याज्यं दोषवदित्येके कर्म प्राहुर्मनीषिणः।
यज्ञदानतपःकर्म न त्याज्यमिति चापरे ॥
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।।18.3।। व्याख्या -- दार्शनिक विद्वानोंके चार मत हैं --,1 -- काम्यानां कर्मणां न्यासं संन्यासं कवयो विदुः -- कई विद्वान् कहते हैं कि काम्यकर्मोंके त्यागका नाम संन्यास है अर्थात् इष्टकी प्राप्ति और अनिष्टकी निवृत्तिके लिये जो कर्म किये जाते हैं? उनका त्याग करनेका नाम संन्यास है।2 -- सर्वकर्मफलत्यागं प्राहुस्त्यागं विचक्षणाः -- कई विद्वान् कहते हैं कि सम्पूर्ण कर्मोंके फलकी इच्छाका त्याग करनेका नाम त्याग है अर्थात् फल न चाहकर कर्तव्यकर्मोंको करते रहनेका नाम त्याग है।3 -- त्याज्यं दोष (टिप्पणी प0 870.1) वदित्येके कर्म प्राहुर्मनीषिणः -- कई विद्वान् कहते हैं कि सम्पूर्ण कर्मोंको दोषकी तरह छोड़ देना चाहिये।4 -- यज्ञदानतपःकर्म न त्याज्यमिति चापरे -- अन्य विद्वान् कहते हैं कि दूसरे सब कर्मोंका भले ही त्याग कर दें? पर यज्ञ? दान और तपरूप कर्मोंका त्याग नहीं करना चाहिये।उपर्युक्त चारों मतोंमें दो विभाग दिखायी देते हैं -- पहला और तीसरा मत संन्यास(सांख्ययोग) का है तथा दूसरा और चौथा मत त्याग(कर्मयोग) का है। इन दो विभागोंमें भी थोड़ाथोड़ा अन्तर है। पहले मतमें केवल काम्यकर्मोंका त्याग है और तीसरे मतमें कर्ममात्रका त्याग है। ऐसे ही दूसरे मतमें कर्मोंके फलका त्याग है और चौथे मतमें यज्ञ? दान और तपरूप कर्मोंके त्यागका निषेध है।दार्शनिकोंके उपर्युक्त चार मतोंमें क्याक्या कमियाँ हैं और उनकी अपेक्षा भगवान्के मतमें क्याक्या विलक्षणताएँ हैं? इसका विवेचन इस प्रकार है --,1 -- काम्यानां कर्मणां न्यासं संन्यासम् -- संन्यासके इस पहले मतमें केवल काम्यकर्मोंका त्याग बताया गया है परन्तु इसके अलावा भी नित्य? नैमित्तिक आदि आवश्यक कर्तव्यकर्म बाकी रह जाते हैं (टिप्पणी प0 870.2)। अतः यह मत पूर्ण नहीं है क्योंकि इसमें न तो कर्तृत्वका त्याग बताया है और न स्वरूपमें स्थिति ही बतायी है। परन्तु भगवान्के मतमें कर्मोंमें कर्तृत्वाभिमान नहीं रहता और स्वरूपमें स्थिति हो जाती है जैसे -- इसी अध्यायके सत्रहवें श्लोकमें जिसमें अहंकृतभाव नहीं है और जिसकी बुद्धि कर्मफलमें लिप्त नहीं होती -- ऐसा कहकर कर्तृत्वाभिमानका त्याग बताया है और अगर वह सम्पूर्ण प्राणियोंको मार दे? तो भी न मारता है? न बँधता है -- ऐसा कहकर स्वरूपमें स्थिति बतायी है।2 -- त्याज्यं दोषवदित्येके -- संन्यासके इस दूसरे मतमें सब कर्मोंको दोषकी तरह छोड़नेकी बात है। परन्तु सम्पूर्ण कर्मोंका त्याग कोई कर ही नहीं सकता (गीता 3। 5) और कर्ममात्रका त्याग करनेसे जीवननिर्वाह भी नहीं हो सकता (गीता 3। 8)। इसलिये भगवान्ने नित्य कर्मोंका स्वरूपसे त्याग करनेको राजसतामस त्याग बताया है (18। 78)।3 -- सर्वकर्मफलत्यागम् -- त्यागके इस पहले मतमें केवल फलका त्याग बताया है। यहाँ फलत्यागके अन्तर्गत केवल कामनाके त्यागकी ही बात आयी है (टिप्पणी प0 871.1)। ममताआसक्तिके त्यागकी बात इसके अन्तर्गत नहीं ले सकते क्योंकि ऐसा लेनेपर दार्शनिकों और भगवान्के मतोंमें कोई अन्तर नहीं रहेगा। भगवान्के मतमें कर्मकी आसक्ति और फलकी आसक्ति -- दोनोंके ही त्यागकी बात आयी है -- सङ्गं त्यक्त्वा फलानि च (गीता 18। 6)।4 -- यज्ञदानतपःकर्म न त्याज्यम् -- त्याग अर्थात् कर्मयोगके इस दूसरे मतमें यज्ञ? दान और तपरूप कर्मोंका त्याग न करनेकी बात है। परन्तु इन तीनोंके अलावा वर्ण? आश्रम? परिस्थिति आदिको लेकर जितने कर्म आते हैं? उनको करने अथवा न करनेके विषयमें कुछ नहीं कहा गया है -- यह इसमें अधूरापन है। भगवान्के मतमें इन कर्मोंका केवल त्याग ही नहीं करना चाहिये? प्रत्युत इनको न करते हों? तो जरूर करना चाहिये और इनके अतिरिक्त तीर्थ? व्रत आदि कर्मोंको भी फल एवं आसक्तिका त्याग करके करना चाहिये (18। 56)। सम्बन्ध -- पीछेके दो श्लोकोंमें दार्शनिक विद्वानोंके चार मत बतानेके बाद अब भगवान् आगेके तीन श्लोकोंमें पहले त्यागके विषयमें अपना मत बताते हैं।
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।।18.3।।श्रीभगवान् बोले -- कई विद्वान् काम्य-कर्मोंके त्यागको संन्यास कहते हैं और कई विद्वान् सम्पूर्ण कर्मोंके फलके त्यागको त्याग कहते हैं। कई विद्वान् कहते हैं कि कर्मोंको दोषकी तरह छोड़ देना चाहिये और कई विद्वान् कहते हैं कि यज्ञ, दान और तप-रूप कर्मोंका त्याग नहीं करना चाहिये।
निश्चयं शृणु मे तत्र त्यागे भरतसत्तम।
त्यागो हि पुरुषव्याघ्र त्रिविधः सम्प्रकीर्तितः ॥
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।।18.4।। व्याख्या -- निश्चयं श्रृणु मे तत्र त्यागे भरतसत्तम -- हे भरतवंशियोंमें श्रेष्ठ अर्जुन अब मैं संन्यास और त्याग -- दोनोंमेंसे पहले त्यागके विषयमें अपना मत कहता हूँ? उसको तुम सुनो।त्यागो हि पुरुषव्याघ्र त्रिविधः संप्रकीर्तितः -- हे पुरुषव्याघ्र त्याग तीन तरहका कहा गया है -- सात्त्विक? राजस और तामस। वास्तवमें भगवान्के मतमें सात्त्विक त्याग ही त्याग है परन्तु उसके साथ राजस और तामस त्यागका भी वर्णन करनेका तात्पर्य यह है कि उसके बिना भगवान्के अभीष्ट सात्त्विक त्यागकी श्रेष्ठता स्पष्ट नहीं होती क्योंकि परीक्षा या तुलना करके किसी भी वस्तुकी श्रेष्ठता सिद्ध करनेके लिये दूसरी वस्तुएँ सामने रखनी ही पड़ती हैं।तीन प्रकारका त्याग बतानेका तात्पर्य यह भी है कि साधक सात्त्विक त्यागको ग्रहण करे और राजस तथा तामस त्यागका त्याग करे।
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।।18.4।। हे भरतवंशियोंमें श्रेष्ठ अर्जुन ! तू संन्यास और त्याग -- इन दोनोंमेंसे पहले त्यागके विषयमें मेरा निश्चय सुन; क्योंकि हे पुरुषश्रेष्ठ ! त्याग तीन प्रकारका कहा गया है।
।।18.5।। व्याख्या -- यज्ञदानतपःकर्म न त्याज्यं कार्यमेव तत् -- यहाँ भगवान्ने दूसरोंके मत (18। 3) को ठीक बताया है। भगवान् कठोर शब्दोंसे किसीके मतका खण्डन नहीं करते। आदर देनेके लिये भगवान् दूसरेके मतका वास्तविक अंश ले लेते हैं और उसमें अपना मत भी शामिल कर देते हैं। यहाँ भगवान्ने दूसरेके मतके अनुसार कहा कि यज्ञ? दान और तपरूप कर्म छोड़ने नहीं चाहिये। इसके साथ भगवान्ने अपना मत बताया कि इतना ही नहीं? प्रत्युत उनको न करते हों तो जरूर करना चाहिये -- कार्यमेव तत्। कारण कि यज्ञ? दान और तप -- तीनों कर्म मनीषियोंको पवित्र करनेवाले हैं।यज्ञो दानं तपश्चैव पावनानि मनीषिणाम् -- यहाँ चैव पदका तात्पर्य है कि नित्य? नैमित्तिक? जीविकासम्बन्धी? शरीरसम्बन्धी आदि जितने भी कर्तव्यकर्म हैं? उनको भी जरूर करना चाहिये क्योंकि वे भी मनीषियोंको पवित्र करनेवाले हैं।,जो मनुष्य समत्वबुद्धिसे युक्त होकर कर्मजन्य फलका त्याग कर देते हैं? वे मनीषी हैं -- कर्मजं बुद्धियुक्ता हि फलं त्यक्त्वा मनीषिणः (गीता 2। 51)। ऐसे मनीषियोंको वे यज्ञादि कर्म पवित्र करते हैं। परन्तु जो वास्तवमें मनीषी नहीं हैं? जिनकी इन्द्रियाँ वशमें नहीं हैं अर्थात् अपने सुखभोगके लिये ही जो यज्ञ? दानादि कर्म करते हैं? उनको वे कर्म पवित्र नहीं करते? प्रत्युत वे कर्म बन्धनकारक हो जाते हैं।इस श्लोकके पूर्वार्धमें यज्ञदानतपःकर्म -- ऐसा समासयुक्त पद दिया है और उत्तरार्धमें यज्ञो दानं तपः -- ऐसे अलगअलग पद दिये हैं? इसका तात्पर्य है कि भगवान्ने समासयुक्त पदसे यह बताया है कि यज्ञ? दान और तपका त्याग नहीं करना चाहिये? प्रत्युत इनको जरूर करना चाहिये और अलगअलग पदोंसे यह बताया है,कि इनमेंसे एकएक कर्म भी मनीषीको पवित्र करनेवाला है।
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।।18.5।।यज्ञ, दान और तपरूप कर्मोंका त्याग नहीं करना चाहिये, प्रत्युत उनको तो करना ही चाहिये क्योंकि यज्ञ, दान और तप -- ये तीनों ही कर्म मनीषियोंको पवित्र करनेवाले हैं।
।।18.6।। व्याख्या -- एतान्यपि तु कर्माणि ৷৷. निश्चितं मतमुत्तमम् -- यहाँ एतानि पदसे पूर्वश्लोकमें कहे यज्ञ? दान और तपरूप कर्मोंकी तथा अपि पदसे शास्त्रविहित पठनपाठन? खेतीव्यापार आदि जीविकासम्बन्धी कर्म शास्त्रकी मर्यादाके अनुसार खानापीना? उठनाबैठना? सोनाजागना आदि शारीरिक कर्म और परिस्थितिके अनुसार सामने आये अवश्य कर्तव्यकर्म -- इन सभी कर्मोंको लेना चाहिये। इन समस्त कर्मोंको आसक्ति और फलेच्छाका त्याग करके जरूर करना चाहिये। अपनी कामना? ममता और आसक्तिका त्याग करके कर्मोंको केवल प्राणिमात्रके हितके लिये करनेसे कर्मोंका प्रवाह संसारके लिये और योग अपने लिये हो जाता है। परन्तु कर्मोंको अपने लिये करनेसे कर्म बन्धनकारक हो जाते हैं -- अपने व्यक्तित्वको नष्ट नहीं होने देते।गीतामें कहीं सङ्ग(आसक्ति) के त्यागकी बात आती है और कहीं कर्मोंके फलके त्यागकी बात आती है। इस श्लोकमें सङ्ग और फल -- दोनोंके त्यागकी बात आयी है। इसका तात्पर्य यह है कि गीतामें जहाँ सङ्गके त्यागकी बात कही है? वहाँ उसके साथ फलके त्यागकी बात भी समझ लेनी चाहिये और जहाँ फलके त्यागकी बात कही है? वहाँ उसके साथ सङ्गके त्यागकी बात भी समझ लेनी चाहिये। यहाँ अर्जुनने त्यागके तत्त्वकी बात पूछी है अतः भगवान्ने त्यागका यह तत्त्व बताया है कि सङ्ग (आसक्ति) और फल -- दोनोंका ही त्याग करना चाहिये? जिससे साधकको यह जानकारी स्पष्ट हो जाय कि आसक्ति न तो कर्ममें रहनी चाहिये और न फलमें ही रहनी चाहिये। आसक्ति न रहनेसे मन? बुद्धि? इन्द्रियाँ? शरीर आदि कर्म करनेके औजारों(करणों)में तथा प्राप्त वस्तुओँमें ममता नहीं रहती (गीता 5। 11)।सङ्ग (आसक्ति या सम्बन्ध) सूक्ष्म होता है और फलेच्छा स्थूल होती है। सङ्ग या आसक्तिकी सूक्ष्मता वहाँतक है? जहाँ चेतनस्वरूपने नाशवान्के साथ सम्बन्ध जोड़ा है। वहीँसे आसक्ति पैदा होती है? जिससे जन्ममरण आदि सब अनर्थ होते -- कारणं गुणसङ्गोऽस्य सदसद्योनिजन्मसु (गीता 13। 21)। आसक्तिका त्याग करनेसे नाशवान्के साथ जोड़े हुए सम्बन्धका विच्छेद हो जाता है और स्वतःस्वाभाविक रहनेवाली असङ्गताका अनुभव हो जाता है।इस विषयमें एक और बात समझनेकी है कि कई दार्शनिक इस नाशवान् संसारको असत् मानते हैं क्योंकि यह पहले भी नहीं था और पीछे भी नहीं रहेगा? इसलिये वर्तमानमें भी यह नहीं है जैसे -- स्वप्न। कई दार्शनिकोंका यह मत है कि संसार परिवर्तनशील है? हरदम बदलता रहता है? कभी एक रूप नहीं रहता जैसे -- अपना शरीर। कई यह मानते हैं कि परिवर्तनशील होनेपर भी संसारका कभी अभाव नहीं होता? प्रत्युत तत्त्वसे सदा रहता है जैसे -- जल (जल ही बर्फ? बादल? भाप और परमाणुरूपसे हो जाता है? पर स्वरूपसे वह मिटता नहीं)। इस तरह अनेक मतभेद हैं किन्तु नाशवान् जडका अपने अविनाशी चेतनस्वरूपके साथ कोई सम्बन्ध नहीं है? इसमें किसी भी दार्शनिकका मतभेद नहीं है। सङ्गं त्यक्त्वा पदोंसे भगवान्ने उसी सम्बन्धका त्याग कहा है।प्रकृति सत् है या असत् है अथवा सत्असत्से विलक्षण है अनादिसान्त है या अनादिअनन्त है इस झगड़ेमें पड़कर साधकको अपना अमूल्य समय खर्च नहीं करना चाहिये? प्रत्युत इस प्रकृतिसे तथा प्रकृतिके कार्य शरीरसंसारसे अपना सम्बन्धविच्छेद करना चाहिये? जो कि स्वतः हो ही रहा है। स्वतः होनेवाले सम्बन्धविच्छेदका केवल अनुभव करना है कि शरीर तो प्रतिक्षण बदलता ही रहता है और स्वयं निर्विकाररूपसे सदा ज्योंकात्यों रहता है।अब प्रश्न यह होता है कि फल क्या है प्रारब्धकर्मके अनुसार अभी हमें जो परिस्थिति? वस्तु? देश? काल आदि प्राप्त हैं? वह सब कर्मोंका प्राप्त फल है और भविष्यमें जो परिस्थिति? वस्तु आदि प्राप्त होनेवाली है? वह सब कर्मोंका अप्राप्त फल है। प्राप्त तथा अप्राप्त फलमें आसक्ति रहनेके कारण ही प्राप्तमें ममता और अप्राप्तकी कामना होती है। इसलिये भगवान्ने त्यक्त्वा फलानि च (टिप्पणी प0 873) कहकर फलोंका त्याग करनेकी बात कही है।कर्मफलका त्याग क्यों करना चाहिये क्योंकि कर्मफल हमारे साथ रहनेवाला है ही नहीं। कारण यह है कि जिन कर्मोंसे फल बनता है? उन कर्मोंका आरम्भ और अन्त होता है अतः उनका फल भी प्राप्त और नष्ट होनेवाला ही है। इसलिये कर्मफलका त्याग करना है। फलके त्यागमें वस्तुतः फलकी आसक्तिका? कामनाका ही त्याग करना है। वास्तवमें आसक्ति हमारे स्वरूपमें है नहीं? केवल मानी हुई है।दूसरी बात? जो अपना स्वरूप होता है? उसका त्याग नहीं होता जैसे -- प्रज्वलित अग्नि उष्णता और प्रकाशका त्याग नहीं कर सकती। जो चीज अपनी नहीं होती? उसका भी त्याग नहीं होता जैसे -- संसारमें अनेक वस्तुएँ पड़ी हैं परन्तु उनका हम त्याग करें -- ऐसा कहना भी नहीं बनता क्योंकि वे वस्तुएँ हमारी हैं ही नहीं। इसलिये त्याग उसीका होता है? जो वास्तवमें अपना नहीं है? पर जिसको अपना मान लिया है। ऐसे ही प्रकृति और प्रकृतिके कार्य शरीर आदि हमारे नहीं हैं? फिर भी उनको हम अपना मानते हैं? तो इस अपनेपनकी मान्यताका ही त्याग करना है। मनुष्यके सामने कर्तव्यरूपसे जो कर्म आ जाय? उसको फल और आसक्तिका त्याग करके सावधानीके साथ तत्परतापूर्वक करना चाहिये -- कर्तव्यानि। कर्मयोगमें विधिनिषेधको लेकर अमुक काम करना है और अमुक काम नहीं करना है -- ऐसा विचार तो करना ही है परन्तु अमुक काम ब़ड़ा है और अमुक काम छोटा है -- ऐसा विचार नहीं करना है। कारण कि जहाँ कर्म और उसके फलसे अपना कोई सम्बन्ध ही नहीं है? वहाँ यह कर्म बड़ा है? यह कर्म छोटा है इस कर्मका फल बड़ा है? इस कर्मका फल छोटा है -- ऐसा विचार हो ही नहीं सकता। कर्मका बड़ा या छोटा होना फलकी इच्छाके कारण ही दीखता है? जब कि कर्मयोगमें फलेच्छाका त्याग होता है। ,कर्म करना रागपूर्तिके लिये भी होता है और रागनिवृत्तिके लिये भी। कर्मयोगी रागनिवृत्तिके लिये अर्थात् करनेका राग मिटानेके लिये ही सम्पूर्ण कर्तव्यकर्म करता है -- आरुरुक्षोर्मुनेर्योगं कर्म कारणमुच्यते (गीता 6। 3)? न कर्मणामनारम्भान्नैष्कर्म्यं पुरुषोऽश्नुते (गीता 3। 4)। अपने लिये कर्म करनेसे करनेका राग बढ़ता है। इसलिये कर्मयोगी कोई भी कर्म अपने लिये नहीं करता? प्रत्युत केवल दूसरोंके हितके लिये ही करता है। उसके स्थूलशरीरमें होनेवाली क्रिया? सूक्ष्मशरीरमें होनेवाला परहितचिन्तन तथा कारणशरीरमें होनेवाली स्थिरता -- तीनों ही दूसरोंके हितके लिये होती हैं? अपने लिये नहीं। इसलिये उसका करनेका राग सुगमतासे मिट जाता है। परमात्मतत्त्वकी प्राप्तिमें संसारका राग ही बाधक है। अतः राग मिटनेपर कर्मयोगीको परमात्मतत्त्वकी प्राप्ति अपनेआप हो जाती है (गीता 4। 38)।कर्तव्य शब्दका अर्थ होता है -- जिसको हम कर सकते हैं तथा जिसको जरूर करना चाहिये और जिसको करनेसे उद्देश्यकी सिद्धि जरूर होती है। उद्देश्य वही कहलाता है? जो नित्यसिद्ध और अनुत्पन्न है अर्थात् जो अनादि है और जिसका कभी विनाश नहीं होता। उस उद्देश्यकी सिद्धि मनुष्यजन्ममें ही होती है और उसकी सिद्धिके लिये ही मनुष्यशरीर मिला है? न कि कर्मजन्य परिस्थितिरूप सुखदुःख भोगनेके लिये। कर्मजन्य परिस्थिति वह होती है? जो उत्पन्न और नष्ट होती हो। वह परिस्थिति तो मनुष्यके अलावा पशुपक्षी? कीटपतङ्ग? वृक्षलता? नारकीयस्वर्गीय आदि योनियोंके प्राणियोंको भी मिलती है? जहाँ कर्तव्यका कोई प्रश्न ही नहीं है और जहाँ उद्देश्यकी पूर्तिका अधिकार भी नहीं है।भगवान्के द्वारा अपने मतको निश्चितम् कहनेका तात्पर्य है कि इस मतमें सन्देहकी कोई गुंजाइश नहीं है? यह मत अटल है अर्थात् यह किञ्चिन्मात्र भी इधरउधर नहीं हो सकता और उत्तमम् कहनेका तात्पर्य है कि,इस मतमें शास्त्रीय दृष्टिसे कोई कमी नहीं है? प्रत्युत यह पूर्णताको प्राप्त करानेवाला है। सम्बन्ध -- इसी अध्यायके चौथे श्लोकमें भगवान्ने तीन प्रकारके त्यागकी बात कही थी। अब आगेके तीन श्लोकोंमें उसी त्रिविध त्यागका वर्णन करते हैं।
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।।18.6।।हे पार्थ ! (पूर्वोक्त यज्ञ, दान और तप -- ) इन कर्मोंको तथा दूसरे भी कर्मोंको आसक्ति और फलोंका त्याग करके करना चाहिये -- यह मेरा निश्चित किया हुआ उत्तम मत है।
।।18.7।। व्याख्या -- [तीन तरहके त्यागका वर्णन भगवान् इसलिये करते हैं कि अर्जुन कर्मोंका स्वरूपसे त्याग करना चाहते थे -- श्रेयो भोक्तुं भैक्ष्यमपीह लोके (गीता 2। 5) अतः त्रिविध त्याग बताकर अर्जुनको चेत कराना था? और आगेके लिये मनुष्यमात्रको यह बताना था कि नियत कर्मोंका स्वरूपसे त्याग करना भगवान्को मान्य (अभीष्ट) नहीं है। भगवान् तो सात्त्विक त्यागको ही वास्तवमें त्याग मानते हैं। सात्त्विक त्यागसे संसारके सम्बन्धका सर्वथा विच्छेद हो जाता है।दूसरी बात? सत्रहवें अध्यायमें भी भगवान् गुणोंके अनुसार श्रद्धा? आहार आदिके तीनतीन भेद कहकर आये हैं? इसलिये यहाँ भी अर्जुनद्वारा त्यागका तत्त्व पूछनेपर भगवान्ने त्यागके तीन भेद कहे हैं।]नियतस्य तु संन्यासः कर्मणो नोपपद्यते -- पूर्वश्लोकमें भगवान्ने त्यागके विषयमें अपना जो निश्चित उत्तम मत बताया है? उससे यह तामस त्याग बिलकुल ही विपरीत है और सर्वथा निकृष्ट है? यह बतानेके लिये यहाँ तु पद आया है।नियत कर्मोंका त्याग करना कभी भी उचित नहीं है क्योंकि वे तो अवश्यकर्तव्य हैं। बलिवैश्वदेव आदि यज्ञ करना? कोई अतिथि आ जाय तो गृहस्थधर्मके अनुसार उसको अन्न? जल आदि देना? विशेष पर्वमें या श्राद्धतर्पणके दिन ब्राह्मणोंको भोजन कराना और दक्षिणा देना? अपने वर्णआश्रमके अनुसार प्रातः और सांयकालमें सन्ध्या करना आदि कर्मोंको न मानना और न करना ही नियत कर्मोंका त्याग है।मोहात्तस्य परित्यागस्तामसः परिकीर्तितः -- ऐसे नियत कर्मोंको मूढ़तासे अर्थात् बिना विवेकविचारके छोड़ देना तामस त्याग कहा जाता है। सत्सङ्ग? सभा? समिति आदिमें जाना आवश्यक था? पर आलस्यमें पड़े रहे? आराम करने लग गये अथवा सो गये घरमें मातापिता बीमार हैं? उनके लिये वैद्यको बुलाने या औषधि लानेके लिये जा रहे थे? रास्तेमें कहींपर लोग ताशचौपड़ आदि खेल रहे थे? उनको देखकर खुद भी खेलमें लग गये और वैद्यको बुलाना या ओषधि लाना भूल गये कोर्टमें मुकदमा चल रहा है? उसमें हाजिर होनेके समय हँसीदिल्लगी? खेलतमाशा आदिमें लग गये और समय बीत गया शरीरके लिये शौचस्नान आदि जो आवश्यक कर्तव्य हैं? उनको आलस्य और प्रमादके कारण छोड़ दिया -- यह सब तामस त्यागके उदाहरण हैं।विहित कर्म और नियत कर्ममें क्या अन्तर है शास्त्रोंने जिन कर्मोंको करनेकी आज्ञा दी है? वे सभी विहित कर्म कहलाते हैं। उन सम्पूर्ण विहित कर्मोंका पालन एक व्यक्ति कर ही नहीं सकता क्योंकि शास्त्रोंमें सम्पूर्ण वारों तथा तिथियोंके व्रतका विधान आता है। यदि एक ही मनुष्य सब वारोंमें या सब तिथियोंमें व्रत करेगा तो फिर वह भोजन कब करेगा इससे यह सिद्ध हुआ कि मनुष्यके लिये सभी विहित कर्म लागू नहीं होते। परन्तु उन विहित कर्मोंमें भी वर्ण? आश्रम और परिस्थितिके अनुसार जिसके लिये जो कर्तव्य आवश्यक होता है? उसके लिये वह नियत कर्म कहलाता है। जैसे ब्राह्मण? क्षत्रिय? वैश्य और शूद्र -- चारों वार्णोंमें जिसजिस वर्णके लिये जीविका और शरीरनिर्वाहसम्बन्धी जितने भी नियम हैं? उसउस वर्णके लिये वे सभी नियत कर्म हैं।नियत कर्मोंका मोहपूर्वक त्याग करनेसे वह त्याग तामस हो जाता है तथा सुख और आरामके लिये त्याग,करनेसे वह त्याग राजस हो जाता है। सुखेच्छा? फलेच्छा तथा आसक्तिका त्याग करके नियत कर्मोंको करनेसे वह त्याग सात्त्विक हो जाता है। तात्पर्य यह है कि मोहमें उलझ जाना तामस पुरुषका स्वभाव है? सुखआराममें उलझ जाना राजस पुरुषका स्वभाव है और इन दोनोंसे रहित होकर सावधानीपूर्वक निष्कामभावसे कर्तव्यकर्म करना सात्त्विक पुरुषका स्वभाव है। इस सात्त्विक स्वभाव अथवा सात्त्विक त्यागसे ही कर्म और कर्मफलसे सम्बन्धविच्छेद होता है। राजस और तामस त्यागसे नहीं क्योंकि राजस और तामस त्याग वास्तवमें त्याग है ही नहीं।लोग सामान्य रीतिसे स्वरूपसे कर्मोंको छोड़ देनेको ही त्याग मानते हैं क्योंकि उन्हें प्रत्यक्षमें वही त्याग दीखता है। कौन व्यक्ति कौनसा काम किस भावसे कर रहा है? इसका उन्हें पता नहीं लगता। परन्तु भगवान् भीतरकी कामनाममताआसक्तिके त्यागको ही त्याग मानते हैं क्योंकि ये ही जन्ममरणके कारण हैं (गीता 13। 21)।यदि बाहरके त्यागको ही असली त्याग माना जाय तो सभी मरनेवालोंका कल्याण हो जाना चाहिये क्योंकि उनकी तो सम्पूर्ण वस्तुएँ छूट जाती हैं और तो क्या? अपना कहलानेवाला शरीर भी छूट जाता है और उनको वे वस्तुएँ प्रायः यादतक नहीं रहतीं अतः भीतरका त्याग ही असली त्याग है। भीतरका त्याग होनेसे बाहरसे वस्तुएँ अपने पास रहें या न रहें? मनुष्य उनसे बँधता नहीं।
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।।18.7।।नियत कर्मका तो त्याग करना उचित नहीं है। उसका मोहपूर्वक त्याग करना तामस कहा गया है।
।।18.8।। व्याख्या -- दुःखमित्येव यत्कर्म -- यज्ञ? दान आदि शास्त्रीय नियत कर्मोंको करनेमें केवल दुःख ही भोगना पड़ता है? और उनमें है ही क्या क्योंकि उन कर्मोंको करनेके लिये अनेक नियमोंमें बँधना पड़ता है और खर्चा भी करना पड़ता है -- इस प्रकार राजस पुरुषको उन कर्मोंमें केवल दुःखहीदुःख दीखता है। दुःख दीखनेका कारण यह है कि उनका परलोकपर? शास्त्रोंपर? शास्त्रविहित कर्मोंपर और उन कर्मोंके परिणामपर श्रद्धाविश्वास नहीं होता।,कायक्लेशभयात्त्यजेत् -- राजस मनुष्यको शास्त्रमर्यादा और लोकमर्यादाके अनुसार चलनेसे शरीरमें क्लेश अर्थात् परिश्रमका अनुभव होता है (टिप्पणी प0 876)। राजस मनुष्यको अपने वर्ण? आश्रम आदिके धर्मका पालन करनेमें और मातापिता? गुरु? मालिक आदिकी आज्ञाका पालन करनेमें पराधीनता और दुःखका अनुभव होता है तथा उनकी आज्ञा भङ्ग करके जैसी मरजी आये? वैसा करनेमें स्वाधीनता और सुखका अनुभव होता है। राजस मनुष्योंके विचार यह होते हैं कि गृहस्थमें आराम नहीं मिलता? स्त्रीपुत्र आदि हमारे अनुकूल नहीं हैं अथवा सब कुटुम्बी मर गये हैं? घरमें काम करनेके लिये कोई रहा नहीं? खुदको तकलीफ उठानी पड़ती है? इसलिये साधु बन जायँ तो आरामसे रहेंगे? रोटी? कपड़ा आदि सब चीजें मुफ्तमें मिल जायँगी? परिश्रम नहीं करना पड़ेगा कोई ऐसी सरकारी नौकरी मिल जाय? जिससे काम कम करना पड़े और रुपये आरामसे मिलते रहें? हम काम न करें तो भी उस नौकरीसे हमें कोई छुड़ा न सके? हम नौकरी छोड़ देंगे तो हमें पेंशन मिलती रहेगी? इत्यादि। ऐसे विचारोंके कारण उन्हें घरका कामधन्धा करना अच्छा नहीं लगता और वे उसका त्याग कर देते हैं।यहाँ शङ्का होती है कि ज्ञानप्राप्तिके साधनोंमें दुःख और दोषको बारबार देखनेकी बात कही है (गीता 13। 8) और यहाँ कर्मोंमें दुःख देखकर उनका त्याग करनेको राजस त्याग कहा है अर्थात् कर्मोंके त्यागका निषेध किया है -- इन दोनों बातोंमें परस्पर विरोध प्रतीत होता है। इसका समाधान है कि वास्तवमें इन दोनोंमें विरोध नहीं है? प्रत्युत इन दोनोंका विषय अलगअलग है। वहाँ (गीता 13। 8 में) भोगोंमें दुःख और दोषको देखनेकी बात है और यहाँ नियत कर्तव्यकर्मोंमें दुःखको देखनेकी बात है। इसलिये वहाँ भोगोंका त्याग करनेका विषय है और यहाँ कर्तव्यकर्मोंका त्याग करनेका विषय है। भोगोंका तो त्याग करना चाहिये? पर कर्तव्यकर्मोंका त्याग कभी नहीं करना चाहिये। कारण कि जिन भोगोंमें सुखबुद्धि और गुणबुद्धि हो रही है? उन भोगोंमें बारबार दुःख और दोषको देखनेसे भोगोंसे वैराग्य होगा? जिससे परमात्मतत्त्वकी प्राप्त होगी परन्तु नियत कर्तव्यकर्मोंमें दुःख देखकर उन कर्मोंका त्याग करनेसे सदा पराधीनता और दुःख भोगना पड़ेगा -- यज्ञार्थात् कर्मणोऽन्यत्र लोकोऽयं कर्मबन्धनः (गीता 3। 9)। तात्पर्य यह हुआ कि भोगोंमें दुःख और दोष देखनेसे भोगासक्ति छूटेगी? जिससे कल्याण होगा और कर्तव्यमें दुःख देखनेसे कर्तव्य छूटेगा? जिससे पतन होगा।कर्तव्यकर्मोंका त्याग करनेमें तो राजस और तामस -- ये दो भेद होते हैं? पर परिणाम(आलस्य? प्रमाद? अतिनिद्रा आदि) में दोनों एक हो जाते हैं अर्थात् परिणाममें दोनों ही तामस हो जाते हैं? जिसका फल अधोगति होता है -- अधो गच्छन्ति तामसाः (गीता 14। 18)।एक शङ्का यह भी हो सकती है कि सत्सङ्ग? भगवत्कथा? भक्तचरित्र सुननेसे किसीको वैराग्य हो जाय तो वह प्रभुको पानेके लिये आवश्यक कर्तव्यकर्मोंको भी छोड़ देता है और केवल भगवान्के भजनमें लग जाता है। इसलिये उसका वह कर्तव्यकर्मोंका त्याग राजस कहा जाना चाहिये ऐसी बात नहीं है। सांसारिक कर्मोंको छोड़कर जो भजनमें लग जाता है? उसका त्याग राजस या तामस नहीं हो सकता। कारण कि भगवान्को प्राप्त करना मनुष्यजन्मका ध्येय है अतः उस ध्येयकी सिद्धिके लिये कर्तव्यकर्मोंका त्याग करना वास्तवमें कर्तव्यका त्याग करना नहीं है? प्रत्युत असली कर्तव्यको करना है। उस असली कर्तव्यको करते हुए आलस्य? प्रमाद आदि दोष नहीं आ सकते क्योंकि उसकी रुचि भगवान्में रहती है। परन्तु राजस और तामस त्याग करनेवालोंमें आलस्य? प्रमाद आदि दोष आयेंगे ही क्योंकि उसकी रुचि भोगोंमें रहती है।स कृत्वा राजसं त्यागं नैव त्यागफलं लभेत् -- त्यागका फल शान्ति है। राजस मनुष्य त्याग करके भी त्यागके फल(शान्ति) को नहीं पाता। कारण कि उसने जो त्याग किया है? वह अपने सुखआरामके लिये ही किया है। ऐसा त्याग तो पशुपक्षी आदि भी करते हैं। अपने सुखआरामके लिये शुभकर्मोंका त्याग करनेसे राजस मनुष्यको शान्ति तो नहीं मिलती? पर शुभकर्मोंके त्यागका फल दण्डरूपसे जरूर भोगना पड़ता है।
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।।18.8।।जो कुछ कर्म है, वह दुःखरूप ही है -- ऐसा समझकर कोई शारीरिक क्लेशके भयसे उसका त्याग कर दे, तो वह राजस त्याग करके भी त्यागके फलको नहीं पाता।
।।18.9।। व्याख्या -- कार्यमित्येव यत्कर्म नियतं क्रियतेऽर्जुन -- यहाँ कार्यम् पदके साथ इति और एव ये दो अव्यय लगानेसे यह अर्थ निकलता है कि केवल कर्तव्यमात्र करना है। इसको करनेमें कोई फलासक्ति नहीं? कोई स्वार्थ नहीं और कोई क्रियाजन्य सुखभोग भी नहीं। इस प्रकार कर्तव्यमात्र करनेसे कर्ताका उस कर्मसे सम्बन्धविच्छेद हो जाता है। ऐसा होनेसे वह कर्म बन्धनकारक नहीं होता अर्थात् संसारके साथ सम्बन्ध नहीं जुड़ता। कर्म तथा उसके फलमें आसक्त होनेसे ही बन्धन होता है -- फले सक्तो निबध्यते (गीता 5। 12)।शास्त्रविहित कर्मोंमें भी देश? काल? वर्ण? आश्रम? परिस्थितिके अनुसार जिसजिस कर्ममें जिसजिसकी नियुक्ति की जाती है? वे सब नियत कर्म कहलाते हैं जैसे -- साधुको ऐसा करना चाहिये? गृहस्थको ऐसा करना चाहिये? ब्राह्मणको अमुक काम करना चाहिये? क्षत्रियको अमुक काम करना चाहिये इत्यादि। उन कर्मोंको प्रमाद? आलस्य? उपेक्षा? उदासीनता आदि दोषोंसे रहित होकर तत्परता और उत्साहपूर्वक करना चाहिये। इसीलिये भगवान् कर्मयोगके प्रसङ्गमें जगहजगह समाचर शब्द दिया है (गीता 3। 9? 19)।सङ्गं त्यक्त्वा फलं चैव -- सङ्गके त्यागका तात्पर्य है कि कर्म? कर्म करनेके औजार (साधन) आदिमें आसक्ति? प्रियता? ममता आदि न हो और फलके त्यागका तात्पर्य है कि कर्मके परिणामके साथ सम्बन्ध न हो अर्थात् फलकी इच्छा न हो। इन दोनोंका तात्पर्य है कि कर्म और फलमें आसक्ति तथा इच्छाका त्याग हो।स त्यागः सात्त्विको मतः (टिप्पणी प0 877) -- कर्म और फलमें आसक्ति तथा कामनाका त्याग करके कर्तव्यमात्र समझकर कर्म करनेसे वह त्याग सात्त्विक हो जाता है। राजस त्यागमें कायक्लेशके भयसे और,तामस त्यागमें मोहपूर्वक कर्मोंका स्वरुपसे त्याग किया जाता है परन्तु सात्त्विक त्यागमें कर्मोंका स्वरूपसे त्याग नहीं किया जाता? प्रत्युत कर्मोंको सावधानी एवं तत्परतासे? विधिपूर्वक? निष्कामभावसे किया जाता है। सात्त्विक त्यागसे कर्म और कर्मफलरूप शरीरसंसारसे सम्बन्धविच्छेद हो जाता है। राजस और तामस त्यागमें कर्मोंका स्वरूपसे त्याग करनेसे केवल बाहरसे कर्मोंसे सम्बन्धविच्छेद दीखता है परन्तु वास्तवमें (भीतरसे) सम्बन्धविच्छेद नहीं होता। इसका कारण यह है कि शरीरके कष्टके भयसे कर्मोंका त्याग करनेसे कर्म तो छूट जाते हैं? पर अपने सुख और आरामके साथ सम्बन्ध जुड़ा ही रहता है। ऐसे ही मोहपूर्वक कर्मोंका त्याग करनेसे कर्म तो छूट जाते हैं? पर मोहके साथ सम्बन्ध जुड़ा रहता है। तात्पर्य यह हुआ कि कर्मोंका स्वरूपसे त्याग करनेपर बन्धन होता है और कर्मोंको तत्परतासे विधिपूर्वक करनेपर मुक्ति (सम्बन्धविच्छेद) होती है। सम्बन्ध -- छठे श्लोकमें एतानि और अपि तु पदोंसे कहे गये यज्ञ? दान? तप आदि शास्त्रविहित कर्मोंके करनेमें और शास्त्रनिषिद्ध तथा काम्य कर्मोंका त्याग करनेमें क्या भाव होना चाहिये यह आगेके श्लोकमें बताते हैं।
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।।18.9।।हे अर्जुन ! 'केवल कर्तव्यमात्र करना है' -- ऐसा समझकर जो नियत कर्म आसक्ति और फलका त्याग करके किया जाता है, वही सात्त्विक त्याग माना गया है।
न द्वेष्ट्यकुशलं कर्म कुशले नानुषज्जते।
त्यागी सत्त्वसमाविष्टो मेधावी छिन्नसंशयः ॥
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।।18.10।। व्याख्या -- न द्वेष्ट्यकुशलं कर्म -- जो शास्त्रविहित शुभकर्म फलकी कामनासे किये जाते हैं और परिणाममें जिनसे पुनर्जन्म होता है (गीता 2। 42 -- 44 9। 20 -- 21) तथा जो शास्त्रनिषिद्ध पापकर्म हैं और परिणाममें जिनसे नीच योनियों तथा नरकोंमें जाना पड़ता है (गीता 16। 7 -- 20)? वे सबकेसब कर्म अकुशल कहलाते हैं। साधक ऐसे अकुशल कर्मोंका त्याग तो करता है? पर द्वेषपूर्वक नहीं। कारण कि द्वेषपूर्वक त्याग करनेसे कर्मोंसे तो सम्बन्ध छूट जाता है? पर द्वेषके साथ सम्बन्ध जुड़ जाता है? जो शास्त्रविहित काम्यकर्मोंसे तथा शास्त्रनिषिद्ध पापकर्मोंसे भी भयंकर है।कुशले नानुषज्जते -- शास्त्रविहित कर्मोंमें भी जो वर्ण? आश्रम? परिस्थिति आदिके अनुसार नियत हैं और जो आसक्ति तथा फलेच्छाका त्याग करके किये जाते हैं तथा परिणाममें जिनसे मुक्ति होती है? ऐसे सभी कर्म कुशल कहलाते हैं। साधक ऐसे कुशल कर्मोंको करते हुए भी उनमें आसक्त नहीं होता।त्यागी -- कुशल कर्मोंके करनेमें जिसका राग नहीं होता और अकुशल कर्मोंके त्यागमें जिसका द्वेष नहीं होता? वही असली त्यागी है (टिप्पणी प0 878)। परन्तु वह त्याग पूर्णतया तब सिद्ध होता है? जब कर्मोंको करने अथवा न करनेसे अपनेमें कोई फरक न पड़े अर्थात् निरन्तर निर्लिप्तता बनी रहे (गीता 3। 18 4। 18)। ऐसा होनेपर साधक योगारूढ़ हो जाता है (गीता 6। 4)।मेधावी -- जिसके सम्पूर्ण कार्य साङ्गोपाङ्ग होते हैं और संकल्प तथा कामनासे रहित होते हैं तथा ज्ञानरूप अग्निसे जिसने सम्पूर्ण कर्मोंको भस्म कर दिया है? उसे पण्डित भी पण्डित (मेधावी अथवा बुद्धिमान्) कहते हैं (गीता 4। 19)। कारण कि कर्मोंको करते हुए भी कर्मोंसे लिपायमान न होना बड़ी बुद्धिमत्ता है।इसी मेधावीको चौथे अध्यायके अठारहवें श्लोकमें स बुद्धिमान्मनुष्येषु पदोंसे सम्पूर्ण मनुष्योंमें बुद्धिमान् बताया गया है।छिन्नसंशयः -- उस त्यागी पुरुषमें कोई सन्देह नहीं रहता। तत्त्वमें अभिन्नभावसे स्थित रहनेके कारण उसमें किसी तरहका संदेह रहनेकी सम्भावना ही नहीं रहती। सन्देह तो वहीं रहता है? जहाँ अधूरा ज्ञान होता है अर्थात् कुछ जानते हैं और कुछ नहीं जानते।सत्त्वसमाविष्टः -- आसक्ति आदिका त्याग होनेसे उसकी अपने स्वरूपमें? चिन्मयतामें स्वतः स्थिति हो जाती है। इसलिये उसे सत्त्वसमाविष्टः कहा गया है। इसीको पाँचवें अध्यायके उन्नीसवें श्लोकमें तस्माद्ब्रह्मणि ते,स्थिताः पदोंसे परमात्मामें स्थित बताया गया है। सम्बन्ध -- कर्मोंको करनेमें राग न हो और छोड़नेमें द्वेष न हो -- इतनी झंझट क्यों की जाय कर्मोंका सर्वथा ही त्याग क्यों न कर दिया जाय -- इस शङ्काको दूर करनेके लिये आगेका श्लोक कहते हैं।
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।।18.10।।जो अकुशल कर्मसे द्वेष नहीं करता और कुशल कर्ममें आसक्त नहीं होता, वह त्यागी, बुद्धिमान्, सन्देहरहित और अपने स्वरूपमें स्थित है।
न हि देहभृता शक्यं त्यक्तुं कर्माण्यशेषतः।
यस्तु कर्मफलत्यागी स त्यागीत्यभिधीयते ॥
Commentary · Hindi
।।18.11।। व्याख्या -- न हि देहभृता (टिप्पणी प0 879.1) शक्यं त्यक्तुं कर्माण्यशेषतः -- देहधारी अर्थात् देहके साथ तादात्म्य रखनेवाले मनुष्योंके द्वारा कर्मोंका सर्वथा त्याग होना सम्भव नहीं है क्योंकि शरीर प्रकृतिका कार्य है और प्रकृति स्वतः क्रियाशील है। अतः शरीरके साथ तादात्म्य (एकता) रखनेवाला क्रियासे रहित कैसे हो सकता है हाँ? यह हो सकता है कि मनुष्य यज्ञ? दान? तप? तीर्थ आदि कर्मोंको छोड़ दे परन्तु वह खानापीना? चलनाफिरना? आनाजाना? उठनाबैठना? सोनाजागना आदि आवश्यक शारीरिक क्रियाओंको कैसे छोड़ सकता हैदूसरी बात? भीतरसे कर्मोंका सम्बन्ध छोड़ना ही वास्तवमें छोड़ना है। बाहरसे सम्बन्ध नहीं छोड़ा जा सकता। यदि बाहरसे सम्बन्ध छोड़ भी दिया जाय तो वह कबतक छूटा रहेगा जैसे कोई समाधि लगा ले तो उस समय बाहरकी क्रियाओंका सम्बन्ध छूट जाता है। परन्तु समाधि भी एक क्रिया है? एक कर्म है क्योंकि इसमें प्रकृतिजन्य कारणशरीरका सम्बन्ध रहता है। इसलिये समाधिसे भी व्युत्थान होता है।कोई भी देहधारी मनुष्य कर्मोंका स्वरूपसे सम्बन्धविच्छेद नहीं कर सकता (गीता 3। 5)। कर्मोंका आरम्भ किये बिना? निष्कर्मता (योगनिष्ठा) प्राप्त नहीं होती और कर्मोंका त्याग करनेमात्रसे सिद्धि (सांख्यनिष्ठा) भी प्राप्त नहीं होती (गीता 3। 4)।मार्मिक बातपुरुष (चेतन) सदा निर्विकार और एकरस रहनेवाला है परन्तु प्रकृति विकारी और सदा परिवर्तनशील है। जिसमें अच्छी रीतिसे क्रियाशीलता हो? उसको प्रकृति कहते हैं -- प्रकर्षेण करणं (भावे ल्युट्) इति प्रकृतिः।उस प्रकृतिके कार्य शरीरके साथ जबतक पुरुष अपना सम्बन्ध (तादात्म्य) मानता रहेगा? तबतक वह कर्मोंका सर्वथा त्याग कर ही नहीं सकता। कारण कि शरीरमें अहंताममता होनेके कारण मनुष्य शरीरसे होनेवाली प्रत्येक क्रियाको अपनी क्रिया मानता है? इसलिये वह कभी किसी अवस्थामें भी क्रियारहित नहीं हो सकता।दूसरी बात? केवल पुरुषने ही प्रकृतिके साथ अपना सम्बन्ध जोड़ा है। प्रकृतिने पुरुषके साथ सम्बन्ध नहीं जोड़ा है। जहाँ विवेक रहता है? वहाँ पुरुषने विवेककी उपेक्षा करके प्रकृतिसे सम्बन्धकी सद्भावना कर ली अर्थात् सम्बन्धको सत्य मान लिया। सम्बन्धको सत्य माननेसे ही बन्धन हुआ है। वह सम्बन्ध दो तरहका होता है -- अपनेको शरीर मानना और शरीरको अपना मानना। अपनेको शरीर माननेसे अहंता और शरीरको अपना माननेसे ममता होती है। इस अहंताममतारूप सम्बन्धका घनिष्ठ होना ही देहधारीका स्वरूप है। ऐसा देहधारी मनुष्य कर्मोंको सर्वथा नहीं छोड़ सकता।यस्तु (टिप्पणी प0 879.2) कर्मफलत्यागी स त्यागीत्यभिधीयते -- जो किसी भी कर्म और फलके साथ अपना सम्बन्ध नहीं रखता? वही त्यागी है। जबतक मनुष्य कुशलअकुशलके साथ? अच्छेमन्देके साथ अपना सम्बन्ध रखता है? तबतक वह त्यागी नहीं है।यह पुरुष जिस प्राकृत क्रिया और पदार्थको अपना मानता है? उसमें उसकी प्रियता हो जाती है। उसी,प्रियताका नाम है -- आसक्ति। यह आसक्ति ही वर्तमानके कर्मोंको लेकर कर्मासक्ति और भविष्यमें मिलनेवाले फलकी इच्छाको लेकर फलासक्ति कहलाती है। जब मनुष्य फलत्यागका उद्देश्य बना लेता है? तब उसके सब कर्म संसारके हितके लिये होने लगते हैं? अपने लिये नहीं। कारण कि उसको यह बात अच्छी तरहसे समझमें आ जाती है कि कर्म करनेकी सबकीसब सामग्री संसारसे मिली है और संसारकी ही है? अपनी नहीं। इन कर्मोंका भी आदि और अन्त होता है तथा उनका फल भी उत्पन्न और नष्ट होनेवाला होता है परन्तु स्वयं सदा निर्विकार रहता है न उत्पन्न होता है? न नष्ट होता है और न कभी विकृत ही होता है। ऐसा विवेक होनेपर फलेच्छाका त्याग सुगमतासे हो जाता है। फलका त्याग करनेमें उस विवेककी मनुष्यमें कभी अभिमान भी नहीं आता क्योंकि कर्म और उसका फल -- दोनों ही अपनेसे प्रतिक्षण वियुक्त हो रहे हैं अतः उनके साथ हमारा सम्बन्ध वास्तवमें है ही कहाँ इसीलिये भगवान् कहते हैं कि जो कर्मफलका त्यागी है? वही त्यागी कहा जाता है।निर्विकारका विकारी कर्मफलके साथ सम्बन्ध कभी था नहीं? है नहीं? हो सकता नहीं और होनेकी सम्भावना भी नहीं है। केवल अविवेकके कारण सम्बन्ध माना हुआ था। उस अविवेकके मिटनेसे मनुष्यकी अभिधा अर्थात् उसका नाम त्यागी हो जाता है -- स त्यागीत्यभिधीयते। माने हुए सम्बन्धके विषयमें दृष्टान्तरूपसे एक बात कही जाती है। एक व्यक्ति घरपरिवारको छोड़कर सच्चे हृदयसे साधुसंन्यासी हो जाता है तो उसके बाद घरवालोंकी कितनी ही उन्नति अथवा अवनति हो जाय अथवा सबकेसब मर जायँ? उनका नामोनिशान भी न रहे? तो भी उसपर कोई असर नहीं पड़ता। इसमें विचार करें कि उस व्यक्तिका परिवारके साथ जो सम्बन्ध था? वह दोनों तरफसे माना हुआ था अर्थात् वह परिवारको अपना मानता था और परिवार उसको अपना मानता था। परन्तु पुरुष और प्रकृतिका सम्बन्ध केवल पुरुषकी तरफसे माना हुआ है? प्रकृतिकी तरफसे माना हुआ नहीं जब दोनों तरफसे माना हुआ (व्यक्ति और परिवारका) सम्बन्ध भी एक तरफसे छोड़नेपर छूट जाता है? तब केवल एक तरफसे माना हुआ (पुरुष और प्रकृतिका) सम्बन्ध छोड़नेपर छूट जाय? इसमें कहना ही क्या है सम्बन्ध -- पूर्वश्लोकमें कहा गया कि कर्मफलका त्याग करनेवाला ही वास्तवमें त्यागी है। अगर मनुष्य कर्मफलका त्याग न करे तो क्या होता है -- इसे आगेके श्लोकमें बताते हैं।
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।।18.11।।कारण कि देहधारी मनुष्यके द्वारा सम्पूर्ण कर्मोंका त्याग करना सम्भव नहीं है। इसलिये जो कर्मफलका त्यागी है, वही त्यागी है -- ऐसा कहा जाता है।
अनिष्टमिष्टं मिश्रं च त्रिविधं कर्मणः फलम्।
भवत्यत्यागिनां प्रेत्य न तु संन्यासिनां क्वचित् ॥
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।।18.12।। व्याख्या -- अनिष्टमिष्टं मिश्रं च त्रिविधं कर्मणः फलम् -- कर्मका फल तीन तरहका होता है -- इष्ट? अनिष्ट और मिश्र। जिस परिस्थितिको मनुष्य चाहता है? वह इष्ट कर्मफल है? जिस परिस्थितिको मनुष्य नहीं चाहता? वह अनिष्ट कर्मफल है और जिसमें कुछ भाग इष्टका तथा कुछ भाग अनिष्टका है? वह मिश्र कर्मफल है। वास्तवमें देखा जाय तो संसारमें प्रायः मिश्रित ही फल होता है जैसे -- धन होनेसे अनुकूल (इष्ट) और प्रतिकूल (अनिष्ट) -- दोनों ही परिस्थितियाँ आती हैं धनसे निर्वाह होता है -- यह अनुकूलता है और टैक्स लगता है? धन नष्ट हो जाता है? छिन जाता है -- यह प्रतिकूलता है। तात्पर्य है कि इष्टमें भी आंशिक अनिष्ट और अनिष्टमें भी आंशिक इष्ट रहता ही है। कारण कि सम्पूर्ण संसार त्रिगुणात्मक है (गीता 18। 40) यह जन्म भी दुःखालय (8। 15) और सुखरहित (9। 33)। अतः चाहे इष्ट (अनुकूल) परिस्थिति हो? चाहे अनिष्ट (प्रतिकूल) परिस्थिति हो? वह सर्वथा अनुकूल या प्रतिकूल होती ही नहीं। यहाँ इष्ट और अनिष्ट कहनेका मतलब यह है कि इष्टमें अनुकूलताकी और अनिष्टमें प्रतिकूलताकी प्रधानता होती है। वास्तवमें कर्मोंका फल मिश्रित ही होता है क्योंकि कोई भी कर्म सर्वथा निर्दोष नहीं होता (18। 48)।भवत्यत्यागिनां प्रेत्य -- उपर्युक्त सभी फल अत्यागियोंको अर्थात् फलकी इच्छा रखकर कर्म करनेवालोंको ही मिलते हैं? संन्यासियोंको नहीं। कारण कि जितने भी कर्म होते हैं? वे सब प्रकृतिके द्वारा अर्थात् प्रकृतिके कार्य शरीर? इन्द्रियाँ? मन और बुद्धिके द्वारा ही होते हैं तथा फलरूप परिस्थिति भी प्रकृतिके द्वारा ही बनती है।,इसलिये कर्मोंका और उनके फलोंका सम्बन्ध केवल प्रकृतिके साथ है? स्वयं(चेतन स्वरूप) के साथ नहीं। परन्तु जब स्वयं उनसे सम्बन्ध तोड़ लेता है? तो फिर वह भोगी नहीं बनता? प्रत्युत त्यागी हो जाता है।अत्यागीका मतलब है -- पीछेके दो (दसवेंग्यारहवें) श्लोकोंमें जिन त्यागियोंकी बात आयी है? उनके समान जो त्यागी नहीं है अर्थात् जिन्होंने कर्मफलका त्याग नहीं किया है? ऐसे अत्यागी मनुष्योंके सामने इष्ट? अनिष्ट और मिश्र -- तीनों कर्मफल अनुकल या प्रतिकूल परिस्थितिके रूपमें आते रहते हैं? जिनसे वे सुखीदुःखी होते रहते हैं। उनसे सुखीदुःखी होना ही वास्तवमें बन्धन है।वास्तवमें अनुकूलतासे सुखी होना ही प्रतिकूलतामें दुःखी होनेका कारण है क्योंकि परिस्थितिजन्य सुख भोगनेवाला कभी दुःखसे बच ही नहीं सकता। जबतक वह सुख भोगता रहेगा? तबतक वह प्रतिकूल परिस्थितियोंमें दुःखी होता ही रहेगा। चिन्ता? शोक? भय? उद्वेग आदि उसको कभी छोड़ नहीं सकते और वह भी इनसे कभी छूट नहीं सकता।प्रेत्य भवति कहनेका तात्पर्य है कि जो कर्मफलके त्यागी नहीं हैं? उनको इष्ट? अनिष्ट और मिश्र -- ये तीनों कर्मफल मरनेके बाद जरूर मिलते हैं। परन्तु इसके साथ न तु संन्यासिनां क्वचित् पदोंमें कहा गया है कि जो कर्मफलके त्यागी हैं? उनको कहीं भी अर्थात् यहाँ और मरनेके बाद भी कर्मफल नहीं मिलता। इससे सिद्ध होता है कि अत्यागियोंको मरनेके बाद तो कर्मफल मिलता ही है? पर यहाँ जीतेजी भी कर्मफल मिल सकता है।न तु संन्यासिनां क्वचित् -- संन्यासियों(त्यागियों) को कहीं भी अर्थात् इस लोकमें या परलोकमें? इस जन्ममें या मरनेके बाद भी कर्मफल भोगना नहीं पड़ता। हाँ? पूर्वजन्ममें किये हुए कर्मोंके अनुसार इस जन्ममें उनके सामने अनुकूल या प्रतिकूल परिस्थिति तो आती है? पर वे अपने विवेकके बलसे उन परिस्थितियोंके भोगी नहीं बनते? उनसे सुखीदुःखी नहीं होते अर्थात् सर्वथा निर्लिप्त रहते हैं।संन्यासियों अर्थात् त्यागियोंको फल क्यों नहीं भोगना पड़ता कारण कि वे अपने लिये कुछ भी नहीं करते। उनको अच्छी तरहसे यह विवेक हो जाता है कि अपना जो सत्स्वरूप है? उसके लिये किसी भी क्रिया और वस्तुकी आवश्यकता है ही नहीं। अपने लिये पानेकी इच्छासे साधक कुछ भी करता है तो वह अपने व्यक्तित्वको ही स्थिर रखता है क्योंकि वह संसारमात्रके हितसे अपना हित अलग मानता है। जब वह संसारमात्रके हितसे अपना हित अलग नहीं मानता अर्थात् सबके हितमें ही अपना हित मानता है? तब वह स्वतः सर्वभूतहिते रताः हो जाता है। फिर उसके स्थूलशरीरसे होनेवाली क्रियाएँ? सूक्ष्मशरीरसे होनेवाला परहितचिन्तन और कारणशरीरसे होनेवाली स्थिरता -- तीनों ही संसारके मात्र प्राणियोंके हितके लिये होती हैं। कारण कि शरीर आदि सबकीसब सामग्री संसारसे अभिन्न है। उस सामग्रीसे अपना हित चाहता है -- यही गलती होती है? जो कि अपनी परिच्छिन्नतामें हेतु है।यहाँ संन्यासिनाम् पदमें त्यागी (कर्मयोगी) और संन्यासी (सांख्ययोगी) -- दोनोंकी एकता की गयी है जैसे -- कर्मयोगी कर्मोंसे असङ्ग रहता है तो सांख्ययोगी भी कर्मोंसे सर्वथा निर्लिप्त रहता है। कर्मयोगी (निष्कामभावसे) कर्म करते हुए भी फलके साथ सम्बन्ध नहीं रखता तो सांख्ययोगी कर्ममात्रके साथ किञ्चित् भी सम्बन्ध नहीं रखता। कर्मयोगी फलसे सम्बन्धविच्छेद करता है अर्थात् ममताका त्याग करता है तो सांख्ययोगी कर्तृत्वाभिमान अर्थात् अहंताका त्याग करता है। ममताका त्याग होनेपर अहंताका भी स्वतः त्याग हो जाता है और अहंताका त्याग होनेपर ममताका भी स्वतः त्याग हो जाता है। इसलिये भगवान्ने कर्मयोगमें ममताके त्यागके बाद अहंताका त्याग बताया है -- निर्ममो निरहंकारः (2। 71) और सांख्ययोगमें अहंताके त्यागके बाद ममताका त्याग बताया है -- अहंकारं बलं दर्पं कामं क्रोधं परिग्रहम्। विमुच्य निर्ममः ৷৷. (18। 53)। इन दोनोंकी इस त्याग करनेकी प्रक्रियामें तो फरक है परन्तु परिवर्तनशील प्रकृति और प्रकृतिका कार्य, -- इनमेंसे किसीके भी साथ इन दोनोंका सम्बन्ध नहीं रहता अर्थात् तत्त्वमें कर्मयोगी और सांख्ययोगी -- दोनों एक हो जाते हैं।पहले अर्जुनने यह पूछा था कि मैं संन्यास और त्यागका तत्त्व जानना चाहता हूँ अतः भगवान्ने यहाँ संन्यासिनाम् पदसे दोनोंका यह तत्त्व बताया कि कर्मयोगीका यह भाव रहता है कि अपना कुछ नहीं है? अपने लिये कुछ नहीं चाहिये और अपने लिये कुछ नहीं करना है। ऐसे ही सांख्ययोगीका यह भाव रहता है कि अपना कुछ नहीं है और अपने लिये कुछ नहीं चाहिये। सांख्ययोगी प्रकृति और प्रकृतिके कार्यके साथ किञ्चिन्मात्र भी अपना सम्बन्ध नहीं मानता? इसलिये उसके लिये अपने लिये कुछ नहीं करना है -- यह कहना ही नहीं बनता।यहाँ त्यागिनाम् पद न देकर संन्यासिनाम् पद देनेका यह तात्पर्य है कि जो निर्लिप्तता सांख्ययोगसे होती है? वही निर्लिप्तता त्यागसे अर्थात् कर्मयोगसे भी होती है (गीता 5। 4 -- 5)। दूसरी बात? यहाँतक भगवान्ने कर्मयोगसे निर्लिप्तता बतायी? अब संन्यासिनाम् पद कहकर आगे सांख्ययोगसे निर्लिप्तता बतानेका बीज भी डाल देते हैं।कर्मसम्बन्धी विशेष बातपुरुष और प्रकृति -- ये दो हैं। इनमेंसे पुरुषमें कभी परिवर्तन नहीं होता और प्रकृति कभी परिवर्तनरहित नहीं होती। जब यह पुरुष प्रकृतिके साथ सम्बन्ध जोड़ लेता है? तब प्रकृतिकी क्रिया पुरुषका कर्म बन जाता है क्योंकि प्रकृतिके साथ सम्बन्ध माननेसे तादात्म्य हो जाता है। तादात्म्य होनेसे जो प्राकृत वस्तुएँ प्राप्त हैं? उनमें ममता होती है और उस ममताके कारण अप्राप्त वस्तुओंकी कामना होती है। इस प्रकार जबतक कामना? ममता और तादात्म्य रहता है? तबतक जो कुछ परिवर्तनरूप क्रिया होती है? उसका नाम कर्म है।तादात्म्यके टूटनेपर वही कर्म पुरुषके लिये अकर्म हो जाता है अर्थात् वह कर्म क्रियामात्र रह जाता है? उसमें फलजनकता नहीं रहती -- यह कर्ममें अकर्म है। अकर्मअवस्थामें अर्थात् स्वरूपका अनुभव होनेपर उस महापुरुषके शरीरसे जो क्रिया होती रहती है? वह अकर्ममें कर्म है (गीता 4। 18)। तात्पर्य यह हुआ कि अपने निर्लिप्त स्वरूपका अनुभव न होनेपर भी वास्तवमें सब क्रियाएँ प्रकृति और उसके कार्य शरीरमें होती हैं परन्तु प्रकृति या शरीरसे अपनी पृथक्ताका अनुभव न होनेसे वे क्रियाएँ कर्म बन जाती हैं (गीता 3। 27 13। 29)।कर्म तीन तरहके होते हैं -- क्रियमाण? सञ्चित और प्रारब्ध। अभी वर्तमानमें जो कर्म किये जाते हैं? वे क्रियमाण कर्म कहलाते हैं (टिप्पणी प0 882.1)। वर्तमानसे पहले इस जन्ममें किये हुए अथवा पहलेके अनेक मनुष्यजन्मोंमें किये हुए जो कर्म संगृहीत हैं? वे सञ्चित कर्म कहलाते हैं। सञ्चितमेंसे जो कर्म फल देनेके लिये प्रस्तुत (उन्मुख) हो गये हैं अर्थात् जन्म? आयु और अनुकूलप्रतिकूल परिस्थितिके रूपमें परिणत होनेके लिये सामने आ गये हैं? वे प्रारब्ध कर्म कहलाते हैं।क्रियमाण कर्म दो तरहके होते हैं -- शुभ और अशुभ। जो कर्म शास्त्रानुसार विधिविधानसे किये जाते हैं? वे शुभकर्म कहलाते हैं और काम? क्रोध? लोभ? आसक्ति आदिको लेकर जो शास्त्रनिषिद्ध कर्म किये जाते हैं? वे अशुभकर्म कहलाते हैं।शुभ अथवा अशुभ प्रत्येक क्रियमाण कर्मका एक तो फलअंश बनता है और एक संस्कारअंश। ये दोनों भिन्नभिन्न हैं।चित्रक्रियमाण कर्म फलअंश संस्कारअंश दृष्ट अदृष्ट तात्कालिक कालान्तिरक लौकिक पारलौकिक शुद्ध अशुद्धक्रियमाण कर्मके फलअंशके दो भेद हैं -- दृष्ट और अदृष्ट। इनमेंसे दृष्टके भी दो भेद होते हैं -- तात्कालिक और कालान्तिरक। जैसे? भोजन करते हुए जो रस आता है? सुख होता है? प्रसन्नता होती है और तृप्ति होती है -- यह दृष्टका तात्कालिक फल है और भोजनके परिणाममें आयु? बल? आरोग्य आदिका बढ़ना -- यह दृष्टका कालान्तिरक फल है। ऐसे ही जिसका अधिक मिर्च खानेका स्वभाव है? वह जब अधिक मिर्चवाले पदार्थ खाता है? तब उसको प्रसन्नता होती है? सुख होता है और मिर्चकी तीक्ष्णताके कारण मुँहमें? जीभमें जलन होती है? आँखोंसे और नाकसे पानी निकलता है? सिरसे पसीना निकलता है -- यह दृष्टका तात्कालिक फल है और कुपथ्यके कारण परिणाममें पेटमें जलन और रोग? दुःख आदिका होना -- यह दृष्टका कालान्तिरक फल है।इसी प्रकार अदृष्टके दो भी भेद होते हैं -- लौकिक और पारलौकिक। जीतेजी ही फल मिल जाय -- इस भावसे यज्ञ? दान? तप? तीर्थ? व्रत? मन्त्रजप आदि शुभकर्मोंको विधिविधानसे किया जाय और उसका कोई प्रबल प्रतिबन्ध न हो तो यहाँ ही पुत्र? धन? यश? प्रतिष्ठा आदि अनुकूलकी प्राप्ति होना और रोग? निर्धनता आदि प्रतिकूलकी निवृत्ति होना -- यह अदृष्टका लौकिक फल है (टिप्पणी प0 882.2) और मरनेके बाद स्वर्ग आदिकी प्राप्ति हो जाय -- इस भावसे यथार्थ विधिविधान और श्रद्धाविश्वासपूर्वक जो यज्ञ? दान? तप? आदि शुभकर्म किये जायँ तो मरनेके बाद स्वर्ग आदि लोकोंकी प्राप्ति होना -- यह अदृष्टका पारलौकिक फल है। ऐसे ही डाका डालने? चोरी करने? मनुष्यकी हत्या करने आदि अशुभकर्मोंका फल यहाँ ही कैद? जुर्माना? फाँसी आदि होना -- यह अदृष्टका लौकिक फल है और पापोंके कारण मरनेके बाद नरकोंमें जाना और पशुपक्षी? कीटपतंग आदि बनना -- यह अदृष्टका पारलौकिक फल है।पापपुण्यके इस लौकिक और पारलौकिक फलके विषयमें एक बात और समझनेकी है कि जिन पापकर्मोंका फल यहीं कैद? जुर्माना? अपमान? निन्दा आदिके रूपमें भोग लिया है? उन पापोंका फल मरनेके बाद भोगना नहीं पड़ेगा। परन्तु व्यक्तिके पाप कितनी मात्राके थे और उनका भोग कितनी मात्रामें हुआ अर्थात् उन पापकर्मोंका फल उसने पूरा भोगा या अधूरा भोगा -- इसका पूरा पता मनुष्यको नहीं लगता क्योंकि मनुष्यके पास इसका कोई मापतौल नहीं है। परन्तु भगवान्को इसका पूरा पता है अतः उनके कानूनके अनुसार उन पापोंका फल यहाँ जितने अंशमें कम भोगा गया है? उतना इस जन्ममें या मरनेके बाद भोगना ही पड़ेगा। इसलिये मनुष्यको ऐसी शङ्का नहीं करनी चाहिये कि मेरा पाप तो कम था? पर दण्ड अधिक भोगना पड़ा अथवा मैंने पाप तो किया नहीं? पर दण्ड मुझे मिल गया कारण कि यह सर्वज्ञ? सर्वसुहृद्? सर्वसमर्थ भगवान्का विधान है कि पापसे अधिक दण्ड कोई नहीं भोगता और जो दण्ड मिलता है? वह किसीनकिसी पापका ही फल होता है (टिप्पणी प0 883)।इसी तरह धनसम्पत्ति? मान? आदर? प्रशंसा? नीरोगता आदि अनुकूल परिस्थितिके रूपमें पुण्यकर्मोंका जितना फल यहाँ भोग लिया है? उतना अंश तो यहाँ नष्ट हो ही गया और जितना बाकी रह गया है? वह परलोकमें फिर भोगा जा सकता है। यदि पुण्यकर्मोंका पूरा फल यहीं भोग लिया गया तो पुण्य यहींपर समाप्त हो जायँगे।क्रियमाणकर्मके संस्कारअंशके भी दो भेद हैं -- शुद्ध एवं पवित्र संस्कार और अशुद्ध एवं अपवित्र संस्कार। शास्त्रविहित कर्म करनेसे जो संस्कार पड़ते हैं? वे शुद्ध एवं पवित्र होते हैं और शास्त्र? नीति? लोकमर्यादाके विरुद्ध कर्म करनेसे जो संस्कार पड़ते हैं? वे अशुद्ध एवं अपवित्र होते हैं।इन दोनों शुद्ध और अशुद्ध संस्कारोंको लेकर स्वभाव (प्रकृति? आदत) बनता है। उन संस्कारोंमेंसे अशुद्ध अंशका सर्वथा नाश करनेपर स्वभाव शुद्ध? निर्मल? पवित्र हो जाता है परन्तु जिन पूर्वकृत कर्मोंसे स्वभाव बना है? उन कर्मोंकी भिन्नताके कारण जीवन्मुक्त पुरुषोंके स्वभावोंमें भी भिन्नता रहती है। इन विभिन्न स्वभावोंके कारण ही उनके द्वारा विभिन्न कर्म होते हैं? पर वे कर्म दोषी नहीं होते? प्रत्युत सर्वथा शुद्ध होते हैं और उन कर्मोंसे दुनियाका कल्याण होता है।संस्कारअंशसे जो स्वभाव बनता है? वह एक दृष्टिसे महान् प्रबल होता है -- स्वभावो मूर्ध्नि वर्तते अतः उसे मिटाया नहीं जा सकता (टिप्पणी प0 884)। इसी प्रकार ब्राह्मण? क्षत्रिय आदि वर्णोंका जो स्वभाव है? उसमें कर्म करनेकी मुख्यता रहती है। इसलिये भगवान्ने अर्जुनसे कहा है कि जिस कर्मको तू मोहवश नहीं करना चाहता? उसको भी अपने स्वाभाविक कर्मसे बँधा हुआ परवश होकर करेगा (गीता 18। 60)।अब इसमें विचार करनेकी एक बात है कि एक ओर तो स्वभावकी महान् प्रबलता है कि उसको कोई छोड़ ही नहीं सकता और दूसरी ओर मनुष्यजन्मके उद्योगकी महान् प्रबलता है कि मनुष्य सब कुछ करनेमें स्वतन्त्र है। अतः इन दोनोंमें किसकी विजय होगी और किसकी पराजय होगी इसमें विजयपराजयकी बात नहीं है। अपनीअपनी जगह दोनों ही प्रबल हैं। परन्तु यहाँ स्वभाव न छोड़नेकी जो बात है? वह जातिविशेषके स्वभावकी बात है। तात्पर्य है कि जीव जिस वर्णमें जन्मा है? जैसा रजवीर्य था? उसके अनुसार बना हुआ जो स्वभाव है? उसको कोई बदल नहीं सकता अतः वह स्वभाव दोषी नहीं है? निर्दोष है। जैसे? ब्राह्मण? क्षत्रिय आदि वर्णोंका जो स्वभाव है? वह स्वभाव नहीं बदल सकता और उसको बदलनेकी आवश्कयकता भी नहीं है तथा उसको बदलनेके लिये शास्त्र भी नहीं कहता। परन्तु उस स्वभावमें जो अशुद्धअंश (रागद्वेष) है? उसको मिटानेकी सामर्थ्य भगवान्ने मनुष्यको दी है। अतः जिन दोषोंसे मनुष्यका स्वभाव अशुद्ध बना है? उन दोषोंको मिटाकर मनुष्य स्वतन्त्रतापूर्वक अपने स्वभावको शुद्ध बना सकता है। मनुष्य चाहे तो कर्मयोगकी दृष्टिसे अपने प्रयत्नसे रागद्वेषको मिटाकर स्वभाव शुद्ध बना ले (गीता 3। 34)? चाहे भक्तियोगकी दृष्टिसे सर्वथा भगवान्के शरण होकर अपना स्वभाव शुद्ध बना ले (गीता 18। 62)। इस प्रकार प्रकृति(स्वभाव) की प्रबलता भी सिद्ध हो गयी और मनुष्यकी स्वतन्त्रता भी सिद्ध हो गयी। तात्पर्य यह हुआ कि शुद्ध स्वभावको रखनेमें प्रकृतिकी प्रबलता है और अशुद्ध स्वभावको मिटानेमें मनुष्यकी स्वतन्त्रता है।जैसे? लोहेकी तलवारको पारस छुआ दिया जाय तो तलवार सोना बन जाती है परन्तु उसकी मार? धार और आकार -- ये तीनों नहीं बदलते। इस प्रकार सोना बनानेमें पारसकी प्रधानता रही और मारधारआकार में तलवारकी प्रधानता रही। ऐसे ही जिन लोगोंने अपने स्वभावको परम शुद्ध बना लिया है? उनके कर्म भी सर्वथा शुद्ध होते हैं। परन्तु स्वभावके शुद्ध होनेपर भी वर्ण? आश्रम? सम्प्रदाय? साधनपद्धति? मान्यता आदिके अनुसार आपसमें उनके कर्मोंकी भिन्नता रहती है। जैसे? किसी ब्राह्मणको तत्त्वबोध हो जानेपर भी वह खानपान आदिमें पवित्रता रखेगा और अपने हाथसे बनाया हुआ भोजन ही ग्रहण करेगा क्योंकि उसके,स्वभावमें पवित्रता है। परन्तु किसी हरिजन आदि साधारण वर्णवालेको तत्त्वबोध हो जाय तो वह खानपान आदिमें पवित्रता नहीं रखेगा और दूसरोंकी जूठन भी खा लेगा क्योंकि उसका स्वभाव ही ऐसा पड़ा हुआ है। पर ऐसा स्वभाव उसके लिये दोषी नहीं होगा।जीवका असत्के साथ सम्बन्ध जोड़नेका स्वभाव अनादिकालसे बना हुआ है? जिसके कारण वह जन्ममरणके चक्करमें पड़ा हुआ है और बारबार ऊँचनीच योनियोंमें जाता है। उस स्वभावको मनुष्य शुद्ध कर सकता है अर्थात् उसमें जो कामना? ममता और तादात्म्य हैं? उनको मिटा सकता है। कामना? ममता और तादात्म्यके मिटनेके बाद जो स्वभाव रहता है? वह स्वभाव दोषी नहीं रहता। इसलिये उस स्वभावको मिटाना नहीं है और मिटानेकी आवश्यकता भी नहीं है।जब मनुष्य अहंकारका आश्रय छोड़ कर सर्वथा भगवान्के शरण हो जाता है? तब उसका स्वभाव शुद्ध हो जाता है जैसे -- लोहा पारसके स्पर्शसे शुद्ध सोना बन जाता है। स्वभाव शुद्ध होनेसे फिर वह स्वभावज कर्म करते हुए भी दोषी और पापी नहीं बनता (गीता 18। 47)। सर्वथा भगवान्के शरण होनेके बाद भक्तका प्रकृतिके साथ कोई सम्बन्ध नहीं रहता। फिर भक्तके जीवनमें भगवान्का स्वभाव काम करता है। भगवान् समस्त प्राणियोंके सुहृद् हैं -- सुहृदं सर्वभूतानाम् (गीता 5। 29) तो भक्त भी समस्त प्राणियोंका सुहृद् हो जाता है -- सुहृदः सर्वदेहिनाम् (श्रीमद्भा0 3। 25। 21)।इसी तरह कर्मयोगकी दृष्टिसे जब मनुष्य रागद्वेषको मिटा देता है? तब उसके स्वभावकी शुद्ध हो जाती है? जिससे अपने स्वार्थका भाव मिटकर केवल दुनियाके हितका भाव स्वतः हो जाता है। जैसे भगवान्का स्वभाव प्राणिमात्रका हित करनेका है? ऐसे ही उसका स्वभाव भी प्राणिमात्रका हित करनेका हो जाता है। जब उसकी सब चेष्टाएँ प्राणिमात्रके हितमें हो जाती हैं? तब उसकी भगवान्की सर्वभूतसुहृत्ताशक्तिके साथ एकता हो जाती है। उसके उस स्वभावमें भगवान्की सुहृत्ताशक्ति कार्य करने लगती है।वास्तवमें भगवान्की यह सर्वभूतसुहृत्ताशक्ति मनुष्यमात्रके लिये समान रीतिसे खुली हुई है परन्तु अपने अहंकार और रागद्वेषके कारण उस शक्तिमें बाधा लग जाती है अर्थात् वह शक्ति कार्य नहीं करती। महापुरुषोंमें अहंकार (व्यक्तित्व) और रागद्वेष नहीं रहते? इसलिये उनमें यह शक्ति कार्य करने लग जाती है।चित्रसञ्चित कर्म फलअंश संस्कारअंश प्रारब्ध स्फुरणाअनेक मनुष्यजन्मोंमें किये हुए जो कर्म (फलअंश और संस्कारअंश) अन्तःकरणमें संगृहीत रहते हैं? वे सञ्चित कर्म कहलाते हैं। उनमें फलअंशसे तो प्रारब्ध बनता है और संस्कारअंशसे स्फुरणा होती रहती है। उन स्फुरणाओंमें भी वर्तमानमें किये गये जो नये क्रियमाण कर्म सञ्चितमें भरती हुए हैं? प्रायः उनकी ही स्फुरणा होती है। कभीकभी सञ्चितमें भरती हुए पुराने कर्मोंकी स्फुरणा भी हो जाती है (टिप्पणी प0 885) जैसे किसी बर्तनमें पहले प्याज डाल दें और उसके ऊपर क्रमशः गेहूँ? चना? ज्वार? बाजरा? डाल दें तो निकालते समय जो सबसे पीछे डाला था? वही (बाजरा) सबसे पहले निकलेगा? पर बीचमें कभीकभी प्याजका भी भभका आ जायेगा। परन्तु यह दृष्टान्त पूरा नहीं घटता क्योंकि प्याज? गेहूँ आदि सावयव,पदार्थ हैं और सञ्चित कर्म निरवयव हैं। यह दृष्टान्त केवल इतने ही अंशमें बतानेके लिये दिया है। कि नये क्रियमाण कर्मोंकी स्फुरणा ज्यादा होती है और कभीकभी पुराने कर्मोंकी भी स्फुरणा होती है।इसी तरह जब नींद आती है तो उसमें भी स्फुरणा होती है। नींदमें जाग्रत्अवस्थाके दब जानेके कारण सञ्चितकी वह स्फुरणा स्वप्नरूपसे दीखने लग जाती है? उसीको स्वप्नावस्था कहते हैं (टिप्पणी प0 886)। स्वप्नावस्थामें बुद्धिकी सावधानी न रहनेके कारण क्रम? व्यतिक्रम और अनुक्रम ये नहीं रहते। जैसे? शहर तो दिल्लीका दीखता है और बाजार बम्बईका तथा उस बाजारमें दूकानें कलकत्ताकी दीखती हैं? कोई जीवित आदमी दीख जाता है अथवा किसी मरे हुए आदमीसे मिलना हो जाता है? बातचीत हो जाती है? आदिआदि।जाग्रत्अवस्थामें हरेक मनुष्यके मनमें अनेक तरहकी स्फुरणाएँ होती रहती हैं। जब जाग्रत्अवस्थामें शरीर? इन्द्रियाँ और मनपरसे बुद्धिका अधिकार हट जाता है? तब मनुष्य जैसा मनमें आता है? वैसा बोलने लगता है। इस तरह उचितअनुचितका विचार करनेकी शक्ति काम न करनेसे वह सीधासरल पागल कहलाता है। परन्तु जिसके शरीर? इन्द्रियाँ और मनपर बुद्धिका अधिकार रहता है? वह जो उचित समझता है? वही बोलता है और जो अनुचित समझता है? वह नहीं बोलता। बुद्धि सावधान रहनेसे वह सावचेत रहता है? इसलिये वह चतुर पागल हैइस प्रकार मनुष्य जबतक परमात्मप्राप्ति नहीं कर लेता? तबतक वह अपनेको स्फुरणाओंसे बचा नहीं सकता। परमात्मप्राप्ति होनेपर बुरी स्फुरणाएँ सर्वथा मिट जाती हैं। इसलिये जीवन्मुक्त महापुरुषके मनमें अपवित्र पुरे विचार कभी आते ही नहीं। अगर उसके कहलानेवाले शरीरमें प्रारब्धवश (व्याधि आदि किसी कारणवश) कभी बेहोशी? उन्माद आदि हो जाता है तो उसमें भी वह न तो शास्त्रनिषिद्ध बोलता है और न शास्त्रनिषिद्ध कुछ करता ही है क्योंकि अन्तःकरण शुद्ध हो जानेसे शास्त्रनिषिद्ध बोलना या करना उसके स्वभावमें नहीं रहता।प्रारब्ध कर्म प्रारब्ध कर्म अनुकूल परिस्थिति मिश्रित (अनुकूलप्रतिकूल) परिस्थिति प्रतिकूल परिस्थिति स्वेच्छापूर्वक क्रिया (प्रवृत्ति) अनिच्छापूर्वक क्रिया परेच्छापूर्वक क्रिया स्वेच्छापूर्वक क्रिया अनिच्छापूर्वक क्रिया परेच्छापूर्वक क्रिया स्वेच्छापूर्वक क्रिया अनिच्छापूर्वक क्रिया परेच्छापूर्वक क्रिया,सञ्चितमेंसे जो कर्म फल देनेके लिये सम्मुख होते हैं? उन कर्मोंको प्रारब्ध कर्म कहते हैं (टिप्पणी प0 887)। प्रारब्ध कर्मोंका फल तो अनुकूल या प्रतिकूल परिस्थितिके रूपमें सामने आता है परन्तु उन प्रारब्ध कर्मोंको भोगनेके लिये प्राणियोंकी प्रवृत्ति तीन प्रकारसे होती है -- (1) स्वेच्छापूर्वक? (2) अनिच्छा(दैवेच्छा)पूर्वक और (3) परेच्छापूर्वक। उदाहरणार्थ --(1) किसी व्यापारीने माल खरीदा तो उसमें मुनाफा हो गया। ऐसे ही किसी दूसरे व्यापारीने माल खरीदा तो उसमें घाटा लग गया। इन दोनोंमें मुनाफा होना और घाटा लगना तो उनके शुभअशुभकर्मोंसे बने हुए प्रारब्धके फल हैं परन्तु माल खरीदनेमें उनकी प्रवृत्ति स्वेच्छापूर्वक हुई है।(2) कोई सज्जन कहीं जा रहा था तो आगे आनेवाली नदीमें बाढ़के प्रवाहके कारण एक धनका टोकरा बहकर आया और उस सज्जनने उसे निकाल लिया। ऐसे ही कोई सज्जन कहीं जा रहा था तो उसपर वृक्षकी एक टहनी गिर पड़ी और उसको चोट लग गयी। इन दोनोंमें धनका मिलना और चोट लगना तो उनके शुभअशुभकर्मोंसे बने हुए प्रारब्धके फल हैं परन्तु धनका टोकरा मिलना और वृक्षकी टहनी गिरना -- यह प्रवृत्ति अनिच्छा(दैवेच्छा) पूर्वक हुई है।(3) किसी धनी व्यक्तिने किसी बच्चेको गोद ले लिया अर्थात् उसको पुत्ररूपमें स्वीकार कर लिया? जिससे उसका सब धन उस बच्चेको मिल गया। ऐसे ही चोरोंने किसीका सब धन लूट लिया। इन दोनोंमें बच्चेको धन मिलना और चोरीमें धनका चला जाना तो उनके शुभअशुभकर्मोंसे बने हुए प्रारब्धके फल हैं परन्तु गोदमें जाना और चोरी होना -- यह प्रवृत्ति परेच्छापूर्वक हुई है।यहाँ एक बात और समझ लेनी चाहिये कि कर्मोंका फल कर्म नहीं होता? प्रत्युत परिस्थिति होती है अर्थात् प्रारब्ध कर्मोंका फल परिस्थितिरूपसे सामने आता है। अगर नये (क्रियमाण) कर्मको प्रारब्धका फल मान लिया जाय तो फिर ऐसा करो? ऐसा मत करो -- यह शास्त्रोंका? गुरुजनोंका विधिनिषेध निरर्थक हो जायगा। दूसरी बात? पहले जैसे कर्म किये थे? उन्हींके अनुसार जन्म होगा और उन्हींके अनुसार कर्म होंगे तो वे कर्म फिर आगे नये कर्म पैदा कर देंगे? जिससे यह कर्मपरम्परा चलती ही रहेगी अर्थात् इसका कभी अन्त ही नहीं जायेगा।प्रारब्ध कर्मसे मिलनेवाले फलके दो भेद हैं -- प्राप्त फल और अप्राप्त फल। अभी प्राणियोंके सामने जो अनुकूल या प्रतिकूल परिस्थिति आ रही है? वह प्राप्त फल है और इसी जन्ममें जो अनुकूल या प्रतिकूल परिस्थिति भविष्यमें आनेवाली है वह अप्राप्त फल है।क्रियमाण कर्मोंका जो फलअंश सञ्चितमें जमा रहता है? वही प्रारब्ध बनकर अनुकूल? प्रतिकूल और मिश्रित परिस्थितिके रूपमें मनुष्यके सामने आता है। अतः जबतक सञ्चित कर्म रहते हैं? तबतक प्रारब्ध बनता ही रहता है और प्रारब्ध परिस्थितिके रूपमें परिणत होता ही रहता है। यह परिस्थिति मनुष्यको सुखीदुःखी होनेके लिये बाध्य नहीं करती। सुखीदुःखी होनेमें तो परिवर्तनशील परिस्थितिके साथ सम्बन्ध जो़ड़ना ही मुख्य कारण है। परिस्थितिके साथ सम्बन्ध जोड़ने अथवा न जोड़नेमें यह मनुष्य सर्वथा स्वाधीन है? पराधीन नहीं है। जो परिवर्तनशील परिस्थितिके साथ अपना सम्बन्ध मान लेता है? वह अविवेकी पुरुष तो सुखीदुःखी होता ही रहता है। परन्तु जो परिस्थितिके साथ सम्बन्ध नहीं मानता? वह विवेकी पुरुष कभी सुखीदुःखी नहीं होता अतः उसकी स्थिति स्वतः साम्यावस्थामें होती है? जो कि उसका स्वरूप है।कर्मोंमें मनुष्यके प्रारब्धकी प्रधानता है या पुरुषार्थकी अथवा प्रारब्ध बलवान् है या पुरुषार्थ -- इस विषयमें बहुतसी शङ्काएँ हुआ करती हैं। उनके समाधानके लिये पहले यह समझ लेना जरूरी है कि प्रारब्ध और पुरुषार्थ क्या हैमनुष्यमें चार तरहकी चाहना हुआ करती है -- एक धनकी? दूसरी धर्मकी? तीसरी भोगकी और चौथी मुक्तिकी। प्रचलित भाषामें इन्हीं चारोंको अर्थ? धर्म? काम और मोक्षके नामसे कहा जाता है --, (1) अर्थ -- धनको अर्थ कहते हैं। वह धन दो तरहका होता है -- स्थावर और जङ्गम। सोना? चाँदी? रुपये? जमीन? जायदाद? मकान आदि स्थावर हैं और गाय? भैंस? घोड़ा? ऊँट? भेड़? बकरी आदि जङ्गम हैं।(2) धर्म -- सकाम अथवा निष्कामभावसे जो यज्ञ? तप? दान? व्रत? तीर्थ आदि किये जाते हैं? उसको धर्म,कहते हैं।(3) काम -- सांसारिक सुखभोगको काम कहते हैं। वह सुखभोग आठ तरहका होता है -- शब्द? स्पर्श? रूप? रस? गन्ध? मान? बड़ाई और आराम।(क) शब्द -- शब्द दो तरहका होता है -- वर्णात्मक और ध्वन्यात्मक। व्याकरण? कोश? साहित्य? उपन्यास? गल्प? कहानी आदि वर्णात्मक शब्द हैं (टिप्पणी प0 888.1)। खाल? तार और फूँकके तीन बाजे और तालका आधा बाजा -- ये साढ़े तीन प्रकारके बाजे ध्वन्यात्मक शब्दको प्रकट करनेवाले हैं (टिप्पणी प0 888.2)। इन वर्णात्मक और ध्वन्यात्मक शब्दोंको सुननेसे जो सुख मिलता है? वह शब्दका सुख है।(ख) स्पर्श -- स्त्री? पुत्र? मित्र आदिके साथ मिलनेसे तथा ठण्डा? गरम? कोमल आदिसे अर्थात् उनका त्वचाके साथ संयोग होनेसे जो सुख होता है? वह स्पर्शका सुख है।(ग) रूप -- नेत्रोंसे खेल? तमाशा? सिनेमा? बाजीगरी? वन? पहाड़? सरोवर? मकान आदिकी सुन्दरताको देखकर जो सुख होता है? वह रूपका सुख है।(घ) रस -- मधुर (मीठा)? अम्ल (खट्टा)? लवण (नमकीन)? कटु (कड़वा)? तिक्त (तीखा) और कषाय (कसैला) -- इन छः रसोंको चखनेसे जो सुख होता है? वह रसका सुख है।(ङ) गन्ध -- नाकसे अतर? तेल? फुलेल? लवेण्डर? पुष्प आदि सुगन्धवाले और लहसुन? प्याज आदि दुर्गन्धवाले पदार्थोंको सूघँनेसे जो सुख होता है? वह गन्धका सुख है।(च) मान -- शरीरका आदरसत्कार होनेसे जो सुख होता है? वह मानका सुख है।(छ) बड़ाई -- नामकी प्रशंसा? वाहवाह होनेसे जो सुख होता है? वह बड़ाईका सुख है।(ज) आराम -- शरीरसे परिश्रम न करनेसे अर्थात् निकम्मे पड़े रहनेसे जो सुख होता है? वह आरामका सुख है।(4) मोक्ष -- आत्मसाक्षात्कार? तत्त्वज्ञान? कल्याण? उद्धार? मुक्ति? भगवद्दर्शन? भगवत्प्रेम आदिका नाम मोक्ष है।इन चारों (अर्थ? धर्म? काम और मोक्ष) में देखा जाये तो अर्थ और धर्म -- दोनों ही परस्पर एकदूसरेकी वृद्धि करनेवाले हैं अर्थात् अर्थसे धर्मकी और धर्मसे अर्थकी वृद्धि होती है। परन्तु धर्मका पालन कामनापूर्तिके लिये किया जाय तो वह धर्म भी कामनापूर्ति करके नष्ट हो जाता है और अर्थको कामनापूर्तिमें लगाया जाय तो वह अर्थ भी कामनापूर्ति करके नष्ट हो जाता है। तात्पर्य है कि कामना धर्म और अर्थ -- दोनोंको खा जाती है। इसीलिये गीतामें भगवान्ने कामनाको महाशन (बहुत खानेवाला) बताते हुए उसके त्यागकी बात विशेषतासे कही है (3। 37 -- 43)।यदि धर्मका अनुष्ठान कामनाका त्याग करके किया जाय तो वह अन्तःकरण शुद्ध करके मुक्त कर देता है। ऐसे ही धनको कामनाका त्याग करके दूसरोंके उपकारमें? हितमें? सुखमें खर्च किया जाय तो वह भी अन्तःकरण शुद्ध करके मुक्त कर देता है।अर्थ? धर्म? काम और मोक्ष -- इन चारोंमें अर्थ (धन) और काम (भोग) की प्राप्तिमें प्रारब्धकी मुख्यता और पुरुषार्थकी गौणता है? तथा धर्म और मोक्षमें पुरुषार्थकी मुख्यता और प्रारब्धकी गौणता है। प्रारब्ध और पुरुषार्थ -- दोनोंका क्षेत्र अलगअलग है और दोनों ही अपनेअपने क्षेत्रमें प्रधान हैं। इसलिये कहा है -- संतोषस्त्रिषु कर्तव्यः स्वदारे भोजने धने। त्रिषु चैव न कर्तव्यः स्वध्याये जपदानयोः।।अर्थात् अपनी स्त्री? पुत्र? परिवार? भोजन और धनमें तो सन्तोष करना चाहिये और स्वाध्याय? पाठपूजा? नामजप? कीर्तन और दान करनेमें कभी सन्तोष नहीं करना चाहिये। तात्पर्य यह हुआ कि प्रारब्धके फल -- धन और भोगमें तो सन्तोष करना चाहिये क्योंकि वे प्रारब्धके अनुसार जितने मिलनेवाले हैं? उतने ही मिलेंगे? उससे अधिक नहीं। परन्तु धर्मका अनुष्ठान और अपना कल्याण करनेमें कभी सन्तोष नहीं करना चाहिये क्योंकि यह नया पुरुषार्थ है और इसी पुरुषार्थके लिये मनुष्यशरीर मिला है।कर्मके दो भेद हैं -- शुभ (पुण्य) और अशुभ (पाप)। शुभकर्मका फल अनुकूल परिस्थिति प्राप्त होना है और अशुभकर्मका फल प्रतिकूल परिस्थिति प्राप्त होना है। कर्म बाहरसे किये जाते हैं? इसलिये उन कर्मोंका फल भी बाहरकी परिस्थितिके रूपमें ही प्राप्त होता है। परन्तु उन परिस्थितियोंसे जो सुखदुःख होते हैं? वे भीतर होते हैं। इसलिये उन परिस्थितियोंमें सुखी तथा दुःखी होना शुभाशुभकर्मोंका अर्थात् प्रारब्धका फल नहीं है? प्रत्युत अपनी मूर्खताका फल है। अगर वह मूर्खता चली जाय? भगवान्पर (टिप्पणी प0 889.1) अथवा प्रारब्धपर (टिप्पणी प0 889.2) विश्वास हो जाय तो प्रतिकूलसेप्रतिकूल परिस्थिति आनेपर भी चित्तमें प्रसन्नता होगी? हर्ष होगा। कारण कि प्रतिकूल परिस्थितिमें पाप कटते हैं? आगे पाप न करनेमें सावधानी आती है और पापोंके नष्ट होनेसे अन्तःकरणकी शुद्ध होती है।साधकको अनुकूल और प्रतिकूल परिस्थितिका सदुपयोग करना चाहिये? दुरुपयोग नहीं। अनुकूल परिस्थिति आ जाय तो अनुकूल सामग्रीको दूसरोंके हितके लिये सेवाबुद्धिसे खर्च करना अनुकूल परिस्थितिका सदुपयोग है और उसका सुखबुद्धिसे भोग करना दुरुपयोग है। ऐसे ही प्रतिकूल परिस्थिति आ जाय तो सुखकी इच्छाका त्याग करना और मेरे पूर्वकृत पापोंका नाश करनेके लिये? भविष्यमें पाप न करनेकी सावधानी रखनेके लिये और मेरी उन्नति करनेके लिये ही प्रभुकृपासे ऐसी परिस्थिति आयी है -- ऐसा समझकर परम प्रसन्न रहना प्रतिकूल परिस्थितिका सदुपयोग है और उससे दुःखी होना दुरुपयोग है।मनुष्यशरीर सुखदुःख भोगनेके लिये नहीं है। सुख भोगनेके स्थान स्वर्गादिक हैं और दुःख भोगनेके स्थान नरक तथा चौरासी लाख योनियाँ हैं। इसलिये वे भोगयोनियाँ हैं और मनुष्य कर्मयोनि है। परन्तु यह कर्मयोनि उनके लिये है जो मनुष्यशरीरमें सावधान नहीं होते? केवल जन्ममरणके सामान्य प्रवाहमें ही पड़े हुए हैं। वास्तवमें मनुष्यशरीर सुखदुःखसे ऊँचा उठनेके लिये अर्थात् मुक्तिकी प्राप्तिके लिये ही मिला है। इसलिये इसको कर्मयोनि न कहकर साधनयोनि ही कहना चाहिये।प्रारब्धकर्मोंके फलस्वरूप जो अनुकूल और प्रतिकूल परिस्थिति आती है? उन दोनोंमें अनुकूल परिस्थितिका स्वरूपसे त्याग करनेमें तो मनुष्य स्वतन्त्र है? पर प्रतिकूल परिस्थितिका स्वरूपसे त्याग करनेमें मनुष्य परतन्त्र है अर्थात् उसका स्वरूपसे त्याग नहीं किया जा सकता। कारण यह है कि अनुकूल परिस्थिति दूसरोंका हित करने? उन्हें सुख देनेके फलस्वरूप बनी है और प्रतिकूल परिस्थिति दूसरोंको दुःख देनेके फलस्वरूप बनी है। इसको एक दृष्टान्तसे इस प्रकार समझ सकते हैं -- श्यामलालने रामलालको सौ रुपये उधार दिये। रामलालने वायदा किया कि अमुक महीने मैं ब्याजसहित,रुपये लौटा दूँगा। महीना बीत गया? पर रामलालने रुपये नहीं लौटाये तो श्यामलाल रामलालके घर पहुँचा और बोला -- तुमने वायदेके अनुसार रुपये नहीं दिये अब दो। रामलालने कहा -- अभी मेरे पास रुपये नहीं हैं? परसों दे दूँगा। श्यामलाल तीसरे दिन पहुँचा और बोला -- लाओ मेरे रुपये तो रामलालने कहा -- अभी मैं आपके पैसे नहीं जुटा सका? परसों आपके रुपये जरूर दूँगा। तीसरे दिन फिर श्यामलाल पहुँचा और बोला -- रुपये दो तो रामलाल ने कहा -- कल जरूर दूँगा। दूसरे दिन श्यामलाल फिर पहुँचा और बोला -- लाओ मेरे रुपये रामलालने कहा -- रुपये जुटे नहीं? मेरे पास रुपये हैं नहीं? तो मैं कहाँसे दूँ परसों आना। रामलालकी बातें सुनकर श्यामलालको गुस्सा आ गया और परसोंपरसों करता है? रुपये देता नहीं -- ऐसा कहकर उसने रामलालको पाँच जूते मार दिये। रामलालने कोर्टमें नालिश (शिकायत) कर दी। श्यामलालको बुलाया गया और पूछा गया -- तुमने इसके घरपर जाकर जूता मारा है तो श्यामलालने कहा -- हाँ साहब? मैंने जूता मारा है। मैजिस्ट्रेटने पूछा -- क्यों मारा श्यामलालने कहा -- इसको मैंने रुपये दिये थे और इसने वायदा किया था कि मैं इस महीने रुपये लौटा दूँगा। महीना बीत जानेपर मैंने इसके घरपर जाकर रुपये माँगे तो कलपरसों? कलपरसों कहकर इसने मुझे बहुत तंग किया। इसपर मैंने गुस्सेमें आकर इसे पाँच जूते मार दिये। तो सरकार पाँच जूतोंके पाँच रुपये काटकर शेष रुपये मुझे दिला दीजिये। मैजिस्ट्रेटने हँसकर कहा -- यह फौजदारी कोर्ट है। यहाँ रुपये दिलानेका कायदा (नियम) नहीं है। यहाँ दण्ड देनेका कायदा है। इसलिये आपको जूता मारनेके बदलेमें कैद या जुर्माना भोगना ही पड़ेगा। आपको रुपये लेने हों तो दीवानी कोर्टमें जाकर नालिश करो? वहाँ रुपये दिलानेका कायदा है क्योंकि वह विभाग अलग है। इस तरह अशुभकर्मोंका फल जो प्रतिकूल परिस्थिति है? वह फौजदारी है? इसलिये उसका स्वरूपसे त्याग नहीं कर सकते और शुभकर्मोंका फल जो अनुकूल परिस्थिति है? वह दीवानी है? इसलिये उसका स्वरूपसे त्याग किया जा सकता है। इससे यह सिद्ध हुआ कि मनुष्यके शुभअशुभकर्मोंका विभाग अलगअलग है। इसलिये शुभकर्मों (पुण्यों) और अशुभकर्मों(पापों)का अलगअलग संग्रह होता है। स्वभाविकरूपसे ये दोनों एकदूसरेसे कटते नहीं अर्थात् पापोंसे पुण्य नहीं कटते और पुण्योंसे पाप नहीं कटते। हाँ? अगर मनुष्य पाप काटनेके उद्देश्यसे (प्रायश्चित्तरूपसे) शुभकर्म करता है? तो उसके पाप कट सकते हैं।संसारमें एक आदमी पुण्यात्मा है? सदाचारी है और दुःख पा रहा है तथा एक आदमी पापात्मा है? दुराचारी है और सुख भोग रहा है -- इस बातको लेकर अच्छेअच्छे पुरुषोंके भीतर भी यह शङ्का हो जाया करती है कि इसमें ईश्वरका न्याय कहाँ है (टिप्पणी प0 890)। इसका समाधान यह है कि अभी पुण्यात्मा जो दुःख पा रहा है? यह पूर्वके किसी जन्ममें किये हुए पापका फल है? अभी किये हुए पुण्यका नहीं। ऐसे ही अभी पापात्मा जो सुख भोग रहा है? यह भी पूर्वके किसी जन्ममें किये हुए पुण्यका फल है? अभी किये हुए पापका नहीं।इसमें एक तात्त्विक बात और है। कर्मोंके फलरूपमें जो अनुकूल परिस्थिति आती है? उससे सुख ही होता है और प्रतिकूल परिस्थिति आती है? उससे दुःख ही होता है -- ऐसी बात है नहीं। जैसे? अनुकूल परिस्थिति आनेपर मनमें अभिमान होता है? छोटोंसे घृणा होती है? अपनेसे अधिक सम्पत्तिवालोंको देखकर उनसे ईर्ष्या होती है? असहिष्णुता होती है? अन्तःकरणमें जलन होती है और मनमें ऐसे दुर्भाव आते हैं कि उनकी सम्पत्ति कैसे नष्ट हो तथा वक्तपर उनको नीचा दिखानेकी चेष्टा भी होती है। इस तरह सुखसामग्री और धनसम्पत्ति पासमें रहनेपर भी वह सुखी नहीं हो सकता। परन्तु बाहरी सामग्रीको देखकर अन्य लोगोंको यह,भ्रम होता है कि वह बड़ा सुखी है। ऐसे ही किसी विरक्त और त्यागी मनुष्यको देखकर भोगसामग्रीवाले मनुष्यको उसपर दया आती है कि बेचारेके पास धनसम्पत्ति आदि सामग्री नहीं है? बेचारा बड़ा दुःखी है परन्तु वास्तवमें विरक्तके मनमें बड़ी शान्ति और बड़ी प्रसन्नता रहती है। वह शान्ति और प्रसन्नता धनके कारण किसी धनीमें नहीं रह सकती। इसलिये धनका होनामात्र सुख नहीं है और धनका अभावमात्र दुःख नहीं है। सुख नाम हृदयकी शान्ति और प्रसन्नताका है और दुःख नाम हृदयकी जलन और सन्तापका है।पुण्य और पापका फल भोगनेमें एक नियम नहीं है। पुण्य तो निष्कामभावसे भगवान्के अर्पण करनेसे समाप्त हो सकता है परन्तु पाप भगवान्के अर्पण करनेसे समाप्त नहीं होता। पापका फल तो भोगना ही पड़ता है क्योंकि भगवान्की आज्ञाके विरुद्ध किये हुए कर्म भगवान्के अर्पण कैसे हो सकते हैं और अर्पण करनेवाला भी भगवान्के विरुद्ध कर्मोंको भगवान्के अर्पण कैसे कर सकता है प्रत्युत भगवान्की आज्ञाके अनुसार किये हुए कर्म ही भगवान्के अर्पण होते हैं। इस विषयमें एक कहानी आती है।एक राजा अपनी प्रजासहित हरिद्वार गया। उसके साथमें सब तरहके लोग थे। उनमें एक चमार भी था। उस चमारने सोचा कि ये बनिये लोग बड़े चतुर होते हैं। ये अपनी बुद्धिमानीसे धनी बन गये हैं। अगर हम भी उनकी बुद्धिमानीके अनुसार चलें तो हम भी धनी बन जायँ ऐसा विचार करके वह एक चतुर बनियेकी क्रियाओंपर निगरानी रखकर चलने लगा। जब हरिद्वारके ब्रह्मकुण्डमें पण्डा दानपुण्यका संकल्प कराने लगा? तब उस बनियेने कहा -- मैंने अमुक ब्राह्मणको सौ रुपये उधार दिये थे? आज मैं उनको दानरूपमें श्रीकृष्णार्पण करता हूँ पण्डेने संकल्प भरवा दिया। चमारने देखा कि इसने एक कौड़ी भी नहीं दी और लोगोंमें प्रसिद्ध हो गया कि इसने सौ रुपयोंका दान कर दिया? कितना बुद्धिमान् है मैं भी इससे कम नहीं रहूँगा। जब पण्डेने चमारसे संकल्प भरवाना शुरू किया? तब चमारने कहा -- अमुक बनियेने मुझै सौ रुपये उधार दिये थे तो उन सौ रुपयोंको मैं श्रीकृष्णार्पण करता हूँ। उसकी ग्रामीण बोलीको पण्डा पूरी तरह समझा नहीं और संकल्प भरवा दिया। इससे चमार बड़ा खुश हो गया कि मैंने भी बनियेके समान सौ रुपयोंका दानपुण्य कर दियासब घर पहुँचे। समयपर खेती हुई। ब्राह्मण और चमारके खेतोंमें खूब अनाज पैदा हुआ। ब्राह्मण देवताने बनियेसे कहा -- सेठ आप चाहें तो सौ रुपयोंका अनाज ले लो? इससे आपको नफा भी हो सकता है। मुझे तो आपका कर्जा चुकाना है। बनियेने कहा -- ब्राह्मण देवता जब मैं हरिद्वार गया था? तब मैंने आपको उधार दिये हुए सौ रुपये दान कर दिये। ब्राह्मण बोला -- सेठ मैंने आपसे सौ रुपये उधार लिये हैं? दान नहीं लिये। इसलिये इन रुपयोंको मैं रखना नहीं चाहता? ब्याजसहित पूरा चुकाना चाहता हूँ। सेठने कहा -- आप देना ही चाहते हैं तो अपनी बहन अथवा कन्याको दे सकते हैं। मैंने सौ रुपये भगवान्के अर्पण कर दिये हैं? इसलिये मैं तू लूँगा नहीं। अब ब्राह्मण और क्या करता वह अपने घर लौट गया।अब जिस बनियेसे चमारने सौ रुपये लिये थे? वह बनिया चमारके खेतमें पहुँचा और बोला -- लाओ मेरे रुपये। तुम्हारा अनाज हुआ है? सौ रुपयोंका अनाज ही दे दो। चमारने सुन रखा था कि ब्राह्मणके देनेपर भी बनियेने उससे रुपये नहीं लिये। अतः उसने सोचा कि मैंने भी संकल्प कर रखा है तो मेरेको रुपये क्यों देने पड़ेंगे ऐसा सोचकर चमार बनियेसे बोला -- मैंने तो अमुक सेठकी तरह गङ्गाजीमें खड़े होकर सब रुपये श्रीकृष्णार्पण कर दिये? तो मेरेको रुपये क्यों देने पड़ेंगे बनिया बोला -- तेरे अर्पण कर देनेसे कर्जा नहीं छूट सकता क्योंकि तूने मेरेसे कर्जा लिया है तो तेरे छोड़नेसे कैसे छूट जायगा मैं तो अपने सौ रुपये ब्याजसहित पूरे लूँगा लाओ मेरे रुपये ऐसा कहकर उसने चमारसे अपने रुपयोंका अनाज ले लिया।इस कहानीसे यह सिद्ध होता है कि हमारेपर दूसरोंका जो कर्जा है? वह हमारे छोड़नेसे नहीं छूट सकता। ऐसे ही हम भगवदाज्ञानुसार शुभकर्मोंको तो भगवान्के अर्पण करके उनके बन्धनसे छूट सकते हैं? पर अशुभकर्मोंका फल तो हमारेको भोगना ही पड़ेगा। इसलिये शुभ और अशुभकर्मोंमें एक कायदा? कानून नहीं है। अगर ऐसा नियम बन जाय कि भगवान्के अर्पण करनेसे ऋण और पापकर्म छूट जायँ तो फिर सभी प्राणी मुक्त हो जायँ परन्तु ऐसा सम्भव नहीं है। हाँ? इसमें एक मार्मिक बात है कि अपनेआपको सर्वथा भगवान्के अर्पित कर देनेपर अर्थात् सर्वथा भगवान्के शरण हो जानेपर पापपुण्य सर्वथा नष्ट हो जाते हैं (गीता 18। 66)।दूसरी शङ्का यह होती है कि धन और भोगोंकी प्राप्ति प्रारब्ध कर्मके अनुसार होती है -- ऐसी बात समझमें नहीं आती क्योंकि हम देखते हैं कि इन्कमटैक्स? सेल्सटैक्स आदिकी चोरी करते हैं तो धन बच जाता है और टैक्स पूरा देते हैं तो धन चला जाता है तो धनका आनाजाना प्रारब्धके अधीन कहाँ हुआ यह तो चोरीके ही अधीन हुआइसका समाधान इस प्रकार है। वास्तवमें धन प्राप्त करना और भोग भोगना -- इन दोनोंमें ही प्रारब्धकी प्रधानता है। परन्तु इन दोनोंमें भी किसीका धनप्राप्तिका प्रारब्ध होता है? भोगका नहीं और किसीका भोगका प्रारब्ध होता है? धनप्राप्तिका नहीं तथा किसीका धन और भोग दोनोंका ही प्रारब्ध होता है। जिसका धनप्राप्तिका प्रारब्ध तो है? पर भोगका प्रारब्ध नहीं है? उसके पास लाखों रुपये रहनेपर भी बीमारीके कारण वैद्य? डॉक्टरके मना करनेपर वह भोगोंको भोग नहीं सकता? उसके खानेमें रूखासूखा ही मिलता है। जिसका भोगका प्रारब्ध तो है? पर धनका प्रारब्ध नहीं है? उसके पास धनका अभाव होनेपर भी उसके सुखआराममें किसी तरहकी कमी नहीं रहती (टिप्पणी प0 891)। उसको किसीकी दयासे? मित्रतासे? कामधंधा मिल जानेसे प्रारब्धके अनुसार जीवननिर्वाहकी सामग्री मिलती रहती है।अगर धनका प्रारब्ध नहीं है तो चोरी करनेपर भी धन नहीं मिलेगा? प्रत्युत चोरी किसी प्रकारसे प्रकट हो जायगी तो बचा हुआ धन भी चला जायगा तथा दण्ड और मिलेगा। यहाँ दण्ड मिले या न मिले? पर परलोकमें तो दण्ड जरूर मिलेगा। उससे वह बच नहीं सकेगा। अगर प्रारब्धवश चोरी करनेसे धन मिल भी जाय तो भी उस धनका उपभोग नहीं हो सकेगा। वह धन बीमारीमें? चोरीमें? डाकेमें? मुकदमेमें? ठगाईमें चला जायगा। तात्पर्य यह है कि वह धन जितने दिन टिकनेवाला है? उतने ही दिन टिकेगा और फिर नष्ट हो जायगा। इतना ही नहीं? इन्कमटैक्स आदिकी चोरी करनेके जो संस्कार भीतर पड़े हैं? वे संस्कार जन्मजन्मातरतक उसे चोरी करनेके लिये उकसाते रहेंगे और वह उनके कारण दण्ड पाता रहेगा।अगर धनका प्रारब्ध है तो कोई गोद ले लेगा अथवा मरता हुआ कोई व्यक्ति उसके नामसे वसीयतनामा लिख देगा अथवा मकान बनाते समय नींव खोदते ही जमीनमें गड़ा हुआ धन मिल जायगा? आदिआदि। इस प्रकार प्रारब्धके अनुसार जो धन मिलनेवाला है? वह किसीनकिसी कारणसे मिलेगा ही (टिप्पणी प0 892)। परन्तु मनुष्य प्रारब्धपर तो विश्वास करता नहीं? कमसेकम अपने पुरुषार्थपर भी विश्वास नहीं करता कि हम मेहनतसे कमाकर खा लेंगे। इसी कारण उसकी चोरी आदि दुष्कर्मोंमें प्रवृत्ति हो जाती है? जिससे हृदयमें जलन रहती है? दूसरोंसे छिपाव करना पड़ता है? पकड़े जानेपर दण्ड पाना पड़ता है? आदिआदि। अगर मनुष्य विश्वास और सन्तोष रखे तो हृदयमें महान् शान्ति? आनन्द? प्रसन्नता रहती है तथा आनेवाला धन भी आ जाता है और जितना जीनेका प्रारब्ध है? उतनी जीवननिर्वाहकी सामग्री भी किसीनकिसी तरह मिलती ही रहती है।जैसे व्यापारमें घाटा लगना? घरमें किसीकी मृत्यु होना? बिना कारण अपयश और अपमान होना आदि प्रतिकूल परिस्थितिको कोई भी नहीं चाहता? पर फिर भी वह आती ही है? ऐसे ही अनुकूल परिस्थिति भी आती ही है? उसको कोई रोक नहीं सकता। भागवतमें आया है -- सुखमैन्द्रियकं राजन् स्वर्गे नरक एव च। देहिनां यद् यथा दुःखं तस्मान्नेच्छेत तद् बुधः।।(श्रीमद्भा0 11। 8। 1)राजन् प्राणियोंको जैसे इच्छाके बिना प्रारब्धानुसार दुःख प्राप्त होते हैं? ऐसे ही इन्द्रियजन्य सुख स्वर्गमें और नरकमें भी प्राप्त होते हैं। अतः बुद्धिमान् पुरुषको चाहिये कि वह उन सुखोंकी इच्छा न करे। जैसे धन और भोगका प्रारब्ध अलगअलग होता है अर्थात् किसीका धनका प्रारब्ध होता है और किसीका भोगका प्रारब्ध होता है? ऐसे ही धर्म और मोक्षका पुरुषार्थ भी अलगअलग होता है अर्थात् कोई धर्मके लिये पुरुषार्थ करता है और कोई मोक्षके लिये पुरुषार्थ करता है। धर्मके अनुष्ठानमें शरीर? धन आदि वस्तुओँकी मुख्यता रहती है और मोक्षकी प्राप्तिमें भाव तथा विचारकी मुख्यता रहती है।एक करना होता है और एक होना होता है। दोनों विभाग अलगअलग हैं। करनेकी चीज है -- कर्तव्य और होनेकी चीज है -- फल। मनुष्यका कर्म करनेमें अधिकार है? फलमें नहीं -- कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन (गीता 2। 47)। तात्पर्य यह है कि होनेकी पूर्ति प्रारब्धके अनुसार अवश्य होती है? उसके लिये यह होना चाहिये और यह नहीं होना चाहिये -- ऐसी इच्छा नहीं करनी चाहिये और करनेमें शास्त्र तथा लोकमर्यादाके अनुसार कर्तव्यकर्म करना चाहिये। करना पुरुषार्थके अधीन है और होना प्रारब्धके अधीन है। इसलिये मनुष्य करनेमें स्वाधीन है और होनेमें पराधीन है। मनुष्यकी उन्नतिमें खास बात है -- करनेमें सावधान रहे और होनेमें प्रसन्न रहे। क्रियमाण? सञ्चित और प्रारब्ध -- तीनों कर्मोंसे मुक्त होनेका क्या उपाय हैप्रकृति और पुरुष -- ये दो हैं। प्रकृति सदा क्रियाशील है? पर पुरुषमें कभी परिवर्तनरूप क्रिया नहीं होती। प्रकृतिसे अपना सम्बन्ध माननेवाला प्रकृतिस्थ पुरुष ही कर्ताभोक्ता बनता है। जब वह प्रकृतिसे सम्बन्धविच्छेद कर लेता है अर्थात् अपने स्वरूपमें स्थित हो जाता है? तब उसपर कोई भी कर्म लागू नहीं होता।प्रारब्धसम्बन्धी अन्य बातें इस प्रकार हैं --(1) बोध हो जानेपर भी ज्ञानीका प्रारब्ध रहता है -- यह कथन केवल अज्ञानियोंको समझानेमात्रके लिये है। कारण कि अनुकूल या प्रतिकूल घटनाका घट जाना ही प्रारब्ध है। प्राणीको सुखी या दुःखी करना प्रारब्धका काम नहीं है? प्रत्युत अज्ञानका काम है। अज्ञान मिटनेपर मनुष्य सुखीदुःखी नहीं होता। उसे केवल अनुकूलताप्रतिकूलताका ज्ञान होता है। ज्ञान होना दोषी नहीं है? प्रत्युत सुखदुःखरूप विकार होना दोषी है। इसलिये वास्तवमें ज्ञानीका प्रारब्ध नहीं होता।(2) जैसा प्रारब्ध होता है? वैसी बुद्धि बन जाती है। जैसे? एक ही बाजारमें एक व्यापारी मालकी बिक्री कर देता है और एक व्यापारी माल खरीद लेता है। बादमें जब बाजारभाव तेज हो जाता है? तब बिक्री करनेवाले व्यापारीको नुकसान होता है तथा खरीदनेवाले व्यापारीको नफा होता है और जब बाजारभाव मन्दा हो जाता है? तब बिक्री करनेवाले व्यापारीको नफा होता है तथा खरीदनेवाले व्यापारीको नुकसान होता है। अतः खरीदने और बेचनेकी बुद्धि प्रारब्धसे बनती है अर्थात् नफा या नुकसानका जैसा प्रारब्ध होता है? उसीके अनुसार पहले बुद्धि बन जाती है? जिससे प्रारब्धके अनुसार फल भुगताया जा सके। परन्तु खरीदने और बेचनेकी क्रिया न्याययुक्त की जाय अथवा अन्याययुक्त की जाय -- इसमें मनुष्य स्वतन्त्र है क्योंकि यह क्रियमाण (नया कर्म) है? प्रारब्ध नहीं।(3) एक आदमीके हाथसे गिलास गिरकर टूट गया तो यह उसकी असावधानी है या प्रारब्धकर्म करते समय तो सावधान रहना चाहिये? पर जो (अच्छा या बुरा) हो गया? उसे पूरी तरहसे प्रारब्ध -- होनहार ही मानना चाहिये। उस समय जो यह कहते हैं कि यदि तू सावधानी रखता तो गिलास न टूटता -- इससे यह समझना चाहिये कि अब आगेसे मुझे सावधानी रखनी है कि दुबारा ऐसी गलती न हो जाय। वास्तवमें जो हो गया? उसे असावधानी न मानकर होनहार मानना चाहिये। इसलिये करनेमें सावधान और होनेमें प्रसन्न रहे। ,(4) प्रारब्धसे होनेवाले और कुपथ्यसे होनेवाले रागमें क्या फरक हैकुपथ्यजन्य रोग दवाईसे मिट सकता है परन्तु प्रारब्धजन्य रोग दवाईसे नहीं मिटता। महामृत्युञ्जय आदिका जप और यज्ञयागादि अनुष्ठान करनेसे प्रारब्धजन्य रोग भी कट सकता है? अगर अनुष्ठान प्रबल हो तो।रोगके दो प्रकार हैं -- आधि (मानसिक रोग) और व्याधि (शारीरिक रोग)। आधिके भी दो भेद हैं -- एक तो शोक? चिन्ता आदि और दूसरा पागलपन। चिन्ता? शोक आदि तो अज्ञानसे होते हैं और पागलपन प्रारब्धसे होता है। अतः ज्ञान होनेपर चिन्ताशोकादि तो मिट जाते हैं? पर प्रारब्धके अनुसार पागलपन हो सकता है। हाँ? पागलपन होनेपर भी ज्ञानीके द्वारा कोई अनुचित? शास्त्रनिषिद्ध क्रिया नहीं होती।(5) आकस्मिक मृत्यु और अकाल मृत्युमें क्या फरक है कोई व्यक्ति साँप काटनेसे मर जाय? अचानक ऊपरसे गिरकर मर जाय? पानीमें डूबकर मर जाय? हार्टफेल होनेसे मर जाय? किसी दुर्घटना आदिसे मर जाय? तो यह उसकी आकस्मिक मृत्यु है। स्वाभाविक मृत्युकी तरह आकस्मिक मृत्यु भी प्रारब्धके अनुसार (आयु पूरी होनेपर) होती है।कोई व्यक्ति जानकर आत्महत्या कर ले अर्थात् फाँसी लगाकर? कुएँमें कूदकर? गाड़ीके नीचे आकर? छतसे कूदकर? जहर खाकर? शरीरमें आग लगाकर मर जाय? तो यह उसकी अकाल मृत्यु है। यह मृत्यु आयुके रहते हुए ही होती है। आत्महत्या करनेवालेको मनुष्यकी हत्याका पाप लगता है। अतः यह नया पापकर्म है? प्रारब्ध नहीं। मनुष्यशरीर परमात्मप्राप्तिके लिये ही मिला है अतः उसको आत्महत्या करके नष्ट करना बड़ा भारी पाप है।कई बार आत्महत्या करनेकी चेष्टा करनेपर भी मनुष्य बच जाता है? मरता नहीं। इसका कारण यह है कि उसका दूसरे मनुष्यके प्रारब्धके साथ सम्बन्ध जुड़ा हुआ रहता है अतः उसके प्रारब्धके कारण वह बच जाता है। जैसे? भविष्यमें किसीका पुत्र होनेवाला है और वह आत्महत्या करनेका प्रयास करे तो उस (आगे होनेवाले) लड़केका प्रारब्ध उसको मरने नहीं देगा। अगर उस व्यक्तिके द्वारा भविष्यमें कोई विशेष अच्छा काम होनेवाला हो? लोगोंका उपकार होनेवाला हो अथवा इसी जन्ममें? इसी शरीरमें प्रारब्धका कोई उत्कट भोग (सुखदुःख) आनेवाला हो? तो आत्महत्याका प्रयास करनेपर भी वह मरेगा नहीं।(6) एक आदमीने दूसरे आदमीको मार दिया तो यह उसने पिछले जन्मके वैरका बदला लिया और मरनेवालेने पुराने कर्मोंका फल पाया? फिर मारनेवालेका क्या दोषमारनेवालेका दोष है। दण्ड देना शासकका काम है? सर्वसाधारणका नहीं। एक आदमीको दस बजे फाँसी मिलनी है। एकदूसरे आदमीने उस (फाँसीकी सजा पानेवाले) आदमीको जल्लादोंके हाथोंसे छुड़ा लिया और ठीक दस बजे उसे कत्ल कर दिया ऐसी हालतमें उस कत्ल करनेवाले आदमीको भी फाँसी होगी कि यह आज्ञा तो राज्यने जल्लादोंको दी थी? पर तुम्हें किसने आज्ञा दी थीमारनेवालेको यह याद नहीं है कि मैं पूर्वजन्मका बदला ले रहा हूँ? फिर भी मारता है तो यह उसका दोष है। दूसरेको मारनेका अधिकार किसीको भी नहीं है। मरना कोई भी नहीं चाहता। दूसरेको मारना अपने विवेकका अनादर है। मनुष्यमात्रको विवेकशक्ति प्राप्त है और उस विवेकके अनुसार अच्छे या बुरे कार्य करनेमें वह स्वतन्त्र है। अतः विवेकका अनादर करके दूसरेको मारना अथवा मारनेकी नीयत रखना दोष है।यदि पूर्वजन्मका बदला एकदूसरे ऐसे ही चुकाते रहें तो यह श्रृङ्खला कभी खत्म नहीं होगी और मनुष्य कभी मुक्त नहीं हो सकेगा। पिछले जन्मका बदला अन्य (साँप आदि) योनियोंमें लिया जा सकता है। मनुष्ययोनि बदला लेनेके लिये नहीं है। हाँ? यह हो सकता है कि पिछले जन्मका हत्यारा व्यक्ति हमें स्वाभाविक ही अच्छा नहीं लगेगा? बुरा लगेगा। परन्तु बुरे लगनेवाले व्यक्तिसे द्वेष करना या उसे कष्ट देना दोष है क्योंकि यह नया कर्म है।जैसा प्रारब्ध है? उसीके अनुसार उसकी बुद्धि बन गयी? फिर दोष किस बातकाबुद्धिमें जो द्वेष है? उसके वशमें हो गया -- यह दोष है। उसे चाहिये कि वह उसके वशमें न होकर विवेकका आदर करे। गीता भी कहती है कि बुद्धिमें जो रागद्वेष रहते हैं (3। 40)? उनके वशमें न हो -- तयोर्न वशमागच्छेत् (3। 34)।(7) प्रारब्ध और भगवत्कृपामें क्या अन्तर हैइस जीवको जो कुछ मिलता है? वह प्रारब्धके अनुसार मिलता है? पर प्रारब्धविधानके विधाता स्वयं भगवान् हैं। कारण कि कर्म जड होनेसे स्वतन्त्र फल नहीं दे सकते? वे तो भगवान्के विधानसे ही फल देते है। जैसे? एक आदमी किसीके खेतमें दिनभर काम करता है तो उसको शामके समय कामके अनुसार पैसे मिलते हैं? पर मिलते हैं खेतके मालिकसे।पैसे तो काम करनेसे ही मिलते हैं? बिना काम किये पैसे मिलते हैं क्यापैसे तो काम करनेसे ही मिलते हैं? बिना काम किये पैसे पैसा देगा कौन यदि कोई जंगलमें जाकर दिनभर मेहनत करे तो क्या उसको पैसे मिल जायँगे नहीं मिल सकते। उसमें यह देखा जायगा कि किसके कहनेसे काम किया और किसकी जिम्मेवारी रही।अगर कोई नौकर कामको बड़ी तत्परता? चतुरता और उत्साहसे करता है? पर करता है केवल मालिककी प्रसन्नताके लिये तो मालिक उसको मजदूरीसे अधिक पैसे भी दे देता है और तत्परता आदि गुणोंको देखकर उसको अपने खेतका हिस्सेदार भी बना देता है। ऐसे ही भगवान् मनुष्यको उसके कर्मोंके अनुसार फल देते हैं। अगर कोई मनुष्य भगवान्की आज्ञाके अनुसार? उन्हींकी प्रसन्नताके लिये सब कार्य करता है? उसे भगवान् दूसरोंकी अपेक्षा अधिक ही देते हैं परन्तु जो भगवान्के सर्वथा समर्पित होकर सब कार्य करता है? उस भक्तके भगवान् भी भक्त बन जाते हैं (टिप्पणी प0 894) संसारमें कोई भी नौकरको अपना मालिक नहीं बनाता परन्तु भगवान् शरणागत भक्तको अपना मालिक बना लेते हैं। ऐसी उदारता केवल प्रभुमें ही है। ऐसे प्रभुके चरणोंकी शरण न होकर जो मनुष्य प्राकृत -- उत्पत्तिविनाशशील पदार्थोंके पराधीन रहते हैं? उनकी बुद्धि सर्वथा ही भ्रष्ट हो चुकी है। वे इस बातको समझ ही नहीं सकते कि हमारे सामने प्रत्यक्ष उत्पन्न और नष्ट होनेवाले पदार्थ हमें कहाँतक सहारा दे सकते हैं। सम्बन्ध -- जिस प्रकार कर्मयोगमें कर्मोंका अपने साथ सम्बन्ध नहीं रहता? ऐसे ही सांख्यसिद्धान्तमें भी कर्मोंका अपने साथ किञ्चिन्मात्र भी सम्बन्ध नहीं रहता -- इसका विवेचन आगे करते हैं।
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।।18.12।।कर्मफलका त्याग न करनेवाले मनुष्योंको कर्मोंका इष्ट, अनिष्ट और मिश्रित -- ऐसे तीन प्रकारका फल मरनेके बाद भी होता है; परन्तु कर्मफलका त्याग करनेवालोंको कहीं भी नहीं होता।
।।18.13।। व्याख्या -- पञ्चैतानि महाबाहो कारणानि -- हे महाबाहो जिसमें सम्पूर्ण कर्मोंका अन्त हो जाता है? ऐसे सांख्यसिद्धान्तमें सम्पूर्ण विहित और निषिद्ध कर्मोंके होनेमें पाँच हेतु बताये गये हैं। स्वयं (स्वरूप) उन कर्मोंमें हेतु नहीं है।निबोध मे -- इस अध्यायमें भगवान्ने जहाँ सांख्यसिद्धान्तका वर्णन आरम्भ किया है? वहाँ निबोध क्रियाका प्रयोग किया है (18। 13? 50)? जब कि दूसरी जगह श्रृणु क्रियाका प्रयोग किया है (18। 4? 19? 29? 36? 45? 64)। तात्पर्य यह है कि सांख्यसिद्धान्तमें तो निबोध पदसे अच्छी तरह समझनेकी बात कही है और दूसरी जगह श्रृणु पदसे सुननेकी बात कही है। अतः सांख्यसिद्धान्तको गहरी रीतिसे समझना चाहिये। अगर उसे अपनेआप (स्वयं) से गहरी रीतिसे समझा जाय? तो तत्काल तत्त्वका अनुभव हो जाता है।सांख्ये कृतान्ते प्रोक्तानि सिद्धये सर्वकर्मणाम् -- कर्म चाहे शास्त्रविहित हों? चाहे शास्त्रनिषिद्ध हों? चाहे शारीरिक हों? चाहे मानसिक हों? चाहे वाचिक हों? चाहे स्थूल हों और चाहे सूक्ष्म हों -- इन सम्पूर्ण कर्मोंकी सिद्धिके लिये पाँच हेतु कहे गये हैं। जब पुरुषका इन कर्मोंमें कर्तृत्व रहता है? तब कर्मसिद्धि और कर्मसंग्रह दोनों होते हैं? और जब पुरुषका इन कर्मोंके होनेमें कर्तृत्व नहीं रहता? तब कर्मसिद्धि तो होती है? पर कर्मसंग्रह नहीं होता? प्रत्युत क्रियामात्र होती है। जैसे? संसारमात्रमें परिवर्तन होता है अर्थात् नदियाँ बहती हैं? वायु चलती है? वृक्ष बढ़ते हैं? आदिआदि क्रियाएँ होती रहती है? परन्तु इन क्रियाओँसे कर्मसंग्रह नहीं होता अर्थात् ये क्रियाएँ पापपुण्यजनक अथवा बन्धनकारक नहीं होतीं। तात्पर्य यह हुआ कि कर्तृत्वाभिमानसे ही कर्मसिद्धि और कर्मसंग्रह होता है। कर्तृत्वाभिमान मिटनेपर क्रियामात्रमें अधिष्ठान? करण? चेष्टा और दैव -- ये चार हेतु ही होते हैं (गीता 18। 14)।यहाँ सांख्यसिद्धान्तका वर्णन हो रहा है। सांख्यसिद्धान्तमें विवेकविचारकी प्रधानता होती है? फिर भगवान्ने सर्वकर्मणां सिद्धये वाली कर्मोंकी बात यहाँ क्यों छेड़ी कारण कि अर्जुनके सामने युद्धका प्रसङ्ग है। क्षत्रिय होनेके नाते युद्ध उनका कर्तव्यकर्म है। इसलिये कर्मयोगसे अथवा सांख्ययोगसे ऐसे कर्म करने चाहिये? जिससे कर्म करते हुए भी कर्मोंसे सर्वथा निर्लिप्त रहे -- यह बात भगवान्को कहनी है। अर्जुनने सांख्यका तत्त्व पूछा है? इसलिये भगवान् सांख्यसिद्धान्तसे कर्म करनेकी बात कहना आरम्भ करते हैं।अर्जुन स्वरूपसे कर्मोंका त्याग करना चाहते थे अतः उनको यह समझाना था कि कर्मोंका ग्रहण और त्याग -- दोनों ही कल्याणमें हेतु नहीं हैं। कल्याणमें हेतु तो परिवर्तनशील नाशवान् प्रकृतिसे अपरिवर्तनशील अविनाशी अपने स्वरूपका सम्बन्धविच्छेद ही है। उस सम्बन्धविच्छेदकी दो प्रक्रियाएँ हैं -- कर्मयोग और सांख्ययोग। कर्मयोगमें तो फलका अर्थात् ममताका त्याग मुख्य है और सांख्ययोगमें अहंताका त्याग मुख्य है। परन्तु ममताके त्यागसे अहंताका और अहंताके त्यागसे ममताका त्याग स्वतः हो जाता है। कारण कि अहंतामें भी ममता होती है जैसे -- मेरी बात रहे? मेरी बात कट न जाय -- यह मैंपनके साथ भी मेरापन है। इसलिये ममता(मेरापन)को छोड़नेसे अहंता(मैंपन) छूट जाती है (टिप्पणी प0 895)। ऐसे ही पहले अहंता होती है? तब ममता होती है अर्थात् पहले मैं होता है? तब मेरापन होता है। परन्तु जहाँ अहंता(मैंपन)का ही त्याग कर दिया जायगा? वहाँ ममता (मेरापन) कैसे रहेगी वह भी छूट ही जायगी। सम्बन्ध -- सम्पूर्ण कर्मोंकी सिद्धिमें पाँच हेतु कौनसे हैं अब यह बताते हैं।
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।।18.13।।हे महाबाहो ! कर्मोंका अन्त करनेवाले सांख्यसिद्धान्तमें सम्पूर्ण कर्मोंकी सिद्धिके लिये ये पाँच कारण बताये गये हैं, इनको तू मेरेसे समझ।
अधिष्ठानं तथा कर्ता करणं च पृथग्विधम्।
विविधाश्च पृथक्चेष्टा दैवं चैवात्र पञ्चमम् ॥
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।।18.14।। व्याख्या -- अधिष्ठानम् -- शरीर और जिस देशमें यह शरीर स्थित है? वह देश -- ये दोनों अधिष्ठान हैं।कर्ता -- सम्पूर्ण क्रियाएँ प्रकृति और प्रकृतिके कार्योंके द्वारा ही होती हैं। वे क्रियाएँ चाहे समष्टि हों? चाहे व्यष्टि हों परन्तु उन क्रियाओँका कर्ता स्वयं नहीं है। केवल अहंकारसे मोहित अन्तःकरणवाला अर्थात् जिसको चेतन और जडका ज्ञान नहीं है -- ऐसा अविवेककी पुरुष ही जब प्रकृतिसे होनेवाली क्रियाओंको अपनी मान लेता है? तब वह कर्ता बन जाता है (टिप्पणी प0 896)। ऐसा कर्ता ही कर्मोंकी सिद्धिमें हेतु बनता है।करणं च पृथग्विधम् -- कुल तेरह करण हैं। पाणि? पाद? वाक्? उपस्थ और पायु -- ये पाँच कर्मेन्द्रियाँ और श्रोत्र? चक्षु? त्वक्? रसना और घ्राण -- ये पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ -- ये दस बहिःकरण हैं तथा मन? बुद्धि और अहंकार -- ये तीन अन्तःकरण हैं।विविधाश्च पृथक्चेष्टाः -- उपर्युक्त तेरह करणोंकी अलगअलग चेष्टाएँ होती हैं जैसे -- पाणि (हाथ) -- आदानप्रदान करना? पाद (पैर) -- आनाजाना? चलनाफिरना? वाक् -- बोलना? उपस्थ -- मूत्रका त्याग करना? पायु (गुदा) -- मलका त्याग करना? श्रोत्र -- सुनना? चक्षु -- देखना? त्वक् -- स्पर्श करना? रसना -- चखना? घ्राण -- सूँघना? मन -- मनन करना? बुद्धि -- निश्चय करना और अहंकार -- मैं ऐसा हूँआदि अभिमान करना।दैवं चैवात्र पञ्चमम् -- कर्मोंकी सिद्धिमें पाँचवें हेतुका नाम दैव है। यहाँ दैव नाम संस्कारोंका है। मनुष्य जैसा कर्म करता है? वैसा ही संस्कार उसके अन्तःकरणपर पड़ता है। शुभकर्मका शुभ संस्कार पड़ता है और अशुभकर्मका अशुभ संस्कार पड़ता है। वे ही संस्कार आगे कर्म करनेकी स्फुरणा पैदा करते हैं। जिसमें जिस कर्मका संस्कार जितना अधिक होता है? उस कर्ममें वह उतनी ही सुगमतासे लग सकता है और जिस कर्मका विशेष संस्कार नहीं है? उसको करनेमें उसे कुछ परिश्रम पड़ सकता है। इसी प्रकार मनुष्य सुनता है? पुस्तकें पढ़ता है और विचार भी करता है तो वे भी अपनेअपने संस्कारोंके अनुसार ही करता है। तात्पर्य है कि मनुष्यके अन्तःकरणमें शुभ और अशुभ -- जैसे संस्कार होते हैं? उन्हींके अनुसार कर्म करनेकी स्फुरणा होती है।इस श्लोकमें कर्मोंकी सिद्धिमें पाँच हेतु बताये गये हैं -- अधिष्ठान? कर्ता? करण? चेष्टा और दैव। इसका कारण यह है कि आधारके बिना कोई भी काम कहाँ किया जायगा इसलिये अधिष्ठान पद आया है। कर्ताके बिना क्रिया कौन करेगा इसलिये कर्ता पद आया है। क्रिया करनेके साधन (करण) होनेसे ही तो कर्ता क्रिया करेगा? इसलिये करण पद आया है। करनेके साधन होनेपर भी क्रिया नहीं की जायगी तो कर्मसिद्धि कैसे होगी इसलिये चेष्टा पद आया है। कर्ता अपनेअपने संस्कारोंके अनुसार ही क्रिया करेगा? संस्कारोंके विरुद्ध अथवा संस्कारोंके बिना क्रिया नहीं कर सकेगा? इसलिये दैव पद आया है। इस प्रकार इन पाँचोंके होनेसे ही कर्मसिद्धि होती है।
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।।18.14।।इसमें (कर्मोंकी सिद्धिमें) अधिष्ठान तथा कर्ता और अनेक प्रकारके करण एवं विविध प्रकारकी अलग-अलग चेष्टाएँ और वैसे ही पाँचवाँ कारण दैव (संस्कार) है।
शरीरवाङ्मनोभिर्यत्कर्म प्रारभते नरः।
न्याय्यं वा विपरीतं वा पञ्चैते तस्य हेतवः ॥
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।।18.15।। व्याख्या -- शरीरवाङ्मनोभिर्यत्कर्म ৷৷. पञ्चैते तस्य हेतवः -- पीछेके (चौदहवें) श्लोकमें कर्मोंके होनेमें जो अधिष्ठान आदि पाँच हेतु बताये गये हैं? वे पाँचों हेतु इन पदोंमें आ जाते हैं जैसे -- शरीर पदमें अधिष्ठान आ गया? वाक् पदमें बहिःकरण और मन पदमें अन्तःकरण आ गया? नरः पदमें कर्ता आ गया? और प्रारभते पदमें सम्पूर्ण इन्द्रियोंकी चेष्टा आ गयी। अब रही दैव की बात। यह दैव अर्थात् संस्कार अन्तःकरणमें ही रहता है परन्तु उसका स्पष्ट रीतिसे पता नहीं लगता। उसका पता तो उससे उत्पन्न हुई वृत्तियोंसे और उसके अनुसार किये हुए कर्मोंसे ही लगता है।मनुष्य शरीर? वाणी और मनसे जो कर्म आरम्भ करता है अर्थात् कहीं शरीरकी प्रधानतासे? कहीं वाणीकी प्रधानतासे और कहीं मनकी प्रधानतासे जो कर्म करता है? वह चाहे न्याय्य -- शास्त्रविहित हो? चाहे विपरीत, -- शास्त्रविरुद्ध हो? उसमें ये (पूर्वश्लोकमें आये) पाँच हेतु होते हैं।शरीर? वाणी और मन -- इन तीनोंके द्वारा ही सम्पूर्ण कर्म होते हैं। इनके द्वारा किये गये कर्मोंको ही कायिक? वाचिक और मानसिक कर्मकी संज्ञा दी जाती है। इन तीनोंमें अशुद्धि आनेसे ही बन्धन होता है। इसीलिये इन तीनों(शरीर? वाणी और मन) की शुद्धिके लिये सत्रहवें अध्यायके चौदहवें? पन्द्रहवें और सोलहवें श्लोकमें क्रमशः कायिक? वाचिक और मानसिक तपका वर्णन किया गया है। तात्पर्य यह है कि शरीर? वाणी और मनसे कोई भी शास्त्रनिषिद्ध कर्म न किया जाय? केवल शास्त्रविहित कर्म ही किये जायँ? तो वह तप हो जाता है। सत्रहवें अध्यायके ही सत्रहवें श्लोकमें अफलाकाङ्क्षिभिः पद देकर यह बताया है कि निष्कामभावसे किया हुआ तप सात्त्विक होता है। सात्त्विक तप बाँधनेवाला नहीं होता? प्रत्युत मुक्ति देनेवाला होता है। परन्तु राजसतामस तप बाँधनेवाले होते हैं।इन शरीर? वाणी आदिको अपना समझकर अपने लिये कर्म करनेसे ही इनमें अशुद्धि आती है? इसलिये इनको शुद्ध किये बिना केवल विचारसे बुद्धिके द्वारा सांख्यसिद्धान्तकी बातें तो समझमें आ सकती हैं परन्तु कर्मोंके साथ मेरा किञ्चिन्मात्र भी सम्बन्ध नहीं है -- ऐसा स्पष्ट बोध नहीं हो सकता। ऐसी हालतमें साधक शरीर आदिको अपना न समझे और अपने लिये कोई कर्म न करे तो वे शरीरादि बहुत जल्दी शुद्ध हो जायँगे अतः चाहे कर्मयोगकी दृष्टिसे इनको शुद्ध करके इनसे सम्बन्ध तोड़ ले? चाहे सांख्ययोगकी दृष्टिसे प्रबल विवेकके द्वारा इनसे सम्बन्ध तोड़ ले। दोनों ही साधनोंसे प्रकृति और प्रकृतिके कार्यके साथ अपने माने हुए सम्बन्धका विच्छेद हो जाता है और वास्तविक तत्त्वका अनुभव हो जाता है।जिस समष्टिशक्तिसे संसारमात्रकी क्रियाएँ होती हैं? उसी समष्टिशक्तिसे व्यष्टि शरीरकी क्रियाएँ भी स्वाभाविक होती हैं। विवेकको महत्त्व न देनेके कारण स्वयं उन क्रियाओंमेंसे खानापीना? उठनाबैठना? सोनाजगना आदि जिन क्रियाओंका कर्ता अपनेको मान लेता है? वहाँ कर्मसंग्रह होता है अर्थात् वे क्रियाएँ बाँधनेवाली हो जाती हैं। परन्तु जहाँ स्वयं अपनेको कर्ता नहीं मानता? वहाँ कर्मसंग्रह नहीं होता। वहाँ तो केवल क्रियामात्र होती है। इसलिये वे क्रियाएँ फलोत्पादक अर्थात् बाँधनेवाली नहीं होतीं। जैसे? बचपनसे जवान होना? श्वासका आनाजाना? भोजनका पाचन होना तथा रस आदि बन जाना आदि क्रियाएँ बिना कर्तृत्वाभिमानके प्रकृतिके द्वारा स्वतःस्वाभाविक होती हैं और उनका कोई कर्मसंग्रह अर्थात् पापपुण्य नहीं होता। ऐसे ही कर्तृत्वाभिमान न रहनेपर सभी क्रियाएँ प्रकृतिके द्वारा ही होती हैं -- ऐसा स्पष्ट अनुभव हो जाता है। सम्बन्ध -- भगवान्ने सांख्यसिद्धान्त बतानेके लिये जो उपक्रम किया है? उनमें कर्मोंके होनेमें पाँच हेतु बतानेका क्या आशय है -- इसका वर्णन आगेके श्लोकमें करते हैं।
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।।18.15।।मनुष्य, शरीर वाणी और मनके द्वारा शास्त्रविहित अथवा शास्त्रविरुद्ध जो कुछ भी कर्म आरम्भ करता है, उसके ये (पूर्वोक्त) पाँचों हेतु होते हैं।
।।18.16।। व्याख्या -- तत्रैवं सति ৷৷. पश्यति दुर्मतिः -- जितने भी कर्म होते हैं? वे सब अधिष्ठान? कर्ता? करण? चेष्टा और दैव -- इन पाँच हेतुओंसे ही होते हैं? अपने स्वरूपसे नहीं। परन्तु ऐसा होनेपर भी जो पुरुष अपने स्वरूपको कर्ता मान लेता है? उसकी बुद्धि शुद्ध नहीं है -- अकृतबुद्धित्वात् अर्थात् उसने विवेकविचारको महत्त्व नहीं दिया है। जड और चेतनका? प्रकृति और पुरुषका जो वास्तविक विवेक है? अलगाव है? उसकी तरफ उसने ध्यान नहीं दिया है। इसलिये उसकी बुद्धिमें दोष आ गया है। उस दोषके कारण वह अपनेको कर्ता मान लेता है।यहाँ आये अकृतबुद्धित्वात् और दुर्मतिःपदोंका समान अर्थ दीखते हुए भी इनमें थोड़ा फरक है। अकृतबुद्धित्वात् पद हेतुके रूपमें आया है और दुर्मतिः पद कर्ताके विशेषणके रूपमें आया है अर्थात् कर्ताके दुर्मति होनेमें अकृतबुद्धि ही हेतु है। तात्पर्य है कि बुद्धिको शुद्ध न करनेसे अर्थात् बुद्धिमें विवेक जाग्रत् न करनेसे ही वह दुर्मति है। अगर वह विवेकको जाग्रत् करता? तो वह दुर्मति नहीं रहता।केवल (शुद्ध) आत्मा कुछ नहीं करता -- न करोति न लिप्यते (गीता 13। 31) परन्तु तादात्म्यके कारण मैं नहीं करता हूँ -- ऐसा बोध नहीं होता। बोध न होनेमें अकृतबुद्धि ही कारण है अर्थात् जिसने बुद्धिको शुद्ध नहीं किया है? वह दुर्मति ही अपनेको कर्ता मान लेता है जब कि शुद्ध आत्मामें कर्तृत्व नहीं है।केवलम् पद कर्मयोग और सांख्ययोग -- दोनोंमें ही आया है। प्रकृति और पुरुषके विवेकको लेकर कर्मयोग और सांख्ययोग चलते हैं। कर्मयोगमें सब क्रियाएँ शरीर? मन? बुद्धि और इन्द्रियोंके द्वारा ही होती हैं? पर उनके साथ सम्बन्ध नहीं जुड़ता अर्थात् उनमें ममता नहीं होती। ममता न होनेसे शरीर? मन आदिकी संसारके साथ जो एकता है? वह एकता अनुभवमें आ जाती है। एकताका अनुभव होते ही स्वरूपमें स्वतःसिद्ध स्थितिका अनुभव हो जाता है। इसलिये कर्मयोगमें केवलैः पद शरीर? मन? बुद्धि और इन्द्रियोंके साथ दिया गया है -- कायेन मनसा बुद्ध्या केवलैरिन्द्रियैरपि (गीता 5। 11)।सांख्ययोगमें विवेकविचारकी प्रधानता है। जितने भी कर्म होते हैं? वे सब पाँच हेतुओंसे ही होते हैं? अपने स्वरूपसे नहीं। परन्तु अहंकारसे मोहित अन्तःकरणवाला अपनेको कर्ता मान लेता है। विवेकसे मोह मिट जाता है। मोह मिटनेसे वह अपनेको कर्ता कैसे मान सकता है अर्थात् उसे अपने शुद्ध स्वरूपका अनुभव हो जाता है। इसलिये सांख्ययोगमें केवलम् पद स्वरूपके साथ दिया गया है -- केवलम् आत्मानम्।अब इसमें एक बात विशेष ध्यान देनेकी है कि कर्मयोगमें केवल शब्द शरीर? मन आदिके साथ रहनेसे शरीर? मन? बुद्धि आदिके साथ अहम् भी संसारकी सेवामें लग जायगा तथा स्वरूप ज्योंकात्यों रह जायगा और सांख्ययोगमें स्वरूपके साथ केवल रहनेसे मैं निर्लेप हूँ? मैं शुद्धबुद्धमुक्त हूँ इस प्रकार सूक्ष्मरीतिसे अहम् की गंध रह जायगी। मैं निर्लेप रहूँ मेरेमें कर्तृत्व नहीं है -- ऐसी स्थिति बहुत कालतक रहनेसे यह अहम् भी अपनेआप गल जायगा अर्थात् अपने कारण प्रकृतिमें लीन हो जायगा। सम्बन्ध -- पूर्वश्लोकमें यह बताया कि शुद्ध स्वरूपको कर्ता देखनेवाला दुर्मति ठीक नहीं देखता। तो ठीक देखनेवाला कौन है -- इसका वर्णन आगेके श्लोकमें करते हैं।
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।।18.16।।परन्तु ऐसे पाँच हेतुओंके होनेपर भी जो उस (कर्मोंके) विषयमें केवल (शुद्ध) आत्माको कर्ता मानता है, वह दुर्मति ठीक नहीं समझता; क्योंकि उसकी बुद्धि शुद्ध नहीं है।
यस्य नाहंकृतो भावो बुद्धिर्यस्य न लिप्यते।
हत्वाऽपि स इमाँल्लोकान्न हन्ति न निबध्यते ॥
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।।18.17।। व्याख्या -- यस्य नाहंकृतो भावो बुद्धिर्यस्य न लिप्यते -- जिससे मैं करता हूँ -- ऐसा अहंकृतभाव नहीं है और जिसकी बुद्धिमें मेरको फल मिलेगा -- ऐसे स्वार्थभावका लेप नहीं है। इसको ऐसे समझना चाहिये -- जैसे शास्त्रविहित और शास्त्रनिषिद्ध -- ये सभी क्रियाएँ एक प्रकाशमें होती हैं और प्रकाशके ही आश्रित होती हैं परन्तु प्रकाश किसी भी क्रियाका कर्ता नहीं बनता अर्थात् प्रकाश उन क्रियाओँको न करनेवाला है और न करानेवाला है। ऐसे ही स्वरूपकी सत्ताके बिना विहित और निषिद्ध -- कोई भी क्रिया नहीं होती परन्तु वह सत्ता उन क्रियाओंको न करनेवाली है और न करानेवाली है -- ऐसा जिसको साक्षात् अनुभव हो जाता है? उसमें मैं क्रियाओंको करनेवाला हूँ -- ऐसा अहंकृतभाव नहीं रहता और अमुक चीज चाहिये? अमुक चीज नहीं चाहिये अमुक घटना होनी चाहिये? अमुक घटना नहीं होनी चाहिये -- ऐसा बुद्धिमें लेप (द्वन्द्वमोह) नहीं रहता। अहंकृतभाव और बुद्धिमें लेप न रहनेसे उसके कर्तृत्व और भोक्तृत्व -- दोनों नष्ट हो जाते हैं अर्थात् अपनेमें कर्तृत्व और भोक्तृत्व -- ये दोनों ही नहीं हैं? इसका वास्तविक अनुभव हो जाता है।प्रकृतिका कार्य स्वतःस्वाभाविक ही चल रहा है? परिवर्तित हो रहा है और अपना स्वरूप केवल उसका प्रकाशक है -- ऐसा समझकर जो अपने स्वरूपमें स्थित रहता है? उसमें मैं करता हूँ ऐसा अहंकृतभाव नहीं होता क्योंकि अंहकृतभाव प्रकृतिके कार्य शरीरको स्वीकार करनेसे ही होता है। अहंकृतभाव सर्वथा मिटनेपर उसकी बुद्धिमें फल मेरेको मिले ऐसा लेप भी नहीं होता अर्थात् फलकी कामना नहीं होती।अहंकृतभाव एक मनोवृत्ति है। मनोवृत्ति होते हुए भी यह भाव स्वयं(कर्ता)में रहता है क्योंकि कर्तृत्व और अकर्तृत्व भाव स्वयं ही स्वीकार करता है।हत्वापि स इमाँल्लोकान्न हन्ति न निबध्यते -- वह इन सम्पूर्ण प्राणियोंको एक साथ मार डाले? तो भी वह मारता नहीं क्योंकि उसमें कर्तृत्व नहीं है और वह बँधता भी नहीं क्योंकि उसमें भोक्तृत्व नहीं है। तात्पर्य यह है कि उसका न क्रियाओंके साथ सम्बन्ध है और न फलके साथ सम्बन्ध है।वास्तवमें प्रकृति ही क्रिया और फलमें परिणत होती है। परन्तु इस वास्तविकताका अनुभव न होनेसे ही पुरुष (चेतन) कर्ता और भोक्ता बनता है। कारण कि जब अहंकारपूर्वक क्रिया होती है? तब कर्ता? करण और कर्म -- तीनों मिलते हैं और तभी कर्मसंग्रह होता है। परन्तु जिसमें अहंकृतभाव नहीं रहा? केवल सबका प्रकाशक? आश्रय? सामान्य चेतन ही रहा? फिर वह कैसे किसको मारे और कैसे किससे बँधे उसका मारना और बँधना सम्भव ही नहीं है (गीता 2। 19)।सम्पूर्ण प्राणियोंको मारना क्या है जिसमें अहंकृतभाव नहीं है और जिसकी बुद्धिमें लेप नहीं है -- ऐसे मनुष्यका शरीर जिस वर्ण और आश्रममें रहता है? उसके अनुसार उसके सामने जो परिस्थिति आ जाती है? उसमें प्रवृत्त होनेपर उसे पाप नहीं लगता। जैसे? किसी जीवन्मुक्त क्षत्रियके लिये स्वतः युद्धकी परिस्थिति प्राप्त हो जाय तो वह उसके अनुसार सबको मारकर भी न तो मारता है और न बँधता है। कारण कि उसमें अभिमान और स्वार्थभाव नहीं है।यहाँ अर्जुनके सामने भी युद्धका प्रसङ्ग है। इसलिये भगवान्ने हत्वापि पदसे अर्जुनको युद्धके लिये प्रेरणा की है। अपि पदका भाव हैं -- कर्मण्यभिप्रवृत्तोऽपि नैव किञ्चित्करोति सः (गीता 4। 20) कर्मोंमें अच्छी तरह प्रवृत्त होनेपर भी वह कुछ नहीं करता। सर्वथा वर्तमानोऽपि स योगी मयि वर्तते (गीता 6। 31) सर्वथा बर्ताव करता हुआ भी वह योगी मेरेमें रहता है। शरीरस्थोऽपि कौन्तेय न करोति न लिप्यते (गीता 13। 31) शरीरमें स्थित होनेपर भी न करता है और न लिप्त होता है। तात्पर्य यह है कि कर्मोंमें साङ्गोपाङ्ग प्रवृत्त होनेके समय और जिस समय कर्मोंमें प्रवृत्त नहीं है? उस समय भी स्वरूपकी निर्विकल्पता ज्योंकीत्यों रहती है अर्थात् क्रिया करनेसे अथाव क्रिया न करनेसे स्वरूपमें कुछ भी फरक नहीं पड़ता। कारण कि क्रियाविभाग प्रकृतिमें है? स्वरूपमें नहीं।वास्तवमें यह अहंभाव (व्यक्तित्व) ही मनुष्यमें भिन्नता करनेवाला है। अहंभाव न रहनेसे परमात्माके साथ भिन्नताका कोई कारण ही नहीं है। फिर तो केवल सबका आश्रय? प्रकाशक सामान्य चेतन रहता है। वह न तो क्रियाका कर्ता बनता है? और न फलका भोक्ता ही बनता है। क्रियाओंका कर्ता और फलका भोक्ता तो वह पहले भी नहीं था। केवल नाशवान् शरीरके साथ सम्बन्ध मानकर जिस अहंभावको स्वीकार किया है? उसी अहंभावसे उसमें कर्तापन और भोक्तापन आया है।अहम् दो प्रकारका होता है -- अहंस्फूर्ति और अहंकृति। गाढ़ नींदसे उठते ही सबसे पहले मनुष्यको अपने होनेपन(सत्तामात्र) का भान होता है? इसको अहंस्फूर्ति कहते हैं। इसके बाद वह अपनेमें मैं अमुक नाम? वर्ण? आश्रम आदिका हूँ -- ऐसा आरोप करता है? यही असत्का सम्बन्ध है। असत्के सम्बन्धसे अर्थात् शरीरके साथ तादात्म्य माननेसे शरीरकी क्रियाको लेकर मैं करता हूँ -- ऐसा भाव उत्पन्न होता है? इसको अहंकृति कहते हैं।अहम् को लेकर ही अपनेमें परिच्छिन्नता आती है। इसलिये अहंस्फूर्तिमें भी किञ्चित् परिच्छिन्नता (व्यक्तित्व) रह सकती है। परन्तु यह परिच्छिन्नता बन्धनकारक नहीं होती अर्थात् परिच्छिन्नता रहनेपर भी अहंस्फूर्ति दोषी नहीं होती। कारण कि अहंकृति अर्थात् कर्तृत्वके बिना अपनेमें गुणदोषका आरोप नहीं होता।,अहंकृति आनेसे ही अपनेमें गुणदोषका आरोप होता है? जिससे शुभअशुभ कर्म बनते हैं। बोध होनेपर अहंस्फूर्तिमें जो परिच्छिन्नता है? वह जल जाती है और स्फूर्तिमात्र रह जाती है। ऐसी स्थितिमें मनुष्य न मारता है और न बँधता है।न हन्ति न निबध्यते (न मारता है और न बँधता है) का क्या भाव है एक निर्विकल्पअवस्था होती है और एक निर्विकल्पबोध होता है। निर्विकल्पअवस्था साधनसाध्य है और उसका उत्थान भी होता है अर्थात् वह एकरस नहीं रहती। इस निर्विकल्पअवस्थासे भी असङ्गता होनेपर स्वतःसिद्ध निर्विकल्पबोधका अनुभव होता है। निर्विकल्पबोध साधनसाध्य नहीं है और उसमें निर्विकल्पता किसी भी अवस्थामें किञ्चिन्मात्र भी भंग नहीं होती। निर्विकल्पबोधमें कभी परिवर्तन हुआ नहीं? होगा नहीं और होना सम्भव भी नहीं। तात्पर्य है कि उस निर्विकल्पबोधमें कभी हलचल आदि नहीं होते? यही न हन्ति न निबध्यते का भाव है।अहंकृतभाव और बुद्धिमें लेप न रहनेका उपाय क्या है क्रियारूपसे परिवर्तन केवल प्रकृतिमें ही होता है और उन क्रियाओंका भी आरम्भ और अन्त होता है तथा उन कर्मोंके फलरूपसे जो पदार्थ मिलते हैं? उनका भी संयोगवियोग होता है। इस प्रकार क्रिया और पदार्थ -- दोनोंके साथ संयोगवियोग होता रहता है। संयोगवियोग होनेपर भी स्वयं तो प्रकाशकरूपसे ज्योंकात्यों ही रहता है। विवेकविचारसे ऐसा अनुभव होनेपर अहंकृतभाव और बुद्धिमें लेप नहीं रहता। सम्बन्ध -- ज्ञान और प्रवृत्ति (क्रिया) दोषी नहीं होते? प्रत्युत कर्तृत्वाभिमान ही दोषी होता है क्योंकि कर्तृत्वाभिमानसे ही कर्मसंग्रह होता है -- यह बात आगेके श्लोकमें बताते हैं।
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।।18.17।।जिसका अहंकृतभाव नहीं है और जिसकी बुद्धि लिप्त नहीं होती, वह इन सम्पूर्ण प्राणियोंको मारकर भी न मारता है और न बँधता है।
।।18.18।। व्याख्या -- [इसी अध्यायके चौदहवें श्लोकमें भगवान्ने कर्मोंके बननेमें पाँच हेतु बताये -- अधिष्ठान? कर्ता? करण? चेष्टा और दैव (संस्कार)। इन पाँचोंमें भी मूल हेतु है -- कर्ता। इसी मूल हेतुको मिटानेके लिये भगवान्ने सोलहवें श्लोकमें कर्तृत्वभाव रखनेवालेकी बड़ी निन्दा की और सत्रहवें श्लोकमें कर्तृत्वभाव न रखनेवालेकी बड़ी प्रशंसा की। कर्तृत्वभाव बिलकुल न रहे? यह साफसाफ समझानेके लिये ही अठारहवाँ श्लोक कहा गया है।]ज्ञानं ज्ञेयं परिज्ञाता त्रिविधा कर्मचोदना -- ज्ञान? ज्ञेय और परिज्ञाता -- इन तीनोंसे कर्मप्रेरणा होती है। ज्ञान को सबसे पहले कहनेमें यह भाव है कि हरेक मनुष्यकी कोई भी प्रवृत्ति होती है तो प्रवृत्तिसे पहले ज्ञान होता है। जैसे? जल पीनेकी प्रवृत्तिसे पहले प्यासका ज्ञान होता है? फिर वह जलसे प्यास बुझाता है। जल आदि जिस विषयका ज्ञान होता है? वह ज्ञेय कहलाता है और जिसको ज्ञान होता है? वह परिज्ञाता कहलाता है। ज्ञान? ज्ञेय और परिज्ञाता -- तीनों होनेसे ही कर्म करनेकी प्रेरणा होती है। यदि इन तीनोंमेंसे एक भी न हो तो कर्म करनेकी प्रेरणा नहीं होती।परिज्ञाता उसको कहते हैं? जो परितः ज्ञाता है अर्थात् जो सब तरहकी क्रियाओंकी स्फुरणाका ज्ञाता है। वह केवल ज्ञाता मात्र है अर्थात् उसे क्रियाओंकी स्फुरणामात्रका ज्ञान होता है? उसमें अपने लिये कुछ चाहनेका अथवा उस क्रियाको करनेका अभिमान आदि बिलकुल नहीं होता।कोई भी क्रिया करनेकी स्फुरणा एक व्यक्तिविशेषमें ही होती है। इसलिये शब्द? स्पर्श? रूप? रस और गन्ध -- इन विषयोंको लेकर सुननेवाला? स्पर्श करनेवाला? देखनेवाला? चखनेवाला और सूँघनेवाला -- इस तरह अनेक कर्ता हो सकते हैं परन्तु उन सबको जाननेवाला एक ही रहता है? उसे ही यहाँ,परिज्ञाता कहा है।करणं कर्म कर्तेति त्रिविधः कर्मसंग्रहः -- कर्मसंग्रहके तीन हेतु हैं -- करण? कर्म तथा कर्ता। इन तीनोंके,सहयोगसे कर्म पूरा होता है। जिन साधनोंसे कर्ता कर्म करता है? उन क्रिया करनेके साधनों(इन्द्रियों आदि)को करण कहते हैं। खानापीना? उठनाबैठना? चलनाफिरना? आनाजाना आदि जो चेष्टाएँ की जाती हैं? उनको कर्म कहते हैं। करण और क्रियासे अपना सम्बन्ध जोड़कर कर्म करनेवालेको कर्ता कहते हैं। इस प्रकार इन तीनोंके मिलनेसे ही कर्म बनता है।भगवान्को यहाँ खास बात यह बतानी है कि कर्मसंग्रह कैसे होता है अर्थात् कर्म बाँधनेवाला कैसे होता है कर्म बननेके तीन हेतु बताते हुए भगवान्का लक्ष्य मूल हेतु कर्ता को बतानेमें है क्योंकि कर्मसंग्रहका खास सम्बन्ध कर्तासे है। यदि कर्तापन न हो तो कर्मसंग्रह नहीं होता? केवल क्रियामात्र होती है।कर्मसंग्रहमें करण हेतु नहीं है क्योंकि करण कर्ताके अधीन होता है। कर्ता जैसा कर्म करना चाहता है? वैसा ही कर्म होता है? इसलिये कर्म भी कर्मसंग्रहमें खास हेतु नहीं है। सांख्यसिद्धान्तके अनुसार खास बाँधनेवाला है -- अहंकृतभाव और इसीसे कर्मसंग्रह होता है। अहंकृतभाव न रहनेसे कर्मसंग्रह नहीं होता अर्थात् कर्म फलजनक नहीं होता। इस मूलका ज्ञान करानेके लिये ही भगवान्ने करण और कर्मको पहले रखकर कर्ताको कर्मसंग्रहके पासमें रखा है? जिससे यह खयालमें आ जाय कि बाँधनेवाला कर्ता ही है। सम्बन्ध -- गुणातीत होनेके उद्देश्यसे अब आगेके श्लोकसे त्रिगुणात्मक पदार्थोंका प्रकरण आरम्भ करते हैं।
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।।18.18।।ज्ञान, ज्ञेय और परिज्ञाता -- इन तीनोंसे कर्मप्रेरणा होती है तथा करण, कर्म और कर्ता -- इन तीनोंसे कर्मसंग्रह होता है।
।।18.19।। व्याख्या -- प्रोच्यते गुणसंख्याने -- जिस शास्त्रमें गुणोंके सम्बन्धसे प्रत्येक पदार्थके भिन्नभिन्न भेदोंकी गणना की गयी है? उसी शास्त्रके अनुसार मैं तुम्हें ज्ञान? कर्म तथा कर्ताके भेद बता रहा हूँ।ज्ञानं कर्म च कर्ता च त्रिधैव गुणभेदतः -- पीछेके श्लोकमें भगवान्ने कर्मकी प्रेरणा होनेमें तीन हेतु बताये तथा तीन ही हेतु कर्मके बननेमें बताये। इस प्रकार कर्मसंग्रह होनेतकमें कुल छः बातें बतायीं (टिप्पणी प0 901)। अब इस श्लोकमें भगवान् ज्ञान? कर्म तथा कर्ता -- इन तीनोंका विवेचन करनेकी ही बात कहते हैं। कर्मप्रेरकविभागमेंसे विवेचन करनेके लिये केवल ज्ञान लिया गया है? क्योंकि किसी भी कर्मकी प्रेरणामें पहले ज्ञान ही होता है। ज्ञानके बाद ही कार्यका आरम्भ होता है। कर्मसंग्रहविभागमेंसे केवल कर्म और कर्ता लिये गये हैं। यद्यपि कर्मके होनेमें कर्ता मुख्य है? तथापि साथमें कर्मको भी लेनेका कारण यह है कि कर्ता जब कर्म करता है? तभी कर्मसंग्रह होता है। अगर कर्ता कर्म न करे तो कर्मसंग्रह होगा ही नहीं। तात्पर्य यह हुआ कि कर्मप्रेरणामें ज्ञान तथा कर्मसंग्रहमें कर्म और कर्ता मुख्य हैं। इन तीनों -- (ज्ञान? कर्म और कर्ता -- ) के सात्त्विक होनेसे ही मनुष्य निर्लिप्त हो सकता है? राजस और तामस होनेसे नहीं। अतः यहाँ कर्मप्रेरकविभागमें ज्ञाता और ज्ञेय को तथा कर्मसंग्रहविभागमें करण को नहीं लिया गया है।कर्मप्रेरकविभाग के ज्ञाता और ज्ञेय का विवेचन क्यों नहीं किया कारण कि ज्ञाता जब क्रियासे सम्बन्ध जोड़ता है? तब वह कर्ता कहलाता है और उस कर्ताके तीन (सात्त्विक? राजस और तामस) भेदोंके अन्तर्गत ही ज्ञाताके भी तीन भेद हो जाते हैं। परन्तु ज्ञाता जब ज्ञप्तिमात्र रहता है? तब उसके तीन भेद नहीं होते क्योंकि उसमें गुणोंका सङ्ग नहीं है। गुणोंका सङ्ग होनेसे ही उसके तीन भेद होते हैं। इसलिये वृत्तिज्ञान ही सात्त्विक? राजस तथा तामस होता है।जिसे जाना जाय? उस विषयको ज्ञेय कहते हैं। जाननेके विषय अनेक हैं? इसलिये इसके अलग भेद नहीं किये गये। परन्तु जाननेयोग्य सब विषयोंका एकमात्र लक्ष्य सुख प्राप्त करना ही रहता है। जैसे? कोई विद्या पढ़ता है? कोई धन कमाता है? कोई अधिकार पानेकी चेष्टा करता है तो इन सब विषयोंको जानने? पानेकी चेष्टाका लक्ष्य एकमात्र सुख ही रहता है। विद्या पढ़नेमें यही भाव रहता है कि ज्यादा पढ़कर ज्यादा धन कमाऊँगा? मान पाऊँगा और उनसे मैं सुखी होऊँगा। ऐसे ही हरेक कर्मका लक्ष्य परम्परासे सुख ही रहता है। इसलिये भगवान्ने ज्ञेयके तीन भेद सात्त्विक? राजस और तामस सुख के नामसे आगे (18 । 36 -- 39में) किये हैं।ऐसे ही भगवान्ने करणके भी तीन भेद नहीं किये क्योंकि इन्द्रियाँ आदि जितने भी करण हैं? वे सब साधनमात्र हैं। इसलिये उनके तीन भेद नहीं होते। परन्तु इन सभी करणोंमें बुद्धि की ही प्रधानता है क्योंकि मनुष्य करणोंसे जो कुछ भी काम करता है? उसको वह बुद्धिपूर्वक (विचारपूर्वक) ही करता है। इसलिये भगवान्ने करणके तीन भेद सात्त्विक? राजस और तामस बुद्धिके नामसे आगे (18। 30 -- 32 में) किये हैं।बुद्धिको दृढ़तासे रखनेमें धृति बुद्धिकी सहायक बनती है। ज्ञानयोगकी साधनामें भगवान्ने दो जगह (6। 25 में तथा 18। 51में) बुद्धिके साथ धृति पद भी दिया है। इससे यह मालूम देता है कि ज्ञानमार्गमें बुद्धिके साथ धृतिकी विशेष आवश्यकता है। इसलिये भगवान्ने धृतिके भी तीन भेद (18। 33 -- 35 में) बताये हैं।त्रिधैव पदमें यह भाव है कि ये भेद तीन (सात्त्विक? राजस और तामस) ही होते हैं? कम और ज्यादा नहीं होते अर्थात् न दो होते हैं और न चार होते हैं। कारण कि सत्त्व? रज और तम -- ये तीन गुण ही प्रकृतिसे उत्पन्न हैं -- सत्त्वं रजस्तम इति गुणाः प्रकृतिसम्भवाः (गीता 14। 5)। इसलिये इन तीनों गुणोंको लेकर तीन ही भेद होते हैं।यथावत् -- गुणसंख्यानशास्त्रमें इस विषयका जैसा वर्णन हुआ है? वैसाकावैसा तुम्हें सुना रहा हूँ अपनी तरफसे कुछ कम या अधिक करके नहीं सुना रहा हूँ।श्रृणु -- इस विषयको ध्यानसे सुनो। कारण कि सात्त्विक? राजस और तामस -- इन तीनोंमेंसे सात्त्विक चीजें तो कर्मोंसे सम्बन्धविच्छेद करके परमात्मतत्त्वका बोध करानेवाली हैं? राजस चीजें जन्ममरण देनेवाली हैं और तामस चीजें पतन करनेवाली अर्थात् नरकों और नीच योनियोंमें ले जानेवाली हैं। इसलिये इनका वर्णन सुनकर सात्त्विक चीजोंको ग्रहण तथा राजसतामस चीजोंका त्याग करना चाहिये।तानि -- इन ज्ञान आदिका तुम्हारे स्वरूपके साथ कोई सम्बन्ध नहीं है। तुम्हारा स्वरूप तो सदा निर्लेप है।अपि -- इनके भेदोंको जाननेकी भी बड़ी भारी आवश्यकता है क्योंकि इनको ठीक तरहसे जाननेपर यस्य नाहंकृतो भावो ৷৷. न हन्ति न निबध्यते (18। 17) -- इस श्लोकका ठीक अनुभव हो जायगा अर्थात् अपने स्वरूपका बोध हो जायगा। सम्बन्ध -- अब भगवान् सात्त्विक ज्ञानका वर्णन करते हैं।
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।।18.19।।गुणसंख्यान (गुणोंके सम्बन्धसे प्रत्येक पदार्थके भिन्न-भिन्न भेदोंकी गणना करनेवाले) शास्त्रमें गुणोंके भेदसे ज्ञान और कर्म तथा कर्ता तीन-तीन प्रकारसे ही कहे जाते हैं, उनको भी तुम यथार्थरूपसे सुनो।
।।18.20।। व्याख्या -- सर्वभूतेषु येनैकं ৷৷. अविभक्तं विभक्तेषु -- व्यक्ति? वस्तु आदिमें जो है पन दीखता है? वह उन व्यक्ति? वस्तु आदिका नहीं है? प्रत्युत सबमें परिपूर्ण परमात्मका ही है। उन व्यक्ति? वस्तु आदिकी स्वतन्त्र सत्ता ही नहीं है क्योंकि उनमें प्रतिक्षण परिवर्तन हो रहा है। कोई भी व्यक्ति? वस्तु आदि ऐसी नहीं है? जिसमें परिवर्तन न होता हो परन्तु अपनी अज्ञता(बेसमझी)से उनकी सत्ता दीखती है। जब अज्ञता मिट जाती है? ज्ञान हो जाता है? तब साधककी दृष्टि उस अविनाशी तत्त्वकी तरफ ही जाती है? जिसकी सत्तासे यह सब सत्तावान् हो रहा है।ज्ञान होनेपर साधककी दृष्टि परिवर्तनशील वस्तुओंको भेदकर परिवर्तनरहित तत्त्वकी ओर ही जाती है (गीता 13। 27)। फिर वह विभक्त अर्थात् अलगअलग वस्तु? व्यक्ति? परिस्थिति? घटना आदिमें विभागरहित एक ही तत्त्वको देखता है (गीता 13। 16)। तात्पर्य यह है कि अलगअलग वस्तु? व्यक्ति आदिका अलगअलग ज्ञान और यथायोग्य अलगअलग व्यवहार होते हुए भी वह इन विकारी वस्तुओंमें उस स्वतःसिद्ध निर्विकार एक तत्त्वको देखता है। उसके देखनेकी यही पहचान है कि उसके अन्तःकरणमें रागद्वेष नहीं होते।तज्ज्ञानं विद्धि सात्त्विकम् -- उस ज्ञानको तू सात्त्विक जान। परिवर्तनशील वस्तुओं? वृत्तियोंके सम्बन्धसे ही इसे सात्त्विक ज्ञान कहते हैं। सम्बन्धरहित होनेपर यही ज्ञान वास्तविक बोध कहलाता है? जिसको भगवान्ने सब साधनोंसे जाननेयोग्य ज्ञेयतत्त्व बताया है -- ज्ञेयं यत्तत्प्रवक्ष्यामि यज्ज्ञात्वामृतमश्नुते (गीता 13। 12)।मार्मिक बातसंसारका ज्ञान इन्द्रियोंसे होता है? इन्द्रियोंका ज्ञान बुद्धिसे होता है और बुद्धिका ज्ञान मैंसे होता है। वह मैं बुद्धि? इन्द्रियाँ और विषय -- इन तीनोंको जानता है। परन्तु उस मैंका भी एक प्रकाशक है? जिसमें मैंका भी भान होता है। वह प्रकाश सर्वदेशीय और असीम है? जब कि मैं एकदेशीय और सीमित है। उस प्रकाशमें जैसे मैंका भान होता है? वैसे ही तू? यह और वह का भी भान होता है। वह प्रकाश किसीका भी विषय नहीं है। वास्तवमें वह प्रकाश निर्गुण ही है परन्तु व्यक्तिविशेषमें रहनेवाला होनेसे (वृत्तियोंके सम्बन्धसे) उसे सात्त्विक ज्ञान कहते हैं।इस सात्त्विक ज्ञानको दूसरे ढंगसे इस प्रकार समझना चाहिये -- मैं? तू? यह और वह -- ये चारों ही किसी प्रकाशमें काम करते हैं। इन चारोंके अन्तर्गत सम्पूर्ण प्राणी आ जाते हैं? जो विभक्त हैं परन्तु इनका जो प्रकाशक है? वह अवभिक्त (विभागरहित) है।बोलनेवाला? मैं? उसके सामने सुननेवाला तू और पासवाला यह तथा दूरवाला वह कहा जाता है अर्थात् बोलनेवाला अपनेको मैं कहता है? सामनेवालेको तू कहता है? पासवालेको यह कहता है और दूरवालेको वह कहता है। जो तू बना हुआ था? वह मैं हो जाय तो मैं बना हुआ तू हो जायगा और यह तथा वह वही रहेंगे। इसी प्रकार यह कहलानेवाला अगर मैं बन जाय तो तू कहलानेवाला यह बन जायगा और मैं कहलानेवाला तू बन जायगा। वह परोक्ष होनेसे अपनी जगह ही रहा। अब वह कहलानेवाला मैं बन जायगा तो उसकी दृष्टिमें मैं? तू और यह कहलानेवाले सब वह हो जायँगे (टिप्पणी प0 903)। इस प्रकाशमें मैं? तू? यह और वह का भान हो रहा है। दृष्टिमें चारों ही बन सकते हैं।इससे यह सिद्ध हुआ कि मैं? तू? यह और वह -- ये सब परिवर्तनशील हैं अर्थात् टिकनेवाले नहीं हैं? वास्तविक नहीं हैं। अगर वास्तविक होते तो एक ही रहते। वास्तविक तो इन सबका प्रकाशक और आश्रय है? जिसके प्रकार मैं? तू? यह और वह -- ये यारों ही एकदूसरेकी उस प्रकाशमें मैं? तू? यह और वह -- ये चारों ही नहीं हैं? प्रत्युत उसीसे इन चारोंको सत्ता मिलती है। अपनी मान्यताके कारण मैं? तू? यह? वह का तो भान होता है? पर प्रकाशकका भान नहीं होता। वह प्रकाशक सबको प्रकाशित करता है? स्वयंप्रकाशस्वरूप है और सदा ज्योंकात्यों रहता है। मैं? तू? यह और वह -- यह सब विभक्त प्राणियोंका स्वरूप है और जो वास्तविक प्रकाशक है? वह विभागरहित है। यही वास्तवमें सात्त्विक ज्ञान है।विभागवाली? परिवर्तनशील और नष्ट होनेवाली जितनी वस्तुएँ हैं? यह ज्ञान उन सबका प्रकाशक है और स्वयं भी निर्मल तथा विकाररहित है -- तत्र सत्त्वं निर्मलत्वात् प्रकाशकमनामयम् (गीता 14। 6)। इसलिये इस ज्ञानको सात्त्विक कहा जाता है।वास्तवमें यह सात्त्विक ज्ञान प्रकाश्यकी दृष्टि(सम्बन्ध)से प्रकाशक और विभक्तकी दृष्टिसे अविभक्त कहा जाता है। प्रकाश्य और विभक्तसे रहित होनेपर तो यह निर्गुण? निरपेक्ष वास्तविक ज्ञान ही है। सम्बन्ध -- अब राजस ज्ञानका वर्णन करते हैं।
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।।18.20।।जिस ज्ञानके द्वारा साधक सम्पूर्ण विभक्त प्राणियोंमें विभागरहित एक अविनाशी भाव-(सत्ता-) को देखता है, उस ज्ञानको तुम सात्त्विक समझो।
।।18.21।। व्याख्या -- पृथक्त्वेन तु (टिप्पणी प0 904.1) यज्ज्ञानं नानाभावान् पृथग्विधान् -- राजस ज्ञानमें राग की मुख्यता होती है -- रजो रागात्मकं विद्धि (गीता 14। 7)। रागका यह नियम है कि वह जिसमें आ जाता है? उसमें किसीके प्रति आसक्ति? प्रियता पैदा करा देता है और किसीके प्रति द्वेष पैदा करा देता है। इस रागके कारण ही मनुष्य? देवता? यक्षराक्षस? पशुपक्षी? कीटपतङ्ग? वृक्षलता आदि जितने भी चरअचर प्राणी हैं? उन प्राणियोंकी विभिन्न आकृति? स्वभाव? नाम? रूप? गुण आदिको लेकर राजस ज्ञानवाला मनुष्य उनमें रहनेवाली एक ही अविनाशी आत्माको तत्त्वसे अलगअलग समझता है।वेत्ति सर्वेषु भूतेषु तज्ज्ञानं विद्धि राजसम् -- इसी तरह जिस ज्ञानसे मनुष्य अलगअलग शरीरोंमें अन्तःकरण? स्वभाव? इन्द्रियाँ? प्राण आदिके सम्बन्धसे प्राणियोंको भी अलगअलग मानता है? वह ज्ञान राजस कहलाता है। राजस ज्ञानमें जडचेतनका विवेक नहीं होता। सम्बन्ध -- अब तामस ज्ञानका वर्णन करते हैं।
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।।18.21।।परन्तु जो ज्ञान अर्थात् जिस ज्ञानके द्वारा मनुष्य सम्पूर्ण प्राणियोंमें अलग-अलग अनेक भावोंको अलग-अलग रूपसे जानता है, उस ज्ञानको तुम राजस समझो।
यत्तु कृत्स्नवदेकस्मिन्कार्ये सक्तमहैतुकम्।
अतत्त्वार्थवदल्पं च तत्तामसमुदाहृतम् ॥
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।।18.22।। व्याख्या -- यत्तु (टिप्पणी प0 904.2) कृत्स्नवदेकस्मिन्कार्ये सक्तम् -- तामस मनुष्य एक ही शरीरमें सम्पूर्णकी तरह आसक्त रहता है अर्थात् उत्पन्न और नष्ट होनेवाले इस पाञ्चभौतिक शरीरको ही अपना स्वरूप मानता है। वह मानता है कि मैं ही छोटा बच्चा था? मैं ही जवान हूँ और मैं ही बूढ़ा हो जाऊँगा मैं भोगी? बलवान् और सुखी हूँ मैं धनी और बड़े कुटुम्बवाला हूँ मेरे समान दूसरा कौन है इत्यादि। ऐसी मान्यता मूढ़ताके कारण ही होती है -- इत्यज्ञानविमोहिताः (16। 15)।अहैतुकम् -- तामस मनुष्यकी मान्यता युक्ति और शास्त्रप्रमाणसे विरुद्ध होती है। यह शरीर हरदम बदल रहा है? शरीरादि वस्तुमात्र अभावमें परिवर्तित हो रही है? दृश्यमात्र अदृश्य हो रहा है और इनमें तू सदा ज्योंकात्यों रहता है अतः यह शरीर और तू एक कैसे हो सकते हैं -- इस प्रकारकी युक्तियोंको वह स्वीकार नहीं करता।अतत्त्वार्थवदल्पं च -- यह शरीर और मैं दोनों अलगअलग हैं -- इस वास्तविक ज्ञान(विवेक) से वह रहित है। उसकी समझ अत्यन्त तुच्छ है अर्थात् तुच्छताकी प्राप्ति करानेवाली है। इसलिये इसको ज्ञान कहनेमें भगवान्को संकोच हुआ है। कारण कि तामस पुरुषमें मूढ़ताकी प्रधानता होती है। मूढ़ता और ज्ञानका आपसमें विरोध है. अतः भगवान्ने ज्ञान पद न देकर यत् और तत् पदसे ही काम चलाया है।तत्तामसमुदाहृतम् -- युक्तिरहित? अल्प और अत्यन्त तुच्छ समझको ही महत्त्व देना तामस कहा गया है।जब तामस समझ ज्ञान है ही नहीं और भगवान्को भी इसको ज्ञान कहनेमें संकोच हुआ है? तो फिर इसका वर्णन ही क्यों किया गया कारण कि भगवान्ने उन्नीसवें श्लोकमें ज्ञानके त्रिविध भेद कहनेका उपक्रम किया है? इसलिये सात्त्विक और राजसज्ञानका वर्णन करनेके बाद तामस समझको भी कहनेकी आवश्यकता थी। सम्बन्ध -- अब भगवान् सात्त्विक कर्मका वर्णन करते हैं।
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।।18.22।।किंतु जो (ज्ञान) एक कार्यरूप शरीरमें ही सम्पूर्णके तरह आसक्त है तथा जो युक्तिरहित, वास्तविक ज्ञानसे रहित और तुच्छ है, वह तामस कहा गया है।
।।18.23।। व्याख्या -- नियतं सङ्गरहितम् ৷৷. सात्त्विकमुच्यते -- जिस व्यक्तिके लिये वर्ण और आश्रमके अनुसार जिस परिस्थितिमें और जिस समय शास्त्रोंने जैसा करनेके लिये कहा है? उसके लिये वह कर्म नियत हो जाता है।यहाँ नियतम् पदसे एक तो कर्मोंका स्वरूप बताया है और दूसरे? शास्त्रनिषिद्ध कर्मका निषेध किया है।सङ्गरहितम् पदका तात्पर्य है कि वह नियतकर्म कर्तृत्वाभिमानसे रहित होकर किया जाय। कर्तृत्वाभिमानसे रहित कहनेका भाव है कि जैसे वृक्ष आदिमें मूढ़ता होनेके कारण उनको कर्तृत्वका भान नहीं होता? पर उनकी भी ऋतु आनेपर पत्तोंका झड़ना? नये पत्तोंका निकलना? शाखा कटनेपर घावका मिल जाना? शाखाओंका बढ़ना? फलफूलका लगना आदि सभी क्रियाएँ समष्टि शक्तिके द्वारा अपनेआप ही होती हैं ऐसे ही इन सभी शरीरोंका बढ़नाघटना? खानापीना? चलनाफिरना आदि सभी क्रियाएँ भी समष्टि शक्तिके द्वारा अपनेआप हो रही हैं। इन क्रियाओँके साथ न अभी कोई सम्बन्ध है? न पहले कोई सम्बन्ध था और न आगे ही कोई सम्बन्ध होगा। इस प्रकार जब साधकको प्रत्यक्ष अनुभव हो जाता है? तो फिर उसमें कर्तृत्व नहीं रहता। कर्तृत्व न रहनेपर उसके द्वारा जो कर्म होता है? वह सङ्गरहित अर्थात् कर्तृत्वाभिमानरहित ही होता है। ,यहाँ सांख्यप्रकरणमें कर्तृत्वका त्याग मुख्य होनेसे और आगे अरागद्वेषतः कृतम् पदोंमें भी आसक्तिके त्यागकी बात आनेसे यहाँ सङ्गरहितम् पदका अर्थ कर्तृत्वअभिमानरहित लिया गया है (टिप्पणी प0 905)।अरागद्वेषतः कृतम् पदोंका तात्पर्य है कि रागद्वेषसे रहित हो करके कर्म किया जाय अर्थात् कर्मका ग्रहण रागपूर्वक न हो और कर्मका त्याग द्वेषपूर्वक न हो तथा कर्म करनेके जितने साधन (शरीर? इन्द्रियाँ? अन्तःकरण आदि) हैं? उनमें भी रागद्वेष न हो।अरागद्वेषतः पदसे वर्तमानमें रागका अभाव बताया है और अफलप्रेप्सुना पदसे भविष्यमें रागका अभाव बताया है। तात्पर्य यह है कि भविष्यमें मिलनेवाले फलकी इच्छासे रहित मनुष्यके द्वारा कर्म किया जाय अर्थात् क्रिया और पदार्थोंसे निर्लिप्त रहते हुए असङ्गतापूर्वक कर्म किया जाय तो वह सात्त्विक कहा जाता है।इस सात्त्विक कर्ममें सात्त्विकता तभीतक है? जबतक अत्यन्त सूक्ष्मरूपसे भी प्रकृतिके साथ सम्बन्ध है। जब प्रकृतिसे सर्वथा सम्बन्धविच्छेद हो जाता है? तब यह कर्म अकर्म हो जाता है। सम्बन्ध -- अब राजस कर्मका वर्णन करते हैं।
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।।18.23।।जो कर्म शास्त्रविधिसे नियत किया हुआ और कर्तृत्वाभिमानसे रहित हो तथा फलेच्छारहित मनुष्यके द्वारा बिना राग-द्वेषके किया हुआ हो, वह सात्त्विक कहा जाता है।
यत्तु कामेप्सुना कर्म साहंकारेण वा पुनः।
क्रियते बहुलायासं तद्राजसमुदाहृतम् ॥
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।।18.24।। व्याख्या -- यत्तु (टिप्पणी प0 906) कामेप्सुना कर्म -- हम कर्म करेंगे तो हमें पदार्थ मिलेंगे? सुखआराम मिलेगा? भोग मिलेंगे? आदरसम्मानबड़ाई मिलेगी आदि फलकी इच्छावाले व्यक्तिके द्वारा कर्म किया जाय।साहंकारेण -- लोगोंके सामने कर्म करनेसे लोग देखते हैं और वाहवाह करते हैं तो अभिमान आता है और जहाँ लोग सामने नहीं होते? वहाँ (एकान्तमें) कर्म करनेसे दूसरोंकी अपेक्षा अपनेमें विलक्षणता? विशेषता देखकर अभिमान आता है। जैसे -- दूसरे आदमी हमारी तरह सुचारुरूपसे साङ्गोपाङ्ग कार्य नहीं कर सकते हमारेमें काम करनेकी जो योग्यता? विद्या? चतुरता आदि है? वह हरेक आदमीमें नहीं मिलेगी हम जो भी काम करते हैं? उसको बहुत ही ईमानदारीसे और जल्दी करते हैं? आदिआदि। इस प्रकार अहंकारपूर्वक किया गया कर्म राजस कहलाता है।वा पुनः -- आगे भविष्यमें मिलनेवाले फलको लेकर (फलेच्छापूर्वक) कर्म किया जाय अथवा वर्तमानमें अपनी विशेषताको लेकर (अहंकारपूर्वक) कर्म किया जाय -- इन दोनों भावोंमेंसे एक भाव होनेपर भी वह कर्म राजस हो जाता है? यह बतानेके लिये यहाँ वा पुनः पद आये हैं। तात्पर्य है कि फलेच्छा और अहंकार -- इन दोनोंमेंसे जब एक भाव होनेपर भी कर्म राजस हो जाता है? तब दोनों भाव होनेपर वह कर्म राजस हो ही जायगा। क्रियते बहुलायासम् -- कर्म करते समय हरेक व्यक्तिके शरीरमें परिश्रम तो होता ही है? पर जिस व्यक्तिमें शरीरके सुखआरामकी इच्छा मुख्य होती है? उसको कर्म करते समय शरीरमें ज्यादा परिश्रम मालूम देता है।जिस व्यक्तिमें कर्मफलकी इच्छा तो मुख्य है? पर शारीरिक सुखआरामकी इच्छा मुख्य नहीं है? अर्थात् सुखआराम लेनेकी स्वाभाविक ही प्रकृति नहीं है? उसको कर्म करते हुए भी शरीरमें परिश्रम नहीं मालूम देता। कारण कि भीतरमें भोगों और संग्रहकी जोरदार कामना होनेसे उसकी वृत्ति कामनापूर्तिकी तरफ ही लगी रहती है शरीरकी तरफ नहीं। तात्पर्य है कि शरीरके सुखआरामकी मुख्यता होनेसे फलेच्छाकी अवहेलना हो जाती है और फलेच्छाकी मुख्यता होनेसे शरीरके सुखआरामकी अवहेलना हो जाती है।लोगोंके सामने कर्म करते समय अहंकारजन्य सुखकी खुराक मिलनेसे और शरीरके सुखआरामकी मुख्यता न होनेसे राजस मनुष्यको कर्म करनेमें परिश्रम नहीं मालूम देता। परन्तु एकान्तमें कर्म करते समय अहंकारजन्य सुखकी खुराक न मिलनेसे और शरीरके सुखआरामकी मुख्यता होनेसे राजस मनुष्यको कर्म करनेमें ज्यादा परिश्रम मालूम देता है।तद्राजसमुदाहृतम् -- ऐसे फलकी इच्छावाले मनुष्यके द्वारा अहंकार और परिश्रमपूर्वक किया हुआ जो कर्म है? वह राजस कहा गया है। सम्बन्ध -- अब तामस कर्मका वर्णन करते हैं।
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।।18.24।।परन्तु जो कर्म भोगोंको चाहनेवाले मनुष्यके द्वारा अहंकार अथवा परिश्रमपूर्वक किया जाता है, वह राजस कहा गया है।
अनुबन्धं क्षयं हिंसामनपेक्ष्य च पौरुषम्।
मोहादारभ्यते कर्म यत्तत्तामसमुच्यते ॥
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।।18.25।। व्याख्या -- अनुबन्धम् -- जिसको फलकी कामना होती है? वह मनुष्य तो फलप्राप्तिके लिये विचारपूर्वक कर्म करता है? परन्तु तामस मनुष्यमें मूढ़ताकी प्रधानता होनेसे वह कर्म करनेमें विचार करता ही नहीं। इस कार्यको करनेसे मेरा तथा दूसरे प्राणियोंका अभी और परिणाममें कितना नुकसान होगा? कितना अहित होगा -- इस अनुबन्ध अर्थात् परिणामको न देखकर वह कार्य आरम्भ कर देता है।क्षयम् -- इस कार्यको करनेसे अपने और दूसरोंके शरीरोंकी कितनी हानि होगी धन और समयका कितना खर्चा होगा इससे दुनियामें मेरा कितना अपमान? निन्दा? तिरस्कार आदि होगा? मेरा लोकपरलोक बिगड़ जायगा आदि नुकसानको न देखकर ही वह कार्य आरम्भ कर देता है।हिंसाम् -- इस कर्मसे कितने जीवोंकी हत्या होगी कितने श्रेष्ठ व्यक्तियोंके सिद्धान्तों और मान्यताओंकी हत्या हो जायगी दूसरे मनुष्योंकी मनुष्यताकी कितनी भारी हिंसा हो जायगी अभीके और भावी जीवोंके शुद्ध भाव? आचरण? वेशभूषा? खानपान आदिकी कितनी भारी हिंसा हो जायगी इससे मेरा और दुनियाका कितना अधःपतन होगा आदि हिंसाको न देखकर ही वह कार्य आरम्भ कर देता है।अनवेक्ष्य च पौरुषम् -- इस कामको करनेकी मेरेमें कितनी योग्यता है? कितना बल? सामर्थ्य है मेरे पास कितना समय है? कितनी बुद्धि है? कितनी कला है? कितना ज्ञान है आदि अपने पौरुष(पुरुषार्थ) को न,देखकर ही वह कार्य आरम्भ कर देता है।मोहादारभ्यते कर्म यत्तत्तामसमुच्यते -- तामस मनुष्य कर्म करते समय उसके परिणाम? उससे होनेवाले नुकसान? हिंसा और अपनी सामर्थ्यका कुछ भी विचार न करके? जब जैसा मनमें भाव आया? उसी समय बिना विवेकविचारके वैसा ही कर बैठता है। इस प्रकार किया गया कर्म तामस कहलाता है। सम्बन्ध -- अब भगवान् सात्त्विक कर्ताके लक्षण बताते हैं।
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।।18.25।।जो कर्म परिणाम, हानि, हिंसा और सामर्थ्यको न देखकर मोहपूर्वक आरम्भ किया जाता है, वह तामस कहा जाता है।
।।18.26।। व्याख्या -- मुक्तसङ्गः -- जैसे सांख्ययोगीका कर्मोंके साथ राग नहीं होता? ऐसे सात्त्विक कर्ता भी रागरहित होता है।कामना? वासना? आसक्ति? स्पृहा? ममता आदिसे अपना सम्बन्ध जोड़नेके कारण ही वस्तु? व्यक्ति? पदार्थ? परिस्थिति? घटना आदिमें आसक्ति लिप्तता होती है। सात्त्विक कर्ता इस लिप्ततासे सर्वथा रहित होता है।अनहंवादी -- पदार्थ? वस्तु? परिस्थिति आदिको लेकर अपनेमें जो एक विशेषताका अनुभव करना है -- यह अहंवदनशीलता है। यह अहंवदनशीलता आसुरीसम्पत्ति होनेसे अत्यन्त निकृष्ट है। सात्त्विक कर्तामें यह अहंवदनशीलता? अभिमान तो रहता ही नहीं? प्रत्युत मैं इन चीजोंका त्यागी हूँ? मेरेमें यह अभिमान नहीं है? मैं निर्विकार हूँ? मैं सम हूँ? मैं सर्वथा निष्काम हूँ? मैं संसारके सम्बन्धसे रहित हूँ -- इस तरहके अहंभावका भी उसमें अभाव रहता है।धृत्युत्साहसमन्वितः -- कर्तव्यकर्म करते हुए विघ्नबाधाएँ आ जायँ? उस कर्मका परिणाम ठीक न निकले? लोगोंमें निन्दा हो जाय? तो भी विघ्नबाधा आदि न आनेपर जैसा धैर्य रहता है? वैसा ही धैर्य विघ्नबाधा आनेपर भी नित्यनिरन्तर बना रहे -- इसका नाम धृति है और सफलताहीसफलता मिलती चली जाय? उन्नति होती चली जाय? लोगोंमें मान? आदर? महिमा आदि बढ़ते चले जायँ -- ऐसी स्थितिमें मनुष्यके मनमें जैसी उम्मेदवारी? सफलताके प्रति उत्साह रहता है? वैसी ही उम्मेदवारी इससे विपरीत अर्थात् असफलता? अवनति? निन्दा आदि हो जानेपर भी बनी रहे -- इसका नाम उत्साह है। सात्त्विक कर्ता इस प्रकारकी धृति और उत्साहसे युक्त रहता है।सिद्ध्यसिद्ध्योर्निर्विकारः -- सिद्धि और असिद्धिमें अपनेमें कुछ भी विकार न आये? अपनेपर कुछ भी असर न पड़े अर्थात् कार्य ठीक तरहसे साङ्गोपाङ्ग पूर्ण हो जाय अथवा पूरा उद्योग करते हुए अपनी शक्ति? समझ? समय? सामर्थ्य आदिको पूरा लगाते हुए भी कार्य पूरा न हो फल प्राप्त हो अथवा न हो? तो भी अपने अन्तःकरणमें प्रसन्नता और खिन्नता? हर्ष और शोकका न होना ही सिद्धिअसिद्धिमें निर्विकार रहना है।कर्ता सात्त्विक उच्यते -- ऐसा आसक्ति तथा अहंकारसे रहित? धैर्य तथा उत्साहसे युक्त और सिद्धिअसिद्धिमें निर्विकार कर्ता सात्त्विक कहा जाता है।इस श्लोकमें छः बातें बतायी गयी हैं -- सङ्ग? अहंवदनशीलता? धृति? उत्साह? सिद्धि और असिद्धि। इनमेंसे पहली दो बातोंसे रहित? बीचकी दो बातोंसे युक्त और अन्तकी दो बातोंमें निर्विकार रहनेके लिये कहा गया है। सम्बन्ध -- अब राजस कर्ताके लक्षण बताते हैं।
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।।18.26।।जो कर्ता रागरहित, अनहंवादी, धैर्य और उत्साहयुक्त तथा सिद्धि और असिद्धिमें निर्विकार है, वह सात्त्विक कहा जाता है।
।।18.27।। व्याख्या -- रागी -- रागका स्वरूप रजोगुण होनेके कारण भगवान्ने राजस कर्ताके लक्षणोंमें,सबसे पहले रागी पद दिया है। रागका अर्थ है -- कर्मोंमें? कर्मोंके फलोंमें तथा वस्तु? पदार्थ आदिमें मनका खिंचाव होना? मनकी प्रियता होना। इन चीजोंका जिसपर रंग चढ़ जाता है? वह रागी होता है।कर्मफलप्रेप्सुः -- राजस मनुष्य कोई भी काम करेगा तो वह किसी फलकी चाहनाको लेकर ही करेगा जैसे -- मैं ऐसाऐसा अनुष्ठान कर रहा हूँ? दान दे रहा हूँ? उससे यहाँ धन? मान? बड़ाई आदि मिलेंगे और परलोकमें स्वर्गादिके भोग? सुख आदि मिलेंगे मैं ऐसीऐसी दवाइयोंका सेवन कर रहा हूँ तो उनसे मेरा शरीर नीरोग रहेगा? आदि।लुब्धः -- राजस मनुष्यको जितना जो कुछ मिलता है? उसमें वह संतोष नहीं करता? प्रत्युत जिमि प्रतिलाभ लोभ अधिकाई की तरह और मिलता रहे? और मिलता रहे अर्थात् आदर? सत्कार? महिमा आदि अधिकसेअधिक होते रहें धन? पुत्र? परिवार आदि अधिकसेअधिक बढ़ते रहें -- इस प्रकारकी लाग लगी रहती है? लोभ लगा रहता है।हिंसात्मकः -- वह हिंसाके स्वभाववाला होता है। अपने स्वार्थके लिये वह दूसरोंके नुकसानकी? दुःखकी परवाह नहीं करता। वह ज्योंज्यों अधिक भोगसामग्री इकट्ठी करके भोग भोगता है? त्योंहीत्यों दूसरे अभावग्रस्त लोगोंके हृदयमें जलन पैदा होती है। अतः दूसरोंके दुःखकी परवाह न करना तथा भोग भोगना हिंसा ही है।तामस कर्म (18। 25) और राजस कर्ता -- दोनोंमें हिंसा बतानेका तात्पर्य यह है कि मूढ़ता रहनेके कारण तामस मनुष्यकी क्रियाएँ विवेकपूर्वक नहीं होतीं अतः चलनेफिरने? उठनेबैठने आदिमें उसके द्वारा हिंसा होती है। राजस मनुष्य अपने सुखके लिये बढ़ियाबढ़िया भोग भोगता है तो उसको देखकर जिनको वे भोग नहीं मिलते? उनके हृदयमें जलन होती है? यह हिंसा उस भोग भोगनेवालेको ही लगती है। कारण कि कोई भी भोग बिना हिंसाके होता ही नहीं। तात्पर्य है कि तामस मनुष्यके द्वारा तो कर्ममें हिंसा होती है और राजस मनुष्य स्वयं हिंसात्मक होता है।अशुचिः -- रागी पुरुष भोगबुद्धिसे जिन वस्तुओं? पदार्थों आदिका संग्रह करता है? वे सब चीजें अपवित्र हो जाती हैं। वह जहाँ रहता है? वहाँका वायुमण्डल अपवित्र हो जाता है। वह जिन कपड़ोंको पहनता है? उन कपड़ोंमें भी अपवित्रता आ जाती है। यही कारण है कि आसक्तिममतावाले मनुष्यके मरनेपर उसके कपड़े आदिको कोई रखना नहीं चाहता। जिस स्थानपर उसके शवको जलाया जाता है? वहाँ कोई भजनध्यान करना चाहे तो उसका मन नहीं लगेगा। वहाँ भूलसे कोई सो जायगा तो उसको प्रायः खराबखराब स्वप्न आयेंगे। तात्पर्य यह है कि उत्पत्तिविनाशशील पदार्थोंकी तरफ आकृष्ट होते ही आसक्तिममतारूप मलिनता आने लगती है? जिससे मनुष्यका शरीर और शरीरकी हड्डियाँतक अधिक अपवित्र हो जाती हैं।हर्षशोकान्वितः -- उसके सामने दिनमें कितनी बार सफलताविफलता? अनुकूलप्रतिकूल परिस्थिति? घटना आदि आते रहते हैं? उनको लेकर वह हर्षशोक? रागद्वेष? सुखदुःख आदिमें ही उलझा रहता है।कर्ता राजसः परिकीर्तितः -- उपर्युक्त लक्षणोंवाला कर्ता राजस कहा गया है। सम्बन्ध -- अब तामस कर्ताके लक्षण बताते हैं।
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।।18.27।।जो कर्ता रागी, कर्मफलकी इच्छावाला, लोभी, हिंसाके स्वभाववाला, अशुद्ध और हर्षशोकसे युक्त है, वह राजस कहा गया है।
।।18.28।। व्याख्या -- अयुक्तः -- तमोगुण मनुष्यको मूढ़ बना देता है (गीता 14। 8)। इस कारण किस समयमें कौनसा काम करना चाहिये किस तरह करनेसे हमें लाभ है और किस तरह करनेसे हमें हानि है -- इस विषयमें तामस मनुष्य सावधान नहीं रहता अर्थात् वह कर्तव्य और अकर्तव्यके विषयमें सोचता ही,नहीं। इसलिये वह अयुक्त अर्थात् असावधान कहलाता है।प्राकृतः -- जिसने शास्त्र? सत्सङ्ग? अच्छी शिक्षा? उपदेश आदिसे न तो अपने जीवनको ठीक बनाया है और न अपने जीवनपर कुछ विचार ही किया है? माँबापसे जैसा पैदा हुआ है? वैसाकावैसा ही कोरा अर्थात् कर्तव्यअकर्तव्यकी शिक्षासे रहित रहा है? ऐसा मनुष्य प्राकृत अर्थात् अशिक्षित कहलाता है।स्तब्धः -- तमोगुणकी प्रधानताके कारण उसके मन? वाणी और शरीरमें अकड़ रहती है। इसलिये वह अपने वर्णआश्रममें बड़ेबूढ़े माता? पिता? गुरु? आचार्य आदिके सामने कभी झुकता नहीं। वह मन? वाणी और शरीरसे कभी सरलता और नम्रताका व्यवहार नहीं करता? प्रत्युत कठोर व्यवहार करता है। ऐसा मनुष्य स्तब्ध अर्थात् ऐंठअकड़वाला कहलाता है।शठः -- तामस मनुष्य अपनी एक जिद होनेके कारण दूसरोंकी दी हुई अच्छी शिक्षाको? अच्छे विचारोंको नहीं मानता। उसको तो मूढ़ताके कारण अपने ही विचार अच्छे लगते हैं। इसलिये वह शठ अर्थात् जिद्दी कहलाता है (टिप्पणी प0 909)।अनैष्कृतिकः -- जिनसे कुछ उपकार पाया है? उनका प्रत्युपकार करनेका जिसका स्वभाव होता है? वह नैष्कृतिक कहलाता है। परन्तु तामस मनुष्य दूसरोंसे उपकार पा करके भी उनका उपकार नहीं करता? प्रत्युत उनका अपकार करता है? इसलिये वह अनैष्कृतिक कहलाता है।अलसः -- अपने वर्णआश्रमके अनुसार आवश्यक कर्तव्यकर्म प्राप्त हो जानेपर भी तामस मनुष्यको मूढ़ताके कारण वह कर्म करना अच्छा नहीं लगता? प्रत्युत सांसारिक निरर्थक बातोंको पड़ेपड़े सोचते रहना अथवा नींदमें पड़े रहना अच्छा लगता है। इसलिये उसे आलसी कहा गया है।विषादी -- यद्यपि तामस मनुष्यमें यह विचार होता ही नहीं कि क्या कर्तव्य होता है और क्या अकर्तव्य होता है तथा निद्रा? आलस्य? प्रमाद आदिमें मेरी शक्तिका? मेरे जीवनके अमूल्य समयका कितना दुरुपयोग हो रहा है? तथापि अच्छे मार्गसे और कर्तव्यसे च्युत होनेसे उसके भीतर स्वाभाविक ही एक विषाद (दुःख? अशान्ति) होता रहता है। इसलिये उसे विषादी कहा गया है।दीर्घसूत्री -- अमुक काम किस तरीकेसे बढ़िया और जल्दी हो सकता है -- इस बातको वह सोचता ही नहीं। इसलिये वह किसी काममें अविवेकपूर्वक लग भी जाता है तो थोड़े समयमें होनेवाले काममें भी बहुत ज्यादा समय लगा देता है और उससे काम भी सुचारुरूपसे नहीं होता। ऐसा मनुष्य दीर्घसूत्री कहलाता है।कर्ता तामस उच्यते -- उपर्युक्त आठ लक्षणोंवाला कर्ता तामस कहलाता है।विशेष बातछब्बीसवें? सत्ताईसवें और अट्ठाईसवें श्लोकमें जितनी बातें आयीं हैं? वे सब कर्ताको लेकर ही कही गयी हैं। कर्ताके जैसे लक्षण होते हैं? उन्हींके अनुसार कर्म होते हैं। कर्ता जिन गुणोंको स्वीकार करता है? उन गुणोंके अनुसार ही कर्मोंका रूप होता है। कर्ता जिस साधनको करता है? वह साधन कर्ताका रूप हो जाता है। कर्ताके आगे जो करण होते हैं? वे भी कर्ताके अनुरूप होते हैं। तात्पर्य यह है कि जैसा कर्ता होता है? वैसे ही कर्म? करण आदि होते हैं। कर्ता सात्त्विक? राजस अथवा तामस होगा तो कर्म आदि भी सात्त्विक? राजस अथवा तामस होंगे।सात्त्विक कर्ता अपने कर्म? बुद्धि आदिको सात्त्विक बनाकर सात्त्विक सुखका अनुभव करते हुए असङ्गतापूर्वक परमात्मतत्त्वसे अभिन्न हो जाता है -- दुःखान्तं च निगच्छति (गीता 18। 36)। कारण कि सात्त्विक कर्ताका ध्येय परमात्मा होता है। इसलिये वह कर्तृत्वभोक्तृत्वसे रहित होकर चिन्मय तत्त्वसे अभिन्न हो जाता है क्योंकि वह तात्त्विक स्वरूपसे अभिन्न ही था। परन्तु राजसतामस कर्ता राजसतामस कर्म? बुद्धि आदिके साथ तन्मय होकर राजसतामस सुखमें लिप्त होता है। इसलिये वह परमात्मतत्त्वसे अभिन्न नहीं हो सकता। कारण कि राजसतामस कर्ताका उद्देश्य परमात्मा नहीं होता और उसमें जडताका बन्धन भी अधिक होता है।अब यहाँ शङ्का हो सकती है कि कर्ताका सात्त्विक होना तो ठीक है? पर कर्म सात्त्विक कैसे होते हैं इसका समाधान यह है कि जिस कर्मके साथ कर्ताका राग नहीं है? कर्तृत्वाभिमान नहीं है? लेप (फलेच्छा) नहीं है? वह कर्म सात्त्विक हो जाता है। ऐसे सात्त्विक कर्मसे अपना और दुनियाका बड़ा भला होता है। उस सात्त्विक कर्मका जिनजिन वस्तु? व्यक्ति? पदार्थ? वायुमण्डल आदिके साथ सम्बन्ध होता है? उन सबमें निर्मलता आ जाती है क्योंकि निर्मलता सत्त्वगुणका स्वभाव है -- तत्र सत्त्वं निर्मलत्वात् (गीता 14। 6)।दूसरी बात? पतञ्जलि महाराजने रजोगुणको क्रियात्मक ही माना है -- प्रकाशक्रियास्थितिशीलं भूतेन्द्रियात्मकं भोगापवर्गार्थं दृश्यम्। (योगदर्शन 2। 18)। परन्तु गीता रजोगुणको क्रियात्मक मानते हुए भी मुख्यरूपसे रागात्मक ही मानती है -- रजो रागात्मकं विद्धि (14। 7)। वास्तवमें देखा जाय तो राग ही बाँधनेवाला है? क्रिया नहीं।गीतामें कर्म तीन प्रकारके बताये गये हैं -- सात्त्विक? राजस और तामस (18। 23 -- 25)। कर्म करनेवालेका भाव सात्त्विक होगा तो वे कर्म सात्त्विक हो जायँगे? भाव राजस होगा तो वे कर्म राजस हो जायँगे और भाव तामस होगा तो वे कर्म तामस हो जायँगे। इसलिये भगवान्ने केवल क्रियाको रजोगुणी नहीं माना है। सम्बन्ध -- सभी कर्म विचारपूर्वक किये जाते हैं। उन कर्मोंके विचारमें बुद्धि और धृति -- इन कर्मसंग्राहक करणोंकी प्रधानता होनेसे अब आगे उनके भेद बताते हैं।
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।।18.28।।जो कर्ता असावधान, अशिक्षित, ऐंठ-अकड़वाला, जिद्दी, उपकारीका अपकार करनेवाला, आलसी, विषादी और दीर्घसूत्री है, वह तामस कहा जाता है।
।।18.29।। व्याख्या -- [इसी अध्यायके अठारहवें श्लोकमें कर्मसंग्रहके तीन हेतु बताये गये हैं -- करण? कर्म और कर्ता। इनमेंसे कर्म करनेके जो इन्द्रियाँ आदि करण हैं? उनके सात्त्विक? राजस और तामस -- ये तीन भेद नहीं होते। उन इन्द्रियोंमें बुद्धिकी ही प्रधानता रहती है और सभी इन्द्रियाँ बुद्धिके अनुसार ही काम करती हैं। इसलिये यहाँ बुद्धिके भेदसे करणोंके भेद बता रहे हैं।बुद्धिके निश्चयको? विचारको दृढ़तासे ठीक तरह रखनेवाली और अपने लक्ष्यसे विचलित न होने देनेवाली धारणशक्तिका नाम धृति है। धारणशक्ति अर्थात् धृतिके बिना बुद्धि अपने निश्चयपर दृढ़ नहीं रह सकती। इसलिये बुद्धिके साथहीसाथ धृतिके भी तीन भेद बताने आवश्यक हो गये (टिप्पणी प0 911.1)।मनुष्य जो कुछ भी करता है? बुद्धिपूर्वक ही करता है अर्थात् ठीक सोचसमझकर ही किसी कार्यमें प्रवृत्त होता है। उस कार्यमें प्रवृत्त होनेपर भी उसको धैर्यकी बड़ी भारी आवश्यकता होती है। उसकी बुद्धिमें विचारशक्ति तेज है और उसे धारण करनेवाली शक्ति -- धृति श्रेष्ठ है? तो उसकी बुद्धि अपने निश्चित किये हुए लक्ष्यसे विचलित नहीं होती। जब बुद्धि अपने लक्ष्यपर दृढ़ रहती है? तब मनुष्यका कार्य सिद्ध हो जाता है।अभी साधकोंके लिये कर्मप्रेरक और कर्मसंग्रहका जो प्रकरण चला है? उसमें ज्ञान? कर्म और कर्ताकी ही खास आवश्यकता है। ऐसे ही साधक अपनी साधनामें दृढ़तापूर्वक लगा रहे? इसके लिये बुद्धि और धृतिके भेदको जाननेकी विशेष आवश्यकता है क्योंकि उनके भेदको ठीक जानकर ही वह संसारसे ऊँचा उठ सकता है। किस प्रकारकी बुद्धि और धृतिको धारण करके साधक संसारसे ऊँचा उठ सकता है और किस प्रकारकी बुद्धि और धृतिके रहनेसे उसे ऊँचा उठनेमें बाधा लग सकती है -- यह जानना साधकके लिये बहुत जरूरी है। इसलिये भगवान्ने उन दोनोंके भेद बताये हैं। भेद बतानेमें भगवान्का भाव यह है कि सात्त्विकी बुद्धि और धृतिसे ही साधक ऊँचा उठ सकता है? राजसीतामसी बुद्धि और धृतिसे नहीं।]धनञ्जय -- जब पाण्डवोंने राजसूय यज्ञ किया था? तब अर्जुन अनेक राजाओंको जीतकर बहुतसा धन लेकर आये थे। इसीसे उनका नाम धनञ्जय पड़ा था। अब भगवान् अर्जुनसे कहते हैं कि अपनी साधनामें सात्त्विकी बुद्धि और धृतिको ग्रहण करके गुणातीत तत्त्वकी प्राप्ति करना ही वास्तविक धन है इसलिये तुम इस वास्तविक धनको धारण करो? इसीमें तुम्हारे धनञ्जय नामकी सार्थकता है।बुद्धेर्भेदं धृतेश्चैव गुणतस्त्रिविधं श्रृणु -- भगवान् कहते हैं कि बुद्धि भी एक है और धृति भी एक है परन्तु गुणोंकी प्रधानतासे उस बुद्धि और धृतिके भी सात्त्विक? राजस और तामस -- ये तीनतीन भेद हो जाते हैं। उनका मैं ठीकठीक विवेचन करूँगा और थोड़ेमें बहुत विशेष बात कहूँगा? उनको तुम मन लगाकर? ध्यान देकर ठीक तरहसे सुनो।धृति श्रोत्रादि करणोंमें नहीं आयी है। इसलिये भगवान् चैव पदका प्रयोग करके कह रहे हैं कि जैसे बुद्धिके तीन भेद बताऊँगा? ऐसे ही धृतिके भी तीन भेद बताऊँगा। साधारण दृष्टिसे देखनेपर तो धृति भी बुद्धिका ही एक गुण दीखती है। बुद्धिका एक गुण होते हुए भी धृति बुद्धिसे अलग और विलक्षण है क्योंकि धृति स्वयं अर्थात् कर्तामें रहती है। उस धृतिके कारण ही मनुष्य बुद्धिका ठीकठीक उपयोग कर सकता है। धृति जितनी श्रेष्ठ अर्थात् सात्त्विकी होगी? साधककी (साधनमें) बुद्धि उतनी ही स्थिर रहेगी। साधनमें बुद्धिकी स्थिरताकी जितनी आवश्यकता है? उतनी आवश्यकता मनकी स्थिरताकी नहीं है। हाँ? एक अंशमें अणिमा आदि सिद्धियोंकी प्राप्तिमें मनकी स्थिरताकी आवश्यकता है परन्तु पारमार्थिक उन्नतिमें तो बुद्धिके अपने उद्देश्यपर स्थिर रहनेकी ही ज्यादा आवश्यकता है (टिप्पणी प0 911.2)। साधककी बुद्धि भी सात्त्विकी हो और धृति भी सात्त्विकी हो? तभी साधक अपने साधनमें दृढ़तासे लगा रहेगा। इसलिये इन दोनोंके ही भेद जाननेकी आवश्यकता है।पृथक्त्वेन -- उनके भेद अलगअलग ठीक तरहसे कहूँगा अर्थात् बुद्धि और धृतिके विषयमें भी क्याक्या भेद होते हैं? उनको भी कहूँगा।प्रोच्यमानमशेषेण -- भगवान् कहते हैं कि बुद्धि और धृतिके विषयमें जाननेकी जोजो आवश्यक बाते हैं? उन सबको मैं पूरापूरा कहूँगा? जिसके बाद फिर जानना बाकी नहीं रहेगा।, सम्बन्ध -- अब भगवान् सात्त्विकी बुद्धिके लक्षण बताते हैं।
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।।18.29।।हे धनञ्जय ! अब तू गुणोंके अनुसार बुद्धि और धृतिके भी तीन प्रकारके भेद अलग-अलगरूपसे सुन, जो कि मेरे द्वारा पूर्णरूपसे कहे जा रहे हैं।
प्रवृत्तिं च निवृत्तिं च कार्याकार्ये भयाभये।
बन्धं मोक्षं च या वेत्ति बुद्धिः सा पार्थ सात्त्विकी ॥
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।।18.30।। व्याख्या -- प्रवृत्तिं च निवृत्तिं च -- साधकमात्रकी प्रवृत्ति और निवृत्ति -- ये दो अवस्थाएँ होती हैं। कभी वह संसारका कामधंधा करता है? तो यह प्रवृत्तिअवस्था है और कभी संसारका कामधंधा छोड़कर एकान्तमें भजनध्यान करता है? तो यह निवृत्तिअवस्था है। परन्तु इन दोनोंमें सांसारिक कामनासहित प्रवृत्ति और वासनासहित निवृत्ति (टिप्पणी प0 912) -- ये दोनों ही अवस्थाएँ प्रवृत्ति हैं अर्थात् संसारमें लगानेवाली हैं? तथा सांसारिक कामनारहित प्रवृत्ति और वासनारहित निवृत्ति -- ये दोनों ही अवस्थाएँ निवृत्ति हैं अर्थात् परमात्माकी तरफ ले जानेवाली हैं। इसलिये साधक इनको ठीकठीक जानकर,कामनावासनारहित प्रवृत्ति और निवृत्तिको ही ग्रहण करें।वास्तवमें गहरी दृष्टिसे देखा जाय तो कामनावासनारहित प्रवृत्ति और निवृत्ति भी यदि अपने सुख? आराम आदिके लिये की जायँ तो वे दोनों ही प्रवृत्ति हैं क्योंकि वे दोनों ही बाँधनेवाली हैं अर्थात् उनसे अपना व्यक्तित्व नहीं मिटता। परन्तु यदि कामनावासनारहित प्रवृत्ति और निवृत्ति -- दोनों केवल दूसरोंके सुख? आराम और हितके लिये ही की जायँ? तो वे दोनों ही निवृत्ति हैं क्योंकि उन दोनोंसे ही अपना व्यक्तित्व नहीं रहता। वह अव्यक्तित्व कब नहीं रहता जब प्रवृत्ति और निवृत्ति जिसके प्रकाशसे प्रकाशित होती हैं तथा जो प्रवृत्ति और निवृत्तिसे रहित है? उस प्रकाशक अर्थात् तत्त्वकी प्राप्तिके उद्देश्यसे ही प्रवृत्ति और निवृत्ति की जाय। प्रवृत्ति तो की जाय प्राणिमात्रकी सेवाके लिये और निवृत्ति की जाय परम विश्राम अर्थात् स्वरूपस्थितिके लिये।कार्याकार्ये -- शास्त्र? वर्ण? आश्रमकी मर्यादाके अनुसार जो काम किया जाता है? वह कार्य है और शास्त्र आदिकी मर्यादासे विरुद्ध जो काम किया जाता है वह अकार्य है।जिसको हम कर सकते हैं? जिसको जरूर करना चाहिये और जिसको करनेसे जीवका जरूर कल्याण होता है? वह कार्य अर्थात् कर्तव्य कहलाता है और जिसको हमें नहीं करना चाहिये तथा जिससे जीवका बन्धन होता है? वह अकार्य अर्थात् अकर्तव्य कहलाता है। जिसको हम नहीं कर सकते? वह अकर्तव्य नहीं कहलाता? वह तो अपनी असामर्थ्य है।भयाभये -- भय और अभयके कारणको देखना चाहिये। जिस कर्मसे अभी और परिणाममें अपना और दुनियाका अनिष्ट होनेकी सम्भावना है? वह कर्म भय अर्थात् भयदायक है और जिस कर्मसे अभी और परिणाममें अपना और दुनियाका हित होनेकी सम्भावनना है? वह कर्म अभय अर्थात् सबको अभय करनेवाला है।मनुष्य जब करनेलायक कार्यसे च्युत होकर अकार्यमें प्रवृत्त होता है? तब उसके मनमें अपनी मनबड़ाईकी हानि और निन्दाअपमान होनेकी आशङ्कासे भय पैदा होता है। परन्तु जो अपनी मर्यादासे कभी विचलित नहीं होता? अपने मनसे किसीका भी अनिष्ट नहीं चाहता और केवल परमात्मामें ही लगा रहता है? उसके मनमें सदा अभय बना रहता है। यह अभय ही मनुष्यको सर्वथा अभयपद -- परमात्माको प्राप्त करा देता है।बन्धं मोक्षं च या वेत्ति -- जो बाहरसे तो यज्ञ? दान? तीर्थ? व्रत आदि उत्तमसेउत्तम कार्य करता है परन्तु भीतरसे असत् जड? नाशवान् पदार्थोंको और स्वर्ग आदि लोकोंको चाहता है? उसके लिये वे सभी कर्म बन्ध अर्थात् बन्धनकारक ही हैं। केवल परमात्मासे ही सम्बन्ध रखना? परमात्माके सिवाय कभी किसी अवस्थामें असत् संसारके साथ लेशमात्र भी सम्बन्ध न रखना मोक्ष अर्थात् मोक्षदायक है।अपनेको जो वस्तुएँ नहीं मिली हैं? उनकी कामना होनेसे मनुष्य उनके अभावका अनुभव करता है। वह अपनेको उन वस्तुओंके परतन्त्र मानता है और वस्तुओंके मिलनेपर अपनेको स्वतन्त्र मानता है। वह समझता तो यह है कि मेरे पास वस्तुएँ होनेसे मैं स्वतन्त्र हो गया हूँ? पर हो जाता है उन वस्तुओंके परतन्त्र वस्तुओंके अभाव और वस्तुओंके भाव -- इन दोनोंकी परतन्त्रतामें इतना ही फरक पड़ता है कि वस्तुओंके अभावमें परतन्त्रता दीखती है? खटकती है और वस्तुओंके होनेपर वस्तुओंकी परतन्त्रता परतन्त्रताके रूपमें दीखती ही नहीं क्योंकि उस समय मनुष्य अन्धा हो जाता है। परन्तु हैं ये दोनों ही परतन्त्रता? और परतन्त्रता ही बन्धन है। अभावकी परतन्त्रता प्रकट विष है और भावकी परतन्त्रता छिपा हुआ मीठा विष है? पर हैं दोनों ही विष। विष तो मारनेवाला ही होता है।निष्कर्ष यह निकला कि सांसारिक वस्तुओंकी कामनासे ही बन्धन होता है और परमात्माके सिवाय किसी वस्तु? व्यक्ति? घटना? परिस्थिति? देश? काल आदिकी कामना न होनेसे मुक्ति होती है (टिप्पणी प0 913)। यदि मनमें कामना है तो वस्तु पासमें हो तो बन्धन और पासमें न हो तो बन्धन यदि मनमें कामना नहीं है तो वस्तु पासमें हो तो मुक्त और पासमें न हो तो मुक्तिबुद्धिः सा पार्थ सात्त्विकी -- इस प्रकार जो प्रवृत्तिनिवृत्ति? कार्यअकार्य? भयअभय और बन्धमोक्षके वास्तविक तत्त्वको जानती है? वह बुद्धि सात्त्विकी है।इनके वास्तविक तत्त्वको जानना क्या है प्रवृत्तिनिवृत्ति? कार्यअकार्य? भयअभय और बन्धमोक्ष -- इनको गहरी रीतिसे समझकर? जिसके साथ वास्तवमें हमारा सम्बन्ध नहीं है? उस संसारके साथ सम्बन्ध न मानना और जिसके साथ हमारा स्वतःसिद्ध सम्बन्ध है? ऐसे (प्रवृत्तिनिवृत्ति आदिके आश्रय तथा प्रकाशक) परमात्माको तत्त्वसे ठीकठीक जानना -- यही सात्त्विकी बुद्धिके द्वारा वास्तविक तत्त्वको ठीकठीक जानना है। सम्बन्ध -- अब राजसी बुद्धिके लक्षण बताते हैं।
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।।18.30।।हे पृथानन्दन ! जो बुद्धि प्रवृत्ति और निवृत्तिको, कर्तव्य और अकर्तव्यको, भय और अभयको तथा बन्धन और मोक्षको जानती है, वह बुद्धि सात्त्विकी है।
।।18.31।। व्याख्या -- यया धर्ममधर्मं च -- शास्त्रोंने जो कुछ भी विधान किया है? वह धर्म है अर्थात् शास्त्रोंने जिसकी आज्ञा दी है और जिससे परलोकमें सद्गति होती है? वह धर्म है। शास्त्रोंने जिसका निषेध किया है? वह अधर्म है अर्थात् शास्त्रोंने जिसकी आज्ञा नहीं दी है और जिससे परलोकमें दुर्गति होती है? वह अधर्म है। जैसे? अपने मातापिता? बड़ेबूढ़ोंकी सेवा करनेमें? दूसरोंको सुख पहुँचानेमें? दूसरोंका हित करनेकी चेष्टामें अपने तन? मन? धन? योग्यता? पद? अधिकार? सामर्थ्य आदिको लगा देना धर्म है। ऐसे ही कुआँबावड़ी खुदवाना? धर्मशालाऔषधालय बनवाना? प्याऊसदावर्त चलाना देश? ग्राम? मोहल्लेके अनाथ तथा गरीब बालकोंकी और समाजकी उन्नतिके लिये अपनी कहलानेवाली चीजोंको आवश्यकतानुसार उनकी ही समझकर निष्कामभावसे उदारतापूर्वक खर्च करना धर्म है। इसके विपरीत अपने स्वार्थ? सुख? आरामके लिये दूसरोंकी धनसम्पत्ति? हक? पद? अधिकार छीनना दूसरोंका अपकार? अहित? हत्या आदि करना अपने तन? मन? धन? योग्यता? पद? अधिकार आदिके द्वारा दूसरोंको दुःख देना अधर्म है।वास्तवमें धर्म वह है? जो जीवका कल्याण कर दे और अधर्म वह है? जो जीवको बन्धनमें डाल दे।कार्यं चाकार्यमेव च -- वर्ण? आश्रम? देश? काल? लोकमर्यादा? परिस्थिति आदिके अनुसार शास्त्रोंने हमारे लिये जिस कर्मको करनेकी आज्ञा दी है? वह कर्म हमारे लिये कर्तव्य है। अवसरपर प्राप्त हुए कर्तव्यका पालन न करना तथा न करनेलायक कामको करना अकर्तव्य है। जैसे? भिक्षा माँगना यज्ञ? विवाह आदि कराना और उनमें दानदक्षिणा लेना आदि कर्म ब्राह्मणके लिये तो कर्तव्य हैं? पर क्षत्रिय? वैश्य और शूद्रके लिये अकर्तव्य हैं। इसी प्रकार शास्त्रोंने जिनजिन वर्ण और आश्रमोंके लिये जोजो कर्म बताये हैं? वे सब उनउनके लिये कर्तव्य हैं और जिनके लिये निषेध किया है? उनके लिये वे सब अकर्तव्य हैं।जहाँ नौकरी करते हैं? वहाँ ईमानदारीसे अपना पूरा समय देना? कार्यको सुचारुरूपसे करना? जिस तरहसे मालिकका हित हो? ऐसा काम करना -- ये सब कर्मचारियोंके लिये कर्तव्य हैं। अपने स्वार्थ? सुख और आराममें फँसकर कार्यमें पूरा समय न लगाना? कार्यको तत्परतासे न करना? थोड़ीसी घूस (रिश्वत) मिलनेसे मालिकका बड़ा नुकसान कर देना? दसपाँच रुपयोंके लिये मालिकका अहित कर देना -- ये सब कर्मचारियोंके लिये अकर्तव्य हैं।राजकीय जितने अफसर हैं? उनको राज्यका प्रबन्ध करनके लिये? सबका हित करनेके लिये ही ऊँचे पदपर,रखा जाता है। इसीलिये अपने स्वार्थ और अभिमानका त्याग करके जिस प्रकार सब लोगोंका हित हो सकता है? सबको सुख? आराम? शान्ति मिल सकती है -- ऐसे कामोंको करना उनके लिये कर्तव्य है। अपने तुच्छ स्वार्थमें आकर राज्यका नुकसान कर देना? लोगोंको दुःख देना आदि उनके लिये अकर्तव्य है।सात्त्विकी बुद्धिमें कही हुई प्रवृत्तिनिवृत्ति? भयअभय और बन्धमोक्षको भी यहाँ एव च पदोंसे ले लेना चाहिये।अयथावत्प्रजानाति बुद्धिः सा पार्थ राजसी -- राग होनेसे राजसी बुद्धिमें स्वार्थ? पक्षपात? विषमता आदि दोष आ जाते हैं। इन दोषोंके रहते हुए बुद्धि धर्मअधर्म? कार्यअकार्य? भयअभय? बन्धमोक्ष आदिके वास्तविक तत्त्वको ठीकठीक नहीं जान सकती। अतः किसी वर्णआश्रमके लिये किस परिस्थितिमें कौनसा धर्म कहा जाता है और कौनसा अधर्म कहा जाता है वह धर्म किस वर्णआश्रमके लिये कर्तव्य हो जाता है और किसके लिये अकर्तव्य हो जाता है किससे भय होता है और किससे मनुष्य अभय हो जाता है इन बातोंको जो बुद्धि ठीकठीक नहीं जान सकती? वह बुद्धि राजसी है।जब सांसारिक वस्तु? व्यक्ति? घटना? परिस्थिति? क्रिया? पदार्थ आदिमें राग (आसक्ति) हो जाता है? तो वह राग दूसरोंके प्रति द्वेष पैदा करनेवाला हो जाता है। फिर जिसमें राग हो जाता है उसके दोषोंको और जिसमें द्वेष हो जाता है? उसके गुणोंको मनुष्य नहीं देख सकता। राग और द्वेष -- इन दोनोंमें संसारके साथ सम्बन्ध जुड़ता है। संसारके साथ सम्बन्ध जुड़नेपर मनुष्य संसारको नहीं जान सकता। ऐसे ही परमात्मासे अलग रहनेपर मनुष्य परमात्माको नहीं जान सकता। संसारसे अलग होकर ही संसारको जान सकता है और परमात्मासे अभिन्न होकर ही परमात्माको जान सकता है। वह अभिन्नता चाहे प्रेमसे हो? चाहे ज्ञानसे हो।परमात्मासे अभिन्न होनेमें सात्त्विकी बुद्धि ही काम करती है क्योंकि सात्त्विकी बुद्धिमें विवेकशक्ति जाग्रत् रहती है। परन्तु राजसी बुद्धिमें वह विवेकशक्ति रागके कारण धुँधलीसी रहती है। जैसे जलमें मिट्टी घुल जानेसे जलमें स्वच्छता? निर्मलता नहीं रहती? ऐसे ही बुद्धिमें रजोगुण आ जानेसे बुद्धिमें उतनी स्वच्छता? निर्मलता नहीं रहती। इसलिये धर्मअधर्म आदिको समझनेमें कठिनता पड़ती है। राजसी बुद्धि होनेपर मनुष्य जिसजिस विषयमें प्रवेश करता है? उसको उस विषयको समझनेमें कठिनता पड़ती है। उस विषयके गुणदोषोंको ठीकठीक समझे बिना वह ग्रहण और त्यागको अपने आचरणमें नहीं ला सकता अर्थात् वह ग्राह्य वस्तुका ग्रहण नहीं कर सकता और त्याज्य वस्तुका त्याग नहीं कर सकता। सम्बन्ध -- अब तामसी बुद्धिके लक्षण बताते हैं।
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।।18.31।।हे पार्थ ! मनुष्य जिसके द्वारा धर्म और अधर्मको, कर्तव्य और अकर्तव्यको भी ठीक तरहसे नहीं जानता, वह बुद्धि राजसी है।
।।18.32।। व्याख्या -- अधर्मं धर्ममिति या मन्यते तमसावृता -- ईश्वरकी निन्दा करना शास्त्र? वर्ण? आश्रम और लोकमर्यादाके विपरीत काम करना मातापिताके साथ अच्छा बर्ताव न करना सन्तमहात्मा? गुरुआचार्य आदिका अपमान करना झूठ? कपट? बेईमानी? जालसाजी? अभक्ष्य भोजन? परस्त्रीगमन आदि शास्त्रनिषिद्ध पापकर्मोंको धर्म मानना -- यह सब अधर्मको धर्म मानना है।अपने शास्त्र? वर्ण? आश्रमकी मर्यादामें चलना मातापिताकी आज्ञाका पालन करना तथा उनकी तनमनधनसे सेवा करना संतमहात्माओंके उपदेशोंके अनुसार अपना जीवन बनाना धार्मिक ग्रन्थोंका पठनपाठन करना दूसरोंकी सेवाउपकार करना शुद्धपवित्र भोजन करना आदि शास्त्रविहित कर्मोंको उचित न मानना -- यह धर्मको अधर्म मानना है।तामसी बुद्धिवाले मनुष्योंके विचार होते हैं कि शास्त्रकारोंने? ब्राह्मणोंने अपनेको बड़ा बता दिया और,तरहतरहके नियम बनाकर लोगोंको बाँध दिया? जिससे भारत परतन्त्र हो गया जबतक ये शास्त्र रहेंगे? ये धार्मिक पुस्तकें रहेंगी? तबतक भारतका उत्थान नहीं होगा? भारत परतन्त्रताकी बेड़ीमें ही जकड़ा हुआ रहेगा? आदिआदि। इसलिये वे मर्यादाओंको तोड़नेमें ही धर्म मानते हैं।सर्वार्थान्विपरीतांश्च -- आत्माको स्वरूप न मानकर शरीरको ही स्वरूप मानना ईश्वरको न मान करके दृश्य जगत्को ही सच्चा मानना दूसरोंको तुच्छ समझकर अपनेको ही सबसे बड़ा मानना दूसरोंको मूर्ख समझकर अपनेको ही पढ़ालिखा? विद्वान् समझना जितने संतमहात्मा हो गये हैं? उनकी मान्यताओंसे अपनी मान्यताको श्रेष्ठ मानना सच्चे सुखकी तरफ ध्यान न देकर वर्तमानमें मिलनेवाले संयोगजन्य सुखको ही सच्चा मानना न करनेयोग्य कार्यको ही अपना कर्तव्य समझना अपवित्र वस्तुओंको ही पवित्र मानना -- यह सम्पूर्ण चीजोंको उलटा मानना है।बुद्धिः सा पार्थ तामसी -- तमोगुणसे आवृत जो बुद्धि अधर्मको धर्म? धर्मको अधर्म और अच्छेको बुरा? सुलटेको उलटा मानती है? वह बुद्धि तामसी है। यह तामसी बुद्धि ही मनुष्यको अधोगतिमें ले जानेवाली है -- अधो गच्छन्ति तामसाः (गीता 14। 18)। इसलिये अपना उद्धार चाहनेवालेको इसका सर्वथा त्याग कर देना चाहिये। सम्बन्ध -- अब भगवान् सात्त्विकी धृतिके लक्षण बताते हैं।
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।।18.32।।हे पृथानन्दन ! तमोगुणसे घिरी हुई जो बुद्धि अधर्मको धर्म और सम्पूर्ण चीजोंको उलटा मान लेती है, वह तामसी है।
।।18.33।। व्याख्या -- धृत्या यया धारयते ৷৷. योगेनाव्यभिचारिण्या -- सांसारिक लाभहानि? जयपराजय? सुखदुःख? आदरनिरादर? सिद्धिअसिद्धिमें सम रहनेका नाम योग (समता) है।परमात्माको चाहनेके साथसाथ इस लोकमें सिद्धि? असिद्धि? वस्तु? पदार्थ? सत्कार? पूजा आदि और परलोकमें सुखभोगको चाहना व्यभिचार है और इस लोक तथा परलोकके सुख? भोग? वस्तु? पदार्थ आदिकी किञ्चिन्मात्र भी इच्छा न रखकर केवल परमात्माको चाहना अव्यभिचार है। यह अव्यभिचार जिसमें होता है? वह धृति अव्यभिचारिणी कहलाती है।अपनी मान्यता? सिद्धान्त? लक्ष्य? भाव? क्रिया? वृत्ति? विचार आदिको दृढ़? अटल रखनेकी शक्तिका नाम धृति है। योग अर्थात् समतासे युक्त इस अव्यभिचारिणी धृतिके द्वारा मनुष्य मन? प्राण और इन्द्रियोंकी क्रियाओँको धारण करता है।मनमें रागद्वेषको लेकर होनेवाले चिन्तनसे रहित होना? मनको जहाँ लगाना चाहें? वहाँ लग जाना और जहाँसे हटाना चाहें? वहाँसे हट जाना आदि मनकी क्रियाओंको धृतिके द्वारा धारण करना है।प्राणायाम करते हुए रेचकमें पूरक न होना? पूरकमें रेचक न होना और बाह्य कुम्भकमें पूरक न होना तथा आभ्यन्तर कुम्भकमें रेचक न होना अर्थात् प्राणायामके नियमसे विरुद्ध श्वासप्रश्वासोंका न होना ही धृतिके द्वारा प्राणोंकी क्रियाओँको धारण करना है।शब्द? स्पर्श? रूप? रस और गन्ध -- इन विषयोंको लेकर इन्द्रियोंका उच्छृङ्खल न होना? जिस विषयमें जैसे प्रवृत्त होना चाहें? उसमें प्रवृत्त होना और जिस विषयसे निवृत्त होना चाहें? उसमें निवृत्त होना ही धृतिके द्वारा इन्द्रियोंकी क्रियाओंको धारण करना है।धृतिः सा पार्थ सात्त्विकी -- जिस धृतिसे मन? प्राण और इन्द्रियोंकी क्रियाओँपर आधिपत्य हो जाता है? हे पार्थ वह धृति सात्त्विकी है। सम्बन्ध -- अब राजसी धृतिके लक्षण बताते हैं।
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।।18.33।।हे पार्थ ! समतासे युक्त जिस अव्यभिचारिणी धृतिके द्वारा मनुष्य मन, प्राण और इन्द्रियोंकी क्रियाओंको धारण करता है, वह धृति सात्त्विकी है।
।।18.34।। व्याख्या -- यया तु धर्मकामार्थान्धृत्या ৷৷. सा पार्थ राजसी -- राजसी धारणशक्तिसे मनुष्य अपनी कामनापूर्तिके लिये धर्मका अनुष्ठान करता है? काम अर्थात् भोगपदार्थोंको भोगता है और अर्थ अर्थात् धनका संग्रह करता है।अमावस्या? पूर्णिमा? व्यतिपात आदि अवसरोंपर दान करना? तीर्थोंमें अन्नदान करना पर्वोंपर उत्सव मनाना तीर्थयात्रा करना धार्मिक संस्थाओंमें चन्दाचिट्ठाके रूपमें कुछ चढ़ा देना कभी कथाकीर्तन? भगवतसप्ताह आदि करवा लेना -- यह सब केवल कामनापूर्तिके लिये करना ही धर्म को धारण करना है (टिप्पणी प0 916)।सांसारिक भोगपदार्थ तो प्राप्त होने ही चाहिये क्योंकि भोगपदार्थोंसे ही सुख मिलता है? संसारमें कोई भी प्राणी ऐसा नहीं है? जो भोगपदार्थोंकी कामना न करता हो यदि मनुष्य भोगोंकी कामना न करे तो उसका जीवन ही व्यर्थ है -- ऐसी धारणके साथ भोगपदार्थोंकी कामनापूर्तिमें ही लगे रहना काम को धारण करना है।धनके बिना दुनियामें किसीका भी काम नहीं चलता धनसे ही धर्म होता है यदि पासमें धन न हो तो आदमी धर्म कर ही नहीं सकता जितने आयोजन किये जाते हैं? वे सब धनसे ही तो होते हैं आज जितने आदमी बड़े कहलाते हैं? वे सब धनके कारण ही तो बड़े बने हैं धन होनेसे ही लोग आदरसम्मान करते हैं जिसके पास धन नहीं होता? उसको संसारमें कोई पूछता ही नहीं अतः धनका खूब संग्रह करना चाहिये -- इस प्रकार धनमें ही रचेपचे रहना अर्थ को धारण करना है। संसारमें अत्यन्त राग (आसक्ति) होनेके कारण राजस पुरुष शास्त्रकी मर्यादाके अनुसार जो कुछ भी शुभ काम करता है? उसमें उसकी यही कामना रहती है कि इस कर्मका मुझे इस लोकमें सुख? आराम? मान? सत्कार आदि मिले और परलोकमें सुखभोग? मिले। ऐसे फलकी कामनावाले तथा संसारमें अत्यन्त आसक्त मनुष्यकी धारणशक्ति राजसी होती है। सम्बन्ध -- अब तामसी धृतिके लक्षण बताते हैं।
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।।18.34।।हे पृथानन्दन अर्जुन ! फलकी इच्छावाला मनुष्य जिस धृतिके द्वारा धर्म, काम (भोग) और अर्थको अत्यन्त आसक्तिपूर्वक धारण करता है, वह धृति राजसी है।
।।18.35।। व्याख्या -- यया स्वप्नं भयं ৷৷. सा पार्थ तामसी -- तामसी धारणशक्तिके द्वारा मनुष्य ज्यादा निद्रा? बाहर और भीतरका भय? चिन्ता? दुःख और घमण्ड -- इनका त्याग नहीं करता? प्रत्युत इन सबमें रचापचा रहता है। वह कभी ज्यादा नींदमें पड़ा रहता है? कभी मृत्यु? बीमारी? अपयश? अपमान? स्वास्थ्य? धन आदिके भयसे भयभीत होता रहता है? कभी शोकचिन्तामें डूबा रहता है? कभी दुःखमें मग्न रहता है और कभी अनुकूल पदार्थोंके मिलनेसे घमण्डमें चूर रहता है।निद्रा? भय? शोक आदिके सिवाय प्रमाद? अभिमान? दम्भ? द्वेष? ईर्ष्या आदि दुर्गुणोंको तथा हिंसा? दूसरोंका अपकार करना? उनको कष्ट देना? उनके धनका किसी तरहसे अपहरण करना आदि दुराचोंको भी एव च पदोंसे मान लेना चाहिये।इस प्रकार निद्रा? भय आदिको और दुर्गुणदुराचारोंको पकड़े रहनेवाली अर्थात् उनको न छोड़नेवाली धृति तामसी होती है।भगवान्ने तैंतीसवेंचौंतीसवें श्लोकोंमें धारयते पदसे सात्त्विक और राजस मनुष्यके द्वारा क्रमशः सात्त्विकी और राजसी धृतिको धारण करनेकी बात कही है परन्तु यहाँ तामस मनुष्यके द्वारा तामसी धृतिको धारण,करनेकी बात नहीं कही। कारण यह है कि जिसकी बुद्धि बहुत ही दुष्टा है? जिसकी बुद्धिमें अज्ञता? मूढता भरी हुई है? ऐसा मिलन अन्तःकरणवाला तामस मनुष्य निद्रा? भय? शोक आदि भावोंको छोड़ता ही नहीं। वह उनमें स्वाभाविक ही रचापचा रहता है।सात्त्विकी? राजसी और तामसी -- इन तीनों धृतियोंके वर्णनमें राजसी और तामसी धृतिमें तो क्रमशः फलाकाङ्क्षी और दुर्मेधाः पदसे कर्ताका उल्लेख किया है? पर सात्त्विकी धृतिमें कर्ताका उल्लेख किया ही नहीं। इसका कारण यह है कि सात्त्विकी धृतिमें कर्ता निर्लिप्त रहता है अर्थात् उसमें कर्तृत्वका लेप नहीं होता परन्तु राजसी और तामसी धृतिमें कर्ता लिप्त होता है।विशेष बातमानवशरीर विवेकप्रधान है। मनुष्य जो कुछ करता है? उसे वह विचारपूर्वक ही करता है। वह ज्यों ही विचारपूर्वक काम करता है? त्यों ही विवेक ज्यादा स्पष्ट प्रकट होता है। सात्त्विक मनुष्यकी धृति(धारणशक्ति) में यह विवेक साफसाफ प्रकट होता है कि मुझे तो केवल परमात्माकी तरफ ही चलना है। राजस मनुष्यकी धृतिमें संसारके पदार्थों और भोगोंमें रागकी प्रधानता होनेके कारण विवेक वैसा स्पष्ट नहीं होता फिर भी इस लोकमें सुखआराम? मानआदर मिले और परलोकमें अच्छी गति मिले? भोग मिले -- इस विषयमें विवेक काम करता है और आचरण भी मर्यादाके अनुसार ही होता है। परन्तु तामस मनुष्यकी धृतिमें विवेक बिलकुल ही दब जाता है। तामस भावोंमें उसकी इतनी दृढ़ता हो जाती है कि उसे उन भावोंको धारण करनेकी आवश्यकता ही नहीं रहती। वह तो निद्रा? भय आदि तामसभावोंमें ही रचापचा रहता है।पारमार्थिक मार्गमें क्रिया इतना काम नहीं करती जितना अपना उद्देश्य काम करता है। स्थूल क्रियाकी प्रधानता स्थूलशरीरमें? चिन्तनकी प्रधानता सूक्ष्मशरीरमें और स्थिरताकी प्रधानता कारणशरीरमें होती है? यह सब क्रिया ही है। क्रिया तो शरीरोंमें होती है? पर मेरेको तो केवल पारमार्थिक मार्गपर ही चलना है -- ऐसा उद्देश्य या लक्ष्य स्वयं(चेतनस्वरूप) में ही रहता है। स्वयंमें जैसा लक्ष्य होता है? उसके अनुसार स्वतः क्रियाएँ होती हैं। जो चीज स्वयंमें रहती है? वह कभी बदलती नहीं। उस लक्ष्यकी दृढ़ताके लिये सात्त्विकी बुद्धिकी आवश्यकता है और बुद्धिके निश्चयको अटल रखनेके लिये सात्त्विकी धृतिकी आवश्यकता है। इसलिये यहाँ तीसवेंसे पैंतीसवें श्लोकतक कुल छः श्लोकोंमें छः बार पार्थ सम्बोधनका प्रयोग करके भगवान् साधकमात्रके प्रतिनिधि अर्जुनको चेताते हैं कि पृथानन्दन लौकिक वस्तुओं और व्यक्तियोंके लिये चिन्ता न करके तुम अपने लक्ष्यको दृढ़तासे धारण किये रहो। अपनेमें कभी भी राजसतामसभाव न आने पायें -- इसके लिये निरन्तर सजग रहो, सम्बन्ध -- मनुष्योंकी कर्मोंमें प्रवृत्ति सुखके लोभसे ही होती है अर्थात् सुखकर्मसंग्रहमें हेतु है। अतः आगेके चार श्लोकोंमें सुखके भेद बताते हैं।
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।।18.35।।हे पार्थ ! दुष्ट बुद्धिवाला मनुष्य जिस धृतिके द्वारा निद्रा, भय, चिन्ता, दुःख और घमण्डको भी नहीं छोड़ता, वह धृति तामसी है।
सुखं त्विदानीं त्रिविधं शृणु मे भरतर्षभ।
अभ्यासाद्रमते यत्र दुःखान्तं च निगच्छति ॥
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।।18.36।। व्याख्या -- भरतर्षभ -- इस सम्बोधनको देनेमें भगवान्का भाव यह है कि भरतवंशियोंमें श्रेष्ठ अर्जुन तुम राजसतामस सुखोंमें लुब्ध? मोहित होनेवाले नहीं हो क्योंकि तुम्हारे लिये राजस और तामस सुखपर विजय करना कोई बड़ी बात नहीं है। तुमने राजस सुखपर विजय भी कर ली है क्योंकि स्वर्गकी उर्वशीजैसी सुन्दरी अप्सराको भी तुमने ठुकरा दिया है। इसी प्रकार तुमने तामस सुखपर भी विजय कर ली है क्योंकि प्राणिमात्रके लिये आवश्यक जो निद्राका तामस सुख है? उसको तुमने जीत लिया है। इसीसे तुम्हारा नाम गुडाकेश हुआ है।सुखं तु इदानीम् -- ज्ञान? कर्म? कर्ता? बुद्धि और धृतिके तीनतीन भेद बतानेके बाद यहाँ तु पदका प्रयोग,करके भगवान् कहते हैं कि सुख भी तीन तरहका होता है। इसमें एक विशेष ध्यान देनेकी बात है कि आज पारमार्थिक मार्गपर चलनेवाले जितने भी साधक हैं? उन साधकोंकी ऊँची स्थिति न होनेमें अथवा उनको परमात्मतत्त्वका अनुभव न होनेमें अगर कोई विघ्नबाधा है? तो वह है -- सुखकी इच्छा।सात्त्विक सुख भी आसक्तिके कारण बन्धनकारक हो जाता है। तात्पर्य है कि अगर साधनजन्य -- ध्यान और एकाग्रताका सुख भी लिया जाय? तो वह भी बन्धनकारक हो जाता है। इतना ही नहीं? अगर समाधिका सुख भी लिया जाय? तो वह भी परमात्मतत्त्वकी प्राप्तिमें बाधक हो जाता है -- सुखसङ्गेन बध्नाति (गीता 14। 6)। इस विषयमें कोई कहे कि परमात्मतत्त्वका सुख आ जाय तो क्या उस सुखको भी हम न लें वास्तवमें परमात्मतत्त्वका सुख लिया नहीं जाता? प्रत्युत उस अक्षय सुखका स्वतः अनुभव होता है (गीता 5। 21 6। 21? 28)। साधनजन्य सुखका भोग न करनेसे वह अक्षय स्वतःस्वाभाविक प्राप्त हो जाता है। उस अक्षय सुखकी तरफ विशेष खयाल करानेके लिये भगवान् यहाँ तु पदका प्रयोग करते हैं।यहाँ इदानीम् कहनेका का तात्पर्य है कि अर्जुन संन्यास और त्यागके तत्त्वको जानना चाहते है अतः उनकी जिज्ञासाके उत्तरमें भगवान्ने त्याग? ज्ञान? कर्म? कर्ता? बुद्धि और धृतिके तीनतीन भेद बताये। परन्तु इन सबमें ध्येय तो सुखका ही होता है। अतः भगवान् कहते हैं कि तुम उसी ध्येयकी सिद्धिके लिये सुखके भेद सुनो।त्रिविधं श्रृणु मे -- लोग रातदिन राजस और तामस सुखमें लगे रहते हैं और उसीको वास्तविक सुख मानते हैं। इस कारण सांसारिक भोगोंसे ऊँचा उठकर भी कोई सुख मिल सकता है प्राणोंके मोहसे ऊँचा उठकर भी कोई सुख मिल सकता है राजस और तामस सुखसे आगे भी कोई सात्त्विक सुख है वे इन बातोंको समझ ही नहीं सकते। इसलिये भगवान् कहते हैं कि भैया वह सुख तीन प्रकारका होता है? उनको तुम सुनो और उनमेंसे सात्त्विक सुखको ग्रहण करो और राजसतामस सुखोंका त्याग करो। कारण कि सात्त्विक सुख परमात्माकी तरफ चलनेमें सहायता करनेवाला है और राजसतामस सुख संसारमें फँसाकर पतन करनेवाले हैं।अभ्यासाद्रमते यत्र -- सात्त्विक सुखमें अभ्याससे रमण होता है। साधारण मनुष्योंको अभ्यासके बिना इस सुखका अनुभव नहीं होता। राजस और तामस सुखमें अभ्यास नहीं करना पड़ता। उसमें तो प्राणिमात्रका स्वतःस्वाभाविक ही आकर्षण होता है।राजसतामस सुखमें इन्द्रियोंका विषयोंकी ओर? मनबुद्धिका भोगसंग्रहकी ओर तथा थकावट होनेपर निद्रा आदिकी ओर स्वतः आकर्षण होता है। विषयजन्य? अभिमानजन्य? प्रशंसाजन्य और निद्राजन्य सुख सभी प्राणियोंको स्वतः ही अच्छे लगते हैं। कुत्ते आदि जो नीच प्राणी हैं? उनका भी आदर करते हैं तो वे राजी होते हैं और निरादर करते हैं तो नाराज हो जाते हैं? दुःखी हो जाते हैं। तात्पर्य यह है कि राजस और तामस सुखमें अभ्यासकी जरूरत नहीं है क्योंकि इस सुखको सभी प्राणी अन्य योनियोंमें भी लेते आये हैं।इस सात्त्विक सुखमें अभ्यास क्या है श्रवणमनन भी अभ्यास है? शास्त्रोंको समझना भी अभ्यास है? और राजसीतामसी वृत्तियोंको हटाना भी अभ्यास है। जिस राजस और तामस सुखमें प्राणिमात्रकी स्वतःस्वाभाविक प्रवृत्ति हो रही है? उससे भिन्न नयी प्रवृत्ति करनेका नाम अभ्यास है। सात्त्विक सुखमें अभ्यास करना तो आवश्यक है? पर रमण करना बाधक है।यहाँ अभ्यासाद्रमते पदका यह भाव नहीं है कि सात्त्विक सुखका भोग किया जाय? प्रत्युत सात्त्विक सुखमें अभ्याससे ही रुचि? प्रियता? प्रवृत्ति आदिके होनेको ही यहाँ रमण करना कहा गया है।दुःखान्तं च निगच्छति -- उस सात्त्विक सुखमें अभ्याससे ज्योंज्यों रुचि? प्रियता बढ़ती जाती है? त्योंत्यों परिणाममें दुःखोंका नाश होता जाता है और प्रसन्नता? सुख तथा आनन्द बढ़ते जाते हैं (गीता 2। 65)।च अव्यय देनेका तात्पर्य है कि जबतक सात्त्विक सुखमें रमण होगा अर्थात् साधक सात्त्विक सुख लेता रहेगा? तबतक दुःखोंका अत्यन्त अभाव नहीं होगा। कारण कि सात्त्विक सुख भी परमात्मविषयक बुद्धिकी प्रसन्नतासे पैदा हुआ है -- आत्मबुद्धिप्रसादजम्। जो उत्पन्न होनेवाला होता है? वह जरूर नष्ट होता है। ऐसे सुखसे दुःखोंका अन्त कैसे होगा इसलिये सात्त्विक सुखमें भी आसक्ति नहीं होनी चाहिये। सात्त्विक सुखसे भी ऊँचा उठनेसे मनुष्य दुःखोंके अन्तको प्राप्त हो जाता है? गुणातीत हो जाता है।आत्मबुद्धिप्रसादजम् -- जिस बुद्धिमें सांसारिक मान? बड़ाई? आदर? धनसंग्रह? विषयजन्य सुख आदिका महत्त्व नहीं रहता? केवल परमात्मविषय विचार ही रहता है? उस बुद्धिकी प्रसन्नता (गीता 2। 64) अर्थात् स्वच्छतासे यह सात्त्विक सुख पैदा होता है। तात्पर्य है कि सांसारिक संयोगजन्य सुखसे सर्वथा उपरत होकर परमात्मामें बुद्धिके विलीन होनेपर जो सुख होता है? वह सुख सात्त्विक है।यत्तदग्रे विषमिव -- यहाँ यत्तत् कहनेका भाव यह है कि यत् -- जो सात्त्विक सुख है तत् -- वह परोक्ष है अर्थात् उसका अभी अनुभव नहीं हुआ है। अभी तो उस सुखका केवल उद्देश्य बनाया है? जबकि राजस और तामस सुखका अभी अनुभव होता है। इसलिये अनुभवजन्य राजस और तामस सुखका त्याग करनेमें कठिनता आती है और लक्ष्यरूपमें जो सात्त्विक सुख है? उसकी प्राप्तिके लिये किया हुआ रसहीन परिश्रम (अभ्यास) आरम्भमें जहरकी तरह लगता है -- अग्ने विषमिव। तात्पर्य यह है कि अनुभवजन्य राजस और तामस सुखका तो त्याग कर दिया और लक्ष्यवाला सात्त्विक सुख मिला नहीं -- उसका रस अभी मिला नहीं इसलिये वह सात्त्विक सुख आरम्भमें जहरकी तरह प्रतीत होता है।राजस और तामस सुखको अनेक योनियोंमें भोगते आये हैं और उसे इस जन्ममें भी भोगा है। उस भोगे हुए सुखकी स्मृति आनेसे राजस और तामस सुखमें स्वाभाविक ही मन लग जाता है। परन्तु सात्त्विक सुख उतना भोगा हुआ नहीं है इसलिये इसमें जल्दी मन नहीं लगता। इस कारण सात्त्विक सुख आरम्भमें विषकी तरह लगता है।वास्तवमें सात्त्विक सुख विषकी तरह नहीं है? प्रत्युत राजस और तामस सुखका त्याग विषकी तरह होता है। जैसे? बालकको खेलकूद छोड़कर पढ़ाईमें लगाया जाय तो उसको पढ़ाईमें कैदीकी तरह होकर अभ्यास करना पड़ता है। पढ़ाईमें मन नहीं लगता तथा इधर उच्छृङ्खलता? खेलकूद छूट जाता है? तो उसको पढ़ाई विषकी तरह मालूम देती है। परन्तु वही बालक पढ़ता रहे और एकदो परीक्षाओंमें पास हो जाय तो उसका पढ़ाईमें मन लग जाता है अर्थात् उसको पढ़ाई अच्छी लगने लग जाती है। तब उसकी पढ़ाईके अभ्याससे रुचि? प्रियता होने लगती है।वास्तवमें देखा जाय तो सात्त्विक सुख आरम्भमें विषकी तरह उन्हीं लोगोंके लिये होता है? जिनका राजस और तामस सुखमें राग है। परन्तु जिनको सांसारिक भोगोंसे स्वाभाविक वैराग्य है? जिनकी पारमार्थिक शास्त्राध्ययन? सत्सङ्ग? कथाकीर्तन? साधनभजन आदिमें स्वाभाविक रुचि है और जिनके ज्ञान? कर्म? बुद्धि और धृति सात्त्विक हैं? उन साधकोंको यह सात्त्विक सुख आरम्भसे ही अमृतकी तरह आनन्द देनेवाला होता है। उनको इसमें कष्ट? परिश्रम? कठिनता आदि मालूम ही नहीं देते।परिणामेऽमृतोपमम् -- साधन करनेसे साधकमें सत्त्वगुण आता है। सत्त्वगुणके आनेपर इन्द्रियों और अन्तःकरणमें स्वच्छता? निर्मलता? ज्ञानकी दीप्ति? शान्ति? निर्विकारता आदि सद्भावसद्गुण प्रकट हो जाते हैं (टिप्पणी प0 919)। इन सद्गुणोंका प्रकट होना ही सात्त्विक सुखका परिणाममें अमृतकी तरह होना है। इसका उपभोग न करनेसे अर्थात् इसमें रस न लेनेसे वास्तविक अक्षय सुखकी प्राप्ति हो जाती है (गीता 5। 21)।परिणाममें सात्त्विक सुख राजस और तामस सुखसे ऊँचा उठाकर जडतासे सम्बन्धविच्छेद करा देता है और इसमें आसक्ति न होनेसे अन्तमें परमात्माकी प्राप्ति करा देता है। इसलिये यह परिणाममें अमृतकी तरह है।तत्सुखं सात्त्विकं प्रोक्तम् -- सत्सङ्ग? स्वाध्याय? संकीर्तन? जप? ध्यान? चिन्तन आदिसे जो सुख होता है? वह मान? बड़ाई? आराम? रुपये? भोग आदि विषयेन्द्रियसम्बन्धका नहीं है और प्रमाद? आलस्य? निद्राका भी नहीं है। वह तो परमात्माके सम्बन्धका है। इसलिये वह सुख सात्त्विक कहा गया है। सम्बन्ध -- अब राजस सुखका वर्णन करते हैं।
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।।18.36।।हे भरतवंशियोंमें श्रेष्ठ अर्जुन ! अब तीन प्रकारके सुखको भी तुम मेरेसे सुनो। जिसमें अभ्याससे रमण होता है और जिससे दुःखोंका अन्त हो जाता है, ऐसा वह परमात्मविषयक बुद्धिकी प्रसन्नतासे पैदा होनेवाला जो सुख (सांसारिक आसक्तिके कारण) आरम्भमें विषकी तरह और परिणाममें अमृतकी तरह होता है, वह सुख सात्त्विक कहा गया है।
।।18.37।। व्याख्या -- भरतर्षभ -- इस सम्बोधनको देनेमें भगवान्का भाव यह है कि भरतवंशियोंमें श्रेष्ठ अर्जुन तुम राजसतामस सुखोंमें लुब्ध? मोहित होनेवाले नहीं हो क्योंकि तुम्हारे लिये राजस और तामस सुखपर विजय करना कोई बड़ी बात नहीं है। तुमने राजस सुखपर विजय भी कर ली है क्योंकि स्वर्गकी उर्वशीजैसी सुन्दरी अप्सराको भी तुमने ठुकरा दिया है। इसी प्रकार तुमने तामस सुखपर भी विजय कर ली है क्योंकि प्राणिमात्रके लिये आवश्यक जो निद्राका तामस सुख है? उसको तुमने जीत लिया है। इसीसे तुम्हारा नाम गुडाकेश हुआ है।सुखं तु इदानीम् -- ज्ञान? कर्म? कर्ता? बुद्धि और धृतिके तीनतीन भेद बतानेके बाद यहाँ तु पदका प्रयोग,करके भगवान् कहते हैं कि सुख भी तीन तरहका होता है। इसमें एक विशेष ध्यान देनेकी बात है कि आज पारमार्थिक मार्गपर चलनेवाले जितने भी साधक हैं? उन साधकोंकी ऊँची स्थिति न होनेमें अथवा उनको परमात्मतत्त्वका अनुभव न होनेमें अगर कोई विघ्नबाधा है? तो वह है -- सुखकी इच्छा।सात्त्विक सुख भी आसक्तिके कारण बन्धनकारक हो जाता है। तात्पर्य है कि अगर साधनजन्य -- ध्यान और एकाग्रताका सुख भी लिया जाय? तो वह भी बन्धनकारक हो जाता है। इतना ही नहीं? अगर समाधिका सुख भी लिया जाय? तो वह भी परमात्मतत्त्वकी प्राप्तिमें बाधक हो जाता है -- सुखसङ्गेन बध्नाति (गीता 14। 6)। इस विषयमें कोई कहे कि परमात्मतत्त्वका सुख आ जाय तो क्या उस सुखको भी हम न लें वास्तवमें परमात्मतत्त्वका सुख लिया नहीं जाता? प्रत्युत उस अक्षय सुखका स्वतः अनुभव होता है (गीता 5। 21 6। 21? 28)। साधनजन्य सुखका भोग न करनेसे वह अक्षय स्वतःस्वाभाविक प्राप्त हो जाता है। उस अक्षय सुखकी तरफ विशेष खयाल करानेके लिये भगवान् यहाँ तु पदका प्रयोग करते हैं।यहाँ इदानीम् कहनेका का तात्पर्य है कि अर्जुन संन्यास और त्यागके तत्त्वको जानना चाहते है अतः उनकी जिज्ञासाके उत्तरमें भगवान्ने त्याग? ज्ञान? कर्म? कर्ता? बुद्धि और धृतिके तीनतीन भेद बताये। परन्तु इन सबमें ध्येय तो सुखका ही होता है। अतः भगवान् कहते हैं कि तुम उसी ध्येयकी सिद्धिके लिये सुखके भेद सुनो।त्रिविधं श्रृणु मे -- लोग रातदिन राजस और तामस सुखमें लगे रहते हैं और उसीको वास्तविक सुख मानते हैं। इस कारण सांसारिक भोगोंसे ऊँचा उठकर भी कोई सुख मिल सकता है प्राणोंके मोहसे ऊँचा उठकर भी कोई सुख मिल सकता है राजस और तामस सुखसे आगे भी कोई सात्त्विक सुख है वे इन बातोंको समझ ही नहीं सकते। इसलिये भगवान् कहते हैं कि भैया वह सुख तीन प्रकारका होता है? उनको तुम सुनो और उनमेंसे सात्त्विक सुखको ग्रहण करो और राजसतामस सुखोंका त्याग करो। कारण कि सात्त्विक सुख परमात्माकी तरफ चलनेमें सहायता करनेवाला है और राजसतामस सुख संसारमें फँसाकर पतन करनेवाले हैं।अभ्यासाद्रमते यत्र -- सात्त्विक सुखमें अभ्याससे रमण होता है। साधारण मनुष्योंको अभ्यासके बिना इस सुखका अनुभव नहीं होता। राजस और तामस सुखमें अभ्यास नहीं करना पड़ता। उसमें तो प्राणिमात्रका स्वतःस्वाभाविक ही आकर्षण होता है।राजसतामस सुखमें इन्द्रियोंका विषयोंकी ओर? मनबुद्धिका भोगसंग्रहकी ओर तथा थकावट होनेपर निद्रा आदिकी ओर स्वतः आकर्षण होता है। विषयजन्य? अभिमानजन्य? प्रशंसाजन्य और निद्राजन्य सुख सभी प्राणियोंको स्वतः ही अच्छे लगते हैं। कुत्ते आदि जो नीच प्राणी हैं? उनका भी आदर करते हैं तो वे राजी होते हैं और निरादर करते हैं तो नाराज हो जाते हैं? दुःखी हो जाते हैं। तात्पर्य यह है कि राजस और तामस सुखमें अभ्यासकी जरूरत नहीं है क्योंकि इस सुखको सभी प्राणी अन्य योनियोंमें भी लेते आये हैं।इस सात्त्विक सुखमें अभ्यास क्या है श्रवणमनन भी अभ्यास है? शास्त्रोंको समझना भी अभ्यास है? और राजसीतामसी वृत्तियोंको हटाना भी अभ्यास है। जिस राजस और तामस सुखमें प्राणिमात्रकी स्वतःस्वाभाविक प्रवृत्ति हो रही है? उससे भिन्न नयी प्रवृत्ति करनेका नाम अभ्यास है। सात्त्विक सुखमें अभ्यास करना तो आवश्यक है? पर रमण करना बाधक है।यहाँ अभ्यासाद्रमते पदका यह भाव नहीं है कि सात्त्विक सुखका भोग किया जाय? प्रत्युत सात्त्विक सुखमें अभ्याससे ही रुचि? प्रियता? प्रवृत्ति आदिके होनेको ही यहाँ रमण करना कहा गया है।दुःखान्तं च निगच्छति -- उस सात्त्विक सुखमें अभ्याससे ज्योंज्यों रुचि? प्रियता बढ़ती जाती है? त्योंत्यों परिणाममें दुःखोंका नाश होता जाता है और प्रसन्नता? सुख तथा आनन्द बढ़ते जाते हैं (गीता 2। 65)।च अव्यय देनेका तात्पर्य है कि जबतक सात्त्विक सुखमें रमण होगा अर्थात् साधक सात्त्विक सुख लेता रहेगा? तबतक दुःखोंका अत्यन्त अभाव नहीं होगा। कारण कि सात्त्विक सुख भी परमात्मविषयक बुद्धिकी प्रसन्नतासे पैदा हुआ है -- आत्मबुद्धिप्रसादजम्। जो उत्पन्न होनेवाला होता है? वह जरूर नष्ट होता है। ऐसे सुखसे दुःखोंका अन्त कैसे होगा इसलिये सात्त्विक सुखमें भी आसक्ति नहीं होनी चाहिये। सात्त्विक सुखसे भी ऊँचा उठनेसे मनुष्य दुःखोंके अन्तको प्राप्त हो जाता है? गुणातीत हो जाता है।आत्मबुद्धिप्रसादजम् -- जिस बुद्धिमें सांसारिक मान? बड़ाई? आदर? धनसंग्रह? विषयजन्य सुख आदिका महत्त्व नहीं रहता? केवल परमात्मविषय विचार ही रहता है? उस बुद्धिकी प्रसन्नता (गीता 2। 64) अर्थात् स्वच्छतासे यह सात्त्विक सुख पैदा होता है। तात्पर्य है कि सांसारिक संयोगजन्य सुखसे सर्वथा उपरत होकर परमात्मामें बुद्धिके विलीन होनेपर जो सुख होता है? वह सुख सात्त्विक है।यत्तदग्रे विषमिव -- यहाँ यत्तत् कहनेका भाव यह है कि यत् -- जो सात्त्विक सुख है तत् -- वह परोक्ष है अर्थात् उसका अभी अनुभव नहीं हुआ है। अभी तो उस सुखका केवल उद्देश्य बनाया है? जबकि राजस और तामस सुखका अभी अनुभव होता है। इसलिये अनुभवजन्य राजस और तामस सुखका त्याग करनेमें कठिनता आती है और लक्ष्यरूपमें जो सात्त्विक सुख है? उसकी प्राप्तिके लिये किया हुआ रसहीन परिश्रम (अभ्यास) आरम्भमें जहरकी तरह लगता है -- अग्ने विषमिव। तात्पर्य यह है कि अनुभवजन्य राजस और तामस सुखका तो त्याग कर दिया और लक्ष्यवाला सात्त्विक सुख मिला नहीं -- उसका रस अभी मिला नहीं इसलिये वह सात्त्विक सुख आरम्भमें जहरकी तरह प्रतीत होता है।राजस और तामस सुखको अनेक योनियोंमें भोगते आये हैं और उसे इस जन्ममें भी भोगा है। उस भोगे हुए सुखकी स्मृति आनेसे राजस और तामस सुखमें स्वाभाविक ही मन लग जाता है। परन्तु सात्त्विक सुख उतना भोगा हुआ नहीं है इसलिये इसमें जल्दी मन नहीं लगता। इस कारण सात्त्विक सुख आरम्भमें विषकी तरह लगता है।वास्तवमें सात्त्विक सुख विषकी तरह नहीं है? प्रत्युत राजस और तामस सुखका त्याग विषकी तरह होता है। जैसे? बालकको खेलकूद छोड़कर पढ़ाईमें लगाया जाय तो उसको पढ़ाईमें कैदीकी तरह होकर अभ्यास करना पड़ता है। पढ़ाईमें मन नहीं लगता तथा इधर उच्छृङ्खलता? खेलकूद छूट जाता है? तो उसको पढ़ाई विषकी तरह मालूम देती है। परन्तु वही बालक पढ़ता रहे और एकदो परीक्षाओंमें पास हो जाय तो उसका पढ़ाईमें मन लग जाता है अर्थात् उसको पढ़ाई अच्छी लगने लग जाती है। तब उसकी पढ़ाईके अभ्याससे रुचि? प्रियता होने लगती है।वास्तवमें देखा जाय तो सात्त्विक सुख आरम्भमें विषकी तरह उन्हीं लोगोंके लिये होता है? जिनका राजस और तामस सुखमें राग है। परन्तु जिनको सांसारिक भोगोंसे स्वाभाविक वैराग्य है? जिनकी पारमार्थिक शास्त्राध्ययन? सत्सङ्ग? कथाकीर्तन? साधनभजन आदिमें स्वाभाविक रुचि है और जिनके ज्ञान? कर्म? बुद्धि और धृति सात्त्विक हैं? उन साधकोंको यह सात्त्विक सुख आरम्भसे ही अमृतकी तरह आनन्द देनेवाला होता है। उनको इसमें कष्ट? परिश्रम? कठिनता आदि मालूम ही नहीं देते।परिणामेऽमृतोपमम् -- साधन करनेसे साधकमें सत्त्वगुण आता है। सत्त्वगुणके आनेपर इन्द्रियों और अन्तःकरणमें स्वच्छता? निर्मलता? ज्ञानकी दीप्ति? शान्ति? निर्विकारता आदि सद्भावसद्गुण प्रकट हो जाते हैं (टिप्पणी प0 919)। इन सद्गुणोंका प्रकट होना ही सात्त्विक सुखका परिणाममें अमृतकी तरह होना है। इसका उपभोग न करनेसे अर्थात् इसमें रस न लेनेसे वास्तविक अक्षय सुखकी प्राप्ति हो जाती है (गीता 5। 21)।परिणाममें सात्त्विक सुख राजस और तामस सुखसे ऊँचा उठाकर जडतासे सम्बन्धविच्छेद करा देता है और इसमें आसक्ति न होनेसे अन्तमें परमात्माकी प्राप्ति करा देता है। इसलिये यह परिणाममें अमृतकी तरह है।तत्सुखं सात्त्विकं प्रोक्तम् -- सत्सङ्ग? स्वाध्याय? संकीर्तन? जप? ध्यान? चिन्तन आदिसे जो सुख होता है? वह मान? बड़ाई? आराम? रुपये? भोग आदि विषयेन्द्रियसम्बन्धका नहीं है और प्रमाद? आलस्य? निद्राका भी नहीं है। वह तो परमात्माके सम्बन्धका है। इसलिये वह सुख सात्त्विक कहा गया है। सम्बन्ध -- अब राजस सुखका वर्णन करते हैं।
Translation · Hindi
।।18.37।।हे भरतवंशियोंमें श्रेष्ठ अर्जुन ! अब तीन प्रकारके सुखको भी तुम मेरेसे सुनो। जिसमें अभ्याससे रमण होता है और जिससे दुःखोंका अन्त हो जाता है, ऐसा वह परमात्मविषयक बुद्धिकी प्रसन्नतासे पैदा होनेवाला जो सुख (सांसारिक आसक्तिके कारण) आरम्भमें विषकी तरह और परिणाममें अमृतकी तरह होता है, वह सुख सात्त्विक कहा गया है।
।।18.38।। व्याख्या -- विषयेन्द्रियसंयोगात् -- विषयों और इन्द्रियोंके संयोगसे होनेवाला जो सुख है? उसमें अभ्यास नहीं करना पड़ता। कारण कि यह प्राणी किसी भी योनिमें जाता है? वहाँ उसको विषयों और इन्द्रियोंके संयोगसे होनेवाला सुख मिलता ही है। शब्द? स्पर्श आदि पाँचों विषयोंका सुख पशुपक्षी? कीटपतङ्ग आदि सभी प्राणियोंको मिलता है। अतः उस सुखमें प्राणिमात्रका स्वाभाविक अभ्यास रहता है। मनुष्यजीवनमें भी बचपनसे देखा जाय तो अनुकूलतामें राजी होना और प्रतिकूलतामें नाराज होना स्वाभाविक ही होता आया है। इसलिये इस राजस सुखमें अभ्यासकी जरूरत नहीं है।यत्तदग्रेऽमृतोपमम् -- राजस सुखको आरम्भमें अमृतकी तरह कहनेका भाव यह है कि सांसारिक विषयोंकी प्राप्तिकी सम्भावनाके समय मनमें जितना सुख होता है? उतना सुख? मस्ती और राजीपन विषयोंके मिलनेपर नहीं रहता। मिलनेपर भी आरम्भमें (संयोग होते ही) जैसा सुख होता है? थोड़े समयेके बाद वैसा सुख नहीं रहता और उस विषयको भोगतेभोगते जब भोगनेकी शक्ति क्षीण हो जाती है? उस समय सुख नहीं होता? प्रत्युत विषयभोगसे अरुचि हो जाती है। भोग भोगनेकी शक्ति क्षीण होनेके बाद भी अगर विषयोंको भोगा जाय तो दुःख? जलन पैदा हो जाती है? चित्तमें सुख नहीं रहता? इसलिये यह राजस सुख आरम्भमें अमृतकी तरह दीखता है।अमृतकी तरह कहनेका दूसरा भाव यह है कि जब मन विषयोंमें खींचता है? तब मनको वे विषय बड़े प्यारे लगते हैं। विषयों और भोगोंकी बातें सुननेमें जितना रस आता है? उतना भोगोंमें नहीं आता। इसलिये गीतामें आया है -- यामिमां पुष्पितां वाचं प्रवदन्त्यविपश्चितः (2। 42) राजस पुरुष स्वर्गके भोगोंका सुख सुनते हैं तो उनको वह सुख बड़ा प्रिय लगता है और वे उसके लिये ललचा उठते हैं। तात्पर्य है कि वे स्वर्गके सुख दूरसे सुनकर ही बड़े प्रिय लगते हैं परन्तु स्वर्गमें जाकर सुख भोगनेसे उनको उतना सुख नहीं मिलता और वह उतना प्रिय भी नहीं लगता परिणामे विषमिव -- आरम्भमें विषय बड़े सुन्दर लगते हैं? उनमें बड़ा सुख मालूम देता है परन्तु उनको भोगतेभोगते जब परिणाममें वह सुख नीरसतामें परिणत हो जाता है? उस सुखमें बिलकुल अरुचि हो जाती है? तब वही सुख जहरकी तरह मालूम देता है।संसारमें जितने प्राणी कैदमें पड़े हैं? जितने चौरासी लाख योनियों और नरकोंमें पड़े हैं? उसका कारण देखा जाय तो उन्होंने विषयोंका भोग किया है? उनसे सुख लिया है? इसीसे वे कैद? नरक आदिमें दुःख पा रहे हैं क्योंकि राजस सुखका परिणाम दुःख होता ही है -- रजसस्तु फलं दुःखम् (गीता 14। 16)।आज भी जो लोग घबरा रहे हैं? दुःखी हो रहे हैं? वे सब पदार्थोंके रागके कारण ही दुःख पा रहे हैं। जो धनी होकर फिर निर्धन हो गया है? वह जितना दुःखी और संतप्त है? उतना दुःख और सन्ताप स्वाभाविक निर्धनको नहीं है क्योंकि उसके भीतर सुखके संस्कार अधिक नहीं पड़े हैं। परन्तु धनीने राजस सुख अधिक भोगा है? उसके भीतर सुखके संस्कार अधिक पड़े हैं? इसलिये उसको धनके अभावका दुःख ज्यादा है। जैसे? जो मनुष्य तरहतरहकी सामग्री भोजन करनेवाला है? उसके भोजनमें कभी थोड़ीसी भी कमी रह जाय तो उसको वह कमी बड़ी खटकती है कि आज भोजनमें चटनी नहीं है? खटाई नहीं है? मिठाई नहीं है? अमुकअमुक चीज नहीं है -- इस प्रकार नहींनहींका ही ताँता लगा रहता है। परन्तु साधारण आदमी बाजरेकी रूखीसूखी रोटी खाकर भी मौजसे रहता है? उसको भोजनमें किसी चीजकी कमी खटकती ही नहीं। तात्पर्य यह हुआ कि पदार्थोंके संयोगसे जितना ज्यादा सुख लिया है? उतना ही उसके अभावका अनुभव होता है। अभावके अनुभवमें दुःख ही होता है। जिस पदार्थकी कामना होती है? उसकी प्राप्तिके लिये मनुष्य उद्योग करते हैं। उद्योग करनेपर भी वस्तु मिलेगी या नहीं मिलेगी? इसमें संदेह रहता है। वस्तु न मिले तो उसके अभावका दुःख होता है? और वस्तु मिल जाय तो उस वस्तुको और भी अधिक प्राप्त करनेकी इच्छा हो जाती है। इस प्रकार इच्छापूर्ति नयी इच्छाका कारण बन जाती है और इच्छापूर्ति तथा फिर इच्छाकी उत्पत्ति -- यह चक्कर चलता ही रहता है? इसका कभी अन्त नहीं आता। तात्पर्य यह है कि इच्छा कभी मिटती नहीं और इच्छाके रहते हुए अभाव खटकता रहता है। यह अभाव ही विषकी तरह है अर्थात् दुःखदायी है।जब राजस सुख परिणाममें विषकी तरह है? तो फिर राजस सुख लेनेवाले जितने लोग हैं? उन सबको सुखभोगके अन्तमें मर जाना चाहिये परन्तु राजस सुख विषकी तरह मारता नहीं? प्रत्युत विषकी तरह अरुचिकारक हो जाता है। उसमें पहले जैसी रुचि होती है? वैसी रुचि अन्तमें नहीं रहती अर्थात् वह सुख विषकी तरह हो जाता है? साक्षात् विष नहीं होता।राजस सुख विषकी तरह क्यों होता है कारण कि विष तो एक जन्ममें ही मारता है? पर राजस सुख कई जन्मोंतक मारता है। राजस सुख लेनेवाला रागी पुरुष शुभ कर्म करके यदि स्वर्गमें भी चला जाता है? तो वहाँ भी उसको सुख? शान्ति नहीं मिलती। स्वर्गमें भी अपनेसे ऊँची श्रेणीवालोंको देखकर ईर्ष्या होती है कि ये हमारेसे ऊँचे क्यों हो गये समान पदवालोंको देखकर दुःख होता है कि ये हमारे समान पदपर आकर क्यों बैठ गये और नीची श्रेणीवालोंको देखकर अभिमान आता है कि हम इनसे ऊँचे हैं इस प्रकार उसके मनमें ईर्ष्या? दुःख और अभिमान होते ही रहते हैं? फिर उसके मनमें सुख कहाँ और शान्ति कहाँ इतना ही नहीं? पुण्योंके क्षीण हो जानेपर उसको पुनः मृत्युलोकमें आना पड़ता है -- क्षीणे पुण्ये मर्त्यलोकं विशन्ति (गीता 9। 21)। यहाँ आकर फिर शुभ कर्म करता है और फिर स्वर्गमें जाता है। इस प्रकार जन्ममरणके चक्करमें चढ़ा ही रहता है -- गतागतं कामकामा लभन्ते (9। 21)। यदि वह रागके कारण पापकर्मोंमें लग जाता है तो परिणाममें चौरासी लाख योनियों और नरकोंमें पड़ता हुआ न जाने कितने जन्मोंतक जन्मतामरता रहता है? जिसका कोई अन्त नहीं आता। इसलिये इस सुखको विषकी तरह कहा गया है।तत्सुखं राजसं स्मृतम् -- सात्त्विक सुखके लिये तो (सैंतीसवें श्लोकमें) प्रोक्तम् पद कहा है? पर राजस सुखके लिये यहाँ स्मृतम् पद कहनेका तात्पर्य है कि पहले भी मनुष्यने राजस सुखका फल दुःख पाया है परन्तु रागके कारण वह संयोगकी तरफ पुनः ललचा उठता है। कारण कि संयोगका प्रभाव उसपर पड़ा हुआ है और परिणामके प्रभावको वह स्वीकार नहीं करता। अगर वह परिणामके प्रभावको स्वीकार कर ले? तो फिर वह राजस सुखमें फँसेगा नहीं। स्मृति? शास्त्र? पुराण आदिमें ऐसे बहुतसे इतिहास आते हैं? जिनमें मनुष्योंके द्वारा राजस सुखके कारण बहुत दुःख पानेकी बात आयी है। इसी बातको स्मरण करानेके लिये यहाँ स्मृतम् पद आया है।जिसकी वृत्ति जितनी सात्त्विक होती है? वह उतना ही हरेक विषयके परिणामकी तरफ देखता है। अभीके तात्कालिक सुखकी तरफ वह ध्यान नहीं देता। परंतु राजसी वृत्तिवाला परिणामकी तरफ देखता ही नहीं? उसकी वृत्ति तात्कालिक सुखकी तरफ ही जाती है। इसलिये वह संसारमें फँसा रहता है। राजस पुरुषको संसारका सम्बन्ध वर्तमानमें तो अच्छा मालूम देता है परन्तु परिणाममें यह हानिकारक है -- ये हि संस्पर्शजा भोगा दुःखयोनय एव ते (गीता 5। 22)। इसलिये साधकको संसारसे विरक्त हो जाना चाहिये राजस सुखमें नहीं फँसना चाहिये।, सम्बन्ध -- अब तामस सुखका वर्णन करते हैं।
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।।18.38।।जो सुख इन्द्रियों और विषयोंके संयोगसे आरम्भमें अमृतकी तरह और परिणाममें विषकी तरह होता है, वह सुख राजस कहा गया है।
यदग्रे चानुबन्धे च सुखं मोहनमात्मनः।
निद्रालस्यप्रमादोत्थं तत्तामसमुदाहृतम् ॥
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।।18.39।। व्याख्या -- निद्रालस्यप्रमादोत्थम् -- जब राग अत्यधिक बढ़ जाता है? तब वह तमोगुणका रूप धारण कर लेता है। इसीको मोह कहते हैं। इस मोह(मूढता)के कारण मनुष्यको अधिक सोना अच्छा लगता है। अधिक सोनेवाले मनुष्यको गाढ़ नींद नहीं आती। गाढ़ नींद न आनेसे तन्द्रा ज्यादा आती है और स्वप्न भी ज्यादा आते हैं। तन्द्रा और स्वप्नमें तामस मनुष्यका बहुत समय बरबाद हो जाता है। परन्तु तामस मनुष्यको इसीसे ही सुख मिलता है? इसलिये इस सुखको निद्रासे उत्पन्न बताया है।जब तमोगुण अधिक बढ़ जाता है? तब मनुष्यकी वृत्तियाँ भारी हो जाती हैं। फिर वह आलस्यमें समय बरबाद कर देता है। आवश्यक काम सामने आनेपर वह कह देता है कि फिर कर लेंगे? अभी तो आराम कर रहे हैं। इस प्रकार आलस्यअवस्थामें उसको सुख मालूम देता है। परन्तु निकम्मा रहनेके कारण उसकी इन्द्रियों और अन्तःकरणमें शिथिलता आ जाती है? मनमें संसारका फालतू चिन्तन होता रहता है और मनमें अशान्ति? शोक? विषाद? चिन्ता? दुःख होते रहते हैं।जब इससे भी अधिक तमोगुण बढ़ जाता है? तब मनुष्य प्रमाद करने लग जाता है। वह प्रमाद दो तरहका होता है -- अक्रिय प्रमाद और सक्रिय प्रमाद। घर? परिवार? शरीर आदिके आवश्यक कामोंको न करना और निठल्ले बैठे रहना अक्रिय प्रमाद (टिप्पणी प0 922) है। व्यर्थ क्रियाएँ (देखना? सुनना? सोचना आदि) करना बीड़ी? सिगरेट? शराब? भाँग? तम्बाकू? खेलतमाशा आदि दुर्व्यसनोंमें लगना और चोरी? डकैती? झूठ? कपट? बेईमानी? व्यभिचार? अभक्ष्यभक्षण आदि दुराचारोंमें लगना सक्रिय प्रमाद है।प्रमादके कारण तामस पुरुषोंको निरर्थक समय बरबाद करनेमें तथा झूठ? कपट? बेईमानी आदि करनेमें सुख मिलता है। जैसे कामधंधा करनेवाले पैसे (मजदूरी या वेतन) तो पूरे ले लेते हैं? पर काम पूरा और ठीक ढंगसे नहीं करते। चिकित्सकलोग रोगियोंका ठीक ढंगसे इलाज नहीं करते? जिससे रोगीलोग बारबार आते रहें और पैसे देते रहें। दूध बेचनेवाले पैंसोंके लोभमें दूधमें पानी मिलाकर बेचते हैं। पैसे अधिक देनेपर भी वे पानी मिलाना नहीं छोड़ते। ऐसे पापरूप प्रमादसे उनको घोर नरकोंकी प्राप्ति होती है।जब तमोगुणी प्रमादवृत्ति आती है? तब वह सत्त्वगुणके विवेकज्ञानको ढक देती है और जब तमोगुणी निद्राआलस्यवृत्ति आती है? तब वह सत्त्वगुणके प्रकाशको ढक देती है। विवेकज्ञानके ढकनेपर प्रमाद होता है तथा प्रकाशके ढकनेपर आलस्य और निद्रा आती है। तामस पुरुषको निद्रा? आलस्य और प्रमाद -- तीनोंसे सुख मिलता है? इसलिये तामस सुखको इन तीनोंसे उत्पन्न बताया गया है।विशेष बातनिद्रा दो प्रकारकी होती है -- युक्तनिद्रा और अतिनिद्रा।,(1) युक्तनिद्रा -- निद्रामें एक विश्राम मिलता है। विश्रामसे शरीर? मन? बुद्धि? अन्तःकरणमें नीरोगता? स्फूर्ति? स्वच्छता? निर्मलता और ताजगी आती है। ताजगी आनेसे साधनभजन करनेमें और सांसारिक काम करनेमें भी शक्ति मिलती है और उत्साह रहता है। इसलिये युक्तनिद्रा दोषी नहीं है? प्रत्युत सबके लिये आवश्यक है। भगवान्ने भी युक्तनिद्राको आवश्यक बताया है -- युक्तस्वप्नावबोधस्य योगो भवति दुःखहा (गीता 6। 17)।ताजगीमात्रके लिये निद्रा साधकके लिये आवश्यक है। जिस साधकके रागपूर्वक सांसारिक संकल्प नहीं होते? उसको नींद बहुत जल्दी आ जाती है और जो ज्यादा संकल्पशील है? उसको नींद जल्दी नहीं आती। इससे यह सिद्ध हुआ कि संसारका जो सम्बन्ध है? वह निद्राका सुख भी नहीं लेने देता। निद्रा आवश्यक क्यों है कारण कि निद्रामें जो स्थिर तत्त्व है? वह साधकको साधनमें प्रवृत्त करनेमें और सांसारिक कार्य करनेमें बल देता है? इसलिये निद्रा आवश्यक है।यद्यपि नींद तामसी है? तथापि नींदका जो बेहोशीपना है? वह त्याज्य है और जो विश्रामपना है? वह ग्राह्य है। परन्तु हरेक आदमी बेहोशीके बिना विश्रामपना ग्रहण नहीं कर सकता अतः उनके लिये नींदका बेहोशीभाग भी ग्राह्य है। हाँ? जो साधना करके ऊँचे उठ गये हैं? उनको नींदके बेहोशीभागके बिना भी जाग्रत्सुषुप्तिमें विश्राम मिल जाता है। कारण कि जाग्रत्अवस्थामें संसारके चिन्तनका सर्वथा त्याग होकर परमात्मतत्त्वमें स्थिति हो जाती है तो महान् विश्राम? सुख मिलता है इस स्थितिसे भी असङ्ग होनेपर वास्तविक तत्त्वकी प्राप्ति हो जाती है।जो साधक हैं? उनको विश्रामके लिये नहीं सोना चाहिये। उनका तो यही भाव होना चाहिये कि पहले कामधंधा करते हुए भगवान्का भजन करते थे? अब लेटेलेटे भजन करना है।(2) अतिनिद्रा -- समयपर सोना और समयपर जागना युक्तनिद्रा है और अधिक सोना अतिनिद्रा है। अतिनिद्राके आदि और अन्तमें शरीरमें आलस्य भरा रहता है। शरीरमें भारीपन रहता है। अधिक नींद लेनेका स्वभाव होनेसे हरेक कार्यमें नींद आती रहती है।चौदहवें अध्यायके आठवें श्लोकमें भगवान्ने पहले प्रमादको? दूसरे नम्बरमें आलस्यको और तीसरे नम्बरमें निद्राको रखा है -- प्रमादालस्यनिद्राभिस्तन्निबध्नाति भारत। परन्तु यहाँ पहले निद्राको? दूसरे नम्बरमें आलस्यको और तीसरे नम्बरमें प्रमादको रखा है -- निद्रालस्यप्रमादोत्थम्। इस व्यतिक्रमका कारण यह है कि वहाँ इन तीनोंके द्वारा मनुष्यको बाँधनेका प्रसङ्ग है और यहाँ मनुष्यका पतन करनेका प्रसङ्ग है। बाँधनेके विषयमें प्रमाद सबसे अधिक बन्धनकारक है अतः इसको सबसे पहले रखा है। कारण कि प्रमाद निषिद्ध आचरणोंमें प्रवृत्त करता है? जिससे अधोगति होती है। आलस्य केवल अच्छी प्रवृत्तिको रोकनेवाला होनेसे इसको दो नम्बरमें रखा है। निद्रा आवश्यक होनेसे बन्धनकारक नहीं है? प्रत्युत अतिनिद्रा ही बन्धनकारक है अतः इसको तीसरे नम्बरमें रखा है। यहाँ उससे उलटा क्रम रखनेका अभिप्राय है कि सबके लिये आवश्यक होनेसे निद्रा इतना पतन करनेवाली नहीं है। निद्रासे अधिक आलस्य पतन करता है और आलस्यसे भी अधिक प्रमाद पतन करता है। कारण कि मनुष्य ज्यादा नींद लेगा तो वृक्ष आदि मूढ़ योनियोंकी प्राप्ति होगी परन्तु आलस्य और प्रमाद करेगा तो कर्तव्यच्युत होकर दुराचार करनेसे नरकमें जाना पड़ेगा (टिप्पणी प0 923.1)।यदग्रे चानुबन्धे च सुखं मोहनमात्मनः -- निद्रा? आलस्य और प्रमादसे उत्पन्न हुआ सुख आरम्भमें और परिणाममें अपनेको मोहित करनेवाला है। इस सुखमें न तो आरम्भमें विवेक रहता है और न परिणाममें विवेक रहता है अर्थात् यह सुख विवेकको जाग्रत् नहीं होने देता। पशुपक्षी? कीटपतंग आदिमें भी विवेकशक्ति जाग्रत् न रहनेसे वे क्रियाके आरम्भ और परिणामको सोच नहीं पाते। ऐसे ही जिस सुखके कारण मनुष्य यह सोच ही नहीं सकता कि इस निद्रा आदिसे उत्पन्न हुए सुखका परिणाम हमारे लिये क्या होगा उससे क्या लाभ होगा क्या हानि होगी क्या हित होगा क्या अहित होगा उस सुखको तामस कहा गया है -- ,तत्तामसमुदाहृतम्।विशेष बात(1) प्रकृति और पुरुष -- दोनों अनादि हैं? और ये दो हैं इस प्रकार इनकी पृथक्ताका विवेक भी अनादि है। यह विवेक पुरुषमें ही रहता है? प्रकृतिमें नहीं। जब यह पुरुष इस विवेकका अनादर करके अविवेकके कारण प्रकृतिके साथ सम्बन्ध जोड़ लेता है? तब इस सम्बन्धके कारण पुरुषमें राग पैदा हो जाता है (टिप्पणी प0 923.2)।जब राग बहुत सूक्ष्म रहता है? तब विवेक प्रबल रहता है। जब राग बढ़ जाता है? तब विवेक दब जाता है? मिटता नहीं। पर विवेक ठीक तरहसे जाग्रत् हो जाय तो फिर राग टिकता नहीं अर्थात् रागका अभाव हो जाता है और उस समय पुरुष मुक्त कहलाता है।उस रागके कारण मनुष्यकी प्रकृतिजन्य सुखमें आसक्ति हो जाती है। उस आसक्तिके रहते हुए जब मनुष्य किसी कारणवश सात्त्विक सुखको प्राप्त करना चाहता है? तब राजस और तामस सुखका त्याग करनेमें उसे कठिनता मालूम देती है -- यत्तदग्रे विषमिव। परन्तु जब राग मिट जाता है? तब वह सुख अमृतकी तरह हो जाता है -- परिणामेऽमृतोऽपमम्।रागके कारण ही रजोगुणी सुख आरम्भमें अमृतकी तरह दीखता है। पर वह सुख परिणाममें प्राणीके लिये जहरकी तरह अनिष्टकारक अर्थात् महान् दुःखरूप हो जाता है। प्रकृतिजन्य सुखकी आसक्ति होनेपर दुःखी परम्पराका कोई अन्त नहीं आता।जब वही राग तमोगुणका रूप धारण कर लेता है? तब मनुष्यकी वृत्तियाँ भारी हो जाती हैं। फिर मनुष्य नींद और आलस्यमें समय बरबाद कर देता है तथा आवश्यक कर्तव्यसे विमुख होकर अकर्तव्यमें लग जाता है। परन्तु तामस पुरुषको इन्हींमें सुख मालूम देता है। इसलिये यह तामस सुख आदि और अन्तमें मोहित करनेवाला है।(2) जो प्रतिक्षण अभावमें जा रहा है? वह वास्तवमें नहीं है। पर जो नहीं को प्रकाशित करनेवाला तथा उसका आधार है? वह वास्तवमें है तत्त्व है। उसी तत्त्वको सच्चिदानन्द कहते हैं। निरन्तर सत्तारूपसे रहनेके कारण उसे सत् कहते हैं? ज्ञानस्वरूप होनेके कारण उसे चित् कहते हैं और आनन्दस्वरूप होनेके कारण उसे आनन्द कहते हैं। उस सच्चिदानन्द परमात्माका ही अंश होनेसे यह प्राणी भी सच्चिदानन्दस्वरूप है। परन्तु जब प्राणी असत् वस्तुकी इच्छा करता है कि अमुक वस्तु मुझे मिले? तब उस इच्छासे स्वतःस्वाभाविक आनन्द -- सुख ढक जाता है। जब असत् वस्तुकी इच्छा मिट जाती है? तब उस इच्छाके मिटते ही वह स्वतःस्वाभाविक सुख प्रकट हो जाता है।नित्यनिरन्तर रहनेवाला जो सुखरूप तत्त्व है? उसमें जब सात्त्विकी बुद्धि तल्लीन हो जाती है? तब बुद्धिमें स्वच्छता? निर्मलता आ जाती है। उस स्वच्छ और निर्मल बुद्धिसे अनुभवमें आनेवाला यह स्वाभाविक सुख ही सात्त्विक कहलाता है। बुद्धिसे भी जब सम्बन्ध छूट जाता है? तब वास्तविक सुख रह जाता है। सात्त्विकी बुद्धिके सम्बन्धसे ही उस सुखकी सात्त्विक संज्ञा होती है। बुद्धिसे सम्बन्ध छूटते ही उसकी सात्त्विक संज्ञा नहीं रहती।मनमें जब किसी वस्तुको प्राप्त करनेकी इच्छा होती है? तब वह वस्तु मनमें बस जाती है अर्थात् मन और बुद्धिका उसके साथ सम्बन्ध हो जाता है। जब वह मनोवाञ्छित वस्तु मिल जाती है? तब वह वस्तु मनसे,निकल जाती है अर्थात् वस्तुका मनमें जो खिंचाव था? वह निकल जाता है। उसके निकलते ही अर्थात् वस्तुसे सम्बन्धविच्छेद होते ही वस्तुके अभावका जो दुःख था? वह निवृत्त हो जाता है और नित्य रहनेवाले स्वतःसिद्ध सुखका तात्कालिक अनुभव हो जाता है। वास्तवमें यह सुख वस्तुके मिलनेसे नहीं हुआ है? प्रत्युत रागके तात्कालिक मिटनेसे हुआ है? पर राजस पुरुष भूलसे उस सुखको वस्तुके मिलनेसे होनेवाला मान लेता है। वास्तवमें देखा जाय तो वस्तुका संयोग बाहरसे होता है और प्रसन्नता भीतरसे होती है। भीतरसे जो प्रसन्नता होती है? वह बाहरके संयोगसे पैदा नहीं होती? प्रत्युत भीतर (मनमें) बसी हुई वस्तुके साथ जो सम्बन्ध था? उस वस्तुसे सम्बन्धविच्छेद होनेपर पैदा होती है। तात्पर्य यह है कि वस्तुके मिलते ही अर्थात् बाहरसे वस्तुका संयोग होते ही भीतरसे उस वस्तुसे सम्बन्धविच्छेद हो जाता है और सम्बन्धविच्छेद होते ही नित्य रहनेवाले स्वाभाविक सुखका आभास हो जाता है।जब नींदमें बुद्धि तमोगुणमें लीन हो जाती है? तब बुद्धिकी स्थिरताको लेकर वह सुख प्रकट हो जाता है। कारण कि तमोगुणके प्रभावसे नींदमें जाग्रत् और स्वप्नके पदार्थोंकी विस्मृति हो जाती है। पदार्थोंकी स्मृति दुःखोंका कारण है। पदार्थोंकी विस्मृति होनेसे निद्रावस्थामें पदार्थोंका वियोग हो जाता है तो उस वियोगके कारण स्वाभाविक सुखका आभास होता है? इसीको निद्राका सुख कहते हैं। परन्तु बुद्धिकी मलिनतासे वह स्वाभाविक सुख जैसा है? वैसा अनुभवमें नहीं आता। तात्पर्य है कि बुद्धिके तमोगुणी होनेसे बुद्धिमें स्वच्छता नहीं रहती और स्वच्छता न रहनेसे वह सुख स्पष्ट अनुभवमें नहीं आता। इसलिये निद्राके सुखको तामस कहा गया है (टिप्पणी प0 924)।इन सबका तात्पर्य यह है कि सात्त्विक मनुष्यको संसारसे विमुख होकर तत्त्वमें बुद्धिके तल्लीन होनेसे सुख होता है राजस मनुष्यको रागके कारण अन्तःकरणमें बसी हुई वस्तुके बाहर निकलनेसे सुख होता है और तामस मनुष्यको वस्तुओंके लिये किये जानेवाले कर्तव्यकर्मोंकी विस्मृतिसे और निरर्थक क्रियाओंमें लगनेसे सुख होता है। इससे यह सिद्ध हुआ कि जो नित्यनिरन्तर रहनेवाला सुखरूप तत्त्व है? वह असत्के सम्बन्धसे आच्छादित रहता है। विवेकपूर्वक असत्से सम्बन्धविच्छेद हो जानेपर? रागवाली वस्तुओंके मनसे निकल जानेपर और बुद्धिके तमोगुणमें लीन हो जानेपर जो सुख होता है? वह उसी सुखका आभास है। तात्पर्य यह हुआ कि संसारसे विवेकपूर्वक विमुख होनेपर सात्त्विक सुख? भीतरसे वस्तुओंके निकलनेपर राजस सुख और मूढ़तासे निद्राआलस्यमें संसारको भूलनेपर तामस सुख होता है परन्तु वास्तविक सुख तो प्रकृतिजन्य पदार्थोंसे सर्वथा सम्बन्धविच्छेदसे ही होता है। इन सुखोंमें जो प्रियता? आकर्षण और (सुखका) भोग है? वही पारमार्थिक उन्नतिमें बाधा देनेवाला और पतन करनेवाला है। इसलिये पारमार्थिक उन्नति चाहनेवाले साधकोंको इन तीनों सुखोंसे सम्बन्धविच्छेद करना अत्यन्त आवश्यक है। सम्बन्ध -- बीसवेंसे उन्तालीसवें श्लोकतक भगवान्ने गुणोंकी मुख्यताको लेकर ज्ञान? कर्म आदिके तीनतीन भेद बताये। अब इनके सिवाय गुणोंको लेकर सृष्टिकी सम्पूर्ण वस्तुओंके भी तीनतीन भेद होते हैं -- इसका लक्ष्य कराते हुए भगवान् आगेके श्लोकमें प्रकरणका उपसंहार करते हैं।
Translation · Hindi
।।18.39।।निद्रा, आलस्य और प्रमादसे उत्पन्न होनेवाला जो सुख आरम्भमें और परिणाममें अपनेको मोहित करनेवाला है, वह सुख तामस कहा गया है।
न तदस्ति पृथिव्यां वा दिवि देवेषु वा पुनः।
सत्त्वं प्रकृतिजैर्मुक्तं यदेभिः स्यात्त्रिभिर्गुणैः ॥
Commentary · Hindi
।।18.40।। व्याख्या -- [इस अध्यायके आरम्भमें अर्जुनने संन्यास और त्यागका तत्त्व जानना चाहा तो भगवान्ने पहले त्याग -- कर्मयोगका वर्णन किया। उस प्रकरणका उपसंहार करते हुए भगवान्ने कहा कि जो त्यागी नहीं हैं? उनको अनिष्ट? इष्ट और मिश्र -- यह तीन प्रकारका कर्मोंका फल मिलता है और जो संन्यासी हैं? उनको कभी नहीं मिलता। ऐसा कहकर तेरहवें श्लोकसे संन्यास -- सांख्ययोगका प्रकरण आरम्भ करके पहले कर्मोंके होनेमें अधिष्ठानादि पाँच हेतु बताये। सोलहवेंसत्रहवें श्लोकोंमें कर्तृत्व माननेवालोंकी निन्दा और कर्तृत्वका त्याग करनेवालोंकी प्रशंसा की। अठारहवें श्लोकमें कर्मप्रेरणा और कर्मसंग्रहका वर्णन किया। परन्तु जो वास्तविक तत्त्व है? वह न कर्मप्रेरक है और न कर्मसंग्राहक। कर्मप्रेरणा और कर्मसंग्रह तो प्रकृतिके गुणोंके साथ सम्बन्ध रखनेसे ही होते हैं। फिर गुणोंके अनुसार ज्ञान? कर्म? कर्ता? बुद्धि? धृति और सुखके तीनतीन भेदोंका वर्णन किया। सुखका वर्णन करते हुए यह बताया कि प्रकृतिके साथ यत्किञ्चित् सम्बन्ध रखते हुए ऊँचासेऊँचा जो सुख होता है? वह सात्त्विक होता है। परंतु जो स्वरूपका वास्तविक सुख है? वह गुणातीत है? विलक्षण है? अलौकिक है (गीता 6। 21)।सात्त्विक सुखको आत्मबुद्धिप्रसादजम् कहकर भगवान्ने उसको जन्य (उत्पन्न होनेवाला) बताया। जन्य वस्तु नित्य नहीं होती। इसलिये उसको जन्य बतानेका तात्पर्य है कि उस जन्य सुखसे भी ऊपर उठना है अर्थात् प्रकृति और प्रकृतिके तीनों गुणोंसे रहित होकर उस परमात्मतत्त्वको प्राप्त करना है? जो कि सबका अपना स्वाभाविक स्वरूप है। इसलिये कहते हैं -- ]न तदस्ति पृथिव्यां वा दिवि देवेषु वा पुनः -- यहाँ पृथिव्याम् पदसे मृत्युलोक और पृथ्वीके नीचेके अतल? वितल आदि सभी लोकोंका? दिवि पदसे स्वर्ग आदि लोकोंका? देवेषु पदको प्राणिमात्रके उपलक्षणके रूपमें उनउन स्थानोंमें रहनेवाले मनुष्य? देवता? असुर? राक्षस? नाग? पशु? पक्षी? कीट? पतंग? वृक्ष आदि सभी चरअचर प्राणियोंका? और वा पुनः पदोंसे अनन्त ब्रह्माण्डोंका संकेत किया गया है। तात्पर्य यह हुआ कि त्रिलोकी और अनन्त ब्रह्माण्ड तथा उनमें रहनेवाली कोई भी वस्तु ऐसी नहीं है? जो प्रकृतिसे उत्पन्न इन तीनों गुणोंसे रहित हो अर्थात् सबकेसब त्रिगुणात्मक हैं -- सत्त्वं प्रकृतिजैर्मुक्तं यदेभिः स्यात्ित्रभिर्गुणैः।प्रकृति और प्रकृतिका कार्य -- यह सबकासब ही त्रिगुणात्मक और परिवर्तनशील है। इनसे सम्बन्ध जोड़नेसे ही बन्धन होता है और इनसे सम्बन्धविच्छेद करनेसे ही मुक्ति होती है क्योंकि स्वरूप असङ्ग है। स्वरूप स्व है और प्रकृति पर है। प्रकृतिसे सम्बन्ध जुड़ते ही अहंकार पैदा हो जाता है? जो कि पराधीनताको पैदा करनेवाला है। यह एक विचित्र बात है कि अहंकारमें स्वाधीनता मालूम देती है? पर है वास्तवमें पराधीनता कारण कि अहंकारसे प्रकृतिजन्य पदार्थोंमें आसक्ति? कामना आदि पैदा हो जाती है? जिससे पराधीनतामें भी स्वाधीनता दीखने लग जाती है। इसलिये प्रकृतिजन्य गुणोंसे रहित होना आवश्यक है।प्रकृतिजन्य गुणोंमें रजोगुण और तमोगुणका त्याग करके सत्त्वगुण बढ़ानेकी आवश्यकता है। सत्त्वगुणमें भी प्रसन्नता और विवेक तो आवश्यक है परन्तु सात्त्विक सुख और ज्ञानकी आसक्ति नहीं होनी चाहिये क्योंकि सुख और ज्ञानकी आसक्ति बाँधनेवाली है। इसलिये इनकी आसक्तिका त्याग करके सत्त्वगुणसे ऊँचा उठे। इससे ऊँचा उठनेके लिये ही यहाँ गुणोंका प्रकरण आया है।साधकको तो सात्त्विक ज्ञान? कर्म? कर्ता? बुद्धि? धृति और सुख -- इनपर ध्यान देकर इनके अनुरूप अपना जीवन बनाना चाहिये और सावधानीसे राजसतामसका त्याग करना चाहिये। इनका त्याग करनेमें सावधानी ही साधन है। सावधानीसे सब साधन स्वतः प्रकट होते हैं। प्रकृतिसे सम्बन्धविच्छेद करनेमें सात्त्विकता बहुत आवश्यक है। कारण कि इसमें प्रकाश अर्थात् विवेक जाग्रत् रहता है? जिससे प्रकृतिसे मुक्त होनेमें बड़ी सहायता मिलती है। वास्तवमें तो इससे भी असङ्ग होना है। सम्बन्ध -- त्यागके प्रकरणमें भगवान्ने यह बताया कि नियत कर्मोंका त्याग करना उचित नहीं है। उनका मूढ़तापूर्वक त्याग करनेसे वह त्याग तामस हो जाता है शारीरिक क्लेशके भयसे नियत कर्मोंका त्याग करनेसे वह त्याग राजस हो जाता है और फल एवं आसक्तिका त्याग करके नियत कर्मोंको करनेसे वह त्याग सात्त्विक हो जाता है (18। 7 -- 9)। सांख्ययोगकी दृष्टिसे सम्पूर्ण कर्मोंकी सिद्धिमें पाँच हेतु बताते हुए जहाँ सात्त्विक कर्मका वर्णन हुआ है? वहाँ नियत कर्मको कर्तृत्वाभिमानसे रहित? रागद्वेषसे रहित और फलेच्छासे रहित मनुष्यके द्वारा किये जानेका उल्लेख किया है (18। 23)। उन कर्मोंमें किस वर्णके लिये कौनसे कर्म नियत कर्म हैं और उन नियत कर्मोंको कैसे किया जाय -- इसको बतानेके लिये और साथ ही भक्तियोगकी बात बतानेके लिये भगवान् आगेका प्रकरण आरम्भ करते हैं।
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।।18.40।।पृथ्वीमें या स्वर्गमें अथवा देवताओंमें तथा इनके सिवाय और कहीं भी वह ऐसी कोई वस्तु नहीं है, जो प्रकृतिसे उत्पन्न इन तीनों गुणोंसे रहित हो।
ब्राह्मणक्षत्रियविशां शूद्राणां च परन्तप।
कर्माणि प्रविभक्तानि स्वभावप्रभवैर्गुणैः ॥
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।।18.41।। व्याख्या -- ब्राह्मणक्षत्रियविशां शूद्राणां च परंतप -- यहाँ ब्राह्मण? क्षत्रिय और वैश्य -- इन तीनोंके लिये एक पद और शूद्रोंके लिये अलग एक पद देनेका तात्पर्य यह है कि ब्राह्मण? क्षत्रिय और वैश्य -- ये द्विजाति हैं और शूद्र द्विजाति नहीं है। इसलिये इनके कर्मोंका विभाग अलगअलग है और कर्मोंके अनुसार शास्त्रीय अधिकार भी अलगअलग है।कर्माणि प्रविभक्तानि स्वभावप्रभवैर्गुणैः -- मनुष्य जो कुछ भी कर्म करता है? उसके अन्तःकरणमें उस कर्मके संस्कार पड़ते हैं और उन संस्कारोंके अनुसार उसका स्वभाव बनता है। इस प्रकार पहलेके अनेक जन्मोंमें किये हुए कर्मोंके संस्कारोंके अनुसार मनुष्यका जैसा स्वभाव होता है? उसीके अनुसार उसमें सत्त्व? रज और तम -- तीनों गुणोंकी वृत्तियाँ उत्पन्न होती है। इन गुणवृत्तियोंके तारतम्यके अनुसार ही ब्राह्मण? क्षत्रिय? वैश्य और शूद्रके कर्मोंका विभाग किया गया है (गीता 4। 13)। कारण कि मनुष्यमें जैसी गुणवृत्तियाँ होती हैं? वैसा ही वह कर्म करता है।विशेष बात(1) कर्म दो तरहके होते हैं -- (1) जन्मारम्भक कर्म और (2) भोगदायक कर्म। जिन कर्मोंसे ऊँचनीच योनियोंमें जन्म होता है? वे जन्मारम्भक कर्म कहलाते हैं और जिन कर्मोंसे सुखदुःखका भोग होता है? वे भोगदायक कर्म कहलाते हैं। भोगदायक कर्म अनुकूलप्रतिकूल परिस्थितिको पैदा करते हैं? जिसको गीतामें अनिष्ट? इष्ट और मिश्र नामसे कहा गया है (18। 12)।गहरी दृष्टिसे देखा जाय तो मात्र कर्म भोगदायक होते हैं अर्थात् जन्मारम्भक कर्मोंसे भी भोग होता है और भोगदायक कर्मोंसे भी भोग होता है। जैसे? जिसका उत्तम कुलमें जन्म होता है? उसका आदर होता है? सत्कार होता है और जिसका नीच कुलमें जन्म होता है? उसका निरादर होता है? तिरस्कार होता है। ऐसे ही अनुकूल परिस्थितिवालेका आदर होता है और प्रतिकूल परिस्थितिवालेका निरादर होता है। तात्पर्य है कि आदर और निरादररूपसे भोग तो जन्मारम्भक और भोगदायक -- दोनों कर्मोंका होता है। परन्तु जन्मारम्भक कर्मोंसे जो जन्म होता है? उसमें आदरनिरादररूप भोग गौण होता है क्योंकि आदरनिरादर कभीकभी हुआ करते हैं? हरदम नहीं हुआ करते और भोगदायक कर्मोंसे जो अनुकूलप्रतिकूल परिस्थिति आती है? उसमें परिस्थितिका भोग मुख्य होता है क्योंकि परिस्थिति हरदम आती रहती है।भोगदायक कर्मोंका सदुपयोगदुरुपयोग करनेमें मनुष्यमात्र स्वतन्त्र है अर्थात् वह अनुकूलप्रतिकूल परिस्थितिसे सुखीदुःखी भी हो सकता है और उसको साधनसामग्री भी बना सकता है। जो अनुकूलप्रतिकूल परिस्थितिसे सुखीदुःखी होते हैं? वे मूर्ख होते हैं और जो उसको साधनसामग्री बनाते हैं? वे बुद्धिमान् साधक होते हैं। कारण कि मनुष्यजन्म परमात्माकी प्राप्तिके लिये ही मिला है अतः इसमें जो भी अनुकूल या प्रतिकूल परिस्थिति आती है? वह सब साधनसामग्री ही है।अनुकूलप्रतिकूल परिस्थितिको साधनसामग्री बनाना क्या है अनुकूल परिस्थिति आ जाय तो उसको दूसरोंकी सेवामें? दूसरोंके सुखआराममें लगा दे? और प्रतिकूल परिस्थिति आ जाय तो सुखकी इच्छाका त्याग कर दे। दूसरोंकी सेवा करना और सुखेच्छाका त्याग करना -- ये दोनों साधन हैं।(2) शास्त्रोंमें आता है कि पुण्योंकी अधिकता होनेसे जीव स्वर्गमें जाता है और पापोंकी अधिकता होनेसे नरकोंमें जाता है तथा पुण्यपाप समान होनेसे मनुष्य बनता है। इस दृष्टिसे किसी भी वर्ण? आश्रम? देश? वेश आदिका कोई भी मनुष्य सर्वथा पुण्यात्मा या पापात्मा नहीं हो सकता।पुण्यपाप समान होनेपर जो मनुष्य बनता है? उसमें भी अगर देखा जाय तो पुण्यपापोंका तारतम्य रहता है अर्थात् किसीके पुण्य अधिक होते हैं और किसीके पाप अधिक होते हैं (टिप्पणी प0 927)। ऐसे ही गुणोंका विभाग भी है। कुल मिलाकर सत्त्वगुणकी प्रधानतावाले ऊर्ध्वलोकमें जाते हैं? रजोगुणकी प्रधानतावाले मध्यलोक अर्थात् मनुष्यलोकमें आते हैं? और तमोगुणकी प्रधानतावाले अधोगतिमें जाते हैं। इन तीनोंमें भी गुणोंके तारतम्यसे अनेक तरहके भेद होते हैं।सत्त्वगुणकी प्रधानतासे ब्राह्मण? रजोगुणकी प्रधानता और सत्त्वगुणकी गौणतासे क्षत्रिय? रजोगुणकी प्रधानता और तमोगुणकी गौणतासे वैश्य तथा तमोगुणकी प्रधानतासे शूद्र होता है। यह तो सामान्य रीतिसे गुणोंकी बात बतायी। अब इनके अवान्तर तारतम्यका विचार करते हैं -- रजोगुणप्रधान मनुष्योंमें सत्त्वगुणकी प्रधानतावाले ब्राह्मण हुए। इन ब्राह्मणोंमें भी जन्मके भेदसे ऊँचनीच ब्राह्मण माने जाते हैं और परिस्थितिरूपसे कर्मोंका फल भी कई तरहका आता है अर्थात् सब ब्राह्मणोंकी एक समान अनुकूलप्रतिकूल परिस्थिति नहीं आती। इस दृष्टिसे ब्राह्मणयोनिमें भी तीनों गुण मानने पड़ेंगे। ऐसे ही क्षत्रिय? वैश्य और शूद्र भी जन्मसे ऊँचनीच माने जाते हैं और अनुकूलप्रतिकूल परिस्थिति भी कई तरहकी आती है। इसलिये गीतामें कहा गया है कि तीनों लोकोंमें ऐसी कोई भी वस्तु नहीं है? जो तीनों गुणोंसे रहित हो (18। 40)।अब जो मनुष्येतर योनिवाले पशुपक्षी आदि हैं? उनमें भी ऊँचनीच माने जाते हैं जैसे गाय आदि श्रेष्ठ माने जाते हैं और कुत्ता? गधा? सूअर आदि नीच माने जाते हैं। कबूतर आदि श्रेष्ठ माने जाते हैं और कौआ? चील आदि नीच माने जाते हैं। इन सबको अनुकूलप्रतिकूल परिस्थिति भी एक समान नहीं मिलती। तात्पर्य है कि ऊर्ध्वगति? मध्यगति और अधोगतिवालोंमें भी कई तरहके जातिभेद और परिस्थितिभेद होते हैं। सम्बन्ध -- अब भगवान् ब्राह्मणके स्वाभाविक कर्म बताते हैं।
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।।18.41।।हे परंतप ! ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्रोंके कर्म स्वभावसे उत्पन्न हुए तीनों गुणोंके द्वारा विभक्त किये गये हैं।
।।18.42।। व्याख्या -- शमः -- मनको जहाँ लगाना चाहें? वहाँ लग जाय और जहाँसे हटाना चाहें? वहाँसे हट जाय -- इस प्रकार मनके निग्रहको शम कहते हैं।दमः -- जिस इन्द्रियसे जब जो काम करना चाहें? तब वह काम कर लें और जिस इन्द्रियको जब जहाँसे हटाना चाहें? तब वहाँसे हटा लें -- इसी प्रकार इन्द्रियोंको वशमें करना दम है।तपः -- गीतामें शरीर? वाणी और मनके तपका वर्णन आता है (17। 14 -- 16)? उस तपको लेते हुए भी यहाँ वास्तवमें तप का अर्थ है -- अपने धर्मका पालन करते हुए जो कष्ट हो अथवा कष्ट आ जाय? उसको प्रसन्नतापूर्वक सहना अर्थात् कष्टके आनेपर चित्तमें प्रसन्नताका होना।शौचम् -- अपने मन? बुद्धि? इन्द्रियाँ? शरीर आदिको पवित्र रखना तथा अपने खानपान? व्यवहार आदिकी पवित्रता रखना -- इस प्रकार शौचाचारसदाचारका ठीक पालन करनेका नाम शौच है।क्षान्तिः -- कोई कितना ही अपमान करे? निन्दा करे? दुःख दे और अपनेमें उसको दण्ड देनेकी योग्यता? बल? अधिकार भी हो? फिर भी उसको दण्ड न देकर उसके क्षमा माँगे बिना ही उसको प्रसन्नतापूर्वक क्षमा कर देनेका नाम क्षान्ति है।आर्जवम् -- शरीर? वाणी आदिके व्यवहारमें सरलता हो और मनमें छल? कपट? छिपाव आदि दुर्भाव न हों अर्थात् सीधासादापन हो? उसका नाम आर्जव है।ज्ञानम् -- वेद? शास्त्र? पुराण? इतिहास आदिका अच्छी तरह अध्ययन होना और उनके भावोंका ठीक तरहसे बोध होना तथा कर्तव्यअकर्तव्यका बोध होना ज्ञान है। विज्ञानम् -- यज्ञमें स्रुक्? स्रुवा आदि वस्तुओंका किस अवसरपर किस विधिसे प्रयोग करना चाहिये -- इसका अर्थात् यज्ञविधिका तथा अनुष्ठान आदिकी विधिका अनुभव कर लेने (अच्छी तरह करके देख लेने) का नाम विज्ञान है।आस्तिक्यम् -- परमात्मा? वेदादि शास्त्र? परलोक आदिका हृदयमें आदर हो? श्रद्धा हो और उनकी सत्यतामें कभी सन्देह न हो तथा उनके अनुसार अपना आचरण हो? इसका नाम आस्तिक्य है।ब्रह्मकर्म स्वभावजम् -- ये शम? दम आदि ब्राह्मणके स्वाभाविक कर्म (गुण) हैं अर्थात् इन कर्मों(गुणों)को धारण करनेमें ब्राह्मणको परिश्रम नहीं पड़ता।जिन ब्राह्मणोंमें सत्त्वगुणकी प्रधानता है? जिनकी वंशपरम्परा परम शुद्ध है और जिनके पूर्वजन्मकृत कर्म भी शुद्ध हैं? ऐसे ब्राह्मणोंके लिये ही शम? दम आदि गुण स्वाभाविक होते हैं और उनमें किसी गुणके न होनेपर अथवा किसी गुणमें कमी होनेपर भी उसकी पूर्ति करना उन ब्राह्मणोंके लिये सहज होता है।चारों वर्णोंकी रचना गुणोंके तारतम्यसे की गयी है? इसलिये गुणोंके अनुसार उसउस वर्णमें वेवे कर्म स्वाभाविक प्रकट हो जाते हैं और दूसरे कर्म गौण हो जाते हैं। जैसे ब्राह्मणमें सत्त्वगुणकी प्रधानता होनेसे उसमें शम? दम आदि कर्म (गुण) स्वाभाविक आते हैं तथा जीविकाके कर्म गौण हो जाते हैं और दूसरे वर्णोंमें रजोगुण तथा तमोगुणकी प्रधानता होनेसे उन वर्णोंके जीविकाके कर्म भी स्वाभाविक कर्मोंमें सम्मिलित हो जाते हैं। इसी दृष्टिसे गीतामें ब्राह्मणके स्वभावज कर्मोंमें जीविकाके कर्म न कह करके शम? दम आदि कर्म (गुण) ही कहे गये हैं। सम्बन्ध -- अब क्षत्रियके स्वाभाविक कर्म बताते हैं।
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।।18.42।।मनका निग्रह करना इन्द्रियोंको वशमें करना; धर्मपालनके लिये कष्ट सहना; बाहर-भीतरसे शुद्ध रहना; दूसरोंके अपराधको क्षमा करना; शरीर, मन आदिमें सरलता रखना; वेद, शास्त्र आदिका ज्ञान होना; यज्ञविधिको अनुभवमें लाना; और परमात्मा, वेद आदिमें आस्तिक भाव रखना -- ये सब-के-सब ब्राह्मणके स्वाभाविक कर्म हैं।
।।18.43।। व्याख्या -- शौर्यम् -- मनमें अपने धर्मका पालन करनेकी तत्परता हो? धर्ममय युद्ध (टिप्पणी प0 928) प्राप्त होनेपर युद्धमें चोट लगने? अङ्ग कट जाने? मर जाने आदिका किञ्चिन्मात्र भी भय न हो? घाव होनेपर भी मनमें प्रसन्नता और उत्साह रहे तथा सिर कटनेपर भी पहलेजैसे ही अस्त्रशस्त्र चलाता रहे? इसका नाम शौर्य है।तेजः -- जिस प्रभाव या शक्तिके सामने पापीदुराचारी मनुष्य भी पाप? दुराचार करनेमें हिचकते हैं? जिसके सामने लोगोंकी मर्यादाविरुद्ध चलनेकी हिम्मत नहीं होती अर्थात् लोग स्वाभाविक ही मर्यादामें चलते हैं? उसका नाम तेज है।धृतिः -- विपरीतसेविपरीत अवस्थामें भी अपने धर्मसे विचलित न होने और शत्रुओंके द्वारा धर्म तथा नीतिसे विरुद्ध अनुचित व्यवहारसे सताये जानेपर भी धर्म तथा नीतिविरुद्ध कार्य न करके धैर्यपूर्वक उसी मर्यादामें चलनेका नाम धृति है।दाक्ष्यम् -- प्रजापर शासन करनेकी? प्रजाको यथायोग्य व्यवस्थित रखनेकी और उसका संचालन करनेकी विशेष योग्यता? चतुराईका नाम दाक्ष्य है।युद्धे चाप्यपलायनम् -- युद्धमें कभी पीठ न दिखाना? मनमें कभी हार स्वीकार न करना? युद्ध छोड़कर कभी,न भागना -- यह युद्धमें अपलायन है।दानम् -- क्षत्रियलोग दान करते हैं तो देनेमें कमी नहीं रखते? बड़ी उदारतापूर्वक देते हैं। वर्तमानमें दानपुण्य करनेका स्वभाव वैश्योंमें देखनेमें आता है परन्तु वैश्य लोग देनेमें कसाकसी करते हैं अर्थात् इतनेसे ही काम चल जाय तो अधिक क्यों दिया जाय -- ऐसा द्रव्यका लोभ उनमें रहता है। द्रव्यका लोभ रहनेसे धर्मका पालन करनेमें बाधा आ जाती है? कमी आ जाती है? जिससे सात्त्विक दान (गीता 17। 20) देनेमें कठिनता पड़ती है। परन्तु क्षत्रियोंमें दानवीरता होती है। इसलिये यहाँ दान शब्द क्षत्रियोंके स्वभावमें आया है।ईश्वरभावश्च -- क्षत्रियोंमें स्वाभाविक ही शासन करनेकी प्रवृत्ति होती है। लोगोंके नीति? धर्म और मर्यादाविरुद्ध आचरण देखनेपर उनके मनमें स्वाभाविक ही ऐसी बात आती है कि ये लोग ऐसा क्यों कर रहें हैं और उनको नीति? धर्मके अनुसार चलानेकी इच्छा होती है। अपने शासनद्वारा सबको अपनीअपनी मर्यादाके अनुसार चलानेका भाव रहता है। इस ईश्वरभावमें अभिमान नहीं होता क्योंकि क्षत्रियजातिमें नम्रता? सरलता आदि गुण देखनेमें आते हैं। क्षात्रं कर्म स्वभावजम् -- जो मात्र प्रजाकी दुःखोंसे रक्षा करे? उसका नाम क्षत्रिय है -- क्षतात् त्रायत इति क्षत्रियः। उस क्षत्रियके जो स्वाभाविक कर्म हैं? वे क्षात्रकर्म कहलाते हैं। सम्बन्ध -- अब वैश्य और शूद्रके स्वाभाविक कर्म बताते हैं।
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।।18.43।।शूरवीरता, तेज, धैर्य, प्रजाके संचालन आदिकी विशेष चतुरता, युद्धमें कभी पीठ न दिखाना, दान करना और शासन करनेका भाव -- ये सबकेसब क्षत्रियके स्वाभाविक कर्म हैं।
।।18.44।। व्याख्या -- कृषिगौरक्ष्यवाणिज्यं वैश्यकर्म स्वभावजम् -- खेती करना? गायोंकी रक्षा करना? उनकी वंशवृद्धि करना और शुद्ध व्यापार करना -- ये कर्म वैश्यमें स्वाभाविक होते हैं।शुद्ध व्यापार करनेका तात्पर्य है -- जिस देशमें? जिस समय? जिस वस्तुकी आवश्यकता हो? लोगोंके हितकी भावनासे उस वस्तुको (जहाँ वह मिलती हो? वहाँसे ला करके) उसी देशमें पहुँचाना प्रजाकी आवश्यक वस्तुओंके अभावकी पूर्ति कैसे हो? वस्तुओंके अभावमें कोई कष्ट न पाये -- इस भावसे सच्चाईके साथ वस्तुओंका वितरण करना।,भगवान् श्रीकृष्ण (नन्दबाबाको लेकर) अपनेको वैश्य ही मानते हैं (टिप्पणी प0 929)। इसलिये उन्होंने स्वयं गायों और बछड़ोंको चराया। मनु महाराजने वैश्यवृत्तिमें पशूनां रक्षणम् (मनुस्मृति 1। 90) (पशुओंकी रक्षा करना) कहा है? पर यहाँ भगवान् (उपर्युक्त पदोंसे) अपने जातिभाईयोंसे मानो यह कहते हैं कि तुम लोग सब पशुओंका पालन? उनकी रक्षा न कर सको तो कमसेकम गायोंका पालन और उनकी रक्षा जरूर करना। गायोंकी वृद्धि न कर सको तो कोई बात नहीं परन्तु उनकी रक्षा जरूर करना? जिससे हमारा गोधन घट न जाय। इसलिये वैश्यसमाजको चाहिये कि वह गायोंकी रक्षामें अपना तनमनधन लगा दे? उनकी रक्षा करनेमें अपनी शक्ति बचाकर न रखे।गोरक्षासम्बन्धी विशेष बातमनुष्योंके लिये गाय सब दृष्टियोंमें पालनीय है। गायसे अर्थ? धर्म? काम और मोक्ष -- इन चारों पुरुषार्थोंकी सिद्धि होती है। आजके अर्थप्रधान युगमें तो गाय अत्यन्त ही उपयोगी है। गोपालनसे? गायके दूध? घी? गोबर आदिसे धनकी वृद्धि होती है। हमारा देश कृषिप्रधान है। अतः यहाँ खेतीमें जितनी प्रधानता बैलोंकी है? उतनी प्रधानता अन्य किसीकी भी नहीं है। भैंसेके द्वारा भी खेती की जाती है? पर खेतींमें जितना काम बैल कर सकता है? उतना भैंसा नहीं कर सकता। भैंसा बलवान् तो होता है? पर वह धूप सहन नहीं कर सकता। धूपमें,चलनेसे वह जीभ निकाल देता है? जब कि बैल धूपमें भी चलता रहता है। कारण कि भैंसेमें सात्त्विक बल नहीं होता? जबकि बैलमें सात्त्विक बल होता है। बैलोंकी अपेक्षा भैंसे कम भी होते हैं। ऐसे ही ऊँटसे भी खेती की जाती है? पर ऊँट भैंसेसे भी कम होते हैं और बहुत महँगे होते हैं। खेती करनेवाला हरेक आदमी ऊँट नहीं खरीद सकता। आजकल अच्छेअच्छे जवान बैल मारे जानेके कारण बैल भी महँगे हो गये हैं? तो भी वे ऊँटजितने महँगे नहीं हैं। यदि घरोंमें गायें रखी जायँ तो बैल घरोंमें ही पैदा हो जाते हैं? खरीदने नहीं पड़ते। विदेशी गायोंके जो बैल होते हैं? वे खेतीमें काम नहीं आ सकते क्योंकि उनके कन्धे न होनेसे उनपर जुआ नहीं रखा जा सकता।गाय पवित्र होती है। उसके शरीरका स्पर्श करनेवाली हवा भी पवित्र होती है। गायके गोबरगोमूत्र भी पवित्र होते हैं। गोबरसे लिपे हुए घरोंमें प्लेग? हैजा आदि भयंकर बीमारियाँ नहीं आतीं। इसके सिवाय युद्धके समय गोबरसे लिपे हुए मकानोंपर बमका उतना असर नहीं होता? जितना सीमेण्ट आदिसे बने हुए मकानोंपर होता है। गोबरमें जहर खींचनेकी विशेष शक्ति होती है। काशीमें कोई व्यक्ति साँप काटनेसे मर गया। लोग उसकी दाहक्रिया करनेके लिये उसको गङ्गाके किनारे ले गये। वहाँपर एक साधु रहते थे। उन्होंने पूछा कि इस व्यक्तिको क्या हुआ लोगोंने कहा कि यह साँप काटनेसे मरा है।साधुने कहा कि यह मरा नहीं है? तुमलोग गायका गोबर ले आओ। गोबर लाया गया। साधुने उस व्यक्तिकी नासिकाको छोड़कर उसके पूरे शरीरमें (नीचेऊपर) गोबरका लेप कर दिया। आधे घण्टेके बाद गोबरका फिर दूसरा लेप किया। इससे उस व्यक्तिके श्वास चलने लगे और वह जी उठा। हृदयके रोगोंको दूर करनेके लिये गोमूत्र बहुत उपयोगी है। छोटी बछड़ीका गोमूत्र रोज तोलादोतोला पीनेसे पेटके रोग दूर हो जाते हैं। एक सन्तको दमाकी शिकायत थी? उनको गोमूत्रसेवनसे बहुत फायदा हुआ है। आजकल तो गोबर और गोमूत्रसे अनेक रोगोंकी दवाइयाँ बनायी जा रही हैं। गोबरसे गैस भी बनने लगी है।खेतोंमें गोबरगोमूत्रकी खादसे जो अन्न पैदा होता है? वह भी पवित्र होता है। खेतोंमें गायोंके रहनेसे? गोबर और गोमूत्रसे जमीनकी जैसी पुष्टि होती है? वैसी पुष्टि विदेशी रासायनिक खादोंसे नहीं होती। जैसे? एक बार अंगूरकी खेती करनेवालेने बताया कि गोबरकी खाद डालनेसे अंगूरके गुच्छे जितने बड़ेबड़े होते हैं? उतने विदेशी खाद डालनेसे नहीं होते। विदेशी खाद डालनेसे कुछ ही वर्षोंमें जमीन खराब हो जाती है अर्थात् उसकी उपजाऊशक्ति नष्ट हो जाती है। परन्तु गोबरगोमूत्रसे जमीनकी उपजाऊशक्ति ज्योंकीत्यों बनी रहती है। विदेशोंमें रासायनिक खादसे बहुतसे खेत खराब हो गये हैं? जिन्हें उपजाऊ बनानेके लिये वे लोग भारतसे गोबर मँगवा रहे हैं और भारतसे गोबरके जहाज भरकर विदेशोंमें जा रहे हैं।हमारे देशकी गायें सौम्य और सात्त्विक होती हैं। अतः उनका दूध भी सात्त्विक होता है? जिसको पीनेसे बुद्धि तीक्ष्ण होती है और स्वभाव शान्ति? सौम्य होता है। विदेशी गायोंका दूध तो ज्यादा होता है? पर उन गायोंमें गुस्सा बहुत होता है। अतः उनका दूध पीनेसे मनुष्यका स्वभाव क्रूर होता है। भैंसका दूध भी ज्यादा होता है? पर वह दूध सात्त्विक नहीं होता। उससे सात्त्विक बल नहीं आता। सैनिकोंके घोड़ोंको गायका दूध पिलाया जाता है? जिससे वे घोड़े बहुत तेज होते हैं। एक बार सैनिकोंने परीक्षाके लिये कुछ घोड़ोंको भैंसका दूध पिलाया? जिससे घोड़े खूब मोटे हो गये। परन्तु जब नदी पार करनेका काम पड़ा तो वे घोड़े पानीमें बैठ गये। भैंस पानीमें बैठा करती है अतः वही स्वभाव घोड़ोंमें भी आ गया। ऊँटनीका दूध भी निकलता है? पर उस दूधका दही? मक्खन होता ही नहीं। उसका दूध तामसी होनेसे दुर्गति देनेवाला होता है। स्मृतियोंमें ऊँट? कुत्ता? गधा आदिको अस्पृश्य बताया गया है।सम्पूर्ण धार्मिक कार्योंमें गायकी मुख्यता है। जातकर्म? चूड़ाकर्म? उपनयन आदि सोलह संस्कारोंमें गायका? उसके दूध? घी? गोबर आदिका विशेष सम्बन्ध रहता है। गायके घीसे ही यज्ञ किया जाता है। स्थानशुद्धिके लिये गोबर का ही चौका लगाया जाता है। श्राद्धकर्ममें गायके दूधकी खीर बनायी जाती है। नरकोंसे,बचनेके लिये गोदान किया जाता है। धार्मिक कृत्योंमें पञ्चगव्य काममें लाया जाता है? जो गायके दूध? दही? घी? गोबर और गोमूत्र -- इन पाँचोंसे बनता है।कामनापूर्तिके लिये किये जानेवाले यज्ञोंमें गायका घी आदि काममें आता है। रघुवंशके चलनेमें गायकी ही प्रधानता थी। पौष्टिक? वीर्यवर्धक चीजोंमें भी गायके दूध और घीका मुख्य स्थान है।निष्कामभावसे गायकी सेवा करनेसे मुक्ति होती है। गायकी सेवा करनेमात्रसे अन्तःकरण निर्मल होता है। भगवान् श्रीकृष्णने भी बिना जूतीके गोचारणकी लीला की थी? इसलिये उनका नाम गोपाल पड़ा। प्राचीनकालमें ऋषिलोग वनमें रहते हुए अपने पास गाय रखा करते थे। गायके दूध? घीसे उनकी बुद्धि प्रखर? विलक्षण होती थी? जिससे वे बड़ेबड़े ग्रन्थोंकी रचना किया करते थे। आजकल तो उन ग्रन्थोंको ठीकठीक समझनेवाले भी कम हैं। गायके दूधघीसे वे दीर्घायु होते थे। इसलिये गायके घीका एक नाम आयु भी है। बड़ेबड़े राजालोग भी उन ऋषियोंके पास आते थे और उनकी सलाहसे राज्य चलाते थे।गोरक्षाके लिये बलिदान करनेवालोंकी कथाओंसे इतिहास? पुराण भरे पड़े हैं। बड़े भारी दुःखकी बात है कि आज हमारे देशमें पैसोंके लोभसे रोजाना हजारोंकी संख्यामें गायोंकी हत्या की जा रही है अगर इसी तरह गोहत्या चलती रही तो एक समय गोवंश समाप्त हो जायगा। जब गायें नहीं रहेंगी? तब क्या दशा होगी? कितनी आफतें आयेंगी -- इसका अन्दाजा नहीं लगाया जा सकता। जब गायें खत्म हो जायेंगी? तब गोबर नहीं रहेगा और गोबरकी खाद न रहनेसे जमीन भी उपजाऊ नहीं रहेगी। जमीनके उपजाऊ न रहनेसे खेती कैसे होगी खेती न होनेसे अन्न तथा वस्त्र (कपास) कैसे मिलेगा लोगोंको शरीरनिर्वाहके लिये अन्नजल और वस्त्र भी मिलना मुश्किल हो जायगा। गाय और उसके दूध? घी? गोबर आदिके न रहनेसे प्रजा बहुत दुःखी हो जायगी। गोधनके अभावमें देश पराधीन और दुर्बल हो जायगा। वर्तमानमें भी अकाल? अनावृष्टि? भूकम्प? आपसी कलह आदिके होनेमें गायोंकी हत्या मुख्य कारण है। अतः अपनी पूरी शक्ति लगाकर हर हालतमें गायोंकी रक्षा करना? उनको कत्लखानोंमें जानेसे रोकना हमारा परम कर्तव्य है।गायोंकी रक्षाके लिये भाईबहनोंको चाहिये कि वे गायोंका पालन करें? उनको अपने घरोंमें रखें। गायका ही दूधघी खायें? भैंस आदिका नहीं। घरोंमें गोबरगैसका प्रयोग किया जाय। गायोंकी रक्षाके उद्देश्यसे ही गोशालाएँ बनायी जाएँ? दूधके उद्देश्यसे नहीं। जितनी गोचरभूमियाँ हैं? उनकी रक्षा की जाय तथा सरकारसे और गोचरभूमियाँ छुड़ाई जायँ। सरकारकी गोहत्यानितिका विरोध किया जाय और सरकारसे अनुरोध किया जाय कि वह देशकी रक्षाके लिये पूरे देशमें तत्काल पूर्णरूपसे गोहत्या बन्द करे।परिचर्यात्मकं कर्म शूद्रस्यापि स्वभावजम् -- चारों वर्णोंकी सेवा करना? सेवाकी सामग्री तैयार करना और चारों वर्णोंके कार्योंमें कोई बाधा? अड़चन न आये? सबको सुखआराम हो -- इस भावसे अपनी बुद्धि? योग्यता? बलके द्वारा सबकी सेवा करना शूद्रका स्वाभाविक कर्म है।यहाँ एक शङ्का पैदा होती है कि भगवान्ने चारों वर्णोंकी उत्पत्तिमें सत्त्व? रज और तम -- इन तीन गुणोंको कारण बताया। उसमें तमोगुणकी प्रधानतासे शूद्रकी उत्पत्ति बतायी और गीतामें जहाँ तमोगुणका वर्णन हुआ है? वहाँपर उसके अज्ञान? प्रमाद? आलस्य? निद्रा? अप्रकाश? अप्रवृत्ति और मोह -- ये सात अवगुण बताये हैं (गीता 14। 8 13। 17)। अतः ऐसे तमोगुणकी प्रधानतावाले शूद्रसे सेवा कैसे होगी क्योंकि वह आलस्य? प्रमाद आदिमें पड़ा रहेगा तो सेवा कैसे कर सकेगा सेवा बहुत ऊँचे दर्जेकी चीज है। ऐसे ऊँचे कर्मका भगवान्ने शूद्रके लिये कैसे विधान कियायदि इस शङ्कापर गुणोंकी दृष्टिसे विचार किया जाय तो गीतामें आया है कि सत्त्वगुणवाले ऊँचे लोकोंमें जाते हैं? रजोगुणवाले मरकर पीछे मध्यलोक अर्थात् मृत्युलोकमें जाते हैं और तमोगुणवाले अधोगतिमें जाते हैं (गीता 14। 18)। इसमें भी वास्तवमें न देखा जाय तो रजोगुणके बढ़नेपर जो मरता है? वह कर्मप्रधान मनुष्ययोनिमें जन्म लेता है -- रजसि प्रलयं गत्वा कर्मसङ्गिषु जायते (गीता 14। 15)। इन सबका तात्पर्य यह हुआ कि मनुष्यमात्र रजःप्रधान (रजोगुणकी प्रधानतावाला) है। रजःप्रधानवालोंमें जो सात्त्विक? राजस और तामस -- तीन गुण होते हैं? उन तीनों गुणोंसे ही चारों वर्णोंकी रचना की गयी है। इसलिये कर्म करना सबमें मुख्य होता है और इसीको लेकर मनुष्योंको कर्मयोनि कहा गया है तथा गीतामें भी चारों वर्णोंके कर्मोंके लिये स्वभावज कर्म? स्वभावनियत कर्म आदि पद आये हैं। अतः शूद्रका परिचर्या अर्थात् सेवा करना स्वभावज कर्म है? जिसमें उसे परिश्रम नहीं होता।मनुष्यमात्र कर्मयोनि होनेपर भी ब्राह्मण? क्षत्रिय और वैश्यमें विवेकविचारका विशेष तारतम्य रहता है और शुद्धि भी रहती है परन्तु शूद्रमें मोहकी प्रधानता रहनेसे उसमें विवेक बहुत दब जाता है। इस दृष्टिसे शूद्रके सेवाकर्ममें विवेककी प्रधानता न होकर आज्ञापालनकी प्रधानता रहती है -- अग्या सम न सुसाहिब सेवा (मानस 2। 301। 2)। इसलिये चारों वर्णोंकी आज्ञाके अनुसार सेवा करना? सुखसुविधा जुटा देना शूद्रके लिये स्वाभाविक होता है।शुद्रोंके कर्म परिचर्यात्मक अर्थात् सेवास्वरूप होते हैं। उनके शारीरिक? सामाजिक? नागरिक? ग्रामणिक आदि सबकेसब कर्म ठीक तरहसे सम्पन्न होते हैं? जिनसे चारों ही वर्णोंके जीवननिर्वाहके लिये सुखसुविधा? अनुकूलता और आवश्यकताकी पूर्ति होती है।स्वाभाविक कर्मोंका तात्पर्यचेतन जीवात्मा और जड प्रकृति -- दोनोंका स्वभाव भिन्नभिन्न है। चेतन स्वाभाविक ही निर्विकार अर्थात् परिवर्तनरहित है और प्रकृति स्वाभाविक ही विकारी अर्थात् परिवर्तनशील है। अतः इन दोनोंका स्वभाव भिन्नभिन्न होनेसे इनका सम्बन्ध स्वाभाविक नहीं है किंतु चेतनने प्रकृतिके साथ अपना सम्बन्ध मानकर उस सम्बन्धकी सद्भावना कर ली है अर्थात् सम्बन्ध है ऐसा मान लिया है। इसीको गुणोंका सङ्ग कहते हैं? जो जीवात्माके अच्छीबुरी योनियोंमें जन्म लेनेका कारण है -- कारणं गुणसङ्गोस्य सदसद्योनिजन्मसु (गीता 13। 21)। इस सङ्गके कारण? गुणोंके तारतम्यसे जीवका ब्राह्मणादि वर्णमें जन्म होता है। गुणोंके तारतम्यसे जिस वर्णमें जन्म होता है? उन गुणोंके अनुसार ही उस वर्णके कर्म स्वाभाविक? सहज होते हैं जैसे -- ब्राह्मणके लिये शम? दम आदि क्षत्रियके लिये शौर्य? तेज आदि वैश्यके लिये खेती? गौरक्षा आदि और शूद्रके लिये सेवा -- ये कर्म स्वतःस्वाभाविक होते हैं। तात्पर्य है कि चारों वर्णोंको इन कर्मोंको करनेमें परिश्रम नहीं होता क्योंकि गुणोंके अनुसार स्वभाव और स्वभावके अनुसार उनके लिये कर्मोंका विधान है। इसलिये इन कर्मोंमें उनकी स्वाभाविक ही रुचि होती है। मनुष्य इन स्वाभाविक कर्मोंको जब अपने लिये अर्थात् अपने स्वार्थ? भोग और आरामके लिये करता है? तब वह उन कर्मोंसे बँध जाता है। जब उन्हीं कर्मोंको स्वार्थ और अभिमानका त्याग करके निष्कामभावपूर्वक संसारके हितके लिये करता है? तब कर्मयोग हो जाता है? और उन्हीं कर्मोंसे सब संसारमें व्यापक परमात्माका पूजन करता है अथवा भगवत्परायण होकर केवल भगवत्सम्बन्धी कर्म (जप? ध्यान? सत्सङ्ग? स्वाध्याय आदि) करता है? तब वह भक्तियोग हो जाता है। फिर प्रकृतिके गुणोंका सर्वथा सम्बन्धविच्छेद हो जानेपर केवल एक परमात्मतत्त्व ही रह जाता है? जिसमें सिद्ध महापुरुषके स्वरूपकी स्वतःसिद्ध स्वतन्त्रता? अखण्डता? निर्विकारताकी अनुभूति रह जाती है। ऐसा होनेपर भी उसके शरीर? मन? बुद्धि और इन्द्रियोंके द्वारा अपनेअपने वर्ण? आश्रमकी मर्यादाके अनुसार निर्लिप्ततापूर्वक शास्त्रविहित कर्म स्वाभाविक होते हैं? जो कि संसारमात्रके लिये आदर्श होते हैं। प्रभुकी तरफ आकृष्ट होनेसे प्रतिक्षण प्रेम बढ़ता रहता है? जो अनन्त आनन्दस्वरूप है।जाति जन्मसे मानी जाय या कर्मसे ऊँचनीच योनियोंमें जितने भी शरीर मिलते हैं? वे सब गुण और कर्मके अनुसार ही मिलते हैं। गुण और कर्मके अनुसार ही मनुष्यका जन्म होता है इसलिये मनुष्यकी जाति जन्मसे ही मानी जाती है। अतः स्थूलशरीरकी दृष्टिसे विवाह? भोजन आदि कर्म जन्मकी प्रधानतासे ही करने चाहिये अर्थात् अपनी जाति या वर्णके अनुसार ही भोजन? विवाह आदि कर्म होने चाहिये।दूसरी बात? जिस प्राणीका सांसारिक भोग? धन? मान? आराम? सुख आदिका उद्देश्य रहता है? उसके लिये वर्णके अनुसार कर्तव्यकर्म करना और वर्णकी मर्यादामें चलना आवश्यक हो जाता है। यदि वह वर्णकी मर्यादामें नहीं चलता? तो उसका पतन हो जाता है (टिप्पणी प0 932)। परन्तु जिसका उद्देश्य केवल परमात्मा ही है? संसारके भोग आदि नहीं? उसके लिये सत्सङ्ग? स्वाध्याय? जप? ध्यान? कथा? कीर्तन? परस्पर विचारविनिमय आदि भगवत्सम्बन्धी काम मुख्य होते हैं। तात्पर्य है कि परमात्माकी प्राप्तिमें प्राणीके पारमार्थिक भाव? आचरण आदिकी मुख्यता है? जाति या वर्णकी नहीं।तीसरी बात? जिसका उद्देश्य परमात्माकी प्राप्तिका है? वह भगवत्सम्बन्धी कार्योंको मुख्यतासे करते हुए भी वर्णआश्रमके अनुसार अपने कर्तव्यकर्मोंको पूजनबुद्धिसे केवल भगवत्प्रीत्यर्थ ही करता है।आगे छियालीसवें श्लोकमें भगवान्ने बड़ी श्रेष्ठ बात बतायी है कि जिससे सम्पूर्ण संसार पैदा हुआ है और जिससे सम्पूर्ण संसार व्याप्त है? उस परमात्माका ही लक्ष्य रखकर? उसके प्रीत्यर्थ ही पूजनरूपसे अपनेअपने वर्णके अनुसार कर्म किये जायँ। इसमें मनुष्यमात्रका अधिकार है। देवता? असुर? पशु? पक्षी आदिका स्वतः अधिकार नहीं है परन्तु उनके लिये भी परमात्माकी तरफसे निषेध नहीं है। कारण कि सभी परमात्माका अंश होनेसे परमात्माकी प्राप्तिके सभी अधिकारी हैं। प्राणिमात्रका भगवान्पर पूरा अधिकार है। इससे भी यह सिद्ध होता है कि आपसके व्यवहारमें अर्थात् रोटी? बेटी और शरीर आदिके साथ बर्ताव करनेमें तो जन्म की प्रधानता है और परमात्माकी प्राप्तिमें भाव? विवेक और कर्म की प्रधानता है। इसी आशयको लेकर भागवतकारने कहा है कि जिस मनुष्यके वर्णको बतानेवाला जो लक्षण कहा गया है? वह यदि दूसरे वर्णवालेमें भी मिले तो उसे भी उसी वर्णका समझ लेना चाहिये (टिप्पणी प0 933.1)। अभिप्राय यह है कि ब्राह्मणके शमदम आदि जितने लक्षण हैं? वे लक्षण या गुण स्वाभाविक ही किसीमें हों तो जन्ममात्रसे नीचा होनेपर भी उसको नीचा नहीं मानना चाहिये। ऐसे ही महाभारतमें युधिष्ठिर और नहुषके संवादमें आया है कि जो शूद्र आचरणोंमें श्रेष्ठ है? उस शूद्रको शूद्र नहीं मानना चाहिये और जो ब्राह्मण ब्राह्मणोचित कर्मोंसे रहित है? उस ब्राह्मणको ब्राह्मण नहीं मानना चाहिये (टिप्पणी प0 933.2) अर्थात् वहाँ कर्मोंकी ही प्रधानता ली गयी है? जन्मकी नहीं।शास्त्रोंमें जो ऐसे वचन आते हैं? उन सबका तात्पर्य है कि कोई भी नीच वर्णवाला साधारणसेसाधारण मनुष्य अपनी पारमार्थिक उन्नति कर सकता है? इसमें संदेहकी कोई बात नहीं है। इतना ही नहीं? वह उसी वर्णमें रहता हुआ शम? दम आदि जो सामान्य धर्म हैं? उनका साङ्गोपाङ्ग पालन करता हुआ अपनी श्रेष्ठताको प्रकट कर सकता है। जन्म तो पूर्वकर्मोंके अनुसार हुआ है? इसमें वह बेचारा क्या कर सकता है परन्तु वहीं (नीच वर्णमें) रहकर भी वह अपनी नयी उन्नति कर सकता है। उस नयी उन्नतिमें प्रोत्साहित करनेके लिये ही शास्त्रवचनोंका आशय मालूम देता है कि नीच वर्णवाला भी नयी उन्नति करनेमें हिम्मत न हारे। जो ऊँचे वर्णवाला होकर भी वर्णोचित काम नहीं करता? उसको भी अपने वर्णोचित काम करनेके लिये शास्त्रोंमें प्रोत्साहित किया है जैसे -- ब्राह्मणस्य हि देहोऽयं क्षुद्रकामाय नेष्यते।(श्रीमद्भा0 11। 17। 42) जिन ब्राह्मणोंका खानपान? आचरण सर्वथा भ्रष्ट है? उन ब्राह्मणोंका वचनमात्रसे भी आदर नहीं करना चाहिये -- ऐसा स्मृतिमें आया है (मनु0 4। 30। 192)। परन्तु जिनके आचरण श्रेष्ठ हैं? जो भगवान्के भक्त हैं? उन ब्राह्मणोंकी भागवत आदि पुराणोंमें और महाभारत? रामायण आदि इतिहासग्रन्थोंमें बहुत महिमा गायी गयी है।भगवान्का भक्त चाहे कितनी ही नीची जातिका क्यों न हो? वह भक्तिहीन विद्वान् ब्राह्मणसे श्रेष्ठ है (टिप्पणी प0 933.3)।ब्राह्मणको विराट्रूप भगवान्का मुख? क्षत्रियको हाथ? वैश्यको ऊरु (मध्यभाग) और शूद्रको पैर बताया गया है। ब्राह्मणको मुख बतानेका तात्पर्य है कि उनके पास ज्ञानका संग्रह है? इसलिये चारों वर्णोंको पढ़ाना? अच्छी शिक्षा देना और उपदेश सुनाना -- यह मुखका ही काम है। इस दृष्टिसे ब्राह्मण ऊँचे माने गये।क्षत्रियको हाथ बतानेका तात्पर्य है कि वे चारों वर्णोंकी शत्रुओंसे रक्षा करते हैं। रक्षा करना मुख्यरूपसे हाथोंका ही काम है जैसे -- शरीरमें फोड़ाफुंसी आदि हो जाय तो हाथोंसे ही रक्षा की जाती है शरीरपर चोट आती हो तो रक्षाके लिये हाथ ही आड़ देते हैं? और अपनी रक्षाके लिये दूसरोंपर हाथोंसे ही चोट पहुँचायी जाती है आदमी कहीं गिरता है तो पहले हाथ ही टिकते हैं। इसलिये क्षत्रिय हाथ हो गये। अराजकता फैल जानेपर तो जन? धन? आदिकी रक्षा करना चारों वर्णोंका धर्म हो जाता है।वैश्यको मध्यभाग कहनेका तात्पर्य है कि जैसे पेटमें अन्न? जल? औषध आदि डाले जाते हैं तो उनसे शरीरके सम्पूर्ण अवयवोंको खुराक मिलती है और सभी अवयव पुष्ट होते हैं? ऐसे ही वस्तुओंका संग्रह करना? उनका यातायात करना? जहाँ जिस चीजकी कमी हो वहाँ पहुँचाना? प्रजाको किसी चीजका अभाव न होने देना वैश्यका काम है। पेटमें अन्नजलका संग्रह सब शरीरके लिये होता है और साथमें पेटको भी पुष्टि मिल जाती है क्योंकि मनुष्य केवल पेटके लिये पेट नहीं भरता। ऐसे ही वैश्य केवल दूसरोंके लिये ही संग्रह करे? केवल अपने लिये नहीं। वह ब्राह्मण आदिको दान देता है? क्षत्रियोंको टैक्स देता है? अपना पालन करता है और शूद्रोंको मेहनताना देता है। इस प्रकार वह सबका पालन करता है। यदि वह संग्रह नहीं करेगा? कृषि? गौरक्ष्य और वाणिज्य नहीं करेगा तो क्या देगाशूद्रको चरण बतानेका तात्पर्य है कि जैसे चरण सारे शरीरको उठाये फिरते हैं और पूरे शरीरकी सेवा चरणोंसे ही होती है? ऐसे ही सेवाके आधारपर ही चारों वर्ण चलते हैं। शूद्र अपने सेवाकर्मके द्वारा सबके आवश्यक कार्योंकी पूर्ति करता है।उपर्युक्त विवेचनमें एक ध्यान देनेकी बात है कि गीतामें चारों वर्णोंके उन स्वाभाविक कर्मोंका वर्णन है? जो कर्म स्वतः होते हैं अर्थात् उनको करनेमें अधिक परिश्रम नहीं पड़ता। चारों वर्णोंके लिये और भी दूसरे कर्मंका विधान है? उनको स्मृतिग्रन्थोंमें देखना चाहिये और उनके अनुसार अपने आचरण बनाने चाहिये (गीता 16। 24)।वर्तमानमें चारों वर्णोंमें गड़बड़ी आ जानेपर भी यदि चारों वर्णोंके समुदायोंको इकट्ठा करके अलगअलग समुदायमें देखा जाय तो ब्राह्मणसमुदायमें शम? दम आदि गुण जितने अधिक मिलेंगे? उतने क्षत्रिय? वैश्य और शूद्रसमुदायमें नहीं मिलेंगे। क्षत्रियसमुदायमें शौर्य? तेज आदि गुण जितने अधिक मिलेंगे? उतने ब्राह्मण? वैश्य और शूद्रसमुदायमें नहीं मिलेंगे। वैश्यसमुदायमें व्यापार करना? धनका उपार्जन करना? धनको पचाना (धनका भभका ऊपरसे न दीखने देना) आदि गुण जितने अधिक मिलेंगे? उतने ब्राह्मण? क्षत्रिय और शूद्रसमुदायमें नहीं मिलेंगे। शूद्रसमुदायमें सेवा करनेकी प्रवृत्ति जितनी अधिक मिलेगी? उतनी ब्राह्मण? क्षत्रिय और वैश्यसमुदायमें नहीं मिलेगी। तात्पर्य यह है कि आज सभी वर्ण मर्यादारहित और उच्छृङ्खल होनेपर भी उनके स्वभावज कर्म उनके समुदायोंमें विशेषतासे देखनेमें आते हैं अर्थात् यह चीज व्यक्तिगत न,दीखकर समुदायगत देखनेमें आती है।जो लोग शास्त्रके गहरे रहस्यको नहीं जानते? वे कह देते हैं कि ब्राह्मणोंके हाथमें कलम रही? इसलिये उन्होंने ब्राह्मण सबसे श्रेष्ठ है ऐसा लिखकर ब्राह्मणोंको सर्वोच्च कह दिया। जिनके पास राज्य था? उन्होंने ब्राह्मणोंसे कहा -- क्यों महाराज हमलोग कुछ नहीं हैं क्या तो ब्राह्मणोंने कह दिया -- नहींनहीं? ऐसी बात नहीं। आपलोग भी हैं? आपलोग दो नम्बरमें हैं। वैश्योंने ब्राह्मणोंसे कहा -- क्यों महाराज हमारे बिना कैसे जीविका चलेगी आपकी ब्राह्मणोंने कहा -- हाँ? हाँ? आपलोग तीसरे नम्बरमें हैं। जिनके पास न राज्य था? न धन था? वे ऊँचे उठने लगे तो ब्राह्मणोंने कह दिया -- आपके भाग्यमें राज्य और धन लिखा नहीं है। आपलोग तो इन ब्राह्मणों? क्षत्रियों और वैश्योंकी सेवा करो। इसलिये चौथे नम्बरमें आप लोग हैं। इस तरह सबको भुलावेमें डालकर विद्या? राज्य और धनके प्रभावसे अपनी एकता करके चौथे वर्णको पददलित कर दिया -- यह लिखनेवालोंका अपना स्वार्थ और अभिमान ही है।इसका समाधान यह है कि ब्राह्मणोंने कहीं भी अपने ब्राह्मणधर्मके लिये ऐसा नहीं लिखा है कि ब्राह्मण सर्वोपरि हैं? इसलिये उनको बड़े आरामसे रहना चाहिये? धनसम्पत्तिसे युक्त होकर मौज करनी चाहिये इत्यादि? प्रत्युत ब्राह्मणोंके लिये ऐसा लिखा है कि उनको त्याग करना चाहिये? कष्ट सहना चाहिये तपश्चर्या करनी चाहिये। गृहस्थमें रहते हुए भी उनको धनसंग्रह नहीं करना चाहिये? अन्नका संग्रह भी थोड़ा ही होना चाहिये -- कुम्भीधान्य अर्थात् एक घड़ा भरा हुआ अनाज हो? लौकिक भोगोंमें आसक्ति नहीं होनी चाहिये? और जीवननिर्वाहके लिये किसीसे दान भी लिया जाय तो उसका काम करके अर्थात् यज्ञ? होम? जप? पाठ आदि करके ही लेना चाहिये। गोदान आदि लिया जाय तो उसका प्रायश्चित्त करना चाहिये।यदि कोई ब्राह्मणको श्राद्धका निमन्त्रण देना चाहे तो वह श्राद्धके पहले दिन दे? जिससे ब्राह्मण उसके पितरोंका अपनेमें आवाहन करके रात्रिमें ब्रह्मचर्य और संयमपूर्वक रह सके। दूसरे दिन वह यजमानके पितरोंका पिण्डदान? तर्पण ठीक विधिविधानसे करवाये। उसके बाद वहाँ भोजन करे। निमन्त्रण भी एक ही यजमानका स्वीकार करे और भोजन भी एक ही घरका करे। श्राद्धका अन्न खानेके बाद गायत्रीजप आदि करके शुद्ध होना चाहिये। दान लेना? श्राद्धका भोजन करना ब्राह्मणके लिये ऊँचा दर्जा नहीं है। ब्राह्मणका ऊँचा दर्जा त्यागमें है। वे केवल यजमानके पितरोंका कल्याण भावनासे ही श्राद्धका भोजन और दक्षिणा स्वीकार करते हैं? स्वार्थकी भावनासे नहीं अतः यह भी उनका त्याग ही है।ब्राह्मणोंने अपनी जीविकाके लिये ऋत? अमृत? मृत? सत्यानृत और प्रमृत -- ये पाँच वृत्तियाँ बतायी हैं (टिप्पणी प0 935.1) --,(1) ऋतवृत्ति सर्वोच्च वृत्ति मानी गयी है। इसको शिलोञ्छ या कपोतवृत्ति भी कहते हैं। खेती करनेवाले खेतमेंसे धान काटकर ले जायँ? उसके बाद वहाँ जो अन्न (ऊमी? सिट्टा आदि) पृथ्वीपर गिरा पड़ा हो? वह भूदेवों (ब्राह्मणों) का होता है अतः उनको चुनकर अपना निर्वाह करना शिलोञ्छवृत्ति है अथवा धान्यमण्डीमें जहाँ धान्य तौला जाता है? वहाँ पृथ्वीपर गिरे हुए दाने भूदेवोंके होते हैं अतः उनको चुनकर जीवननिर्वाह करना कपोतवृत्ति है।(2) बिना याचना किये और बिना इशारा किये कोई यजमान आकर देता है तो निर्वाहमात्रकी वस्तु लेना अमृतवृत्ति है। इसको अयाचितवृत्ति भी कहते हैं।(3) सुबह भिक्षाके लिये गाँवमें जाना और लोगोंको वार? तिथि? मुहूर्त आदि बताकर (इस रूपमें काम करके) भिक्षामें जो कुछ मिल जाय? उसीसे अपना जीवननिर्वाह करना मृतवृत्ति है।(4) व्यापार करके जीवननिर्वाह करना सत्यानृतवृत्ति है।(5) उपर्युक्त चारों वृत्तियोंसे जीवननिर्वाह न हो तो खेती करे? पर वह भी कठोर विधिविधानसे करे जैसे -- एक बैलसे हल न चलाये? धूपके समय हल न चलाये आदि? यह प्रमृतवृत्ति है।उपर्युक्त वृत्तियोंमेंसे किसी भी वृत्तिसे निर्वाह किया जाय? उसमें पञ्चमहायज्ञ? अतिथिसेवा करके यज्ञशेष भोजन करना चाहिये (टिप्पणी प0 935.2)।श्रीमद्भगवद्गीतापर विचार करते हैं तो ब्राह्मणके लिये पालनीय जो नौ स्वाभाविक धर्म बताये गये हैं? उनमें जीविका पैदा करनेवाला एक भी धर्म नहीं है। क्षत्रियके लिये सात स्वाभाविक धर्म बताये हैं। उनमें युद्ध करना और शासन करना -- ये दो धर्म कुछ जीविका पैदा करनेवाले हैं। वैश्यके लिये तीन धर्म बताये हैं -- खेती? गोरक्षा और व्यापार ये तीनों ही जीविका पैदा करनेवाले हैं। शूद्रके लिये एक सेवा ही धर्म बताया है? जिसमें पैदाहीपैदा होती है। शूद्रके लिये खानपान? जीवननिर्वाह आदिमें भी बहुत छूट दी गयी है।भगवान्ने स्वे स्वे कर्मण्यभिरतः संसिद्धिं लभते नरः (गीता 18। 45) पदोंसे कितनी विचित्र बात बतायी है कि शम? दम आदि नौ धर्मोंके पालनसे ब्राह्मणका जो कल्याण होता है? वही कल्याण शौर्य? तेज आदि सात धर्मोंके पालनसे क्षत्रियका होता है? वही कल्याण खेती? गोरक्षा और व्यापारके पालनसे वैश्य होता है और वही कल्याण केवल सेवा करनेसे शूद्रका हो जाता है।आगे भगवान्ने एक विलक्षण बात बतायी है कि ब्राह्मण? क्षत्रिय? वैश्य और शूद्र अपनेअपने वर्णोचित कर्मोंके द्वारा उस परमात्माका पूजन करके परम सिद्धिको प्राप्त हो जाते हैं -- स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य सिद्धिं विन्दति मानवः (18। 46)। वास्तवमें कल्याण वर्णोचित कर्मोंसे नहीं होता? प्रत्युत निष्कामभावपूर्वक पूजनसे ही होता है। शूद्रका तो स्वाभाविक कर्म ही परिचर्यात्मक अर्थात् पूजनरूप है अतः उसका पूजनके द्वारा पूजन होता है अर्थात् उसके द्वारा दुगुनी पूजा होती है इसलिये उसका कल्याण जितनी जल्दी होगा? उतनी जल्दी ब्राह्मण आदिका नहीं होगा।शास्त्रकारोंने उद्धार करनेमें छोटेको ज्यादा प्यार दिया है क्योंकि छोटा प्यारका पात्र होता है और बड़ा अधिकारका पात्र होता है। बड़ेपर चिन्ताफिक्र ज्यादा रहती है? छोटेपर कुछ भी भार नहीं रहता। शूद्रको भाररहित करके उसकी जीविका बतायी गयी है और प्यार भी दिया गया है।वास्तवमें देखा जाय तो जो वर्णआश्रममें जितना ऊँचा होता है? उसके लिये शास्त्रोंके अनुसार उतने ही कठिन नियम होते हैं। उन नियमोंका साङ्गोपाङ्ग पालन करनेमें कठिनता अधिक मालूम देती है। परन्तु जो वर्णआश्रममें नीचा होता है? उसका कल्याण सुगमतासे हो जाता है। इस विषयमें विष्णुपुराणमें एक कथा आती है -- एक बार बहुतसे ऋषिमुनि मिलकर श्रेष्ठताका निर्णय करनेके लिये भगवान् वेदव्यासजीके पास गये। व्यासजीने सबको आदरपूर्वक बिठाया और स्वयं गङ्गामें स्नान करने चले गये। गङ्गामें स्नान करते हुए उन्होंने कहा -- कलियुग? तुम धन्य हो स्त्रियों? तुम धन्य हो शूद्रों? तुम धन्य हो जब व्यासजी स्नान करके ऋषियोंके पास आये तो ऋषियोंने कहा -- महाराज आपने कलियुग? स्त्रियों और शूद्रोंको धन्यवाद कैसे दिया तो उन्होंने कहा कि कलियुगमें अपने धर्मका पालन करनेसे स्त्रियाँ और शूद्रोंका कल्याण जल्दी और सुगमतापूर्वक हो जाता है।यहाँ एक और बात सोचनेकी है कि जो अपने स्वार्थका काम करता है? वह समाजमें और संसारमें आदरका पात्र नहीं होता। समाजमें ही नहीं? घरमें भी जो व्यक्ति पेटू और चट्टू होता है? उसकी दूसरे निन्दा करते हैं। ब्राह्मणोंने स्वार्थदृष्टिसे अपने ही मुँहसे अपनी (ब्राह्मणोंकी) प्रशंसा? श्रेष्ठताकी बात नहीं कही है। उन्होंने,ब्राह्मणोंके लिये त्याग ही बताया है। सात्त्विक मनुष्य अपनी प्रशंसा नहीं करते? प्रत्युत दूसरोंकी प्रशंसा? दूसरोंका आदर करते हैं। तात्पर्य है कि ब्राह्मणोंने कभी अपने स्वार्थ और अभिमानकी बात नहीं कही। यदि वे स्वार्थ और अभिमानकी बात कहते तो वे इतने आदरणीय नहीं होते? संसारमें और शास्त्रोंमें आदर न पाते। वे जो आदर पाते हैं? वह त्यागसे ही पाते हैं।इस प्रकार मनुष्यको शास्त्रोंका गहरा अध्ययन करके उपर्युक्त सभी बातोंको समझना चाहिये और ऋषिमुनियोंपर? शास्त्रकारोंपर झूठा आक्षेप नहीं करना चाहिये।ऊँचनीच वर्णोंमें प्राणियोंका जन्म मुख्यरूपसे गुणों और कर्मोंके अनुसार होता है -- चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टं गुणकर्मविभागशः (गीता 4। 13) परन्तु ऋणानुबन्ध? शाप? वरदान? सङ्ग आदि किसी कारणविशेषसे भी ऊँचनीच वर्णोंमें जन्म हो जाता है। उन वर्णोंमें जन्म होनेपर भी वे अपने पूर्वस्वभावके अनुसार ही आचरण करते हैं। यही कारण है कि ऊँचे वर्णमें उत्पन्न होनेपर भी उनके नीच आचरण देखे जाते हैं? जैसे धुन्धुकारी आदि और नीच वर्णमें उत्पन्न होनेपर भी वे महापुरुष होते हैं? जैसे विदुर? कबीर? रैदास आदि।आज जिस समुदायमें जातिगत? कुलपरम्परागत? समाजगत और व्यक्तिगत जो भी शास्त्रविपरीत दोष आये हैं? उनको अपने विवेकविचार? सत्सङ्ग? स्वाध्याय आदिके द्वारा दूर करके अपनेमें स्वच्छता? निर्मलता? पवित्रता लानी चाहिये? जिससे अपने मनुष्यजन्मका ध्येय सिद्ध हो सके। सम्बन्ध -- स्वभावज कर्मोंका वर्णन करनेका प्रयोजन क्या है -- इसको अब आगेके दो श्लोकोंमें बताते हैं।
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।।18.44।।खेती करना, गायोंकी रक्षा करना और शुद्ध व्यापार करना -- ये सब-के-सब वैश्यके स्वाभाविक कर्म हैं, तथा चारों वर्णोंकी सेवा करना शूद्रका भी स्वाभाविक कर्म है।
5.10।। व्याख्या--'ब्रह्मण्याधाय कर्माणि'--शरीर, इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि, प्राण आदि सब भगवान्के ही हैं, अपने हैं ही नहीं; अतः इनके द्वारा होनेवाली क्रियाओँको भक्तियोगी अपनी कैसे मान सकता है? इसलिये उसका यह भाव रहता है कि मात्र क्रियाएँ भगवान्के द्वारा ही हो रही हैं और भगवान्के लिये ही हो रही हैं; मैं तो निमित्तमात्र हूँ।भगवान् ही अपनी इन्द्रियोंके द्वारा आप ही सम्पूर्ण क्रियाएँ करते हैं--इस बातको ठीक-ठीक धारण करके सम्पूर्ण क्रियाओंके कर्तापनको भगवान्में ही मानना, यही उपर्युक्त पदोंका अर्थ है।शरीरादि वस्तुएँ अपनी हैं ही नहीं, प्रत्युत मिली हुई हैं और बिछुड़ रही हैं। ये केवल भगवान्के नाते, भगवत्प्रीत्यर्थ दूसरोंकी सेवा करनेके लिये मिली हैं। इन वस्तुओँपर हमारा स्वतन्त्र अधिकार नहीं है अर्थात् इनको अपने इच्छानुसार न तो रख सकते हैं, न बदल सकते हैं और न मरनेपर साथ ही ले जा सकते हैं। इसलिये इन शरीरादिको तथा इनसे होनेवाली क्रियाओँको अपनी मानना ईमानदारी नहीं है। अतः मनुष्यको ईमानदारीके साथ जिसकी ये वस्तुएँ हैं ,उसीकी अर्थात् भगवान्की मान लेनी चाहिये।सम्पूर्ण क्रियाओँ और पदार्थोंको कर्मयोगी 'संसार' के, ज्ञानयोगी 'प्रकृति' के और भक्तियोगी 'भगवान्' के अर्पण करता है। प्रकृति और संसार--दोनोंके ही स्वामी भगवान् हैं। अतः क्रियाओँ और पदार्थोंको भगवान्के अर्पण करना ही श्रेष्ठ है।'सङ्गं त्यक्त्वा करोति यः'--किसी भी प्राणी, पदार्थ, शरीर, इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि, प्राण, क्रिया आदिमें किञ्चिन्मात्र भी राग, खिंचाव, आकर्षण, लगाव, महत्त्व, ममता, कामना आदिका न रहना ही आसक्तिका सर्वथा त्याग करना है।
शास्त्रीय दृष्टिसे 'अज्ञान' जन्म-मरणका हेतु होते हुए भी साधनकी दृष्टिसे 'राग' ही जन्म-मरणका मुख्य हेतु है 'कारणं गुणसङ्गोऽस्य सदसद्योनिजन्मसु' (गीता 13। 21)। रागपर ही अज्ञान टिका हुआ है, इसलिये राग मिटनेपर अज्ञान भी मिट जाता है। इस राग या आसक्तिसे ही कामना पैदा होती है--'सङ्गात्संजायते कामः' (गीता 2। 62)। कामना ही सम्पूर्ण पापोंकी जड़ है (गीता 3। 37)। इसलिये यहाँ पापोंके मूल कारण आसक्तिका त्याग करनेकी बात आयी है; क्योंकि इसके रहते मनुष्य पापोंसे बच नहीं सकता और इसके न रहनेसे मनुष्य पापोंसे लिप्त नहीं होता।किसी भी क्रियाको करते समय क्रियाजन्य सुख लेनेसे तथा उसके फलमें आसक्त रहनेसे उस क्रियाका सम्बन्ध छूटता नहीं, प्रत्युत छूटनेकी अपेक्षा और बढ़ता है। किसी भी छोटी या बड़ी क्रियाके फलरूपमें कोई वस्तु चाहना ही आसक्ति नहीं है ,प्रत्युत क्रिया करते समय भी अपनेमें महत्त्वका, अच्छेपनका आरोप करना और दूसरोंसे अच्छा कहलवानेका भाव रखना भी आसक्ति ही है। इसलिये अपने लिये कुछ भी नहीं करना है। जिस कर्मसे अपने लिये किसी प्रकारका किञ्चिन्मात्र भी सुख पानेकी इच्छा है, वह कर्म अपने लिये हो जाता है। अपनी सुख-सुविधा और सम्मानकी इच्छाका सर्वथा त्याग करके कर्म करना ही उपर्युक्त पदोंका अभिप्राय है।'लिप्यते न स पापेन पद्मपत्रमिवाम्भसा'--यह कितनी विशेष बात है कि भगवान्के सम्मुख होकर भक्ति-योगी संसारमें रहकर सम्पूर्ण भगवदर्थ कर्म करते हुए भी कर्मोंसे नहीं बँधता! जैसे कमलका पत्ता जलमें उत्पन्न होकर और जलमें रहकर भी जलसे निर्लिप्त रहता है, ऐसे ही भक्तियोगी संसारमें रहकर सम्पूर्ण क्रियाएँ करनेपर भी भगवान्के सम्मुख होनेके कारण संसारमें सर्वदा-सर्वथा निर्लिप्त रहता है।भगवान्से विमुख होकर संसारकी कामना करना ही सब पापोंका मुख्य हेतु है। कामना आसक्तिसे उत्पन्न होती है। आसक्तिका सर्वथा अभाव होनेसे कामना नहीं रह सकती, इसलिये पाप होनेकी सम्भावना ही नहीं रहती।
धुएँसे अग्निकी तरह सभी कर्म किसी-न-किसी दोषसे युक्त होते हैं (गीता 18। 48)। परन्तु जिसने आशा, कामना, आसक्तिका त्याग कर दिया है, उसे ये दोष नहीं लगते। आसक्तिरहित होकर भगवदर्थ कर्म करनेके प्रभावसे सम्पूर्ण संचित पाप विलीन हो जाते हैं (गीता 9। 27 28)। अतः भक्तियोगीका किसी प्रकारसे भी पापसे सम्बन्ध नहीं रहता।यहाँ 'पापेन' पद कर्मोंसे होनेवाले उस पाप-पुण्यरूप फलका वाचक है, जो आगामी जन्मारम्भमें कारण होता है। भक्तियोगी उस पाप-पुण्यरूप फलसे कभी लिप्त नहीं होता अर्थात् बँधता नहीं। इसी बातको नवें अध्यायके अट्ठाईसवें श्लोकमें 'शुभाशुभफलैरेवं मोक्ष्यसे कर्मबन्धनैः' पदोंसे कहा गया है।
सम्बन्ध--अब भगवान् कर्मयोगीके कर्म करनेकी शैली बताते हैं।
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।।5.10।। जो (भक्तियोगी) सम्पूर्ण कर्मोंको भगवान् में अर्पण करके और आसक्तिका त्याग करके कर्म करता है, वह जलसे कमलके पत्तेकी तरह पापसे लिप्त नहीं होता।
।।18.46।। व्याख्या -- यतः प्रवृत्तिर्भूतानां येन सर्वमिदं ततम् -- जिस परमात्मासे संसार पैदा हुआ है? जिससे सम्पूर्ण संसारका संचालन होता है? जो सबका उत्पादक? आधार और प्रकाशक है और जो सबमें परिपूर्ण है अर्थात् जो परमात्मा अनन्त ब्रह्माण्डोंकी उत्पत्तिसे पहले भी था? जो अनन्त ब्रह्माण्डोंके लीन होनेपर भी रहेगा और अनन्त ब्रह्माण्डोंके रहते हुए भी जो रहता है तथा जो अनन्त ब्रह्माण्डोंमें व्याप्त है? उसी परमात्माका अपनेअपने स्वभावज (वर्णोचित स्वाभाविक) कर्मोंके द्वारा पूजन करना चाहिये।स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य -- मनुस्मृतिमें ब्राह्मणोंके लिये छः कर्म बताये गये हैं -- स्वयं पढ़ना और दूसरोंको पढ़ाना? स्वयं यज्ञ करना और दूसरोंसे यज्ञ कराना तथा स्वयं दान लेना और दूसरोंको दान देना (टिप्पणी प0 938.1) (इनमें पढ़ाना? यज्ञ कराना और दान लेना -- ये तीन कर्म जीविकाके हैं और पढ़ना? यज्ञ करना और दान देना -- ये तीन कर्तव्यकर्म हैं)। उपर्युक्त शास्त्रनियत छः कर्म और शमदम आदि नौ स्वभावज कर्म तथा इनके अतिरिक्त खानापीना? उठनाबैठना आदि जितने भी कर्म हैं? उन कर्मोंके द्वारा ब्राह्मण चारों वर्णोंमें व्याप्त परमात्माका पूजन करें। तात्पर्य है कि परमात्माकी आज्ञासे? उनकी प्रसन्नताके लिये ही भगवद्बुद्धिसे निष्कामभावपूर्वक सबकी सेवा करें।ऐसे ही क्षत्रियोंके लिये पाँच कर्म बताये गये हैं -- प्रजाकी रक्षा करना? दान देना? यज्ञ करना? अध्ययन करना और विषयोंमें आसक्त न होना (टिप्पणी प0 938.2)। इन पाँच कर्मों तथा शौर्य? तेज आदि सात स्वभावज कर्मोंके द्वारा और खानापीना आदि सभी कर्मोंके द्वारा क्षत्रिय सर्वत्र व्यापक परमात्माका पूजन करें।वैश्य यज्ञ करना? अध्ययन करना? दान देना और ब्याज लेना तथा कृषि? गौरक्ष्य और वाणिज्य (टिप्पणी प0 939.1) -- इन शास्त्रनियत और स्वभावज कर्मोंके द्वारा और शूद्र शास्त्रविहित तथा स्वभावज कर्म सेवा (टिप्पणी प0 939.2) के द्वारा सर्वत्र व्यापक परमात्माका पूजन करें अर्थात् अपने शास्त्रविहित? स्वभावज और खानापीना? सोनाजागना आदि सभी कर्मोंके द्वारा भगवान्की आज्ञासे? भगवान्की प्रसन्नताके लिये भगवद्बुद्धिसे निष्कामभावपूर्वक सबकी सेवा करें।शास्त्रोंमें मनुष्यके लिये अपने वर्ण और आश्रमके अनुसार जोजो कर्तव्यकर्म बताये गये हैं? वे सब संसाररूप परमात्माकी पूजाके लिये ही हैं। अगर साधक अपने कर्मोंके द्वारा भावसे उस परमात्माका पूजन करता है? तो उसकी मात्र क्रियाएँ परमात्माकी पूजा हो जाती है। जैसे? पितामह भीष्मने (अर्जुनके साथ युद्ध करते हुए) अर्जुनके सारथि बने हुए भगवान्की अपने युद्धरूप कर्मके द्वारा (बाणोंसे) पूजा की। भीष्मके बाणोंसे भगवान्का कवच टूट गया? जिससे भगवान्के शरीरमें घाव हो गये और हाथकी अंगुलियोंमें छोटेछोटे बाण लगनेसे अंगुलियोंसे लगाम पकड़ना कठिन हो गया। ऐसी पूजा करके अन्तसमयमें शरशय्यापर पड़े हुए पितामह भीष्म अपने बाणोंद्वारा पूजित भगवान्का ध्यान करते हैं -- युद्धमें मेरे तीखे बाणोंसे जिनका कवच टूट गया है? जिनकी त्वचा विच्छिन्न हो गयी है? परिश्रमके कारण जिनके मुखपर स्वेदकण सुशोभित हो रहे हैं? घोड़ोंकी टापोंसे उड़ी हुई रज जिनकी सुन्दर अलकावलिमें लगी हुई है? इस प्रकार बाणोंसे अलंकृत भगवान् कृष्णमें मेरे मनबुद्धि लग जायँ (टिप्पणी प0 939.3)।,लौकिक और पारमार्थिक कर्मोंके द्वारा उस परमात्माका पूजन तो करना चाहिये? पर उन कर्मोंमें और उनको करनेके करणोंउपकरणोंमें ममता नहीं रखनी चाहिये। कारण कि जिन वस्तुओं? क्रियाओँ आदिमें ममता हो जाती है? वे सभी चीजें अपवित्र हो जानेसे (टिप्पणी प0 939.4) पूजासामग्री नहीं रहतीं (अपवित्र फल? फूर आदि भगवान्पर नहीं चढ़ते)। इसलिये मेरे पास जो कुछ है? वह सब उस सर्वव्यापक परमात्माका ही है?,मुझे तो केवल निमित्त बनकर उनकी दी हुई शक्तिसे उनका पूजन करना है -- इस भावसे जो कुछ किया जाय? वह सबकासब परमात्माका पूजन हो जाता है। इसके विपरीत उन क्रियाओँ? वस्तुओँ आदिको मनुष्य जितनी अपनी मान लेता है? उतनी ही वे (अपनी मानी हुई) क्रियाएँ? वस्तुएँ (अपवित्र होनेसे) परमात्माके पूजनसे वञ्चित रह जाती हैं।सिद्धिं विन्दति मानवः -- सिद्धिको प्राप्त होनेका तात्पर्य है कि अपने कर्मोंसे परमात्माका पूजन करनेवाला मनुष्य प्रकृतिके सम्बन्धसे रहित होकर स्वतः अपने स्वरूपमें स्थित हो जाता है। स्वरूपमें स्थित होनेपर पहले जो परमात्माके समर्पण किया था? उस संस्कारके कारण उसका प्रभुमें अनन्यप्रेम जाग्रत् हो जाता है। फिर उसके लिये कुछ भी पाना बाकी नहीं रहता।यहाँ मानवः पदका तात्पर्य केवल ब्राह्मण? क्षत्रिय? वैश्य? शूद्र और ब्रह्मचारी? गृहस्थ? वानप्रस्थ? संन्यास -- इन वर्णों और आश्रमों आदिसे ही नहीं है? प्रत्युत हिन्दू? मुसलमान? ईसाई? बौद्ध? पारसी? यहूदी आदि सभी जातियों और सम्प्रदायोंसे है। किसी भी जाति? सम्प्रदाय आदिके कोई भी व्यक्ति क्यों न हों? सबकेसब ही परमात्माके पूजनके अधिकारी हैं क्योंकि सभी परमात्माके अपने हैं। जैसे घरमें स्वभाव आदिके भेदसे अनेक तरहके बालक होते हैं? पर उन सबकी माँ एक ही होती है और उन बालकोंकी तरहतरहकी जितनी भी क्रियाएँ होती हैं? उन सब क्रियाओंसे माँ प्रसन्न होती रहती है क्योंकि उन बालकोंमें माँका अपनापन होता है। ऐसे ही भगवान्के सम्मुख हुए मनुष्योंकी सभी क्रियाओँको भगवान् अपना पूजन मान लेते हैं और प्रसन्न होते हैं।इसी अध्यायके सत्तरवें श्लोकमें भगवान्ने अर्जुनसे कहा है कि कोई भी मनुष्य हम दोनोंके संवादका अध्ययन करेगा? उसके द्वारा मैं ज्ञानयज्ञसे पूजित हो जाऊँगा। इससे यह सिद्ध होता है कि कोई गीताका पाठ करे? अध्ययन करे तो उसको भगवान् अपना पूजन मान लेते हैं। ऐसे ही जो उत्पत्तिविनाशशील वस्तुओँसे विमुख होकर भगवान्के सम्मुख हो जाता है? उसकी क्रियाओँको भगवान् अपना पूजन मान लेते हैं।विशेष बातकर्मयोगमें कर्मोंके द्वारा जडतासे असङ्गता होती है और भक्तियोगमें संसारसे असङ्गतापूर्वक परमात्माके प्रति पूज्यभाव होनेसे परमात्माकी सम्मुखता रहती है।कर्मयोगी तो अपने पास शरीर? इन्द्रियाँ? मन? बुद्धि आदि जो कुछ संसारका जडअंश है? उसको स्वार्थ? अभिमान? कामनाका त्याग करके संसारकी सेवामें लगा देता है। इससे अपनी मानी हुई चीजोंसे अपनापन छूटकर उनसे सर्वथा सम्बन्धविच्छेद हो जाता है? और जो स्वतःस्वाभाविक असङ्गता है? वह प्रकट हो जाती है।भक्त अपने वर्णोचित स्वाभाविक कर्मों और समयसमयपर किये गये पारमार्थिक कर्मों(जप? ध्यान आदि) के द्वारा सम्पूर्ण संसारमें व्याप्त परमात्माका पूजन करता है।इन दोनोंमें भावकी भिन्नता होनेसे इतना ही अन्तर हुआ कि कर्मयोगीकी सम्पूर्ण क्रियाओंका प्रवाह सबको सुख पहुँचानेमें लग जाता है? तो क्रियाओँको करनेका वेग मिटकर स्वयंमें असङ्गता आ जाती है और भक्तकी सम्पूर्ण क्रियाएँ परमात्माकी पूजनसामग्री बन जानेसे जडतासे विमुखता होकर भगवान्की सम्मुखता आ जाती है और प्रेम बढ़ जाता है।भक्त तो पहलेसे ही भगवान्के सम्मुख होकर अपनेआपको भगवान्के अर्पित कर देता है। स्वयंके,अनन्यतापूर्वक भगवान्के समर्पित हो जानेसे खानापीना? कामधंधा आदि लौकिक और जप? ध्यान? सत्सङ्ग? स्वाध्याय आदि पारमार्थिक क्रियाएँ भी भगवान्के अर्पण हो जाती हैं। उसकी लौकिकपारमार्थिक क्रियाओंमें केवल बाहरसे भेद देखनेमें आता है परन्तु वास्तवमें कोई भेद नहीं रहता।कर्मयोगी और ज्ञानयोगी -- ये दोनों अन्तमें एक हो जाते हैं। जैसे? कर्मयोगी कर्मोंके द्वारा जडताका त्याग करता है अर्थात् सेवाके द्वारा उसकी सभी क्रियाएँ संसारके अर्पण हो जाती हैं और स्वयं असङ्ग हो जाता है और ज्ञानयोगी विचारके द्वारा जडताका त्याग करता है अर्थात् विचारके द्वारा उसकी सभी क्रियाएँ प्रकृतिके अर्पण हो जाती हैं और स्वयं असङ्ग हो जाता है। तात्पर्य है कि दोनोंके अर्पण करनेके प्रकारमें अन्तर है? पर असङ्गतामें दोनों एक हो जाते हैं (टिप्पणी प0 940)। इस असङ्गतामें कर्मयोगी और ज्ञानयोगी -- दोनों स्वतन्त्र हो जाते हैं। उनके लिये किञ्चिन्मात्र भी कर्मोंका बन्धन नहीं रहता। केवल कर्तव्यपालनके लिये ही कर्तव्यकर्म करनेसे कर्मयोगीके सम्पूर्ण कर्म लीन हो जाते हैं (गीता 4। 23)? और ज्ञानरूप अग्निसे ज्ञानयोगीके सम्पूर्ण कर्म भस्म हो जाते हैं (गीता 4। 37)। परन्तु इस स्वतन्त्रतामें भी जिसको संतोष नहीं होता अर्थात् स्वतन्त्रतासे जिसको उपरति हो जाती है? उसमें भगवत्कृपासे प्रेम प्रकट हो सकता है। , सम्बन्ध -- स्वभावज (सहज) कर्मोंको निष्कामभावपूर्वक और पूजाबुद्धिसे करते हुए उसमें कोई कमी रह भी जाय? तो भी उसमें साधकको हताश नहीं होना चाहिये -- इसको आगेके दो श्लोकोंमें बताते हैं।
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।।18.46।।जिस परमात्मासे सम्पूर्ण प्राणियोंकी उत्पत्ति होती है और जिससे यह सम्पूर्ण संसार व्याप्त है, उस परमात्माका अपने कर्मके द्वारा पूजन करके मनुष्य सिद्धिको प्राप्त हो जाता है।
।।18.47।। व्याख्या -- श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात् -- यहाँ स्वधर्म शब्दसे वर्णधर्म ही मुख्यतासे लिया गया है।परमात्मप्राप्तिके उद्देश्यवाला मनुष्य स्व को अर्थात् अपनेको जा मानता है? उसका धर्म (कर्तव्य) स्वधर्म है। जैसे कोई अपनेको मनुष्य मानता है? तो मनुष्यताका पालन करना उसके लिये स्वधर्म है। ऐसे ही कर्मोंके अनुसार अपनेको कोई विद्यार्थी या अध्यापक मानता है तो पढ़ना या पढ़ाना उसका स्वधर्म हो जायगा। कोई अपनेको साधक मानता है? तो साधन करना उसका स्वधर्म हो जायगा। कोई अपनेको भक्त? जिज्ञासु और सेवक मानता है तो भक्ति? जिज्ञासा और सेवा उसका स्वधर्म हो जायगा। इस प्रकार जिसकी जिस कार्यमें नियुक्ति हुई है और जिसने जिस कार्यको स्वीकार किया है? उसके लिये उस कार्यको साङ्गोपाङ्ग करना स्वधर्म है।ऐसे ही मनुष्य जन्म और कर्मके अनुसार अपनेको जिस वर्ण और आश्रमका मानता है? उसके लिये उसी वर्ण और आश्रमका धर्म स्वधर्म हो जायगा। ब्राह्मणवर्णमें उत्पन्न हुआ अपनेको ब्राह्मण मानता है तो यज्ञ कराना? दान लेना? पढ़ाना आदि जीविकासम्बन्धी कर्म उसके लिये स्वधर्म हैं। क्षत्रियके लिये युद्ध करना? ईश्वरभाव आदि वैश्यके लिये कृषि? गौरक्षा? व्यापार आदि और शूद्रके लिये सेवा -- ये जीविकासम्बन्धी कर्म स्वधर्म हैं। ऐसा अपना स्वधर्म अगर दूसरोंके धर्मकी अपेक्षा गुणरहित है अर्थात् अपने स्वधर्ममें गुणोंकी कमी है? उसका अनुष्ठान करनेमें कमी रहती है तथा उसको कठिनतासे किया जाता है परन्तु दूसरेका धर्म गुणोंसे परिपूर्ण है? दूसरेके धर्मका अनुष्ठान साङ्गोपाङ्ग है और करनेमें बहुत सुगम है तो भी अपने स्वधर्मका पालन करना ही सर्वश्रेष्ठ है।शास्त्रने जिस वर्णके लिये जिन कर्मोंका विधान किया है? उस वर्णके लिये वे कर्म स्वधर्म हैं और उन्हीं कर्मोंका जिस वर्णके लिये निषेध किया है? उस वर्णके लिये वे कर्म परधर्म हैं। जैसे यज्ञ कराना? दान लेना आदि कर्म ब्राह्मणके लिये शास्त्रकी आज्ञा होनेमें स्वधर्म हैं परन्तु वे ही कर्म क्षत्रिय? वैश्य और शूद्रके लिये शास्त्रका निषेध होनेसे परधर्म हैं। परन्तु आपत्कालको लेकर शास्त्रोंने जीविकासम्बन्धी जिन कर्मोंका निषेध नहीं किया है? वे कर्म सभी वर्णोंके लिये स्वधर्म हो जाते हैं। जैसे आपत्कालमें अर्थात् आपत्तिके समय वैश्यके खेती? व्यापार आदि जीविकासम्बन्धी कर्म ब्राह्मणके लिये भी स्वधर्म हो जाते हैं (टिप्पणी प0 941)।ब्राह्मणके शम? दम आदि जितने भी स्वभावज कर्म हैं? वे सामान्य धर्म होनेसे चारों वर्णोंके लिये स्वधर्म हैं। कारण कि उनका पालन करनेके लिये सभीको शास्त्रकी आज्ञा है। उनका किसीके लिये भी निषेध नहीं है।मनुष्यशरीर केवल परमात्मप्राप्तिके लिये ही मिला है। इस दृष्टिसे मनुष्यमात्र साधक है। अतः दैवीसम्पत्तिके जितने भी सद्गुणसदाचार हैं? वे सभीके अपने होनेसे मनुष्यमात्रके लिये स्वधर्म हैं। परन्तु आसुरीसम्पत्तिके जितने भी दुर्गुणदुराचार हैं? वे मनुष्यमात्रके लिये न तो स्वधर्म हैं और न परधर्म ही हैं वे तो सभीके लिये निषिद्ध हैं? त्याज्य हैं क्योंकि वे अधर्म हैं। दैवीसम्पत्तिके गुणोंको धारण करनेमें और आसुरीसम्पत्तिके पापकर्मोंका त्याग करनेमें सभी स्वतन्त्र हैं? सभी सबल हैं? सभी अधिकारी हैं कोई भी परतन्त्र? निर्बल तथा अनधिकारी नहीं है। हाँ? यह बात अलग है कि कोई सद्गुण किसीके स्वभावके अनुकूल पड़ता है और कोई सद्गुण किसीके स्वभावके अनुकूल पड़ता है। जैसे? किसीके स्वभावमें दया मुख्य होती है और किसीके स्वभावमें उपेक्षा मुख्य होती है? किसीका स्वभाव स्वतः क्षमा करनेका होता है और किसीका स्वभाव माँगनेपर क्षमा करनेका होता है? किसीके स्वभावमें उदारता स्वाभाविक होती है और किसीके स्वभावमें उदारता विचारपूर्वक होती है? आदि। ऐसा भेद रह सकता है।स्वभावनियतं कर्म कुर्वन्नाप्नोति किल्बिषम् -- शास्त्रोंमें विहित और निषिद्ध -- दो तरहके वचन आते हैं। उनमें विहित कर्म करनेकी आज्ञा है और निषिद्ध कर्म करनेका निषेध है। उन विहित कर्मोंमें भी शास्त्रोंने जिस वर्ण? आश्रम? देश? काल? घटना? परिस्थिति? वस्तु? संयोग? वियोग आदिको लेकर अलगअलग जो कर्म नियुक्त किये हैं? उस वर्ण? आश्रम आदिके लिये वे नियत कर्म कहलाते हैं।सत्त्व? रज और तम -- इन तीनों गुणोंको लेकर जो स्वभाव बनता है? उस स्वभावके अनुसार जो कर्म नियत किये जाते हैं? वे स्वभावनियत कर्म कहलाते हैं। उन्हींको स्वभावप्रभव? स्वभावज? स्वधर्म? स्वकर्म और सहज कर्म कहा है।तात्पर्य यह है कि जिस वर्ण? जातिमें जन्म लेनेसे पहले इस जीवके जैसे गुण और कर्म रहे हैं? उन्हीं गुणों और कर्मोंके अनुसार उस वर्णमें उसका जन्म हुआ है। कर्म तो करनेपर समाप्त हो जाते हैं? पर गुणरूपसे उनके संस्कार रहते हैं। जन्म होनेपर उन गुणोंके अनुसार ही उसमें गुण और पालनीय आचरण स्वाभाविक ही उत्पन्न होते हैं अर्थात् उनको न तो कहींसे लाना पड़ता है और न उनके लिये परिश्रम ही करना पड़ता है। इसलिये उनको स्वभावज और स्वभावनियत कहा है।यद्यपि सर्वारम्भा ही दोषेण धूमेनाग्निरिवावृताः (गीता 18। 48) के अनुसार कर्ममात्रमें दोष आता ही है? तथापि स्वभावके अनुसार शास्त्रने जिस वर्णके लिये जिन कर्मोंकी आज्ञा दी है? उन कर्मोंको अपने स्वार्थ और अभिमानका त्याग करके केवल दूसरोंके हितकी दृष्टिसे किया जाय? तो उस वर्णके व्यक्तिको उन कर्मोंका दोष (पाप) नहीं लगता। ऐसे ही जो केवल शरीरनिर्वाहके लिये कर्म करता है? उसको भी पाप नहीं लगता -- शारीरं केवलं कर्म कुर्वन्नाप्नोति किल्बिषम् (गीता 4। 21)।विशेष बातयहाँ एक बड़ी भारी शङ्का पैदा होती है कि एक आदमी कसाईके घर पैदा होता है तो उसके लिये कसाईका कर्म सहज (साथ ही पैदा हुआ) है? स्वाभाविक है। स्वभावनियत कर्म करता हुआ मनुष्य पापको नहीं प्राप्त होता? तो क्या कसाईके कर्मका त्याग नहीं करना चाहिये अगर उसको कसाईके कर्मका त्याग नहीं करना चाहिये? तो फिर निषिद्ध आचरण कैसे छूटेगा कल्याण कैसे होगाइसका समाधान है कि स्वभावनियत कर्म वह होता है? जो विहित हो? किसी रीतिसे निषिद्ध नहीं हो अर्थात् उससे किसीका भी अहित न होता हो। जो कर्म किसीके लिये भी अहितकारक होते हैं? वे सहज कर्ममें नहीं लिये जाते। वे कर्म आसक्ति? कामनाके कारण पैदा होते हैं। निषिद्ध कर्म चाहे इस जन्ममें बना हो? चाहे पूर्वजन्ममें बना हो? है वह दोषवाला ही। दोषभाग त्याज्य होता है क्योंकि दोष आसुरीसम्पत्ति है और गुण दैवीसम्पत्ति है। पहले जन्मके संस्कारोंसे भी दुर्गुणदुराचोंमें रुचि हो सकती है? पर वह रुचि दुर्गुणदुराचार करनेमें बाध्य नहीं करती। विवेक? सद्विचार? सत्सङ्ग? शास्त्र आदिके द्वारा उस रुचिको मिटाया जा सकता है।युक्तिसे भी देखा जाय तो कोई भी प्राणी अपना अहित नहीं चाहता? अपनी हत्या नहीं चाहता। अतः किसीका अहित करनेका? हत्या करनेका अधिकार किसीको भी नहीं है। मनुष्य अपने लिये अच्छा काम चाहता है तो उसे दूसरोंके लिये भी अच्छा काम करना चाहिये। शास्त्रोंमें भी देखा जाय तो यही बात है कि जिसमें दोष होते हैं? पाप होते हैं? अन्याय होते हैं? वे कर्म वैकृत हैं? प्राकृत नहीं हैं अर्थात् वे विकारसे पैदा हुए हैं? स्वभावसे नहीं। तीसरे अध्यायमें अर्जुनने पूछा कि मनुष्य न चाहता हुआ भी किससे प्रेरित होकर पापकर्म करता है तो भगवान्ने कहा कि कामनाके वशमें होकर भी मनुष्य पाप करता है (3। 36 -- 37)। कामनाको लेकर? क्रोधको लेकर? स्वार्थ और अभिमानको लेकर जो कर्म किये जाते हैं? वे कर्म शुद्ध नहीं होते? अशुद्ध होते हैं।परमात्मप्राप्तिके उद्देश्यसे जो कर्म किये जाते हैं? उन कर्मोंमें भिन्नता तो रहती है? पर वे दोषी नहीं होते। ब्राह्मणके घर जन्म होगा तो ब्राह्मणोचित कर्म होंगे? शूद्रके घर जन्म होगा तो शूद्रोचित कर्म होंगे? पर दोषीभाग किसीमें भी नहीं होगा। दोषीभाग सहज नहीं है? स्वभावनियत नहीं है। दोषयुक्त कर्म स्वाभाविक हो सकते हैं? पर स्वभावनियत नहीं हो सकते। एक ब्राह्मणको परमात्मतत्त्वकी प्राप्ति हो जाय तो प्राप्ति होनेके बाद भी वह वैसी ही पवित्रतासे भोजन बनायेगा जैसी पवित्रतासे ब्राह्मणको रहना चाहिये? वैसी ही पवित्रतासे रहेगा। ऐसे ही एक अन्त्यजको परमात्माकी प्राप्ति हो जाय तो वह जूठन भी खा लेगा जैसे पहले रहता था? वैसे ही रहेगा। परन्तु ब्राह्मण ऐसा नहीं करेगा क्योंकि पवित्रतासे भोजन करना उसका स्वभावनियत कर्म है? जबकि अन्त्यजके लिये जूठन खाना दोषी नहीं बताया गया है। इसलिये सिद्ध महापुरुषोंमें एकएकसे विचित्र कर्म होते हैं? पर वे दोषी नहीं होते। उनका स्वभाव रागद्वेषसे रहित होनेके कारण शुद्ध होता है।पहलेके किसी पापकर्मसे कसाईके घर जन्म हो गया तो वह जन्म पापका फल भोगनेके लिये हुआ है? पाप करनेके लिये नहीं। पापका फल जाति? आयु और भोग बताया गया है? नया कर्म नहीं बताया गया -- सति मूले तद्विपाको जात्यायुर्भोगाः। (योगदर्शन 2। 13)। कर्म करनेमें वह स्वतन्त्र है। यदि उसका चित्त शुद्ध हो जाय तो वह कसाई आदिका कर्म कर नहीं सकेगा। एक सन्तसे किसीने कहा कि अगर कोई अपना धर्म पशुओंको मारना ही मानता है तो वह क्या करे तो उन सन्तने बड़ी दृढ़तासे कहा कि यदि वह अपने धर्मके अनुसार ही लगातार तीन वर्षतक पवित्रतापूर्वक भगवान्के नामका? अपने इष्टके नामका जप करे? तो फिर वह मार नहीं सकेगा। कारण कि उसका पूर्वजन्मका अथवा यहाँका जो स्वभाव पड़ा हुआ है? वह स्वभाव दोषी है। यदि सच्चे हृदयसे ठीक परमात्मतत्त्वकी प्राप्ति चाहेगा तो वह कसाईका काम नहीं कर सकेगा। उससे अपनेआप ग्लानि होगी? उपरति होगी। बिना कहेसुने उसमें सद्गुण स्वाभाविक आयेंगे।रामचरितमानसमें शबरीके प्रसङ्गमें आता है -- भगवान् रामने शबरीसे कहा -- नवधा भगति कहउँ तोहि पाहीं। सावधान सुनु धरु मन माहीं।। (3। 35। 4)। फिर नौ प्रकारकी भक्ति कहकर अन्तमें भगवान्ने कहा -- सकल प्रकार भगति दृढ़ तोरें (3। 36। 4)। तात्पर्य यह है कि भक्ति नौ प्रकारकी होती है? इसका शबरीको पता ही नहीं है परन्तु शबरीमें सब प्रकारकी भक्ति स्वाभाविक ही थी। सत्सङ्ग? भजन? ध्यान आदि,करनेसे जिन गुणोंका हमें ज्ञान नहीं है? वे गुण भी आ जाते हैं। जो केवल दूसरोंको सुनानेके लिये याद करते हैं? वे दूसरोंको तो बता देंगे? पर आचरणमें वे गुण तभी आयेंगे? जब अपना स्वभाव शुद्ध करके परमात्माकी तरफ चलेंगे। इसलिये मनुष्यको अपना स्वभाव और अपने कर्म शुद्ध? निर्मल बनाने चाहिये। इसमें कोई परतन्त्र नहीं है? कोई निर्बल नहीं है? कोई अयोग्य नहीं है? कोई अपात्र नहीं है। मनुष्यके मनमें ऐसा आता है कि मैं कर्तव्यका पालन करनेमें और सद्गुणोंको लानेमें असमर्थ हूँ। परन्तु वास्तवमें वह असमर्थ नहीं है। सांसारिक भोगोंकी आदत और पदार्थोंके संग्रहकी रुचि होनेसे ही असमर्थताका अनुभव होता है।उद्धारके योग्य समझकर ही भगवान्ने मनुष्यशरीर दिया है। इसलिये अपने स्वभावका सुधार करके अपना उद्धार करनेमें प्रत्येक मनुष्य स्वतन्त्र है? सबल है? योग्य है? समर्थ है। स्वभावका सुधार करना असम्भव तो है ही नहीं? कठिन भी नहीं है। मनुष्यको मुक्तिका द्वार कहा गया है -- साधन धाम मोच्छ कर द्वारा (मानस 7। 43। 4)। यदि स्वभावका सुधार करना असम्भव होता तो इसे मुक्तिका द्वार कैसे कहा जा सकता अगर मनुष्य अपने स्वभावका सुधार न कर सके? तो फिर मनुष्यजीवनकी सार्थकता क्या हुई
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।।18.47।।अच्छी तरहसे अनुष्ठान किये हुए परधर्मसे गुणरहित अपना धर्म श्रेष्ठ है। कारण कि स्वभावसे नियत किये हुए स्वधर्मरूप कर्मको करता हुआ मनुष्य पापको प्राप्त नहीं होता।
सहजं कर्म कौन्तेय सदोषमपि न त्यजेत्।
सर्वारम्भा हि दोषेण धूमेनाग्निरिवावृताः ॥
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।।18.48।। व्याख्या -- [पूर्वश्लोकमें यह कहा गया कि स्वभावके अनुसार शास्त्रोंने जो कर्म नियत किये हैं? उन कर्मोंको करता हुआ मनुष्य पापको प्राप्त नहीं होता। इससे सिद्ध होता है कि स्वभावनियत कर्मोंमें भी पापक्रिया होती है। अगर पापक्रिया न होती तो पापको प्राप्त नहीं होता यह कहना नहीं बनता। अतः यहाँ भगवान् कहते हैं कि जो सहज कर्म हैं? उनमें कोई दोष भी आ जाय तो भी उनका त्याग नहीं करना चाहिये क्योंकि सबकेसब कर्म धुएँसे अग्निकी तरह दोषसे आवृत हैं। ]सहजं कर्म कौन्तेय सदोषमपि न त्यजेत् -- स्वभावनियतकर्म सहजकर्म कहलाते हैं जैसे -- ब्राह्मणके शम? दम आदि क्षत्रियके शौर्य? तेज आदि वैश्यके कृषि? गौरक्ष्य आदि और शूद्रके सेवाकर्म -- ये सभी सहजकर्म हैं। जन्मके बाद शास्त्रोंने पूर्वके गुण और कर्मोंके अनुसार जिस वर्णके लिये जिन कर्मोंकी आज्ञा दी है? वे शास्त्रनियत कर्म भी सहजकर्म कहलाते हैं जैसे ब्राह्मणके लिये यज्ञ करना और कराना? पढ़ना और पढ़ाना आदि क्षत्रियके लिये यज्ञ करना? दान करना आदि वैश्यके लिये यज्ञ करना आदि और शूद्रके लिये सेवा।सहज कर्ममें ये दोष हैं --,(1) परमात्मा और परमात्माका अंश -- ये दोनों ही स्व हैं तथा प्रकृति और प्रकृतिका कार्य शरीर आदि -- ये दोनों ही पर हैं। परन्तु परमात्माका अंश स्वयं प्रकृतिके वश होकर परतन्त्र हो जाता है अर्थात् क्रियामात्र प्रकृतिमें होती है और उस क्रियाको यह अपनेमें मान लेता है तो परतन्त्र हो जाता है। यह प्रकृतिके परतन्त्र होना ही महान् दोष है।(2) प्रत्येक कर्ममें कुछनकुछ आनुषङ्गिक अनिवार्य हिंसा आदि दोष होते ही हैं।(3) कोई भी कर्म किया जाय? वह कर्म किसीके अनुकूल और किसीके प्रतिकूल होता ही है। किसीके प्रतिकूल होना भी दोष है।(4) प्रमाद आदि दोषोंके कारण कर्मके करनेमें कमी रह जाना अथवा करनेकी विधिमें भूल हो जाना भी दोष है।अपने सहजकर्ममें दोष भी हो? तो भी उसको नहीं छोड़ना चाहिये। इसका तात्पर्य है कि जैसे ब्राह्मणके कर्म जितने सौम्य हैं? उतने ब्राह्मणेतर वर्णोंके कर्म सौम्य नहीं हैं। परन्तु सौम्य न होनेपर भी वे कर्म दोषी नहीं,माने जाते अर्थात् ब्राह्मणके सहज कर्मोंकी अपेक्षा क्षत्रिय? वैश्य आदिके सहज कर्मोंमें गुणोंकी कमी होनेपर भी उस कमीका दोष नहीं लगता और अनिवार्य हिंसा आदि भी नहीं लगते? प्रत्युत उनका पालन करनेसे लाभ होता है। कारण कि वे कर्म उनके स्वभावके अनुकूल होनेसे करनेमें सुगम हैं और शास्त्रविहित हैं।ब्राह्मणके लिये भिक्षा बतायी गयी है। देखनेमें भिक्षा निर्दोष दीखती है? पर उसमें भी दोष आ जाते हैं। जैसे किसी गृहस्थके घरपर कोई भिक्षुक खड़ा है और उसी समय दूसरा भिक्षुक वहाँ आ जाता है तो गृहस्थको भार लगता है। भिक्षुकोंमें परस्पर ईर्ष्या होनेकी सम्भावना रहती है। भिक्षा देनेवालेके घरमें पूरी तैयारी नहीं है तो उसको भी दुःख होता है। यदि कोई गृहस्थ भिक्षा देना नहीं चाहता और उसके घरपर भिक्षुक चला जाय तो उसको बड़ा कष्ट होता है। अगर वह भिक्षा देता है तो खर्चा होता है और नहीं देता है तो भिक्षुक निराश होकर चला जाता है। इससे उस गृहस्थको पाप लगता है और बेचारा उसमें फँस जाता है। इस प्रकार यद्यपि भिक्षामें भी दोष होते हैं? तथापि ब्राह्मणको उसे छोड़ना नहीं चाहिये।क्षत्रियके लिये न्याययुक्त युद्ध प्राप्त हो जाय तो उसको करनेसे क्षत्रियको पाप नहीं लगता। यद्यपि युद्धरूप कर्ममें दोष हैं क्योंकि उसमें मनुष्योंको मारना पड़ता है? तथापि क्षत्रियके लिये सहज और शास्त्रविहित होनेसे दोष नहीं लगता। ऐसे ही वैश्यके लिये खेती करना बताया गया है। खेती करनेमें बहुतसे जन्तुओंकी हिंसा होती है। परन्तु वैश्यके लिये सहज और शास्त्रविहित होनेसे हिंसाका इतना दोष नहीं लगता। इसलिये सहज कर्मोंको छोड़ना नहीं चाहिये।सहज कर्मोंको करनेमें दोष (पाप) नहीं लगता -- यह बात ठीक है परन्तु इन साधारण सहज कर्मोंसे मुक्ति कैसे हो जायगी वास्तवमें मुक्ति होनेमें सहज कर्म बाधक नहीं हैं। कामना? आसक्ति? स्वार्थ? अभिमान आदिसे ही बन्धन होता है और पाप भी इन कामना आदिके कारणसे ही होते हैं। इसलिये मनुष्यको निष्कामभावपूर्वक भगवत्प्रीत्यर्थ सहज कर्मोंको करना चाहिये? तभी बन्धन छूटेगा।सर्वारम्भा हि दोषेण धूमेनाग्निरिवावृताः -- जितने भी कर्म हैं? वे सबकेसब सदोष ही हैं जैसे -- आग सुलगायी जाय तो आरम्भमें धुआँ होता ही है। कर्म करनेमें देश? काल? घटना? परिस्थिति आदिकी परतन्त्रता और दूसरोंकी प्रतिकूलता भी दोष है? परन्तु स्वभावके अनुसार शास्त्रोंने आज्ञा दी है। उस आज्ञाके अनुसार निष्कामभावपूर्वक कर्म करता हुआ मनुष्य पापका भागी नहीं होता। इसीसे भगवान् अर्जुनसे मानो यह कह रहे हैं कि भैया तू जिस युद्धरूप क्रियाको घोर कर्म मान रहा है? वह तेरा धर्म है क्योंकि न्यायसे प्राप्त हुए युद्धको करना क्षत्रियोंका धर्म है? इसके सिवाय क्षत्रियके लिये दूसरा कोई श्रेयका साधन नहीं है (गीता 2। 31)। सम्बन्ध -- अब भगवान् सांख्ययोगका प्रकरण आरम्भ करते हुए पहले सांख्ययोगके अधिकारीका वर्णन करते हैं।
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।।18.48।।हे कुन्तीनन्दन ! दोषयुक्त होनेपर भी सहज कर्मका त्याग नहीं करना चाहिये; क्योंकि सम्पूर्ण कर्म धुएँसे अग्निकी तरह किसी-न-किसी दोषसे युक्त हैं।
असक्तबुद्धिः सर्वत्र जितात्मा विगतस्पृहः।
नैष्कर्म्यसिद्धिं परमां संन्यासेनाधिगच्छति ॥
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।।18.49।। व्याख्या -- संन्यास(सांख्य) योगका अधिकारी होनेसे ही सिद्धि होती है। अतः उसका अधिकारी कैसा होना चाहिये -- यह बतानेके लिये श्लोकके पूर्वार्द्धमें तीन बातें बतायी हैं --,(1) असक्तबुद्धिः सर्वत्र -- जिसकी बुद्धि सब जगह आसक्तिरहित है अर्थात् देश? काल? घटना? परिस्थिति? वस्तु? व्यक्ति? क्रिया? पदार्थ आदि किसीमें भी जिसकी बुद्धि लिप्त नहीं होती।(2) जितात्मा -- जिसने शरीरपर अधिकार कर लिया है अर्थात् जो आलस्य? प्रमाद आदिसे शरीरके वशीभूत नहीं होता? प्रत्युत इसको अपने वशीभूत रखता है। तात्पर्य है कि वह किसी कार्यको अपने सिद्धान्तपूर्वक करना चाहता है तो उस कार्यमें शरीर तत्परतासे लग जाता है और किसी क्रिया? घटना? आदिसे हटना,चाहता है तो वह वहाँसे हट जाता है। इस प्रकार जिसने शरीरपर विजय कर ली है? वह जितात्मा कहलाता है।(3) विगतस्पृहः -- जीवनधारणमात्रके लिये जिनकी विशेष जरूरत होती है? उन चीजोंकी सूक्ष्म इच्छाका नाम स्पृहा है जैसे -- सागपत्ती कुछ मिल जाय? रूखीसूखी रोटी ही मिल जाय? कुछनकुछ खाये बिना हम कैसे जी सकते हैं जल पीये बिना हम कैसे रह सकते हैं ठण्डीके दिनोंमें कपड़े बिलकुल न हों तो हम कैसे जी सकते हैं सांख्ययोगका साधक इन जीवननिर्वाहसम्बन्धी आवश्यकताओंकी भी परवाह नहीं करता।तात्पर्य यह हुआ कि सांख्ययोगमें चलनेवालेको जडताका त्याग करना पड़ता है। उस जडताका त्याग करनेमें उपर्युक्त तीन बातें आयी हैं। असक्तबुद्धि होनेसे वह जितात्मा हो जाता है? और जितात्मा होनेसे वह विगतस्पृह हो जाता है? तब वह सांख्ययोगका अधिकारी हो जाता है।नैष्कर्म्यसिद्धिं परमां संन्यासेनाधिगच्छति -- ऐसा असक्तबुद्धि? जितात्मा और विगतस्पृह पुरुष सांख्ययोगके द्वारा परम नैष्कर्म्यसिद्धिको अर्थात् नैष्कर्म्यरूप परमात्मतत्त्वको प्राप्त हो जाता है। कारण कि क्रियामात्र प्रकृतिमें होती है और जब स्वयंका उस क्रियाके साथ लेशमात्र भी सम्बन्ध नहीं रहता? तब कोई भी क्रिया और उसका फल उसपर किञ्चिन्मात्र भी लागू नहीं होता। अतः उसमें जो स्वाभाविक? स्वतःसिद्ध निष्कर्मता -- निर्लिप्तता है? वह प्रकट हो जाती है। सम्बन्ध -- अब उस परम सिद्धिको प्राप्त करनेकी विधि बतानेकी प्रतिज्ञा करते हैं।
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।।18.49।।जिसकी बुद्धि सब जगह आसक्तिरहित है, जिसने शरीरको वशमें कर रखा है, जो स्पृहारहित है, वह मनुष्य सांख्ययोगके द्वारा नैष्कर्म्य-सिद्धिको प्राप्त हो जाता है।
।।18.50।। व्याख्या -- सिद्धिं प्राप्तो यथा ब्रह्म तथाप्नोति निबोध मे -- यहाँ सिद्धि नाम अन्तःकरणकी शुद्धिका है? जिसका वर्णन पूर्वश्लोकमें आये असक्तबुद्धिः? जितात्मा और विगतस्पृहः पदोंसे हुआ है। जिसका अन्तःकरण इतना शुद्ध हो गया है कि उसमें किञ्चिन्मात्र भी किसी प्रकारकी कामना? ममता और आसक्ति नहीं रही? उसके लिये कभी किञ्चिन्मात्र भी किसी वस्तु? व्यक्ति? परिस्थिति आदिकी जरूरत नहीं पड़ती अर्थात् उसके लिये कुछ भी प्राप्त करना बाकी नहीं रहता। इसलिये इसको सिद्धि कहा है।लोकमें तो ऐसा कहा जाता है कि मनचाही चीज मिल गयी तो सिद्धि हो गयी? अणिमादि सिद्धियाँ मिल गयीं तो सिद्धि हो गयी। पर वास्तवमें यह सिद्धि नहीं है क्योंकि इसमें पराधीनता होती है? किसी बातकी कमी रहती है? और किसी वस्तु? परिस्थिति आदिकी जरूरत पड़ती है। अतः जिस सिद्धिमें किञ्चिन्मात्र भी कामना पैदा न हो? वही वास्तवमें सिद्धि है। जिस सिद्धिके मिलनेपर कामना बढ़ती रहे? वह सिद्धि वास्तवमें सिद्धि नहीं है? प्रत्युत एक बन्धन ही है।अन्तःकरणकी शुद्धिरूप सिद्धिको प्राप्त हुआ साधक ही ब्रह्मको प्राप्त होता है। वह जिस क्रमसे ब्रह्मको प्राप्त होता है? उसको मुझसे समझ -- निबोध मे। कारण कि सांख्ययोगकी जो सारसार बातें हैं? वे सांख्ययोगीके लिये अत्यन्त आवश्यक हैं और उन बातोंको समझनेकी बहुत जरूरत है।निबोध पदका तात्पर्य है कि सांख्ययोगमें क्रिया और सामग्रीकी प्रधानता नहीं है। किन्तु उस तत्त्वको समझनेकी प्रधानता है। इसी अध्यायके तेरहवें श्लोकमें भी सांख्ययोगीके विषयमें निबोध पद आया है।समासेनैव कौन्तेय निष्ठा ज्ञानस्य या परा -- सांख्ययोगीकी जो आखिरी स्थिति है? जिससे बढ़कर साधककी कोई स्थिति नहीं हो सकती? वही ज्ञानकी परा निष्ठा कही जाती है। उस परा निष्ठाको अर्थात् ब्रह्मको सांख्ययोगका साधक जिस प्रकारसे प्राप्त होता है? उसको मैं संक्षेपसे कहूँगा अर्थात् उसकी सारसार बातें,कहूँगा। सम्बन्ध -- ज्ञानकी परा निष्ठा प्राप्त करनेके लिये साधनसामग्रीकी आवश्यकता है? उसको आगेके तीन श्लोकोंमें बताते हैं।
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।।18.50।।हे कौन्तेय ! सिद्धि-(अन्तःकरणकी शुद्धि-) को प्राप्त हुआ साधक ब्रह्मको, जो कि ज्ञानकी परा निष्ठा है, जिस प्रकारसे प्राप्त होता है, उस प्रकारको तुम मुझसे संक्षेपमें ही समझो।
।।18.51।। व्याख्या -- बुद्ध्या विशुद्धया युक्तः -- जो सांख्ययोगी साधक परमात्मतत्त्वको प्राप्त करना चाहता है? उसकी बुद्धि विशुद्ध अर्थात् सात्त्विकी (गीता 18। 30) हो। उसकी बुद्धिका विवेक साफसाफ हो? उसमें किञ्चिन्मात्र भी सन्देह न हो।इस सांख्ययोगके प्रकरणमें सबसे पहले बुद्धिका नाम आया है। इसका तात्पर्य है कि सांख्ययोगीके लिये जिस विवेककी आवश्यकता है? वह विवेक बुद्धिमें ही प्रकट होता है। उस विवेकसे वह जडताका त्याग करता है।वैराग्यं समुपाश्रितः -- जैसे संसारी लोग रागपूर्वक वस्तु? व्यक्ति आदिके आश्रित रहते हैं? उनको अपना आश्रय? सहारा मानते हैं? ऐसे ही सांख्ययोगका साधक वैराग्यके आश्रित रहता है अर्थात् जनसमुदाय? स्थान आदिसे उसकी स्वाभाविक ही निर्लिप्तता बनी रहती है। लौकिक और पारलौकिक सम्पूर्ण भोगोंसे उसका दृढ़ वैराग्य होता है।विविक्तसेवी -- सांख्ययोगके साधकका स्वभाव? उसकी रुचि स्वतःस्वाभाविक एकान्तमें रहनेकी होती है। एकान्तसेवनकी रुचि होनी तो बढ़िया है? पर उसका आग्रह नहीं होना चाहिये अर्थात् एकान्त न मिलनेपर मनमें विक्षेप? हलचल नहीं होनी चाहिये। आग्रह न होनेसे रुचि होनेपर भी एकान्त न मिले? प्रत्युत समुदाय मिले? खूब हल्लागुल्ला हो? तो भी साधक उकतायेगा नहीं अर्थात् सिद्धिअसिद्धिमें सम रहेगा। परन्तु आग्रह होगा तो वह उकता जायगा? उससे समुदाय सहा नहीं जायगा। अतः साधकका स्वभाव तो एकान्तमें रहनेका ही होना चाहिये? पर एकान्त न मिले तो उसके अन्तःकरणमें हलचल नहीं होनी चाहिये। कारण कि हलचल होनेसे अन्तःकरणमें संसारकी महत्ता आती है और संसारकी महत्ता आनेपर हलचल होती है? जो कि ध्यानयोगमें बाधक है।एकान्तमें रहनेसे साधन अधिक होगा? मन भगवान्में अच्छी तरह लगेगा अन्तःकरण निर्मल बनेगा -- इन बातोंको लेकर मनमें जो प्रसन्नता होती है? वह साधनमें सहायक होती है। परन्तु एकान्तमें हल्लागुल्ला करनेवाला कोई नहीं होगा अतः वहाँ नींद अच्छी आयेगी? वहाँ किसी भी प्रकारसे बैठ जायँ तो कोई देखनेवाला नहीं होगा? वहाँ सब प्रकारसे आराम रहेगा? एकान्तमें रहनेसे लोग भी ज्यादा मानबड़ाई? आदर करेंगे -- इन बातोंको लेकर मनमें जो प्रसन्नता होती है? वह साधनमें बाधक होती है क्योंकि यह सब भोग है। साधकको इन सुखसुविधाओंमें फँसना नहीं चाहिये? प्रत्युत इनसे सदा सावधान रहना चाहिये।लघ्वाशी -- साधकका स्वभाव स्वल्प अर्थात् नियमित और सात्त्विक भोजन करनेका हो। भोजनके विषयमें हित? मित और मेध्य -- ये तीन बातें बतायी गयी हैं। हित का तात्पर्य है -- भोजन शरीरके अनुकूल हो। मितका तात्पर्य है -- भोजन न तो अधिक करे और न कम करे? प्रत्युत जितने भोजनसे शरीरनिर्वाह की जाय? उतना भोजन करे (गीता 6। 16)। भोजनसे शरीर पुष्ट हो जायगा -- ऐसे भावसे भोजन न करे? प्रत्युत केवल औषधकी तरह क्षुधानिवृत्तिके लिये ही भोजन करे? जिससे साधनमें विघ्न न पड़े। मेध्यका तात्पर्य है -- भोजन पवित्र हो।धृत्यात्मानं नियम्य च -- सांसारिक कितने ही प्रलोभन सामने आनेपर भी बुद्धिको अपने ध्येय परमात्मतत्त्वसे विचलित न होने देना -- ऐसी दृढ़ सात्त्विकी धृति (गीता 18। 33) के द्वारा इन्द्रियोंका नियमन करे अर्थात् उनको मर्यादामें रखे। आठों पहर यह जागृति रहे कि इन्द्रियोंके द्वारा साधनके विरुद्ध कोई भी चेष्टा न हो।यतवाक्कायमानसः -- शरीर? वाणी और मनको संयत (वशमें) करना भी साधकके लिये बहुत जरूरी है (गीता 17। 14 -- 16)। अतः वह शरीरसे वृथा न घूमे? देखनेसुननेके शौकसे कोई यात्रा न करे। वाणीसे वृथा बातचीत न करे? आवश्यक होनेपर ही बोले? असत्य न बोले? निन्दाचुगली न करे। मनसे रागपूर्वक संसारका चिन्तन न करे? प्रत्युत परमात्माका चिन्तन करे।शब्दादीन्विषयांस्त्यक्त्वा -- ध्यानके समय बाहरके जितने सम्बन्ध हैं? जो कि विषयरूपसे आते हैं और जिनसे संयोगजन्य सुख होता है? उन शब्द? स्पर्श? रूप? रस और गन्ध -- पाँचों विषयोंका स्वरूपसे ही त्याग कर देना चाहिये। कारण कि विषयोंका रागपूर्वक सेवन करनेवाला ध्यानयोगका साधन नहीं कर सकता। अगर विषयोंका रागपूर्वक सेवन करेगा तो ध्यानमें वृत्तियाँ (बहिर्मुख होनेसे) नहीं लगेंगी और विषयोंका चिन्तन होगा।रागद्वेषौ व्युदस्य च -- सांसारिक वस्तु महत्त्वशाली है? अपने काममें आनेवाली है? उपयोगी है -- ऐसा जो भाव है? उसका नाम राग है। तात्पर्य है कि अन्तःकरणमें असत् वस्तुका जो रंग चढ़ा हुआ है? वह राग है। असत् वस्तु आदिमें राग रहते हुए कोई उनकी प्राप्तिमें बाधा डालता है? उसके प्रति द्वेष हो जाता है।असत् संसारके किसी अंशमें राग हो जाय तो दूसरे अंशमें द्वेष हो जाता है -- यह नियम है। जैसे? शरीरमें राग हो जाय तो शरीरके अनुकूल वस्तुमात्रमें राग हो जाता है और प्रतिकूल वस्तुमात्रमें द्वेष हो जाता है।संसारके साथ रागसे भी सम्बन्ध जुड़ता है और द्वेषसे भी सम्बन्ध जुड़ता है। रागवाली बातका भी चिन्तन होता है और द्वेषवाली बातका भी चिन्तन होता है। इसलिये साधक न राग करे और न द्वेष करे।ध्यानयोगपरो नित्यम् -- साधक नित्य ही ध्यानयोगके परायण रहे अर्थात् ध्यानके सिवाय दूसरा कोई साधन न करे। ध्यानके समय तो ध्यान करे ही? व्यवहारके समय अर्थात् चलतेफिरते? खातेपीते? कामधंधा करते समय भी यह ध्यान (भाव) सदा बना रहे कि वास्तवमें एक परमात्माके सिवाय संसारकी स्वतन्त्र सत्ता है ही नहीं (गीता 18। 20)।अहंकारं बलं दर्पं ৷৷. विमुच्य -- गुणोंको लेकर अपनेमें जो एक विशेषता दीखती है? उसे अहंकार कहते हैं। जबर्दस्ती करके? विशेषतासे मनमानी करनेका जो आग्रह (हठ) होता है? उसे बल कहते हैं। जमीनजायदाद आदि बाह्य चीजोंकी विशेषताको लेकर जो घमंड होता है? उसे दर्प कहते हैं। भोग? पदार्थ तथा अनुकूल परिस्थिति मिल जाय? इस इच्छाका नाम काम है। अपने स्वार्थ और अभिमानमें ठेस लगनेपर दूसरोंका अनिष्ट करनेके लिये जो जलनात्मक वृत्ति पैदा होती है? उसको क्रोध कहते हैं। भोगबुद्धिसे? सुखआरामबुद्धिसे चीजोंका जो संग्रह किया जाता है? उसे परिग्रह (टिप्पणी प0 947.1) कहते हैं।साधक उपर्युक्त अहंकार? बल? दर्प? काम? क्रोध और परिग्रह -- इन सबका त्याग कर देता है।निर्ममः -- अपने पास निर्वाहमात्रकी जो वस्तुएँ हैं और कर्म करनेके शरीर? इन्द्रियाँ आदि जो साधन हैं? उनमें ममता अर्थात् अपनापन न हो (टिप्पणी प0 947.2)। अपना शरीर? वस्तु आदि जो हमें प्रिय लगते हैं? उनके बने रहनेकी इच्छा न होना निर्मम होना है।जिन व्यक्तियों और वस्तुओंको हम अपनी मानते हैं? वे आजसे सौ वर्ष पहले भी अपनी नहीं थीं और सौ वर्षके बाद भी अपनी नहीं रहेंगी। अतः जो अपनी नहीं रहेंगी? उनका उपयोग या सेवा तो कर सकते हैं? पर उनको,अपनी मानकर अपने पास नहीं रख सकते। अगर उनको अपने पास नहीं रख सकते तो वे अपने नहीं हैं ऐसा माननेमें क्या बाधा है उनको अपनी न माननेसे अधिक निर्मम हो जाता है।शान्तः -- असत् संसारके साथ सम्बन्ध रखनेसे ही अन्तःकरणमें अशान्ति? हलचल आदि पैदा होते हैं। जडतासे सर्वथा सम्बन्धविच्छेद होनेपर अशान्ति कभी पासमें आती ही नहीं। फिर रागद्वेष न रहनेसे साधक हरदम शान्त रहता है।ब्रह्मभूयाय कल्पते -- ममतारहित और शान्त मनुष्य (सांख्ययोगका साधक) परमात्मप्राप्तिका अधिकारी बन जाता है अर्थात् असत्का सर्वथा सम्बन्ध छूटते ही उसमें ब्रह्मप्राप्तिकी योग्यता? सामर्थ्य आ जाती है। कारण कि जबतक असत् पदार्थोंके साथ सम्बन्ध रहता है? तबतक परमात्मप्राप्तिकी सामर्थ्य नहीं आती। सम्बन्ध -- उपर्युक्त साधनसामग्रीसे निष्ठा प्राप्त हो जानेपर क्या होता है -- इसको आगेके श्लोकमें बताते हैं।
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।।18.51।।जो विशुद्ध (सात्त्विकी) बुद्धिसे युक्त, वैराग्यके आश्रित, एकान्तका सेवन करनेवाला और नियमित भोजन करनेवाला साधक धैर्यपूर्वक इन्द्रियोंका नियमन करके, शरीर-वाणी-मनको वशमें करके, शब्दादि विषयोंका त्याग करके और राग-द्वेषको छोड़कर निरन्तर ध्यानयोगके परायण हो जाता है, वह अहंकार, बल, दर्प, काम, क्रोध और परिग्रहका त्याग करके एवं निर्मम तथा शान्त होकर ब्रह्मप्राप्तिका पात्र हो जाता है।
।।18.52।। व्याख्या -- बुद्ध्या विशुद्धया युक्तः -- जो सांख्ययोगी साधक परमात्मतत्त्वको प्राप्त करना चाहता है? उसकी बुद्धि विशुद्ध अर्थात् सात्त्विकी (गीता 18। 30) हो। उसकी बुद्धिका विवेक साफसाफ हो? उसमें किञ्चिन्मात्र भी सन्देह न हो।इस सांख्ययोगके प्रकरणमें सबसे पहले बुद्धिका नाम आया है। इसका तात्पर्य है कि सांख्ययोगीके लिये जिस विवेककी आवश्यकता है? वह विवेक बुद्धिमें ही प्रकट होता है। उस विवेकसे वह जडताका त्याग करता है।वैराग्यं समुपाश्रितः -- जैसे संसारी लोग रागपूर्वक वस्तु? व्यक्ति आदिके आश्रित रहते हैं? उनको अपना आश्रय? सहारा मानते हैं? ऐसे ही सांख्ययोगका साधक वैराग्यके आश्रित रहता है अर्थात् जनसमुदाय? स्थान आदिसे उसकी स्वाभाविक ही निर्लिप्तता बनी रहती है। लौकिक और पारलौकिक सम्पूर्ण भोगोंसे उसका दृढ़ वैराग्य होता है।विविक्तसेवी -- सांख्ययोगके साधकका स्वभाव? उसकी रुचि स्वतःस्वाभाविक एकान्तमें रहनेकी होती है। एकान्तसेवनकी रुचि होनी तो बढ़िया है? पर उसका आग्रह नहीं होना चाहिये अर्थात् एकान्त न मिलनेपर मनमें विक्षेप? हलचल नहीं होनी चाहिये। आग्रह न होनेसे रुचि होनेपर भी एकान्त न मिले? प्रत्युत समुदाय मिले? खूब हल्लागुल्ला हो? तो भी साधक उकतायेगा नहीं अर्थात् सिद्धिअसिद्धिमें सम रहेगा। परन्तु आग्रह होगा तो वह उकता जायगा? उससे समुदाय सहा नहीं जायगा। अतः साधकका स्वभाव तो एकान्तमें रहनेका ही होना चाहिये? पर एकान्त न मिले तो उसके अन्तःकरणमें हलचल नहीं होनी चाहिये। कारण कि हलचल होनेसे अन्तःकरणमें संसारकी महत्ता आती है और संसारकी महत्ता आनेपर हलचल होती है? जो कि ध्यानयोगमें बाधक है।एकान्तमें रहनेसे साधन अधिक होगा? मन भगवान्में अच्छी तरह लगेगा अन्तःकरण निर्मल बनेगा -- इन बातोंको लेकर मनमें जो प्रसन्नता होती है? वह साधनमें सहायक होती है। परन्तु एकान्तमें हल्लागुल्ला करनेवाला कोई नहीं होगा अतः वहाँ नींद अच्छी आयेगी? वहाँ किसी भी प्रकारसे बैठ जायँ तो कोई देखनेवाला नहीं होगा? वहाँ सब प्रकारसे आराम रहेगा? एकान्तमें रहनेसे लोग भी ज्यादा मानबड़ाई? आदर करेंगे -- इन बातोंको लेकर मनमें जो प्रसन्नता होती है? वह साधनमें बाधक होती है क्योंकि यह सब भोग है। साधकको इन सुखसुविधाओंमें फँसना नहीं चाहिये? प्रत्युत इनसे सदा सावधान रहना चाहिये।लघ्वाशी -- साधकका स्वभाव स्वल्प अर्थात् नियमित और सात्त्विक भोजन करनेका हो। भोजनके विषयमें हित? मित और मेध्य -- ये तीन बातें बतायी गयी हैं। हित का तात्पर्य है -- भोजन शरीरके अनुकूल हो। मितका तात्पर्य है -- भोजन न तो अधिक करे और न कम करे? प्रत्युत जितने भोजनसे शरीरनिर्वाह की जाय? उतना भोजन करे (गीता 6। 16)। भोजनसे शरीर पुष्ट हो जायगा -- ऐसे भावसे भोजन न करे? प्रत्युत केवल औषधकी तरह क्षुधानिवृत्तिके लिये ही भोजन करे? जिससे साधनमें विघ्न न पड़े। मेध्यका तात्पर्य है -- भोजन पवित्र हो।धृत्यात्मानं नियम्य च -- सांसारिक कितने ही प्रलोभन सामने आनेपर भी बुद्धिको अपने ध्येय परमात्मतत्त्वसे विचलित न होने देना -- ऐसी दृढ़ सात्त्विकी धृति (गीता 18। 33) के द्वारा इन्द्रियोंका नियमन करे अर्थात् उनको मर्यादामें रखे। आठों पहर यह जागृति रहे कि इन्द्रियोंके द्वारा साधनके विरुद्ध कोई भी चेष्टा न हो।यतवाक्कायमानसः -- शरीर? वाणी और मनको संयत (वशमें) करना भी साधकके लिये बहुत जरूरी है (गीता 17। 14 -- 16)। अतः वह शरीरसे वृथा न घूमे? देखनेसुननेके शौकसे कोई यात्रा न करे। वाणीसे वृथा बातचीत न करे? आवश्यक होनेपर ही बोले? असत्य न बोले? निन्दाचुगली न करे। मनसे रागपूर्वक संसारका चिन्तन न करे? प्रत्युत परमात्माका चिन्तन करे।शब्दादीन्विषयांस्त्यक्त्वा -- ध्यानके समय बाहरके जितने सम्बन्ध हैं? जो कि विषयरूपसे आते हैं और जिनसे संयोगजन्य सुख होता है? उन शब्द? स्पर्श? रूप? रस और गन्ध -- पाँचों विषयोंका स्वरूपसे ही त्याग कर देना चाहिये। कारण कि विषयोंका रागपूर्वक सेवन करनेवाला ध्यानयोगका साधन नहीं कर सकता। अगर विषयोंका रागपूर्वक सेवन करेगा तो ध्यानमें वृत्तियाँ (बहिर्मुख होनेसे) नहीं लगेंगी और विषयोंका चिन्तन होगा।रागद्वेषौ व्युदस्य च -- सांसारिक वस्तु महत्त्वशाली है? अपने काममें आनेवाली है? उपयोगी है -- ऐसा जो भाव है? उसका नाम राग है। तात्पर्य है कि अन्तःकरणमें असत् वस्तुका जो रंग चढ़ा हुआ है? वह राग है। असत् वस्तु आदिमें राग रहते हुए कोई उनकी प्राप्तिमें बाधा डालता है? उसके प्रति द्वेष हो जाता है।असत् संसारके किसी अंशमें राग हो जाय तो दूसरे अंशमें द्वेष हो जाता है -- यह नियम है। जैसे? शरीरमें राग हो जाय तो शरीरके अनुकूल वस्तुमात्रमें राग हो जाता है और प्रतिकूल वस्तुमात्रमें द्वेष हो जाता है।संसारके साथ रागसे भी सम्बन्ध जुड़ता है और द्वेषसे भी सम्बन्ध जुड़ता है। रागवाली बातका भी चिन्तन होता है और द्वेषवाली बातका भी चिन्तन होता है। इसलिये साधक न राग करे और न द्वेष करे।ध्यानयोगपरो नित्यम् -- साधक नित्य ही ध्यानयोगके परायण रहे अर्थात् ध्यानके सिवाय दूसरा कोई साधन न करे। ध्यानके समय तो ध्यान करे ही? व्यवहारके समय अर्थात् चलतेफिरते? खातेपीते? कामधंधा करते समय भी यह ध्यान (भाव) सदा बना रहे कि वास्तवमें एक परमात्माके सिवाय संसारकी स्वतन्त्र सत्ता है ही नहीं (गीता 18। 20)।अहंकारं बलं दर्पं ৷৷. विमुच्य -- गुणोंको लेकर अपनेमें जो एक विशेषता दीखती है? उसे अहंकार कहते हैं। जबर्दस्ती करके? विशेषतासे मनमानी करनेका जो आग्रह (हठ) होता है? उसे बल कहते हैं। जमीनजायदाद आदि बाह्य चीजोंकी विशेषताको लेकर जो घमंड होता है? उसे दर्प कहते हैं। भोग? पदार्थ तथा अनुकूल परिस्थिति मिल जाय? इस इच्छाका नाम काम है। अपने स्वार्थ और अभिमानमें ठेस लगनेपर दूसरोंका अनिष्ट करनेके लिये जो जलनात्मक वृत्ति पैदा होती है? उसको क्रोध कहते हैं। भोगबुद्धिसे? सुखआरामबुद्धिसे चीजोंका जो संग्रह किया जाता है? उसे परिग्रह (टिप्पणी प0 947.1) कहते हैं।साधक उपर्युक्त अहंकार? बल? दर्प? काम? क्रोध और परिग्रह -- इन सबका त्याग कर देता है।निर्ममः -- अपने पास निर्वाहमात्रकी जो वस्तुएँ हैं और कर्म करनेके शरीर? इन्द्रियाँ आदि जो साधन हैं? उनमें ममता अर्थात् अपनापन न हो (टिप्पणी प0 947.2)। अपना शरीर? वस्तु आदि जो हमें प्रिय लगते हैं? उनके बने रहनेकी इच्छा न होना निर्मम होना है।जिन व्यक्तियों और वस्तुओंको हम अपनी मानते हैं? वे आजसे सौ वर्ष पहले भी अपनी नहीं थीं और सौ वर्षके बाद भी अपनी नहीं रहेंगी। अतः जो अपनी नहीं रहेंगी? उनका उपयोग या सेवा तो कर सकते हैं? पर उनको,अपनी मानकर अपने पास नहीं रख सकते। अगर उनको अपने पास नहीं रख सकते तो वे अपने नहीं हैं ऐसा माननेमें क्या बाधा है उनको अपनी न माननेसे अधिक निर्मम हो जाता है।शान्तः -- असत् संसारके साथ सम्बन्ध रखनेसे ही अन्तःकरणमें अशान्ति? हलचल आदि पैदा होते हैं। जडतासे सर्वथा सम्बन्धविच्छेद होनेपर अशान्ति कभी पासमें आती ही नहीं। फिर रागद्वेष न रहनेसे साधक हरदम शान्त रहता है।ब्रह्मभूयाय कल्पते -- ममतारहित और शान्त मनुष्य (सांख्ययोगका साधक) परमात्मप्राप्तिका अधिकारी बन जाता है अर्थात् असत्का सर्वथा सम्बन्ध छूटते ही उसमें ब्रह्मप्राप्तिकी योग्यता? सामर्थ्य आ जाती है। कारण कि जबतक असत् पदार्थोंके साथ सम्बन्ध रहता है? तबतक परमात्मप्राप्तिकी सामर्थ्य नहीं आती। सम्बन्ध -- उपर्युक्त साधनसामग्रीसे निष्ठा प्राप्त हो जानेपर क्या होता है -- इसको आगेके श्लोकमें बताते हैं।
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।।18.52।।जो विशुद्ध (सात्त्विकी) बुद्धिसे युक्त, वैराग्यके आश्रित, एकान्तका सेवन करनेवाला और नियमित भोजन करनेवाला साधक धैर्यपूर्वक इन्द्रियोंका नियमन करके, शरीर-वाणी-मनको वशमें करके, शब्दादि विषयोंका त्याग करके और राग-द्वेषको छोड़कर निरन्तर ध्यानयोगके परायण हो जाता है, वह अहंकार, बल, दर्प, काम, क्रोध और परिग्रहका त्याग करके एवं निर्मम तथा शान्त होकर ब्रह्मप्राप्तिका पात्र हो जाता है।
।।18.53।। व्याख्या -- बुद्ध्या विशुद्धया युक्तः -- जो सांख्ययोगी साधक परमात्मतत्त्वको प्राप्त करना चाहता है? उसकी बुद्धि विशुद्ध अर्थात् सात्त्विकी (गीता 18। 30) हो। उसकी बुद्धिका विवेक साफसाफ हो? उसमें किञ्चिन्मात्र भी सन्देह न हो।इस सांख्ययोगके प्रकरणमें सबसे पहले बुद्धिका नाम आया है। इसका तात्पर्य है कि सांख्ययोगीके लिये जिस विवेककी आवश्यकता है? वह विवेक बुद्धिमें ही प्रकट होता है। उस विवेकसे वह जडताका त्याग करता है।वैराग्यं समुपाश्रितः -- जैसे संसारी लोग रागपूर्वक वस्तु? व्यक्ति आदिके आश्रित रहते हैं? उनको अपना आश्रय? सहारा मानते हैं? ऐसे ही सांख्ययोगका साधक वैराग्यके आश्रित रहता है अर्थात् जनसमुदाय? स्थान आदिसे उसकी स्वाभाविक ही निर्लिप्तता बनी रहती है। लौकिक और पारलौकिक सम्पूर्ण भोगोंसे उसका दृढ़ वैराग्य होता है।विविक्तसेवी -- सांख्ययोगके साधकका स्वभाव? उसकी रुचि स्वतःस्वाभाविक एकान्तमें रहनेकी होती है। एकान्तसेवनकी रुचि होनी तो बढ़िया है? पर उसका आग्रह नहीं होना चाहिये अर्थात् एकान्त न मिलनेपर मनमें विक्षेप? हलचल नहीं होनी चाहिये। आग्रह न होनेसे रुचि होनेपर भी एकान्त न मिले? प्रत्युत समुदाय मिले? खूब हल्लागुल्ला हो? तो भी साधक उकतायेगा नहीं अर्थात् सिद्धिअसिद्धिमें सम रहेगा। परन्तु आग्रह होगा तो वह उकता जायगा? उससे समुदाय सहा नहीं जायगा। अतः साधकका स्वभाव तो एकान्तमें रहनेका ही होना चाहिये? पर एकान्त न मिले तो उसके अन्तःकरणमें हलचल नहीं होनी चाहिये। कारण कि हलचल होनेसे अन्तःकरणमें संसारकी महत्ता आती है और संसारकी महत्ता आनेपर हलचल होती है? जो कि ध्यानयोगमें बाधक है।एकान्तमें रहनेसे साधन अधिक होगा? मन भगवान्में अच्छी तरह लगेगा अन्तःकरण निर्मल बनेगा -- इन बातोंको लेकर मनमें जो प्रसन्नता होती है? वह साधनमें सहायक होती है। परन्तु एकान्तमें हल्लागुल्ला करनेवाला कोई नहीं होगा अतः वहाँ नींद अच्छी आयेगी? वहाँ किसी भी प्रकारसे बैठ जायँ तो कोई देखनेवाला नहीं होगा? वहाँ सब प्रकारसे आराम रहेगा? एकान्तमें रहनेसे लोग भी ज्यादा मानबड़ाई? आदर करेंगे -- इन बातोंको लेकर मनमें जो प्रसन्नता होती है? वह साधनमें बाधक होती है क्योंकि यह सब भोग है। साधकको इन सुखसुविधाओंमें फँसना नहीं चाहिये? प्रत्युत इनसे सदा सावधान रहना चाहिये।लघ्वाशी -- साधकका स्वभाव स्वल्प अर्थात् नियमित और सात्त्विक भोजन करनेका हो। भोजनके विषयमें हित? मित और मेध्य -- ये तीन बातें बतायी गयी हैं। हित का तात्पर्य है -- भोजन शरीरके अनुकूल हो। मितका तात्पर्य है -- भोजन न तो अधिक करे और न कम करे? प्रत्युत जितने भोजनसे शरीरनिर्वाह की जाय? उतना भोजन करे (गीता 6। 16)। भोजनसे शरीर पुष्ट हो जायगा -- ऐसे भावसे भोजन न करे? प्रत्युत केवल औषधकी तरह क्षुधानिवृत्तिके लिये ही भोजन करे? जिससे साधनमें विघ्न न पड़े। मेध्यका तात्पर्य है -- भोजन पवित्र हो।धृत्यात्मानं नियम्य च -- सांसारिक कितने ही प्रलोभन सामने आनेपर भी बुद्धिको अपने ध्येय परमात्मतत्त्वसे विचलित न होने देना -- ऐसी दृढ़ सात्त्विकी धृति (गीता 18। 33) के द्वारा इन्द्रियोंका नियमन करे अर्थात् उनको मर्यादामें रखे। आठों पहर यह जागृति रहे कि इन्द्रियोंके द्वारा साधनके विरुद्ध कोई भी चेष्टा न हो।यतवाक्कायमानसः -- शरीर? वाणी और मनको संयत (वशमें) करना भी साधकके लिये बहुत जरूरी है (गीता 17। 14 -- 16)। अतः वह शरीरसे वृथा न घूमे? देखनेसुननेके शौकसे कोई यात्रा न करे। वाणीसे वृथा बातचीत न करे? आवश्यक होनेपर ही बोले? असत्य न बोले? निन्दाचुगली न करे। मनसे रागपूर्वक संसारका चिन्तन न करे? प्रत्युत परमात्माका चिन्तन करे।शब्दादीन्विषयांस्त्यक्त्वा -- ध्यानके समय बाहरके जितने सम्बन्ध हैं? जो कि विषयरूपसे आते हैं और जिनसे संयोगजन्य सुख होता है? उन शब्द? स्पर्श? रूप? रस और गन्ध -- पाँचों विषयोंका स्वरूपसे ही त्याग कर देना चाहिये। कारण कि विषयोंका रागपूर्वक सेवन करनेवाला ध्यानयोगका साधन नहीं कर सकता। अगर विषयोंका रागपूर्वक सेवन करेगा तो ध्यानमें वृत्तियाँ (बहिर्मुख होनेसे) नहीं लगेंगी और विषयोंका चिन्तन होगा।रागद्वेषौ व्युदस्य च -- सांसारिक वस्तु महत्त्वशाली है? अपने काममें आनेवाली है? उपयोगी है -- ऐसा जो भाव है? उसका नाम राग है। तात्पर्य है कि अन्तःकरणमें असत् वस्तुका जो रंग चढ़ा हुआ है? वह राग है। असत् वस्तु आदिमें राग रहते हुए कोई उनकी प्राप्तिमें बाधा डालता है? उसके प्रति द्वेष हो जाता है।असत् संसारके किसी अंशमें राग हो जाय तो दूसरे अंशमें द्वेष हो जाता है -- यह नियम है। जैसे? शरीरमें राग हो जाय तो शरीरके अनुकूल वस्तुमात्रमें राग हो जाता है और प्रतिकूल वस्तुमात्रमें द्वेष हो जाता है।संसारके साथ रागसे भी सम्बन्ध जुड़ता है और द्वेषसे भी सम्बन्ध जुड़ता है। रागवाली बातका भी चिन्तन होता है और द्वेषवाली बातका भी चिन्तन होता है। इसलिये साधक न राग करे और न द्वेष करे।ध्यानयोगपरो नित्यम् -- साधक नित्य ही ध्यानयोगके परायण रहे अर्थात् ध्यानके सिवाय दूसरा कोई साधन न करे। ध्यानके समय तो ध्यान करे ही? व्यवहारके समय अर्थात् चलतेफिरते? खातेपीते? कामधंधा करते समय भी यह ध्यान (भाव) सदा बना रहे कि वास्तवमें एक परमात्माके सिवाय संसारकी स्वतन्त्र सत्ता है ही नहीं (गीता 18। 20)।अहंकारं बलं दर्पं ৷৷. विमुच्य -- गुणोंको लेकर अपनेमें जो एक विशेषता दीखती है? उसे अहंकार कहते हैं। जबर्दस्ती करके? विशेषतासे मनमानी करनेका जो आग्रह (हठ) होता है? उसे बल कहते हैं। जमीनजायदाद आदि बाह्य चीजोंकी विशेषताको लेकर जो घमंड होता है? उसे दर्प कहते हैं। भोग? पदार्थ तथा अनुकूल परिस्थिति मिल जाय? इस इच्छाका नाम काम है। अपने स्वार्थ और अभिमानमें ठेस लगनेपर दूसरोंका अनिष्ट करनेके लिये जो जलनात्मक वृत्ति पैदा होती है? उसको क्रोध कहते हैं। भोगबुद्धिसे? सुखआरामबुद्धिसे चीजोंका जो संग्रह किया जाता है? उसे परिग्रह (टिप्पणी प0 947.1) कहते हैं।साधक उपर्युक्त अहंकार? बल? दर्प? काम? क्रोध और परिग्रह -- इन सबका त्याग कर देता है।निर्ममः -- अपने पास निर्वाहमात्रकी जो वस्तुएँ हैं और कर्म करनेके शरीर? इन्द्रियाँ आदि जो साधन हैं? उनमें ममता अर्थात् अपनापन न हो (टिप्पणी प0 947.2)। अपना शरीर? वस्तु आदि जो हमें प्रिय लगते हैं? उनके बने रहनेकी इच्छा न होना निर्मम होना है।जिन व्यक्तियों और वस्तुओंको हम अपनी मानते हैं? वे आजसे सौ वर्ष पहले भी अपनी नहीं थीं और सौ वर्षके बाद भी अपनी नहीं रहेंगी। अतः जो अपनी नहीं रहेंगी? उनका उपयोग या सेवा तो कर सकते हैं? पर उनको,अपनी मानकर अपने पास नहीं रख सकते। अगर उनको अपने पास नहीं रख सकते तो वे अपने नहीं हैं ऐसा माननेमें क्या बाधा है उनको अपनी न माननेसे अधिक निर्मम हो जाता है।शान्तः -- असत् संसारके साथ सम्बन्ध रखनेसे ही अन्तःकरणमें अशान्ति? हलचल आदि पैदा होते हैं। जडतासे सर्वथा सम्बन्धविच्छेद होनेपर अशान्ति कभी पासमें आती ही नहीं। फिर रागद्वेष न रहनेसे साधक हरदम शान्त रहता है।ब्रह्मभूयाय कल्पते -- ममतारहित और शान्त मनुष्य (सांख्ययोगका साधक) परमात्मप्राप्तिका अधिकारी बन जाता है अर्थात् असत्का सर्वथा सम्बन्ध छूटते ही उसमें ब्रह्मप्राप्तिकी योग्यता? सामर्थ्य आ जाती है। कारण कि जबतक असत् पदार्थोंके साथ सम्बन्ध रहता है? तबतक परमात्मप्राप्तिकी सामर्थ्य नहीं आती। सम्बन्ध -- उपर्युक्त साधनसामग्रीसे निष्ठा प्राप्त हो जानेपर क्या होता है -- इसको आगेके श्लोकमें बताते हैं।
Translation · Hindi
।।18.53।।जो विशुद्ध (सात्त्विकी) बुद्धिसे युक्त, वैराग्यके आश्रित, एकान्तका सेवन करनेवाला और नियमित भोजन करनेवाला साधक धैर्यपूर्वक इन्द्रियोंका नियमन करके, शरीर-वाणी-मनको वशमें करके, शब्दादि विषयोंका त्याग करके और राग-द्वेषको छोड़कर निरन्तर ध्यानयोगके परायण हो जाता है, वह अहंकार, बल, दर्प, काम, क्रोध और परिग्रहका त्याग करके एवं निर्मम तथा शान्त होकर ब्रह्मप्राप्तिका पात्र हो जाता है।
ब्रह्मभूतः प्रसन्नात्मा न शोचति न काङ्क्षति।
समः सर्वेषु भूतेषु मद्भक्तिं लभते पराम् ॥
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।।18.54।। व्याख्या -- ब्रह्मभूतः -- जब अन्तःकरणमें विनाशशील वस्तुओंका महत्त्व मिट जाता है? तब अन्तःकरणकी अहंकार? घमंड आदि वृत्तियाँ शान्त हो जाती हैं अर्थात् उनका त्याग हो जाता है। फिर अपने पास जो वस्तुएँ हैं? उनमें भी ममता नहीं रहती। ममता न रहनेसे सुख और भोगबुद्धिसे वस्तुओंका संग्रह नहीं होता। जब सुख और भोगबुद्धि मिट जाती है? तब अन्तःकरणमें स्वतःस्वाभाविक ही शान्ति आ जाती है।इस प्रकार साधक जब असत्से ऊपर उठ जाता है? तब वह ब्रह्मप्राप्तिका पात्र बन जाता है। पात्र बननेपर उसकी ब्रह्मभूतअवस्था अपनेआप हो जाती है। इसके लिये उसको कुछ करना नहीं पड़ता। इस अवस्थामें मैं ब्रह्मस्वरूप हूँ और ब्रह्म मेरा स्वरूप है ऐसा उसको अपनी दृष्टिसे अनुभव हो जाता है। इसी अवस्थाको यहाँ (और गीता 5। 24 में भी) ब्रह्मभूतः पदसे कहा गया है।प्रसन्नात्मा -- जब अन्तःकरणमें असत् वस्तुओंका महत्त्व हो जाता है? तब उन वस्तुओंको प्राप्त करनेकी कामना पैदा हो जाती है और अशान्ति (हलचल) पैदा हो जाती है। परन्तु जब असत् वस्तुओंका महत्त्व मिट जाता है? तब साधकके चित्तमें स्वाभाविक ही प्रसन्नता रहती है। अप्रसन्नताका कारण मिट जानेसे फिर कभी अप्रसन्नता होती ही नहीं। कारण कि सांख्ययोगी साधकके अन्तःकरणमें अपनेसहित संसारका अभाव और परमात्मतत्त्वका भाव अटल रहता है।न शोचति न काङ्क्षति -- उस प्रसन्नताकी पहचान यह है कि वह शोकचिन्ता नहीं करता। सांसारिक कितनी ही बड़ी हानि हो जाय? तो भी वह शोक नहीं करता और अमुक परिस्थिति प्राप्त हो जाय -- ऐसी इच्छा भी नहीं करता। तात्पर्य है कि उत्पन्न और नष्ट होनेवाली तथा आनेजानेवाली परिवर्तनशील परिस्थिति? वस्तु? व्यक्ति? पदार्थ आदिके बननेबिगड़नेसे उसपर कोई असर ही नहीं पड़ता। जो परमात्मामें अटलरूपसे स्थित है? उसपर आनेजानेवाली परिस्थितियोंका असर हो ही कैसे सकता हैसमः सर्वेषु भूतेषु -- जबतक साधकमें किञ्चिन्मात्र भी हर्षशोक? रागद्वेष आदि द्वन्द्व रहते हैं? तबतक वह सर्वत्र व्याप्त परमात्माके साथ अभिन्नताका अनुभव नहीं कर सकता। अभिन्नताका अनुभव न होनेसे वह अपनेको सम्पूर्ण भूतोंमें सम नहीं देख सकता। परन्तु जब साधक हर्षशोकादि द्वन्द्वोंसे सर्वथा रहित हो जाता है? तब परमात्माके साथ स्वतःस्वाभाविक अभिन्नता (जो कि सदासे ही थी) का अनुभव हो जाता है। परमात्माके साथ अभिन्नता होनेसे? अपना कोई व्यक्तित्व (टिप्पणी प0 948) (व्यक्तित्व उसे कहते हैं? जिसमें मनुष्य अपनी सत्ता अलग मानता है और जिससे बन्धन होता है) न रहनेसे अर्थात् मैं हूँ इस रूपसे अपनी कोई अलग सत्ता न रहनेसे वह सम्पूर्ण प्राणियोंमें सम है -- समोऽहं सर्वभूतेषु (गीता 9। 29)? ऐसे ही वह भी सम्पूर्ण प्राणियोंमें सम हो जाता है।वह सम्पूर्ण प्राणियोंमें सम किस प्रकार होता है जैसे -- मनोराज्य और स्वप्नमें जो नाना सृष्टि होती है? उसमें मन ही अनेक रूप धारण करता है अर्थात् वह सृष्टि मनोमयी होती है। मनोमयी होनेसे जैसे सब सृष्टिमें मन है और मनमें सब सृष्टि है? ऐसे ही सब प्राणियोंमें (आत्मरूपसे) वह है और उसमें सम्पूर्ण प्राणी हैं (गीता 6। 29)। इसीको यहाँ समः सर्वेषु भूतेषु कहा है।मद्भक्तिं लभते पराम् -- जब समरूप परमात्माके साथ अभिन्नताका अनुभव होनेसे साधकका सर्वत्र समभाव हो जाता है? तब उसका परमात्मामें प्रतिक्षण वर्धमान एक विलक्षण आकर्षण? खिंचाव? अनुराग हो जाता है। उसीको यहाँ पराभक्ति कहा है।पाँचवें अध्यायके चौबीसवें श्लोकमें जैसे ब्रह्मभूतअवस्थाके बाद ब्रह्मनिर्वाणकी प्राप्ति बतायी है -- स योगी ब्रह्मनिर्वाणं ब्रह्मभूतोऽधिगच्छति? ऐसे ही यहाँ ब्रह्मभूतअवस्थाके बाद पराभक्तिकी प्राप्ति बतायी है। सम्बन्ध -- अब आगेके श्लोकमें पराभक्तिका फल बताते हैं।
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।।18.54।।वह ब्रह्मभूत-अवस्थाको प्राप्त प्रसन्न मनवाला साधक न तो किसीके लिये शोक करता है और न किसीकी इच्छा करता है। ऐसा सम्पूर्ण प्राणियोंमें समभाववाला साधक मेरी पराभक्तिको प्राप्त हो जाता है।
।।18.55।। व्याख्या -- भक्त्या मामभिजानाति -- जब परमात्मतत्त्वमें आकर्षण? अनुराग हो जाता है? तब साधक स्वयं उस परमात्माके सर्वथा समर्पित हो जाता है? उस तत्त्वसे अभिन्न हो जाता है। फिर उसका अलग कोई (स्वतन्त्र) अस्तित्व नहीं रहता अर्थात् उसके अहंभावका अतिसूक्ष्म अंश भी नहीं रहता। इसलिये उसको प्रेमस्वरूपा प्रेमाभक्ति प्राप्त हो जाती है। उस भक्तिसे परमात्मतत्त्वका वास्तविक बोध हो जाता है।,ब्रह्मभूतअवस्था हो जानेपर संसारके सम्बन्धका तो सर्वथा त्याग हो जाता है? पर मैं ब्रह्म हूँ? मैं शान्त हूँ? मैं निर्विकार हूँ? ऐसा सूक्ष्म अहंभाव रह जाता है। यह अहंभाव जबतक रहता है? तबतक परिच्छिन्नता और पराधीनता रहती है। कारण कि यह अहंभाव प्रकृतिका कार्य है और प्रकृति पर है इसलिये पराधीनता रहती है। परमात्माकी तरफ आकृष्ट होनेसे? पराभक्ति होनेसे ही यह अहंभाव मिटता है (टिप्पणी प0 949.1)। इस अहंभावके सर्वथा मिटनेसे ही तत्त्वका वास्तविक बोध होता है।यावान् -- सातवें अध्यायके आरम्भमें भगवान्ने अर्जुनको समग्ररूप सुननेकी आज्ञा दी कि मेरेमें जिसका मन आसक्त हो गया है? जिसको मेरा ही आश्रय है? वह अनन्यभावसे मेरे साथ दृढ़तापूर्वक सम्बन्ध रखते हुए मेरे जिस समग्ररूपको जान लेता है? उसको तुम सुनो। यही बात भगवान्ने सातवें अध्यायके अन्तमें कही कि जरामरणसे मुक्ति पानके लिये जो मेरा आश्रय लेकर यत्न करते हैं? वे ब्रह्म? सम्पूर्ण अध्यात्म और सम्पूर्ण कर्मको अर्थात् सम्पूर्ण निर्गुणविषयको जान लेते हैं और अधिभूत? अधिदैव और अधियज्ञके सहित मुझको अर्थात् सम्पूर्ण सगुणविषयको जान लेते हैं।इस प्रकार निर्गुण और सगुणके सिवाय राम? कृष्ण? शिव? गणेश? शक्ति? सूर्य आदि अनेक रूपोंमें प्रकट होकर परमात्मा लीला करते हैं? उनको भी जान लेना -- यही पराभक्तिसे यावान् अर्थात् समग्ररूपको जानना है।यश्चास्मि तत्त्वतः -- वे ही परमात्मा अनेक रूपोंमें? अनेक आकृतियोंमें? अनेक शक्तियोंको साथ लेकर? अनेक कार्य करनेके लिये बारबार प्रकट होते हैं? और वे ही परमात्मा अनेक सम्प्रदायोंमें अपनीअपनी भावनाके अनुसार अनेक इष्टदेवोंके रूपमें कहे जाते हैं। वास्तवमें परमात्मा एक ही हैं। इस प्रकार मैं जो हूँ -- इसे तत्त्वसे जान लेता है।ततो मां तत्त्वतो ज्ञात्वा विशते तदनन्तरम् -- ऐसा मुझे तत्त्वसे जानकर तत्काल (टिप्पणी प0 949.2) मेरेमें प्रविष्ट हो जाता है अर्थात् मेरे साथ भिन्नताका जो भाव था? वह सर्वथा मिट जाता है।तत्त्वसे जाननेपर उसमें जो अनजानपना था? वह सर्वथा मिट जाता है और वह उस तत्त्वमें प्रविष्ट हो जाता है। यही पूर्णता है और इसीमें मनुष्यजन्मकी सार्थकता है।विशेष बातजीवका परमात्मामें प्रेम (रति? प्रीति या आकर्षण) स्वतः है। परन्तु जब यह जीव प्रकृतिके साथ सम्बन्ध जोड़ लेता है? तब वह परमात्मासे विमुख हो जाता है और उसका संसारमें आकर्षण हो जाता है। यह आकर्षण ही वासना? स्पृहा? कामना? आशा? तृष्णा आदि नामोंसे कहा जाता है।इस वासना आदिका जो विषय (प्रकृतिजन्य पदार्थ) है? वह क्षणभङ्गुर और परिवर्तनशील है तथा यह जीवात्मा स्वयं? नित्य और अपरिवर्तनशील है। परन्तु ऐसा होते हुए भी प्रकृतिके साथ तादात्म्य होनेसे यह परिवर्तनशीलमें आकृष्ट हो जाता है। इससे इसको मिलता तो कुछ नहीं? पर कुछ मिलेगा -- इस भ्रम? वासनाके कारण यह जन्ममरणके चक्करमें पड़ा हुआ महान् दुःख पाता रहता है। इससे छूटनेके लिये भगवान्ने योग बताया है। वह योग जडतासे सम्बन्धविच्छेद करके परमात्माके साथ नित्ययोगका अनुभव करा देता है।गीतामें मुख्यरूपसे तीन योग कहे हैं -- कर्मयोग? ज्ञानयोग और भक्तियोग। इन तीनोंपर विचार किया जाय तो भगवान्का प्रेम तीनों ही योगोंमें है। कर्मयोगमें उसको कर्तव्यरति कहते हैं अर्थात् वह रति कर्तव्य होती है -- स्वे स्वे कर्मण्यभिरतः (18। 45)। [कर्मयोगकी यह रति अन्तमें आत्मरतिमें परिणत हो जाती है (गीता 2। 55 3। 17) और जिस कर्मयोगीमें भक्तिके संस्कार हैं? उसकी यह रति भगवद्रतिमें परिणत हो जाती है।] ज्ञानयोगमें उसी प्रेमको आत्मरति कहते हैं अर्थात् वह रति स्वरूपमें होती है -- योऽन्तःसुखोऽन्तरारामः (5। 24)। और भक्तियोगमें उसी प्रेमको भगवद्रति कहते हैं अर्थात् वह रति भगवान्में होती है (टिप्पणी प0 950.1) -- तुष्यन्ति च रमन्ति च (10। 9)। इस प्रकार इन तीनों योगोंमें रति होनेपर भी गीतामें भगवद्रति की विशेषरूपसे महिमा गायी गयी है।तपस्वी? ज्ञानी और कर्मी -- इन तीनोंसे भी योगी (समतावाला) श्रेष्ठ है (गीता 6। 46)। तात्पर्य यह है कि जडतासे सम्बन्ध रखते हुए बड़ा भारी तप करनेपर? बहुतसे शास्त्रोंका (अनेक प्रकारका) ज्ञानसम्पादन करनेपर और यज्ञ? दान? तीर्थ आदिके बड़ेबड़े अनुष्ठान करनेपर जो कुछ प्राप्त होता है? वह सब अनित्य ही होता है? पर योगीको नित्यतत्त्वकी प्राप्ति होती है। अतः तपस्वी? ज्ञानी और कर्मी -- इन तीनोंसे योगी श्रेष्ठ है। इस प्रकारके कर्मयोगी? ज्ञानयोगी? हठयोगी? लययोगी आदि सब योगियोंमें भी भगवान्ने भक्तियोगी को सर्वश्रेष्ठ बताया है (गीता 6। 47)। यही भक्तियोगी भगवान्के समग्ररूपको जान लेता है। सांख्ययोगी भी पराभक्तिके द्वारा उस समग्ररूपको जान लेता है। उसी समग्ररूपका वर्णन यहाँ यावान् पदसे हुआ है (टिप्पणी प0 950.2)।इस प्रकरणके आरम्भमें अन्तःकरणकी शुद्धिरूप सिद्धिको प्राप्त हुआ साधक जिस प्रकार ब्रह्मको प्राप्त होता है -- यह कहनेकी प्रतिज्ञा की और बताया कि ध्यानयोगके परायण होनेसे वह वैराग्यको प्राप्त होता है। वैराग्यसे अहंकार आदिका त्याग करके ममतारहित होकर शान्त होता है। तब वह ब्रह्मप्राप्तिका पात्र होता है। पात्र होते ही उसकी ब्रह्मभूतअवस्था हो जाती है। ब्रह्मभूतअवस्था होनेपर संसारके सम्बन्धसे जो रागद्वेष? हर्षशोक आदि द्वन्द्व होते थे? वे सर्वथा मिट जाते हैं तो वह सम्पूर्ण प्राणियोंमें सम हो जाता है। सम होनेपर,पराभक्ति प्राप्त हो जाती है। वह पराभक्ति ही वास्तविक प्रीति है। उस प्रीतिसे परमात्माके समग्ररूपका बोध हो जाता है। बोध होते ही उस तत्त्वमें प्रवेश हो जाता है -- विशते तदनन्तरम्।अनन्यभक्तिसे तो मनुष्य भगवान्को तत्त्वसे जान सकता है? उनमें प्रविष्ट हो सकता है और उनके दर्शन भी कर सकता है (गीता 11। 54) परन्तु सांख्ययोगी भगवान्को तत्त्वसे जानकर उनमें प्रविष्ट तो होता है? पर भगवान् उसको दर्शन देनेमें बाध्य नहीं होते। कारण कि उसकी साधना पहलेसे ही विवेकप्रधान रही है? इसलिये उसको दर्शनकी इच्छा नहीं होती। दर्शन न होनेपर भी उसमें कोई कमी नहीं रहती अतः कमी माननी नहीं चाहिये।यहाँ उस तत्त्वमें प्रविष्ट हो जाना ही अनिर्वचनीय प्रेमकी प्राप्ति है। इसी प्रेमको नारदभक्तिसूत्रमें प्रतिक्षण वर्धमान कहा है (टिप्पणी प0 951)। इस प्रेममें सर्वथा पूर्णता हो जाती है अर्थात् उसके लिये करना? जानना और पाना कुछ भी बाकी नहीं रहता। इसलिये न करनेका राग रहता है? न जाननेकी जिज्ञासा रहती है? न जीनेकी आशा रहती है? न मरनेका भय रहता है और न पानेका लालच ही रहता है।जबतक भगवान्में पराभक्ति अर्थात् परम प्रेम नहीं होता? तबतक ब्रह्मभूतअवस्थामें भी मैं ब्रह्म हूँ यह सूक्ष्म अहंकार रहता है। जबतक लेशमात्र भी अहंकार रहता है? तबतक परिच्छिन्नताका अत्यन्त अभाव नहीं होता। परन्तु मैं ब्रह्म हूँ यह सूक्ष्म अहंभाव तबतक जन्ममरणका कारण नहीं बनता? जबतक उसमें प्रकृतिजन्य गुणोंका सङ्ग नहीं होता क्योंकि गुणोंका सङ्ग होनेसे ही बन्धन होता है -- कारणं गुणसङ्गोऽस्य सदसद्योनिजन्मसु (गीता 13। 21)। उदाहरणार्थ -- गाढ़ नींदसे जगनेपर साधारण मनुष्यमात्रको सबसे पहले यह अनुभव होता है कि मैं हूँ। ऐसा अनुभव होते ही जब नाम? रूप? देश? काल जाति आदिके साथ स्वयंका सम्बन्ध जुड़ जाता है? तब मैं हूँ यह अहंभाव शुभअशुभ कर्मोंका कारण बन जाता है? जिससे जन्ममरणका चक्कर चल पड़ता है। परन्तु जो ऊँचे दर्जेका साधक होता है अर्थात् जिसकी निरन्तर ब्रह्मभूतअवस्था रहती है? उसके सात्त्विक ज्ञान (18। 20) में सब जगह ही अपने स्वरूपका बोध रहता है। परन्तु जबतक साधकका सत्त्वगुणके साथ सम्बन्ध रहता है? तबतक नींदसे जगनेपर तत्काल मैं ब्रह्म हूँ अथवा सब कुछ एक परमात्मा ही है -- ऐसी वृत्ति पकड़ी जाती है और मालूम होता है कि नींदमें यह वृत्ति छूट गयी थी? मानो उसकी भूल हो गयी थी और अब पीछे उस तत्त्वकी जागृति हो गयी है? स्मृति आ गयी है। गुणातीत हो जानेपर अर्थात् गुणोंसे सर्वथा सम्बन्धविच्छेद होनेपर विस्मृति और स्मृति -- ऐसी दो अवस्थाएँ नहीं होतीं अर्थात् नींदमें भूल हो गयी और अब स्मृति आ गयी -- ऐसा अनुभव नहीं होता? प्रत्युत नींद तो केवल अन्तःकरणमें आयी थी? अपनेमें नहीं? अपना स्वरूप तो ज्योंकात्यों रहा -- ऐसा अनुभव रहता है। तात्पर्य यह है कि निद्राका आना और उससे जगना -- ये दोनों प्रकृतिमें ही हैं? ऐसा उसका स्पष्ट अनुभव रहता है। इसी अवस्थाको चौदहवें अध्यायके बाईसवें श्लोकमें कहा है कि प्रकाश अर्थात् नींदसे जगना और मोह अर्थात् नींदका आना -- इन दोनोंमें गुणातीत पुरुषके किञ्चिन्मात्र भी रागद्वेष नहीं होते। सम्बन्ध -- पहले श्लोकमें अर्जुनने संन्यास और त्यागके तत्त्वके विषयमें पूछा तो उसके उत्तरमें भगवान्ने चौथेसे बारहवें श्लोकतक कर्मयोगका और इकतालीसवेंसे अड़तालीसवें श्लोकतक कर्मयोगका तथा संक्षेपमें भक्तियोगका वर्णन किया और तेरहवेंसे चालीसवें श्लोकतक विचारप्रधान सांख्ययोगका तथा उन्चासवेंसे पचपनवें श्लोकतक ध्यानप्रधान सांख्ययोगका एवं संक्षेपमें पराभक्तिकी प्राप्तिका वर्णन किया। अब भगवान् शरणागतिकी प्रधानतावाले भक्तियोगका वर्णन आरम्भ करते हैं।
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।।18.55।।उस पराभक्तिसे मेरेको, मैं जितना हूँ और जो हूँ -- इसको तत्त्वसे जान लेता है तथा मेरेको तत्त्वसे जानकर फिर तत्काल मेरेमें प्रविष्ट हो जाता है।
सर्वकर्माण्यपि सदा कुर्वाणो मद्व्यपाश्रयः।
मत्प्रसादादवाप्नोति शाश्वतं पदमव्ययम् ॥
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।।18.56।। व्याख्या -- मद्व्यपाश्रयः -- कर्मोंका? कर्मोंके फलका? कर्मोंके पूरा होने अथवा न होनेका? किसी घटना? परिस्थिति? वस्तु? व्यक्ति आदिका आश्रय न हो। केवल मेरा ही आश्रय (सहारा) हो। इस तरह जो सर्वथा मेरे ही परायण हो जाता है? अपना स्वतन्त्र कुछ नहीं समझता? किसी भी वस्तुको अपनी नहीं मानता? सर्वथा मेरे आश्रित रहता है? ऐसे भक्तको अपने उद्धारके लिये कुछ करना नहीं पड़ता। उसका उद्धार मैं कर देता हूँ (गीता 12। 7) उसको अपने जीवननिर्वाह या साधनसम्बन्धी किसी बातकी कमी नहीं रहती सबकी मैं पूर्ति कर देता हूँ (गीता 9। 22) -- यह मेरा सदाका एक विधान है? नियम है? जो कि सर्वथा शरण हो जानेवाले हरेक प्राणीको प्राप्त हो सकता है (गीता 9। 30 -- 32)।सर्वकर्माण्यपि सदा कुर्वाणः -- यहाँ कर्माणि पदके साथ सर्व और कुर्वाणः पदके साथ सदा पद देनेका तात्पर्य है कि जिस ध्यानपरायण सांख्ययोगीने शरीर? वाणी और मनका संयमन कर लिया है अर्थात् जिसने शरीर आदिकी क्रियाओंको संकुचित कर लिया है और एकान्तमें रहकर सदा ध्यानयोगमें लगा रहता है? उसको जिस पदकी प्राप्ति होती है? उसी पदको लौकिक? पारलौकिक? सामाजिक? शारीरिक आदि सम्पूर्ण कर्तव्यकर्मोंको हमेशा करते हुए भी मेरा आश्रय लेनेवाला भक्त मेरी कृपासे प्राप्त कर लेता है।हरेक व्यक्तिको यह बात तो समझमें आ जाती है कि जो एकान्तमें रहता है और साधनभजन करता है? उसका कल्याण हो जाता है परन्तु यह बात समझमें नहीं आती कि जो सदा मशीनकी तरह संसारका सब काम करता है? उसका कल्याण कैसे होगा उसका कल्याण हो जाय? ऐसी कोई युक्ति नहीं दीखती क्योंकि ऐसे तो सब लोग कर्म करते ही रहते हैं। इतना ही नहीं? मात्र जीव कर्म करते ही रहते हैं? पर उन सबका कल्याण होता हुआ दीखता नहीं और शास्त्र भी ऐसा कहता नहीं इसके उत्तरमें भगवान् कहते हैं -- मत्प्रसादात्। तात्पर्य यह है कि जिसने केवल मेरा ही आश्रय ले लिया है? उसका कल्याण मेरी कृपासे हो जायगा? कौन है मना करनेवालायद्यपि प्राणिमात्रपर भगवान्का अपनापन और कृपा सदासर्वदा स्वतःसिद्ध है? तथापि यह मनुष्य जबतक असत् संसारका आश्रय लेकर भगवान्से विमुख रहता है? तबतक भगवत्कृपा उसके लिये फलीभूत नहीं होती अर्थात् उसके काममें नहीं आती। परन्तु यह मनुष्य भगवान्का आश्रय लेकर ज्योंज्यों दूसरा आश्रय छोड़ता जाता है? त्योंहीत्यों भगवान्का आश्रय दृढ़ होता चला जाता है? और ज्योंज्यों भगवान्का आश्रय दृढ़ होता जाता है? त्योंहीत्यों भगवत्कृपाका अनुभव होता जाता है। जब सर्वथा भगवान्का आश्रय ले लेता है? तब उसे भगवान्की कृपाका पूर्ण अनुभव हो जाता है।अवाप्नोति शाश्वतं पदमव्ययम् -- स्वतःसिद्ध परमपदकी प्राप्ति अपने कर्मोंसे? अपने पुरुषार्थसे अथवा अपने साधनसे नहीं होती। यह तो केवल भगवत्कृपासे ही होती है। शाश्वत अव्ययपद सर्वोत्कृष्ट है। उसी परमपदको भक्तिमार्गमें परमधाम? सत्यलोक? वैकुण्ठलोक? गोलोक? साकेतलोक आदि कहते हैं और ज्ञानमार्गमें विदेहकैवल्य? मुक्ति? स्वरूपस्थिति आदि कहते हैं। वह परमपद तत्त्वसे एक होते हुए भी मार्गों और उपासनाओंका भेद होनेसे उपासकोंकी दृष्टिसे भिन्नभिन्न कहा जाता है (गीता 8। 21 14। 27)। भगवान्का चिन्मय लोक एक देशविशेषमें होते हुए भी सब जगह व्यापकरूपसे परिपूर्ण है। जहाँ भगवान् हैं? वहीं उनका लोक भी है क्योंकि भगवान् और उनका लोक तत्त्वसे एक ही हैं। भगवान् सर्वत्र विराजमान हैं अतः उनका लोक भी सर्वत्र विराजमान (सर्वव्यापी) है। जब भक्तकी अनन्य निष्ठा सिद्ध हो जाती है? तब परिच्छिन्नताका अत्यन्त अभाव हो जाता है और वही लोक उसके सामने प्रकट हो जाता है अर्थात् उसे यहाँ जीतेजी ही उस लोककी दिव्य लीलाओंका अनुभव होने लगता है। परन्तु जिस भक्तकी ऐसी धारणा रहती है कि वह दिव्य लोक एक देशविशेषमें ही है? तो उसे उस लोककी प्राप्ति शरीर छोड़नेपर ही होती है। उसे लेनेके लिये भगवान्के पार्षद आते हैं और कहींकहीं स्वयं भगवान् भी आते हैं। सम्बन्ध -- पूर्वश्लोकमें अपना सामान्य विधान (नियम) बताकर अब भगवान् आगेके श्लोकमें अर्जुनके लिये विशेषरूपसे आज्ञा देते हैं।
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।।18.56।।मेरा आश्रय लेनेवाला भक्त सदा सब कर्म करता हुआ भी मेरी कृपासे शाश्वत अविनाशी पदको प्राप्त हो जाता है।
।।18.57।। व्याख्या -- [इस श्लोकमें भगवान्ने चार बातें बतायी हैं --,(1) चेतसा सर्वकर्माणि मयि संन्यस्य -- सम्पूर्ण कर्मोंको चित्तसे मेरे अर्पण कर दे।(2) मत्परः -- स्वयंको मेरे अर्पित कर दे।(3) बुद्धियोगमुपाश्रित्य -- समताका आश्रय लेकर संसारसे सम्बन्धविच्छेद कर ले।(4) मच्चितः सततं भव -- निरन्तर मेरेमें चित्तवाला हो जा अर्थात् मेरे साथ अटल सम्बन्ध कर ले।]चेतसा सर्वकर्माणि मयि संन्यस्य -- चित्तसे कर्मोंको अर्पित करनेका तात्पर्य है कि मनुष्य चित्तसे यह दृढ़तासे मान ले कि मन? बुद्धि? इन्द्रियाँ? शरीर आदि और संसारके व्यक्ति? पदार्थ? घटना? परिस्थिति आदि सब भगवान्के ही हैं। भगवान् ही इन सबके मालिक हैं। इनमेंसे कोई भी चीज किसीकी व्यक्तिगत नहीं है। केवल इन वस्तुओंका सदुपयोग करनेके लिये ही भगवान्ने व्यक्तिगत अधिकार दिया है। इस दिये हुए अधिकारको भी भगवान्के अर्पण कर देना है।शरीर? इन्द्रियाँ? मन आदिसे जो कुछ शास्त्रविहित सांसारिक या पारमार्थिक क्रियाएँ होती हैं? वे सब भगवान्की मरजीसे ही होती हैं। मनुष्य तो केवल अहंकारके कारण उनको अपनी मान लेता है। उन क्रियाओँमें जो अपनापन है? उसे भी भगवान्के अर्पण कर देना है क्योंकि वह अपनापन केवल मूर्खतासे माना हुआ है? वास्तवमें है नहीं। इसलिये उनमें अपनेपनका भाव बिलकुल उठा देना चाहिये और उन सबपर भगवान्की मुहर लगा देनी चाहिये।मत्परः -- भगवान् ही मेरे परम आश्रय हैं? उनके सिवाय मेरा कुछ नहीं है? मेरेको करना भी कुछ नहीं है? पाना भी कुछ नहीं है? किसीसे लेना भी कुछ नहीं है अर्थात् देश? काल? वस्तु? व्यक्ति? घटना? परिस्थिति आदिसे मेरा किञ्चिन्मात्र कोई प्रयोजन नहीं है -- ऐसा अनन्यभाव हो जाना ही भगवान्के परायण होना है।एक बात खास ध्यान देनेकी है -- रुपयेपैसे? कुटुम्ब? शरीर आदिको मनुष्य अपना मानते हैं और मनमें यह समझते हैं कि हम इनके मालिक बन गये? हमारा इनपर आधिपत्य है परन्तु वास्तवमें यह बात बिलकुल झूठी है? कोरा वहम है और बड़ा भारी धोखा है। जो किसी चीजको अपनी मान लेता है? वह उस चीजका गुलाम बन जाता है और वह चीज उसका मालिक बन जाती है। फिर उस चीजके बिना वह रह नहीं सकता। अतः जिन चीजोंको मनुष्य अपनी मान लेता है? वे सब उसपर चढ़ जाती हैं और वह तुच्छ हो जाता है। वह चीज चाहे रुपया हो? चाहे कुटुम्बी हो? चाहे शरीर हो? चाहे विद्याबुद्धि आदि हो। ये सब चीजें प्राकृत हैं और अपनेसे भिन्न हैं? पर हैं। इनके अधीन होना ही पराधीन होना है।भगवान् स्वकीय हैं? अपने हैं। उनको मनुष्य अपना मानेगा? तो वे मनुष्यके वशमें हो जायँगे। भगवान्के हृदयमें भक्तका जितना आदर है? उतना आदर करनेवाला संसारमें दूसरा कोई नहीं है। भगवान् भक्तके दास हो जाते हैं और उसे अपना मुकुटमणि बना लेते हैं -- मैं तो हूँ भगतनका दास भगत मेरे मुकुटमणि? परन्तु संसार मनुष्यका दास बनकर उसे अपना मुकुटमणि नहीं बनायेगा। वह तो उसे अपना दास बनाकर पददलित ही करेगा। इसलिये केवल भगवान्के शरण होकर सर्वथा उन्हींके परायण हो जाना चाहिये।बुद्धियोगमुपाश्रित्य -- गीताभरमें देखा जाय तो समताकी बड़ी भारी महिमा है। मनुष्यमें एक समता आ गयी तो वह ज्ञानी? ध्यानी? योगी? भक्त आदि सब कुछ बन गया। परन्तु यदि उसमें समता नहीं आयी तो अच्छेअच्छे लक्षण आनेपर भी भगवान् उसको पूर्णता नहीं मानते। वह समता मनुष्यमें स्वाभाविक रहती है। केवल आनेजानेवाली परिस्थितियोंके साथ मिलकर वह सुखीदुःखी हो जाता है। इसलिये उनमें मनुष्य सावधान रहे कि आनेजानेवाली परिस्थितिके साथ मैं नहीं हूँ। सुख आया? अनुकूल परिस्थिति आयी तो भी मैं हूँ और सुख चला गया? अनुकूल परिस्थिति चली गयी तो भी मैं हूँ। ऐसे ही दुःख आया? प्रतिकूल परिस्थिति आयी तो भी मैं हूँ और दुःख चला गया? प्रतिकूल परिस्थिति चली गयी तो भी मैं हूँ। अतः सुखदुःखमें? अनुकूलताप्रतिकूलतामें? हानिलाभमें मैं सदैव ज्योंकात्यों रहता हूँ। परिस्थितियोंके बदलनेपर भी मैं नहीं बदलता? सदा वही रहता हूँ। इस तरह अपनेआपमें स्थित रहे। अपनेआपमें स्थित रहनेसे सुखदुःख आदिमें समता हो जायगी। यह समता ही भगवान्की आराधना है -- समत्वमाराधनमच्युतस्य (विष्णुपुराण 1। 17। 90)। इसीलिये यहाँ भगवान् बुद्धियोग अर्थात् समताका आश्रय लेनेके लिये कहते हैं।मच्चित्तः सततं भव -- जो अपनेको सर्वथा भगवान्के समर्पित कर देता है? उसका चित्त भी सर्वथा भगवान्के चरणोंमें समर्पित हो जाता है। फिर उसपर भगवान्का जो स्वतःस्वाभाविक अधिकार है? वह प्रकट हो जाता है और उसके चित्तमें स्वयं भगवान् आकर विराजमान हो जाते हैं। यही मच्चित्तः होना है।मच्चित्तः पदके साथ सततम् पद देनेका अर्थ है कि निरन्तर मेरेमें (भगवान्में) चित्तवाला हो जा। भगवान्का निरन्तर चिन्तन तभी होगा? जब मैं भगवान्का हूँ इस प्रकार अहंता भगवान्में लग जायगी। अहंता भगवान्में लग जानेपर चित्त स्वतःस्वाभाविक भगवान्में लग जाता है। जैसे? शिष्य बननेपर मैं गुरुका हूँ इस प्रकार अहंता गुरुमें लग जानेपर गुरुकी याद निरन्तर बनी रहती है। गुरुका सम्बन्ध अहंतामें बैठ जानेके कारण इस सम्बन्धकी याद आये तो भी याद है और याद न आये तो भी याद है क्योंकि स्वयं निरन्तर रहता है। इसमें भी देखा जाय तो गुरुके साथ उसने खुद सम्बन्ध जोड़ा है परन्तु भगवान्के साथ इस जीवका स्वतःसिद्ध नित्य सम्बन्ध है। केवल संसारके साथ सम्बन्ध जोड़नेसे ही नित्य सम्बन्धकी विस्मृति हुई है। उस विस्मृतिको मिटानेके लिये भगवान् कहते हैं कि निरन्तर मेरेमें चित्तवाला हो जा।,साधक कोई भी सांसारिक कामधंधा करे? तो उसमें यह एक सावधानी रखे कि अपने चित्तको उस कामधंधेमें द्रवित न होने दे? चित्तको संसारके साथ घुलनेमिलने न दे अर्थात् तदाकार न होने दे? प्रत्युत उसमें अपने चित्तको कठोर रखे। परन्तु भगवन्नामका जप? कीर्तन? भगवत्कथा? भगवच्चिन्तन आदि भगवत्सम्बन्धी कार्योंमें चित्तको द्रवित करता रहे? तल्लीन करता रहे? उस रसमें चित्तको तरान्तर करता रहे (टिप्पणी प0 954.1)। इस प्रकार करते रहनेसे साधक बहुत जल्दी भगवान्में चित्तवाला हो जायगा।प्रेमसम्बन्धी विशेष बातचित्तसे सब कर्म भगवान्के अर्पण करनेसे संसारसे नित्यवियोग हो जाता है (टिप्पणी प0 954.2) और भगवान्के परायण होनेसे नित्ययोग (प्रेम) हो जाता है। नित्ययोगमें योग? नित्ययोगमें वियोग? वियोगमें नित्ययोग और वियोगमें वियोग -- ये चार अवस्थाएँ चित्तकी वृत्तियोंको लेकर होती हैं। इन चारों अवस्थाओंको इस प्रकार समझना चाहिये -- जैसे? श्रीराधा और श्रीकृष्णका परस्पर मिलन होता है? तो यह नित्ययोगमें योग है। मिलन होनेपर भी श्रीजीमें ऐसा भाव आ जाता है कि प्रियतम कहीं चले गये हैं और वे एकदम कह उठती हैं कि प्यारे तुम कहाँ चले गये तो यह नित्ययोगमें वियोग है। श्यामसुन्दर सामने नहीं हैं? पर मनसे उन्हींका गाढ़ चिन्तन हो रहा है और वे मनसे प्रत्यक्ष मिलते हुए दीख रहे हैं? तो यह वियोगमें नित्ययोग है। श्यामसुन्दर थोड़े समयके लिये सामने नहीं आये? पर मनमें ऐसा भाव है कि बहुत समय बीत गया? श्यामसुन्दर मिले नहीं? क्या करूँ कहाँ जाऊँ श्यामसुन्दर कैसे मिलें तो यह वियोगमें वियोग है। वास्तवमें इन चारों अवस्थाओंमें भगवान्के साथ नित्ययोग ज्योंकात्यों बना रहता है? वियोग कभी होता ही नहीं? हो सकता ही नहीं और होनेकी संभावना भी नहीं। इसी नित्ययोगको प्रेम कहते हैं क्योंकि प्रेममें प्रेमी और प्रेमास्पद दोनों अभिन्न रहते हैं। वहाँ भिन्नता कभी हो ही नहीं सकती। प्रेमका आदानप्रदान,करनेके लिये ही भक्त और भगवान्में संयोगवियोगकी लीला हुआ करती है।यह प्रेम प्रतिक्षण वर्धमान किस प्रकार है जब प्रेमी और प्रेमास्पद परस्पर मिलते हैं? तब प्रियतम पहले चले गये थे? उनसे वियोग हो गया था अब कहीं ये फिर न चले जायँ (टिप्पणी प0 954.3) इस भावके कारण प्रेमास्पदके मिलनेमें तृप्ति नहीं होती? सन्तोष नहीं होता। वे चले जायँगे -- इस बातको लेकर मन ज्यादा खिंचता है। इसलिये इस प्रेमको प्रतिक्षण वर्धमान बताया है।प्रेम(भक्ति)में चार प्रकारका रस अथवा रति होती है -- दास्य? सख्य? वात्सल्य और माधुर्य। इन रसोंमें दास्यसे सख्य? सख्यसे वात्सल्य और वात्सल्यसे माधुर्यरस श्रेष्ठ है क्योंकि इनमें क्रमशः भगवान्के ऐश्वर्यकी विस्मृति ज्यादा होती चली जाती है। परन्तु जब इन चारोंमेंसे कोई एक भी रस पूर्णतामें पहुँच जाता है? तब उसमें दूसरे रसोंकी कमी नहीं रहती अर्थात् उसमें सभी रस आ जाते हैं। जैसे? दास्यरस पूर्णतामें पहुँच जाता है तो उसमें सख्य? वात्सल्य और माधुर्य -- तीनों रस आ जाते हैं। यही बात अन्य रसोंके विषयमें भी समझनी चाहिये। कारण यह है कि भगवान् पूर्ण हैं? उनका प्रेम भी पूर्ण है और परमात्माका अंश होनेसे जीव स्वयं भी पूर्ण है। अपूर्णता तो केवल संसारके सम्बन्धसे ही आती है। इसलिये भगवान्के साथ किसी भी रीतिसे रति हो जायगी तो वह पूर्ण हो जायगी? उसमें कोई कमी नहीं रहेगी।दास्य रतिमें भक्तका भगवान्के प्रति यह भाव रहता है कि भगवान् मेरे स्वामी हैं और मैं उनका सेवक हूँ। मेरेपर उनका पूरा अधिकार है। वे चाहे जो करें? चाहे जैसी परिस्थितिमें रखें और मेरेसे चाहे जैसा काम लें। मेरेपर अत्यधिक अपनापन होनेसे ही वे बिना मेरी सम्मति लिये ही मेरे लिये सब विधान करते हैं।सख्य रतिमें भक्तका भगवान्के प्रति यह भाव रहता है कि भगवान् मेरे सखा हैं और मैं उनका सखा हूँ। वे मेरे प्यारे हैं और मैं उनका प्यारा हूँ। उनका मेरेपर पूरा अधिकार है और मेरा उनपर पूरा अधिकार है। इसलिये मैं उनकी बात मानता हूँ? तो मेरी भी बात उनको माननी पड़ेगी।वात्सल्य रतिमें भक्तका अपनेमें स्वामिभाव रहता है कि मैं भगवान्की माता हूँ या उनका पिता हूँ अथवा उनका गुरु हूँ और वह तो हमारा बच्चा है अथवा शिष्य है इसलिये उसका पालनपोषण करना है। उसकी निगरानी भी रखनी है कि कहीं वह अपना नुकसान न कर ले जैसे -- नन्दबाबा और यशोदा मैया कन्हैयाका खयाल रखते हैं और कन्हैया वनमें जाता है तो उसकी निगरानी रखनेके लिये दाऊजीको साथमें भेजते हैंमाधुर्य (टिप्पणी प0 955) रतिमें भक्तको भगवान्के ऐश्वर्यकी विशेष विस्मृति रहती है अतः इस रतिमें भक्त भगवान्के साथ अपनी अभिन्नता (घनिष्ठ अपनापन) मानता है। अभिन्नता माननेसे उनके लिये सुखदायी सामग्री जुटानी है? उन्हें सुखआराम पहुँचाना है? उनको किसी तरहकी कोई तकलीफ न हो -- ऐसा भाव बना रहता है।प्रेमरस अलौकिक है? चिन्मय है। इसका आस्वादन करनेवाले केवल भगवान् ही हैं। प्रेममें प्रेमी और प्रेमास्पद दोनों ही चिन्मयतत्त्व होते हैं। कभी प्रेमी प्रेमास्पद बन जाता है और कभी प्रेमास्पद प्रेमी हो जाता है। अतः एक चिन्मयतत्त्व ही प्रेमका आस्वादन करनेके लिये दो रूपोंमें हो जाता है।प्रेमके तत्त्वको न समझनेके कारण कुछ लोग सांसारिक कामको ही प्रेम कह देते हैं। उनका यह कहना बिलकुल गलत है क्योंकि काम तो चौरासी लाख योनियोंके सम्पूर्ण जीवोंमें रहता है और उन जीवोंमें भी जो भूत? प्रेत? पिशाच होते हैं? उनमें काम (सुखभोगकी इच्छा) अत्यधिक होता है। परन्तु प्रेमके अधिकारी जीवन्मुक्त महापुरुष ही होते हैं।काममें लेनेहीलेनेकी भावना होती है और प्रेममें देनेहीदेनेकी भावना होती है। काममें अपनी इन्द्रियोंको तृप्त करने -- उनसे सुख भोगनेका भाव रहता है और प्रेममें अपने प्रेमास्पदको सुख पहुँचाने तथा सेवापरायण रहनेका भाव रहता है। काम केवल शरीरको लेकर ही होता है और प्रेम स्थूलदृष्टिसे शरीरमें दीखते हुए भी वास्तवमें चिन्मयतत्त्वसे ही होता है। काममें मोह (मूढ़भाव) रहता है और प्रेममें मोहकी गन्ध भी नहीं रहती। काममें संसार तथा संसारका दुःख भरा रहता है और प्रेममें मुक्ति तथा मुक्तिसे भी विलक्षण आनन्द रहता है। काममें जडता(शरीर? इन्द्रियाँ? आदि) की मुख्यता रहती है और प्रेममें चिन्मयता(चेतन स्वरूप) की मुख्यता रहती है। काममें राग होता है और प्रेममें त्याग होता है। काममें परतन्त्रता होती है और प्रेममें परतन्त्रताका लेश भी नहीं होता अर्थात् सर्वथा स्वतन्त्रता होती है। काममें वह मेरे काममें आ जाय ऐसा भाव रहता है और प्रेममें मैं उसके काममें आ जाऊँ ऐसा भाव रहता है। काममें कामी भोग्य वस्तुका गुलाम बन जाता है और प्रेममें स्वयं भगवान् प्रेमीके गुलाम बन जाते हैं। कामका रस नीरसतामें बदलता है और प्रेमका रस आनन्दरूपसे प्रतिक्षण बढ़ता ही रहता है। काम खिन्नतासे पैदा होता है और प्रेम प्रेमास्पदकी प्रसन्तासे प्रकट होता है। काममें अपनी प्रसन्नताका ही उद्देश्य रहता है। और प्रेममें प्रेमास्पदकी प्रसन्नताका ही उद्देश्य रहता है। काममार्ग नरकोंकी तरफ ले जाता है और प्रेममार्ग भगवान्की तरफ ले जाता है। काममें दो होकर दो ही रहते हैं अर्थात् द्वैधीभाव (भिन्नता या भेद) कभी मिटता नहीं और प्रेममें एक होकर दो होते हैं अर्थात् अभिन्नता कभी मिटती नहीं (टिप्पणी प0 956)। सम्बन्ध -- पूर्वश्लोकमें दी हुई आज्ञाको अब भगवान् आगेके दो श्लोकोंमें क्रमशः अन्वय और व्यतिरेकरीतिसे दृढ़ करते हैं।
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।।18.57।।चित्तसे सम्पूर्ण कर्म मुझमें अर्पण करके, मेरे परायण होकर तथा समताका आश्रय लेकर निरन्तर मुझमें चित्तवाला हो जा।
।।18.58।। व्याख्या -- मच्चित्तः सर्वदुर्गाणि मत्प्रसादात्तरिष्यसि -- भगवान् कहते हैं कि मेरेमें चित्तवाला होनेसे तू मेरी कृपासे सम्पूर्ण विघ्न? बाधा? शोक? दुःख आदिको तर जायगा अर्थात् उनको दूर करनेके लिये तुझे कुछ भी प्रयास नहीं करना पड़ेगा।भगवद्भक्तने अपनी तरफसे सब कर्म भगवान्के अर्पण कर दिये? स्वयं भगवान्के अर्पित हो गया? समताके आश्रयसे संसारकी संयोगजन्य लोलुपतासे सर्वथा विमुख हो गया और भगवान्के साथ अटल सम्बन्ध जोड़ लिया। यह सब कुछ हो जानेपर भी वास्तविक तत्त्वकी प्राप्तिमें यदि कुछ कमी रह जाय या सांसारिक लोगोंकी अपेक्षा अपनेमें कुछ विशेषता देखकर अभिमान आ जाय अथवा इस प्रकारके कोई सूक्ष्म दोष रह जायँ? तो उन दोषोंको दूर करनेकी साधकपर कोई जिम्मेवारी नहीं रहती? प्रत्युत उन दोषोंको? विघ्नबाधाओंको दूर करनेकी पूरी जिम्मेवारी भगवान्की हो जाती है। इसलिये भगवान् कहते हैं -- मत्प्रसादात्तरिष्यसि अर्थात् मेरी कृपासे सम्पूर्ण विघ्नबाधाओँको तर जायगा। इसका तात्पर्य यह निकला कि भक्त अपनी तरफसे? उसको जितना समझमें आ जाय? उतना पूरी सावधानीके साथ कर ले? उसके बाद जो कुछ कमी रह जायगी? वह भगवान्की कृपासे पूरी हो जायगी।मनुष्यका अगर कुछ अपराध हुआ है तो वह यही हुआ है कि उसने संसारके साथ अपना सम्बन्ध मान लिया और भगवान्से विमुख हो गया। अब उस अपराधको दूर करनेके लिये वह अपनी ओरसे संसारका सम्बन्ध तोड़कर भगवान्के सम्मुख हो जाय। सम्मुख हो जानेपर जो कुछ कमी रह जायगी? वह भगवान्की कृपासे पूरी हो जायगी। अब आगेका सब काम भगवान् कर लेंगे। तात्पर्य यह हुआ कि भगवत्कृपा प्राप्त करनेमें संसारके साथ किञ्चित् भी सम्बन्ध मानना और भगवान्से विमुख हो जाना -- यही बाधा थी। वह बाधा उसने मिटा दी तो अब पूर्णताकी प्राप्ति भगवत्कृपा अपनेआप करा देगी।जिसका प्रकृति और प्रकृतिके कार्य शरीरादिके साथ सम्बन्ध है? उसपर ही शास्त्रोंका विधिनिषेध? अपने वर्णआश्रमके अनुसार कर्तव्यका पालन आदि नियम लागू होते हैं और उसको उनउन नियमोंका पालन,जरूर करना चाहिये। कारण कि प्रकृति और प्रकृतिके कार्य शरीरादिके सम्बन्धको लेकर ही पापपुण्य होते हैं और उनका फल सुखदुःख भी भोगना पड़ता है। इसलिये उसपर शास्त्रीय मर्यादा और नियम विशेषतासे लागू होते हैं। परन्तु जो प्रकृति और प्रकृतिके कार्यसे सर्वथा ही विमुख होकर भगवान्के सम्मुख हो जाता है? वह शास्त्रीय विधिनिषेध और वर्णआश्रमोंकी मर्यादाका दास नहीं रहता। वह विधिनिषेधसे भी ऊँचा उठ जाता है अर्थात् उसपर विधिनिषेध लागू नहीं होते क्योंकि विधिनिषेधकी मुख्यता प्रकृतिके राज्यमें ही रहती है। प्रभुके राज्यमें तो शरणागतिकी ही मुख्यता रहती है।जीव साक्षात् परमात्माका अंश है (गीता 15। 7)। यदि वह केवल अपने अंशी परमात्माकी ही तरफ चलता है तो उसपर देव? ऋषि? प्राणी? मातापिता आदि आप्तजन और दादापरदादा आदि पितरोंका भी कोई ऋण नहीं रहता (टिप्पणी प0 957) क्योंकि शुद्ध चेतन अंशने इनसे कभी कुछ लिया ही नहीं। लेना तभी बनता है? जब वह जड शरीरके साथ अपना सम्बन्ध जोड़ लेता है और सम्बन्ध जोड़नेसे ही कमी आती है नहीं तो उसमें कभी कमी आती ही नहीं -- नाभावो विद्यते सतः (गीता 2। 16)। जब उसमें कभी कमी आती ही नहीं? तो फिर वह उनका ऋणी कैसे बन सकता है यही सम्पूर्ण विघ्नोंको तरना हैसाधनकालमें जीवननिर्वाहकी समस्या? शरीरमें रोग आदि अनेक विघ्नबाधाएँ आती हैं परन्तु उनके आनेपर भी भगवान्की कृपाका सहारा रहनेसे साधक विचलित नहीं होता। उसे तो उन विघ्नबाधाओंमें भगवान्की विशेष कृपा ही दीखती है। इसलिये उसे विघ्नबाधाएँ बाधारूपसे दीखती ही नहीं? प्रत्युत कृपारूपसे ही दीखती हैं।पारमार्थिक साधनमें विघ्नबाधाओंके आनेकी तथा भगवत्प्राप्तिमें आड़ लगनेकी सम्भावना रहती है। इसके लिये भगवान् कहते हैं कि मेरा आश्रय लेनेवालेके दोनों काम मैं कर दूँगा अर्थात् अपनी कृपासे साधनकी सम्पूर्ण विघ्नबाधाओंको भी दूर कर दूँगा और उस साधनके द्वारा अपनी प्राप्ति भी करा दूँगा।अथ चेत्त्वमहंकारान्न श्रोष्यसि विनङ्क्ष्यसि -- भगवान् अत्यधिक कृपालुताके कारण आत्मीयतापूर्वक अर्जुनसे कह रहे हैं कि अथ -- पक्षान्तरमें मैंने जो कुछ कहा है? उसे न मानकर अगर अहंकारके कारण अर्थात् मैं भी कुछ जानता हूँ? करता हूँ तथा मैं कुछ समझ सकता हूँ? कुछ कर सकता हूँ आदि भावोंके कारण तू मेरी बात नहीं सुनेगा? मेरे इशारेके अनुसार नहीं चलेगा? मेरा कहना नहीं मानेगा? तो तेरा पतन हो जायगा -- विनङ्क्ष्यसि।यद्यपि अर्जुनके लिये यह किञ्चिन्मात्र भी सम्भव नहीं है कि वह भगवान्की बात न सुने अथवा न माने? तथापि भगवान् कहते हैं कि चेत् -- अगर तू मेरी बात नहीं सुनेगा तो तेरा पतन हो जायगा। तात्पर्य यह है कि अगर तू अज्ञता अर्थात् अनजानपनेसे मेरी बात न सुने अथवा किसी भूलके कारण न सुने? तो यह सब क्षम्य है परन्तु यदि तू अहंकारसे मेरी बात नहीं सुनेगा तो तेरा पतन हो जायगा क्योंकि अहंकारसे मेरी बात न सुननेसे तेरा अभिमान बढ़ जायगा? जो सम्पूर्ण आसुरी सम्पत्तिका मूल है।पहले चौथे अध्यायमें भगवान् स्वयं अपने श्रीमुखसे कहकर आये हैं कि तू मेरा भक्त और प्रिय सखा है -- भक्तोऽसि मे सखा चेति (4। 3) और फिर नवें अध्यायमें उन्होंने कहा है कि हे अर्जुन तू प्रतिज्ञा कर कि मेरे भक्तका पतन नहीं होता -- कौन्तेय प्रतिजानीहि न मे भक्तः प्रणश्यति (9। 31)। इससे सिद्ध हुआ कि अर्जुन भगवान्के भक्त हैं अतः वे कभी भगवान्से विमुख नहीं हो सकते और उनका पतन भी कभी नहीं हो सकता। परन्तु वे अर्जुन भी यदि भगवान्की बात नहीं सुनेंगे तो भगवान्से विमुख हो जायँगे और भगवान्से विमुख होनेके कारण उनका भी पतन हो जायगा। तात्पर्य यह है कि भगवान्से विमुख होनेके कारण ही प्राणिका पतन होता है अर्थात् वह जन्ममरणके चक्करमें पड़ता है (गीता 9। 3 16। 20)।विशेष बातइसी अध्यायके छप्पनवें श्लोकमें भगवान्ने प्रथम पुरुष अवाप्नोति का प्रयोग करके सामान्य रीतिसे सबके लिये कहा कि मेरी कृपासे परमपदकी प्राप्ति हो जाती है? और यहाँ मध्यम पुरुष तरिष्यसि का प्रयोग करके अर्जुनके लिये कहते हैं कि मेरी कृपासे तू विघ्नबाधाओंको तर जायगा। इन दोनों बातोंका तात्पर्य यह है कि भगवान्की कृपामें जो शक्ति है? वह शक्ति किसी साधनमें नहीं है। इसका अर्थ यह नहीं कि साधन न करें? प्रत्युत परमात्मप्राप्तिके लिये साधन करना मनुष्यका स्वाभाविक धर्म होना चाहिये क्योंकि मनुष्यजन्म केवल परमात्मप्राप्तिके लिये ही मिला है। मनुष्यजन्मको प्राप्त करके भी जो परमात्माको प्राप्त नहीं करता? वह यदि ऊँचेसेऊँचे लोकोंमें भी चला जाय? तो भी उसे लौटकर संसार(जन्ममरण)में आना ही पड़ेगा (टिप्पणी प0 958) (गीता 8। 16)। इसलिये जब यह मनुष्यशरीर प्राप्त हुआ है? तो फिर मनुष्यको जीतेजी ही भगवत्प्राप्ति कर लेनी चाहिये और जन्ममरणसे रहित हो जाना चाहिये। कर्मयोगीके लिये भी भगवान्ने कहा है कि समतायुक्त पुरुष इस जीवितअवस्थामें ही पुण्य और पाप -- दोनोंसे रहित हो जाता है (गीता 2। 50)। तात्पर्य यह हुआ कि कर्मबन्धनसे सर्वथा रहित होना अर्थात् जन्ममरणसे रहित होना मनुष्यमात्रका परम ध्येय है।दसवें अध्यायके ग्यारहवें श्लोकमें भगवान्ने कहा है कि मैं अपनी कृपासे भक्तोंके अन्तःकरणमें ज्ञान प्रकाशित कर देता हूँ? और ग्यारहवें अध्यायके सैंतालीसवें श्लोकमें भगवान्ने कहा कि मैंने अपनी कृपासे ही विराट्रूप दिखाया है। उसी कृपाको लेकर भगवान् यहाँ कहते हैं कि मेरी कृपासे परमपदकी प्राप्ति हो जायगी (18। 56) और मेरी कृपासे ही सम्पूर्ण विघ्नोंको तर जायगा (18। 58)। परमपदको प्राप्त होनेपर किसी प्रकारकी विघ्नबाधा सामने आनेकी सम्भावना ही नहीं रहती। फिर भी सम्पूर्ण विघ्नबाधाओंको तरनेकी बात कहनेका तात्पर्य यह है कि अर्जुनके मनमें यह भय बैठा था कि युद्ध करनेसे मुझे पाप लगेगा युद्धके कारण कुलपरम्पराके नष्ट होनेसे पितरोंका पतन हो जायगा और इस प्रकार अनर्थपरम्परा बढ़ती ही जायगी हमलोग राज्यके लोभमें आकर इस महान् पापको करनेके लिये तैयार हो गये हैं? इसलिये मैं शस्त्र छोड़कर बैठ जाऊँ और धृतराष्ट्रके पक्षके लोग मेरेको मार भी दें? तो भी मेरा कल्याण ही होगा (गीता 1। 36 -- 46)। इन सभी बातोंको लेकर और अनेक जन्मोंके दोषोंको भी लेकर भगवान् अर्जुनसे कहते हैं कि मेरी कृपासे तू सब विघ्नोंको? पापोंको तर जायगा -- सर्वदुर्गाणि मत्प्रसादात्तरिष्यसि। भगवान्ने बहुवचनमें दुर्गाणि पद देकर भी उसके साथ सर्व शब्द और जोड़ दिया है। इसका तात्पर्य यह है कि मेरी कृपासे तेरा किञ्चिन्मात्र भी पाप नहीं रहेगा कोई भी बन्धन नहीं रहेगा और मेरी कृपासे सर्वथा शुद्ध होकर तू परमपदको प्राप्त हो जायगा।
Translation · Hindi
।।18.58।।मेरेमें चित्तवाला होकर तू मेरी कृपासे सम्पूर्ण विघ्नोंको तर जायगा और यदि तू अहंकारके कारण मेरी बात नहीं सुनेगा तो तेरा पतन हो जायगा।
यदहंकारमाश्रित्य न योत्स्य इति मन्यसे।
मिथ्यैष व्यवसायस्ते प्रकृतिस्त्वां नियोक्ष्यति ॥
Commentary · Hindi
।।18.59।। व्याख्या -- यदहंकारमाश्रित्य -- प्रकृतिसे ही महत्तत्त्व और महत्तत्त्वसे अहंकार पैदा हुआ है। उस अहंकारका ही एक विकृत अंश है -- मैं शरीर हूँ। इस विकृत अहंकारका आश्रय लेनेवाला पुरुष कभी भी क्रियारहित नहीं हो सकता। कारण कि प्रकृति हरदम क्रियाशील है? बदलनेवाली है? इसलिये उसके आश्रित रहनेवाला कोई भी मनुष्य कर्म किये बिना नहीं रह सकता (गीता 3। 5)।जब मनुष्य अहंकारपूर्वक क्रियाशील प्रकृतिके वशमें हो जाता है? तो फिर वह यह कैसे रह सकता है कि मैं अमक कर्म करूँगा और अमुक कर्म नहीं करूँगा अर्थात् प्रकृतिके परवश हुआ मनुष्य करना और न करना -- इन दोनोंसे छूटेगा नहीं। कारण कि प्रकृतिके परवश हुए मनुष्यका तो करना भी कर्म है और न करना भी कर्म है। परन्तु जब मनुष्य प्रकृतिके परवश नहीं रहता? उससे निर्लिप्त हो जाता है (जो कि इसका वास्तविक स्वरूप है)? तो फिर उसके लिये करना और न करना -- ऐसा कहना ही नहीं बनता। तात्पर्य यह है कि जो प्रकृतिके साथ सम्बन्ध रखे और कर्म न करना चाहे? ऐसा उसके लिये सम्भव नहीं है। परन्तु जिसने प्रकृतिसे सम्बन्धविच्छेद कर लिया है अथवा जो सर्वथा भगवान्के शरण हो गया है? उसको कर्म करनेके लिये बाध्य नहीं होना पड़ता।न योत्स्य इति मन्यसे -- दूसरे अध्यायमें अर्जुनने भगवान्के शरण होकर शिक्षाकी प्रार्थना की -- शिष्यस्तेऽहं शाधि मां त्वां प्रपन्नम् (2। 7) और उसके बाद अर्जुनने साफसाफ कह दिया कि मैं युद्ध नहीं करूँगा -- न योत्स्ये (2। 9)। यह बात भगवानको अच्छी नहीं लगी। भगवान् मनमें सोचते हैं कि यह पहले तो मेरे शरण हो गया और फिर इसने मेरे कुछ कहे बिना ही अपनी तरफसे साफसाफ कह दिया कि मैं युद्ध नहीं करूँगा? तो फिर यह मेरी शरणागति कहाँ रही यह तो अहंकारकी शरणागति हो गयी कारण कि वास्तविक शरणागत होनेपर मैं यह करूँगा? यह नहीं करूँगा ऐसा कहना ही नहीं बनता। भगवान्के शरणागत होनेपर तो भगवान् जैसा करायेंगे? वैसा ही करना होगा। इसी बातको लेकर भगवान्को हँसी आ गयी (2। 10)। परन्तु अर्जुनपर अत्यधिक कृपा और स्नेह होनेके कारण भगवान्ने उपदेश देना आरम्भ कर दिया? नहीं तो भगवान् वहींपर यह कह देते कि जैसा चाहता है? वैसा कर -- यथेच्छसि तथा कुरु (18। 63) परन्तु अर्जुनकी यह बात कि मैं युद्ध नहीं करूँगा भगवान्के भीतर खटक गयी। इसलिये भगवान्ने यहाँ अर्जुनके उन्हीं शब्दों -- न योत्स्ये का प्रयोग करके यह कहा है कि तू अहंकारके ही शरण है? मेरे शरण नहीं। अगर तू मेरे शरण हो गया होता तो युद्ध नहीं करूँगा ऐसा कहना बन ही नहीं सकता था। मेरे शरण होता तो मैं क्या करूँगा और क्या नहीं करूँगा इसकी जिम्मेवारी मेरेपर होती। इसके अलावा मेरे शरणागत होनेपर यह प्रकृति भी तुझे बाध्य नहीं कर पाती (गीता 7। 14)। यह त्रिगुणमयी माया अर्थात् प्रकृति उसीको बाध्य करती है? जो मेरे शरण नहीं हुआ है (गीता 7। 13) क्योंकि यह नियम है कि प्रकृतिके प्रवाहमें पड़ा हुआ प्राणी प्रकृतिके गुणोंके द्वारा सदा ही परवश होता है।यह एक बड़ी मार्मिक बात है कि मनुष्य जिन प्राकृत पदार्थोंको अपना मान लेते हैं? उन पदार्थोंके सदा ही परवश (पराधीन) हो जाते हैं। वे वहम तो यह रखते हैं कि हम इन पदार्थोंके मालिक हैं? पर हो जाते हैं उनके गुलाम परन्तु जिन पदार्थोंको अपना नहीं मानते? उन पदार्थोंके परवश नहीं होते। इसलिये मनुष्यको किसी भी प्राकृत पदार्थको अपना नहीं मानना चाहिये क्योंकि वे वास्तवमें अपने हैं ही नहीं। अपने तो वास्तवमें केवल भगवान् ही हैं। उन भगवान्को अपना माननेसे मनुष्यकी परवशता सदाके लिये समाप्त हो जाती है। तात्पर्य यह हुआ कि मनुष्य पदार्थों और क्रियाओँको अपनी मान्यता है तो सर्वथा परतन्त्र हो जाता है? और भगवान्को अपना मानता है और उनके अनन्य शरण होता है तो सर्वथा स्वतन्त्र हो जाता है। प्रभुके शरणागत होनेपर परतन्त्रता लेशमात्र भी नहीं रहती -- यह शरणागतिकी महिमा है। परन्तु जो प्रभुकी शरण न लेकर अहंकारकी शरण लेते हैं? वे मौतके मार्ग(संसार)में बह जाते हैं -- निवर्तन्ते मृत्युसंसारवर्त्मनि (9। 3)। इसी बातकी चेतावनी देते हुए भगवान् अर्जुनसे कह रहे हैं कि तू जो यह कहता है कि मैं युद्ध नहीं करूँगा? तो तेरा यह कहना? तेरी यह हेकड़ी चलेगी नहीं। तुझे क्षात्रप्रकृतिके परवश होकर युद्ध करना ही पड़ेगा।मिथ्यैष व्यवसायस्ते -- व्यवसाय अर्थात् निश्चय दो तरहका होता है -- वास्तविक और अवास्तविक। परमात्माके साथ अपना जो नित्य सम्बन्ध है? उसका निश्चय करना तो वास्तविक है और प्रकृतिके साथ मिलकर प्राकृत पदार्थोंका निश्चय करना अवास्तविक है। जो निश्चय परमात्माको लेकर होता है? उसमें स्वयंकी प्रधानता रहती है? और जो निश्चय प्रकृतिको लेकर होता है? उसमें अन्तःकरणकी प्रधानता रहती है। इसलिये भगवान् यहाँ अर्जुनसे कहते हैं कि अहंकारका अर्थात् प्रकृतिका आश्रय लेकर तू जो यह कह रहा है कि मैं युद्ध नहीं करूँगा? ऐसा तेरा (क्षात्रप्रकृतिके विरुद्ध) निश्चय अवास्तविक अर्थात् मिथ्या है? झूठा है। आश्रय परमात्माका ही होना चाहिये? प्रकृति और प्रकृतिके कार्य संसारका नहीं।यदि प्राणी यह निश्चय कर लेता है कि मैं परमात्माका ही हूँ और मुझे केवल परमात्माकी तरफ ही चलना है? तो उसका यह निश्चय वास्तविक अर्थात् सत्य है? नित्य है। इस निश्चयकी महिमा भगवान्ने नवें अध्यायके तीसवें श्लोकमें की है कि अगर दुराचारीसेदुराचारी मनुष्य भी अनन्यभावसे मेरा भजन करता है तो उसको दुराचारी नहीं मानना चाहिये प्रत्युत साधु ही मानना चाहिये क्योंकि वह वास्तविक निश्चय कर चुका है कि,मैं भगवान्का ही हूँ और भगवान्का ही भजन करूँगा।प्रकृतिस्त्वां नियोक्ष्यति -- इन पदोंसे भगवान् कहते हैं कि तेरा क्षात्रस्वभाव तुझे जबर्दस्ती युद्धमें लगा देगा। क्षत्रियका स्वभाव है -- शूरवीरता? युद्धमें पीठ न दिखाना (गीता 18। 43)। अतः धर्ममय युद्धका अवसर सामने आनेपर तू युद्ध किये बिना रह नहीं सकेगा। सम्बन्ध -- पूर्वश्लोकमें भगवान्ने अर्जुनसे कहा कि प्रकृति तुझे कर्ममें लगा देगी? अब आगेके श्लोकमें उसीका विवेचन करते हैं।
Translation · Hindi
।।18.59।।अहंकारका आश्रय लेकर तू जो ऐसा मान रहा है कि मैं युद्ध नहीं करूँगा, तेरा यह निश्चय मिथ्या (झूठा) है; क्योंकि तेरी क्षात्र-प्रकृति तेरेको युद्धमें लगा देगी।
।।18.60।। व्याख्या -- स्वभावजेन कौन्तेय निबद्धः स्वेन कर्मणा -- पूर्वजन्ममें जैसे कर्म और गुणोंकी वृत्तियाँ रही हैं? इस जन्ममें जैसे मातापितासे पैदा हुए हैं अर्थात् मातापिताके जैसे संस्कार रहे हैं? जन्मके बाद जैसा देखासुना है? जैसी शिक्षा प्राप्त हुई है और जैसे कर्म किये हैं -- उन सबके मिलनेसे अपनी जो कर्म करनेकी एक आदत बनी है? उसका नाम स्वभाव है। इसको भगवान्ने स्वभावजन्य स्वकीय कर्म कहा है। इसीको स्वधर्म भी कहते हैं -- स्वधर्ममपि चावेक्ष्य न विकम्पितुमर्हसि (गीता 2। 31)।कर्तुं नेच्छसि यन्मोहात् करिष्यस्यवशोऽपि तत् -- स्वभावजन्य क्षात्रप्रकृतिसे बँधा हुआ तू मोहके कारण जो नहीं करना चाहता? उसको तू परवश होकर करेगा। स्वभावके अनुसार ही शास्त्रोंने कर्तव्यपालनकी आज्ञा दी है। उस आज्ञामें यदि दूसरोंके कर्मोंकी अपेक्षा अपने कर्मोंमें कमियाँ अथवा दोष दीखते हों? तो भी वे दोष बाधक (पापजनक) नहीं होते -- श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात्। (गीता 3। 35 18। 47)। उस स्वभावज कर्म (क्षात्रधर्म)के अनुसार तू युद्ध करनेके लिये परवश है। युद्धरूप कर्तव्यको न करनेका तेरा विचार मूढ़तापूर्वक किया गया है।जो जीवन्मुक्त महापुरुष होते हैं? उनका स्वभाव सर्वथा शुद्ध होता है। अतः उनपर स्वभावका आधिपत्य नहीं रहता अर्थात् वे स्वभावके परवश नहीं होते फिर भी वे किसी काममें प्रवृत्त होते हैं? तो अपनी प्रकृति(स्वभाव) के अनुसार ही काम करते हैं। परन्तु साधारण मनुष्य प्रकृतिके परवश होते हैं? इसलिये उनका स्वभाव उनको जबर्दस्ती कर्ममें लगा देता है (गीता 3। 33)। भगवान् अर्जुनसे कहते हैं कि तेरा क्षात्रस्वभाव भी तुझे जबर्दस्ती युद्धमें लगा देगा परन्तु उसका फल तेरे लिये बढ़िया नहीं होगा। यदि तू शास्त्र या सन्तमहापुरुषोंकी आज्ञासे अथवा मेरी आज्ञासे युद्धरूप कर्म करेगा? तो वही कर्म तेरे लिये कल्याणकारी हो जायगा। कारण कि शास्त्र अथवा मेरी आज्ञासे कर्मोंको करनेसे? उन कर्मोंमें जो रागद्वेष हैं? वे स्वाभाविक ही मिटते चले जायँगे क्योंकि तेरी दृष्टि आज्ञाकी तरफ रहेगी? रागद्वेषकी तरफ नहीं। अतः वे कर्म बन्धनकारक न होकर कल्याणकारक ही होंगे।विशेष बातगीतामें प्रकृतिकी परवशताकी बात सामान्यरूपसे कई जगह आयी है (जैसे -- 3। 5 8। 19 9। 8 आदि) परन्तु दो जगह प्रकृतिकी परवशताकी बात विशेषरूपसे आयी है -- प्रकृतिं यान्ति भूतानि (3। 33) और यहाँ प्रकृतिस्त्वां नियोक्ष्यति (18। 59) (टिप्पणी प0 960)। इससे स्वभावकी प्रबलता ही सिद्ध होती है क्योंकि कोई भी प्राणी जिसकिसी योनिमें भी जन्म लेता है? उसकी प्रकृति अर्थात् स्वभाव उसके साथमें रहता है। अगर उसका स्वभाव परम शुद्ध हो अर्थात् स्वभावमें सर्वथा असङ्गता हो तो उसका जन्म ही क्यों होगा यदि उसका जन्म होगा तो उसमें स्वभावकी मुख्यता रहेगी -- कारणं गुणसङ्गोऽस्य सदसद्योनिजन्मसु (गीता 13। 21)। जब स्वभावकी ही मुख्यता अथवा परवशता रहेगी और प्रत्येक क्रिया स्वभावके अनुसार ही होगी? तो फिर शास्त्रोंका विधिनिषेध किसपर लागू होगा गुरुजनोंकी शिक्षा किसके काम आयेगी और मनुष्य दुर्गुणदुराचारोंका त्याग करके सद्गुणसदाचारोंमें कैसे प्रवृत्त होगाउपर्युक्त प्रश्नोंका उत्तर यह है कि जैसे मनुष्य गङ्गाजीके उपर्युक्त प्रश्नोंका उत्तर यह है कि जैसे मनुष्य गङ्गाजीके प्रवाहको रोक तो नहीं सकता? पर उसके प्रवाहको मोड़ सकता है? घुमा सकता है। ऐसे ही मनुष्य अपने वर्णोचित स्वभावको छोड़ तो नहीं सकता? पर भगवत्प्राप्तिका उद्देश्य रखकर उसको रागद्वेषसे रहित परम शुद्ध? निर्मल बना सकता है। तात्पर्य यह हुआ कि स्वभावको शुद्ध बनानेमें मनुष्यमात्र सर्वथा सबल और स्वतन्त्र है? निर्बल और परतन्त्र नहीं है। निर्बलता और परतन्त्रता तो केवल रागद्वेष होनेसे प्रतीत होती है।अब इस स्वभावको सुधारनेके लिये भगवान्ने गीतामें कर्मयोग और भक्तियोगकी दृष्टिसे दो उपाय बताये हैं --,(1) कर्मयोगकी दृष्टिसे -- तीसरे अध्यायके चौंतीसवें श्लोकमें भगवान्ने बताया है कि मनुष्यके खास शत्रु रागद्वेष ही हैं। अतः रागद्वेषके वशमें नहीं होना चाहिये अर्थात् रागद्वेषको लेकर कोई भी कर्म नहीं करना चाहिये? प्रत्युत शास्त्रकी आज्ञाके अनुसार ही प्रत्येक कर्म करना चाहिये। शास्त्रके आज्ञानुसार अर्थात् शिष्य गुरुकी? पुत्र मातापिताकी? पत्नी पतिकी और नौकर मालिककी आज्ञाके अनुसार प्रसन्नतापूर्वक सब कर्म करता है तो उसमें रागद्वेष नहीं रहते। कारण कि अपने मनके अनुसार कर्म करनेसे ही रागद्वेष पुष्ट होते हैं। शास्त्र आदिकी आज्ञाके अनुसार कार्य करनेसे और कभी दूसरा नया कार्य करनेकी मनमें आ जानेपर भी शास्त्रकी आज्ञा न होनेसे हम वह कार्य नहीं करते तो उससे हमारा राग मिट जायगा और कभी कार्यको न करनेकी मनमें आ जानेपर भी शास्त्रकी आज्ञा होनेसे हम वह कार्य प्रसन्नतापूर्वक करते हैं तो उससे हमारा द्वेष मिट जाता है।(2) भक्तियोगकी दृष्टिसे -- जब मनुष्य ममतावाली वस्तुओंके सहित स्वयं भगवान्के शरण हो जाता है? तब उसके पास अपना करके कुछ नहीं रहता। वह भगवान्के हाथकी कठपुतली बन जाता है। फिर भगवान्की आज्ञाके अनुसार? उनकी इच्छाके अनुसार ही उसके द्वारा सब कार्य होते हैं? जिससे उसके स्वभावमें रहनेवाले रागद्वेष मिट जाते हैं।तात्पर्य यह हुआ कि कर्मयोगमें रागद्वेषके वशीभूत न होकर कार्य करनेसे स्वभाव शुद्ध हो जाता है (गीता 3। 34) और भक्तियोगमें भगवान्के सर्वथा अर्पित होनेसे स्वभाव शुद्ध हो जाता है (गीता 18। 62)। स्वभाव शुद्ध होनेसे बन्धनका कोई प्रश्न ही नहीं रहता।मनुष्य जो कुछ कर्म करता है? वह कभी रागद्वेषके वशीभूत होकर करता है और कभी सिद्धान्तके अनुसार करता है। रागद्वेषपूर्वक कर्म करनेसे रागद्वेष दृढ़ हो जाते हैं और फिर मनुष्यका वैसा ही स्वभाव बन जाता है। सिद्धान्तके अनुसार कर्म करनेसे उसका सिद्धान्तके अनुसार ही करनेका स्वभाव बन जाता है। जो मनुष्य परमात्मप्राप्तिका उद्देश्य रखकर शास्त्र और महापुरुषोंके सिद्धान्तके अनुसार कर्म करते हैं और जो परमात्माको प्राप्त हो गये हैं -- उन दोनों(साधकों और सिद्ध महापुरुषों) के कर्म दुनियाके लिये आदर्श होते हैं? अनुकरणीय होते हैं (गीता 3। 21)। सम्बन्ध -- जीव स्वयं परमात्माका अंश है और स्वभाव अंश है स्वयं स्वतःसिद्ध है और स्वभाव खुदका बनाया हुआ है स्वयं चेतन है और स्वभाव जड है -- ऐसा होनेपर भी जीव स्वभावके परवश कैसे हो जाता है इस प्रश्नके उत्तरमें भगवान् आगेका श्लोक कहते हैं।
Translation · Hindi
।।18.60।।हे कुन्तीनन्दन ! अपने स्वभावजन्य कर्मसे बँधा हुआ तू मोहके कारण जो नहीं करना चाहता, उसको तू (क्षात्र-प्रकृतिके) परवश होकर करेगा।
।।18.61।। व्याख्या -- ईश्वरः सर्वभूतानां ৷৷. यन्त्रारूढानि मायया -- इसका तात्पर्य यह है कि जो ईश्वर सबका शासक? नियामक? सबका भरणपोषण करनेवाला और निरपेक्षरूपसे सबका संचालक है? वह अपनी,शक्तिसे उन प्राणियोंको घुमाता है? जिन्होंने शरीरको मैं औरमेरा मान रखा है।जैसे? विद्युत्शक्तिसे संचालित यन्त्र -- रेलपर कोई आरूढ़ हो जाता है? चढ़ जाता है तो उसको परवशतासे रेलके अनुसार ही जाना पड़ता है। परन्तु जब वह रेलपर आरूढ़ नहीं रहता? नीचे उतर जाता है? तब उसको रेलके अनुसार नहीं जाना पड़ता। ऐसे ही जबतक मनुष्य शरीररूपी यन्त्रके साथ मैं और मेरेपनका समबन्ध रखता है? तबतक ईश्वर उसको उसके स्वभाव (टिप्पणी प0 962) के अनुसार संचालित करता रहता है और वह मनुष्य जन्ममरणरूप संसारके चक्रमें घूमता रहता है।शरीरके साथ मैंमेरेपनका सम्बन्ध होनेसे ही रागद्वेष पैदा होते हैं? जिससे स्वभाव अशुद्ध हो जाता है। स्वभावके अशुद्ध होनेपर मनुष्य प्रकृति अर्थात् स्वभावके परवश हो जाता है। परन्तु शरीरसे सर्वथा सम्बन्धविच्छेद होनेपर जब स्वभाव रागद्वेषसे रहित अर्थात् शुद्ध हो जाता है? तब प्रकृतिकी परवशता नहीं रहती। प्रकृति(स्वभाव)की परवशता न रहनेसे ईश्वरकी माया उसको संचालित नहीं करती।अब यहाँ यह शङ्का होती है कि जब ईश्वर ही हमारेको भ्रमण करवाता है? क्रिया करवाता है? तब यह काम करना चाहिये और यह काम नहीं करना चाहिये -- ऐसी स्वतंन्त्रता कहाँ रही क्योंकि यन्त्रारूढ़ होनेके कारण हम यन्त्रके और यन्त्रके संचालक ईश्वरके अधीन हो गये? परतन्त्र हो गये? फिर यन्त्रका संचालक (प्रेरक) जैसा करायेगा? वैसा ही होगा इसका समाधान इस प्रकार इस प्रकार है -- जैसे? बिजलीसे संचालित होनेवाले यन्त्र अनेक तरहके होते हैं। एक ही बिजलीसे संचालित होनेपर भी किसी यन्त्रमें बर्फ जम जाती है और किसी यन्त्रमें अग्नि जल जाती है अर्थात् उनमें एकदूसरेसे बिलकुल विरुद्ध काम होता है। परन्तु बिजलीका यह आग्रह नहीं रहता कि मैं तो केवल बर्फ ही जमाऊँगी अथवा केवल अग्नि ही जलाऊँगी। यन्त्रोंका भी ऐसा आग्रह नहीं रहता कि हम तो केवल बर्फ ही जमायेंगे अथवा केवल अग्नि ही जलायेंगे? प्रत्युत यन्त्र बनानेवाले कारीगरने यन्त्रोंको जैसा बना दिया है? उसके अनुसार उनमें स्वाभाविक ही बर्फ जमती है और अग्नि जलती है। ऐसे ही मनुष्य? पशु? पक्षी? देवता? यक्ष राक्षस आदि जितने भी प्राणी हैं? सब शरीररूपी यन्त्रोंपर चढ़े हुए हैं और उन सभी यन्त्रोंको ईश्वर संचालित करता है। उन अलगअलग शरीरोँमें भी जिस शरीरमें जैसा स्वभाव है? उस स्वभावके अनुसार वे ईश्वरसे प्रेरणा पाते हैं और कार्य करते हैं। तात्पर्य यह है कि उन शरीरोंसे मैंमेरेपनका सम्बन्ध माननेवालेका जैसा (अच्छा या मन्दा) स्वभाव होता है? उससे वैसी ही क्रियाएँ होती हैं। अच्छे स्वभाववाले (सज्जन) मनुष्यके द्वारा श्रेष्ठ क्रियाएँ होती हैं और मन्दे स्वभाववाले (दुष्ट) मनुष्यके द्वारा खराब क्रियाएँ होती हैं। इसलिये अच्छी या मन्दी क्रियाओंको करानेमें ईश्वरका हाथ नहीं है? प्रत्युत खुदके बनाये हुए अच्छे या मन्दे स्वभावका ही हाथ है।जैसे बिजली यन्त्रके स्वभावके अनुसार ही उसका संचालन करती है? ऐसे ही ईश्वर प्राणीके (शरीरमें स्थित) स्वभावके अनुसार उसका संचालन करते हैं। जैसा स्वभाव होगा? वैसे ही कर्म होंगे। इसमें एक बात विशेष ध्यान देनेकी है कि स्वभावको सुधारनेमें और बिगाड़नेमें सभी मनुष्य स्वतन्त्र हैं? कोई भी परतन्त्र नहीं है। परन्तु पशु? पक्षी? देवता आदि जितने भी मनुष्येतर प्राणी हैं? उनमें अपने स्वभावको सुधारनेका न अधिकार है और न स्वतन्त्रता ही है। मनुष्यशरीर अपना उद्धार करनेके लिये ही मिला है? इसलिये इसमें अपने स्वभावको सुधारनेका पूरा अधिकार? पूरी स्वतन्त्रता है। उस स्वतन्त्रताका सदुपयोग करके स्वभाव सुधारनेमें और स्वतन्त्रताका दुरुपयोग करके स्वभाव बिगाड़नेमें मनुष्य स्वयं ही हेतु है। ईश्वर सम्पूर्ण प्राणियोंके हृदयदेशमें रहता है -- यह कहनेका तात्पर्य है कि जैसे पृथ्वीमें सब जगह जल रहनेपर भी जहाँ कुआँ होता है? वहींसे जल प्राप्त होता है ऐसे ही परमात्मा सब जगह समान रीतिसे परिपूर्ण होते हुए भी हृदयमें प्राप्त होते हैं अर्थात् हृदय सर्वव्यापी परमात्माकी प्राप्तिका विशेष स्थान है। ऐसे ही तीसरे अध्यायमें सर्वव्यापी परमात्माको यज्ञ(निष्कामकर्म) में स्थित बताया गया है तस्मात्सर्वगतं ब्रह्म नित्यं यज्ञे प्रतिष्ठितम् (गीता 3। 15)।विशेष बातसाधककी प्रायः यह भूल होती है कि वह भजन? कीर्तन? ध्यान आदि करते हुए भी भगवान् दूर हैं वे अभी नहीं मिलेंगे यहाँ नहीं मिलेंगे अभी मैं योग्य नहीं हूँ भगवान्की कृपा नहीं है आदि भावनाएँ बनाकर भगवान्की दूरीकी मान्यता ही दृढ़ करता रहता है। इस जगह साधकको यह सावधानी रखनी चाहिये कि जब भगवान् सभी प्राणियोंमें मौजूद हैं तो मेरेमें भी हैं। वे सर्वत्र व्यापक हैं तो मैं जो जप करता हूँ उस जपमें भी भगवान् हैं मैं श्वास लेता हूँ तो उस श्वासमें भी भगवान् हैं मेरे मनमें भी भगवान् हैं? बुद्धिमें भी भगवान् हैं मैं जो मैंमैं कहता हूँ? उस मैं में भी भगवान् हैं। उस मैं का जो आधार है? वह अपना स्वरूप भगवान्से अभिन्न है अर्थात् मैंपन तो दूर है? पर भगवान् मैंपनसे भी नजदीक हैं। इस प्रकार अपनेमें भगवान्को मानते हुए ही भजन? जप? ध्यान आदि करने चाहिये।अब शङ्का यह होती है कि अपनेमें परमात्माको माननेसे मैं और परमात्मा दो (अलगअलग) हैं -- यह द्वैतापत्ति होगी। इसका समाधान यह है कि परमात्माको अपनेमें माननेसे द्वैतापत्ति नहीं होती? प्रत्युत अहंकार(मैंपन) को स्वीकार करनेसे जो अपनी अलग सत्ता प्रतीत होती है? उसीसे द्वैतापत्ति होती है। परमात्माको अपना और और अपनेमें माननेसे तो परमात्मासे अभिन्नता होती है? जिससे प्रेम प्रकट होता है।जैसे? गङ्गाजीमें बाढ़ आ जानेसे उसका जल बहुत बढ़ जाता है और फिर पीछे वर्षा न होनेसे उसका जल पुनः कम हो जाता है परन्तु उसका जो जल गड्ढेमें रह जाता है अर्थात् गङ्गाजीसे अलग हो जाता है? उसकोगङ्गोज्झ कहते हैं। उस गङ्गोज्झको मदिराके समान महान् अपवित्र माना गया है। गङ्गाजीसे अलग होनेके कारण वह गंदा हो जाता है और उसमें अनेक कीटाणु पैदा हो जाते हैं? जो कि रोगोंके कारण हैं। परन्तु फिर कभी जोरकी बाढ़ आ जाती है? तो वह गङ्गोज्झ वापस गङ्गाजीमें मिल जाता है। गङ्गाजीमें मिलते ही उसकी एकदेशीयता? अपवित्रता? अशुद्धि आदि सभी दोष जाते हैं और वह पुनः महान् पवित्र गङ्गाजल बन जाता है।ऐसे ही यह मनुष्य जब अहंकारको स्वीकार करके परमात्मासे विमुख हो जाता है? तब इसमें परिच्छिन्नता? पराधीनता? जडता? विषमता? अभाव? अशान्ति? अपवित्रता आदि सभी दोष (विकार) आ जाते हैं। परन्तु जब यह अपने अंशी परमात्माके सम्मुख हो जाता है? उन्हींकी शरणमें चला जाता है अर्थात् अपना अलग कोई व्यक्तित्व नहीं रखता? तब उसमें आये हुए भिन्नता? पराधीनता आदि सभी दोष मिट जाते हैं। कारण कि स्वयं (चेतन स्वरूप) में दोष नहीं हैं दोष तो अहंता(मैंपन) को स्वीकार करनेसे ही आते हैं। सम्बन्ध -- अब भगवान् यन्त्रारूढ़ हुए प्राणियोंकी परवशताको मिटानेका उपाय बताते हैं।
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।।18.61।।हे अर्जुन ! ईश्वर सम्पूर्ण प्राणियोंके हृदयमें रहता है और अपनी मायासे शरीररूपी यन्त्रपर आरूढ़ हुए सम्पूर्ण प्राणियोंको (उनके स्वभावके अनुसार) भ्रमण कराता रहता है।
।।18.62।। व्याख्या -- [मनुष्यमें प्रायः यह एक कमजोरी रहती है कि जब उसके सामने संतमहापुरुष विद्यमान रहते हैं? तब उसका उनपर श्रद्धाविश्वास एवं महत्त्वबुद्धि नहीं होती (टिप्पणी प0 963) परन्तु जब वे चले जाते हैं? तब पीछे वह रोता है? पश्चात्ताप करता है। ऐसे ही भगवान् अर्जुनके रथके घोड़े हाँकते हैं और उनकी आज्ञाका पालन करते हैं। वे ही भगवान् जब अर्जुनसे कहते हैं कि शरणागत भक्त मेरी कृपासे शाश्वत पदको प्राप्त हो जाता है और तू भी मेरेमें चित्तवाला होकर मेरी कृपासे सम्पूर्ण विघ्नोंको तर जायगा? तब अर्जुन कुछ बोले ही नहीं। इससे यह सम्भावना भी हो सकती है कि भगवान्के वचनोंपर अर्जुनको पूरा विश्वास न हुआ हो। इसी दृष्टिसे भगवान्को यहाँ अर्जुनके लिये अन्तर्यामी ईश्वरकी शरणमें जानेकी बात कहनी पड़ी।]तमेव शरणं गच्छ -- भगवान् कहते हैं कि जो सर्वव्यापक ईश्वर सबके हृदयमें विराजमान है और सबका संचालक है? तू उसीकी शरणमें चला जा। तात्पर्य है कि सांसारिक उत्पत्तिविनाशशील पदार्थ? वस्तु? व्यक्ति? घटना परिस्थिति आदि किसीका किञ्चिन्मात्र भी आश्रय न लेकर केवल अविनाशी परमात्माका ही आश्रय ले ले।पूर्वश्लोकमें यह कहा गया कि मनुष्य जबतक शरीररूपी यन्त्रके साथ मैंमेरापनका सम्बन्ध रखता है तबतक ईश्वर अपनी मायासे उसको घुमाता रहता है। अब यहाँ एव पदसे उसका निषेध करते हुए भगवान् अर्जुनसे कहते हैं कि शरीररूपी यन्त्रके साथ किञ्चिन्मात्र भी मैंमेरापनका सम्बन्ध न रखकर तू केवल उस ईश्वरकी शरणमें चला जा।सर्वभावेन -- सर्वभावसे शरणमें जानेका तात्पर्य यह हुआ कि मनसे उसी परमात्माका चिन्तन हो? शारीरिक क्रियाओंसे उसीका पूजन हो? उसीका प्रेमपूर्वक भजन हो और उसके प्रत्येक विधानमें परम प्रसन्नता हो। वह विधान चाहे शरीर? इन्द्रियाँ? मन आदिके अनुकूल हो? चाहे प्रतिकूल हो? उसे भगवान्का ही किया हुआ मानकर खूब प्रसन्न हो जाय कि अहो भगवान्की मेरेपर कितनी कृपा है कि मेरेसे बिना पूछे ही? मेरे मन? बुद्धि आदिके विपरीत जानते हुए भी केवल मेरे हितकी भावनासे? मेरा परम कल्याण करनेके लिये उन्होंने ऐसा विधान किया हैतत्प्रसादात्परां शान्तिं स्थानं प्राप्स्यसि शाश्वतम् -- भगवान्ने पहले यह कह दिया था कि मेरी कृपासे शाश्वत पदकी प्राप्ति हो जाती है (18। 56) और मेरी कृपासे तू सम्पूर्ण विघ्नोंसे तर जायगा (18। 58)। वही बात यहाँ कहते हैं कि उस अन्तर्यामी परमात्माकी कृपासे तू परमशान्ति और शाश्वत स्थान(पद)को प्राप्त कर लेगा।गीतामें अविनाशी परमपदको हीपरा शान्ति नामसे कहा गया है। परन्तु यहाँ भवगान्नेपरा शान्ति औरशाश्वत स्थान (परमपद) -- दोनोंका प्रयोग एक साथ किया है। अतः यहाँपरा शान्ति का अर्थ संसारसे सर्वथा उपरति औरशाश्वत स्थान का अर्थ परमपद लेना चाहिये।भगवान्ने तमेव शरणं गच्छ पदोंसे अर्जुनको सर्वव्यापी ईश्वरकी शरणमें जानेके लिये कहा है। इससे यह शङ्का हो सकती है कि क्या भगवान् श्रीकृष्ण ईश्वर नहीं हैं क्योंकि अगर भगवान् श्रीकृष्ण ईश्वर होते? तो अर्जुनकोउसीकी शरणमें जा -- ऐसा (परोक्ष रीतिसे) नहीं कहते।इसका समाधान यह है कि भगवान्ने सर्वव्यापक ईश्वरकी शरणागतिको तो गुह्याद्गुह्यतरम् (18। 63) अर्थात् गुह्यसे गुह्यतर कहा है? पर अपनी शरणागतिको सर्वगुह्यतमम् (18। 64) अर्थात् सबसे गुह्यतम कहा है। इससे सर्वव्यापक ईश्वरकी अपेक्षा भगवान् श्रीकृष्ण बड़े ही सिद्ध हुए।भगवान्ने पहले कहा है कि मैं अजन्मा? अविनाशी और सम्पूर्ण प्राणियोंका ईश्वर होते हुए भी अपनी प्रकृतिको अधीन करके अपनी योगमायासे प्रकट होता हूँ (4। 6) मैं सम्पूर्ण यज्ञों और तपोंका भोक्ता हूँ? सम्पूर्ण लोकोंका महान् ईश्वर हूँ और सम्पूर्ण प्राणियोंका सुहृद हूँ -- ऐसा मुझे माननेसे शान्तिकी प्राप्ति होती है (5। 29) परन्तु जो मुझे सम्पूर्ण यज्ञोंका भोक्ता और सबका मालिक नहीं मानते? उनका पतन होता है (9। 24)। इस प्रकार अन्वयव्यतिरेकसे भी भगवान् श्रीकृष्णका ईश्वरत्व सिद्धि हो जाता है।इस अध्यायमें ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति (18। 61) पदोंसे अन्तर्यामी ईश्वरको सब प्राणियोंके हृदयमें स्थित बताया है और पंद्रहवें अध्यायमें सर्वस्य चाहं हृदि संनिविष्टः (15। 15) पदोंसे अपनेको सबके हृदयमें स्थित बताया है। इसका तात्पर्य यह हुआ कि अन्तर्यामी परमात्मा और भगवान् श्रीकृष्ण दो नहीं हैं?,एक ही हैं।जब अन्तर्यामी परमात्मा और भगवान् श्रीकृष्ण एक ही हैं? तो फिर भगवान् श्रीकृष्णने अर्जुनको तमेंव शरणं गच्छ क्यों कहा इसका कारण यह है कि पहले छप्पनवें श्लोकमें भगवान्ने अपनी कृपासे शाश्वत अविनाशी पदकी प्राप्ति होनेकी बात कही और सत्तावनवेंअट्ठावनवें श्लोकोंमें अर्जुनको अपने परायण होनेकी आज्ञा देकरमेरी कृपासे सम्पूर्ण विघ्नोंको तर जायगा -- यह बात कही। परन्तु अर्जुन कुछ बोले नहीं अर्थात् उन्होंने कुछ भी स्वीकार नहीं किया। इसपर भगवान्ने अर्जुनको धमकाया कि यदि अहंकारके कारण तू मेरी बात नहीं सुनेगा तो तेरा पतन हो जायगा। उनसठवें और साठवें श्लोकमें कहा कि मैं युद्ध नहीं करूँगा -- इस प्रकार अहंकारका आश्रय लेकर किया हुआ तेरा निश्चय भी नहीं टिकेगा और तुझे स्वभावज कर्मोंके परवश होकर युद्ध करना ही पड़ेगा। भगवान्के इतना कहनेपर भी अर्जुन कुछ बोले नहीं। अतः अन्तमें भगवान्को यह कहना पड़ा कि यदि तू मेरी शरणमें नहीं आना चाहता तो सबके हृदयमें स्थित जो अन्तर्यामी परमात्मा हैं? उसीकी शरणमें तू चला जा।वास्तवमें अन्तर्यामी ईश्वर और भगवान् श्रीकृष्ण सर्वथा अभिन्न हैं अर्थात् सबके हृदयमें अन्तर्यामीरूपसे विराजमान ईश्वर ही भगवान् श्रीकृष्ण हैं और भगवान् श्रीकृष्ण ही सबके हृदयमें अन्तर्यामीरूपसे विराजमान ईश्वर हैं। सम्बन्ध -- पूर्वश्लोकमें भगवान्ने अर्जुनसे कहा कि तू उस अन्तर्यामी ईश्वरकी शरणमें चला जा। ऐसा कहनेपर भी अर्जुन कुछ नहीं बोले। इसलिये भगवान् आगेके श्लोकमें अर्जुनको चेतानेके लिये उन्हें स्वतन्त्रता प्रदान करते हैं।
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।।18.62।।हे भरतवंशोद्भव अर्जुन ! तू सर्वभावसे उस ईश्वरकी ही शरणमें चला जा। उसकी कृपासे तू परमशान्ति-(संसारसे सर्वथा उपरति-) को और अविनाशी परमपदको प्राप्त हो जायगा।
इति ते ज्ञानमाख्यातं गुह्याद्गुह्यतरं मया।
विमृश्यैतदशेषेण यथेच्छसि तथा कुरु ॥
Commentary · Hindi
।।18.63।। व्याख्या -- इति ते ज्ञानमाख्यातं गुह्याद्गुह्यतरं मया -- पूर्वश्लोकमें सर्वव्यापक अन्तर्यामी परमात्माकी जो शरणागति बतायी गयी है? उसीका लक्ष्य यहाँ इति पदसे कराया गया है। भगवान् कहते हैं कि यह गुह्यसे भी गुह्यतर शरणागतिरूप ज्ञान मैंने तेरे लिये कह दिया है। कर्मयोग गुह्य है और अन्तर्यामी निराकार परमात्माकी शरणागतिगुह्यतर है (टिप्पणी प0 965.1)।विमृश्यैतदशेषेण -- गुह्यसेगुह्यतर शरणागतिरूप ज्ञान बताकर भगवान् अर्जुनसे कहते हैं कि मैंने पहले जो भक्तिकी बातें कही हैं? उनपर तुम अच्छी तरहसे विचार कर लेना। भगवान्ने इसी अध्यायके सत्तावनवेंअट्ठावनवें श्लोकोंमें अपनी भक्ति(शरणागति) की जो बातें कही हैं? उन्हें एतत् पदसे लेना चाहिये। गीतामें जहाँजहाँ भक्तिकी बातें आयी हैं? उन्हें अशेषेण पदसे लेना चाहिये (टिप्पणी प0 965.2)।विमृश्यैतदशेषेण कहनेमें भगवान्की अत्यधिक कृपालुताकी एक गुढ़ाभिसन्धि है कि कहीं अर्जुन मेरेसे विमुख न हो जाय? इसलिये यदि यह मेरी कही हुई बातोंकी तरफ विशेषतासे खयाल करेगा तो असली बात अवश्य ही इसकी समझमें आ जायगी और फिर यह मेरेसे विमुख नहीं होगा।यथेच्छसि तथा कुरु -- पहले कही सब बातोंपर पूरापूरा विचार करके फिर तेरी जैसी मरजी आये? वैसा कर। तू जैसा करना चाहता है? वैसा कर -- ऐसा कहनेमें भी भगवान्की आत्मीयता? कृपालुता और हितैषिता ही प्रत्यक्ष दीख रही है।पहले वक्ष्याम्यशेषतः (7। 2)? इदं तु ते गुह्यतमं प्रवक्ष्याम्यनसूयवे (9। 1) वक्ष्यामि हितकाम्यया (10। 1) आदि श्लोकोंमें भगवान् अर्जुनके हितकी बात कहते आये हैं? पर इन वाक्योंमें भगवान्की अर्जुनपर सामान्य कृपा है।न श्रोष्यति विनङ्क्ष्यसि (18। 58) -- इस श्लोकमें अर्जुनको धमकानेमें भगवान्की विशेष कृपा और अपनेपनका भाव टपकता है।यहाँ यथेच्छसि तथा कुरु कहकर भगवान् जो अपनेपनका त्याग कर रहे हैं? इसमें तो भगवान्कीअध्यधिक कृपा और आत्मीयता भरी हुई है। कारण कि भक्त भगवान्का धमकाया जाना तो सह सकता है? पर भगवान्का त्याग नहीं सह सकता। इसलिये न श्रोष्यसि विनङ्क्ष्यसि आदि कहनेपर भी अर्जुनपर इतना असर नहीं पड़ा जितना यथेच्छसि तथा कुरु कहनेपर पड़ा। इसे सुनकर अर्जुन घबरा गये कि भगवान् तो मेरा त्याग कर रहे हैं क्योंकि मैंने यह बड़ी भारी गलती की कि भगवान्के द्वारा प्यारसे समझाने? अपनेपनसे धमकाने और अन्तर्यामीकी शरणागतिकी बात कहनेपर भी मैं कुछ बोला नहीं? जिससे भगवान्कोजैसी मरजी आये? वैसा कर -- यह कहना पड़ा। अब तो मैं कुछ भी कहनेके लायक नहीं हूँ ऐसा सोचकर अर्जुन बड़े दुःखी हो जाते हैं? तब भगवान् अर्जुनके बिना पूछे ही सर्वगुह्यतम वचनोंको कहते हैं? जिसका वर्णन आगेके श्लोकमें है। सम्बन्ध -- पूर्वश्लोकमें भगवान् विमृश्यैतदेषेण पदसे अर्जुनको कहा कि मेरे इस पूरे उपदेशका सार निकाल लेना। परन्तु भगवान्के सम्पूर्ण उपदेशका सार निकाल लेना अर्जुनके वशकी बात नहीं थी क्योंकि अपने उपदेशका सार निकालना जितना वक्ता जानता है? उतना श्रोता नहीं जानता दूसरी बात? जैसी मरजी आये? वैसा कर -- इस प्रकार भगवान्के मुखसे अपने त्यागकी बात सुनकर अर्जुन बहुत डर गये? इसलिये आगेके दो श्लोकोंमें भगवान् अपने प्रिय सखा अर्जुनको आश्वासन देते हैं।
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।।18.63।।यह गुह्यसे भी गुह्यतर (शरणागतिरूप) ज्ञान मैंने तुझे कह दिया। अब तू इसपर अच्छी तरहसे विचार करके जैसा चाहता है, वैसा कर।
सर्वगुह्यतमं भूयः शृणु मे परमं वचः।
इष्टोऽसि मे दृढमिति ततो वक्ष्यामि ते हितम् ॥
Commentary · Hindi
।।18.64।। व्याख्या -- सर्वगुह्यतमं भूयः श्रुणु मे परमं वचः -- पहले तिरसठवें श्लोकमें भगवान्ने गुह्य (कर्मयोगकी) और गुह्यतर (अन्तर्यामी निराकारकी शरणागतिकी) बात कही और इदं तु ते गुह्यतमम् (9। 1) तथा इति गुह्यतमं शास्त्रम् (15। 20) -- इन पदोंसे गुह्यतम (अपने प्रभावकी) बात कह दी? पर सर्वगुह्यतम बात गीतामें पहले कहीं नहीं कही। अब यहाँ अर्जुनकी घबराहटको देखकर भगवान् कहते हैं कि मैं सर्वगुह्यतम अर्थात् सबसे अत्यन्त गोपनीय बात फिर कहूँगा? तू मेरे परम? सर्वश्रेष्ठ वचनोंको सुन।इस श्लोकमें सर्वगुह्यतमम् पदसे भगवान्ने बताया कि यह हरेकके सामने प्रकट करनेकी बात नहीं है और सड़सठवें श्लोकमें इदं ते नातपस्काय नाभक्ताय कदाचन पदसे भगवान्ने बताया कि इस बातको असहिष्णु और अभक्तसे कभी मत कहना। इस प्रकार दोनों तरफसे निषेध करके बीचमें (छियासठवें श्लोकमें) सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज -- इस सर्वगुह्यतम बातको रखा है। दोनों तरफसे निषेध करनेका तात्पर्य है कि यह गीताभरमें अत्यन्त रहस्यमय खास उपदेश है। (टिप्पणी प0 966)दूसरे अध्यायके सातवें श्लोकमें धर्मसम्मूढचेताः कहकर अर्जुन अपनेको धर्मका निर्णय करनेमें अयोग्य समझते हुए भगवान्से पूछते हैं? उसके शिष्य बनते हैं और शिक्षा देनेके लिये कहते हैं। अतः भगवान् यहाँ (18। 66 में) कहते हैं कि तू धर्मके निर्णयका भार अपने ऊपर मत ले? वह भार मेरेपर छोड़ दे -- मेरे ही अर्पण कर दे और अनन्यभावसे केवल मेरी शरणमें आ जा। फिर तेरेको जो पाप आदिका डर है? उन सब पापोंसे मैं तुझे मुक्त कर दूँगा। तू सब चिन्ताओंको छोड़ दे। यही भगवान्का सर्वगुह्यतम परम वचन है।भूयः श्रृणु का तात्पर्य है कि मैंने यही बात दूसरे शब्दोंमें पहले भी कही थी? पर तुमने ध्यान नहीं दिया। अतः मैं फिर वही बात कहता हूँ। अब इस बातपर तुम विशेषरूपसे ध्यान दो।यह सर्वगुह्यतमवाली बात भगवान्ने पहले मत्परः ৷৷. मच्चित्तः सततं भव (18। 57) और मच्चित्तः सर्वदुर्गाणि मत्प्रसादत्तरिष्यसि (18। 58) पदोंसे कह दी थी परन्तु सर्वगुह्यतमम् पद पहले नहीं कहा? और अर्जुनका भी उस बातपर लक्ष्य नहीं गया। इसलिये अब फिर उस बातपर अर्जुनका लक्ष्य करानेके लिये और,उस बातका महत्त्व बतानेके लिये भगवान् यहाँ सर्वगुह्यतमम् पद देते हैं।इष्टोऽसि मे दृढमिति -- इससे पहले भगवान्ने कहा था कि जैसी मरजी आये? वैसा कर। जो अनुयायी है? आज्ञापालक है? शरणागत है? उसके लिये ऐसी बात कहनेके समान दूसरा क्या दण्ड दिया जा सकता है अतः इस बातको सुनकर अर्जुनके मनमें भय पैदा हो गया कि भगवान् मेरा त्याग कर रहे हैं। उस भयको दूर करनेके लिये भगवान् यहाँ कहते हैं कि तुम मेरे अत्यन्त प्यारे मित्र हो (टिप्पणी प0 967.1)।यदि अर्जुनके मनमें भय या संदेह न होता? तो भगवान्कोतुम मेरे अत्यन्त प्यारे मित्र हो -- यह कहकर सफाई देनेकी क्या जरूरत थी सफाई देना तभी बनता है? जब दूसरेके मनमें भय हो? सन्देह हो? हलचल हो। इष्टः कहनेका दूसरा भाव यह है कि भगवान् अपने शरणागत भक्तको अपना ईष्टदेव मान लेते हैं। भक्त सब कुछ छोड़कर केवल भगवान्को अपना इष्ट मानता है? तो भगवान् भी उसको अपना इष्ट मान लेते हैं क्योंकि भक्तिके विषयमें भगवान्का यह कानून है -- ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम् (गीता 4। 11) अर्थात् जो भक्त जैसे मेरे शरण होते हैं? मैं भी उनको वैसे ही आश्रय देता हूँ। भगवान्की दृष्टिमें भक्तके समान और कोई श्रेष्ठ नहीं है। भागवतमें भगवान् उद्धवजीसे कहते हैं -- तुम्हारेजैसे प्रेमी भक्त मुझे जितने प्यारे हैं? उतने प्यारे न ब्रह्माजी हैं? न शंकरजी हैं? न बलरामजी हैं और तो क्या? मेरे शरीरमें निवास करनेवाली लक्ष्मीजी और मेरी आत्मा भी उतनी प्यारी नहीं है (टिप्पणी प0 967.2)।दृढम् कहनेका तात्पर्य है कि जब तुमने एक बार कह दिया कि मैं आपके शरण हूँ (2। 7) तो अब तुम्हें बिलकुल भी भय नहीं करना चाहिये। कारण कि जो मेरी शरणमें आकर एक बार भी सच्चे हृदयसे कह देता है कि मैं आपका ही हूँ ? उसको मैं सम्पूर्ण प्राणियोंसे अभय (सुरक्षित) कर देता हूँ -- यह मेरा व्रत है (टिप्पणी प0 967.3)। ततो वक्ष्यामि ते हितम् -- तू मेरा अत्यन्त प्यारा मित्र है? इसलिये अपने हृदयकी अत्यन्त गोपनीय और अपने दरबारकी श्रेष्ठसेश्रेष्ठ बात तुझे कहूँगा। दूसरी बात? मैं जो आगे शरणागतिकी बात कहूँगा? उसका यह तात्पर्य नहीं है कि मेरी शरणमें आनेसे मुझे कोई लाभ हो जायगा? प्रत्युत इसमें केवल तेरा ही हित होगा। इससे सिद्ध होता है कि प्राणिमात्रका हित केवल इसी बातमें है कि वह किसी दूसरेका सहारा न लेकर केवल भगवान्की ही शरण ले।भगवान्की शरण होनेके सिवाय जीवका कहीं भी? किञ्चन्मात्र भी हित नहीं है। कारण यह है कि जीव साक्षात् परमात्माका अंश है। इसलिये वह परमात्माको छोड़कर किसीका भी सहारा लेगा तो वह सहारा टिकेगा नहीं। जब संसारकी कोई भी वस्तु? व्यक्ति? घटना? परिस्थिति? अवस्था आदि स्थिर नहीं है? तो फिर उनका सहारा कैसे स्थिर रह सकता है उनका सहारा तो रहेगा नहीं? पर चिन्ता? शोक? दुःख आदि रह जायँगे जैसे? अग्निसे अङ्गार दूर हो जाता है तो वह काला कोयला बन जाता है -- कोयला होय नहीं उजला? सौ मन साबुन लगाय। पर वही कोयला जब पुनः अग्निसे मिल जाता है? तब वह अङ्गार (अग्निरूप) बन जाता है और चमक उठता है। ऐसे ही यह जीव भगवान्से विमुख हो जाता है तो बारबार जन्मतामरता और दुःख पाता रहता है? पर जब यह भगवान्के सम्मुख हो जाता है अर्थात् अनन्यभावसे भगवान्की शरणमें हो जाता है? तब यह भगवत्स्वरूप बन जाता है और चमक उठता है? तथा संसारमात्रका कल्याण करनेवाला हो जाता है।
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।।18.64।।सबसे अत्यन्त गोपनीय वचन तू फिर मेरेसे सुन। तू मेरा अत्यन्त प्रिय है, इसलिये मैं तेरे हितकी बात कहूँगा।
मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु।
मामेवैष्यसि सत्यं ते प्रतिजाने प्रियोऽसि मे ॥
Commentary · Hindi
।।18.65।। व्याख्या -- मद्भक्तः -- साधकको सबसे पहले मैं भगवान्का हूँ इस प्रकार अपनी अहंता(मैंपन) को बदल देना चाहिये। कारण कि बिना अहंताके बदले साधन सुगमतासे नहीं होता।,अहंताके बदलनेपर साधन सुगमतासे? स्वाभाविक ही होने लगता है। अतः साधकको सबसे पहले मद्भक्तः होना चाहिये।किसीका शिष्य बननेपर व्यक्ति अपनी अहंताको बदल देता है कि मैं तो गुरु महाराजका ही हूँ। विवाह हो जानेपर कन्या अपनी अहंताको बदल देती है कि मैं तो ससुरालकी ही हूँ ? और पिताके कुलका सम्बन्ध बिलकुल छूट जाता है। ऐसे ही साधकको अपनी अहंता बदल देनी चाहिये कि मैं तो भगवान्का ही हूँ और भगवान् ही मेरे हैं मैं संसारका नहीं हूँ और संसार मेरा नहीं है। [अहंताके बदलनेपर ममता भी अपनेआप बदल जाती है।]मन्मना भव -- उपर्युक्त प्रकारसे अपनेको भगवान्का मान लेनेपर भगवान्में स्वाभाविक ही मन लगने लगता है। कारण कि जो अपना होता है? वह स्वाभाविक ही प्रिय लगता है और जहाँ प्रियता होती है? वहाँ स्वाभाविक ही मन लगता है। अतः भगवान्को अपना माननेसे भगवान् स्वाभाविक ही प्रिय लगते हैं। फिर मनसे स्वाभाविक ही भगवान्के नाम? गुण? प्रभाव? लीला आदिका चिन्तन होता है। भगवान्के नामका जप और स्वरूपका ध्यान बड़ी तत्परतासे और लगनपूर्वक होता है।मद्याजी -- अहंता बदल जानेपर अर्थात् अपनेआपको भगवान्का मान लेनेपर संसारका सब काम भगवान्की सेवाके रूपमें बदल जाता है अर्थात् साधक पहले जो संसारका काम करता था? वही काम अब भगवान्का,काम हो जाता है। भगवान्का सम्बन्ध ज्योंज्यों दृढ़ होता जाता है? त्योंहीत्यों उसका सेवाभाव पूजाभावमें परिणत होता जाता है। फिर वह चाहे संसारका काम करे? चाहे घरका काम करे? चाहे शरीरका काम करे? चाहे ऊँचानीचा कोई भी काम करे? उसमें भगवान्की पूजाका ही भाव बना रहता है। उसकी यह दृढ़ धारणा हो जाती है कि भगवान्की पूजाके सिवाय मेरा कुछ भी काम नहीं है।मां नमस्कुरु -- भगवान्के चरणोंमें साष्टाङ्ग प्रणाम करके सर्वथा भगवान्के समर्पित हो जाय। मैं प्रभुके चरणोंमें ही पड़ा हुआ हूँ -- ऐसा मनमें भाव रखते हुए जो कुछ अनुकूल या प्रतिकूल परिस्थिति सामने आ जाय? उसमें भगवान्का मङ्गलमय विधान मानकर परम प्रसन्न रहे।भगवान्के द्वारा मेरे लिये जो कुछ भी विधान होगा? वह मङ्गलमय ही होगा। पूरी परिस्थिति मेरी समझमें आये या न आये -- यह बात दूसरी है? पर भगवान्का विधान तो मेरे लिये कल्याणकारी ही है? इसमें कोई सन्देह नहीं। अतः जो कुछ होता है? वह मेरे कर्मोंका फल नहीं है? प्रत्युत भगवान्के द्वारा कृपा करके केवल मेरे हितके लिये भेजा हुआ विधान है। कारण कि भगवान् प्राणिमात्रके परम सुहृद होनेसे जो कुछ विधान करते हैं? वह जीवोंके कल्याणके लिये ही करते हैं। इसलिये भगवान् अनुकूल या प्रतिकूल परिस्थिति भेजकर प्राणियोंके पुण्यपापोंका नाश करके? उन्हें परम शुद्ध बनाकर अपने चरणोंमें खींच रहे हैं -- इस प्रकार दृढ़तासे भाव होना ही भगवान्के चरणोंमें नमस्कार करना है।मामेवैष्यसि सत्यं ते प्रतिजाने प्रियोऽसि मे -- भगवान् कहते हैं कि इस प्रकार मेरा भक्त होनेसे? मेरेमें मनवाला होनेसे? मेरा पूजन करनेवाला होनेसे और मुझे नमस्कार करनेसे तू मेरेको ही प्राप्त होगा अर्थात् मेरेमें ही निवास करेगा (टिप्पणी प0 969) -- ऐसी मैं सत्य प्रतिज्ञा करता हूँ क्योंकि तू मेरा प्यारा है।प्रियोऽसि मे कहनेका तात्पर्य है कि भगवान्का जीवमात्रपर अत्यधिक स्नेह है। अपना ही अंश होनेसे कोई भी जीव भगवान्को अप्रिय नहीं है। भगवान् जीवोंको चाहे चौरासी लाख योनियोंमें भेंजें? चाहे नरकोंमें भेजें? उनका उद्देश्य जीवोंको पवित्र करनेका ही होता है। जीवोंके प्रति भगवान्का जो यह कृपापूर्ण विधान है? यह भगवान्के प्यारका ही द्योतक है। इसी बातको प्रकट करनेके लिये भगवान् अर्जुनको जीवमात्रका प्रतिनिधि बनाकर प्रियोऽसि मे वचन कहते हैं।जीवमात्र भगवान्को अत्यन्त प्रिय है। केवल जीव ही भगवान्से विमुख होकर प्रतिक्षण वियुक्त होनेवाले संसार(धनसम्पत्ति? कुटुम्बी? शरीर? इन्द्रियाँ? मन? बुद्धि? प्राण आदि) को अपना मानने लगता है? जबकि संसारने कभी जीवको अपना नहीं माना है। जीव ही अपनी तरफसे संसारसे सम्बन्ध जोड़ता है। संसार प्रतिक्षण परिवर्तनशील है और जीव नित्य अपरिवर्तनशील है। जीवसे यही गलती होती है कि वह प्रतिक्षण बदलनेवाले संसारके सम्बन्धको नित्य मान लेता है। यही कारण है कि सम्बन्धीके न रहनेपर भी उससे माना हुआ सम्बन्ध रहता है। यह मान हुआ सम्बन्ध ही अनर्थका हेतु है। इस सम्बन्धको मानने अथवा न माननेमें सभी स्वतन्त्र हैं। अतः इस माने हुए सम्बन्धका त्याग करके? जिनसे हमारा वास्तविक और नित्यसम्बन्ध है? उन भगवान्की शरणमें चले जाना चाहिये। सम्बन्ध -- पीछेके दो श्लोकोंमें अर्जुनको आश्वासन देकर अब भगवान् आगेके श्लोकमें अपने उपदेशकी अत्यन्त गोपनीय सार बात बताते हैं।
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।।18.65।।तू मेरा भक्त हो जा, मेरेमें मनवाला हो जा, मेरा पूजन करनेवाला हो जा और मेरेको नमस्कार कर। ऐसा करनेसे तू मेरेको ही प्राप्त हो जायगा -- यह मैं तेरे सामने सत्य प्रतिज्ञा करता हूँ; क्योंकि तू मेरा अत्यन्त प्रिय है।
।।18.66।। व्याख्या -- सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज -- भगवान् कहते हैं कि सम्पूर्ण धर्मोंका आश्रय? धर्मके निर्णयका विचार छोड़कर अर्थात् क्या करना है और क्या नहीं करना है -- इसको छोड़कर केवल एक मेरी ही शरणमें आ जा।स्वयं भगवान्के शरणागत हो जाना -- यह सम्पूर्ण साधनोंका सार है। इसमें शरणागत भक्तको अपने लिये कुछ भी करना शेष नहीं रहता जैसे -- पतिव्रताका अपना कोई काम नहीं रहता। वह अपने शरीरकी सारसँभाल भी पतिके नाते? पतिके लिये ही करती है। वह घर? कुटुम्ब? वस्तु? पुत्रपुत्री और अपने कहलानेवाले शरीरको भी अपना नहीं मानती? प्रत्युत पतिदेवका ही मानती है। तात्पर्य यह हुआ कि जिस प्रकार पतिव्रता पतिके परायण होकर पतिके गोत्रमें ही अपना गोत्र मिला देती है और पतिके ही घरपर रहती है? उसी प्रकार शरणागत भक्त भी शरीरको लेकर माने जानेवाले गोत्र? जाति? नाम आदिको भगवान्के चरणोंमें अर्पण करके निर्भय? निःशोक? निश्चिन्त और निःशङ्क हो जाता है।गीताके अनुसार यहाँ धर्म शब्द कर्तव्यकर्मका वाचक है। कारण कि इसी अध्यायके इकतालीसवेंसे चौवालीसवें श्लोकतक स्वभावज कर्म शब्द आये हैं? फिर सैंतीलीसवें श्लोकके पूर्वार्धमें स्वधर्म शब्द आया है। उसके बाद? सैंतालीसवें श्लोकके ही उत्तरार्धमें तथा (प्रकरणके अन्तमें) अड़तालीसवें श्लोकमें कर्म शब्द आया है। तात्पर्य यह हुआ कि आदि और अन्तमें कर्म शब्द आया है और बीचमें स्वधर्म शब्द आया है तो इससे स्वतः ही धर्म शब्द कर्तव्यकर्मका वाचक सिद्ध हो जाता है।अब यहाँ प्रश्न यह होता है कि सर्वधर्मान्परित्यज्य पदसे क्या धर्म अर्थात् कर्तव्यकर्मका स्वरूपसे त्याग माना जाय इसका उत्तर यह है कि धर्मका स्वरूपसे त्याग करना न तो गीताके अनुसार ठीक है और न यहाँके प्रसङ्गके अनुसार ही ठीक है क्योंकि भगवान्की यह बात सुनकर अर्जुनने कर्तव्यकर्मका त्याग नहीं किया है? प्रत्युत करिष्ये वचनं तव (18। 73) कहकर भगवान्की आज्ञाके अनुसार कर्तव्यकर्मका पालन करना स्वीकार किया है। केवल स्वीकार ही नहीं किया है? प्रत्युत अपने क्षात्रधर्मके अनुसार युद्धि भी किया है। अतः उपर्युक्त पदमें धर्म अर्थात् कर्तव्यका त्याग करनेकी बात नहीं है। भगवान् भी कर्तव्यके त्यागकी बात कैसे कह सकते हैं भगवान्ने इसी अध्यायके छठे श्लोकमें कहा है कि यज्ञ? दान? तप और अपनेअपने वर्णआश्रमोंके जो कर्तव्य हैं? उनका कभी त्याग नहीं करना चाहिये? प्रत्युत उनको जरूर करना चाहिये (टिप्पणी प0 970.1)।गीताका पूरा अध्ययन करनेसे यह मालूम होता है कि मनुष्यको किसी भी हालतमें कर्तव्यकर्मका त्याग नहीं करना चाहिये। अर्जुन तो युद्धरूप कर्तव्यकर्म छोड़कर भिक्षा माँगना श्रेष्ठ समझते थे (2। 5) परन्तु भगवान्ने इसका निषेध किया (2। 3138)। इससे भी यही सिद्ध होता है कि यहाँ स्वरूपसे धर्मोंका त्याग नहीं है।अब विचार यह करना है कि यहाँ सम्पूर्ण धर्मोंके त्यागसे क्या लेना चाहिये गीताके अनुसार सम्पूर्ण धर्मों अर्थात् कर्मोंको भगवान्के अर्पण करना ही सर्वश्रेष्ठ धर्म है। इसमें सम्पूर्ण धर्मोंके आश्रयका त्याग करना और केवल भगवान्का आश्रय लेना -- दोनों बातें सिद्ध हो जाती हैं। धर्मका आश्रय लेनेवाले बारबार जन्ममरणको प्राप्त होते हैं -- एवं त्रयीधर्ममनुप्रपन्ना गतागतं कामकामा लभन्ते (गीता 9। 21)। इसलिये धर्मका आश्रय छोड़कर भगवान्का ही आश्रय लेनेपर फिर अपने धर्मका निर्णय करनेकी जरूरत नहीं रहती। आगे अर्जुनके जीवनमें ऐसा हुआ भी है।अर्जुनका कर्णके साथ युद्ध हो रहा था। इस बीच कर्णके रथका चक्का पृथ्वीमें धँस गया। कर्ण रथसे नीचे उतरकर रथके चक्केको निकालनेका उद्योग करने लगा और अर्जुनसे बोला कि जबतक मैं यह चक्का निकाल न लूँ? तबतक तुम ठहर जाओ क्योंकि तुम रथपर हो और मैं रथसे रहित हूँ और दूसरे कार्यमें लगा हूआ हूँ। ऐसे समय रथीको उचित है कि उसपर बाण न छोड़े। तुम सहस्रार्जुनके समान शस्त्र और शास्त्रके ज्ञाता हो और धर्मको जाननेवाले हो? इसलिये मेरे ऊपर प्रहार करना उचित नहीं है। कर्णकी बात सुनकर अर्जुनने बाण नहीं चलाया। तब भगवान्ने कर्णसे कहा कितुम्हारेजैसे आततायीको किसी तरहसे मार देना धर्म ही है पाप नहीं (टिप्पणी प0 970.2) और अभीअभी तुम छः महारथियोंने मिलकर अकेले अभिमन्युको घेरकर उसे मार डाला। अतः धर्मकी दुहाई देनेसे कोई लाभ नहीं है। हाँ? यह सौभाग्यकी बात है कि इस समय तुम्हें धर्मकी बात याद आ रही है? पर जो स्वयं धर्मका पालन नहीं करता? उसे धर्मकी दुहाई देनेका कोई अधिकार नहीं है। ऐसा कहकर भगवान्ने अर्जुनको बाण चलानेकी आज्ञा दी तो अर्जुनने बाण चलाना आरम्भ कर दिया।इस प्रकार यदि अर्जुन अपनी बुद्धिसे धर्मका निर्णय करते तो भूल कर बैठते अतः उन्होंने धर्मका निर्णय भगवान्पर ही रखा और भगवान्ने धर्मका निर्णय किया भी।अर्जुनके मनमें सन्देह था कि हमलोगोंके लिये युद्ध करना श्रेष्ठ है अथवा युद्ध न करना श्रेष्ठ है (2। 6)। यदि हम युद्ध करते हैं तो अपने कुटुम्बका नाश होता है और अपने कुटुम्बका नाश करना बड़ा भारी पाप है। इससे तो अनर्थपरम्परा ही बढ़ेगी (2। 40 -- 44)। दूसरी तरफ हमलोग देखते हैं तो क्षत्रियके लिये युद्धसे बढ़कर श्रेयका कोई साधन नहीं है। अतः भगवान् कहते हैं कि क्या करना है और क्या नहीं करना है? क्या धर्म है और क्या अधर्म है? इस पचड़ेमें तू क्यों पड़ता है तू धर्मके निर्णयका भार मेरेपर छोड़ दे। यही सर्वधर्मान्परित्यज्य का तात्पर्य है।मामेकं शरणं व्रज -- इन पदोंमें एकम् पद माम् का विशेषण नहीं हो सकता माम् (भगवान्) एक ही हैं? अनेक नहीं। इसलिये एकम् पदका अर्थ अनन्य लेना ही ठीक बैठता है। दूसरी बात? अर्जुनने तदेकं वद निश्चित्य (3। 2) और यच्छ्रेय एतयोरेकम् (5। 1) पदोंमें भी एकम् पदसे सांख्य और कर्मयोगके विषयमें एक निश्चित श्रेयका साधन पूछा है। उसी एकम् पदको लेकर भगवान् यहाँ यह बताना चाहते हैं कि सांख्ययोग? कर्मयोग आदि जितने भी भगवत्प्राप्तिके साधन हैं? उन सम्पूर्ण साधनोंमें मुख्य साधन एक अनन्य शरणागति ही है।गीतामें अर्जुनने अपने कल्याणके साधनके विषयमें कई तरहके प्रश्न किये और भगवान्ने उनके उत्तर भी दिये। वे सब साधन होते हुए भी गीताके पूर्वापरको देखनेसे यह बात स्पष्ट दीखती है कि सम्पूर्ण साधनोंका सार और शिरोमणि साधन भगवान्के अनन्यशरण होना ही है।भगवान्ने गीतामें जगहजगह अनन्यभक्तिकी बहुत महिमा गायी है। जैसे? दुस्तर मायाको सुगमतासे तरनेका उपाय अनन्य शरणागति ही है (टिप्पणी प0 971.1) (7। 14) अनन्यचेताके लिये मैं सुलभ हूँ (टिप्पणी प0 971.2) (8। 14) परम पुरुषकी प्राप्ति अनन्य भक्तिसे ही होती है (8। 22) अनन्य भक्तोंका योगक्षेम मैं वहन करता हूँ (9। 22) अनन्य भक्तिसे ही भगवान्को जाना? देखा तथा प्राप्त किया जा सकता है (11। 54) अनन्य भक्तोंका मैं बहुत जल्दी उद्धार करता हूँ (12। 37) गुणातीत होनेका उपाय अनन्यभक्ति ही है (14। 26)। इस प्रकार अनन्य भक्तिकी महिमा गाकर भगवान् यहाँ पूरी गीताका सार बताते हैं -- मामेकं शरणं व्रज। तात्पर्य है कि उपाय और उपेय? साधन और साध्य मैं ही हूँ।मामेकं शरणं व्रज का तात्पर्य मनबुद्धिके द्वारा शरणागतिको स्वीकार करना नहीं है? प्रत्युत स्वयंको भगवान्की शरणमें जाना है। कारण कि स्वयंके शरण होनेपर मन? बुद्धि? इन्द्रियाँ? शरीर आदि भी उसीमें आ जाते हैं? अलग नहीं रहते।अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः -- यहाँ कोई ऐसा मान सकता है कि पहले अध्यायमें अर्जुनने जो युद्धसे पाप होनेकी बातें कही थीं? उन पापोंसे छुटकारा दिलानेका प्रलोभन भगवान्ने दिया है। परन्तु यह मान्यता यक्तिसंगत नहीं है क्योंकि जब अर्जुन सर्वथा भगवान्के शरण हो गये हैं? तब उनके पाप कैसे रह सकते हैं (टिप्पणी प0 971.3) और उनके लिये प्रलोभन कैसे दिया जा सकता है अर्थात् उनके लिये,प्रलोभन देना बनता ही नहीं। हाँ? पापोंसे मुक्त करनेका प्रलोभन देना हो तो वह शरणागत होनेके पहले ही दिया जा सकता है? शरणागत होनेके बाद नहीं। मैं तुझे सम्पूर्ण पापोंसे मुक्त कर दूँगा -- इसका भाव यह है कि जब तू सम्पूर्ण धर्मोंका आश्रय छोड़कर मेरी शरणमें आ गया और शरण होनेके बाद भी तुम्हारे भावों? वृत्तियों? आचरणों आदिमें फरक नहीं पड़ा अर्थात् उनमें सुधार नहीं हुआ भगवत्प्रेम? भगवद्दर्शन आदि नहीं हुए और अपनेमें अयोग्यता? अनधिकारिता? निर्बलता आदि मालूम होती है? तो भी उनको लेकर तुम चिन्ता या भय मत करो। कारण कि जब तुम मेरी अनन्यशरण हो गये तो वह कमी तुम्हारी कमी कैसे रही उसका सुधार करना तुम्हारा काम कैसे रहा वह कमी मेरी कमी है। अब उस कमीको दूर करना? उसका सुधार करना मेरा काम रहा। तुम्हारा तो बस? एक ही काम है वह काम है -- निर्भय? निःशोक? निश्चिन्त और निःशङ्क होकर मेरे चरणोंमें पड़े रहना (टिप्पणी प0 972.1) परन्तु अगर तेरेमें भय? चिन्ता? वहम आदि दोष आ जायँगे तो वे शरणागतिमें बाधक हो जायँगे और सब भार तेरेपर आ जायगा। शरण होकर अपनेपर भार लेना शरणागतिमें कलङ्क है।जैसे? विभीषण भगवान् रामके चरणोंकी शरण हो जाते हैं? तो फिर विभीषणके दोषको भगवान् अपना ही दोष मानते हैं। एक समय विभीषणजी समुद्रके इस पार आये। वहाँ विप्रघोष नामक गाँवमें उनसे एक अज्ञात ब्रह्महत्या हो गयी। इसपर वहाँके ब्राह्मणोंने इकट्ठे होकर विभीषणको खूब मारापीटा? पर वे मरे नहीं। फिर ब्राह्मणोंने उन्हें जंजीरोंसे बाँधकर जमीनके भीतर एक गुफामें ले जाकर बंद कर दिया। रामजीको विभीषणके कैद होनेका पता लगा तो वे पुष्पकविमानके द्वारा तत्काल विप्रघोष नामक गाँवमें पहुँच गये और वहाँ विभीषणका पता लगाकर उनके पास गये। ब्राह्मणोंने रामजीका बहुत आदरसत्कार किया और कहा कि महाराज इसने ब्रह्महत्या कर दी है। इसको हमने बहुत मारा? पर यह मरा नहीं। भगवान् रामने कहा कि हे ब्राह्मणों विभीषणको मैंने कल्पतककी आयु और राज्य दे रखा है? वह कैसे मारा जा सकता है और उसको मारनेकी जरूरत ही क्या है वह तो मेरा भक्त है। भक्तके लिये मैं स्वयं मरनेको तैयार हूँ। दासके अपराधकी जिम्मेवारी वास्तवमें उसके मालिकपर ही होती है अर्थात् मालिक ही उसके दण्डका पात्र होता है। अतः विभीषणके बदलेमें आपलोग मेरेको ही दण्ड दें (टिप्पणी प0 972.2)। भगवान्की यह शरणागतवत्सलता देखकर सब ब्राह्मण आश्यर्य करने लगे और उन सबने भगवान्की शरण ले ली।तात्पर्य यह हुआ कि मैं भगवान्का हूँ और भगवान् मेरे हैं -- इस अपनेपनके समान योग्यता? पात्रता?,अधिकारिता आदि कुछ भी नहीं है। यह सम्पूर्ण साधनोंका सार है। छोटासा बच्चा भी अपनेपनके बलपर ही आधी रातमें सारे घरको नचाता है अर्थात् जब वह रातमें रोता है तो सारे घरवाले उठ जाते हैं और उसे राजी करते हैं। इसलिये शरणागत भक्तको अपनी योग्यता आदिकी तरफ न देखकर भगवान्के साथ अपनेपनकी तरफ ही देखते रहना चाहिये।, मा शुचः का तात्पर्य है -- (1) मेरे शरण होकर तू चिन्ता करता है? यह मेरे प्रति अपराध है? तेरा अभिमान है और शरणागतिमें कलङ्क है।मेरे शरण होकर भी मेरा पूरा विश्वास? भरोसा न रखना ही मेरे प्रति अपराध है। अपने दोषोंको लेकर चिन्ता करना वास्तवमें अपने बलका अभिमान है क्योंकि दोषोंको मिटानेमें अपनी सामर्थ्य मालूम देनेसे ही उनको मिटानेकी चिन्ता होती है। हाँ? अगर दोषोंको मिटानेमें चिन्ता न होकर दुःख होता है तो दुःख होना इतना दोषी नहीं है। जैसे? छोटे बालकके पास कुत्ता आता है तो वह कुत्तेको देखकर रोता है? चिन्ता नहीं करता। ऐसे ही दोषोंका न सुहाना दोष नहीं है? प्रत्युत चिन्ता करना दोष है। चिन्ता करनेका अर्थ यही होता है कि भीतरमें अपने छिपे हुए बलका आश्रय है (टिप्पणी प0 972.3) और यही तेरा अभिमान है। मेरा भक्त होकर भी तू चिन्ता करता है तो तेरी चिन्ता दूर कहाँ होगी लोग भी देखेंगे तो यही कहेंगे कि यह भगवान्का भक्त,है और चिन्ता करता है भगवान् इसकी चिन्ता नहीं मिटाते तू मेरा विश्वास न करके चिन्ता करता है तो विश्वासकी कमी तो है तेरी और कलङ्क आता है मेरेपर? मेरी शरणागतिपर। इसको तू छोड़ दे।(2) तेरे भाव? वृत्तियाँ? आचरण शुद्ध नहीं हुए हैं तो भी तू इनकी चिन्ता मत कर। इनकी चिन्ता मैं करूँगा।(3) दूसरे अध्यायके सातवें श्लोकमें अर्जुन भगवान्के शरण हो जाते हैं और फिर आठवें श्लोकमें कहते हैं कि इस भूमण्डलका धनधान्यसे सम्पन्न निष्कण्टक राज्य मिलनेपर अथवा देवताओंका आधिपत्य मिलनेपर भी इन्द्रियोंको सुखानेवाला मेरा शोक दूर नहीं हो सकता। भगवान् मानो कह रहे हैं कि तेरा कहना ठीक ही है क्योंकि भौतिक नाशवान् पदार्थोंके सम्बन्धसे किसीका शोक कभी दूर हुआ नहीं? हो सकता नहीं और होनेकी सम्भावना भी नहीं। परन्तु मेरे शरण होकर जो तू शोक करता है? यह तेरी बड़ी भारी गलती है। तू मेरे शरण होकर भी भार अपने सिरपर ले रहा है(4) शरणागत होनेके बाद भक्तको लोकपरलोक? सद्गतिदुर्गति आदि किसी भी बातकी चिन्ता नहीं करनी चाहिये। इस विषयमें किसी भक्तने कहा है --, दिवि वा भुवि वा ममास्तु वासो नरके वा नरकान्तक प्रकामम्। अवधीरितशारदारविन्दौ चरणौ ते मरणेऽपि चिन्तयामि।। हे नरकासुरका अन्त करनेवाले प्रभो आप मेरेको चाहे स्वर्गमें रखें? चाहे भूमण्डलपर रखें और चाहे यथेच्छ नरकमें रखें अर्थात् आप जहाँ रखना चाहें? वहाँ रखें। जो कुछ करना चाहें? वह करें। इस विषयमें मेरा कुछ भी कहना नहीं है। मेरी तो एक यही माँग है कि शरद् ऋतुके कमलकी शोभाको तिरस्कृत करनेवाले आपके अति सुन्दर चरणोंका मृत्युजैसी भयंकर अवस्थामें भी चिन्तन करता रहूँ आपके चरणोंको भूलूँ नहीं।,शरणागतिसम्बन्धी विशेष बातशरणागत भक्त मैं भगवान्का हूँ और भगवान् मेरे हैं इस भावको दृढ़तासे पकड़ लेता है? स्वीकार कर,लेता है तो उसके भय? शोक? चिन्ता? शङ्का आदि दोषोंकी जड़ कट जाती अर्थात् दोषोंका आधार मिट जाता है। कारण कि भक्तिकी दृष्टिसे सभी दोष भगवान्की विमुखतापर ही टिके रहते हैं।भगवान्के सम्मुख होनेपर भी संसार और शरीरके आश्रयके संस्कार रहते हैं? जो भगवान्के सम्बन्धकी दृढ़ता होनेपर मिट जाते हैं (टिप्पणी 973.1)। उनके मिटनेपर सब दोष भी मिट जाते हैं।सम्बन्धका दृढ़ होना क्या है भय? शोक? चिन्ता? शङ्का? परीक्षा ओर विपरीत भावनाका न होना ही सम्बन्धका दृढ़ होना है। अब इनपर विचार करें।(1) निर्भय होना -- आचरणोंकी कमी होनेसे भीतरसे भय पैदा होता है और साँप? बिच्छू? बाघ आदिसे बाहरसे भय पैदा होता है। शरणागत भक्तके ये दोनों ही प्रकारके भय मिट जाते हैं। इतना ही नहीं? पतञ्जलि महाराजने जिस मृत्युके भयको पाँचवाँ क्लेश माना है (टिप्पणी प0 973.2) और जो बड़ेबड़े विद्वानोंको भी होता है (टिप्पणी प0 973.3) वह भय भी सर्वथा मिट जाता है (टिप्पणी प0 973.4)।अब मेरी वृत्तियाँ खराब हो जायँगी -- ऐसा भयका भाव भी साधकको भीतरसे ही निकाल देना चाहिये क्योंकि मैं भगवान्की कृपामें तरान्तर हो गया हूँ? अब मेरेको किसी बातका भय नहीं है। इन वृत्तियोंको मेरी माननेसे ही मैं इनको शुद्ध नहीं कर सका क्योंकि इनको मेरी मानना ही मलिनता है -- ममता मल जरि जाइ (मानस 7। 117क)। अतः अब मैं कभी भी इनको मेरी नहीं मानूँगा। जब वृत्तियाँ मेरी हैं ही नहीं तो मेरेको भय किस बातका अब तो केवल भगवान्की कृपाहीकृपा है भगवान्की कृपा ही सर्वत्र परिपूर्ण हो रही है यह बड़ी खुशीकी? बड़ी प्रसन्नताकी बात है,कई ऐसी शङ्का करते हैं कि भगवान्के शरण होकर उनका भजन करनेसे तो द्वैत हो जायगा अर्थात् भगवान् और भक्त -- ये दो हो जायँगे और दूसरेसे भय होता है -- द्वितीयाद्वै भयं भवति (बृहदारण्यक0 1। 4। 2)। पर यह शङ्का निराधार है। भय द्वितीयसे तो होता है? पर आत्मीय से भय नहीं होता अर्थात भय दूसरेसे होता है? अपनेसे नहीं। प्रकृति और प्रकृतिका कार्य शरीरसंसार द्वितीय है? इसलिये इनसे सम्बन्ध रखनेपर ही भय होता है क्योंकि इनके साथ सदा सम्बन्ध रह ही नहीं सकता। कारण यह है कि प्रकृति और पुरुषका स्वभाव सर्वथा भिन्नभिन्न है जैसे एक जड है और एक चेतन? एक विकारी है और एक निर्विकारी? एक परिवर्तनशील है और एक अपरिवर्तनशील? एक प्रकाश्य है और एक प्रकाशक? इत्यादि।भगवान् द्वितीय नहीं हैं। वे तो आत्मीय हैं क्योंकि जीव उनका सनातन अंश है? उनका स्वरूप है। अतः भगवान्के शरण होनेपर उनसे भय कैसे हो सकता है प्रत्युत उनके शरण होनेपर मनुष्य सदाके लिये अभय हो जाता है। स्थूल दृष्टिसे देखा जाय तो बच्चेको माँसे दूर रहनेपर भय होता है? पर माँकी गोदमें चले जानेपर उसका भय मिट जाता है क्योंकि माँ उसकी अपनी है। भगवान्का भक्त इससे विलक्षण होता है। कारण कि बच्चे और माँमें तो भेदभाव दीखता है? पर भक्त और भगवान्में भेदभाव सम्भव ही नहीं।(2) निःशोक होना -- जो बात बीत चुकी है? उसको लेकर शोक होता है। बीती हुई बातको लेकर शोक करना बड़ी भारी भूल है क्योंकि जो हुआ है? वह अवश्यम्भावी था और जो नहीं होनेवाला है? वह कभी हो ही नहीं सकता तथा अभी जो हो रहा है? वह ठीकठीक (वास्तविक) होनेवाला ही हो रहा है? फिर उसमें शोक करनेकी कोई बात ही नहीं है (टिप्पणी प0 974.1)। प्रभुके इस मङ्गलमय विधानको जानकर शरणागत भक्त सदा निःशोक रहता है शोक उसके पास कभी आता ही नहीं।(3) निश्चिन्त होना -- जब भक्त अपनी मानी हुई वस्तुओंसहित अपनेआपको भगवान्के समर्पित कर देता है? तब उसको लौकिकपारलौकिक किञ्चिन्मात्र भी चिन्ता नहीं होती अर्थात् अभी जीवननिर्वाह कैसे होगा कहाँ रहना होगा मेरी क्या दशा होगी क्या गति होगी आदि चिन्ताएँ बिलकुल नहीं रहतीं (टिप्पणी प0 974.2)। भगवान्के शरण होनेपर शरणागत भक्तमें यह एक बात आती है कि अगर मेरा जीवन प्रभुके लायक सुन्दर और शुद्ध नहीं बना तो भक्तोंकी बात मेरे आचरणमें कहाँ आयी अर्थात् नहीं आयी क्योंकि मेरी वृत्तियाँ ठीक नहीं रहतीं। वास्तवमें मेरी वृत्तियाँ है ऐसा मानना ही दोष है? वृत्तियाँ उतनी दोषी नहीं हैं। मन? बुद्धि? इन्द्रियाँ? शरीर आदिमें जो मेरापन है -- यही गलती है क्योंकि जब मैं भगवान्के शरण हो गया और जब सब कुछ उनके अर्पण कर दिया? तो फिर मन? बुद्धि आदिकी अशुद्धिकी चिन्ता कभी नहीं करनी चाहिये अर्थात् मेरी वृत्तियाँ ठीक नहीं हैं -- ऐसा भाव कभी नहीं लाना चाहिये। किसी कारणवश अचानक ऐसी वृत्तियाँ आ भी जायँ तो आर्तभावसेहे मेरे नाथ हे मेरे प्रभो बचाओ बचाओ बचाओ ऐसे प्रभुको पुकारना चाहिये क्योंकि वे मेरे स्वामी हैं? मेरे सर्वप्रथम प्रभु हैं तो अब मैं चिन्ता क्यों करूँ और भगवान्ने भी कह दिया है कितू चिन्ता मत कर (मा शुचः)। अतः निश्चिन्त होकर मनसे भगवान्के चरणोंमें गिर जाय और भगवान्से कह दे -- हे नाथ यह सब आपके हाथकी बात है? आप जानें।सर्वप्रथम प्रभुके शरण भी हो गये और चिन्ता भी करें -- ये दोनों बातें बड़ी विरोधी हैं क्योंकि शरण हो गये तो चिन्ता कैसी और चिन्ता होती है तो शरणागति कैसी इसलिये शरणागतको ऐसा सोचना चाहिये कि जब,भगवान् यह कहते हैं किमैं सम्पूर्ण पापोंसे छुड़ा दूँगा? तो क्या ऐसी वृत्तियोंसे छूटनेके लिये मेरेको कुछ करना पड़ेगा मैं तो बस? आपका हूँ। हे भगवन् मेरेमें वृत्तियोंको अपना माननेका भाव कभी आये ही नहीं। हे नाथ शरीर? इन्द्रियाँ? प्राण? मन? बुद्धि -- ये कभी मेरे दीखें ही नहीं परन्तु हे नाथ सब कुछ आपको देनेपर भी ये शरीर आदि कभीकभी मेरे दीख जाते हैं अब इस अपराधसे मेरेको आप ही छुड़ाइये -- ऐसा कहकर निश्चिन्त हो जाय।(4) निःशङ्क होना -- भगवान्के सम्बन्धमें कभी यह सन्देह न करे कि मैं भगवान्का हुआ या नहीं भगवान्ने मुझे स्वीकार किया या नहीं प्रत्युत इस बातको देखे किमैं तो अनादिकालसे भगवान्का ही रहूँगा। मैंने ही अपनी मूर्खतासे अपनेको भगवान्से अलग -- विमुख मान लिया था। परन्तु मैं अपनेको भगवान्से कितना ही अलग मान लूँ तो भी उनसे अलग हो सकता ही नहीं और होना सम्भव भी नहीं। अगर मैं भगवान्से अलग होना भी चाहूँ? तो भी अलग कैसे हो सकता हूँ क्योंकि भगवान्ने कहा है कि यह जीव मेरा ही अंश है -- मम एव अंशः (गीता 15। 7)। इस प्रकारमैं भगवान्का हूँ और भगवान् मेरे हैं -- इस वास्तविकताकी स्मृति आते ही शङ्काएँ -- सन्देह मिट जाते हैं? शङ्काओं -- सन्देहोंके लिये किञ्चिन्मात्र भी गुंजाइश नहीं रहती।(5) परीक्षा न करना -- भगवान्के शरण होकर ऐसी परीक्षा न करे किजब मैं भगवान्के शरण हो गया हूँ तो मेरेमें ऐसेऐसे लक्षण घटने चाहिये। यदि ऐसेऐसे लक्षण मेरेमें नहीं हैं तो मैं भगवान्के शरण कहाँ हुआ प्रत्युतअद्वेष्टा आदि (गीता 12। 13 -- 19) गुणोंकी अपनेमें कमी दीखे तो आश्चर्य करे कि मेरेमें यह कमी कैसे रह गयी। (टिप्पणी प0 975) ऐसा भाव आते ही यह कमी नहीं रहेगी? मिट जायगी। कारण कि यह उसका प्रत्यक्ष अनुभव है कि पहले अद्वेष्टा आदि गुण जितने कम थे? उतने कम अब नहीं हैं। शरणागत होनेपर भक्तोंके जितने भी लक्षण हैं? वे सब बिना प्रयत्न किये जाते हैं।(6) विपरीत धारणा न करना -- भगवान्के शरणागत भक्तमें यह विपरीत धारणा भी कैसे हो सकती है किमैं भगवान्का नहीं हूँ क्योंकि यह मेरे मानने अथवा न माननेपर निर्भर नहीं है। भगवान्का और मेरा परस्पर जो सम्बन्ध है? वह अटूट है? अखण्ड है? नित्य है। मैंने इस सम्बन्धकी तरफ खयाल नहीं किया? यह मेरी गलती थी। अब वह गलती मिट गयी? तो फिर विपरीत धारणा हो ही कैसे सकती हैजो मनुष्य सच्चे हृदयसे प्रभुकी शरणागतिको स्वीकार कर लेता है? उसमें भय? शोक? चिन्ता आदि दोष नहीं रहते। उसका शरणभाव स्वतः ही दृढ़ होता चला जाता है जैसेविवाह होनेके बाद कन्याका अपने पिताके घरसे सम्बन्धविच्छेद और पतिके घरसे सम्बन्ध स्वतः ही दृढ़ होता चला जाता है। वह सम्बन्ध यहाँतक दृढ़ हो जाता है कि जब वह कन्या दादीपरदादी बन जाती है? तब उसको स्वप्नमें भी यह भाव नहीं आता कि मैं यहाँकी नहीं हूँ। उसके मनमें यह भाव दृढ़ हो जाता है कि मैं तो यहाँकी ही हूँ और ये सब मेरे ही हैं। जब उसके पौत्रकी स्त्री आती है और घरमें उद्दण्डता करती है? खटपट मचाती है तो वह (दादी) कहती है कि इस परायी जायी छोकरीने मेरा घर बिगाड़ दिया पर उस बूढ़ी दादीको यह बात याद ही नहीं आती कि मैं भी तो परायी जायी (पराये घरमें जन्मी) हूँ। तात्पर्य यह हुआ कि जब बनावटी सम्बन्धमें भी इतनी दृढ़ता हो सकती है? तब भगवान्के ही अंश इस प्राणीका भगवान्के साथ जो नित्य सम्बन्ध है? वह दृढ़ हो जाय -- इसमें आश्चर्य ही क्या है वास्तवमें भगवान्के सम्बन्धकी दृढ़ताके लिये केवल संसारके माने हुए सम्बन्धों का त्याग करनेकी ही आवश्यकता है।सच्चे हृदयसे प्रभुके चरणोंकी शरण होनेपर उस शरणागत भक्तमें यदि किसी भाव? आचरण आदिकी किञ्चित कमी रह जाय? कभी विपरीत वृत्ति पैदा हो जाय अथवा किसी परिस्थितिमें पड़कर (परवशतासे) कभी किञ्चित् कोई दुष्कर्म हो जाय? तो उसके हृदयमें जलन पैदा हो जायगी। इसलिये उसके लिये अन्य कोई प्रायश्चित्त करनेकी आवश्यकता नहीं है। भगवान् कृपा करके उसके उस पापको सर्वथा नष्ट कर देते हैं (टिप्पणी प0 976.1)।भगवान् भक्तके अपनेपनको ही देखते हैं? गुणों और अवगुणोंको नहीं (टिप्पणी प0 976.2) अर्थात् भगवान्को भक्तके दोष दीखते ही नहीं? उनको तो केवल भक्तके साथ जो अपनापन है? वही दीखता है। कारण कि स्वरूपसे भक्त सदासे ही भगवान्का है। दोष आगन्तुक होनेसे आतेजाते रहते हैं और वह नित्य निरन्तर ज्योंकात्यों ही रहता है। इसलिये भगवान्की दृष्टि सदा इस वास्तविकतापर ही जमी रहती है। जैसे? कीचड़ आदिसे सना हुआ बच्चा जब माँके सामने आता है? तब माँकी दृष्टि केवल अपने बच्चेकी तरफ जाती है बच्चेकी मैलेकी तरफ नहीं जाती। बच्चेकी दृष्टि भी मैलेकी तरफ नहीं जाती। माँ साफ करे या न करे? पर बच्चेकी दृष्टिमें तो मैला है ही नहीं? उसकी दृष्टिमें तो केवल माँ ही है। द्रौपदीके मनमें कितना द्वेष और क्रोध भरा हुआ था कि जब दुःशासनके खूनसे अपने केश धोऊँगी? तभी केशोंको बाँधूँगी परन्तु द्रौपदी जब भी भगवान्को पुकारती है? भगवान् चट आ चाते हैं क्योंकि भगवान्के साथ द्रौपदीका गाढ़ अपनापन था।भगवान्के साथ अपनापन होनेमें दो भाव रहते हैं -- (1) भगवान् मेरे हैं और (2) मैं भगवान् का हूँ। इन दोनोंमें भगवान्का सम्बन्ध समान रीतिसे रहते हुए भीभगवान् मेरे हैं -- इस भावमें भगवान्से अपनी अनुकूलताकी इच्छा है किभगवान् मेरे हैं तो मेरी इच्छाकी पूर्ति क्यों नहीं करते परन्तुमैं भगवान्का हूँ इस भावमें भगवान्से अपनी अनुकूलता की इच्छा नहीं हो सकती क्योंकिमैं भगवान्का हूँ तो भगवान् मेरे लिये जैसा ठीक समझें? वैसा ही निःसंकोच होकर करें। इसलिये साधकको चाहिये कि वह भगवान्की ही मरजीमें सर्वथा अपनी मरजी मिला दे? भगवान्पर अपना किञ्चित भी आधिपत्य न माने? प्रत्युत अपनेपर उनका पूरा आधिपत्य माने। कहीँ भी भगवान् हमारे मनकी करें तो उसमें संकोच हो कि मेरे लिये भगवान्को ऐसा करना पड़ा यदि अपने मनकी बात पूरी होनेसे संकोच नहीं होता? प्रत्युत संतोष होता है तो यह शरणागति नहीं है। शरणागत भक्त शरीर? इन्द्रियाँ? मन? बुद्धिके प्रतिकूल परिस्थितिमें भी भगवान्की मरजी समझकर प्रसन्न रहता है।शरणागत भक्तको अपने लिये कभी किञ्चिन्मात्र भी कुछ करना शेष नहीं रहता क्योंकि उसने सम्पूर्ण ममतावाली वस्तुओंसहित अपनेआपको भगवान्के समर्पित कर दिया जो वास्तवमें प्रभुका ही था। अब करने? कराने आदिका सब काम भगवान्का ही रह गया। ऐसी अवस्थामें वह कठिनसेकठिन और भयंकरसेभंयकर घटना? परिस्थितिमें भी अपनेपर प्रभुकी महान् कृपा देखकर सदा प्रसन्न रहता है मस्त रहता है। जैसे? गरुडजीके पूछनेपर काकभुशुण्डिजीने अपने पूर्वजन्मके ब्राह्मणशरीरकी कथा सुनायी? जिसमें लोमश ऋषिने शाप देकर उन्हें (ब्राह्मणको) पक्षियोंमें नीच चाण्डाल पक्षी (कौआ) बना दिया परन्तु काकभुशुण्डिजीके मनमें न कुछ भय हुआ और न कुछ दीनता ही आयी। उन्होंने उसमें भगवान्का शुद्ध विधान ही समझा। केवल समझा ही नहीं? प्रत्युत मनहीमन बोल उठे -- उर प्रेरक रघुबंस बिभूषन (मानस 7। 113। 1)। ऐसा भयंकर शाप मिलनेपर भी जब काकभुशुण्डिजीकी प्रसन्नतामें कोई कमी नहीं आयी? तब लोमश ऋषिने उनको भगवान्का प्यारा भक्त समझकर अपने पास बुलाया और बालक रामजीका ध्यान बताया। फिर भगवान्की कथा सुनायी और अत्यन्त प्रसन्न होकर काकभुशुण्डिजीके सिरपर हाथ रखकर आशीर्वाद दिया -- मेरी कृपासे तुम्हारे हृदयमें अबाध? अखण्ड रामभक्ति रहेगी। तुम रामजीके प्यारे हो जाओगे। तुम सम्पूर्ण गुणोंकी खान बन जाओगे। जिस रूपकी इच्छा करोगे? वह रूप धारण कर लोगे। जिस स्थानपर तुम रहोगे? उसमें एक योजनापर्यन्त मायाका कण्टक किञ्चिन्मात्र भी नहीं आयेगा आदिआदि। इस प्रकार बहुतसे आशीर्वाद देते ही आकाशवाणी हुई किहे ऋषे तुमने जो कुछ कहा? वह सब सच्चा होगा? यह मन? वाणी? कर्मसे मेरा भक्त है। इन्हीं बातोंको लेकर भगवान्के विधानमें सदा प्रसन्न रहनेवाले काकभुशुण्डिजीने कहा है --, भगति पच्छ हठ करि रहेउँ दीन्हि महा रिषि साप। मुनि दुर्लभ बर पायउँ देखहु भजन प्रताप।। (मानस 7। 114 ख)यहाँभजन प्रताप शब्दोंका अर्थ है -- भगवान्के विधानमें हर समय प्रसन्न रहना। विपरीतसेविपरीत अवस्थामें भी प्रेमी भक्तकी प्रसन्नता अधिकसेअधिक बढ़ती रहती है क्योंकि प्रेमका स्वरूप ही प्रतिक्षण वर्धमान है।यह नियम है कि जो चीज अपनी होती है? सदा ही अपनेको प्यारी लगती है। भगवान् सम्पूर्ण जीवोंको अपना प्रिय मानते हैं -- सब मम प्रिय सब मम उपजाए (मानस 7। 86। 2) और इस जीवको भी प्रभु स्वतः ही प्रिय लगते हैं। हाँ? यह बात दूसरी है कि यह जीव परिवर्तनशील संसार और शरीरको भूलसे अपना मानकर अपने प्यारे प्रभुसे विमुख हो जाता है। इसके विमुख होनेपर भी भगवान्ने अपनी तरफसे किसी भी जीवका त्याग नहीं किया है और न कभी त्याग कर ही सकते हैं। कारण कि जीव सदासे साक्षात् भगवान्का ही अंश है। इसलिये सम्पूर्ण जीवोंके साथ भगवान्की आत्मीयता अक्षुण्ण? अखणडितरूपसे स्वाभाविक ही बनी हुई है। इसीसे वे मात्र जीवोंपर कृपा करनेके लिये अर्थात् भक्तोंकी रक्षा? दुष्टोंका विनाश और धर्मकी स्थापना -- इन तीन बातोंके लिये समयसमयपर अवतार लेते हैं (गीता 4। 8)। इन तीनों बातोंमें केवल भगवान्की आत्मीयता ही टपक रही है? नहीं तो भक्तोंकी रक्षा? दुष्टोंका विनाश और धर्मकी स्थापनासे भगवान्का क्या प्रयोजन सिद्ध होता है अर्थात् कुछ भी प्रयोजन सिद्ध नहीं होता। भगवान् तो ये तीनों ही काम केवल प्राणिमात्रके कल्याणके लिये ही करते हैं। इससे भी प्राणिमात्रके साथ भगवान्की स्वाभाविक आत्मीयता? कृपालुता? प्रियता? हितैषिता? सुहृत्ता और निरपेक्ष उदारता ही सिद्ध होती है? और यहाँ भी इसी दृष्टिसे अर्जुनसे कहते हैं -- मद्भक्तो भव? मन्मना भव? मद्याजी भव? मां नमस्कुरु। इन चारों बातोंमें भगवान्का तात्पर्य केवल जीवको अपने सम्मुख करानेमें ही है? जिससे सम्पूर्ण जीव असत् पदार्थोंसे विमुख हो जायँ क्योंकि दुःख? संताप? बारबार जन्मनामरना? मात्र विपत्ति आदिमें मुख्य हेतु भगवान्से विमुख होना ही है।भगवान् जो कुछ भी विधान करते हैं? वह संसारमात्रके सम्पूर्ण जीवोंके कल्याणके लिये ही करते हैं -- बस? भगवान्की इस कृपाकी तरफ जीवकी दृष्टि हो जाय? तो फिर उसके लिये क्या करना बाकी रहा जीवोंके हितके लिये भगवान्के हृदयमें एक तड़पन है? इसीलिये भगवान् सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज वाली अत्यन्त गोपनीय बात कह देते हैं। कारण कि भगवान् जीवमात्रको अपना मित्र मानते हैं -- सुहृदं सर्वभूतानाम् (5। 29) और उन्हें यह स्वतन्त्रता देते हैं कि वे कर्मयोग? ज्ञानयोग? भक्तियोग आदि जितने भी साधन हैं? उनमेंसे किसी भी साधनके द्वारा सुगमतापूर्वक मेरी प्राप्ति कर सकते हैं और दुःख? संताप,आदिको सदाके लिये समूल नष्ट कर सकते हैं।वास्तवमें जीवका उद्धार केवल भगवत्कृपासे ही होता है। कर्मयोग? ज्ञानयोग? भक्तियोग? अष्टाङ्गयोग? लययोग? हठयोग? राजयोग? मन्त्रयोग आदि जितने भी साधन हैं? वे सबकेसब भगवान्के द्वारा और भगवत्तत्त्वको जाननेवाले महापुरुषोंके द्वारा ही प्रकट किये गये हैं (टिप्पणी प0 977.1)। अतः इन सब साधनोंमें भगवत्कृपा ही ओतप्रोत है। साधन करनेमें तो साधक निमित्तमात्र होता है? पर साधनकी सिद्धिमें भगवत्कृपा ही मुख्य है।शरणागत भक्तको तो ऐसी चिन्ता भी कभी नहीं करनी चाहिये कि अभी भगवान्के दर्शन नहीं हुए? भगवान्के चरणोंमें प्रेम नहीं हुआ? अभी वृत्तियाँ शुद्ध नहीं हुईँ? आदि। इस प्रकारकी चिन्ताएँ करना मानो बँदरीका बच्चा बनना है। बँदरीका बच्चा स्वयं ही बँदरीको पकड़े रहता है। बँदरी कूदेफाँदे? किधर भी जाय? बच्चा स्वयं बँदरीसे चिपका रहता है।भक्तको तो अपनी सब चिन्ताएँ भगवान्पर ही छोड़ देनी चाहिये अर्थात् भगवान् दर्शन दें या न दें? प्रेम दें या न दें? वृत्तियोंको ठीक करें या न करें? हमें शुद्ध बनायें या न बनायें -- यह सब भगवान्की मरजीपर छोड़ देना चाहिये। उसे तो बिल्लीका बच्चा बनना चाहिये। बिल्लीका बच्चा अपनी माँपर निर्भर रहता है। बिल्ली चाहे जहाँ रखे? चाहे जहाँ ले जाय। बिल्ली अपनी मरजीसे बच्चेको उठाकर ले जाती है तो वह पैर समेट लेता है। ऐसे ही शरणागत भक्त संसारकी तरफसे अपने हाथपैर समेटकर (टिप्पणी प0 977.2) केवल भगवान्का चिन्तन? नामजप आदि करते हुए भगवान्की तरफ ही देखता रहता है। भगवान्का जो विधान है? उसमें परम प्रसन्न रहता है? अपने मनकी कुछ भी नहीं लगाता।जैसे? कुम्हार पहले मिट्टीको सिरपर उठाकर लाता है तो कुम्हारकी मरजी? फिर उस मिट्टीको गीला करके उसे रौंदता है तो कुम्हारकी मरजी? फिर चक्केपर चढ़ाकर घुमाता है तो कुम्हारकी मरजी। मिट्टी कभी कुछ नहीं कहती कि तुम घड़ा बनाओ? सकोरा? मटकी बनाओ। कुम्हार चाहे जो बनाये? उसकी मरजी है। ऐसे ही शरणागत भक्त अपनी कुछ भी मरजी? मनकी बात नहीं रखता। वह जितना अधिक निश्चिन्त और निर्भय होता है? भगवत्कृपा उसको अपनेआप उतना ही अधिक अपने अनुकूल बना लेती है और जितनी वह चिन्ता करता है? अपना बल मानता है? उतना ही वह आती हुई भगवत्कृपामें बाधा लगाता है अर्थात् शरणागत होनेपर भगवान्की ओरसे जो विलक्षण? विचित्र? अखण्ड? अटूट कृपा आती है? अपनी चिन्ता करनेसे उस कृपामें बाधा लग जाती है।जैसे धीवर (मछुआ) मछलियोंको पकड़नेके लिये नदीमें जाल डालता है तो जालके भीतर आनेवाली सब मछलियाँ पकड़ी जाती हैं परन्तु जो मछली जाल डालनेवाले मछुएके चरणोंके पास आ जाती है? वह नहीं पकड़ी जाती। ऐसे ही भगवान्की माया(संसार) में ममता करके जीव फँस जाते हैं और जन्मतेमरते रहते हैं परन्तु जो जीव मायापति भगवान्के चरणोंकी शरण हो जाते हैं? वे मायाको तर जाते हैं -- मामेव ये प्रपद्यन्ते मायामेतां तरन्ति ते (गीता 7। 14)। इस दृष्टान्तका एक ही अंश ग्रहण करना चाहिये क्योंकि धीवरका तो मछलियोंको जालमें फँसानेका भाव होता है परन्तु भगवान्का जीवोंको मायामें फँसानेका किञ्चिन्मात्र भी भाव नहीं होता। भगवान्का भाव तो जीवोंको मायाजालसे मुक्त करके अपने शरण लेनेका होता है? तभी तो वे कहते हैं -- मामेकं शरणं व्रज। जीव संयोगजन्य सुखकी लोलुपतासे खुद ही मायासे फँस जाते हैं।जैसे चलती हुई चक्कीके भीतर आनेवाले सभी दाने पिस जाते हैं (टिप्पणी प0 978) परन्तु जिसके आधारपर चक्की चलती है? उस कीलके आसपास रहनेवाले दाने ज्योंकेत्यों साबूत रह जाते हैं। ऐसे ही जन्ममरणरूप संसारकी चलती हुई चक्कीमें पड़े हुए सबकेसब जीव पिस जाते हैं अर्थात् दुःख पाते हैं,परन्तु जिसके आधारपर संसारचक्र चलता है? उन भगवान्के चरणोंका सहारा लेनेवाला जीव पिसनेसे बच जाता है -- कोई हरिजन ऊबरे? कील माकड़ी पास। परन्तु यह दृष्टान्त भी पूरा नहीं घटता क्योंकि दाने तो स्वाभाविक ही कीलके पास रह जाते हैं। वे बचनेका कोई उपाय नहीं करते। परन्तु भगवान्के भक्त संसारसे विमुख होकर प्रभुके चरणोंका आश्रय लेते हैं। तात्पर्य यह है कि जो भगवान्का अंश होकर भी संसारको अपना मानता है अथवा संसारसे कुछ चाहता है? वही जन्ममरणरूप चक्रमें पड़कर दुःख भोगता है।संसार और भगवान् -- इन दोनोंका सम्बन्ध दो तरहका होता है। संसारका सम्बन्ध केवल माना हुआ है और भगवान्का सम्बन्ध वास्तविक है। संसारका सम्बन्ध तो मनुष्यको पराधीन बनाता है? गुलाम बनाता है? पर भगवान्का सम्बन्ध मनुष्यको स्वाधीन बनाता है? चिन्मय बनाता है और बनाता है भगवान्का भी मालिककिसी बातको लेकर अपनेमें कुछ भी विशेषता दीखती है? यही वास्तवमें पराधीनता है। यदि मनुष्य विद्या? बुद्धि? धनसम्पत्ति? त्याग? वैराग्य आदि किसी बातको लेकर अपनी विशेषता मानता है तो यह उस विद्या आदिकी पराधीनता? दासता ही है। जैसे? कोई धनको लेकर अपनेमें विशेषता मानता है तो यह विशेषता वास्तवमें धनकी ही हुई? खुदकी नहीं। वह अपनेको धनका मालिक मानता है? पर वास्तवमें वह धनका गुलाम है।संसारका यह कायदा है कि सांसारिक पदार्थोंको लेकर जो अपनेमें कुछ विशेषता मानता है? उसको ये सांसारिक पदार्थ तुच्छ बना देते हैं? पददलित कर देते हैं। परन्तु जो भगवान्के आश्रित होकर सदा भगवान्पर ही निर्भर रहता है? उसको अपनी कुछ विशेषता दीखती ही नहीं? प्रत्युत भगवान्की ही अलौकिकता? विलक्षणता? विचित्रता दीखती है। भगवान् चाहे उसको अपना मुकुटमणि बना लें और चाहे अपना मालिक बना लें? तो भी उसको अपनेमें कुछ भी विशेषता नहीं दीखती। प्रभुका यह कायदा है कि जिस भक्तको अपनेमें कुछ भी विशेषता नहीं दीखती? अपनेमें किसी बातका अभिमान नहीं होता? उस भक्तमें भगवान्की विलक्षणता उतर आती है। किसीकिसीमें यहाँ तक विलक्षणता उतर आती है कि उसके शरीर? इन्द्रियाँ? मन? बुद्धि आदि प्राकृत पदार्थ भी चिन्मय बन जाते हैं। उनमें जडताका अत्यन्त अभाव हो जाता है। ऐसे भगवान्के कई प्रेमी भक्त भगवान्में ही समा गये? अन्तमें उनके शरीर नहीं मिले। जैसे मीराबाई शरीरसहित भगवान्के श्रीविग्रहमें लीन हो गयीं। केवल पहचानके लिये उनकी साड़ीका छोटासा छोर श्रीविग्रहके मुखमें रह गया और कुछ नहीं बचा। ऐसे ही सन्त श्रीतुकारामजी शरीरसहित वैकुण्ठ चले गये।ज्ञानमार्गमें शरीर चिन्मय नहीं होता क्योंकि ज्ञानी असत्से सम्बन्धविच्छेद करके? असत्से अलग होकर स्वयं चिन्मय तत्त्वमें स्थित हो जाता है। परन्तु जब भक्त भगवान्के सम्मुख होता है? तब उसके शरीर? इन्द्रियाँ? मन? प्राण आदि सभी भगवान्के सम्मुख हो जाते हैं। तात्पर्य यह हुआ कि जिनकी दृष्टि केवल चिन्मय तत्त्वपर ही है अर्थात् जिनकी दृष्टिमें चिन्मय तत्त्वसे भिन्न जडताकी स्वतन्त्र सत्ता ही नहीं होती? तो वह चिन्मयता उनके शरीर आदिमें भी उतर आती है और वे शरीर आदि चिन्मय हो जाते हैं। हाँ? लोगोंकी दृष्टिमें तो उनके शरीरमें जडता दीखती है? पर वास्तवमें उनके शरीर चिन्मय ही होते हैं।भगवान्के सर्वथा शरण हो जानेपर शरणागतके लिये भगवान्की कृपा तो विशेषतासे प्रकट होती ही है? पर मात्र संसारका स्नेहपूर्वक पालन करनेवाली और भगवान्से अभिन्न रहनेवाली वात्सल्यमयी माता लक्ष्मीका प्रभुशरणागतपर कितना अधिक स्नेह होता है वे कितना अधिक प्यार करती हैं? इसका कोई भी वर्णन नहीं कर सकता। लौकिक व्यवहारमें भी देखनेमें आता है कि पतिव्रता स्त्रीको पितृभक्त पुत्र बहुत प्यारा लगता है।दूसरी बात? प्रेमभावसे परिपूरित प्रभु जब अपने भक्तको देखनेके लिये गरुडपर बैठकर पधारते हैं? तब माता लक्ष्मी भी प्रभुके साथ गरुडपर बैठकर आती हैं? जिस गरुडकी पाँखोंसे सामवेदके मन्त्रोंका गान होता रहता,है परन्तु कोई भगवान्को न चाहकर केवल माता लक्ष्मीको ही चाहता है? तो उसके स्नेहके कारण माता लक्ष्मी आ तो जाती हैं? पर उनका वाहन दिवान्ध उल्लू होता है। ऐसे वाहनवाली लक्ष्मीको प्राप्त करके मनुष्य भी मदान्ध हो जाता है। अगर उस माँको कोई भोग्या समझ लेता है तो उनका बड़ा भारी पतन हो जाता है क्योंकि वह तो अपनी माँको ही कुदृष्टिसे देखता है? इसलिये वह महान् अधम है।तीसरी बात? जहाँ केवल भगवान्का प्रेम होता है? वहाँ तो भगवान्से अभिन्न रहनेवाली लक्ष्मी भगवान्के साथ आ ही जाती हैं? पर जहाँ केवल लक्ष्मीकी चाहना है? वहाँ लक्ष्मीके साथ भगवान् भी आ जायँ -- यह नियम नहीं है।शरणागतिके विषयमें एक कथा आती है। सीताजी? रामजी और हनुमान्जी जंगलमें एक वृक्षके नीचे बैठे थे। उस वृक्षकी शाखाओं और टहनियोंपर एक लता छायी हुई थी। लताके कोमलकोमल तन्तु फैल रहे थे। उन तन्तुओंमें कहींपर नयीनयी कोपलें निकल रही थीं और कहींपर ताम्रवर्णके पत्ते निकल रहे थे। पुष्प और पत्तोंसे लता छायी हुई थी। उससे वृक्षकी सुन्दर शोभा हो रही थी। वृक्ष बहुत ही सुहावना लग रहा था। उस वृक्षकी शोभाको देखकर भगवान् श्रीराम हनुमान्जीसे बोले -- देखो हनुमान् यह लता कितनी सुन्दर है वृक्षके चारों ओर कैसी छायी हुई है यह लता अपने सुन्दरसुन्दर फल? सुगन्धित फूल और हरीभरी पत्तियोंसे इस वृक्षकी कैसी शोभा बढ़ा रही है इससे जंगलके अन्य सब वृक्षोंसे यह वृक्ष कितना सुन्दर दीख,रहा है इतना ही नहीं? इस वृक्षके कारण ही सारे जंगलकी शोभा हो रही है। इस लताके कारण ही पशुपक्षी इस वृक्षका आश्रय लेते हैं। धन्य है यह लताभगवान् श्रीरामके मुखसे लताकी प्रसंशा सुनकर सीताजी हनुमान्जीसे बोलीं -- देखो बेटा हनुमान् तुमने खयाल किया कि नहीं देखो? इस लताका ऊपर चढ़ जाना? फूलपत्तोंसे छा जाना? तन्तुओंका फैल जाना -- ये सब वृक्षके आश्रित हैं? वृक्षके कारण ही हैं। इस लताकी शोभा भी वृक्षके ही कारण हैं। इसलिये मूलमें महिमा तो वृक्षकी ही है। आधार तो वृक्ष ही है। वृक्षके सहारे बिना लता स्वयं क्या कर सकती है कैसे छा सकती है अब बोलो हनुमान् तुम्हीं बातओ? महिमा वृक्षकी ही हुई न रामजीने कहा -- क्यों हनुमान् यह महिमा तो लताकी ही हुई न, हनुमान्जी बोले -- हमें तीसरी ही बात सूझती है। सीताजीने पूछा -- वह क्या है बेटा हनुमान्जीने कहा -- माँ वृक्ष और लताकी छाया बड़ी सुन्दर है। इसलिये हमें तो इन दोनोंकी छायामें रहना ही अच्छा लगता है अर्थात् हमें तो आप दोनोंकी छाया(चरणोंके आश्रय) में रहना ही अच्छा लगता हैसेवक सुत पति मातु भरोसें। रहइ असोच बनइ प्रभु पोसें।। (मानस 4। 3। 2)ऐसे ही भगवान् और उनकी दिव्य आह्लादिनी शक्ति -- दोनों ही एकदूसरेकी शोभा बढ़ाते हैं। परन्तु कोई तो उन दोनोंको श्रेष्ठ बताता है? कोई केवल भगवान्को श्रेष्ठ बताता है और कोई केवल उनकी आह्लादिनी शक्तिको श्रेष्ठ बताता है। शरणागत भक्तके लिये तो प्रभु और उनकी आह्लादिनी शक्ति -- दोनोंका आश्रय ही श्रेष्ठ है।एक बार एक प्रज्ञाचक्षु (नेत्रहीन) संत हाथमें लाठी पकड़े हुए यमुनाके किनारेकिनारे चले जा रहे थे। नदीमें बाढ़ आयी हुई थी। उससे एक जगह यमुनाका किनारा पानीमें गिर पड़ा तो बाबाजी भी पानीमे गिर पड़े।,हाथसे लाठी छूट गयी थी। दीखता तो था ही नहीं? अब तैरें तो किधर तैरें भगवान्की शरणागतिकी बात याद आते ही प्रयासरहित होकर शरीरको ढीला छोड़ दिया तो उनको ऐसा लगा कि किसीने हाथ पकड़कर किनारेपर डाल दिया। वहाँ दूसरी कोई लाठी हाथमें आ गयी और उसके सहारे वे चले पड़े। तात्पर्य यह है कि जो भगवान्के शरण होकर भगवान्पर निर्भर रहता है? उसको अपने लिये करना कुछ नहीं रहता। भगवान्के विधानसे जो हो जाय? उसीमें वह प्रसन्न रहता है।बहुतसी भेड़बकरियाँ जंगलमें चरने गयीं। उनमेंसे एक बकरी चरतेचरते एक लतामें उलझ गयी। उसको उस लतामें निकलनेमें बहुत देर लगी? तबतक अन्य सब भेड़बकरियाँ अपने घर पहुँच गयीं। अँधेरा भी हो रहा था। वह बकरी घूमतेघूमते एक सरोवरके किनारे पहुँची। वहाँ किनारेकी गीली जमीनपर सिंहका एक चरणचिन्ह अङ्कित था। वह उस चरणचिन्हके शरण होकर उसके पास बैठ गयी। रातमें जंगली सियार? भेड़िया? बाघ आदि प्राणी बकरीको खानेके लिये पासमें आये तो उस बकरीने बता दिया किपहले देख लेना कि मैं किसके शरणमें हूँ? तब मुझे खाना वे चिन्हको देखकर कहने लगे -- अरे? यह तो सिंहके चरणचिन्हके शरण है? जल्दी भागो यहाँसे सिंह आ जायगा तो हमको मार डालेगा। इस प्रकार सभी प्राणी भयभीत होकर भाग गये। अन्तमें जिसका चरणचिन्ह था? वह सिंह स्वयं आया और बकरीसे बोला -- तू जंगलमें अकेली कैसे बैठी है बकरीने कहा -- यह चरणचिन्ह देख लेना? फिर बात करना। जिसका यह चरणचिन्ह है? उसीके मैं शरण हुए बैठी हूँ। सिंहने देखा किओह यह तो मेरा ही चरण चिन्ह है? यह,बकरी तो मेरे ही शरण हुई सिंहने बकरीको आश्वासन दिया कि अब तुम डरो मत? निर्भय होकर रहो।रातमें जब जल पीनेके लिये हाथी आया तो सिंहने हाथीसे कहा -- तू इस बकरीको पीठपर चढ़ा ले इसको जंगलमें चराकर लाया कर और हरदम अपनी पीठपर ही रखा कर? नहीं तो तू जानता नहीं कि मैं कौन हूँ मार डालूँगा सिंहकी बात सुनकर हाथी थरथर काँपने लगा उसने अपनी सूँडसे झट बकरीको पीठपर चढ़ा लिया। अब वह बकरी निर्भय होकर हाथीकी पीठपर बैठेबैठे ही वृक्षोंकी ऊपरकी कोंपलें खाया करती और मस्त रहती। खोज पकड़ सैंठे रहो? धणी मिलेंगे आय। अजया गज मस्तक चढ़े? निर्भय कोंपल खाय।।ऐसे ही जब मनुष्य भगवान्के शरण हो जाता है? उनके चरणोंका सहारा ले लेता है? तब वह सम्पूर्ण प्राणियोंसे? विघ्नबाधाओंसे निर्भय हो जाता है। उसको कोई भी भयभीत नहीं कर सकता? उसका कोई भी कुछ बिगाड़ नहीं सकता। जो जाको शरणो गहै? ताकहँ ताकी लाज। उलटे जल मछली चले? बह्यो जात गजराज।।भगवान्के साथ काम? भय? द्वेष? क्रोध? स्नेह आदिसे भी सम्बन्ध क्यों न जोड़ा जाय? वह भी जीवका कल्याण करनेवाला ही होता है (टिप्पणी प0 980)। तात्पर्य यह हुआ कि काम? भय? द्वेष आदि किसी तरहसे भी जिनका भगवान्के साथ सम्बन्ध जुड़ गया? उनका तो उद्धार हो ही गया? पर जिन्होंने किसी तरहसे भी भगवान्के साथ सम्बन्ध नहीं जोड़ा? उदासीन ही रहे? वे भगवत्प्राप्तिसे वञ्चित रह गये भगवान्के अनन्य भक्तोंके लिये नारदजीने कहा --, नास्ति तेषु जातिविद्यारूपकुलधनक्रियादिभेदः। (नारदभक्तिसूत्र 72)उन भक्तोंमें जाति? विद्या? रूप? कुल? धन? क्रिया आदिका भेद नहीं है।तात्पर्य यह है कि स्थूल? सूक्ष्म और कारणशरीरको लेकर सांसारिक जितने भी जाति? विद्या आदि भेद हो सकते हैं? वे सब उनपर लागू नहीं होते जो सर्वथा भगवान्के अर्पित हो गये हैं (टिप्पणी प0 981.1)। कारण कि वे अच्युत भगवान्के ही हैं -- यतस्तदीयाः (नारदभक्तिसूत्र 73)? संसारके नहीं। अच्युत भगवान्के होनेसे वेअच्युत गोत्र के ही कहलाते हैं (टिप्पणी प0 981.2)।शरणागतिका रहस्यशरणागतिका रहस्य क्या है -- इसको वास्तवमें भगवान् ही जानते हैं। फिर भी अपनी समझमें आयी बात कहनेकी चेष्टा की जाती है क्योंकि हरेक आदमी जो बात कहता है? उससे वह अपनी बुद्धिका ही परिचय देता है। पाठकोंसे प्रार्थना है कि वे यहाँ आयी बातोंका उलटा अर्थ न निकालें क्योंकि प्रायः लोग किसी तात्त्विक रहस्यवाली बातको गहराईसे समझे बिना उसका उलटा अर्थ जल्दी निकाल लेते हैं? इसलिये ऐसी बातको कहनेसुननेके पात्र बहुत कम होते हैं।भगवान्ने गीतामें शरणागतिके विषयमें दो बातें बतायी हैं --, (1) मामेकं शरणं व्रज (18। 66)अनन्यभावसे केवल मेरी शरणमें आ जा। (2) स सर्वविद्भजति मां सर्वभावेन भारत (15। 19)वह सर्वज्ञ पुरुष सर्वभावसे मेरा भजन करता है? तमेव शरणं गच्छ सर्वभावेन भारत (18। 62)तू सर्वभावसे उस परमात्माकी शरणमें जा।हम भगवान्के शरण कैसे हो जायँ केवल एक भगवान्के शरण हो जायँ अर्थात् भगवान्के गुण? ऐश्वर्य आदिकी तरफ दृष्टि न रखें और सर्वभावसे भगवान्के शरण हो जायँ अर्थात् साथमें अपनी कोई सांसारिक कामना न रखें।केवल एक भगवान्के शरण होनेका रहस्य यह है कि भगवान्के अनन्त गुण हैं? प्रभाव हैं? तत्त्व हैं? रहस्य हैं? महिमा है? लीलाएँ हैं? नाम हैं? धाम हैं भगवान्का अनन्त ऐश्वर्य है? माधुर्य है? सौन्दर्य है -- इन विभूतियोंकी तरफ शरणागत भक्त देखता ही नहीं। उसका यही एक भाव रहता है किमैं केवल भगवान्का हूँ और केवल भगवान् ही मेरे हैं। अगर वह गुण? प्रभाव आदिकी तरफ देखकर भगवान्की शरण लेता है? तो वास्तवमें वह गुण? प्रभाव आदिके ही शरण हुआ? भगवान्के शरण नहीं हुआ। परन्तु इन बातोंका उलटा अर्थ न लगा लें।उलटा अर्थ लगाना क्या है भगवान्के गुण? प्रभाव? नाम? धाम? ऐश्वर्य? माधुर्य? सौन्दर्य आदिको मानना ही नहीं है? इनकी तरफ जाना ही नहीं है। अब कुछ करना है ही नहीं? न भजन करना है? न भगवान्के गुण? प्रभाव? लीला आदि सुननी है? न भगवान्के धाममें जाना है -- यह उलटा अर्थ लगाना है। इनका ऐसा अर्थ लगाना महान् अनर्थ करना है।केवल एक भगवान्के शरण होनेका तात्पर्य है -- केवल भगवान् मेरे हैं। अब वे ऐश्वर्यसम्पन्न हैं तो बड़ी अच्छी बात और उनमें कुछ भी ऐश्वर्य नहीं है तो बड़ी अच्छी बात। वे बड़े दयालु हैं तो बड़ी अच्छी बात और इतने निष्ठुर? कठोर हैं कि उनके समान दुनियामें कोई कठोर है ही नहीं? तो बड़ी अच्छी बात। उनका बड़ा भारी प्रभाव है तो बड़ी अच्छी बात और उनमें कोई प्रभाव नहीं है तो बड़ी अच्छी बात। शरणागतमें इन बातोंकी कोई परवाह नहीं होती। उसका तो एक ही भाव रहता है कि भगवान् जैसे भी हैं? मेरे हैं (टिप्पणी प0 982.1)। भगवान् की इन बातोंकी परवाह न होनेसे भगवान्का ऐश्वर्य? माधुर्य? सौन्दर्य? गुण? प्रभाव आदि चले जायँगे? ऐसी बात नहीं है। पर हम उनकी परवाह नहीं करेंगे? तो हमारी असली शरणागति होगी।जहाँ गुण? प्रभाव आदिको लेकर भगवान्के शरण होते हैं? वहाँ केवल भगवान्के शरण नहीं होते? प्रत्युत गुण? प्रभाव आदिके ही शरण होते हैं जैसे -- कोई रुपयोंवाले आदमीका आदर करे तो वास्तवमें वह आदर उस आदमीका नहीं? रुपयोंका है। किसी मिनिस्टरका कितना ही आदर किया जाय तो वह आदर उसका नहीं? मिनिस्टरी(पद) का है। किसी बलवान् व्यक्तिका आदर किया जाय तो वह उसके बलका आदर है? उसका खुदका आदर नहीं है। परन्तु अगर कोई केवल व्यक्ति(धनी आदि) का आदर करे तो इससे धनीका धन या मिनिस्टरकी मिनिस्टरी चली जायगी -- यह बात नहीं है। वह तो रहेगी ही। ऐसे ही केवल भगवान्के शरण होनेसे भगवान्के गुण? प्रभाव आदि चले जायँगे -- ऐसी बात नहीं है। परन्तु हमारी दृष्टि तो केवल भगवान्पर ही रहनी चाहिये? उनके गुणों आदिपर नहीं।सप्तर्षियोंने जब पार्वतीजीके सामने शिवजीके अनेक अवगुणोंका और विष्णुके अनेक सद्गुणोंका वर्णन करते हुए उनको शिवजीका त्याग करनेके लिये कहा? तब पार्वतीजीने उनको यही उत्तर दिया -- महादेव अवगुन भवन विष्नु सकल गुन धाम। जेहि कर मनु रम जाहि सन तेहि तेही सन काम।। (मानस 1। 80)ऐसी ही बात गोपियोंने भी उद्धवजीसे कही थी --, ऊधौ मन माने की बात। दाख छोहारा छाड़ि अमृतफल? बिषकीरा बिष खात।। जो चकोर को दै कपूर कोउ?, तजि अंगार अघात। मधुप करत घर कोरे काठमें?, बँधत कमल के पात।। ज्यों पतंग हित जान आपनो?, दीपक सों लपटात। सूरदास जाको मन जासों? ताको सोइ सुहात।।भगवान्के प्रभाव आदिकी तरफ देखनेवालेको? उससे प्रेम करनेवालेको मुक्ति? ऐश्वर्य आदि तो मिल सकता है? पर भगवान् नहीं मिल सकते। भगवान्के प्रभावकी तरफ न देखनेवाला भगवत्प्रेमी भक्त ही भगवान्को पा सकता है। इतना ही नहीं? वह प्रेमीभक्त भगवान्को बाँध भी सकता है? उनकी बिक्री भी कर सकता है भगवान् देखते हैं कि वह मेरेसे प्रेम करता है? मेरे प्रभावकी तरफ देखतातक नहीं? तो भगवान्के मनमें उसका बड़ा आदर होता है।प्रभावकी तरफ देखना यह सिद्ध करता है कि हमारेमें कुछ पानेकी कामना है। हमारे मनमें उन कामनावाले पदार्थका आदर है। जबतक हमारे मनमें उस कामनावाले पदार्थका आदर है। जबतक हमारे मनमें कामना है? तबतक हम प्रभावको देखते हैं। अगर हमारे मनमें कोई कामना न रहे तो भगवान्के प्रभाव? ऐश्वर्यकी तरफ हमारी दृष्टि नहीं जायगी। केवल भगवान्की तरफ दृष्टि होगी तो हम भगवान्के शरण हो जायँगे? भगवान्के अपने हो जायँगे।पूतना राक्षसीने जहर लगाकर स्तन मुखमें दिया तो उसको भगवान्ने माताकी गति दे दी (टिप्पणी प0 982.2) अर्थात् जो मुक्ति यशोदा मैयाको मिले? वह मुक्ति पूतनाको मिल गयी। जो मुखमें जहर देती है? उसे,तो भगवान्ने मुक्ति दे दी। अब जो रोजाना दूध पिलाती है? उस मैयाको भगवान् क्या दें तो अनन्त जीवोंको मुक्ति देनेवाले भगवान् मैयाके अधीन हो गये? उन्हें अपनेआपको ही दे दिया मैयाके इतने वशीभूत हो गये कि मैया छड़ी दिखाती है तो वे डरकर रोने रग जाते हैं कारण कि मैयाकी भगवान्के प्रभाव? ऐश्वर्यकी तरफ दृष्टि ही नहीं है। इस प्रकार जो भगवान्से मुक्ति चाहता है? उसे भगवान् मुक्ति दे देते हैं? पर जो कुछ भी नहीं चाहता? उसे भगवान् अपनेआपको ही दे देते हैं।सर्वभावसे भगवान्के शरण होनेका रहस्य यह है कि हमारा शरीर अच्छा है? इन्द्रियाँ वशमें हैं? मन शुद्धनिर्मल है? बुद्धिसे हम ठीक जानते हैं? हम पढ़ेलिखे हैं? हम यशस्वी हैं? हमारा संसारमें मान है -- इस प्रकारहम भी कुछ हैं ऐसा मानकर भगवान्के शरण होना शरणागति नहीं है। भगवान्के शरण होनेके बाद शरणागतको ऐसा विचार भी नहीं करना चाहिये कि हमारा शरीर ऐसा होना चाहिये हमारी बुद्धि ऐसी होनी चाहिये हमारा मन ऐसा होना चाहिये हमारा ऐसा ध्यान लगना चाहिये हमारी ऐसी भावना होनी चाहिये हमारे जीवनमें ऐसे लक्षण आने चाहिये हमारे ऐसे आचरण होने चाहिये हमारेमें ऐसा प्रेम होना चाहिये कि कथाकीर्तन सुननेपर आँसू बहने लगें? कण्ठ गद्गद हो जाय पर ऐसा हमारे जीवनमें हुआ ही नहीं तो हम भगवान्के शरण कैसे हुए आदिआदि। ये बातें अनन्य शरणागतिकी कसौटी नहीं हैं। जो अनन्य शरण हो जाता है? वह यह देखता ही नहीं कि शरीर बीमार है कि स्वस्थ है मन चञ्चल है कि स्थिर है बुद्धिमें जानकारी है कि अनजानपना है अपनेमें मूर्खता है कि विद्वत्ता है योग्यता है कि अयोग्यता है आदि। इन सबकी तरफ वह स्वप्नमें भी नहीं देखता क्योंकि उसकी दृष्टिमें ये सब चीजें कूड़ाकरकट हैं? जिन्हें अपने साथ नहीं लेना है। यदि इन चीजोंकी तरफ देखेगा तो अभिमान ही बढ़ेगा कि मैं भगवान्का शरणागत भक्त हूँ अथवा निराश होना पड़ेगा कि मैं भगवान्के शरण तो हो गया? पर भक्तोंके गुण (गीता 12। 13 -- 19) तो मेरेमें आये ही नहीं। तात्पर्य यह हुआ कि अगर अपनेमें भक्तोंके गुण दिखायी देंगे तो उनका अभिमान हो जायगा और अगर नहीं दिखायी देंगे तो निराशा हो जायगी। इसलिये यही अच्छा है कि भगवान्के शरण होनेके बाद इन गुणोंकी तरफ भूलकर भी नहीं देखें। इसका यह उलटा अर्थ न लगा लें कि हम चाहे वैरविरोध करें? चाहे द्वेष करें? चाहे ममता करें? चाहे जो कुछ करें यह अर्थ बिलकुल नहीं है। तात्पर्य है कि इन गुणोंकी तरफ खयाल ही नहीं होना चाहिये। भगवान्के शरण होनेवाले भक्तमें ये सबकेसब गुण अपनेआप ही आयेंगे? पर इनके आने या न आनेसे उसको कोई मतलब नहीं रखना चाहिये। अपनेमें ऐसी कसौटी नहीं लगानी चाहिये कि अपनेमें ये गुण या लक्षण हैं या नहीं।सच्चा शरणागत भक्त तो भगवान्के गुणोंकी तरफ भी नहीं देखता और अपने गुणोंकी तरफ भी नहीं देखता। वह भगवान्के ऊँचेऊँचे प्रेमियोंकी तरफ भी नहीं देखता कि ऊँचे प्रेमी ऐसेऐसे होते हैं? तत्त्वको जाननेवाले जीवन्मुक्त ऐसेऐसे होते हैं।प्रायः लोग ऐसी कसौटी लगाते हैं कि यह भगवान्का भजन करता है तो बीमार कैसे हो गया भगवान्का भक्त हो गया तो उसको बुखार क्यों आ गया उसपर दुःख क्यों आ गया उसका बेटा क्यों मर गया उसका धन क्यों चला गया उसका संसारमें अपयश क्यों हो गया उसका निरादर क्यों हो गया आदिआदि। ऐसी कसौटी लगाना बिलकुल फालतू बात है? बड़े नीचे दर्जेकी बात है। ऐसे लोगोंको क्या समझायें वे सत्सङ्गके नजदीक ही नहीं आये? इसीलिये उनको इस बातका पता ही नहीं है कि भक्ति क्या होती है शरणागति क्या होती है वे इन बातोंको समझ ही नहीं सकते। परन्तु इसका अर्थ यह भी नहीं है कि भगवान्का भक्त दरिद्र होता ही है? उसका संसारमें अपमान होती ही है? उसकी निन्दा होती ही है। शरणागत भक्तको तो निन्दाप्रशंसा? रोगनिरोगअवस्था आदिसे कोई मतलब ही नहीं होता। इनकी तरफ वह देखता ही नहीं। वह यही देखता है कि मैं हूँ और भगवान् हैं? बस। अब संसारमें क्या है? क्या नहीं है? त्रिलोकीमें क्या है? क्या नहीं है? प्रभु ऐसे हैं? वे उत्पत्ति? स्थिति और प्रलय करनेवाले हैं -- इन बातोंकी तरफ उसकी दृष्टि जाती ही नहीं।किसीने एक सन्त से पूछा -- आप किस भगवान्के भक्त हैं जो उत्पत्ति? स्थिति? प्रलय करते हैं? उनके भक्त हैं क्या तो उस सन्तने उत्तर दिया -- हमारे भगवान्का तो उत्पत्ति? स्थिति? प्रलयके साथ कोई सम्बन्ध है ही नहीं। यह तो हमारे प्रभुका ऐश्वर्य है। यह कोई विशेष बात नहीं है। शरणागत भक्तको ऐसा होना चाहिये। ऐश्वर्य आदिकी तरफ उसकी दृष्टि ही नहीं होनी चाहिये।ऋषिकेशमें गङ्गाजीके किनारे शामको सत्सङ्ग हो रहा था। गरमी पड़ रही थी। उधरसे गङ्गाजीकी ठण्डी हवाकी लहर आयी तो एक सज्जनने कहा -- कैसी ठण्डी हवाकी लहर आ रही है पास बैठे दूसरे सज्जनने उनसे कहा -- हवाको देखनेके लिये तुम्हें समय कैसे मिल गया यह ठण्डी हवा आयी? यह गरम हवा आयी -- इस तरफ तुम्हारा खयाल कैसे चला गया भगवान्के भजनमें लगे हो तो हवा ठण्डा आयी या गरम आयी? सुख आया या दुःख आया -- इस तरफ जब तक खयाल है? तबतक भगवान्की तरफ खयाल कहाँ इसी विषयमें हमने एक कहानी सुनी है। कहानी तो नीचे दर्जेकी है पर उसका निष्कर्ष बड़ा अच्छा है।एक कुलटा स्त्री थी। उसको किसी पुरुषसे संकेत मिला कि इस समय अमुक स्थानपर तुम आ जाना। अतः वह समयपर अपने प्रेमीके पास जा रही थी। रास्तेमें एक मस्जिद पड़ती थी। मस्जिदकी दीवारें छोटीछोटी थीं। दीवारके पास ही वहाँका मौलवी झुककर नमाज पढ़ रहा था। वह कुलटा अनजानेमें उसके ऊपर पैर,रखकर निकल गयी। मौलवीको बड़ा गुस्सा आया कि कैसी औरत है यह इसने मेरेपर जूतीसहित पैर रखकर मेरेको नापाक (अशुद्ध) बना दिया वह वहीं बैठकर उसको देखता रहा कि कब आयेगी। जब वह कुलटा पीछे लौटकर आयी? तब मौलवीने उसको धमकाया किकैसी बेअक्ल हो तुम हम परवरदिगारकी बंदगीमें बैठे थे? नमाज पढ़ रहे थे और तुम हमारेपर पैर रखकर चली गयी तब वह बोली -- मैं नरराची ना लखी? तुम कस लख्यो सुजान। पढ़ि कुरान बौरा भया? राच्यो नहिं रहमान।।अर्थात् एक पुरुषके ध्यानमें रहनेके कारण मेरेको इसका पता ही नहीं लगा कि सामने दीवार है या कोई मनुष्य है? पर तू तो भगवान्के ध्यानमें था? फिर तूने मेरेको कैसे पहचान लिया कि वह यही थी तू केवल कुरान पढ़पढ़कर बावला हो गया है। अगर तू भगवान्के ध्यानमें रचा हुआ होता तो क्या मुझे पहचान लेता कौन आया? कैसे आया? मनुष्य था कि पशुपक्षी था? क्या था? क्या नहीं था? कौन ऊपर आया? कौन नीचे आया? किसने पैर रखा -- इधर तेरा खयाल ही क्यों जाता तात्पर्य है कि एक भगवान्को छोड़कर किसीकी तरफ ध्यान ही कैसे जाय दूसरी बातोंका पता ही कैसे लगे जबतक दूसरी बातोंका पता लगता है? तबतक वह शरण कहाँ हुआकौरवपाण्डव जब बालक थे? तब वे अस्त्रशस्त्र सीख रहे थे। सीखकर जब तैयार हो गये? तब उनकी परीक्षा ली गयी। एक वृक्षपर एक बनावटी चिड़िया बैठा दी गयी और सबसे कहा गया कि उस चिड़ियाके कण्ठपर तीर मारकर दिखाओ। एकएक करके सभी आने लगे। गुरुजी पहले सबसे अलगअलग पूछते कि बताओ? तुम्हें वहाँ क्या दीख रहा है कोई कहता कि हमें तो वृक्ष दीखता है? कोई कहता कि हमें तो टहनी दीखती है? कोई कहता है हमें तो चिड़िया दीखती है? चोंच भी दीखती है? पंख भी दीखते हैं। ऐसा कहनेवालोंको वहाँसे हटा दिया गया। जब अर्जुनकी बारी आयी? तब उनसे पूछा गया कि तुमको क्या दीखता है? तो अर्जुनने कहा कि मेरेको तो केवल कण्ठ ही दीखता है और कुछ भी नहीं दीखता। तब अर्जुनसे बाण मारनेके लिये कहा गया। अर्जुनने अपने बाणसे उस चिड़ियाका कण्ठ वेध दिया क्योंकि उनकी लक्ष्यपर दृष्टि ठीक थी। अगर चिड़िया दीखती है? वृक्ष? टहनी आदि दीखते हैं तो लक्ष्य कहाँ सधा है अभी तो दृष्टि फैली हुई है। लक्ष्य होनेपर तो वही दीखेगा? जो लक्ष्य होगा। लक्ष्यके सिवाय दूसरा कुछ दीखेगा ही नहीं। इसी प्रकार जबतक मनुष्यका लक्ष्य एक नहीं हुआ है? तबतक वह अनन्य कैसे हुआ अव्यभीचारीअनन्ययोग होना चाहिये -- मयि चानन्ययोगेन भक्तिरव्यभिचारिणी (गीता 13। 10)।अन्ययोग,नहीं होना चाहिये अर्थात् शरीर? मन? बुद्धि? अहम् आदिकी सहायता नहीं होनी चाहिये। वहाँ तो केवल एक भगवान् ही होने चाहिये।गोस्वामी तुलसीदासजी महाराजसे किसीने कहा -- आप जिन रामललाकी भक्ति करते हैं? वे तो बारह कलाके अवतार हैं? पर सूरदासजी जिन भगवान् कृष्णकी भक्ति करते हैं? सोलह कलाके अवतार हैं। यह सुनते ही गोस्वामीजी महाराज उसके चरणोंमें गिर पड़े और बोले -- ओह आपने बड़ी भारी कृपा कर दी मैं तो रामको दशरथजीके लाड़ले कुँवर समझकर ही भक्ति करता था। अब पता लगा कि वे बारह कलाके अवतार हैं इतने बड़े हैं वे आपने आज नयी बात बताकर बड़ा उपकार किया। अब कृष्ण सोलह कलाके अवतार हैं -- यह बात उन्होंने सुनी ही नहीं? इस तरफ उनका ध्यान ही नहीं गया।भगवान्के प्रति भक्तोंके अलगअलग भाव होते हैं। कोई कहता है कि दशरथजीकी गोदमें खेलनेवाले जो रामलला हैं? वे ही हमारे इष्ट हैं -- इष्टदेव मम बालक रामा (मानस 7। 75। 3) राजाधिराज रामचन्द्रजी नहीं? छोटासा रामलला। कोई भक्त कहता है कि हमारे इष्ट तो लड्डूगोपाल हैं? नन्दके लाला हैं। वे भक्त अपने रामललाको? नन्दललाको सन्तोंसे आशीर्वाद दिलाते हैं? तो भगवान्को वह बहुत प्यारा लगता है।,तात्पर्य है कि भक्तोंकी दृष्टि भगवान्के ऐश्वर्यकी तरफ जाती ही नहीं। या ब्रजरज की परस से? मुकति मिलत है चार। वा रज को नित गोपिका? डारत डगर बुहार।।आँगनकी जिस रजमें कन्हैया खेलते हैं? वह रज कोई ले ले तो उसको चारों प्रकारकी मुक्ति मिल जाय। पर यशोदा मैया उसी रजको बुहारकर बाहर फेंक देती हैं। मैयाके लिये तो वह कूड़ाकरकट है। अब मुक्ति किसको चाहिये मैयाकी केवल कन्हैयाकी तरफ ही दृष्टि है। न तो कन्हैयाके ऐश्वर्यकी तरफ दृष्टि है और न योग्यताकी तरफ ही दृष्टि है।सन्तोंने कहा है कि अगर भगवान्से मिलना हो तो साथमें साथी भी नहीं होना चाहिये और सामान भी नहीं होना चाहिये अर्थात् साथी और सामानके बिना उनसे मिलो। जब साथी? सहारा साथमें है? तो तुम क्या मिले भगवान्से और मन? बुद्धि? विद्या? धन आदि सामान साथमें बँधा रहेगा तो उसका परदा (व्यवधान) रहेगा। परदेमें मिलन थोड़े ही होता है वहाँ तो कपड़ेका भी व्यवधान होता है। कपड़ा ही नहीं? माला भी आड़में आ जाय तो मिलन क्या हुआ इसलिये साथमें कोई साथी और सामान न हो फिर भगवान्से जो मिलन होगा? वह बड़ा विलक्षण और दिव्य होगा।एक महात्माजीको खेतमें काम करनेवाला एक व्रजवासी ग्वाला मिल गया। वह भगवान्का भक्त था। महात्माजीने उससे पूछा -- तुम क्या करते हो उसने कहा -- हम तो अपने लाला कन्हैयाका काम करते हैं। महात्माजीने कहा -- हम भगवान्के अनन्य भक्त हैं? तुम क्या हो उसने कहा -- हम फनन्य भक्त हैं। महात्माजीने पूछा -- फनन्य भक्त क्या होता है तो उसने भी पूछा -- अनन्य भक्त क्या होता है महात्माजीने कहा -- अनन्य भक्त वह होता है जो सूर्य? शक्ति? गणेश? ब्रह्मा आदि किसीको भी न माने? केवल हमारे कन्हैयाको ही माने। उसने कहा -- बाबाजी? हम तो इन ससुरोंका नाम भी नहीं जानते कि ये क्या होते हैं? क्या नहीं होते हमें इनका पता ही नहीं है तो हम फनन्य हो गये कि नहीं इस प्रकार ब्रह्म क्या होता है आत्मा क्या होती है सगुण और निर्गुण क्या होता है साकार और निराकार क्या होता है आदि बातोंकी तरफ शरणागत भक्तकी दृष्टि ही नहीं जानी चाहिये।व्रजकी एक बात है। एक सन्त कुएँपर किसीसे बात कर रहे थे कि ब्रह्म है? परमात्मा है? जीवात्मा है आदि। वहाँ एक गोपी जल भरने आयी। उसने कान लगाया कि बाबाजी क्या बात कर रहे हैं। जब वह गोपी दूसरी,गोपीसे मिली तो उससे पूछा -- अरी सखी यह ब्रह्म क्या होता है उसने कहा -- हमारे लालाका ही कोई अड़ोसीपड़ोसी? सगासम्बन्धी होगा हमलोग तो जानती नहीं सखी ये लोग उसीकी धुनमें लगे हैं न इसलिये सब जानते हैं। हमारे तो एक नन्दके लाला ही हैं। कोई काम हो तो नन्दबाबासे कह देंगी? गिरिराजसे कह देंगी कि महाराज आप कृपा करो। कन्हैया तो भोलाभाला है? वह क्या समझेगा और क्या करेगा कन्हैयासे क्या मिलेगा अरी सखी वह कन्हैया हमारा है? और क्या मिलेगा हम भी अकेली हैं और वह कन्हैया भी अकेला है। हमारे पास भी कुछ समान नहीं? और उसके पास भी कुछ सामान नहीं? बिलकुल नंगधड़ंग बाबा -- नगन मूरतिबाल गुपालकी? कतरनी बरनी जगजालकी। अब ऐसे कन्हैयासे क्या मिलेगायशोदा मैया दाऊजीसे कहती हैं -- देख दाऊ यह कन्हैया बहुत भोलाभाला है? तू इसका खयाल रखा कर कि कहीं यह जंगलमें दूर न चला जाय। जंगलमें मेले साथ चलतेचलते कोई साँपका बिन देखता है तो उसमें हाथ डाल देता है? अब इसे कोई साँप काट ले तो मैया कहती है -- बेटा अभी वह छोटासा अबोध बालक है? तू बड़ा है? इसलिये इसकी निगाह रखा कर। ग्वालबालोंसे कोई कहे कि कन्हैया तो सब दुनियाका पालन करता है? तो वे यही कहेंगे कि तुम्हारा ऐसा भगवान् होगा? जो सब दुनियाका पालन करता होगा। हमारा तो ऐसा नहीं है। हमारा छोटासा कन्हैया दुनियाका क्या पालन करेगाएक बाबाजीकी गोपियोंसे बातचीत चली। वे बाबाजी बात करतेकरते कहने लगे कि कृष्ण इतने ऐश्वर्यशाली हैं? उनका इतना माधुर्य है? उनके पास ऐश्वर्यका इतना खजाना है? आदि। तो गोपियाँ कहने लगीं -- महाराज उस खजानेकी चाबी तो हमारे पास है कन्हैयाके पास क्या है उसके पास तो कुछ भी नहीं है। कोई उससे माँगेगा तो वह कहाँसे देगा इसलिये किसीको कुछ चाहिये तो वह कन्हैया पास न जाये। कन्हैयाके पास? उसकी शरणमें तो वही जाये? जिसको कभी कुछ नहीं चाहिये। किसी भी अवस्थामें कुछ भी चाहनेका भाव न हो अर्थात् विपत्ति? मौत आदिकी अवस्थामें भीमेरी थोड़ी सहायता कर दो? रक्षा कर दोऐसा भाव भी नहीं होभगवान् श्रीरामसे वाल्मीकिजी कहते हैं --, जाहि न चाहिअ कबहुँ कछु तुम्ह सन सहज सनेहु। बसहु निरंतर तासु मन सो राउर निज गेहु।। (मानस 2। 131)कुछ भी चाहनेका भाव न होनेसे भगवान् स्वाभाविक ही प्यारे लगते हैं? मीठे लगते हैं -- तुम्ह सन सहज सनेहु। जिसमें चाह नहीं है? वह भगवान्का खास घर है -- सो राउर निज गेहु। यदि चाहना भी साथमें रखें और भगवान्को भी साथमें रखें तो वह भगवान्का खास घर नहीं है। भगवान्के साथसहज स्नेह हो? स्नेहमें कोई मिलावट न हो अर्थात् कुछ भी चाहना न हो। वहाँ तो आसक्ति? वासना? मोह? ममता ही होते हैं। इसलिये गोपियाँ सावधान करती हुई कहती हैं --, मा यात पान्थाः पथिभीमरथ्यां दिगम्बरः कोऽपि तमालनीलः। विन्यस्तहस्तोऽपि नितम्बबिम्बे धूतः समाकर्षति चित्तवित्तम्।।अरे पथिको उस गलीसे मत जाना? वह बड़ी भयावनी है। वहाँ अपने नितम्बविम्बपर दोनों हाथ रखे जो तमालके समान नीले रंग का एक नंगधड़ंग बालक खड़ा है? वह केवल देखनेमात्रका अवधूत है। वास्तवमें तो वह अपने पासमें होकर निकलनेवाले किसी भी पथिकके चित्तरूपी धनको लूटे बिना नहीं रहता।वह जो कालाकाला नंगधड़ंग बालक खड़ा है न उससे तुम लुट जाओगे? रीते रह जाओगे वह ऐसा चोर है कि सब खत्म कर देगा। उधर जाना ही मत? पहले ही खयाल रखना। अगर चले गये तो फिर सदाके,लिये ही चले गये इसलिये कोई अच्छी तरहसे जीना चाहे तो उधर मत जाय। उसका नाम कृष्ण है न कृष्ण कहते हैं खींचनेवालेको। एक बार खींच ले तो फिर छोड़े ही नहीं। उससे पहचान न हो? तबतक तो ठीक है। अगर उससे पहचान हो गयी तो फिर मामला खत्म। फिर किसी कामको नहीं रहोगे? त्रिलोकीभरमें निकम्मे हो जाओगे नारायन बौरी भई डोलै? रही न काहू काम की।। जाहि लगन लगी घनस्याम की।हाँ? जो किसी कामका नहीं होता? वह सबके लिये सब कामका होता है। परन्तु उनको उसी कामसे कोई मतलब नहीं होता।शरणागत भक्तको भजन भी करना नहीं पड़ता। उसके द्वारा स्वतःस्वाभाविक भजन होता है। भगवान्का नाम उसे स्वाभाविक ही बड़ा मीठा? प्यारा लगता है। अगर कोई पूछे कि तुम श्वास क्यों लेते हो यह हवाको भीतरबाहर करनेका क्या धंधा शुरू कर रखा है तो यही कहेंगे कि भाई यह धंधा नहीं है? इसके बिना हम जी ही नहीं सकते। ऐसे ही शरणागत भक्त भजनके बिना रह ही नहीं सकता। जिसको सब कुछ अर्पण कर दिया? उसके विस्मरणमें परम व्याकुलता? महान् छटपटाहट होने लगती है -- तद्विस्मरणे परमव्याकुलतेति (नारदभक्तिसूत्र 19)। ऐसे भक्तसे अगर कोई कहे कि आधे क्षणके लिये भगवान्को भूल जानेसे त्रिलोकीका राज्य मिलेगा? तो वह इसे भी ठुकरा देगा। भागवतमें आया है -- त्रिभुवनविभवहेतवेऽप्यकुण्ठ स्मृतिरजितात्मसुरादिभिर्विमृग्यात्। न चलति भगवत्पदारविन्दा ल्लवनिमिषार्धमपि यः स वैष्णवाग्र्यः।। (श्रीमद्भा0 11। 2। 53)तीनों लोकोंके समस्त ऐश्वर्यके लिये भी उन देवदुर्लभ भगवच्चारणकमलोंका जो आधे निमेषके लिये भी त्याग नहीं कर सकते? वे ही श्रेष्ठ भगवद्भक्त हैं। न पारमेष्ठ्यं न महेन्द्रधिष्ण्यं न सार्वभौमं न रसाधिपत्यम्। न योगसिद्धीरपुनर्भवं वा मय्यार्पितात्मेच्छति मद् विनान्यत्।। (श्रीमद्भा0 11। 14। 14)भगवान् कहते हैं किस्वयंको मेरे अर्पित करनेवाला भक्त मुझे छोड़कर ब्रह्माका पद? इन्द्रका पद? सम्पूर्ण पृथ्वीका राज्य? पातालादि लोकोंका राज्य? योगकी समस्त सिद्धियाँ और मोक्षको भी नहीं चाहता।भरतजी कहते हैं -- अरथ न धरम न काम रुचि गति न चहउँ निरबान। जनम जनम रति राम पद यह बरदानु न आन।। (मानस 2। 204) सम्बन्ध -- अब पूर्वश्लोकमें कहे अत्यन्त गोपनीय वचनको अनाधिकारियोंके सामने कहनेका निषेध करत हैं।
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।।18.66।।सम्पूर्ण धर्मोंका आश्रय छोड़कर तू केवल मेरी शरणमें आ जा। मैं तुझे सम्पूर्ण पापोंसे मुक्त कर दूँगा, चिन्ता मत कर।
इदं ते नातपस्काय नाभक्ताय कदाचन।
न चाशुश्रूषवे वाच्यं न च मां योऽभ्यसूयति ॥
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।।18.67।। व्याख्या -- इदं ते नातपस्काय -- पूर्वश्लोकमें आये सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज -- इस सर्वगुह्यतम वचनके लिये यहाँ इदम् पद आया है।अपने कर्तव्यका पालन करते हुए स्वाभाविक जो कष्ट आ जाय? विपरीत परिस्थिति आ जाय? उसको प्रसन्नतापूर्वक सहनेका नामतप है। तपके बिना अन्तःकरणमें पवित्रता नहीं आती? और पवित्रता आये बिना अच्छी बातें धारण नहीं होतीं। इसलिये भगवान् कहते हैं कि जो तपस्वी नहीं है? उसको यह सर्वगुह्यतम रहस्य नहीं कहना चाहिये।जो सहिष्णु अर्थात् सहनशील नहीं है? वह भी अतपस्वी है। अतः उसको भी यह सर्वगुह्यतम रहस्य नहीं कहना चाहिये। यह सहिष्णुता चार प्रकारकी होती है --,(1) द्वन्द्वसहिष्णुता -- रागद्वेष? हर्षशोक? सुखदुःख? मानअपमान? निन्दास्तुति आदि द्वन्द्वोंसे रहित हो जाना -- ते द्वन्द्वमोहनिर्मुक्ताः (गीता 7। 28) द्वन्द्वैर्विमुक्ताः सुखदुःखसंज्ञैः गीता (15। 5)।(2) वेगसहिष्णुता -- काम? क्रोध? लोभ? द्वेष आदिके वेगोंको उत्पन्न न होने देना -- कामक्रोधोद्भवं वेगम् (गीता 5। 23)।(3) परमतसहिष्णुता -- दूसरोंके मतकी महिमा सुनकर अपने मतमें सन्देह न होना और उनके मतसे उद्विग्न न होना (टिप्पणी प0 987.1) -- एकं सांख्यं च योगं च यः पश्यति स पश्यति (गीता 5। 5)।(4) परोत्कर्षसहिष्णुता -- अपनेमें योग्यता? अधिकार? पद? त्याग? तपस्या आदिकी कमी है? तो भी दूसरोंकी योग्यता? अधिकार आदिकी प्रसंशा सुनकर अपनेमें कुछ भी विकार न होना -- विमत्सरः (गीता 4। 22) हर्षामर्षभयोद्वेगैर्मुक्तः (गीता 12। 15)।ये चारों सहिष्णुताएँ सिद्धोंकी हैं। ये सहिष्णुताएँ जिसका लक्ष्य हों? वही तपस्वी है और जिसका लक्ष्य न हों? वही अतपस्वी है।ऐसे अतपस्वी अर्थात् असहिष्णु (टिप्पणी प0 987.2) को सर्वगुह्यतम रहस्य न सुनानेका मतलब है किसम्पूर्ण धर्मोंको मेरेमें अर्पण करके तू अनन्यभावसे मेरी शरण आ जा -- इस बात को सुनकर उसके मनमें कोई विपरीत भावना या दोष आ जाय? तो वह मेरी इस सर्वगुह्यतम बातको सह नहीं सकेगा और इसका निरादर करेगा? जिससे उसका पतन हो जायगा।दूसरा भाव यह है कि जिसका अपनी वृत्तियों? आचरणों? भावों आदिको शुद्ध करनेका उद्देश्य नहीं है? वह यदि मेरीतू मेरी शरणमें आ जा? तो मैं तुझे सम्पूर्ण पापोंसे मुक्त कर दूँगा? तू चिन्ता मत कर -- इन बातोंको सुनेगा तोमैं चिन्ता क्यों करूँ चिन्ता भगवान् करेंगे ऐसा उल्टा समझकर दुर्गणदुराचारोंमें लग जायगा और अपना अहित कर लेगा। इससे मेरी सर्वगुह्यतम् बातका दुरुपयोग होगा। अतः इसे कुपात्रको कभी मत सुनाना।नाभक्ताय कदाचन -- जो भक्तिसे रहित है? जिसका भगवान्पर भरोसा? श्रद्धाविश्वास और भक्ति न होनेसे उसकी यह विपरीत धारणा हो सकती है किभगवान् जो आत्मश्लाघी हैं? स्वार्थी हैं और दूसरोंको वशमें करना चाहते हैं। जो दूसरोंको अपनी आज्ञामें चलाना चाहता है? वह दूसरोंको क्या निहाल करेगा उसके शरण होनेसे क्या लाभ आदिआदि। इस प्रकार दुर्भाव करके वह अपना पतन कर लेगा। इसलिये ऐसे,अभक्तको कभी मत कहना।न चाशुश्रूषवे वाच्यम् -- जो इस रहस्यको सुनना नहीं चाहता? इसकी उपेक्षा करता है? उसको भी कभी मत सुनाना क्योंकि बिना रुचिके? जबर्दस्ती सुनानेसे वह इस बातका तिरस्कार करेगा? उसको सुनना अच्छा नहीं लगेगा? उसका मन इस बातको फेंकेगा। यह भी उसके द्वारा एक अपराध होगा। अपराध करनेवालेका भला नहीं होता। अतः जो सुनना नहीं चाहता? उसको मत सुनाना।न च मां योऽभ्यसूयति -- जो गुणोंमें दोषारोपण करता है? उसको भी मत सुनाना क्योंकि उसका अन्तःकरण अत्यधिक मलिन होनेके कारण वह भगवान्की बात सुनकर उलटे उनमें दोषारोपण ही करेगा।दोषदृष्टि रहनेसे मनुष्य महान् लाभसे वञ्चित हो जाता है और अपना पतन कर लेता है। अतः दोषदृष्टि करना बड़ा भारी दोष है। यह दोष श्रद्धालुओंमें भी रहता है। इसलिये साधकको सावधान होकर इस भयंकर दोषसे बचते रहना चाहिये। भगवान्ने भी (गीता 3। 31में) जहाँ अपना मत बताया? वहाँ श्रद्धावन्तः अनसूयन्तः पदोंसे यह बात कही कि श्रद्धायुक्त और दोषदृष्टिसे रहित मनुष्य कर्मोंसे छूट जाता है। ऐसे ही गीताके माहात्म्य (गीता 18। 71) में भी श्रद्धावाननसूयश्च पदोंसे यह बताया कि श्रद्धावान् और दोषदृष्टिसे रहित मनुष्य केवल गीताको सुननेमात्रसे वैकुण्ठ आदि लोकोंको चला जाता है।इस गोपनीय रहस्यको दूसरोंसे मत कहना -- यह कहनेका तात्पर्य दूसरोंको इस गोपनीय तत्त्वसे वञ्चित रखना नहीं है? प्रत्युत जिसकी भगवान् और उनके वचनोंपर श्रद्धाभक्ति नहीं है? वह भगवान्को स्वार्थी समझकर (जैसे साधारण मनुष्य अपने स्वार्थके लिये ही किसीको स्वीकार करते हैं)? भगवान्पर दोषारोपण करके महान् पतनकी तरफ न चला जाय? इसलिये उसको कहनेका निषेध किया है। सम्बन्ध -- गीताजीका यह प्रभाव है कि जो प्रचार करेगा? उससे बढ़कर मेरा प्यारा कोई नहीं होगा -- यह बात भगवान् आगेको दो श्लोकोंमें बताते हैं।
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।।18.67।।यह सर्वगुह्यतम वचन अतपस्वीको मत कहना; अभक्तको कभी मत कहना; जो सुनना नहीं चाहता, उसको मत कहना; और जो मेरेमें दोषदृष्टि करता है, उससे भी मत कहना।
।।18.68।। व्याख्या -- भक्तिं मयि परां कृत्वा -- जो मेरेमें पराभक्ति करके इस गीताको कहता है। इसका तात्पर्य है कि जो रुपये? मानबड़ाई? भेंटपूजा? आदरसत्कार आदि किसी भी वस्तुके लिये नहीं कहता? प्रत्युत भगवान्में भक्ति हो जाय? भगवद्भावोंका मनन हो जाय? इन भावोंका प्रचार हो जाय? इनकी आवृत्ति हो जाय? सुनकर लोगोंका दुःख? जलन? सन्ताप आदि दूर हो जाय? सन्ताप आदि दूर हो जाय? सबका कल्याण हो जाय -- ऐसे उद्देश्यसे कहता है। इस प्रकार भगवान्की भक्तिका उद्देश्य रखकर कहना ही परमभक्ति करते कहना है।इसी अध्यायके चौवनवें श्लोकमें कही गयी पराभक्तिमें अन्तर है। वहाँ मदभक्तिं लभते पराम् पदोंसे कहा गया है कि ब्रह्मभूत होनेके बाद सांख्ययोगी पराभक्तिको प्राप्त हो जाता है अर्थात् भगवान्से जो अनादिकालका सम्बन्ध है? उसकी स्मृति हो जाती है। परन्तु यहाँ सांसारिक मानबड़ाई आदि किसीकी भी किञ्चिन्मात्र कामना न रखकर केवल भगवद्भक्तिकी? भगवत्प्रेमकी अभिलाषा रखना पराभक्ति है? इसलिये यहाँ भक्तिं मयि परां कृत्वामेरेमें पराभक्ति करके -- ऐसा कहा गया है।य इदं परमं गुह्यम् -- इन पदोंसे पूरी गीताका परमगुह्य संवाद लेना चाहिये? जो कि गीताग्रन्थ कहलाता है। परमं गुह्यम् पदोंमें ही गुह्य? गुह्यतर? गुह्यतम और सर्वगुह्यतम -- ये सब बातें आ जाती हैं।मद्भक्तेष्वभिधास्यति -- जिसकी भगवान् और उनके वचनोंमें पूज्यबुद्धि है? आदरबुद्धि है? श्रद्धाविश्वास है और सुनना चाहता है? वह भक्त हो गया। ऐसे मेरे भक्तोंमें जो इस संवादको कहेगा? वह मेरेको प्राप्त होगा।पीछेके श्लोकमें नाभक्ताय पदमें एकवचन दिया और यहाँ भद्भक्तेषु पदमें बहुवचन दिया। इसका तात्पर्य है कि जहाँ बहुतसेश्रोता सुनते हों? वहाँ पहले बताये दोषोंवाला कोई व्यक्ति बैठा हो तो वक्ताके लिये पहले कहा निषेध लागू नहीं पड़ेगा क्योंकि वक्ता केवल उस (दोषी) व्यक्तिको गीता सुनाता ही नहीं। जैसे कोई कबूतरोंको अनाजके दाने डालता है और कबूतर दाने चुगते हैं। यदि उनमें कोई कौआ आकर दाने चुगने लग जाय तो उसको उड़ाया थोड़े ही जा सकता है क्योंकि दाना डालनेवालेका लक्ष्य कबूतरोंको दाना डालना ही रहता है? कौओंको नहीं ऐसे ही कोई गीताका प्रवचन कर रहा है और उस प्रवचनको सुननेके लिये बीचमें कोई नया व्यक्ति आ जाय अथवा कोई उठकर चल दे तो वक्ताका ध्यान उसकी तरफ नहीं रहता। वक्ताका ध्यान तो सुननेवाले लोगोंकी तरफ होता है और उन्हींको वह सुनाता है।मामेवैष्यत्यसंशयः -- अगर गीता सुनानेवालेका केवल मेरा ही उद्देश्य होगा तो वह मेरेको प्राप्त हो जायगा? इसमें कोई सन्देहकी बात नहीं है। कारण कि गीताकी यह एक विचित्र कला है कि मनुष्य अपने स्वाभाविक कर्मोंसे भी परमात्माका निष्कामभावपूर्वक पूजन करता हुआ परमात्माको प्राप्त हो जाता है (18। 46)? और जो खानापीना? शौचस्नान आदि शारीरिक कार्योंको भी भगवान्के अर्पण कर देता है? वह भी शुभअशुभ फलरूप कर्मबन्धनसे मुक्त होकर भगवान्को प्राप्त हो जाता है (9। 2728)। तो फिर जो केवल भगवान्की भक्तिका लक्ष्य करके गीताका प्रचार करता है? वह भगवान्को प्राप्त हो जाय? इसमें कहना ही क्या है
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।।18.68।।मेरेमें पराभक्ति करके जो इस परम गोपनीय संवाद-(गीता-ग्रन्थ) को मेरे भक्तोंमें कहेगा, वह मुझे ही प्राप्त होगा -- इसमें कोई सन्देह नहीं है।
न च तस्मान्मनुष्येषु कश्चिन्मे प्रियकृत्तमः।
भविता न च मे तस्मादन्यः प्रियतरो भुवि ॥
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।।18.69।। व्याख्या -- न च तस्मान्मनुष्येषु कश्चिन्मे प्रियकृत्तमः -- जो अपनेमें लौकिकपारलौकिक प्राकृत पदार्थोंकी महत्ता? लिप्सा? आवश्यकता रखता है और रखना चाहता है? वह पराभक्ति ( 18। 68) के अन्तर्गत नहीं आ सकता। पराभक्तिके अन्तर्गत नहीं आ सकता है? जिसका प्राकृत पदार्थोंको प्राप्त करनेका किञ्चिन्मात्र भी उद्देश्य नहीं है और जो भगवत्प्राप्ति? भगवद्दर्शन? भगवत्प्रेम आदि पारमार्थिक उद्देश्य रखकर गीताके अनुसार ही अपना जीवन बनाना चाहता है। ऐसा पुरुष ही भगवद्गीताके प्रचारका अधिकारी होता है। यदि उसमें कभी मानबड़ाई आदिकी इच्छा आ भी जाय तो वह टिकेगी नहीं क्योंकि मानबड़ाई आदि प्राप्त करना उसका उद्देश्य नहीं है।भगवान्के भक्तोंमें गीताका प्रचार करनेवाले उपर्युक्त अधिकारी मनुष्यके लिये ही तस्मात् पद देकर भगवान् कहते हैं कि मनुष्योंमें उसके समान मेरा प्रियकृत्तम अर्थात् अत्यन्त प्रिय कार्य करनेवाला कोई भी नहीं है क्योंकि गीताप्रचारके समान दूसरा मेरा कोई प्रिय कार्य है ही नहीं।प्रियकृत्तमः पदमें जो कृत् पद आया है? उसका तात्पर्य है कि गीताका प्रचार करनेमें उसका अपना कोई स्वार्थ नहीं है? मानबड़ाई? आदरसत्कार आदिकी कोई कामना नहीं है केवल भगवत्प्रीत्यर्थ गीताके भावोंका प्रचार करता है। इसलिये वह प्रियकृत्तम -- भगवान्का अत्यन्त प्रिय कार्य करनेवाला है।मनुष्योंमें प्रियकृत्तम कहनेका तात्पर्य है कि भगवान्का अत्यन्त प्यारा बननेके लिये मनुष्योंको ही अधिकार है। संसारमें कामनाओंकी पूर्ति कर लेना कोई महत्त्वकी? बहादुरीकी बात नहीं है। देवता? पशुपक्षी? नारकीय जीव? कीटपतङ्ग? वृक्षलता आदि सभी योनियोंमें कामनाकी पूर्ति करनेका अवसर मिलता है परन्तु कामनाका त्याग करके परमात्माकी प्राप्ति करनेका अवसर तो केवल मनुष्ययोनिमें ही मिलता है। इस मनुष्ययोनिको प्राप्त करके परमात्माकी प्राप्ति करनेमें? परमात्माका अत्यन्त प्यारा बननेमें ही मनुष्यजन्मकी सफलता है।भविता न च मे तस्मादन्यः प्रियतरो भुवि -- जिसमें अपनी मानबड़ाईकी वासना है? कुछ स्वार्थभाव भी है और जिसका अपना उद्धार करनेका तथा गीताके अनुसार जीवन बनानेका उद्देश्य वैसा (प्रियकृत्तमके समान) नहीं बना है परन्तु जिसके हृदयमें गीताका विशेष आदर है और गीताका पाठ करवाना? गीता कण्ठस्थ,करवाना? गीता मुद्रित करवाकर उसकी सस्ती बिक्री करना आदि किसी तरहसे गीताका प्रचार करता है और लोगोंको गीतामें लगाता है? उसके समान पृथ्वीमण्डलपर मेरा दूसरा कोई प्रियतर नहीं होगा।अपने धर्म? सम्प्रदाय? सिद्धान्त आदिका प्रचार करनेवाला व्यक्ति भगवान्का प्रिय तो हो सकता है? पर प्रियतर नहीं होगा। प्रियतर तो किसी तरहसे गीताका प्रचार करनेवाला ही होगा।भगवद्गीतामें अपना उद्धार करनेकी ऐसीऐसी विलक्षण? सुगम और सरल युक्तियाँ बतायी गयी हैं? जिनको मनुष्यमात्र अपने आचरणोंमें ला सकता है। तात्पर्य यह है कि जो गीताका आदर करता है? ऐसा मनुष्य हिंदू? मुसलमान? ईसाई? यहूदी? पारसी? बौद्ध आदि किसी भी धर्मको माननेवाला क्यों न हो किसी भी देश? वेश? वर्ण? आश्रम? सम्प्रदाय आदिका क्यों न हो अपनी रुचिके अनुसार किसी भी शैली? उपाय? सिद्धान्त? साधनको माननेवाला क्यों न हो? वह यदि अपना किसी तरहका आग्रह न रखकर? पक्षपातविषमताको छोड़कर? किसी भी प्राणीको दुःख पहुँचानेवाली चेष्टाका त्याग करके? मनमें किसी भी लौकिकपारलौकिक उत्पन्न और नष्ट होनेवाली वस्तुकी कामना न रखकर? अपना सम्प्रदाय? अपनी टोनी बनानेका उद्देश्य न रखकर? केवल अपने कल्याणका उद्देश्य रखकर गीताके अनुसार चलता है (अकर्तव्यका सर्वथा त्याग करके प्राप्त परिस्थितिके अनुसार अपने कर्तव्यका लोकहितार्थ? निष्कामभावपूर्वक पालन करता है)? तो वह भी जीविकासम्बन्धी और खानापीना? सोनाजागना आदि शरीरसम्बन्धी सब काम करते हुए परमात्माकी प्राप्ति कर सकता है? महान् आनन्द? महान् सुखको (गीता 6। 22) प्राप्त कर सकता है।गीता वेश? आश्रम? अवस्था? क्रिया आदिका परिवर्तन करनेके लिये नहीं कहती? प्रत्युत परिमार्जन करनेके लिये कहती है अर्थात् केवल अपने भाव और उद्देश्यको शुद्ध बनानेके लिये कहती है। गीताकी ऐसी युक्तियोंको जो भगवान्की तरफ चलनेवाले भक्तोंमें कहेगा? उससे उन भक्तोंको पारमार्थिक मार्गमें बढ़नेकी युक्तियाँ मिलेंगी? शंकाओंका समाधान होगा? साधनकी उलझनें सुलझेंगी? पारमार्थिक मार्गकी बाधाएँ दूर होंगी? जिससे वे उत्साहसे सुगमतापूर्वक बहुत ही जल्दी अपने लक्ष्यको प्राप्त कर सकेंगे। इसलिये वह भगवान्को सबसे अधिक प्यारा होगा क्योंकि भगवान् जीवके उद्धारसे बड़े राजी होते हैं? प्रसन्न होते हैं। सम्बन्ध -- जिसमें गीताका प्रचार करनेकी योग्यता नहीं है? वह क्या करे इसको भगवान् आगे के श्लोकमें बताते हैं।
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।।18.69।।उसके समान मेरा अत्यन्त प्रिय कार्य करनेवाला मनुष्योंमें कोई भी नहीं है और इस भूमण्डलपर उसके समान मेरा दूसरा कोई प्रियतर होगा भी नहीं।
अध्येष्यते च य इमं धर्म्यं संवादमावयोः।
ज्ञानयज्ञेन तेनाहमिष्टः स्यामिति मे मतिः ॥
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।।18.70।। व्याख्या -- अध्येष्यते च य इमं धर्म्यं संवादमावयोः -- तुम्हारा और हमारा यह संवाद शास्त्रों? सिद्धान्तोंके साररूप धर्मसे युक्त है। यह बहुत विचित्र बात है कि परस्पर साथ रहते हुए तुम्हारेहमारे बहुत वर्ष बीत गये परन्तु हम दोनोंका ऐसा संवाद कभी नहीं हुआ ऐसा धर्ममय संवाद तो कोई विलक्षण? अलौकिक अवसर आनेपर ही होता है।जबतक मनुष्यकी संसारसे उकताहट न हो? वैराग्य या उपरति न हो और हृदयमें जोरदार हलचल न मची हो? तबतक उसकी असली जिज्ञासा जाग्रत् नहीं होती। किसी कारणवश जब यह मनुष्य अपने कर्तव्यका निर्णय करनेके लिये व्याकुल हो जाता है? जब अपने कल्याणके लिये कोई रास्ता नहीं दीखता? बिना समाधानके और कोई सांसारिक वस्तु? व्यक्ति? घटना? परिस्थिति आदि किञ्चिन्मात्र भी अच्छी नहीं लगती? एकमात्र हृदयका सन्देह दूर करनेकी धुन (चटपटी) लग जाती है? एक ही जोरदार जिज्ञासा होती है और दूसरी तरफसे मन सर्वथा हट जाता है? तब यह मनुष्य जहाँसे प्रकाश और समाधान मिलनेकी सम्भावना होती है? वहाँ अपना हृदय खोलकर बात पूछता है? प्रार्थना करता है? शरण हो जाता है? शिष्य हो जाता है।पूछनेवालेके मनमें जैसीजैसी उत्कण्ठा बढ़ती है? कहनेवालेके मनमें वैसीवैसी बड़ी विचित्रता और विलक्षणतासे समाधान करनेवाली बातें पैदा होती हैं। जैसे दूध पीनेके समय बछड़ा जब गायके थनोंपर मुहँसे,बारबार धक्का मारता है और थनोंसे दूध खींचता है? तब गायके शरीरमें रहनेवाला दूध थनोंमें एकदम उतर आता है। ऐसे ही मनमें जोरदार दूध थनोंमें एकदम उतर आता है। ऐसे ही मनमें जोरदार जिज्ञासा होनेसे जब जिज्ञासु बारबार प्रश्न करता है? तब कहनेवालेके मनमें नयेनये उत्तर पैदा होते हैं। सुननेवालेको ज्योंज्यों नयी बातें मिलती हैं? त्योंत्यों उसमें सुननेकी नयीनयी उत्कण्ठा पैदा होती रहती है। ऐसा होनेपर ही वक्ता और श्रोता -- इन दोनोंका संवाद बढ़िया होता है।अर्जुनने ऐसी उत्कण्ठासे पहले कभी बात नहीं पूछी और भगवान्के मनमें भी ऐसी बातें कहनेकी कभी नहीं आयी। परन्तु जब अर्जुनने जिज्ञासापूर्वक स्थितप्रज्ञस्य का भाषा ৷৷. (2। 54) -- यहाँसे पूछना प्रारम्भ किया? वहींसे उन दोनोंका प्रश्नोत्तररूपसे संवाद प्रारम्भ हुआ है। इसमें वेदों तथा उपनिषदोंका सार और भगवान्के हृदयका असली भाव है? जिसको धारण करनेसे मनुष्य भयंकरसेभयंकर परिस्थितिमें भी अपने मनुष्यजन्मके ध्येयको सुगमतापूर्वक सिद्ध कर सकता है। प्रतिकूलसेप्रतिकूल परिस्थिति आनेपर भी घबराये नहीं? प्रत्युत प्रतिकूल परिस्थितिका आदर करते हुए उसका सदुपयोग करे अर्थात् अनुकूलताकी इच्छाका त्याग करे क्योंकि प्रतिकूलता पहले किये पापोंका नाश करने और आगे अनुकूलताकी इच्छाका त्याग करनेके लिये ही आती है। अनुकूलताकी इच्छा जितनी ज्यादा होगी? उतनी ही प्रतिकूल अवस्था भयंकर होगी। अनुकूलताकी इच्छाका ज्योंज्यों त्याग होता जायगा? त्योंत्यों अनुकूलताका राग और प्रतिकूलताका भय मिटता जायगा। राग और भय -- दोनोंके मिटनेसे समता आ जायगी। समता परमात्माका साक्षात् स्वरूप है। गीतामें समताकी बात विशेषतासे बतायी गयी और गीताने इसीको योग कहा है। इस प्रकार कर्मयोग? ज्ञानयोग? भक्तियोग? ध्यानयोग? प्राणायाम आदिकी विलक्षणविलक्षण बातोंका इसमें वर्णन हुआ है।अध्येष्यते का तात्पर्य है कि इस संवादको कोई ज्योंज्यों पढ़ेगा? पाठ करेगा? याद करेगा? उसके भावोंको समझनेका प्रयास करेगा? त्योंहीत्यों उसके हृदयमें उत्कण्ठा बढ़ेगी। वह ज्योंज्यों समझेगा? त्योंत्यों उसकी शङ्काका समाधान होगा। ज्योंज्यों समाधान होगा? त्योंत्यों इसमें अधिक रुचि पैदा होगी। ज्योंज्यो रुचि अधिक पैदा होगी? त्योंत्यों गहरे भाव उसकी समझमें आयेंगे और फिर वे भाव उसके आचरणोंमें? क्रियाओंमें? बर्तावमें आने लगेंगे। आदरपूर्वक आचरण करनेसे वह गीताकी मूर्ति बन जायगा? उसका जीवन गीतारूपी साँचेमें ढल जायगा अर्थात् वह चलतीफिरती भगवद्गीता हो जायगी। उसको देखकर लोगोंको गीताकी याद आने लगेगी जैसे निषादराज गुहको देखकर माताओंको और दूसरे लोगोंको लखनलालकी याद आती है (टिप्पणी प0 991)।ज्ञानयज्ञेन तेनाहमिष्टः स्याम -- यज्ञ दो प्रकारके होते हैं -- द्रव्ययज्ञ और ज्ञानयज्ञ। जो यज्ञ पदार्थों और क्रियाओंकी प्रधानतासे किया जाता है? वहद्रव्ययज्ञ कहलाता है और उत्कण्ठासे केवल अपनी आवश्यक वास्तविकताको जाननेके लिये जो प्रश्न किये जाते हैं? विज्ञ पुरुषोंद्वारा उनका समाधान किया जाता है? उनका गहरा विचार किया जाता है? विचारके अनुसार अपनी वास्तविक स्थितिका अनुभव किया जाता है तथा वास्तविक तत्त्वको जानकर ज्ञातज्ञातव्य हो जाता है? वहज्ञानयज्ञ कहलाता है। परन्तु यहाँ भगवान् अर्जुनसे कहते हैं कि तुम्हारेहमारे संवादका कोई पाठ करेगा तो मैं उसके द्वारा भी ज्ञानयज्ञसे पूजित हो जाऊँगा। इसमें कारण यह है कि जैसे प्रेमी भक्तको कोई भगवान्की बात सुनाये? उसकी याद दिलाये तो वह बड़ा प्रसन्न होता है? ऐसे ही कोई गीताका पाठ करे? अभ्यास करे तो भगवान्को अपने अनन्य भक्तकी? उसकी उत्कण्ठापूर्वक जिज्ञासाकी और उसे दिये हुए उपदेशकी याद आ जाती है और वे बड़े प्रसन्न होते हैं एवं उस पाठ? अभ्यास आदिको ज्ञानयज्ञ मानकर उससे पूजित होते हैं। कारण कि पाठ? अभ्यास आदि करनेवालेके हृदयमें उसके भावोंके अनुसार भगवान्का नित्यज्ञान विशेषतासे स्फुरित होने लगता है।इति मे मतिः -- ऐसा कहनेका तात्पर्य है कि जब कोई गीताका पाठ करता है तो मैं उसको सुनता हूँ क्योंकि मैं सब जगह रहता हूँ -- मया ततमिदं सर्वम् (गीता 9। 4) और सब जगह ही मेरे कान हैं -- सर्वतःश्रुतिमल्लोके (गीता 13। 13)। अतः उस पाठको सुनते ही मेरे हृदयमें विशेषतासे ज्ञान? प्रेम? दया,आदिका समुद्र लहराने लगता है और गीतोपदेशकी यादमें मेरी बुद्धि सराबोर हो जाती है। वह पूजन करता है -- ऐसी बात नहीं है? वह तो पाठ करता है परन्तु मैं उससे पूजित हो जाता हूँ अर्थात् उसको ज्ञानयज्ञका फल मिल जाता है।दूसरा भाव यह है कि पाठ करनेवाला यदि उतने गहरे भावोंमें नहीं उतरता? केवल पाठमात्र या यादमात्र करता है तो भी उससे मेरे हृदयमें तेरे और मेरे सारे संवादकी (उत्कण्ठापूर्वक किये गये तेरे प्रश्नोंकी और मेरे दिये हुये गहरे वास्तविक उत्तरोंकी) एक गहरी मीठीमीठी स्मृति बारबार आने लगती है। इस प्रकार गीताका अध्ययन करनेवाला मेरी बड़ी भारी सेवा करता है? ऐसा मैं मान लेता हूँ।विदेशमें किसी जगह एक जलसा हो रहा था। उसमें बहुतसे लोग इकट्ठे हुए थे। एक पादरी उस जलसेमें एक लड़केको ले आया। वह लड़का पहले नाटकमें काम किया करता था। पादरीने उस लड़केको दसपन्द्रह मिनटका एक बहुत बढ़िया व्याख्यान सिखाया। साथ ही ढंगसे उठना? बैठना? खड़े होना? इधरउधर ऐसाऐसा देखना आदि व्याख्यानकी कला भी सिखायी। व्याख्यानमें बड़े ऊँचे दर्जेकी अंग्रेजीका प्रयोग किया गया था। व्याख्यानका विषय भी बहुत गहरा था। पादरीने व्याख्यान देनेके लिये उस बालकको मेजपर खड़ा कर दिया। बच्चा खड़ा हो गया और बड़े मिजाजसे दायेंबायें देखने लगा और बोलनेकी जैसीजैसी रिवाज है? वैसेवैसे सम्बोधन देकर बोलने लगा। वह नाटकमें रहा हुआ था? उसको बोलना आता ही था अतः वह गंभीरतासे? मानो अर्थोंको समझते हुएकी मुद्रामें ऐसा विलक्षण बोला कि जितने सदस्य बैठे थे? वे सब अपनीअपनी कुर्सियोंपर उछलने लगे। सदस्य इतने प्रसन्न हुए कि व्याख्यान पूरा होते ही वे रुपयोंकी बौछार करने लगे। अब वह बालक सभाके ऊपरहीऊपर घुमाया जाने लगा। उसको सब लोग अपनेअपने कन्धोंपर लेने लगे। परन्तु उस बालकको यह पता ही नहीं था कि मैंने क्या कहा है वह तो बेचारा ज्यादा पढ़ालिखा न होनेसे अंग्रेजीके भावोंको भी पूरा नहीं समझता था? पर सभावाले सभी लोग समझते थे। इसी प्रकार कोई गीताका अध्ययन करता है? पाठ करता है तो वह भले ही उसके अर्थको? भावोंको न समझे? पर भगवान् तो उसके अर्थको? भावोंको समझते हैं। इसलिये भगवान् कहते हैं कि मैं उसके अध्ययनरूप? पाठरूप ज्ञानयज्ञसे पूजित हो जाता हूँ। सभामें जैसे बालकके व्याख्यानसे सभापति तो खुश हुआ ही? पर उसके साथसाथ सभासद् भी बड़े खुश हुए और उत्साहपूर्वक बच्चेका आदर करने लगे? ऐसे ही गीता पाठ करनेवालेसे भगवान् ज्ञानयज्ञसे पूजित होते हैं तथा स्वयं वहाँ निवास करते हैं? साथहीसाथ प्रयोग आदि तीर्थ? देवता? ऋषि? योगी? दिव्य नाग? गोपाल? गोपिकाएँ? नारद? उद्धव आदि भी वहाँ निवास करते हैं (टिप्पणी प0 992.1)। सम्बन्ध -- जो गीताका प्रचार और अध्ययन भी न कर सके? इसके लिये आगेके श्लोकमें उपाय बताते हैं।
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।।18.70।।जो मनुष्य हम दोनोंके इस धर्ममय संवादका अध्ययन करेगा, उसके द्वारा भी मैं ज्ञानयज्ञसे पूजित होऊँगा -- ऐसा मेरा मत है।
श्रद्धावाननसूयश्च शृणुयादपि यो नरः।
सोऽपि मुक्तः शुभाँल्लोकान्प्राप्नुयात्पुण्यकर्मणाम् ॥
Commentary · Hindi
।।18.71।।व्याख्या -- श्रद्धावाननसूयश्च৷৷. पुण्यकर्मणाम् -- गीताकी बातोंको जैसा सुन ले? उसको प्रत्यक्षसे भी बढ़कर पूज्यभावसहित वैसाकावैसा माननेवालेका नाम श्रद्धावान् है? और उन बातोंमें कहीं भी? किसी भी विषयमें किञ्चिन्मात्र भी कमी न देखनेवालेका नाम अनसूयः है। ऐसा श्रद्धावान् और दोषदृष्टिसे रहित मनुष्य गीताको केवल सुन भी ले? तो वह भी सम्पूर्ण पापोंसे मुक्त होकर पुण्यकारियोंके शुभ लोकोंको प्राप्त कर लेता है।यहाँ दो बार अपि पद देनेका तात्पर्य है कि जो गीताका प्रचार करता है? अध्ययन करता है? उसके लिये तो कहना ही क्या है पर जो सुन भी लेता है? वह मनुष्य भी पापोंसे छूटकर शुभ लोकोंको प्राप्त हो जाता है।मनुष्यकी वाणीमें प्रायः भ्रम? प्रमाद? लिप्सा और कारणापाटव -- ये चार दोष होते हैं (टिप्पणी प0 992.2)। अतः मनुष्यकी वाणी सर्वथा निर्दोष नहीं हो सकती। परन्तु भगवान्की दिव्य वाणीमें इन चारोंमेंसे कोई भी दोष नहीं रह सकता क्योंकि भगवान् निर्दोषताकी परावधि हैं अर्थात् भगवान्से बढ़कर निर्दोषता किसीमें,कभी होती ही नहीं। इसलिये भगवान्के वचनोंमें किसी प्रकारके संशयकी सम्भावना ही नहीं है। अतः गीता सुननेवालेको कोई विषय समझमें कम आये? विचारद्वारा कोई बात न जँचे? तो समझना चाहिये कि इस विषयको समझनेमें मेरी बुद्धिकी कमी है? मैं समझ नहीं पा रहा हूँ -- इस भावको दृढ़तासे धारण करनेपर असूयादोष मिट जाता है। भगवान्में अत्यधिक श्रद्धाविश्वासपूर्वक भक्ति होनेपर भी असूयादोष नहीं रहता।चैतन्य महाप्रभुका एक भक्त था। वह रोज गीताका पाठ करते हुए मस्त हो जाता था? गद्गद हो जाता था और रोने लगता था। वह शुद्ध पाठ नहीं करता था। उसके पाठमें अशुद्धियाँ आती थीं। उसके विषयमें किसीने चैतन्य महाप्रभुसे शिकायत कर दी किदेखिये प्रभु वह बड़ा पाखण्ड करता है पाठ तो शुद्ध करता नहीं और रोता रहता है। चैतन्य महाप्रभुने उसको अपने पास बुलाकर पूछा -- तुम गीताका पाठ करते हो? तो क्या उसका अर्थ जानते हो उसने कहा -- नहीं प्रभु फिर पूछा -- तो फिर तुम रोते क्यों हो उसने कहा -- मैं जब अर्जुन उवाच पढ़ता हूँ तो अर्जुन भगवान्से पूछ रहे हैं -- ऐसा मेरेको प्रत्यक्ष दीखता है और जब मैं श्रीभगवानुवाच पढ़ता हूँ? तो भगवान् अर्जुनके प्रश्नोंका उत्तर दे रहे हैं -- ऐसा मेरेको प्रत्यक्ष,दीखता है। इस प्रकार भगवान् श्रीकृष्ण और अर्जुनका आपसमें संवाद हो रहा है -- ऐसा प्रत्यक्ष दीखता है परन्तु अर्जुन क्या पूछते हैं और भगवान् क्या उत्तर देते हैं? यह मेरी समझमें नहीं आता। मैं तो उन दोनोंके दर्शन करकरके राजी होता हूँ। उसकी ऐसी श्रद्धाभक्ति देखकर चैतन्य महाप्रभु बहुत प्रसन्न हुए। इस प्रकारकी श्रद्धाभक्तिवाला मनुष्य गीताको केवल सुन भी ले? तो उसकी मुक्तिमें कोई सन्देह नहीं रहता। वह सम्पूर्ण पापोंसे मुक्त होकर पुण्यकारियोंके शुभ लोकोंको प्राप्त हो जाता है।यहाँ पुण्यकर्मणाम् पदसे सकामभावपूर्वक यज्ञ? अनुष्ठान आदि पुण्यकर्म करनेवालोंको नहीं लेना चाहिये क्योंकि भगवान्ने उनको ऊँचा नहीं माना है? प्रत्युत उनके बारेमें कहा है कि वे बारबार आवागमनको प्राप्त होते हैं (गीता 9। 21)। यहाँ उन पुण्यकर्मा भक्तोंको लेना चाहिये? जिनको भगवान्का प्रेमदर्शन आदिकी प्राप्ति होती है। ऐसे पुण्यकर्मा भक्तोंको अपनेअपने इष्टके अनुसार वैकुण्ठ? साकेत? गोलोक? कैलास आदि जिन दिव्य लोकोंकी प्राप्ति होती है? असूयादोषरहित श्रद्धावान् पुरुषको गीता सुननेमात्रसे उन लोकोंकी प्राप्ति हो जाती है। सम्बन्ध -- पूर्वश्लोकमें गीता सुननेका माहात्म्य बताकर अब अर्जुनकी क्या स्थिति है? क्या दशा है? आदि सब कुछ जानते हुए भी भगवान् भगवद्गीताश्रवणके माहात्म्यको सबके सामने प्रकट करनेके उद्देश्यसे आगेके श्लोकमें अर्जुनसे प्रश्न करते हैं।
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।।18.71।।श्रद्धावान् और दोषदृष्टिसे रहित जो मनुष्य इस गीता-ग्रन्थको सुन भी लेगा, वह भी सम्पूर्ण पापोंसे मुक्त होकर पुण्यकारियोंके शुभ लोकोंको प्राप्त हो जायगा।
।।18.72।। व्याख्या -- कच्चिदेतच्छ्रुतं पार्थ त्वयैकाग्रेण चेतसा -- एतत् शब्द अत्यन्त समीपका वाचक होता है और यहाँ अत्यन्त समीप इकहत्तरवाँ श्लोक है। उनहत्तरवेंसत्तरवें श्लोकोंमें जो गीताका प्रचार और अध्ययन करनेवालेकी महिमा कही है? उस प्रचार और अध्ययनका तो अर्जुनके सामने कोई प्रश्न ही नहीं था। इसलिये पीछेके (इकहत्तरवें) श्लोकका लक्ष्य करके भगवान् अर्जुनसे कहते हैं किमनुष्य श्रद्धापूर्वक और दोषदृष्टिरहित होकर गीता सुने -- यह बात तुमने ध्यानपूर्वक सुनी कि नहीं अर्थात् तुमने श्रद्धापूर्वक और दोषदृष्टिरहित होकर गीता सुनी कि नहींएकाग्रेण चेतसा कहनेका तात्पर्य है कि गीतामें भी जिस अत्यन्त गोपनीय रहस्यको अभी पहले चौंसठवें श्लोकमें कहनेकी प्रतिज्ञा की? सड़सठवें श्लोकमें इदं ते नातपस्काय कहकर निषेध किया और मेरे वचनोंमें जिसको मैंने परम वचन कहा? उस सर्वगुह्यतम शरणागतिकी बात (18। 66) को तुमने ध्यानपूर्वक सुना कि नहीं उसपर खयाल किया कि नहींकच्चिदज्ञानसंमोहः प्रनष्टस्ते धनञ्जय -- भगवान् दूसरा प्रश्न करते हैं कि तुम्हारा अज्ञानसे उत्पन्न हुआ मोह नष्ट हुआ कि नहीं अगर मोह नष्ट हो गया तो तुमने मेरा उपदेश सुन लिया और अगर मोह नष्ट नहीं हुआ,तो तुमने मेरा यह रहस्यमय उपदेश एकाग्रतासे सुना ही नहीं क्योंकि यह एकदम पक्का नियम है कि जो दोषदृष्टिसे रहित होकर श्रद्धापूर्वक गीताके उपदेशको सुनता है? उसका मोह नष्ट हो ही जाता है।पार्थ सम्बोधन देकर भगवान् अपनेपनसे? बहुत प्यारसे पूछ रहे हैं कि तुम्हारा मोह नष्ट हुआ कि नहीं पहले अध्यायके पचीसवें श्लोकमें भी भगवान्ने अर्जुनको सुननेके उन्मुख करनेके लिये पार्थ सम्बोधन देकर सबसे प्रथम बोलना आरम्भ किया और कहा कि हे पार्थ युद्धके लिये इक्ट्ठे हुए इन कुटुम्बियोंको देखो। ऐसा कहनेका तात्पर्य यह था कि अर्जुनके अन्तःकरणमें छिपा हुआ जो कौटुम्बिक मोह है? वह जाग्रत् हो जाय और उस मोहसे छूटनेके लिये उनको चटपटी लग जाय? जिससे वे केवल मेरे सम्मुख होकर सुननेके लिये तत्पर हो जायँ। अब यहाँ उसी मोहके दूर होनेकी बातका उपसंहार करते हुए भगवान् पार्थ सम्बोधन देते हैं।धनञ्जय सम्बोधन देकर भगवान् कहते हैं कि तुम लौकिक धनको लेकर धनञ्जय (राजाओंके धनको जीतनेवाले) बने हो। अब इस वास्तविक तत्त्वरूप धनको प्राप्त करके अपने मोहका नाश कर लो और सच्चे अर्थोंमेंधनञ्जय बन जाओ। सम्बन्ध -- पूर्वश्लोकमें भगवान्ने जो प्रश्न किया था? उसका उत्तर अर्जुन आगेके श्लोकमें देते हैं।
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।।18.72।।हे पृथानन्दन ! क्या तुमने एकाग्र-चित्तसे इसको सुना ?और हे धनञ्जय ! क्या तुम्हारा अज्ञानसे उत्पन्न मोह नष्ट हुआ ?
।।18.73।। व्याख्या -- नष्टो मोहः स्मृतिर्लब्धा त्वत्प्रसादान्मयाच्युत -- अर्जुनने यहाँ भगवान्के लिये अच्युत सम्बोधनका प्रयोग किया है। इसका तात्पर्य है कि जीव तो च्युत हो जाता है अर्थात् अपने स्वरूपसे विमुख हो जाता है तथा पतनकी तरफ चला जाता है परन्तु भगवान् कभी भी च्युत नहीं होते। वे सदा एकरस रहते हैं। इसी बातका द्योतन करनेके लिये गीतामें अर्जुनने कुल तीन बार अच्युत सम्बोधन दिया है। पहली बार (गीता 1। 21 में) अच्युत सम्बोधनसे अर्जुनने भगवान्से कहा कि दोनों सेनाओंके बीचमें मेरा रथ खड़ा करो। ऐसी आज्ञा देनेपर भी भगवान्में कोई फरक नहीं पड़ा। दूसरी बार (11। 42 में) इस सम्बोधनसे अर्जुन्ने भगवान्के विश्वरूपकी स्तुतिप्रार्थना की? तो भगवान्में कोई फरक नहीं पड़ा। अन्तिम बार यहाँ (18। 73 में) इस सम्बोधनसे अर्जुन संदेहरहित होकर कहते हैं कि अब मैं आपकी आज्ञाका पालन करूँगा? तो भगवान्में कोई फरक नहीं पड़ा। तात्पर्य यह हुआ कि अर्जुनकी तो आदि? मध्य और अन्तमें तीन प्रकारकी अवस्थाएँ हुईँ? पर भगवान्की आदि? मध्य और अन्तमें एक ही अवस्था रही अर्थात् वे एकरस ही बने रहे।दूसरे अध्यायमें अर्जुनने शिष्यस्तेऽहं शाधि मां त्वां प्रपन्नम् (2। 7) कहकर भगवान्की शरणागति स्वीकार की थी। इस श्लोकमें उस शरणागतिकी पूर्णता होती है।दसवें अध्यायके अन्तमें भगवान्ने अर्जुनसे यह कहा कितेरेको बहुत जाननेकी क्या जरूरत है? मैं सम्पूर्ण संसारको एक अंशमें व्याप्त करके स्थित हूँ इस बातको सुनते ही अर्जुनके मनमें एक विशेष भाव पैदा हुआ कि भगवान् कितने विलक्षण हैं भगवान्की विलक्षणताकी ओर लक्ष्य जानेसे अर्जुनको एक प्रकाश मिला। उस प्रकाशकी प्रसन्नतामें अर्जुनके मुखसे यह बात निकल पड़ी किमेरा मोह चला गया -- मोहोऽयं विगतो मम (11। 1)। परन्तु भगवान्के विराट्रूपको देखकर जब अर्जुनके हृदयमें भयके कारण हलचल पैदा हो गयी? तब भगवान्ने कहा कि यह तुम्हारा मूढ़भाव है? तुम व्यथित और मोहित मत होओ -- मा ते व्यथा मा च विमूढभावः (11। 49)। इससे सिद्ध होता है कि अर्जुनका मोह तब नष्ट नहीं हुआ था। अब यहाँ सर्वज्ञ भगवान्के पूछनेपर अर्जुन कह रहे हैं कि मेरा मोह नष्ट हो गया है और मुझे तत्त्वकी अनादि स्मृति प्राप्त हो गयी -- नष्टो मोहः स्मृतिर्लब्धा (टिप्पणी प0 995.1)।अन्तःकरणकी स्मृति और तत्त्वकी स्मृतिमें बड़ा अन्तर है। प्रमाणसे प्रमेयका ज्ञान होता है (टिप्पणी प0 995.2) परन्तु परमात्मतत्त्व अप्रमेय है। अतः परमात्मा प्रमाणसे व्याप्य नहीं हो सकता अर्थात् परमात्मा प्रमाणके अन्तर्गत आनेवाला तत्त्व नहीं है। परन्तु संसार सबकासब प्रमाणके अन्तर्गत आनेवाला है और प्रमाण प्रमाताके अन्तर्गत आनेवाला है (टिप्पणी प0 995.3)।प्रमाता एक होता है और प्रमाण अनेक होते हैं। प्रमाणोंके बारेमें कई प्रत्यक्ष? अनुमान? आगम -- ये तीन मुख्य प्रमाण मानते हैं कई प्रत्यक्ष? अनुमान? उपमान और शब्द -- ये चार प्रमाण मानते हैं और कई इन चारोंके सिवाय अर्थापत्ति? अनुपलब्धि और ऐतिह्य -- ये तीन प्रमाण और भी मानते हैं। इस प्रकार प्रमाणोंके माननेमें अनेक मतभेद हैं परन्तु प्रमाताके विषयमें किसीका कोई मतभेद नहीं है। ये प्रत्यक्ष? अनुमान आदि प्रमाण वृत्तिरूप होते हैं परन्तु प्रमाता वृत्तिरूप नहीं होता? वह तो स्वयं अनुभवरूप होता है।अब इसस्मृति शब्दकी जहाँ व्याख्या की गयी है? वहाँ उसके ये लक्षण बताये हैं -- (1) अनुभूतविषयासम्प्रमोषः स्मृतिः। (योगदर्शन 1। 11), अनुभूत विषयका न छिपाना अर्थात् प्रकट हो जाना स्मृति है। (2) संस्कारमात्रजन्यं ज्ञानं स्मृतिः। (तर्कसंग्रह)संस्कारमात्रसे जन्य हो और ज्ञान हो? उसको स्मृति कहते हैं।यह स्मृति अन्तःकरणकी एकवृति है। यह वृत्ति प्रमाण? विपर्यय? विकल्प? निद्रा और स्मृति -- पाँच प्रकारकी होती है तथा हर प्रकारकी वृत्तिके दो भेद होते हैं -- क्लिष्ट और अक्लिष्ट। संसारकी वृत्तिरूप स्मृतिक्लिष्ट होती है अर्थात् बाँधनेवाली होती है? और भगवत्सम्बन्धी वृत्तिरूप स्मृतिअक्लिष्ट होती है अर्थात् क्लेशको दूर करनेवाली होती है। इन सब वृत्तियोंका कारणअविद्या है। परन्तु परमात्मा अविद्यासे रहित है। इसलिये परमात्माकी स्मृतिस्वयंसे ही होती है? वृत्ति या करणसे नहीं। जब परमात्माकी स्मृति जाग्रत् होती है तो फिर उसकी कभी विस्मृति नहीं होती? जबकि अन्तःकरणकी वृत्तिमें स्मृति और विस्मृति -- दोनों होती हैं।परमात्मतत्त्वकी विस्मृति या भूल तो असत् संसारको सत्ता और महत्ता देनेसे ही हुई है। यह विस्मृति अनादिकालसे है। अनादिकालसे होनेपर भी इसका अन्त हो जाता है। जब इसका अन्त हो जाता है और अपने स्वरूपकी स्मृति जाग्रत् होती है? तब इसको स्मृतिर्लब्धा कहते हैं अर्थात् असत्के सम्बन्धके कारण जो स्मृति सुषुप्तिरूपसे थी? वह जाग्रत् हो गयी। जैसे एक आदमी सोया हुआ है और एक मुर्दा पड़ा हुआ है -- इन दोनोंमें महान् अन्तर है? ऐसे ही अन्तःकरणकी स्मृतिविस्मृति दोनों ही मुर्देकी तरह जड हैं? पर स्वरूपकी स्मृति सुप्त है? जड नहीं। केवल जडका आदर करनेसे सोये हुएकी तरह ऊपरसे वह स्मृति लुप्त रहती है अर्थात् आवृत रहती है। उस आवरणके न रहनेपर उस स्मृतिका प्राकट्य हो जाता है तो उसे स्मृतिर्लब्धा कहते हैं अर्थात् पहलेसे जो तत्त्व मौजूद है? उसका प्रकट होना स्मृति है? और आवरण हटनेका नाम लब्धा है।साधकोंकी रुचिके अनुसार उसी स्मृतिके तीन भेद हो जाते हैं -- (1) कर्मयोग अर्थात् निष्कामभावकी स्मृति? (2) ज्ञानयोग अर्थात् अपने स्वरूपकी स्मृति और (3) भक्तियोग अर्थात् भगवान्के सम्बन्धकी स्मृति। इस प्रकार इन तीनों योगोंकी स्मृति जाग्रत् हो जाती है क्योंकि ये तीनों योग स्वतःसिद्ध और नित्य हैं। ये तीनों योग जब वृत्तिके विषय होते हैं? तब ये साधन कहलाते हैं परन्तु स्वरूपसे ये तीनों नित्य हैं। इसलिये नित्यकी प्राप्तिको स्मृति कहते हैं। तात्पर्य यह हुआ कि इन साधनोंकी विस्मृति हुई है? अभाव नहीं हुआ है।असत् संसारके पदार्थोंको आदर देनेसे अर्थात् उनको सत्ता और महत्ता देनेसे राग पैदा हुआ -- यहकर्मयोग की विस्मृति (आवरण) है। असत् पदार्थोंके सम्बन्धसे अपने स्वरूपकी विमुखता हुई अर्थात् अज्ञान हुआ -- यहज्ञानयोग की विस्मृति है। अपना स्वरूप साक्षात् परमात्माका अंश है। इस परमात्मासे विमुख होकर,संसारके सम्मुख होनेसे संसारमें आसक्ति हो गयी। उस आसक्तिसे प्रेम ढक गया -- यहभक्तियोग की विस्मृति है।स्वरूपकी विस्मृति अर्थात् विमुखताका नाश होना यहाँस्मृति है। उस स्मृतिका प्राप्त होना अप्राप्तका प्राप्त होना नहीं है? प्रत्युत नित्यप्राप्तका प्राप्त होना है। नित्य स्वरूपकी प्राप्ति होनेपर फिर उसकी विस्मृति होना सम्भव नहीं है क्योंकि स्वरूपमें कभी परिवर्तन हुआ नहीं। वह सदा निर्विकार और एकरस रहता है। परन्तु वृत्तिरूप स्मृतिकी विस्मृति हो सकती है क्योंकि वह प्रकृतिका कार्य होनेसे परिवर्तनशील है।इन सबका तात्पर्य यह हुआ कि संसार तथा शरीरके साथ अपने स्वरूपको मिला हुआ समझनाविस्मृति है और संसार तथा शरीरसे अलग होकर अपने स्वरूपका अनुभव करनास्मृति है। अपने स्वरूपकी स्मृति स्वयंसे होती है। इसमें करण आदिकी अपेक्षा नहीं होती जैसे -- मनुष्यको अपने होनेपनका जो ज्ञान,होता है? उसमें किसी प्रमाणकी आवश्यकता नहीं होती। जिसमें करण आदिकी अपेक्षा होती है? वह स्मृति अन्तःकरणकी एक वृत्ति ही है।स्मृति तत्काल प्राप्त होती है। इसकी प्राप्तिमें देरी अथवा परिश्रम नहीं है। कर्ण कुन्तीके पुत्र थे। परन्तु जन्मके बाद जब कुन्तीने उनका त्याग कर दिया? तब अधिरथ नामक सूतकी पत्नी राधाने उनका पालनपोषण किया। इससे वे राधाको ही अपनी माँ मानने लगे। जब सूर्यदेवसे उनको यह पता लगा कि वास्तवमें मेरी माँ कुन्ती है? तब उनको स्मृति प्राप्त हो गयी। अबमैं कुन्तीका पुत्र हूँ -- ऐसी स्मृति प्राप्त होनेमें कितना समय लगा कितना परिश्रम या अभ्यास करना पड़ा कितना जोर आया पहले उधर लक्ष्य नहीं था? अब उधर लक्ष्य हो गया -- केवल इतनी ही बात है।स्वरूप निष्काम है? शुद्धबुद्धमुक्त है और भगवान्का है। स्वरूपकी विस्मृति अर्थात् विमुखतासे ही जीव सकाम? बद्ध और सांसारिक होता है। ऐसे स्वरूपकी स्मृति वृत्तिकी अपेक्षा नहीं रखती अर्थात् अन्तःकरणकी वृत्तिसे स्वरूपकी स्मृति जाग्रत् होना सम्भव नहीं है। स्मृति तभी जाग्रत् होगी? जब अन्तःकरणसे सर्वथा सम्बन्धविच्छेद होगा। स्मृति अपने ही द्वारा अपनेआपमें जाग्रत् होती है। अतः स्मृतिकी प्राप्तिके लिये किसीके सहयोगकी या अभ्यासकी जरूरत नहीं है। कारण कि जडताकी सहायताके बिना अभ्यास नहीं होता? जबकि स्वरूपके साथ जडताका लेशमात्र भी सम्बन्ध नहीं है। स्मृति अनुभवसिद्ध है? अभ्याससाध्य नहीं है। इसलिये एक बार स्मृति जाग्रत् होनेपर फिर उसकी पुनरावृत्ति नहीं करनी पड़ती।स्मृति भगवान्की कृपासे जाग्रत् होती है। कृपा होती है भगवान्के सम्मुख होनेपर और भगवान्की सम्मुखता होती है संसारमात्रसे विमुख होनेपर। जैसे अर्जुनने कहा कि मैं केवल आपकी आज्ञाका ही पालन करूँगा -- करिष्ये वचनं तव? ऐसे ही संसारका आश्रय छोड़कर केवल भगवान्के शरण होकर कह दे किहे नाथ अब मैं केवल आपकी आज्ञाका ही पालन करूँगा।तात्पर्य है कि इस स्मृतिकी लब्धिमें साधककी सम्मुखता और भगवान्की कृपा ही कारण है। इसलिये अर्जुनने स्मृतिके प्राप्त होनेमें केवल भगवान्की कृपाको ही माना है। भगवान्की कृपा तो मात्र प्राणियोंपर अपारअटूटअखण्डरूपसे है। जब मनुष्य भगवान्के सम्मुख हो जाता है? तब उसको उस कृपाका अनुभव हो जाता है।त्वत्प्रसादात् मयाच्युत पदोंसे अर्जुन कह रहे हैं कि आपने विशेषतासे जो सर्वगुह्यतम तत्त्व बताया? उसकी मुझे विशेषतासे स्मृति आ गयी कि मैं आपका ही था? आपका ही हूँ और आपका ही रहूँगा। यह जो स्मृति आ गयी है? यह मेरी एकाग्रतासे सुननेकी प्रवृत्तिसे नहीं आयी है अर्थात् यह मेरे एकाग्रतासे सुननेका फल नहीं है? प्रत्युत यह स्मृति तो आपकी कृपासे ही आयी है। पहले मैंने शरण होकर शिक्षा देनेकी प्रार्थना की थी और फिर यह कहा था कि मैं युद्ध नहीं करूँगा परन्तु मेरेको जबतक वास्तविकताका बोध नहीं हुआ? तबतक आप मेरे पीछे पड़े ही रहे। इसमें तो आपकी कृपा ही कारण है। मेरेको जैसा सम्मुख होना चाहिये? वैसा मैं सम्मुख नहीं हुआ हूँ परन्तु आपने बिना कारण मेरेपर कृपा की अर्थात् मेरेपर कृपा करनेके लिये आप अपनी कृपाके परवश हो गये? वशीभूत हो गये और बिना पूछे ही आपने शरणागतिकी सर्वगुह्यतम बात कह दी (18। 64 -- 66)। उसी अहैतुकी कृपासे मेरा मोह नष्ट हुआ है।स्थितोऽस्मि गतसन्देहः करिष्ये वचनं तव -- अर्जुन कहते हैं कि मूलमें मेरा जो यह सन्देह था कि युद्ध करूँ या न करूँ (न चैतद्विद्मः कतरन्नो गरीयः 2। 6)? वह मेरा सन्देह सर्वथा नष्ट हो गया है और मैं अपनी वास्तविकतामें स्थित हो गया हूँ। वह संदेह ऐसा नष्ट हो गया है कि न तो युद्ध करनेकी मनमें रही और न युद्ध न करनेकी ही मनमें रही। अब तो यही एक मनमें रही है कि आप जैसा कहें? वैसा मैं करूँ अर्थात् अब,तो बस? आपकी आज्ञाका ही पालन करूँगा -- करिष्ये वचनं तव। अब मेरेको युद्ध करने अथवा न करनेसे किसी तरहका किञ्चिन्मात्र भी प्रयोजन नहीं है। अब तो आपकी आज्ञाके अनुसार लोकसंग्रहार्थ युद्ध आदि जो कर्तव्यकर्म होगा? वह करूँगा।अब एक ध्यान देनेकी बात है कि पहले कुटुम्बका स्मरण होनेसे अर्जुनको मोह हुआ था। उस मोहके वर्णनमें भगवान्ने यह प्रक्रिया बतायी थी कि विषयोंके चिन्तनसे आसक्ति? आसक्तिसे कामना? कामनासे क्रोध? क्रोधसे मोह? मोहसे स्मृतिभ्रंश? स्मृतिभ्रंशसे बुद्धिनाश और बुद्धिनाशसे पतन होता है (गीता 2। 6263)। अर्जुन भी यहाँ उसी प्रक्रियाको याद दिलाते हुए कहते हैं कि मेरा मोह नष्ट हो गया है और मोहसे जो स्मृति भ्रष्ट होती है? वह स्मृति मिल गयी है -- नष्टो मोहः स्मृतिर्लब्धा। स्मृति नष्ट होनेसे बुद्धिनाश हो जाता है? इसके उत्तरमें अर्जुन कहते हैं कि मेरा सन्देह चला गया है -- गतसन्देहः। बुद्धिनाशसे पतन होता है? उसके उत्तरमें कहते हैं कि मैं अपनी स्वाभाविक स्थितिमें स्थित हूँ -- स्थितोऽस्मि। इस प्रकार उस प्रक्रियाको बतानेमें अर्जुनका तात्पर्य है कि मैंने आपके मुखसे ध्यानपूर्वक गीता सुनी है? तभी तो आपने सम्मोहका कहाँ प्रयोग किया है और सम्मोहकी परम्परा कहाँ कही है? वह भी मेरेको याद है। परन्तु मेरे मोहका नाश होनेमें तो आपकी कृपा ही कारण है।यद्यपि वहाँका और यहाँका -- दोनोंका विषय भिन्नभिन्न प्रतीत होता है क्योंकि वहाँ विषयोंके चिन्तन करने आदि क्रमसे सम्मोह होनेकी बात है और यहाँ सम्मोह मूल अज्ञानका वाचक है? फिर भी गहरा विचार किया जाय तो भिन्नता नहीं दीखेगी। वहाँका विषय ही यहाँ आया है।दूसरे अध्यायके इकसठवेंसे तिरसठवें श्लोकतक भगवान्ने यह बात बतायी कि इन्द्रियोंको वशमें करके अर्थात् संसारसे सर्वथा विमुख होकर केवल मेरे परायण होनेसे बुद्धि स्थिर हो जाती है। परन्तु मेरे परायण न होनेसे मनमें स्वाभाविक ही विषयोंका चिन्तन होता है। विषयोंका चिन्तन होनेसे पतन ही होता है क्योंकि यह आसुरीसम्पत्ति है। परन्तु यहाँ उत्थानकी बात बतायी है कि संसारसे विमुख होकर भगवान्के सम्मुख होनेसे मोह नष्ट हो जाता है क्योंकि यह दैवीसम्पत्ति है। तात्पर्य यह हुआ कि वहाँ भगवान्से विमुख होकर इन्द्रियों और विषयोंके परायण होना पतनमें हेतु है और यहाँ भगवान्के सम्मुख होनेपर भगवान्के साथ वास्तविक सम्बन्धकी स्मृति आनेमें भगवत्कृपा ही हेतु है।भगवत्कृपासे जो काम होता है? वह श्रवण? मनन? निदिध्यासन? ध्यान? समाधि आदि साधनोंसे नहीं होता। कारण कि अपना पुरुषार्थ मानकर जो भी साधनोंसे नहीं होता। कारण कि अपना पुरुषार्थ मानकर जो भी साधन किया जाता है? उस साधनमें अपना सूक्ष्म व्यक्तित्व अर्थात् अहंभाव रहता है। वह व्यक्तित्व साधनमें अपना पुरुषार्थ न मानकर केवल भगवत्कृपा माननेसे ही मिटता है।मार्मिक बातअर्जुनने कहा कि मुझे स्मृति मिल गयी -- स्मृतिर्लब्धा। तो विस्मृति किसी कारणसे हुई जीवने असत्के साथ तादात्म्य मानकर असत्की मुख्यता मान ली? इसीसे अपने सत्स्वरूपकी विस्मृति हो गयी। विस्मृति होनेसे इसने असत्की कमीको अपनी कमी मान ली? अपनेको शरीर मानने (मैंपन) तथा शरीरको अपना मानने (मेरापन) के कारण इसने असत् शरीरकी उत्पत्ति और विनाशको अपनी उत्पत्ति और विनाश मान लिया एवं जिससे शरीर पैदा हुआ? उसीको अपनी उत्पादक मान लियाअब कोई प्रश्न करे कि भूल पहले हुई कि असत्का सम्बन्ध पहले हुआ अर्थात् भूलसे असत्का सम्बन्ध हुआ कि असत्के सम्बन्धसे भूल हुई तो इसका उत्तर है कि अनादिकालसे जन्ममरणके चक्करमें पड़े हुए जीवको जन्ममरणसे छुड़ाकर सदाके लिये महान् सुखी करनेके लिये अर्थात् केवल अपनी प्राप्ति करानेके लिये भगवान्ने जीवको मनुष्यशरीर दिया। भगवान्का अकेलेमें मन नहीं लगा -- एकाकी न रमते (बृहदारण्यक 1। 4। 3)? इसलिये उन्होंने अपने साथ खेलनेके लिये मनुष्यशरीरकी रचना की। खेल तभी होता है? जब दोनों तरफके खिलाड़ी स्वतन्त्र होते हैं। अतः भगवान्ने मनुष्यशरीर देनेके साथसाथ इसे स्वतन्त्रता भी दी और विवेक (सत्असत्का ज्ञान) भी दिया। दूसरी बात? अगर इसे स्वतन्त्रता और विवेक न मिलाता? तो यह पशुकी तरह ही होता? इसमें मनुष्यताकी किञ्चिन्मात्र भी कोई विशेषता नहीं होती। इस विवेकके कारण असत्को असत् जानकर भी मनुष्यने मिली हुई स्वतन्त्रताका दुरुपयोग किया और असत्में (संसारके भोग और संग्रहके सुखमें) आसक्त हो गया। असत्में आसक्त होनेसे ही भूल हुई है।असत्को असत् जानकर भी यह उसमें आसक्त क्यों होता है कारण कि असत्के सम्बन्धसे प्रतीत होनेवाले तात्कालिक सुखकी तरफ तो यह दृष्टि रखता है? पर उसका परिणाम क्या होगा? उस तरफ अपनी दृष्टि रखता ही नहीं। (जो परिणामकी तरफ दृष्टि रखते हैं? वे संसारी होते हैं।) इसलिये असत्के सम्बन्धसे ही भूल पैदा हुई है। इसका पता कैसे लगता है जब यह अपने अनुभवमें आनेवाले असत्की आसक्तिका त्याग करके परमात्माके सम्मुख हो जाता है? इससे सिद्ध हुआ कि परमात्मासे विमुख होकर जाने हुए असत्में आसक्ति होनेसे ही यह भूल हुई है।असत्को महत्त्व देनेसे होनेवाली भूल स्वाभाविक नहीं है। इसको मनुष्यने खुद पैद किया है। जो चीज स्वाभाविक होती है? उसमें परिवर्तन भले ही हो? पर उसका अत्यन्त अभाव नहीं होता। परन्तु भूलका अत्यन्त अभाव होता है। इससे यह सिद्ध होता है कि इस भूलको मनुष्यने खुद उत्पन्न किया है क्योंकि जो वस्तु मिटनेवाली होती है? वह उत्पन्न होनेवाली ही होती है। इसलिये इस भूलको मिटानेका दायित्व भी मनुष्यपर ही है? जिसको वह सुगमतापूर्वक मिटा सकता है। तात्पर्य है कि अपने ही द्वारा उत्पन्न की हुई इस भूलको मिटानेमें मनुष्यमात्र समर्थ और सबल है। भूलको मिटानेकी सामर्थ्य भगवान्ने पूरी दे रखी है। भूल मिटते ही अपने वास्तविक स्वरूपकी स्मृति अपनेआपमें ही जाग्रत् हो जाती है और मनुष्य सदाके लिये कृतकृत्य? ज्ञातज्ञातव्य और प्राप्तप्राप्तव्य हो जाता है।अबतक मनुष्यने अनेक बार जन्म लिया है और अनेक बार कई वस्तुओं? व्यक्तियों? परिस्थितियों? अवस्थाओं? घटनाओं आदिका मनुष्यको संयोग हुआ है परन्तु उन सभीका उससे वियोग हो गया और वह स्वयं वही रहा। कारण कि वियोगका संयोग अवश्यम्भावी नहीं है? पर संयोगका वियोग अवश्यम्भावी है। इससे सिद्ध हुआ कि संसारसे वियोगहीवियोग है? संयोग है ही नहीं। अनादिकालसे वस्तुओं आदिका निरन्तर वियोग ही होता चला आ रहा है? इसलिये वियोग ही सच्चा है। इस प्रकार संसारसे सर्वथा वियोगका अनुभव हो जाना हीयोग है -- तं विद्याद् दुःखसंयोगवियोगं योगसंज्ञितम् (गीता 6। 23)। यह योग नित्यसिद्ध है। स्वरूप अथवा परमात्माके साथ हमारा नित्ययोग है (टिप्पणी प0 998) और शरीरसंसारके साथ नित्यवियोग है। संसारके संयोगकी सद्भावना होनेसे ही वास्तवमें नित्ययोग अनुभवमें नहीं आता। सद्भावना मिटते ही नित्ययोगका अनुभव हो जाता है? जिसका कभी वियोग हुआ ही नहीं।संसारसे संयोग मानना हीविस्मृति है और संसारसे नित्यवियोगका अनुभव होना अर्थात् वास्तवमें संसारके साथ मेरा संयोग था नहीं? होगा नहीं और हो सकता भी नहीं -- ऐसा अनुभव होना हीस्मृति है। सम्बन्ध -- पहले अध्यायके बीसवें श्लोकमें अर्थ पदसे श्रीकृष्णार्जुनसंवादके रूपमें गीताका आरम्भ हुआ था? अब आगेके श्लोकमें इति पदसे उसकी समाप्ति करते हुए सञ्जय इस संवादकी महिमा गाते हैं।
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।।18.73।।अर्जुन बोले -- हे अच्युत ! आपकी कृपासे मेरा मोह नष्ट हो गया है और स्मृति प्राप्त हो गयी है। मैं सन्देहरहित होकर स्थित हूँ। अब मैं आपकी आज्ञाका पालन करूँगा।
सञ्जय उवाच।
इत्यहं वासुदेवस्य पार्थस्य च महात्मनः।
संवादमिममश्रौषमद्भुतं रोमहर्षणम् ॥
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।।18.74।। व्याख्या -- इत्यहं वासुदेवस्य पार्थस्य च महात्मनः -- सञ्जय कहते हैं कि इस तरह मैंने भगवान् वासुदेव और महात्मा पृथानन्दन अर्जुनका यह संवाद सुना? जो कि अत्यन्त अद्भुत? विलक्षण है और इसकी यादमात्र हर्षके मारे रोमाञ्चित करनेवाली है।यहाँ इति पदका तात्पर्य है कि पहले अध्यायके बीसवें श्लोकमें अथ व्यवस्थितान्दृष्ट्वा धार्तराष्ट्रान् कपिध्वजः पदोंसे सञ्जय श्रीकृष्ण और अर्जुनके संवादरूप गीताका आरम्भ करते हैं और यहाँ इति पदसे उस संवादकी समाप्ति करते हैं।अर्जुनके लिये महात्मनः विशेषण देनेका तात्पर्य है कि अर्जुन कितने महान् विलक्षण पुरुष हैं? जिनकी आज्ञाका पालन स्वयं भगवान् करते हैं अर्जुन कहते हैं कि हे अच्युत मेरे रथको दोनों सेनाओंके बीचमें खड़ा कर दो (गीता 1। 21)? तो भगवान् दोनों सेनाओंके बीचमें रथको खड़ा कर देते हैं (गीता 1। 24)। गीतामें अर्जुन जहाँजहाँ प्रश्न करते हैं? वहाँवहाँ भगवान् बड़े प्यारसे और बड़ी विलक्षण रीतिसे प्रायः विस्तारपूर्वक उत्तर देते हैं। इस प्रकार महात्मा अर्जुनके और भगवान् वासुदेवके संवादको मैंने सुना है।संवादमिममश्रौषमद्भुतं रोमहर्षणम् -- इस संवादमें अद्भुत और रोमहर्षणपना क्या है शास्त्रोंमें प्रायः ऐसी बात आती है कि संसारकी निवृत्ति करनेसे ही मनुष्य पारमार्थिक मार्गपर चल सकता है और उसका कल्याण हो सकता है। मनुष्योंमें भी प्रायः ऐसी ही धारण बैठी हुई है कि घर? कुटुम्ब आदिको छोड़कर साधुसंन्यासी होनेसे ही कल्याण होता है। परन्तु गीता कहती है कि कोई भी परिस्थिति? अवस्था? घटना? काल आदि क्यों न हो? उसीके सदुपयोगसे मनुष्यका कल्याण हो सकता है। इतना ही नहीं? वह परिस्थिति बढ़ियासेबढ़िया हो या घटियासेघटिया? सौम्यसेसौम्य हो या घोरसेघोर विहित युद्धजैसी प्रवृत्ति हो? जिसमें दिनभर मनुष्योंका गला काटना पड़ता है? उसमें भी मनुष्यका कल्याण हो सकता है? मुक्ति हो सकती है (टिप्पणी प0 999)। कारण कि जन्ममरणरूप बन्धनमें संसारका राग ही कारण है (गीता 13। 21)। उस रागको मिटानेमें परिस्थितिका सदुपयोग करना ही हेतु है अर्थात् जो पुरुष परिस्थितिमें रागद्वेष न करके अपने कर्तव्यका पालन करता है? वह सुखपूर्वक मुक्त हो जाता है (गीता 5। 3)। यही इस संवादमें अद्भुतपना है।भगवान्का स्वयं अवतार लेकर मनुष्यजैसा काम करते हुए अपनेआपको प्रकट कर देना औरमेरी शरणमें आ जा यह अत्यन्त गोपनीय रहस्यकी बात कह देना -- यही संवादमें रोमहर्षण करनेवाला? प्रसन्न करनेवाला? आनन्द देनेवाला है। सम्बन्ध -- पारमार्थिक मार्गमें सच्चे साधकको जिसकिसीसे लाभ होता है? उसकी वहि कृतज्ञता प्रकट करता ही है। अतः सञ्जय भी आगेके तीन श्लोकोंमें व्यासजीकी कृतज्ञता प्रकट करते हैं।
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।।18.74।।सञ्जय बोले -- इस प्रकार मैंने भगवान् वासुदेव और महात्मा पृथानन्दन अर्जुनका यह रोमाञ्चित करनेवाला अद्भुत संवाद सुना।
।।18.75।। व्याख्या -- व्यासप्रसादात् श्रुतवान् -- सञ्जयने जब भगवान् श्रीकृष्ण और महात्मा अर्जुनका पूरा संवाद सुना? तब वे बड़े प्रसन्न हुए। अब उसी प्रसन्नतामें वे कह रहे हैं कि ऐसा परम गोपनीय योग मैंने भगवान् व्यासजीकी कृपासे सुना व्यासजीकी कृपासे सुननेका तात्पर्य यह है कि भगवान्ने यत्तेऽहं प्रीयमाणाय वक्ष्यामि हितकाम्यया (10। 1)? इष्टोऽसि मे दृढमिति ततो वक्ष्यामि ते हितम् (18। 64)? मामेवैष्यसि सत्यं ते प्रतिजाने प्रियोऽसि मे (18। 65)? अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः (18। 66) आदिआदि प्यारे वचनोंसे अपना हृदय खोलकर अर्जुनसे जो बातें कही हैं? उन बातोंको सुननेमें केवल व्यासदेवजीकी कृपा ही है अर्थात् सब बातें मैंने व्यासजीकी कृपासे ही सुनी हैं।एतद् गुह्यं परं योगम् -- समस्त योगोंके महान् ईश्वरके द्वारा कहा जानेसे यह गीताशास्त्रयोग अर्थात् योगशास्त्र है। यह गीताशास्त्र अत्यन्त श्रेष्ठ और गोपनीय है। इसके समान श्रेष्ठ और गोपनीय दूसरा कोई संवाद देखनेसुननेमें नहीं आता।जीवका भगवान्के साथ जो नित्यसम्बन्ध है? उसका नामयोग है। उस नित्ययोगकी पहचान करानेके लिये कर्मयोग? ज्ञानयोग आदि योग कहे गये हैं। उन योगोंके समुदायका वर्णन गीतामें होनेसे गीता भीयोग,अर्थात् योगशास्त्र है।योगेश्वरात्कृष्णात्साक्षात्कथयतः स्वयम् -- सञ्जयके आनन्दकी कोई सीमा नहीं रही है। इसलिये वे हर्षोल्लासमें भरकर कह रहे हैं कि इस योगमें मैंने समस्त योगोंके महान् ईश्वर साक्षात् भगवान् श्रीकृष्णके मुखसे सुना है। सञ्जयको योगेश्वरात्? कृष्णात्? साक्षात्? कथयतः? स्वयम् -- ये पाँच शब्द कहनेकी क्या आवश्यकता थी सञ्जय इन शब्दोंका प्रयोग करके यह कहना चाहते हैं कि मैंने यह संवाद परम्परामें नहीं सुना है और किसीने मुझे सुनाया हैऐसी बात भी नहीं इसको तो मैंने खुद भगवान्के कहतेकहते सुना है
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।।18.75।।व्यासजीकी कृपासे मैंने स्वयं इस परम गोपनीय योग (गीता-ग्रन्थ) को कहते हुए साक्षात् योगेश्वर भगवान् श्रीकृष्णसे सुना है।
राजन्संस्मृत्य संस्मृत्य संवादमिममद्भुतम्।
केशवार्जुनयोः पुण्यं हृष्यामि च मुहुर्मुहुः ॥
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।।18.76।। व्याख्या -- राजन्संस्मृत्य ৷৷. मुहुर्मुहुः -- सञ्जय कहते हैं कि हे महाराज भगवान् श्रीकृष्ण और अर्जुनका यह बहुत अलौकिक? विलक्षण संवाद हुआ है। इसमें कितना रहस्य भरा हुआ है कि घोरसेघोर युद्धरूप क्रिया करते हुए भी ऊँचीसेऊँची पारमार्थिक सिद्धि हो सकती है मनुष्यमात्र हरेक परिस्थितिमें अपना उद्धार कर सकता है। इस प्रकारके संवादको याद करकरके मैं बड़ा हर्षित हो रहा हूँ? प्रसन्न हो रहा हूँ।श्रीभगवान् और अर्जुनके इस अद्भुत संवादकी महिमा भी बहुत विलक्षण है। भगवान् श्रीकृष्ण और अर्जुन सदा साथमें रहनेपर भी इन दोनोंका ऐसा संवाद कभी नहीं हुआ। युद्धके समय अर्जुन घबरा गये क्योंकि एक तरफ तो उनको कुटुम्बका मोह तंग कर रहा था और दूसरी तरफ वे क्षात्रधर्मकी दृष्टिसे युद्ध करना अवश्य कर्तव्य समझते थे। मनुष्यकी जब किसी एक सिद्धान्तपर? एक मतपर स्थिति नहीं होती? तब उसकी व्याकुलता बड़ी विचित्र होती है (टिप्पणी प0 1000)। अर्जुन भीयुद्ध करना श्रेष्ठ है या युद्ध न करना श्रेष्ठ है -- इन दोनोंमेंसे एक निश्चित निर्णय नहीं कर सके। इसी व्याकुलताके कारण अर्जुन भगवान्की तरफ खिंच गये? उनके सम्मुख हो गये। सम्मुख होनेसे भगवान्की कृपा उनको विशेषतासे प्राप्त हुई। अर्जुनकी अनन्य भावना? उत्कण्ठाके कारण भगवान् योगमें स्थित हो गये अर्थात् ऐश्वर्य आदिमें स्थित न रहकर केवल अपने प्रेमतत्त्वमें सराबोर हो गये और उसी स्थितिमें अर्जुनको समझाया। इस प्रकार उत्कट अभिलषासम्पन्न अर्जुन और अलौकिक अटलयोगमें स्थित भगवान्के संवादका क्या महिमा कहें उसकी महिमाको कहनेमें कोई भी समर्थ नहीं है।
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।।18.76।।हे राजन् ! भगवान् श्रीकृष्ण और अर्जुनके इस पवित्र और अद्भुत संवादको याद कर-करके मैं बार-बार हर्षित हो रहा हूँ।
तच्च संस्मृत्य संस्मृत्य रूपमत्यद्भुतं हरेः।
विस्मयो मे महान् राजन्हृष्यामि च पुनः पुनः ॥
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।।18.77।। व्याख्या -- तच्च संस्मृत्य ৷৷. पुनः पुनः -- सञ्जयने पीछेके श्लोकमें भगवान् श्रीकृष्ण और अर्जुनके संवादको तोअद्भुत बताया? पर यहाँ भगवान्के विराट्रूपकोअत्यन्त अद्भुत बताते हैं। इसका तात्पर्य है कि संवादको तो अब भी पढ़ सकते हैं? उसपर विचार कर सकते हैं? पर उस विराट्रूपके दर्शन अब नहीं हो सकते। अतः वह रूप अत्यन्त अद्भुत है।ग्यारहवें अध्यायके नवें श्लोकमें सञ्जयने भगवान्को महायोगेश्वरः कहा था। यहाँ विस्मयो मे महान् पदोंसे कहते हैं कि ऐसे महायोगेश्वर भगवान्के रूपको याद करनेसे महान् विस्मय होगा ही। दूसरी बात? अर्जुनको,तो भगवान्ने कृपासे द्रवित होकर विश्वरूप दिखाया? पर मेरेको तो व्यासजीकी कृपासे देखनेको मिल गयायद्यपि भगवान्ने रामावतारमें कौसल्या अम्बाको विराट्रूप दिखाया और कृष्णावतारमें यशोदा मैयाको तथा कौरवसभामें दुर्योधन आदिको विराट्रूप दिखाया तथापि वह रूप ऐसा अद्भुत नहीं था कि जिसकी दाढ़ोंमें बड़ेबड़े योद्धालोग फँसे हुए हैं और दोनों सेनाओँका महान् संहार हो रहा है। इस प्रकारके अत्यन्त अद्भुत रूपको याद करके सञ्जय कहते हैं कि राजन् यह सब जो व्यासजी महाराजकी कृपासे ही मेरेको देखनेको मिला है। नहीं तो ऐसा रूप मेरेजैसेको कहाँ देखनेको मिलता सम्बन्ध -- गीताके आरम्भमें धृतराष्ट्रका गूढ़ाभिसन्धिरूप प्रश्न था कि युद्धका परिणआम क्या होगा अर्थात् मेरे पुत्रोंकी विजय होगी या पाण्डुपुत्रोंकी आगेके श्लोकमें सञ्जय धृतराष्ट्रके उसी प्रश्नका उत्तर देते हैं।
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।।18.77।।हे राजन् ! भगवान् श्रीकृष्णके उस अत्यन्त अद्भुत विराट्रूपको याद कर-करके मेरेको बड़ा भारी आश्चर्य हो रहा है और मैं बार-बार हर्षित हो रहा हूँ।
।।18.78।। व्याख्या -- यत्र योगेश्वरः कृष्णो पार्थो धनुर्धरः -- सञ्जय कहते हैं कि राजन जहाँ अर्जुनका संरक्षण करनेवाले? उनको सम्मति देनेवाले? सम्पूर्ण योगोंके महान् ईश्वर? महान् बलशाली? महान् ऐश्वर्यवान्? महान् विद्यावान्? महान् चतुर भगवान् श्रीकृष्ण हैं और जहाँ भगवान्की आज्ञाका पालन करनेवाले? भगवान्के प्रिय सखा तथा भक्तगाण्डीवधनुर्धारी अर्जुन हैं? उसी पक्षमें श्री? विजय? विभूति और अचल नीति -- ये सभी हैं और मेरी सम्मति भी उधर ही है।
भगवान्ने जब अर्जुनको दिव्य दृष्टि दी? उस समय सञ्जयने भगवान्को महायोगेश्वरः (टिप्पणी प0 1001) कहा था? अब उसी महायोगेश्वरकी याद दिलाते हुए यहाँ योगेश्वरः कहते हैं। वे सम्पूर्ण योगोंके ईश्वर (मालिक) भगवान् कृष्ण तो प्रेरक हैं और उनकी आज्ञाका पालन करनेवाले धनुर्धारी अर्जुन प्रेर्य हैं। गीतामें भगवान्के लियेमहायोगेश्वर?योगेश्वर आदि शब्दोंका प्रयोग हुआ है। इनका तात्पर्य है कि भगवान् सब योगियोंको सिखानेवाले हैं। भगवान्को खुद सीखना नहीं पड़ता क्योंकि उनका योग स्वतःसिद्ध है। सर्वज्ञता? ऐश्वर्य? सौन्दर्य? माधुर्य आदि जितने भी वैभवशाली गुण हैं? वे सबकेसब भगवान्में स्वतः रहते हैं? वे गुण भगवान्में नित्य रहते हैं? असीम रहते हैं। ऐसे पिताका पिता? फिर पिताका पिता -- यह परम्परा अन्तमें जाकर परमपिता परमात्मामें समाप्त होती है? ऐसे ही जितने भी गुण हैं? उन सबकी समाप्ति परमात्मामें ही होती है।पहले अध्यायमें जब युद्धकी घोषणाका प्रसङ्ग आया? तब कौरवपक्षमें सबसे पहले भीष्मजीने शङ्ख बजाया। भीष्मजी कौरवसेनाके अधिपति थे? इसलिये उनका शङ्ख बजाना उचित ही था। परन्तु भगवान् श्रीकृष्ण तो पाण्डवसेनामें सारथि बने हुए हैं और सबसे पहले शङ्ख बजाकर युद्धकी घोषणा करते हैं लौकिक दृष्टिसे देखा जाय तो सबसे पहले शङ्ख बजानेका भगवान्का कोई अधिकार नहीं दीखता। फिर भी वे शङ्ख बजाते हैं तो इससे सिद्ध होता है कि पाण्डवसेनामें सबसे मुख्य भगवान् श्रीकृष्ण ही हैं और दूसरे नम्बरमें अर्जुन हैं। इसलिये इन दोनोंने पाण्डवसेनामें सबसे पहले शङ्ख बजाये। तात्पर्य यह हुआ कि सञ्जयने जैसे आरम्भमें (शङ्खवादनक्रियामें) दोनोंकी मुख्यता प्रकट की? ऐसे ही यहाँ अन्तमें इन दोनोंका नाम लेकर दोनोंकी मुख्यता प्रकट करते हैं।गीताभरमें पार्थ सम्बोधनकी अड़तीस बार आवृत्ति हुई है। अर्जुनके लिये इतनी संख्यामें और कोई सम्बोधन नहीं आया है। इससे मालूम होता है कि भगवान्को पार्थ सम्बोधन ज्यादा प्रिय लगता है। इसी रीतिसे अर्जुनको भी कृष्ण सम्बोधन ज्यादा प्रिय लगता है। इसलिये गीतामें कृष्ण सम्बोधनकी आवृत्ति नौ बार हुई है। भगवान्के सम्बोधनोंमें इतनी संख्यामें दूसरे किसी भी सम्बोधनकी आवृत्ति नहीं हुई। अन्तमें गीताका उपसंहार करते हुए सञ्जयने भी कृष्ण और पार्थ ये दोनों नाम लिये हैं।तत्र श्रीर्विजयो भूतिर्ध्रुवा नीतिर्मतिर्मम -- लक्ष्मी? शोभा? सम्पत्ति -- ये सब श्री शब्दके अन्तर्गत हैं। जहाँ श्रीपति भगवान् कृष्ण हैं? वहाँ श्री रहेगी ही।विजय नाम अर्जुनका भी है और शूरवीरता आदिका भी। जहाँ विजयरूप अर्जुन होंगे? वहाँ शूरवीरता? उत्साह आदि क्षात्रऐश्वर्य रहेंगे ही।ऐसे ही जहाँ योगेश्वर भगवान् श्रीकृष्ण होंगे? वहाँ विभूति -- ऐश्वर्य? महत्ता? प्रभाव? सामर्थ्य आदि सबकेसब भगवद्गुण रहेंगे ही और जहाँ धर्मात्मा अर्जुन होंगे? वहाँ ध्रुवा नीति -- अटल नीति? न्याय? धर्म आदि रहेंगे ही।वास्तवमें श्री? विजय? विभूति और ध्रुवा नीति -- ये सब गुण भगवान्में और अर्जुनमें हरदम विद्यमान रहते हैं। उपर्युक्त दो विभाग तो मुख्यताको लेकर किये गये हैं। योगेश्वर श्रीकृष्ण और धनुर्धारी अर्जुन -- ये दोनों जहाँ रहेंगे? वहाँ अनन्त ऐश्वर्य? अनन्त माधुर्य? अनन्त सौशील्य? अनन्त सौजन्य? अनन्त सौन्दर्य आदि दिव्य गुण रहेंगे ही।धृतराष्ट्रका विजयकी गूढ़ाभिसन्धिरूप जो प्रश्न है? उसका उत्तर सञ्जय यहाँ सम्यक् रीतिसे दे रहे हैं। तात्पर्य है कि पाण्डुपुत्रोंकी विजय निश्चित है? इसमें कोई सन्देह नहीं है। ज्ञानयज्ञः सुसम्पन्नः प्रीतये पार्थसारथेः।
अङ्गीकरोतु तत्सर्वं मुकुन्दो भक्तवत्सलः।। नेत्रवेदखयुग्मे हि बहुधान्ये च वत्सरे (टिप्पणी प0 1002)
संजीवनी मुमुक्षूणां माधवे पूर्णतामियात्।।
इस प्रकार ? तत्? सत् -- इन भगवन्नामोंके उच्चारणपूर्वक ब्रह्मविद्या और योगशास्त्रमय श्रीमद्भगवद्गीतोपनिषद्रूप श्रीकृष्णार्जुनसंवादमें मोक्षसंन्यासयोग नामक अठारहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ।।18।।
Translation · Hindi
।।18.78।।जहाँ योगेश्वर भगवान् श्रीकृष्ण हैं और जहाँ गाण्डीवधनुषधारी अर्जुन हैं, वहाँ ही श्री, विजय, विभूति और अचल नीति है -- ऐसा मेरा मत है।
अर्जुन उवाच। संन्यासस्य महाबाहो तत्त्वमिच्छामि वेदितुम्। त्यागस्य च हृषीकेश पृथक्केशिनिषूदन ॥
।।18.1।। व्याख्या -- संन्यासस्य महाबाहो ৷৷. पृथक्केशिनिषूदन -- यहाँ महाबाहो सम्बोधन सामर्थ्यका सूचक है। अर्जुनद्वारा इस सम्बोधनका प्रयोग करनेका भाव यह है कि आप सम्पूर्ण विषयोंको कहनेमें समर्थ हैं अतः मेरी जिज्ञासाका समाधान आप इस प्रकार करें? जिससे मैं विषयको सरलतासे समझ सकूँ।हृषीकेश सम्बोधन अन्तर्यामीका वाचक है। इसके प्रयोगमें अर्जुनका भाव यह है कि मैं संन्यास और त्यागका तत्त्व जानना चाहता हूँ अतः इस विषयमें जोजो आवश्यक बातें हों? उनको आप (मेरे पूछे बिना भी) कह दें।केशिनिषूदन सम्बोधन विघ्नोंको दूर करनेवालेका सूचक है। इसके प्रयोगमें अर्जुनका भाव यह है कि जिस प्रकार आप अपने भक्तोंके सम्पूर्ण विघ्नोंको दूर कर देते हैं? उसी प्रकार मेरे भी सम्पूर्ण विघ्नोंको अर्थात् शङ्काओँ और संशयोंको दूर कर दें।जिज्ञासा प्रायः दो प्रकारसे प्रकट की जाती है --,(1) अपने आचरणमें लानेके लिये और (2) सिद्धान्तको समझनेके लिये। जो केवल पढ़ाई करनेके लिये (सीखनेके लिये) सिद्धान्तको समझते हैं? वे केवल पुस्तकोंके विद्वान् बन सकते हैं और नयी पुस्तक भी बना सकते हैं? पर अपना कल्याण नहीं कर सकते (टिप्पणी प0 869)। अपना कल्याण तो वे ही कर सकते हैं? जो सिद्धान्तको समझकर उसके अनुसार अपना जीवन बनानेके लिये तत्पर हो जाते हैं।यहाँ अर्जुनकी जिज्ञासा भी केवल सिद्धान्तको जाननेके लिये ही नहीं है? प्रत्युत सिद्धान्तको जानकर उसके अनुसार अपना जीवन बनानेके लिये है।एषा तेऽभिहिता सांख्ये (गीता 2। 39) में आये सांख्य पदको ही यहाँ संन्यास पदसे कहा गया है। भगवान्ने भी सांख्य और संन्यासको पर्यायवाची माना है जैसे -- पाँचवें अध्यायके दूसरे श्लोकमें संन्यासः? चौथे श्लोकमें सांख्ययोगौ? पाँचवें श्लोकमें यत्सांख्यैः और छठे श्लोकमें संन्यासस्तु पदोंका एक ही अर्थमें प्रयोग हुआ है। इसलिये यहाँ अर्जुनने सांख्यको ही संन्यास कहा है।इसी प्रकार बुद्धिर्योगे त्विमां श्रृणु (गीता 2। 39) में आये योग पदको ही यहाँ त्याग पदसे कहा गया है। भगवान्ने भी योग (कर्मयोग) और त्यागको पर्यायवाची माना है जैसे -- दूसरे अध्यायके अड़तालीसवें श्लोकमें सङ्गं त्यक्त्वा तथा इक्यावनवें श्लोकमें फलं त्यक्त्वा? तीसरे अध्यायके तीसरे श्लोकमें कर्मयोगेन योगिनाम्? चौथे अध्यायके बीसवें श्लोकमें त्यक्त्वा कर्मफलासङ्गम्? पाँचवें श्लोकमें तद्योगैरपि गम्यते? ग्यारहवें श्लोकमें सङ्गं त्यक्त्वा तथा बारहवें श्लोकमें त्यागात् पदोंका एक ही अर्थमें प्रयोग हुआ है। इसलिये यहाँ अर्जुनने कर्मयोगको ही त्याग कहा है।अच्छी तरहसे रखनेका नाम संन्यास है -- सम्यक् न्यासः संन्यासः। तात्पर्य है कि प्रकृतिकी चीज सर्वथा प्रकृतिमें देने (छोड़ देने) और विवेकद्वारा प्रकृतिसे अपना सर्वथा सम्बन्धविच्छेद कर लेनेका नाम संन्यास है।कर्म और फलकी आसक्तिको छोड़नेका नाम त्याग है। छठे अध्यायके चौथे श्लोकमें आया है कि जो कर्म और फलमें आसक्त नहीं होता? वह योगारूढ़ हो जाता है। सम्बन्ध -- अर्जुनकी जिज्ञासाके उत्तरमें पहले भगवान् आगेके दो श्लोकोंमें अन्य दार्शनिक विद्वानोंके चार मत बताते हैं।
।।18.1।। अर्जुन बोले -- हे महाबाहो ! हे हृषीकेश ! हे केशिनिषूदन ! मैं संन्यास और त्यागका तत्त्व अलग-अलग जानना चाहता हूँ।
श्रीभगवानुवाच। काम्यानां कर्मणां न्यासं संन्यासं कवयो विदुः। सर्वकर्मफलत्यागं प्राहुस्त्यागं विचक्षणाः ॥
Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas।।18.2।। व्याख्या -- दार्शनिक विद्वानोंके चार मत हैं --,1 -- काम्यानां कर्मणां न्यासं संन्यासं कवयो विदुः -- कई विद्वान् कहते हैं कि काम्यकर्मोंके त्यागका नाम संन्यास है अर्थात् इष्टकी प्राप्ति और अनिष्टकी निवृत्तिके लिये जो कर्म किये जाते हैं? उनका त्याग करनेका नाम संन्यास है। 2 -- सर्वकर्मफलत्यागं प्राहुस्त्यागं विचक्षणाः -- कई विद्वान् कहते हैं कि सम्पूर्ण कर्मोंके फलकी इच्छाका त्याग करनेका नाम त्याग है अर्थात् फल न चाहकर कर्तव्यकर्मोंको करते रहनेका नाम त्याग है। 3 -- त्याज्यं दोष (टिप्पणी प0 870.1) वदित्येके कर्म प्राहुर्मनीषिणः -- कई विद्वान् कहते हैं कि सम्पूर्ण कर्मोंको दोषकी तरह छोड़ देना चाहिये। 4 -- यज्ञदानतपःकर्म न त्याज्यमिति चापरे -- अन्य विद्वान् कहते हैं कि दूसरे सब कर्मोंका भले ही त्याग कर दें? पर यज्ञ? दान और तपरूप कर्मोंका त्याग नहीं करना चाहिये।उपर्युक्त चारों मतोंमें दो विभाग दिखायी देते हैं -- पहला और तीसरा मत संन्यास(सांख्ययोग) का है तथा दूसरा और चौथा मत त्याग(कर्मयोग) का है। इन दो विभागोंमें भी थोड़ाथोड़ा अन्तर है। पहले मतमें केवल काम्यकर्मोंका त्याग है और तीसरे मतमें कर्ममात्रका त्याग है। ऐसे ही दूसरे मतमें कर्मोंके फलका त्याग है और चौथे मतमें यज्ञ? दान और तपरूप कर्मोंके त्यागका निषेध है।दार्शनिकोंके उपर्युक्त चार मतोंमें क्याक्या कमियाँ हैं और उनकी अपेक्षा भगवान्के मतमें क्याक्या विलक्षणताएँ हैं? इसका विवेचन इस प्रकार है --,1 -- काम्यानां कर्मणां न्यासं संन्यासम् -- संन्यासके इस पहले मतमें केवल काम्यकर्मोंका त्याग बताया गया है परन्तु इसके अलावा भी नित्य? नैमित्तिक आदि आवश्यक कर्तव्यकर्म बाकी रह जाते हैं (टिप्पणी प0 870.2)। अतः यह मत पूर्ण नहीं है क्योंकि इसमें न तो कर्तृत्वका त्याग बताया है और न स्वरूपमें स्थिति ही बतायी है। परन्तु भगवान्के मतमें कर्मोंमें कर्तृत्वाभिमान नहीं रहता और स्वरूपमें स्थिति हो जाती है जैसे -- इसी अध्यायके सत्रहवें श्लोकमें जिसमें अहंकृतभाव नहीं है और जिसकी बुद्धि कर्मफलमें लिप्त नहीं होती -- ऐसा कहकर कर्तृत्वाभिमानका त्याग बताया है और अगर वह सम्पूर्ण प्राणियोंको मार दे? तो भी न मारता है? न बँधता है -- ऐसा कहकर स्वरूपमें स्थिति बतायी है। 2 -- त्याज्यं दोषवदित्येके -- संन्यासके इस दूसरे मतमें सब कर्मोंको दोषकी तरह छोड़नेकी बात है। परन्तु सम्पूर्ण कर्मोंका त्याग कोई कर ही नहीं सकता (गीता 3। 5) और कर्ममात्रका त्याग करनेसे जीवननिर्वाह भी नहीं हो सकता (गीता 3। 8)। इसलिये भगवान्ने नित्य कर्मोंका स्वरूपसे त्याग करनेको राजसतामस त्याग बताया है (18। 78)। 3 -- सर्वकर्मफलत्यागम् -- त्यागके इस पहले मतमें केवल फलका त्याग बताया है। यहाँ फलत्यागके अन्तर्गत केवल कामनाके त्यागकी ही बात आयी है (टिप्पणी प0 871.1)। ममताआसक्तिके त्यागकी बात इसके अन्तर्गत नहीं ले सकते क्योंकि ऐसा लेनेपर दार्शनिकों और भगवान्के मतोंमें कोई अन्तर नहीं रहेगा। भगवान्के मतमें कर्मकी आसक्ति और फलकी आसक्ति -- दोनोंके ही त्यागकी बात आयी है -- सङ्गं त्यक्त्वा फलानि च (गीता 18। 6)। 4 -- यज्ञदानतपःकर्म न त्याज्यम् -- त्याग अर्थात् कर्मयोगके इस दूसरे मतमें यज्ञ? दान और तपरूप कर्मोंका त्याग न करनेकी बात है। परन्तु इन तीनोंके अलावा वर्ण? आश्रम? परिस्थिति आदिको लेकर जितने कर्म आते हैं? उनको करने अथवा न करनेके विषयमें कुछ नहीं कहा गया है -- यह इसमें अधूरापन है। भगवान्के मतमें इन कर्मोंका केवल त्याग ही नहीं करना चाहिये? प्रत्युत इनको न करते हों? तो जरूर करना चाहिये और इनके अतिरिक्त तीर्थ? व्रत आदि कर्मोंको भी फल एवं आसक्तिका त्याग करके करना चाहिये (18। 56)। सम्बन्ध -- पीछेके दो श्लोकोंमें दार्शनिक विद्वानोंके चार मत बतानेके बाद अब भगवान् आगेके तीन श्लोकोंमें पहले त्यागके विषयमें अपना मत बताते हैं।
Hindi Translation By Swami Ramsukhdas।।18.2।।श्रीभगवान् बोले -- कई विद्वान् काम्यकर्मोंके त्यागको संन्यास कहते हैं और कई विद्वान् सम्पूर्ण कर्मोंके फलके त्यागको त्याग कहते हैं। कई विद्वान् कहते हैं कि कर्मोंको दोषकी तरह छोड़ देना चाहिये और कई विद्वान् कहते हैं कि यज्ञ? दान और तपरूप कर्मोंका त्याग नहीं करना चाहिये।
त्याज्यं दोषवदित्येके कर्म प्राहुर्मनीषिणः। यज्ञदानतपःकर्म न त्याज्यमिति चापरे ॥
।।18.3।। व्याख्या -- दार्शनिक विद्वानोंके चार मत हैं --,1 -- काम्यानां कर्मणां न्यासं संन्यासं कवयो विदुः -- कई विद्वान् कहते हैं कि काम्यकर्मोंके त्यागका नाम संन्यास है अर्थात् इष्टकी प्राप्ति और अनिष्टकी निवृत्तिके लिये जो कर्म किये जाते हैं? उनका त्याग करनेका नाम संन्यास है।2 -- सर्वकर्मफलत्यागं प्राहुस्त्यागं विचक्षणाः -- कई विद्वान् कहते हैं कि सम्पूर्ण कर्मोंके फलकी इच्छाका त्याग करनेका नाम त्याग है अर्थात् फल न चाहकर कर्तव्यकर्मोंको करते रहनेका नाम त्याग है।3 -- त्याज्यं दोष (टिप्पणी प0 870.1) वदित्येके कर्म प्राहुर्मनीषिणः -- कई विद्वान् कहते हैं कि सम्पूर्ण कर्मोंको दोषकी तरह छोड़ देना चाहिये।4 -- यज्ञदानतपःकर्म न त्याज्यमिति चापरे -- अन्य विद्वान् कहते हैं कि दूसरे सब कर्मोंका भले ही त्याग कर दें? पर यज्ञ? दान और तपरूप कर्मोंका त्याग नहीं करना चाहिये।उपर्युक्त चारों मतोंमें दो विभाग दिखायी देते हैं -- पहला और तीसरा मत संन्यास(सांख्ययोग) का है तथा दूसरा और चौथा मत त्याग(कर्मयोग) का है। इन दो विभागोंमें भी थोड़ाथोड़ा अन्तर है। पहले मतमें केवल काम्यकर्मोंका त्याग है और तीसरे मतमें कर्ममात्रका त्याग है। ऐसे ही दूसरे मतमें कर्मोंके फलका त्याग है और चौथे मतमें यज्ञ? दान और तपरूप कर्मोंके त्यागका निषेध है।दार्शनिकोंके उपर्युक्त चार मतोंमें क्याक्या कमियाँ हैं और उनकी अपेक्षा भगवान्के मतमें क्याक्या विलक्षणताएँ हैं? इसका विवेचन इस प्रकार है --,1 -- काम्यानां कर्मणां न्यासं संन्यासम् -- संन्यासके इस पहले मतमें केवल काम्यकर्मोंका त्याग बताया गया है परन्तु इसके अलावा भी नित्य? नैमित्तिक आदि आवश्यक कर्तव्यकर्म बाकी रह जाते हैं (टिप्पणी प0 870.2)। अतः यह मत पूर्ण नहीं है क्योंकि इसमें न तो कर्तृत्वका त्याग बताया है और न स्वरूपमें स्थिति ही बतायी है। परन्तु भगवान्के मतमें कर्मोंमें कर्तृत्वाभिमान नहीं रहता और स्वरूपमें स्थिति हो जाती है जैसे -- इसी अध्यायके सत्रहवें श्लोकमें जिसमें अहंकृतभाव नहीं है और जिसकी बुद्धि कर्मफलमें लिप्त नहीं होती -- ऐसा कहकर कर्तृत्वाभिमानका त्याग बताया है और अगर वह सम्पूर्ण प्राणियोंको मार दे? तो भी न मारता है? न बँधता है -- ऐसा कहकर स्वरूपमें स्थिति बतायी है।2 -- त्याज्यं दोषवदित्येके -- संन्यासके इस दूसरे मतमें सब कर्मोंको दोषकी तरह छोड़नेकी बात है। परन्तु सम्पूर्ण कर्मोंका त्याग कोई कर ही नहीं सकता (गीता 3। 5) और कर्ममात्रका त्याग करनेसे जीवननिर्वाह भी नहीं हो सकता (गीता 3। 8)। इसलिये भगवान्ने नित्य कर्मोंका स्वरूपसे त्याग करनेको राजसतामस त्याग बताया है (18। 78)।3 -- सर्वकर्मफलत्यागम् -- त्यागके इस पहले मतमें केवल फलका त्याग बताया है। यहाँ फलत्यागके अन्तर्गत केवल कामनाके त्यागकी ही बात आयी है (टिप्पणी प0 871.1)। ममताआसक्तिके त्यागकी बात इसके अन्तर्गत नहीं ले सकते क्योंकि ऐसा लेनेपर दार्शनिकों और भगवान्के मतोंमें कोई अन्तर नहीं रहेगा। भगवान्के मतमें कर्मकी आसक्ति और फलकी आसक्ति -- दोनोंके ही त्यागकी बात आयी है -- सङ्गं त्यक्त्वा फलानि च (गीता 18। 6)।4 -- यज्ञदानतपःकर्म न त्याज्यम् -- त्याग अर्थात् कर्मयोगके इस दूसरे मतमें यज्ञ? दान और तपरूप कर्मोंका त्याग न करनेकी बात है। परन्तु इन तीनोंके अलावा वर्ण? आश्रम? परिस्थिति आदिको लेकर जितने कर्म आते हैं? उनको करने अथवा न करनेके विषयमें कुछ नहीं कहा गया है -- यह इसमें अधूरापन है। भगवान्के मतमें इन कर्मोंका केवल त्याग ही नहीं करना चाहिये? प्रत्युत इनको न करते हों? तो जरूर करना चाहिये और इनके अतिरिक्त तीर्थ? व्रत आदि कर्मोंको भी फल एवं आसक्तिका त्याग करके करना चाहिये (18। 56)। सम्बन्ध -- पीछेके दो श्लोकोंमें दार्शनिक विद्वानोंके चार मत बतानेके बाद अब भगवान् आगेके तीन श्लोकोंमें पहले त्यागके विषयमें अपना मत बताते हैं।
।।18.3।।श्रीभगवान् बोले -- कई विद्वान् काम्य-कर्मोंके त्यागको संन्यास कहते हैं और कई विद्वान् सम्पूर्ण कर्मोंके फलके त्यागको त्याग कहते हैं। कई विद्वान् कहते हैं कि कर्मोंको दोषकी तरह छोड़ देना चाहिये और कई विद्वान् कहते हैं कि यज्ञ, दान और तप-रूप कर्मोंका त्याग नहीं करना चाहिये।
निश्चयं शृणु मे तत्र त्यागे भरतसत्तम। त्यागो हि पुरुषव्याघ्र त्रिविधः सम्प्रकीर्तितः ॥
।।18.4।। व्याख्या -- निश्चयं श्रृणु मे तत्र त्यागे भरतसत्तम -- हे भरतवंशियोंमें श्रेष्ठ अर्जुन अब मैं संन्यास और त्याग -- दोनोंमेंसे पहले त्यागके विषयमें अपना मत कहता हूँ? उसको तुम सुनो।त्यागो हि पुरुषव्याघ्र त्रिविधः संप्रकीर्तितः -- हे पुरुषव्याघ्र त्याग तीन तरहका कहा गया है -- सात्त्विक? राजस और तामस। वास्तवमें भगवान्के मतमें सात्त्विक त्याग ही त्याग है परन्तु उसके साथ राजस और तामस त्यागका भी वर्णन करनेका तात्पर्य यह है कि उसके बिना भगवान्के अभीष्ट सात्त्विक त्यागकी श्रेष्ठता स्पष्ट नहीं होती क्योंकि परीक्षा या तुलना करके किसी भी वस्तुकी श्रेष्ठता सिद्ध करनेके लिये दूसरी वस्तुएँ सामने रखनी ही पड़ती हैं।तीन प्रकारका त्याग बतानेका तात्पर्य यह भी है कि साधक सात्त्विक त्यागको ग्रहण करे और राजस तथा तामस त्यागका त्याग करे।
।।18.4।। हे भरतवंशियोंमें श्रेष्ठ अर्जुन ! तू संन्यास और त्याग -- इन दोनोंमेंसे पहले त्यागके विषयमें मेरा निश्चय सुन; क्योंकि हे पुरुषश्रेष्ठ ! त्याग तीन प्रकारका कहा गया है।
यज्ञदानतपःकर्म न त्याज्यं कार्यमेव तत्। यज्ञो दानं तपश्चैव पावनानि मनीषिणाम् ॥
।।18.5।। व्याख्या -- यज्ञदानतपःकर्म न त्याज्यं कार्यमेव तत् -- यहाँ भगवान्ने दूसरोंके मत (18। 3) को ठीक बताया है। भगवान् कठोर शब्दोंसे किसीके मतका खण्डन नहीं करते। आदर देनेके लिये भगवान् दूसरेके मतका वास्तविक अंश ले लेते हैं और उसमें अपना मत भी शामिल कर देते हैं। यहाँ भगवान्ने दूसरेके मतके अनुसार कहा कि यज्ञ? दान और तपरूप कर्म छोड़ने नहीं चाहिये। इसके साथ भगवान्ने अपना मत बताया कि इतना ही नहीं? प्रत्युत उनको न करते हों तो जरूर करना चाहिये -- कार्यमेव तत्। कारण कि यज्ञ? दान और तप -- तीनों कर्म मनीषियोंको पवित्र करनेवाले हैं।यज्ञो दानं तपश्चैव पावनानि मनीषिणाम् -- यहाँ चैव पदका तात्पर्य है कि नित्य? नैमित्तिक? जीविकासम्बन्धी? शरीरसम्बन्धी आदि जितने भी कर्तव्यकर्म हैं? उनको भी जरूर करना चाहिये क्योंकि वे भी मनीषियोंको पवित्र करनेवाले हैं।,जो मनुष्य समत्वबुद्धिसे युक्त होकर कर्मजन्य फलका त्याग कर देते हैं? वे मनीषी हैं -- कर्मजं बुद्धियुक्ता हि फलं त्यक्त्वा मनीषिणः (गीता 2। 51)। ऐसे मनीषियोंको वे यज्ञादि कर्म पवित्र करते हैं। परन्तु जो वास्तवमें मनीषी नहीं हैं? जिनकी इन्द्रियाँ वशमें नहीं हैं अर्थात् अपने सुखभोगके लिये ही जो यज्ञ? दानादि कर्म करते हैं? उनको वे कर्म पवित्र नहीं करते? प्रत्युत वे कर्म बन्धनकारक हो जाते हैं।इस श्लोकके पूर्वार्धमें यज्ञदानतपःकर्म -- ऐसा समासयुक्त पद दिया है और उत्तरार्धमें यज्ञो दानं तपः -- ऐसे अलगअलग पद दिये हैं? इसका तात्पर्य है कि भगवान्ने समासयुक्त पदसे यह बताया है कि यज्ञ? दान और तपका त्याग नहीं करना चाहिये? प्रत्युत इनको जरूर करना चाहिये और अलगअलग पदोंसे यह बताया है,कि इनमेंसे एकएक कर्म भी मनीषीको पवित्र करनेवाला है।
।।18.5।।यज्ञ, दान और तपरूप कर्मोंका त्याग नहीं करना चाहिये, प्रत्युत उनको तो करना ही चाहिये क्योंकि यज्ञ, दान और तप -- ये तीनों ही कर्म मनीषियोंको पवित्र करनेवाले हैं।
एतान्यपि तु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा फलानि च। कर्तव्यानीति मे पार्थ निश्चितं मतमुत्तमम् ॥
।।18.6।। व्याख्या -- एतान्यपि तु कर्माणि ৷৷. निश्चितं मतमुत्तमम् -- यहाँ एतानि पदसे पूर्वश्लोकमें कहे यज्ञ? दान और तपरूप कर्मोंकी तथा अपि पदसे शास्त्रविहित पठनपाठन? खेतीव्यापार आदि जीविकासम्बन्धी कर्म शास्त्रकी मर्यादाके अनुसार खानापीना? उठनाबैठना? सोनाजागना आदि शारीरिक कर्म और परिस्थितिके अनुसार सामने आये अवश्य कर्तव्यकर्म -- इन सभी कर्मोंको लेना चाहिये। इन समस्त कर्मोंको आसक्ति और फलेच्छाका त्याग करके जरूर करना चाहिये। अपनी कामना? ममता और आसक्तिका त्याग करके कर्मोंको केवल प्राणिमात्रके हितके लिये करनेसे कर्मोंका प्रवाह संसारके लिये और योग अपने लिये हो जाता है। परन्तु कर्मोंको अपने लिये करनेसे कर्म बन्धनकारक हो जाते हैं -- अपने व्यक्तित्वको नष्ट नहीं होने देते।गीतामें कहीं सङ्ग(आसक्ति) के त्यागकी बात आती है और कहीं कर्मोंके फलके त्यागकी बात आती है। इस श्लोकमें सङ्ग और फल -- दोनोंके त्यागकी बात आयी है। इसका तात्पर्य यह है कि गीतामें जहाँ सङ्गके त्यागकी बात कही है? वहाँ उसके साथ फलके त्यागकी बात भी समझ लेनी चाहिये और जहाँ फलके त्यागकी बात कही है? वहाँ उसके साथ सङ्गके त्यागकी बात भी समझ लेनी चाहिये। यहाँ अर्जुनने त्यागके तत्त्वकी बात पूछी है अतः भगवान्ने त्यागका यह तत्त्व बताया है कि सङ्ग (आसक्ति) और फल -- दोनोंका ही त्याग करना चाहिये? जिससे साधकको यह जानकारी स्पष्ट हो जाय कि आसक्ति न तो कर्ममें रहनी चाहिये और न फलमें ही रहनी चाहिये। आसक्ति न रहनेसे मन? बुद्धि? इन्द्रियाँ? शरीर आदि कर्म करनेके औजारों(करणों)में तथा प्राप्त वस्तुओँमें ममता नहीं रहती (गीता 5। 11)।सङ्ग (आसक्ति या सम्बन्ध) सूक्ष्म होता है और फलेच्छा स्थूल होती है। सङ्ग या आसक्तिकी सूक्ष्मता वहाँतक है? जहाँ चेतनस्वरूपने नाशवान्के साथ सम्बन्ध जोड़ा है। वहीँसे आसक्ति पैदा होती है? जिससे जन्ममरण आदि सब अनर्थ होते -- कारणं गुणसङ्गोऽस्य सदसद्योनिजन्मसु (गीता 13। 21)। आसक्तिका त्याग करनेसे नाशवान्के साथ जोड़े हुए सम्बन्धका विच्छेद हो जाता है और स्वतःस्वाभाविक रहनेवाली असङ्गताका अनुभव हो जाता है।इस विषयमें एक और बात समझनेकी है कि कई दार्शनिक इस नाशवान् संसारको असत् मानते हैं क्योंकि यह पहले भी नहीं था और पीछे भी नहीं रहेगा? इसलिये वर्तमानमें भी यह नहीं है जैसे -- स्वप्न। कई दार्शनिकोंका यह मत है कि संसार परिवर्तनशील है? हरदम बदलता रहता है? कभी एक रूप नहीं रहता जैसे -- अपना शरीर। कई यह मानते हैं कि परिवर्तनशील होनेपर भी संसारका कभी अभाव नहीं होता? प्रत्युत तत्त्वसे सदा रहता है जैसे -- जल (जल ही बर्फ? बादल? भाप और परमाणुरूपसे हो जाता है? पर स्वरूपसे वह मिटता नहीं)। इस तरह अनेक मतभेद हैं किन्तु नाशवान् जडका अपने अविनाशी चेतनस्वरूपके साथ कोई सम्बन्ध नहीं है? इसमें किसी भी दार्शनिकका मतभेद नहीं है। सङ्गं त्यक्त्वा पदोंसे भगवान्ने उसी सम्बन्धका त्याग कहा है।प्रकृति सत् है या असत् है अथवा सत्असत्से विलक्षण है अनादिसान्त है या अनादिअनन्त है इस झगड़ेमें पड़कर साधकको अपना अमूल्य समय खर्च नहीं करना चाहिये? प्रत्युत इस प्रकृतिसे तथा प्रकृतिके कार्य शरीरसंसारसे अपना सम्बन्धविच्छेद करना चाहिये? जो कि स्वतः हो ही रहा है। स्वतः होनेवाले सम्बन्धविच्छेदका केवल अनुभव करना है कि शरीर तो प्रतिक्षण बदलता ही रहता है और स्वयं निर्विकाररूपसे सदा ज्योंकात्यों रहता है।अब प्रश्न यह होता है कि फल क्या है प्रारब्धकर्मके अनुसार अभी हमें जो परिस्थिति? वस्तु? देश? काल आदि प्राप्त हैं? वह सब कर्मोंका प्राप्त फल है और भविष्यमें जो परिस्थिति? वस्तु आदि प्राप्त होनेवाली है? वह सब कर्मोंका अप्राप्त फल है। प्राप्त तथा अप्राप्त फलमें आसक्ति रहनेके कारण ही प्राप्तमें ममता और अप्राप्तकी कामना होती है। इसलिये भगवान्ने त्यक्त्वा फलानि च (टिप्पणी प0 873) कहकर फलोंका त्याग करनेकी बात कही है।कर्मफलका त्याग क्यों करना चाहिये क्योंकि कर्मफल हमारे साथ रहनेवाला है ही नहीं। कारण यह है कि जिन कर्मोंसे फल बनता है? उन कर्मोंका आरम्भ और अन्त होता है अतः उनका फल भी प्राप्त और नष्ट होनेवाला ही है। इसलिये कर्मफलका त्याग करना है। फलके त्यागमें वस्तुतः फलकी आसक्तिका? कामनाका ही त्याग करना है। वास्तवमें आसक्ति हमारे स्वरूपमें है नहीं? केवल मानी हुई है।दूसरी बात? जो अपना स्वरूप होता है? उसका त्याग नहीं होता जैसे -- प्रज्वलित अग्नि उष्णता और प्रकाशका त्याग नहीं कर सकती। जो चीज अपनी नहीं होती? उसका भी त्याग नहीं होता जैसे -- संसारमें अनेक वस्तुएँ पड़ी हैं परन्तु उनका हम त्याग करें -- ऐसा कहना भी नहीं बनता क्योंकि वे वस्तुएँ हमारी हैं ही नहीं। इसलिये त्याग उसीका होता है? जो वास्तवमें अपना नहीं है? पर जिसको अपना मान लिया है। ऐसे ही प्रकृति और प्रकृतिके कार्य शरीर आदि हमारे नहीं हैं? फिर भी उनको हम अपना मानते हैं? तो इस अपनेपनकी मान्यताका ही त्याग करना है। मनुष्यके सामने कर्तव्यरूपसे जो कर्म आ जाय? उसको फल और आसक्तिका त्याग करके सावधानीके साथ तत्परतापूर्वक करना चाहिये -- कर्तव्यानि। कर्मयोगमें विधिनिषेधको लेकर अमुक काम करना है और अमुक काम नहीं करना है -- ऐसा विचार तो करना ही है परन्तु अमुक काम ब़ड़ा है और अमुक काम छोटा है -- ऐसा विचार नहीं करना है। कारण कि जहाँ कर्म और उसके फलसे अपना कोई सम्बन्ध ही नहीं है? वहाँ यह कर्म बड़ा है? यह कर्म छोटा है इस कर्मका फल बड़ा है? इस कर्मका फल छोटा है -- ऐसा विचार हो ही नहीं सकता। कर्मका बड़ा या छोटा होना फलकी इच्छाके कारण ही दीखता है? जब कि कर्मयोगमें फलेच्छाका त्याग होता है। ,कर्म करना रागपूर्तिके लिये भी होता है और रागनिवृत्तिके लिये भी। कर्मयोगी रागनिवृत्तिके लिये अर्थात् करनेका राग मिटानेके लिये ही सम्पूर्ण कर्तव्यकर्म करता है -- आरुरुक्षोर्मुनेर्योगं कर्म कारणमुच्यते (गीता 6। 3)? न कर्मणामनारम्भान्नैष्कर्म्यं पुरुषोऽश्नुते (गीता 3। 4)। अपने लिये कर्म करनेसे करनेका राग बढ़ता है। इसलिये कर्मयोगी कोई भी कर्म अपने लिये नहीं करता? प्रत्युत केवल दूसरोंके हितके लिये ही करता है। उसके स्थूलशरीरमें होनेवाली क्रिया? सूक्ष्मशरीरमें होनेवाला परहितचिन्तन तथा कारणशरीरमें होनेवाली स्थिरता -- तीनों ही दूसरोंके हितके लिये होती हैं? अपने लिये नहीं। इसलिये उसका करनेका राग सुगमतासे मिट जाता है। परमात्मतत्त्वकी प्राप्तिमें संसारका राग ही बाधक है। अतः राग मिटनेपर कर्मयोगीको परमात्मतत्त्वकी प्राप्ति अपनेआप हो जाती है (गीता 4। 38)।कर्तव्य शब्दका अर्थ होता है -- जिसको हम कर सकते हैं तथा जिसको जरूर करना चाहिये और जिसको करनेसे उद्देश्यकी सिद्धि जरूर होती है। उद्देश्य वही कहलाता है? जो नित्यसिद्ध और अनुत्पन्न है अर्थात् जो अनादि है और जिसका कभी विनाश नहीं होता। उस उद्देश्यकी सिद्धि मनुष्यजन्ममें ही होती है और उसकी सिद्धिके लिये ही मनुष्यशरीर मिला है? न कि कर्मजन्य परिस्थितिरूप सुखदुःख भोगनेके लिये। कर्मजन्य परिस्थिति वह होती है? जो उत्पन्न और नष्ट होती हो। वह परिस्थिति तो मनुष्यके अलावा पशुपक्षी? कीटपतङ्ग? वृक्षलता? नारकीयस्वर्गीय आदि योनियोंके प्राणियोंको भी मिलती है? जहाँ कर्तव्यका कोई प्रश्न ही नहीं है और जहाँ उद्देश्यकी पूर्तिका अधिकार भी नहीं है।भगवान्के द्वारा अपने मतको निश्चितम् कहनेका तात्पर्य है कि इस मतमें सन्देहकी कोई गुंजाइश नहीं है? यह मत अटल है अर्थात् यह किञ्चिन्मात्र भी इधरउधर नहीं हो सकता और उत्तमम् कहनेका तात्पर्य है कि,इस मतमें शास्त्रीय दृष्टिसे कोई कमी नहीं है? प्रत्युत यह पूर्णताको प्राप्त करानेवाला है। सम्बन्ध -- इसी अध्यायके चौथे श्लोकमें भगवान्ने तीन प्रकारके त्यागकी बात कही थी। अब आगेके तीन श्लोकोंमें उसी त्रिविध त्यागका वर्णन करते हैं।
।।18.6।।हे पार्थ ! (पूर्वोक्त यज्ञ, दान और तप -- ) इन कर्मोंको तथा दूसरे भी कर्मोंको आसक्ति और फलोंका त्याग करके करना चाहिये -- यह मेरा निश्चित किया हुआ उत्तम मत है।
नियतस्य तु संन्यासः कर्मणो नोपपद्यते। मोहात्तस्य परित्यागस्तामसः परिकीर्तितः ॥
।।18.7।। व्याख्या -- [तीन तरहके त्यागका वर्णन भगवान् इसलिये करते हैं कि अर्जुन कर्मोंका स्वरूपसे त्याग करना चाहते थे -- श्रेयो भोक्तुं भैक्ष्यमपीह लोके (गीता 2। 5) अतः त्रिविध त्याग बताकर अर्जुनको चेत कराना था? और आगेके लिये मनुष्यमात्रको यह बताना था कि नियत कर्मोंका स्वरूपसे त्याग करना भगवान्को मान्य (अभीष्ट) नहीं है। भगवान् तो सात्त्विक त्यागको ही वास्तवमें त्याग मानते हैं। सात्त्विक त्यागसे संसारके सम्बन्धका सर्वथा विच्छेद हो जाता है।दूसरी बात? सत्रहवें अध्यायमें भी भगवान् गुणोंके अनुसार श्रद्धा? आहार आदिके तीनतीन भेद कहकर आये हैं? इसलिये यहाँ भी अर्जुनद्वारा त्यागका तत्त्व पूछनेपर भगवान्ने त्यागके तीन भेद कहे हैं।]नियतस्य तु संन्यासः कर्मणो नोपपद्यते -- पूर्वश्लोकमें भगवान्ने त्यागके विषयमें अपना जो निश्चित उत्तम मत बताया है? उससे यह तामस त्याग बिलकुल ही विपरीत है और सर्वथा निकृष्ट है? यह बतानेके लिये यहाँ तु पद आया है।नियत कर्मोंका त्याग करना कभी भी उचित नहीं है क्योंकि वे तो अवश्यकर्तव्य हैं। बलिवैश्वदेव आदि यज्ञ करना? कोई अतिथि आ जाय तो गृहस्थधर्मके अनुसार उसको अन्न? जल आदि देना? विशेष पर्वमें या श्राद्धतर्पणके दिन ब्राह्मणोंको भोजन कराना और दक्षिणा देना? अपने वर्णआश्रमके अनुसार प्रातः और सांयकालमें सन्ध्या करना आदि कर्मोंको न मानना और न करना ही नियत कर्मोंका त्याग है।मोहात्तस्य परित्यागस्तामसः परिकीर्तितः -- ऐसे नियत कर्मोंको मूढ़तासे अर्थात् बिना विवेकविचारके छोड़ देना तामस त्याग कहा जाता है। सत्सङ्ग? सभा? समिति आदिमें जाना आवश्यक था? पर आलस्यमें पड़े रहे? आराम करने लग गये अथवा सो गये घरमें मातापिता बीमार हैं? उनके लिये वैद्यको बुलाने या औषधि लानेके लिये जा रहे थे? रास्तेमें कहींपर लोग ताशचौपड़ आदि खेल रहे थे? उनको देखकर खुद भी खेलमें लग गये और वैद्यको बुलाना या ओषधि लाना भूल गये कोर्टमें मुकदमा चल रहा है? उसमें हाजिर होनेके समय हँसीदिल्लगी? खेलतमाशा आदिमें लग गये और समय बीत गया शरीरके लिये शौचस्नान आदि जो आवश्यक कर्तव्य हैं? उनको आलस्य और प्रमादके कारण छोड़ दिया -- यह सब तामस त्यागके उदाहरण हैं।विहित कर्म और नियत कर्ममें क्या अन्तर है शास्त्रोंने जिन कर्मोंको करनेकी आज्ञा दी है? वे सभी विहित कर्म कहलाते हैं। उन सम्पूर्ण विहित कर्मोंका पालन एक व्यक्ति कर ही नहीं सकता क्योंकि शास्त्रोंमें सम्पूर्ण वारों तथा तिथियोंके व्रतका विधान आता है। यदि एक ही मनुष्य सब वारोंमें या सब तिथियोंमें व्रत करेगा तो फिर वह भोजन कब करेगा इससे यह सिद्ध हुआ कि मनुष्यके लिये सभी विहित कर्म लागू नहीं होते। परन्तु उन विहित कर्मोंमें भी वर्ण? आश्रम और परिस्थितिके अनुसार जिसके लिये जो कर्तव्य आवश्यक होता है? उसके लिये वह नियत कर्म कहलाता है। जैसे ब्राह्मण? क्षत्रिय? वैश्य और शूद्र -- चारों वार्णोंमें जिसजिस वर्णके लिये जीविका और शरीरनिर्वाहसम्बन्धी जितने भी नियम हैं? उसउस वर्णके लिये वे सभी नियत कर्म हैं।नियत कर्मोंका मोहपूर्वक त्याग करनेसे वह त्याग तामस हो जाता है तथा सुख और आरामके लिये त्याग,करनेसे वह त्याग राजस हो जाता है। सुखेच्छा? फलेच्छा तथा आसक्तिका त्याग करके नियत कर्मोंको करनेसे वह त्याग सात्त्विक हो जाता है। तात्पर्य यह है कि मोहमें उलझ जाना तामस पुरुषका स्वभाव है? सुखआराममें उलझ जाना राजस पुरुषका स्वभाव है और इन दोनोंसे रहित होकर सावधानीपूर्वक निष्कामभावसे कर्तव्यकर्म करना सात्त्विक पुरुषका स्वभाव है। इस सात्त्विक स्वभाव अथवा सात्त्विक त्यागसे ही कर्म और कर्मफलसे सम्बन्धविच्छेद होता है। राजस और तामस त्यागसे नहीं क्योंकि राजस और तामस त्याग वास्तवमें त्याग है ही नहीं।लोग सामान्य रीतिसे स्वरूपसे कर्मोंको छोड़ देनेको ही त्याग मानते हैं क्योंकि उन्हें प्रत्यक्षमें वही त्याग दीखता है। कौन व्यक्ति कौनसा काम किस भावसे कर रहा है? इसका उन्हें पता नहीं लगता। परन्तु भगवान् भीतरकी कामनाममताआसक्तिके त्यागको ही त्याग मानते हैं क्योंकि ये ही जन्ममरणके कारण हैं (गीता 13। 21)।यदि बाहरके त्यागको ही असली त्याग माना जाय तो सभी मरनेवालोंका कल्याण हो जाना चाहिये क्योंकि उनकी तो सम्पूर्ण वस्तुएँ छूट जाती हैं और तो क्या? अपना कहलानेवाला शरीर भी छूट जाता है और उनको वे वस्तुएँ प्रायः यादतक नहीं रहतीं अतः भीतरका त्याग ही असली त्याग है। भीतरका त्याग होनेसे बाहरसे वस्तुएँ अपने पास रहें या न रहें? मनुष्य उनसे बँधता नहीं।
।।18.7।।नियत कर्मका तो त्याग करना उचित नहीं है। उसका मोहपूर्वक त्याग करना तामस कहा गया है।
दुःखमित्येव यत्कर्म कायक्लेशभयात्त्यजेत्। स कृत्वा राजसं त्यागं नैव त्यागफलं लभेत् ॥
।।18.8।। व्याख्या -- दुःखमित्येव यत्कर्म -- यज्ञ? दान आदि शास्त्रीय नियत कर्मोंको करनेमें केवल दुःख ही भोगना पड़ता है? और उनमें है ही क्या क्योंकि उन कर्मोंको करनेके लिये अनेक नियमोंमें बँधना पड़ता है और खर्चा भी करना पड़ता है -- इस प्रकार राजस पुरुषको उन कर्मोंमें केवल दुःखहीदुःख दीखता है। दुःख दीखनेका कारण यह है कि उनका परलोकपर? शास्त्रोंपर? शास्त्रविहित कर्मोंपर और उन कर्मोंके परिणामपर श्रद्धाविश्वास नहीं होता।,कायक्लेशभयात्त्यजेत् -- राजस मनुष्यको शास्त्रमर्यादा और लोकमर्यादाके अनुसार चलनेसे शरीरमें क्लेश अर्थात् परिश्रमका अनुभव होता है (टिप्पणी प0 876)। राजस मनुष्यको अपने वर्ण? आश्रम आदिके धर्मका पालन करनेमें और मातापिता? गुरु? मालिक आदिकी आज्ञाका पालन करनेमें पराधीनता और दुःखका अनुभव होता है तथा उनकी आज्ञा भङ्ग करके जैसी मरजी आये? वैसा करनेमें स्वाधीनता और सुखका अनुभव होता है। राजस मनुष्योंके विचार यह होते हैं कि गृहस्थमें आराम नहीं मिलता? स्त्रीपुत्र आदि हमारे अनुकूल नहीं हैं अथवा सब कुटुम्बी मर गये हैं? घरमें काम करनेके लिये कोई रहा नहीं? खुदको तकलीफ उठानी पड़ती है? इसलिये साधु बन जायँ तो आरामसे रहेंगे? रोटी? कपड़ा आदि सब चीजें मुफ्तमें मिल जायँगी? परिश्रम नहीं करना पड़ेगा कोई ऐसी सरकारी नौकरी मिल जाय? जिससे काम कम करना पड़े और रुपये आरामसे मिलते रहें? हम काम न करें तो भी उस नौकरीसे हमें कोई छुड़ा न सके? हम नौकरी छोड़ देंगे तो हमें पेंशन मिलती रहेगी? इत्यादि। ऐसे विचारोंके कारण उन्हें घरका कामधन्धा करना अच्छा नहीं लगता और वे उसका त्याग कर देते हैं।यहाँ शङ्का होती है कि ज्ञानप्राप्तिके साधनोंमें दुःख और दोषको बारबार देखनेकी बात कही है (गीता 13। 8) और यहाँ कर्मोंमें दुःख देखकर उनका त्याग करनेको राजस त्याग कहा है अर्थात् कर्मोंके त्यागका निषेध किया है -- इन दोनों बातोंमें परस्पर विरोध प्रतीत होता है। इसका समाधान है कि वास्तवमें इन दोनोंमें विरोध नहीं है? प्रत्युत इन दोनोंका विषय अलगअलग है। वहाँ (गीता 13। 8 में) भोगोंमें दुःख और दोषको देखनेकी बात है और यहाँ नियत कर्तव्यकर्मोंमें दुःखको देखनेकी बात है। इसलिये वहाँ भोगोंका त्याग करनेका विषय है और यहाँ कर्तव्यकर्मोंका त्याग करनेका विषय है। भोगोंका तो त्याग करना चाहिये? पर कर्तव्यकर्मोंका त्याग कभी नहीं करना चाहिये। कारण कि जिन भोगोंमें सुखबुद्धि और गुणबुद्धि हो रही है? उन भोगोंमें बारबार दुःख और दोषको देखनेसे भोगोंसे वैराग्य होगा? जिससे परमात्मतत्त्वकी प्राप्त होगी परन्तु नियत कर्तव्यकर्मोंमें दुःख देखकर उन कर्मोंका त्याग करनेसे सदा पराधीनता और दुःख भोगना पड़ेगा -- यज्ञार्थात् कर्मणोऽन्यत्र लोकोऽयं कर्मबन्धनः (गीता 3। 9)। तात्पर्य यह हुआ कि भोगोंमें दुःख और दोष देखनेसे भोगासक्ति छूटेगी? जिससे कल्याण होगा और कर्तव्यमें दुःख देखनेसे कर्तव्य छूटेगा? जिससे पतन होगा।कर्तव्यकर्मोंका त्याग करनेमें तो राजस और तामस -- ये दो भेद होते हैं? पर परिणाम(आलस्य? प्रमाद? अतिनिद्रा आदि) में दोनों एक हो जाते हैं अर्थात् परिणाममें दोनों ही तामस हो जाते हैं? जिसका फल अधोगति होता है -- अधो गच्छन्ति तामसाः (गीता 14। 18)।एक शङ्का यह भी हो सकती है कि सत्सङ्ग? भगवत्कथा? भक्तचरित्र सुननेसे किसीको वैराग्य हो जाय तो वह प्रभुको पानेके लिये आवश्यक कर्तव्यकर्मोंको भी छोड़ देता है और केवल भगवान्के भजनमें लग जाता है। इसलिये उसका वह कर्तव्यकर्मोंका त्याग राजस कहा जाना चाहिये ऐसी बात नहीं है। सांसारिक कर्मोंको छोड़कर जो भजनमें लग जाता है? उसका त्याग राजस या तामस नहीं हो सकता। कारण कि भगवान्को प्राप्त करना मनुष्यजन्मका ध्येय है अतः उस ध्येयकी सिद्धिके लिये कर्तव्यकर्मोंका त्याग करना वास्तवमें कर्तव्यका त्याग करना नहीं है? प्रत्युत असली कर्तव्यको करना है। उस असली कर्तव्यको करते हुए आलस्य? प्रमाद आदि दोष नहीं आ सकते क्योंकि उसकी रुचि भगवान्में रहती है। परन्तु राजस और तामस त्याग करनेवालोंमें आलस्य? प्रमाद आदि दोष आयेंगे ही क्योंकि उसकी रुचि भोगोंमें रहती है।स कृत्वा राजसं त्यागं नैव त्यागफलं लभेत् -- त्यागका फल शान्ति है। राजस मनुष्य त्याग करके भी त्यागके फल(शान्ति) को नहीं पाता। कारण कि उसने जो त्याग किया है? वह अपने सुखआरामके लिये ही किया है। ऐसा त्याग तो पशुपक्षी आदि भी करते हैं। अपने सुखआरामके लिये शुभकर्मोंका त्याग करनेसे राजस मनुष्यको शान्ति तो नहीं मिलती? पर शुभकर्मोंके त्यागका फल दण्डरूपसे जरूर भोगना पड़ता है।
।।18.8।।जो कुछ कर्म है, वह दुःखरूप ही है -- ऐसा समझकर कोई शारीरिक क्लेशके भयसे उसका त्याग कर दे, तो वह राजस त्याग करके भी त्यागके फलको नहीं पाता।
कार्यमित्येव यत्कर्म नियतं क्रियतेऽर्जुन। सङ्गं त्यक्त्वा फलं चैव स त्यागः सात्त्विको मतः ॥
।।18.9।। व्याख्या -- कार्यमित्येव यत्कर्म नियतं क्रियतेऽर्जुन -- यहाँ कार्यम् पदके साथ इति और एव ये दो अव्यय लगानेसे यह अर्थ निकलता है कि केवल कर्तव्यमात्र करना है। इसको करनेमें कोई फलासक्ति नहीं? कोई स्वार्थ नहीं और कोई क्रियाजन्य सुखभोग भी नहीं। इस प्रकार कर्तव्यमात्र करनेसे कर्ताका उस कर्मसे सम्बन्धविच्छेद हो जाता है। ऐसा होनेसे वह कर्म बन्धनकारक नहीं होता अर्थात् संसारके साथ सम्बन्ध नहीं जुड़ता। कर्म तथा उसके फलमें आसक्त होनेसे ही बन्धन होता है -- फले सक्तो निबध्यते (गीता 5। 12)।शास्त्रविहित कर्मोंमें भी देश? काल? वर्ण? आश्रम? परिस्थितिके अनुसार जिसजिस कर्ममें जिसजिसकी नियुक्ति की जाती है? वे सब नियत कर्म कहलाते हैं जैसे -- साधुको ऐसा करना चाहिये? गृहस्थको ऐसा करना चाहिये? ब्राह्मणको अमुक काम करना चाहिये? क्षत्रियको अमुक काम करना चाहिये इत्यादि। उन कर्मोंको प्रमाद? आलस्य? उपेक्षा? उदासीनता आदि दोषोंसे रहित होकर तत्परता और उत्साहपूर्वक करना चाहिये। इसीलिये भगवान् कर्मयोगके प्रसङ्गमें जगहजगह समाचर शब्द दिया है (गीता 3। 9? 19)।सङ्गं त्यक्त्वा फलं चैव -- सङ्गके त्यागका तात्पर्य है कि कर्म? कर्म करनेके औजार (साधन) आदिमें आसक्ति? प्रियता? ममता आदि न हो और फलके त्यागका तात्पर्य है कि कर्मके परिणामके साथ सम्बन्ध न हो अर्थात् फलकी इच्छा न हो। इन दोनोंका तात्पर्य है कि कर्म और फलमें आसक्ति तथा इच्छाका त्याग हो।स त्यागः सात्त्विको मतः (टिप्पणी प0 877) -- कर्म और फलमें आसक्ति तथा कामनाका त्याग करके कर्तव्यमात्र समझकर कर्म करनेसे वह त्याग सात्त्विक हो जाता है। राजस त्यागमें कायक्लेशके भयसे और,तामस त्यागमें मोहपूर्वक कर्मोंका स्वरुपसे त्याग किया जाता है परन्तु सात्त्विक त्यागमें कर्मोंका स्वरूपसे त्याग नहीं किया जाता? प्रत्युत कर्मोंको सावधानी एवं तत्परतासे? विधिपूर्वक? निष्कामभावसे किया जाता है। सात्त्विक त्यागसे कर्म और कर्मफलरूप शरीरसंसारसे सम्बन्धविच्छेद हो जाता है। राजस और तामस त्यागमें कर्मोंका स्वरूपसे त्याग करनेसे केवल बाहरसे कर्मोंसे सम्बन्धविच्छेद दीखता है परन्तु वास्तवमें (भीतरसे) सम्बन्धविच्छेद नहीं होता। इसका कारण यह है कि शरीरके कष्टके भयसे कर्मोंका त्याग करनेसे कर्म तो छूट जाते हैं? पर अपने सुख और आरामके साथ सम्बन्ध जुड़ा ही रहता है। ऐसे ही मोहपूर्वक कर्मोंका त्याग करनेसे कर्म तो छूट जाते हैं? पर मोहके साथ सम्बन्ध जुड़ा रहता है। तात्पर्य यह हुआ कि कर्मोंका स्वरूपसे त्याग करनेपर बन्धन होता है और कर्मोंको तत्परतासे विधिपूर्वक करनेपर मुक्ति (सम्बन्धविच्छेद) होती है। सम्बन्ध -- छठे श्लोकमें एतानि और अपि तु पदोंसे कहे गये यज्ञ? दान? तप आदि शास्त्रविहित कर्मोंके करनेमें और शास्त्रनिषिद्ध तथा काम्य कर्मोंका त्याग करनेमें क्या भाव होना चाहिये यह आगेके श्लोकमें बताते हैं।
।।18.9।।हे अर्जुन ! 'केवल कर्तव्यमात्र करना है' -- ऐसा समझकर जो नियत कर्म आसक्ति और फलका त्याग करके किया जाता है, वही सात्त्विक त्याग माना गया है।
न द्वेष्ट्यकुशलं कर्म कुशले नानुषज्जते। त्यागी सत्त्वसमाविष्टो मेधावी छिन्नसंशयः ॥
।।18.10।। व्याख्या -- न द्वेष्ट्यकुशलं कर्म -- जो शास्त्रविहित शुभकर्म फलकी कामनासे किये जाते हैं और परिणाममें जिनसे पुनर्जन्म होता है (गीता 2। 42 -- 44 9। 20 -- 21) तथा जो शास्त्रनिषिद्ध पापकर्म हैं और परिणाममें जिनसे नीच योनियों तथा नरकोंमें जाना पड़ता है (गीता 16। 7 -- 20)? वे सबकेसब कर्म अकुशल कहलाते हैं। साधक ऐसे अकुशल कर्मोंका त्याग तो करता है? पर द्वेषपूर्वक नहीं। कारण कि द्वेषपूर्वक त्याग करनेसे कर्मोंसे तो सम्बन्ध छूट जाता है? पर द्वेषके साथ सम्बन्ध जुड़ जाता है? जो शास्त्रविहित काम्यकर्मोंसे तथा शास्त्रनिषिद्ध पापकर्मोंसे भी भयंकर है।कुशले नानुषज्जते -- शास्त्रविहित कर्मोंमें भी जो वर्ण? आश्रम? परिस्थिति आदिके अनुसार नियत हैं और जो आसक्ति तथा फलेच्छाका त्याग करके किये जाते हैं तथा परिणाममें जिनसे मुक्ति होती है? ऐसे सभी कर्म कुशल कहलाते हैं। साधक ऐसे कुशल कर्मोंको करते हुए भी उनमें आसक्त नहीं होता।त्यागी -- कुशल कर्मोंके करनेमें जिसका राग नहीं होता और अकुशल कर्मोंके त्यागमें जिसका द्वेष नहीं होता? वही असली त्यागी है (टिप्पणी प0 878)। परन्तु वह त्याग पूर्णतया तब सिद्ध होता है? जब कर्मोंको करने अथवा न करनेसे अपनेमें कोई फरक न पड़े अर्थात् निरन्तर निर्लिप्तता बनी रहे (गीता 3। 18 4। 18)। ऐसा होनेपर साधक योगारूढ़ हो जाता है (गीता 6। 4)।मेधावी -- जिसके सम्पूर्ण कार्य साङ्गोपाङ्ग होते हैं और संकल्प तथा कामनासे रहित होते हैं तथा ज्ञानरूप अग्निसे जिसने सम्पूर्ण कर्मोंको भस्म कर दिया है? उसे पण्डित भी पण्डित (मेधावी अथवा बुद्धिमान्) कहते हैं (गीता 4। 19)। कारण कि कर्मोंको करते हुए भी कर्मोंसे लिपायमान न होना बड़ी बुद्धिमत्ता है।इसी मेधावीको चौथे अध्यायके अठारहवें श्लोकमें स बुद्धिमान्मनुष्येषु पदोंसे सम्पूर्ण मनुष्योंमें बुद्धिमान् बताया गया है।छिन्नसंशयः -- उस त्यागी पुरुषमें कोई सन्देह नहीं रहता। तत्त्वमें अभिन्नभावसे स्थित रहनेके कारण उसमें किसी तरहका संदेह रहनेकी सम्भावना ही नहीं रहती। सन्देह तो वहीं रहता है? जहाँ अधूरा ज्ञान होता है अर्थात् कुछ जानते हैं और कुछ नहीं जानते।सत्त्वसमाविष्टः -- आसक्ति आदिका त्याग होनेसे उसकी अपने स्वरूपमें? चिन्मयतामें स्वतः स्थिति हो जाती है। इसलिये उसे सत्त्वसमाविष्टः कहा गया है। इसीको पाँचवें अध्यायके उन्नीसवें श्लोकमें तस्माद्ब्रह्मणि ते,स्थिताः पदोंसे परमात्मामें स्थित बताया गया है। सम्बन्ध -- कर्मोंको करनेमें राग न हो और छोड़नेमें द्वेष न हो -- इतनी झंझट क्यों की जाय कर्मोंका सर्वथा ही त्याग क्यों न कर दिया जाय -- इस शङ्काको दूर करनेके लिये आगेका श्लोक कहते हैं।
।।18.10।।जो अकुशल कर्मसे द्वेष नहीं करता और कुशल कर्ममें आसक्त नहीं होता, वह त्यागी, बुद्धिमान्, सन्देहरहित और अपने स्वरूपमें स्थित है।
न हि देहभृता शक्यं त्यक्तुं कर्माण्यशेषतः। यस्तु कर्मफलत्यागी स त्यागीत्यभिधीयते ॥
।।18.11।। व्याख्या -- न हि देहभृता (टिप्पणी प0 879.1) शक्यं त्यक्तुं कर्माण्यशेषतः -- देहधारी अर्थात् देहके साथ तादात्म्य रखनेवाले मनुष्योंके द्वारा कर्मोंका सर्वथा त्याग होना सम्भव नहीं है क्योंकि शरीर प्रकृतिका कार्य है और प्रकृति स्वतः क्रियाशील है। अतः शरीरके साथ तादात्म्य (एकता) रखनेवाला क्रियासे रहित कैसे हो सकता है हाँ? यह हो सकता है कि मनुष्य यज्ञ? दान? तप? तीर्थ आदि कर्मोंको छोड़ दे परन्तु वह खानापीना? चलनाफिरना? आनाजाना? उठनाबैठना? सोनाजागना आदि आवश्यक शारीरिक क्रियाओंको कैसे छोड़ सकता हैदूसरी बात? भीतरसे कर्मोंका सम्बन्ध छोड़ना ही वास्तवमें छोड़ना है। बाहरसे सम्बन्ध नहीं छोड़ा जा सकता। यदि बाहरसे सम्बन्ध छोड़ भी दिया जाय तो वह कबतक छूटा रहेगा जैसे कोई समाधि लगा ले तो उस समय बाहरकी क्रियाओंका सम्बन्ध छूट जाता है। परन्तु समाधि भी एक क्रिया है? एक कर्म है क्योंकि इसमें प्रकृतिजन्य कारणशरीरका सम्बन्ध रहता है। इसलिये समाधिसे भी व्युत्थान होता है।कोई भी देहधारी मनुष्य कर्मोंका स्वरूपसे सम्बन्धविच्छेद नहीं कर सकता (गीता 3। 5)। कर्मोंका आरम्भ किये बिना? निष्कर्मता (योगनिष्ठा) प्राप्त नहीं होती और कर्मोंका त्याग करनेमात्रसे सिद्धि (सांख्यनिष्ठा) भी प्राप्त नहीं होती (गीता 3। 4)।मार्मिक बातपुरुष (चेतन) सदा निर्विकार और एकरस रहनेवाला है परन्तु प्रकृति विकारी और सदा परिवर्तनशील है। जिसमें अच्छी रीतिसे क्रियाशीलता हो? उसको प्रकृति कहते हैं -- प्रकर्षेण करणं (भावे ल्युट्) इति प्रकृतिः।उस प्रकृतिके कार्य शरीरके साथ जबतक पुरुष अपना सम्बन्ध (तादात्म्य) मानता रहेगा? तबतक वह कर्मोंका सर्वथा त्याग कर ही नहीं सकता। कारण कि शरीरमें अहंताममता होनेके कारण मनुष्य शरीरसे होनेवाली प्रत्येक क्रियाको अपनी क्रिया मानता है? इसलिये वह कभी किसी अवस्थामें भी क्रियारहित नहीं हो सकता।दूसरी बात? केवल पुरुषने ही प्रकृतिके साथ अपना सम्बन्ध जोड़ा है। प्रकृतिने पुरुषके साथ सम्बन्ध नहीं जोड़ा है। जहाँ विवेक रहता है? वहाँ पुरुषने विवेककी उपेक्षा करके प्रकृतिसे सम्बन्धकी सद्भावना कर ली अर्थात् सम्बन्धको सत्य मान लिया। सम्बन्धको सत्य माननेसे ही बन्धन हुआ है। वह सम्बन्ध दो तरहका होता है -- अपनेको शरीर मानना और शरीरको अपना मानना। अपनेको शरीर माननेसे अहंता और शरीरको अपना माननेसे ममता होती है। इस अहंताममतारूप सम्बन्धका घनिष्ठ होना ही देहधारीका स्वरूप है। ऐसा देहधारी मनुष्य कर्मोंको सर्वथा नहीं छोड़ सकता।यस्तु (टिप्पणी प0 879.2) कर्मफलत्यागी स त्यागीत्यभिधीयते -- जो किसी भी कर्म और फलके साथ अपना सम्बन्ध नहीं रखता? वही त्यागी है। जबतक मनुष्य कुशलअकुशलके साथ? अच्छेमन्देके साथ अपना सम्बन्ध रखता है? तबतक वह त्यागी नहीं है।यह पुरुष जिस प्राकृत क्रिया और पदार्थको अपना मानता है? उसमें उसकी प्रियता हो जाती है। उसी,प्रियताका नाम है -- आसक्ति। यह आसक्ति ही वर्तमानके कर्मोंको लेकर कर्मासक्ति और भविष्यमें मिलनेवाले फलकी इच्छाको लेकर फलासक्ति कहलाती है। जब मनुष्य फलत्यागका उद्देश्य बना लेता है? तब उसके सब कर्म संसारके हितके लिये होने लगते हैं? अपने लिये नहीं। कारण कि उसको यह बात अच्छी तरहसे समझमें आ जाती है कि कर्म करनेकी सबकीसब सामग्री संसारसे मिली है और संसारकी ही है? अपनी नहीं। इन कर्मोंका भी आदि और अन्त होता है तथा उनका फल भी उत्पन्न और नष्ट होनेवाला होता है परन्तु स्वयं सदा निर्विकार रहता है न उत्पन्न होता है? न नष्ट होता है और न कभी विकृत ही होता है। ऐसा विवेक होनेपर फलेच्छाका त्याग सुगमतासे हो जाता है। फलका त्याग करनेमें उस विवेककी मनुष्यमें कभी अभिमान भी नहीं आता क्योंकि कर्म और उसका फल -- दोनों ही अपनेसे प्रतिक्षण वियुक्त हो रहे हैं अतः उनके साथ हमारा सम्बन्ध वास्तवमें है ही कहाँ इसीलिये भगवान् कहते हैं कि जो कर्मफलका त्यागी है? वही त्यागी कहा जाता है।निर्विकारका विकारी कर्मफलके साथ सम्बन्ध कभी था नहीं? है नहीं? हो सकता नहीं और होनेकी सम्भावना भी नहीं है। केवल अविवेकके कारण सम्बन्ध माना हुआ था। उस अविवेकके मिटनेसे मनुष्यकी अभिधा अर्थात् उसका नाम त्यागी हो जाता है -- स त्यागीत्यभिधीयते। माने हुए सम्बन्धके विषयमें दृष्टान्तरूपसे एक बात कही जाती है। एक व्यक्ति घरपरिवारको छोड़कर सच्चे हृदयसे साधुसंन्यासी हो जाता है तो उसके बाद घरवालोंकी कितनी ही उन्नति अथवा अवनति हो जाय अथवा सबकेसब मर जायँ? उनका नामोनिशान भी न रहे? तो भी उसपर कोई असर नहीं पड़ता। इसमें विचार करें कि उस व्यक्तिका परिवारके साथ जो सम्बन्ध था? वह दोनों तरफसे माना हुआ था अर्थात् वह परिवारको अपना मानता था और परिवार उसको अपना मानता था। परन्तु पुरुष और प्रकृतिका सम्बन्ध केवल पुरुषकी तरफसे माना हुआ है? प्रकृतिकी तरफसे माना हुआ नहीं जब दोनों तरफसे माना हुआ (व्यक्ति और परिवारका) सम्बन्ध भी एक तरफसे छोड़नेपर छूट जाता है? तब केवल एक तरफसे माना हुआ (पुरुष और प्रकृतिका) सम्बन्ध छोड़नेपर छूट जाय? इसमें कहना ही क्या है सम्बन्ध -- पूर्वश्लोकमें कहा गया कि कर्मफलका त्याग करनेवाला ही वास्तवमें त्यागी है। अगर मनुष्य कर्मफलका त्याग न करे तो क्या होता है -- इसे आगेके श्लोकमें बताते हैं।
।।18.11।।कारण कि देहधारी मनुष्यके द्वारा सम्पूर्ण कर्मोंका त्याग करना सम्भव नहीं है। इसलिये जो कर्मफलका त्यागी है, वही त्यागी है -- ऐसा कहा जाता है।
अनिष्टमिष्टं मिश्रं च त्रिविधं कर्मणः फलम्। भवत्यत्यागिनां प्रेत्य न तु संन्यासिनां क्वचित् ॥
।।18.12।। व्याख्या -- अनिष्टमिष्टं मिश्रं च त्रिविधं कर्मणः फलम् -- कर्मका फल तीन तरहका होता है -- इष्ट? अनिष्ट और मिश्र। जिस परिस्थितिको मनुष्य चाहता है? वह इष्ट कर्मफल है? जिस परिस्थितिको मनुष्य नहीं चाहता? वह अनिष्ट कर्मफल है और जिसमें कुछ भाग इष्टका तथा कुछ भाग अनिष्टका है? वह मिश्र कर्मफल है। वास्तवमें देखा जाय तो संसारमें प्रायः मिश्रित ही फल होता है जैसे -- धन होनेसे अनुकूल (इष्ट) और प्रतिकूल (अनिष्ट) -- दोनों ही परिस्थितियाँ आती हैं धनसे निर्वाह होता है -- यह अनुकूलता है और टैक्स लगता है? धन नष्ट हो जाता है? छिन जाता है -- यह प्रतिकूलता है। तात्पर्य है कि इष्टमें भी आंशिक अनिष्ट और अनिष्टमें भी आंशिक इष्ट रहता ही है। कारण कि सम्पूर्ण संसार त्रिगुणात्मक है (गीता 18। 40) यह जन्म भी दुःखालय (8। 15) और सुखरहित (9। 33)। अतः चाहे इष्ट (अनुकूल) परिस्थिति हो? चाहे अनिष्ट (प्रतिकूल) परिस्थिति हो? वह सर्वथा अनुकूल या प्रतिकूल होती ही नहीं। यहाँ इष्ट और अनिष्ट कहनेका मतलब यह है कि इष्टमें अनुकूलताकी और अनिष्टमें प्रतिकूलताकी प्रधानता होती है। वास्तवमें कर्मोंका फल मिश्रित ही होता है क्योंकि कोई भी कर्म सर्वथा निर्दोष नहीं होता (18। 48)।भवत्यत्यागिनां प्रेत्य -- उपर्युक्त सभी फल अत्यागियोंको अर्थात् फलकी इच्छा रखकर कर्म करनेवालोंको ही मिलते हैं? संन्यासियोंको नहीं। कारण कि जितने भी कर्म होते हैं? वे सब प्रकृतिके द्वारा अर्थात् प्रकृतिके कार्य शरीर? इन्द्रियाँ? मन और बुद्धिके द्वारा ही होते हैं तथा फलरूप परिस्थिति भी प्रकृतिके द्वारा ही बनती है।,इसलिये कर्मोंका और उनके फलोंका सम्बन्ध केवल प्रकृतिके साथ है? स्वयं(चेतन स्वरूप) के साथ नहीं। परन्तु जब स्वयं उनसे सम्बन्ध तोड़ लेता है? तो फिर वह भोगी नहीं बनता? प्रत्युत त्यागी हो जाता है।अत्यागीका मतलब है -- पीछेके दो (दसवेंग्यारहवें) श्लोकोंमें जिन त्यागियोंकी बात आयी है? उनके समान जो त्यागी नहीं है अर्थात् जिन्होंने कर्मफलका त्याग नहीं किया है? ऐसे अत्यागी मनुष्योंके सामने इष्ट? अनिष्ट और मिश्र -- तीनों कर्मफल अनुकल या प्रतिकूल परिस्थितिके रूपमें आते रहते हैं? जिनसे वे सुखीदुःखी होते रहते हैं। उनसे सुखीदुःखी होना ही वास्तवमें बन्धन है।वास्तवमें अनुकूलतासे सुखी होना ही प्रतिकूलतामें दुःखी होनेका कारण है क्योंकि परिस्थितिजन्य सुख भोगनेवाला कभी दुःखसे बच ही नहीं सकता। जबतक वह सुख भोगता रहेगा? तबतक वह प्रतिकूल परिस्थितियोंमें दुःखी होता ही रहेगा। चिन्ता? शोक? भय? उद्वेग आदि उसको कभी छोड़ नहीं सकते और वह भी इनसे कभी छूट नहीं सकता।प्रेत्य भवति कहनेका तात्पर्य है कि जो कर्मफलके त्यागी नहीं हैं? उनको इष्ट? अनिष्ट और मिश्र -- ये तीनों कर्मफल मरनेके बाद जरूर मिलते हैं। परन्तु इसके साथ न तु संन्यासिनां क्वचित् पदोंमें कहा गया है कि जो कर्मफलके त्यागी हैं? उनको कहीं भी अर्थात् यहाँ और मरनेके बाद भी कर्मफल नहीं मिलता। इससे सिद्ध होता है कि अत्यागियोंको मरनेके बाद तो कर्मफल मिलता ही है? पर यहाँ जीतेजी भी कर्मफल मिल सकता है।न तु संन्यासिनां क्वचित् -- संन्यासियों(त्यागियों) को कहीं भी अर्थात् इस लोकमें या परलोकमें? इस जन्ममें या मरनेके बाद भी कर्मफल भोगना नहीं पड़ता। हाँ? पूर्वजन्ममें किये हुए कर्मोंके अनुसार इस जन्ममें उनके सामने अनुकूल या प्रतिकूल परिस्थिति तो आती है? पर वे अपने विवेकके बलसे उन परिस्थितियोंके भोगी नहीं बनते? उनसे सुखीदुःखी नहीं होते अर्थात् सर्वथा निर्लिप्त रहते हैं।संन्यासियों अर्थात् त्यागियोंको फल क्यों नहीं भोगना पड़ता कारण कि वे अपने लिये कुछ भी नहीं करते। उनको अच्छी तरहसे यह विवेक हो जाता है कि अपना जो सत्स्वरूप है? उसके लिये किसी भी क्रिया और वस्तुकी आवश्यकता है ही नहीं। अपने लिये पानेकी इच्छासे साधक कुछ भी करता है तो वह अपने व्यक्तित्वको ही स्थिर रखता है क्योंकि वह संसारमात्रके हितसे अपना हित अलग मानता है। जब वह संसारमात्रके हितसे अपना हित अलग नहीं मानता अर्थात् सबके हितमें ही अपना हित मानता है? तब वह स्वतः सर्वभूतहिते रताः हो जाता है। फिर उसके स्थूलशरीरसे होनेवाली क्रियाएँ? सूक्ष्मशरीरसे होनेवाला परहितचिन्तन और कारणशरीरसे होनेवाली स्थिरता -- तीनों ही संसारके मात्र प्राणियोंके हितके लिये होती हैं। कारण कि शरीर आदि सबकीसब सामग्री संसारसे अभिन्न है। उस सामग्रीसे अपना हित चाहता है -- यही गलती होती है? जो कि अपनी परिच्छिन्नतामें हेतु है।यहाँ संन्यासिनाम् पदमें त्यागी (कर्मयोगी) और संन्यासी (सांख्ययोगी) -- दोनोंकी एकता की गयी है जैसे -- कर्मयोगी कर्मोंसे असङ्ग रहता है तो सांख्ययोगी भी कर्मोंसे सर्वथा निर्लिप्त रहता है। कर्मयोगी (निष्कामभावसे) कर्म करते हुए भी फलके साथ सम्बन्ध नहीं रखता तो सांख्ययोगी कर्ममात्रके साथ किञ्चित् भी सम्बन्ध नहीं रखता। कर्मयोगी फलसे सम्बन्धविच्छेद करता है अर्थात् ममताका त्याग करता है तो सांख्ययोगी कर्तृत्वाभिमान अर्थात् अहंताका त्याग करता है। ममताका त्याग होनेपर अहंताका भी स्वतः त्याग हो जाता है और अहंताका त्याग होनेपर ममताका भी स्वतः त्याग हो जाता है। इसलिये भगवान्ने कर्मयोगमें ममताके त्यागके बाद अहंताका त्याग बताया है -- निर्ममो निरहंकारः (2। 71) और सांख्ययोगमें अहंताके त्यागके बाद ममताका त्याग बताया है -- अहंकारं बलं दर्पं कामं क्रोधं परिग्रहम्। विमुच्य निर्ममः ৷৷. (18। 53)। इन दोनोंकी इस त्याग करनेकी प्रक्रियामें तो फरक है परन्तु परिवर्तनशील प्रकृति और प्रकृतिका कार्य, -- इनमेंसे किसीके भी साथ इन दोनोंका सम्बन्ध नहीं रहता अर्थात् तत्त्वमें कर्मयोगी और सांख्ययोगी -- दोनों एक हो जाते हैं।पहले अर्जुनने यह पूछा था कि मैं संन्यास और त्यागका तत्त्व जानना चाहता हूँ अतः भगवान्ने यहाँ संन्यासिनाम् पदसे दोनोंका यह तत्त्व बताया कि कर्मयोगीका यह भाव रहता है कि अपना कुछ नहीं है? अपने लिये कुछ नहीं चाहिये और अपने लिये कुछ नहीं करना है। ऐसे ही सांख्ययोगीका यह भाव रहता है कि अपना कुछ नहीं है और अपने लिये कुछ नहीं चाहिये। सांख्ययोगी प्रकृति और प्रकृतिके कार्यके साथ किञ्चिन्मात्र भी अपना सम्बन्ध नहीं मानता? इसलिये उसके लिये अपने लिये कुछ नहीं करना है -- यह कहना ही नहीं बनता।यहाँ त्यागिनाम् पद न देकर संन्यासिनाम् पद देनेका यह तात्पर्य है कि जो निर्लिप्तता सांख्ययोगसे होती है? वही निर्लिप्तता त्यागसे अर्थात् कर्मयोगसे भी होती है (गीता 5। 4 -- 5)। दूसरी बात? यहाँतक भगवान्ने कर्मयोगसे निर्लिप्तता बतायी? अब संन्यासिनाम् पद कहकर आगे सांख्ययोगसे निर्लिप्तता बतानेका बीज भी डाल देते हैं।कर्मसम्बन्धी विशेष बातपुरुष और प्रकृति -- ये दो हैं। इनमेंसे पुरुषमें कभी परिवर्तन नहीं होता और प्रकृति कभी परिवर्तनरहित नहीं होती। जब यह पुरुष प्रकृतिके साथ सम्बन्ध जोड़ लेता है? तब प्रकृतिकी क्रिया पुरुषका कर्म बन जाता है क्योंकि प्रकृतिके साथ सम्बन्ध माननेसे तादात्म्य हो जाता है। तादात्म्य होनेसे जो प्राकृत वस्तुएँ प्राप्त हैं? उनमें ममता होती है और उस ममताके कारण अप्राप्त वस्तुओंकी कामना होती है। इस प्रकार जबतक कामना? ममता और तादात्म्य रहता है? तबतक जो कुछ परिवर्तनरूप क्रिया होती है? उसका नाम कर्म है।तादात्म्यके टूटनेपर वही कर्म पुरुषके लिये अकर्म हो जाता है अर्थात् वह कर्म क्रियामात्र रह जाता है? उसमें फलजनकता नहीं रहती -- यह कर्ममें अकर्म है। अकर्मअवस्थामें अर्थात् स्वरूपका अनुभव होनेपर उस महापुरुषके शरीरसे जो क्रिया होती रहती है? वह अकर्ममें कर्म है (गीता 4। 18)। तात्पर्य यह हुआ कि अपने निर्लिप्त स्वरूपका अनुभव न होनेपर भी वास्तवमें सब क्रियाएँ प्रकृति और उसके कार्य शरीरमें होती हैं परन्तु प्रकृति या शरीरसे अपनी पृथक्ताका अनुभव न होनेसे वे क्रियाएँ कर्म बन जाती हैं (गीता 3। 27 13। 29)।कर्म तीन तरहके होते हैं -- क्रियमाण? सञ्चित और प्रारब्ध। अभी वर्तमानमें जो कर्म किये जाते हैं? वे क्रियमाण कर्म कहलाते हैं (टिप्पणी प0 882.1)। वर्तमानसे पहले इस जन्ममें किये हुए अथवा पहलेके अनेक मनुष्यजन्मोंमें किये हुए जो कर्म संगृहीत हैं? वे सञ्चित कर्म कहलाते हैं। सञ्चितमेंसे जो कर्म फल देनेके लिये प्रस्तुत (उन्मुख) हो गये हैं अर्थात् जन्म? आयु और अनुकूलप्रतिकूल परिस्थितिके रूपमें परिणत होनेके लिये सामने आ गये हैं? वे प्रारब्ध कर्म कहलाते हैं।क्रियमाण कर्म दो तरहके होते हैं -- शुभ और अशुभ। जो कर्म शास्त्रानुसार विधिविधानसे किये जाते हैं? वे शुभकर्म कहलाते हैं और काम? क्रोध? लोभ? आसक्ति आदिको लेकर जो शास्त्रनिषिद्ध कर्म किये जाते हैं? वे अशुभकर्म कहलाते हैं।शुभ अथवा अशुभ प्रत्येक क्रियमाण कर्मका एक तो फलअंश बनता है और एक संस्कारअंश। ये दोनों भिन्नभिन्न हैं।चित्रक्रियमाण कर्म फलअंश संस्कारअंश दृष्ट अदृष्ट तात्कालिक कालान्तिरक लौकिक पारलौकिक शुद्ध अशुद्धक्रियमाण कर्मके फलअंशके दो भेद हैं -- दृष्ट और अदृष्ट। इनमेंसे दृष्टके भी दो भेद होते हैं -- तात्कालिक और कालान्तिरक। जैसे? भोजन करते हुए जो रस आता है? सुख होता है? प्रसन्नता होती है और तृप्ति होती है -- यह दृष्टका तात्कालिक फल है और भोजनके परिणाममें आयु? बल? आरोग्य आदिका बढ़ना -- यह दृष्टका कालान्तिरक फल है। ऐसे ही जिसका अधिक मिर्च खानेका स्वभाव है? वह जब अधिक मिर्चवाले पदार्थ खाता है? तब उसको प्रसन्नता होती है? सुख होता है और मिर्चकी तीक्ष्णताके कारण मुँहमें? जीभमें जलन होती है? आँखोंसे और नाकसे पानी निकलता है? सिरसे पसीना निकलता है -- यह दृष्टका तात्कालिक फल है और कुपथ्यके कारण परिणाममें पेटमें जलन और रोग? दुःख आदिका होना -- यह दृष्टका कालान्तिरक फल है।इसी प्रकार अदृष्टके दो भी भेद होते हैं -- लौकिक और पारलौकिक। जीतेजी ही फल मिल जाय -- इस भावसे यज्ञ? दान? तप? तीर्थ? व्रत? मन्त्रजप आदि शुभकर्मोंको विधिविधानसे किया जाय और उसका कोई प्रबल प्रतिबन्ध न हो तो यहाँ ही पुत्र? धन? यश? प्रतिष्ठा आदि अनुकूलकी प्राप्ति होना और रोग? निर्धनता आदि प्रतिकूलकी निवृत्ति होना -- यह अदृष्टका लौकिक फल है (टिप्पणी प0 882.2) और मरनेके बाद स्वर्ग आदिकी प्राप्ति हो जाय -- इस भावसे यथार्थ विधिविधान और श्रद्धाविश्वासपूर्वक जो यज्ञ? दान? तप? आदि शुभकर्म किये जायँ तो मरनेके बाद स्वर्ग आदि लोकोंकी प्राप्ति होना -- यह अदृष्टका पारलौकिक फल है। ऐसे ही डाका डालने? चोरी करने? मनुष्यकी हत्या करने आदि अशुभकर्मोंका फल यहाँ ही कैद? जुर्माना? फाँसी आदि होना -- यह अदृष्टका लौकिक फल है और पापोंके कारण मरनेके बाद नरकोंमें जाना और पशुपक्षी? कीटपतंग आदि बनना -- यह अदृष्टका पारलौकिक फल है।पापपुण्यके इस लौकिक और पारलौकिक फलके विषयमें एक बात और समझनेकी है कि जिन पापकर्मोंका फल यहीं कैद? जुर्माना? अपमान? निन्दा आदिके रूपमें भोग लिया है? उन पापोंका फल मरनेके बाद भोगना नहीं पड़ेगा। परन्तु व्यक्तिके पाप कितनी मात्राके थे और उनका भोग कितनी मात्रामें हुआ अर्थात् उन पापकर्मोंका फल उसने पूरा भोगा या अधूरा भोगा -- इसका पूरा पता मनुष्यको नहीं लगता क्योंकि मनुष्यके पास इसका कोई मापतौल नहीं है। परन्तु भगवान्को इसका पूरा पता है अतः उनके कानूनके अनुसार उन पापोंका फल यहाँ जितने अंशमें कम भोगा गया है? उतना इस जन्ममें या मरनेके बाद भोगना ही पड़ेगा। इसलिये मनुष्यको ऐसी शङ्का नहीं करनी चाहिये कि मेरा पाप तो कम था? पर दण्ड अधिक भोगना पड़ा अथवा मैंने पाप तो किया नहीं? पर दण्ड मुझे मिल गया कारण कि यह सर्वज्ञ? सर्वसुहृद्? सर्वसमर्थ भगवान्का विधान है कि पापसे अधिक दण्ड कोई नहीं भोगता और जो दण्ड मिलता है? वह किसीनकिसी पापका ही फल होता है (टिप्पणी प0 883)।इसी तरह धनसम्पत्ति? मान? आदर? प्रशंसा? नीरोगता आदि अनुकूल परिस्थितिके रूपमें पुण्यकर्मोंका जितना फल यहाँ भोग लिया है? उतना अंश तो यहाँ नष्ट हो ही गया और जितना बाकी रह गया है? वह परलोकमें फिर भोगा जा सकता है। यदि पुण्यकर्मोंका पूरा फल यहीं भोग लिया गया तो पुण्य यहींपर समाप्त हो जायँगे।क्रियमाणकर्मके संस्कारअंशके भी दो भेद हैं -- शुद्ध एवं पवित्र संस्कार और अशुद्ध एवं अपवित्र संस्कार। शास्त्रविहित कर्म करनेसे जो संस्कार पड़ते हैं? वे शुद्ध एवं पवित्र होते हैं और शास्त्र? नीति? लोकमर्यादाके विरुद्ध कर्म करनेसे जो संस्कार पड़ते हैं? वे अशुद्ध एवं अपवित्र होते हैं।इन दोनों शुद्ध और अशुद्ध संस्कारोंको लेकर स्वभाव (प्रकृति? आदत) बनता है। उन संस्कारोंमेंसे अशुद्ध अंशका सर्वथा नाश करनेपर स्वभाव शुद्ध? निर्मल? पवित्र हो जाता है परन्तु जिन पूर्वकृत कर्मोंसे स्वभाव बना है? उन कर्मोंकी भिन्नताके कारण जीवन्मुक्त पुरुषोंके स्वभावोंमें भी भिन्नता रहती है। इन विभिन्न स्वभावोंके कारण ही उनके द्वारा विभिन्न कर्म होते हैं? पर वे कर्म दोषी नहीं होते? प्रत्युत सर्वथा शुद्ध होते हैं और उन कर्मोंसे दुनियाका कल्याण होता है।संस्कारअंशसे जो स्वभाव बनता है? वह एक दृष्टिसे महान् प्रबल होता है -- स्वभावो मूर्ध्नि वर्तते अतः उसे मिटाया नहीं जा सकता (टिप्पणी प0 884)। इसी प्रकार ब्राह्मण? क्षत्रिय आदि वर्णोंका जो स्वभाव है? उसमें कर्म करनेकी मुख्यता रहती है। इसलिये भगवान्ने अर्जुनसे कहा है कि जिस कर्मको तू मोहवश नहीं करना चाहता? उसको भी अपने स्वाभाविक कर्मसे बँधा हुआ परवश होकर करेगा (गीता 18। 60)।अब इसमें विचार करनेकी एक बात है कि एक ओर तो स्वभावकी महान् प्रबलता है कि उसको कोई छोड़ ही नहीं सकता और दूसरी ओर मनुष्यजन्मके उद्योगकी महान् प्रबलता है कि मनुष्य सब कुछ करनेमें स्वतन्त्र है। अतः इन दोनोंमें किसकी विजय होगी और किसकी पराजय होगी इसमें विजयपराजयकी बात नहीं है। अपनीअपनी जगह दोनों ही प्रबल हैं। परन्तु यहाँ स्वभाव न छोड़नेकी जो बात है? वह जातिविशेषके स्वभावकी बात है। तात्पर्य है कि जीव जिस वर्णमें जन्मा है? जैसा रजवीर्य था? उसके अनुसार बना हुआ जो स्वभाव है? उसको कोई बदल नहीं सकता अतः वह स्वभाव दोषी नहीं है? निर्दोष है। जैसे? ब्राह्मण? क्षत्रिय आदि वर्णोंका जो स्वभाव है? वह स्वभाव नहीं बदल सकता और उसको बदलनेकी आवश्कयकता भी नहीं है तथा उसको बदलनेके लिये शास्त्र भी नहीं कहता। परन्तु उस स्वभावमें जो अशुद्धअंश (रागद्वेष) है? उसको मिटानेकी सामर्थ्य भगवान्ने मनुष्यको दी है। अतः जिन दोषोंसे मनुष्यका स्वभाव अशुद्ध बना है? उन दोषोंको मिटाकर मनुष्य स्वतन्त्रतापूर्वक अपने स्वभावको शुद्ध बना सकता है। मनुष्य चाहे तो कर्मयोगकी दृष्टिसे अपने प्रयत्नसे रागद्वेषको मिटाकर स्वभाव शुद्ध बना ले (गीता 3। 34)? चाहे भक्तियोगकी दृष्टिसे सर्वथा भगवान्के शरण होकर अपना स्वभाव शुद्ध बना ले (गीता 18। 62)। इस प्रकार प्रकृति(स्वभाव) की प्रबलता भी सिद्ध हो गयी और मनुष्यकी स्वतन्त्रता भी सिद्ध हो गयी। तात्पर्य यह हुआ कि शुद्ध स्वभावको रखनेमें प्रकृतिकी प्रबलता है और अशुद्ध स्वभावको मिटानेमें मनुष्यकी स्वतन्त्रता है।जैसे? लोहेकी तलवारको पारस छुआ दिया जाय तो तलवार सोना बन जाती है परन्तु उसकी मार? धार और आकार -- ये तीनों नहीं बदलते। इस प्रकार सोना बनानेमें पारसकी प्रधानता रही और मारधारआकार में तलवारकी प्रधानता रही। ऐसे ही जिन लोगोंने अपने स्वभावको परम शुद्ध बना लिया है? उनके कर्म भी सर्वथा शुद्ध होते हैं। परन्तु स्वभावके शुद्ध होनेपर भी वर्ण? आश्रम? सम्प्रदाय? साधनपद्धति? मान्यता आदिके अनुसार आपसमें उनके कर्मोंकी भिन्नता रहती है। जैसे? किसी ब्राह्मणको तत्त्वबोध हो जानेपर भी वह खानपान आदिमें पवित्रता रखेगा और अपने हाथसे बनाया हुआ भोजन ही ग्रहण करेगा क्योंकि उसके,स्वभावमें पवित्रता है। परन्तु किसी हरिजन आदि साधारण वर्णवालेको तत्त्वबोध हो जाय तो वह खानपान आदिमें पवित्रता नहीं रखेगा और दूसरोंकी जूठन भी खा लेगा क्योंकि उसका स्वभाव ही ऐसा पड़ा हुआ है। पर ऐसा स्वभाव उसके लिये दोषी नहीं होगा।जीवका असत्के साथ सम्बन्ध जोड़नेका स्वभाव अनादिकालसे बना हुआ है? जिसके कारण वह जन्ममरणके चक्करमें पड़ा हुआ है और बारबार ऊँचनीच योनियोंमें जाता है। उस स्वभावको मनुष्य शुद्ध कर सकता है अर्थात् उसमें जो कामना? ममता और तादात्म्य हैं? उनको मिटा सकता है। कामना? ममता और तादात्म्यके मिटनेके बाद जो स्वभाव रहता है? वह स्वभाव दोषी नहीं रहता। इसलिये उस स्वभावको मिटाना नहीं है और मिटानेकी आवश्यकता भी नहीं है।जब मनुष्य अहंकारका आश्रय छोड़ कर सर्वथा भगवान्के शरण हो जाता है? तब उसका स्वभाव शुद्ध हो जाता है जैसे -- लोहा पारसके स्पर्शसे शुद्ध सोना बन जाता है। स्वभाव शुद्ध होनेसे फिर वह स्वभावज कर्म करते हुए भी दोषी और पापी नहीं बनता (गीता 18। 47)। सर्वथा भगवान्के शरण होनेके बाद भक्तका प्रकृतिके साथ कोई सम्बन्ध नहीं रहता। फिर भक्तके जीवनमें भगवान्का स्वभाव काम करता है। भगवान् समस्त प्राणियोंके सुहृद् हैं -- सुहृदं सर्वभूतानाम् (गीता 5। 29) तो भक्त भी समस्त प्राणियोंका सुहृद् हो जाता है -- सुहृदः सर्वदेहिनाम् (श्रीमद्भा0 3। 25। 21)।इसी तरह कर्मयोगकी दृष्टिसे जब मनुष्य रागद्वेषको मिटा देता है? तब उसके स्वभावकी शुद्ध हो जाती है? जिससे अपने स्वार्थका भाव मिटकर केवल दुनियाके हितका भाव स्वतः हो जाता है। जैसे भगवान्का स्वभाव प्राणिमात्रका हित करनेका है? ऐसे ही उसका स्वभाव भी प्राणिमात्रका हित करनेका हो जाता है। जब उसकी सब चेष्टाएँ प्राणिमात्रके हितमें हो जाती हैं? तब उसकी भगवान्की सर्वभूतसुहृत्ताशक्तिके साथ एकता हो जाती है। उसके उस स्वभावमें भगवान्की सुहृत्ताशक्ति कार्य करने लगती है।वास्तवमें भगवान्की यह सर्वभूतसुहृत्ताशक्ति मनुष्यमात्रके लिये समान रीतिसे खुली हुई है परन्तु अपने अहंकार और रागद्वेषके कारण उस शक्तिमें बाधा लग जाती है अर्थात् वह शक्ति कार्य नहीं करती। महापुरुषोंमें अहंकार (व्यक्तित्व) और रागद्वेष नहीं रहते? इसलिये उनमें यह शक्ति कार्य करने लग जाती है।चित्रसञ्चित कर्म फलअंश संस्कारअंश प्रारब्ध स्फुरणाअनेक मनुष्यजन्मोंमें किये हुए जो कर्म (फलअंश और संस्कारअंश) अन्तःकरणमें संगृहीत रहते हैं? वे सञ्चित कर्म कहलाते हैं। उनमें फलअंशसे तो प्रारब्ध बनता है और संस्कारअंशसे स्फुरणा होती रहती है। उन स्फुरणाओंमें भी वर्तमानमें किये गये जो नये क्रियमाण कर्म सञ्चितमें भरती हुए हैं? प्रायः उनकी ही स्फुरणा होती है। कभीकभी सञ्चितमें भरती हुए पुराने कर्मोंकी स्फुरणा भी हो जाती है (टिप्पणी प0 885) जैसे किसी बर्तनमें पहले प्याज डाल दें और उसके ऊपर क्रमशः गेहूँ? चना? ज्वार? बाजरा? डाल दें तो निकालते समय जो सबसे पीछे डाला था? वही (बाजरा) सबसे पहले निकलेगा? पर बीचमें कभीकभी प्याजका भी भभका आ जायेगा। परन्तु यह दृष्टान्त पूरा नहीं घटता क्योंकि प्याज? गेहूँ आदि सावयव,पदार्थ हैं और सञ्चित कर्म निरवयव हैं। यह दृष्टान्त केवल इतने ही अंशमें बतानेके लिये दिया है। कि नये क्रियमाण कर्मोंकी स्फुरणा ज्यादा होती है और कभीकभी पुराने कर्मोंकी भी स्फुरणा होती है।इसी तरह जब नींद आती है तो उसमें भी स्फुरणा होती है। नींदमें जाग्रत्अवस्थाके दब जानेके कारण सञ्चितकी वह स्फुरणा स्वप्नरूपसे दीखने लग जाती है? उसीको स्वप्नावस्था कहते हैं (टिप्पणी प0 886)। स्वप्नावस्थामें बुद्धिकी सावधानी न रहनेके कारण क्रम? व्यतिक्रम और अनुक्रम ये नहीं रहते। जैसे? शहर तो दिल्लीका दीखता है और बाजार बम्बईका तथा उस बाजारमें दूकानें कलकत्ताकी दीखती हैं? कोई जीवित आदमी दीख जाता है अथवा किसी मरे हुए आदमीसे मिलना हो जाता है? बातचीत हो जाती है? आदिआदि।जाग्रत्अवस्थामें हरेक मनुष्यके मनमें अनेक तरहकी स्फुरणाएँ होती रहती हैं। जब जाग्रत्अवस्थामें शरीर? इन्द्रियाँ और मनपरसे बुद्धिका अधिकार हट जाता है? तब मनुष्य जैसा मनमें आता है? वैसा बोलने लगता है। इस तरह उचितअनुचितका विचार करनेकी शक्ति काम न करनेसे वह सीधासरल पागल कहलाता है। परन्तु जिसके शरीर? इन्द्रियाँ और मनपर बुद्धिका अधिकार रहता है? वह जो उचित समझता है? वही बोलता है और जो अनुचित समझता है? वह नहीं बोलता। बुद्धि सावधान रहनेसे वह सावचेत रहता है? इसलिये वह चतुर पागल हैइस प्रकार मनुष्य जबतक परमात्मप्राप्ति नहीं कर लेता? तबतक वह अपनेको स्फुरणाओंसे बचा नहीं सकता। परमात्मप्राप्ति होनेपर बुरी स्फुरणाएँ सर्वथा मिट जाती हैं। इसलिये जीवन्मुक्त महापुरुषके मनमें अपवित्र पुरे विचार कभी आते ही नहीं। अगर उसके कहलानेवाले शरीरमें प्रारब्धवश (व्याधि आदि किसी कारणवश) कभी बेहोशी? उन्माद आदि हो जाता है तो उसमें भी वह न तो शास्त्रनिषिद्ध बोलता है और न शास्त्रनिषिद्ध कुछ करता ही है क्योंकि अन्तःकरण शुद्ध हो जानेसे शास्त्रनिषिद्ध बोलना या करना उसके स्वभावमें नहीं रहता।प्रारब्ध कर्म प्रारब्ध कर्म अनुकूल परिस्थिति मिश्रित (अनुकूलप्रतिकूल) परिस्थिति प्रतिकूल परिस्थिति स्वेच्छापूर्वक क्रिया (प्रवृत्ति) अनिच्छापूर्वक क्रिया परेच्छापूर्वक क्रिया स्वेच्छापूर्वक क्रिया अनिच्छापूर्वक क्रिया परेच्छापूर्वक क्रिया स्वेच्छापूर्वक क्रिया अनिच्छापूर्वक क्रिया परेच्छापूर्वक क्रिया,सञ्चितमेंसे जो कर्म फल देनेके लिये सम्मुख होते हैं? उन कर्मोंको प्रारब्ध कर्म कहते हैं (टिप्पणी प0 887)। प्रारब्ध कर्मोंका फल तो अनुकूल या प्रतिकूल परिस्थितिके रूपमें सामने आता है परन्तु उन प्रारब्ध कर्मोंको भोगनेके लिये प्राणियोंकी प्रवृत्ति तीन प्रकारसे होती है -- (1) स्वेच्छापूर्वक? (2) अनिच्छा(दैवेच्छा)पूर्वक और (3) परेच्छापूर्वक। उदाहरणार्थ --(1) किसी व्यापारीने माल खरीदा तो उसमें मुनाफा हो गया। ऐसे ही किसी दूसरे व्यापारीने माल खरीदा तो उसमें घाटा लग गया। इन दोनोंमें मुनाफा होना और घाटा लगना तो उनके शुभअशुभकर्मोंसे बने हुए प्रारब्धके फल हैं परन्तु माल खरीदनेमें उनकी प्रवृत्ति स्वेच्छापूर्वक हुई है।(2) कोई सज्जन कहीं जा रहा था तो आगे आनेवाली नदीमें बाढ़के प्रवाहके कारण एक धनका टोकरा बहकर आया और उस सज्जनने उसे निकाल लिया। ऐसे ही कोई सज्जन कहीं जा रहा था तो उसपर वृक्षकी एक टहनी गिर पड़ी और उसको चोट लग गयी। इन दोनोंमें धनका मिलना और चोट लगना तो उनके शुभअशुभकर्मोंसे बने हुए प्रारब्धके फल हैं परन्तु धनका टोकरा मिलना और वृक्षकी टहनी गिरना -- यह प्रवृत्ति अनिच्छा(दैवेच्छा) पूर्वक हुई है।(3) किसी धनी व्यक्तिने किसी बच्चेको गोद ले लिया अर्थात् उसको पुत्ररूपमें स्वीकार कर लिया? जिससे उसका सब धन उस बच्चेको मिल गया। ऐसे ही चोरोंने किसीका सब धन लूट लिया। इन दोनोंमें बच्चेको धन मिलना और चोरीमें धनका चला जाना तो उनके शुभअशुभकर्मोंसे बने हुए प्रारब्धके फल हैं परन्तु गोदमें जाना और चोरी होना -- यह प्रवृत्ति परेच्छापूर्वक हुई है।यहाँ एक बात और समझ लेनी चाहिये कि कर्मोंका फल कर्म नहीं होता? प्रत्युत परिस्थिति होती है अर्थात् प्रारब्ध कर्मोंका फल परिस्थितिरूपसे सामने आता है। अगर नये (क्रियमाण) कर्मको प्रारब्धका फल मान लिया जाय तो फिर ऐसा करो? ऐसा मत करो -- यह शास्त्रोंका? गुरुजनोंका विधिनिषेध निरर्थक हो जायगा। दूसरी बात? पहले जैसे कर्म किये थे? उन्हींके अनुसार जन्म होगा और उन्हींके अनुसार कर्म होंगे तो वे कर्म फिर आगे नये कर्म पैदा कर देंगे? जिससे यह कर्मपरम्परा चलती ही रहेगी अर्थात् इसका कभी अन्त ही नहीं जायेगा।प्रारब्ध कर्मसे मिलनेवाले फलके दो भेद हैं -- प्राप्त फल और अप्राप्त फल। अभी प्राणियोंके सामने जो अनुकूल या प्रतिकूल परिस्थिति आ रही है? वह प्राप्त फल है और इसी जन्ममें जो अनुकूल या प्रतिकूल परिस्थिति भविष्यमें आनेवाली है वह अप्राप्त फल है।क्रियमाण कर्मोंका जो फलअंश सञ्चितमें जमा रहता है? वही प्रारब्ध बनकर अनुकूल? प्रतिकूल और मिश्रित परिस्थितिके रूपमें मनुष्यके सामने आता है। अतः जबतक सञ्चित कर्म रहते हैं? तबतक प्रारब्ध बनता ही रहता है और प्रारब्ध परिस्थितिके रूपमें परिणत होता ही रहता है। यह परिस्थिति मनुष्यको सुखीदुःखी होनेके लिये बाध्य नहीं करती। सुखीदुःखी होनेमें तो परिवर्तनशील परिस्थितिके साथ सम्बन्ध जो़ड़ना ही मुख्य कारण है। परिस्थितिके साथ सम्बन्ध जोड़ने अथवा न जोड़नेमें यह मनुष्य सर्वथा स्वाधीन है? पराधीन नहीं है। जो परिवर्तनशील परिस्थितिके साथ अपना सम्बन्ध मान लेता है? वह अविवेकी पुरुष तो सुखीदुःखी होता ही रहता है। परन्तु जो परिस्थितिके साथ सम्बन्ध नहीं मानता? वह विवेकी पुरुष कभी सुखीदुःखी नहीं होता अतः उसकी स्थिति स्वतः साम्यावस्थामें होती है? जो कि उसका स्वरूप है।कर्मोंमें मनुष्यके प्रारब्धकी प्रधानता है या पुरुषार्थकी अथवा प्रारब्ध बलवान् है या पुरुषार्थ -- इस विषयमें बहुतसी शङ्काएँ हुआ करती हैं। उनके समाधानके लिये पहले यह समझ लेना जरूरी है कि प्रारब्ध और पुरुषार्थ क्या हैमनुष्यमें चार तरहकी चाहना हुआ करती है -- एक धनकी? दूसरी धर्मकी? तीसरी भोगकी और चौथी मुक्तिकी। प्रचलित भाषामें इन्हीं चारोंको अर्थ? धर्म? काम और मोक्षके नामसे कहा जाता है --, (1) अर्थ -- धनको अर्थ कहते हैं। वह धन दो तरहका होता है -- स्थावर और जङ्गम। सोना? चाँदी? रुपये? जमीन? जायदाद? मकान आदि स्थावर हैं और गाय? भैंस? घोड़ा? ऊँट? भेड़? बकरी आदि जङ्गम हैं।(2) धर्म -- सकाम अथवा निष्कामभावसे जो यज्ञ? तप? दान? व्रत? तीर्थ आदि किये जाते हैं? उसको धर्म,कहते हैं।(3) काम -- सांसारिक सुखभोगको काम कहते हैं। वह सुखभोग आठ तरहका होता है -- शब्द? स्पर्श? रूप? रस? गन्ध? मान? बड़ाई और आराम।(क) शब्द -- शब्द दो तरहका होता है -- वर्णात्मक और ध्वन्यात्मक। व्याकरण? कोश? साहित्य? उपन्यास? गल्प? कहानी आदि वर्णात्मक शब्द हैं (टिप्पणी प0 888.1)। खाल? तार और फूँकके तीन बाजे और तालका आधा बाजा -- ये साढ़े तीन प्रकारके बाजे ध्वन्यात्मक शब्दको प्रकट करनेवाले हैं (टिप्पणी प0 888.2)। इन वर्णात्मक और ध्वन्यात्मक शब्दोंको सुननेसे जो सुख मिलता है? वह शब्दका सुख है।(ख) स्पर्श -- स्त्री? पुत्र? मित्र आदिके साथ मिलनेसे तथा ठण्डा? गरम? कोमल आदिसे अर्थात् उनका त्वचाके साथ संयोग होनेसे जो सुख होता है? वह स्पर्शका सुख है।(ग) रूप -- नेत्रोंसे खेल? तमाशा? सिनेमा? बाजीगरी? वन? पहाड़? सरोवर? मकान आदिकी सुन्दरताको देखकर जो सुख होता है? वह रूपका सुख है।(घ) रस -- मधुर (मीठा)? अम्ल (खट्टा)? लवण (नमकीन)? कटु (कड़वा)? तिक्त (तीखा) और कषाय (कसैला) -- इन छः रसोंको चखनेसे जो सुख होता है? वह रसका सुख है।(ङ) गन्ध -- नाकसे अतर? तेल? फुलेल? लवेण्डर? पुष्प आदि सुगन्धवाले और लहसुन? प्याज आदि दुर्गन्धवाले पदार्थोंको सूघँनेसे जो सुख होता है? वह गन्धका सुख है।(च) मान -- शरीरका आदरसत्कार होनेसे जो सुख होता है? वह मानका सुख है।(छ) बड़ाई -- नामकी प्रशंसा? वाहवाह होनेसे जो सुख होता है? वह बड़ाईका सुख है।(ज) आराम -- शरीरसे परिश्रम न करनेसे अर्थात् निकम्मे पड़े रहनेसे जो सुख होता है? वह आरामका सुख है।(4) मोक्ष -- आत्मसाक्षात्कार? तत्त्वज्ञान? कल्याण? उद्धार? मुक्ति? भगवद्दर्शन? भगवत्प्रेम आदिका नाम मोक्ष है।इन चारों (अर्थ? धर्म? काम और मोक्ष) में देखा जाये तो अर्थ और धर्म -- दोनों ही परस्पर एकदूसरेकी वृद्धि करनेवाले हैं अर्थात् अर्थसे धर्मकी और धर्मसे अर्थकी वृद्धि होती है। परन्तु धर्मका पालन कामनापूर्तिके लिये किया जाय तो वह धर्म भी कामनापूर्ति करके नष्ट हो जाता है और अर्थको कामनापूर्तिमें लगाया जाय तो वह अर्थ भी कामनापूर्ति करके नष्ट हो जाता है। तात्पर्य है कि कामना धर्म और अर्थ -- दोनोंको खा जाती है। इसीलिये गीतामें भगवान्ने कामनाको महाशन (बहुत खानेवाला) बताते हुए उसके त्यागकी बात विशेषतासे कही है (3। 37 -- 43)।यदि धर्मका अनुष्ठान कामनाका त्याग करके किया जाय तो वह अन्तःकरण शुद्ध करके मुक्त कर देता है। ऐसे ही धनको कामनाका त्याग करके दूसरोंके उपकारमें? हितमें? सुखमें खर्च किया जाय तो वह भी अन्तःकरण शुद्ध करके मुक्त कर देता है।अर्थ? धर्म? काम और मोक्ष -- इन चारोंमें अर्थ (धन) और काम (भोग) की प्राप्तिमें प्रारब्धकी मुख्यता और पुरुषार्थकी गौणता है? तथा धर्म और मोक्षमें पुरुषार्थकी मुख्यता और प्रारब्धकी गौणता है। प्रारब्ध और पुरुषार्थ -- दोनोंका क्षेत्र अलगअलग है और दोनों ही अपनेअपने क्षेत्रमें प्रधान हैं। इसलिये कहा है -- संतोषस्त्रिषु कर्तव्यः स्वदारे भोजने धने। त्रिषु चैव न कर्तव्यः स्वध्याये जपदानयोः।।अर्थात् अपनी स्त्री? पुत्र? परिवार? भोजन और धनमें तो सन्तोष करना चाहिये और स्वाध्याय? पाठपूजा? नामजप? कीर्तन और दान करनेमें कभी सन्तोष नहीं करना चाहिये। तात्पर्य यह हुआ कि प्रारब्धके फल -- धन और भोगमें तो सन्तोष करना चाहिये क्योंकि वे प्रारब्धके अनुसार जितने मिलनेवाले हैं? उतने ही मिलेंगे? उससे अधिक नहीं। परन्तु धर्मका अनुष्ठान और अपना कल्याण करनेमें कभी सन्तोष नहीं करना चाहिये क्योंकि यह नया पुरुषार्थ है और इसी पुरुषार्थके लिये मनुष्यशरीर मिला है।कर्मके दो भेद हैं -- शुभ (पुण्य) और अशुभ (पाप)। शुभकर्मका फल अनुकूल परिस्थिति प्राप्त होना है और अशुभकर्मका फल प्रतिकूल परिस्थिति प्राप्त होना है। कर्म बाहरसे किये जाते हैं? इसलिये उन कर्मोंका फल भी बाहरकी परिस्थितिके रूपमें ही प्राप्त होता है। परन्तु उन परिस्थितियोंसे जो सुखदुःख होते हैं? वे भीतर होते हैं। इसलिये उन परिस्थितियोंमें सुखी तथा दुःखी होना शुभाशुभकर्मोंका अर्थात् प्रारब्धका फल नहीं है? प्रत्युत अपनी मूर्खताका फल है। अगर वह मूर्खता चली जाय? भगवान्पर (टिप्पणी प0 889.1) अथवा प्रारब्धपर (टिप्पणी प0 889.2) विश्वास हो जाय तो प्रतिकूलसेप्रतिकूल परिस्थिति आनेपर भी चित्तमें प्रसन्नता होगी? हर्ष होगा। कारण कि प्रतिकूल परिस्थितिमें पाप कटते हैं? आगे पाप न करनेमें सावधानी आती है और पापोंके नष्ट होनेसे अन्तःकरणकी शुद्ध होती है।साधकको अनुकूल और प्रतिकूल परिस्थितिका सदुपयोग करना चाहिये? दुरुपयोग नहीं। अनुकूल परिस्थिति आ जाय तो अनुकूल सामग्रीको दूसरोंके हितके लिये सेवाबुद्धिसे खर्च करना अनुकूल परिस्थितिका सदुपयोग है और उसका सुखबुद्धिसे भोग करना दुरुपयोग है। ऐसे ही प्रतिकूल परिस्थिति आ जाय तो सुखकी इच्छाका त्याग करना और मेरे पूर्वकृत पापोंका नाश करनेके लिये? भविष्यमें पाप न करनेकी सावधानी रखनेके लिये और मेरी उन्नति करनेके लिये ही प्रभुकृपासे ऐसी परिस्थिति आयी है -- ऐसा समझकर परम प्रसन्न रहना प्रतिकूल परिस्थितिका सदुपयोग है और उससे दुःखी होना दुरुपयोग है।मनुष्यशरीर सुखदुःख भोगनेके लिये नहीं है। सुख भोगनेके स्थान स्वर्गादिक हैं और दुःख भोगनेके स्थान नरक तथा चौरासी लाख योनियाँ हैं। इसलिये वे भोगयोनियाँ हैं और मनुष्य कर्मयोनि है। परन्तु यह कर्मयोनि उनके लिये है जो मनुष्यशरीरमें सावधान नहीं होते? केवल जन्ममरणके सामान्य प्रवाहमें ही पड़े हुए हैं। वास्तवमें मनुष्यशरीर सुखदुःखसे ऊँचा उठनेके लिये अर्थात् मुक्तिकी प्राप्तिके लिये ही मिला है। इसलिये इसको कर्मयोनि न कहकर साधनयोनि ही कहना चाहिये।प्रारब्धकर्मोंके फलस्वरूप जो अनुकूल और प्रतिकूल परिस्थिति आती है? उन दोनोंमें अनुकूल परिस्थितिका स्वरूपसे त्याग करनेमें तो मनुष्य स्वतन्त्र है? पर प्रतिकूल परिस्थितिका स्वरूपसे त्याग करनेमें मनुष्य परतन्त्र है अर्थात् उसका स्वरूपसे त्याग नहीं किया जा सकता। कारण यह है कि अनुकूल परिस्थिति दूसरोंका हित करने? उन्हें सुख देनेके फलस्वरूप बनी है और प्रतिकूल परिस्थिति दूसरोंको दुःख देनेके फलस्वरूप बनी है। इसको एक दृष्टान्तसे इस प्रकार समझ सकते हैं -- श्यामलालने रामलालको सौ रुपये उधार दिये। रामलालने वायदा किया कि अमुक महीने मैं ब्याजसहित,रुपये लौटा दूँगा। महीना बीत गया? पर रामलालने रुपये नहीं लौटाये तो श्यामलाल रामलालके घर पहुँचा और बोला -- तुमने वायदेके अनुसार रुपये नहीं दिये अब दो। रामलालने कहा -- अभी मेरे पास रुपये नहीं हैं? परसों दे दूँगा। श्यामलाल तीसरे दिन पहुँचा और बोला -- लाओ मेरे रुपये तो रामलालने कहा -- अभी मैं आपके पैसे नहीं जुटा सका? परसों आपके रुपये जरूर दूँगा। तीसरे दिन फिर श्यामलाल पहुँचा और बोला -- रुपये दो तो रामलाल ने कहा -- कल जरूर दूँगा। दूसरे दिन श्यामलाल फिर पहुँचा और बोला -- लाओ मेरे रुपये रामलालने कहा -- रुपये जुटे नहीं? मेरे पास रुपये हैं नहीं? तो मैं कहाँसे दूँ परसों आना। रामलालकी बातें सुनकर श्यामलालको गुस्सा आ गया और परसोंपरसों करता है? रुपये देता नहीं -- ऐसा कहकर उसने रामलालको पाँच जूते मार दिये। रामलालने कोर्टमें नालिश (शिकायत) कर दी। श्यामलालको बुलाया गया और पूछा गया -- तुमने इसके घरपर जाकर जूता मारा है तो श्यामलालने कहा -- हाँ साहब? मैंने जूता मारा है। मैजिस्ट्रेटने पूछा -- क्यों मारा श्यामलालने कहा -- इसको मैंने रुपये दिये थे और इसने वायदा किया था कि मैं इस महीने रुपये लौटा दूँगा। महीना बीत जानेपर मैंने इसके घरपर जाकर रुपये माँगे तो कलपरसों? कलपरसों कहकर इसने मुझे बहुत तंग किया। इसपर मैंने गुस्सेमें आकर इसे पाँच जूते मार दिये। तो सरकार पाँच जूतोंके पाँच रुपये काटकर शेष रुपये मुझे दिला दीजिये। मैजिस्ट्रेटने हँसकर कहा -- यह फौजदारी कोर्ट है। यहाँ रुपये दिलानेका कायदा (नियम) नहीं है। यहाँ दण्ड देनेका कायदा है। इसलिये आपको जूता मारनेके बदलेमें कैद या जुर्माना भोगना ही पड़ेगा। आपको रुपये लेने हों तो दीवानी कोर्टमें जाकर नालिश करो? वहाँ रुपये दिलानेका कायदा है क्योंकि वह विभाग अलग है। इस तरह अशुभकर्मोंका फल जो प्रतिकूल परिस्थिति है? वह फौजदारी है? इसलिये उसका स्वरूपसे त्याग नहीं कर सकते और शुभकर्मोंका फल जो अनुकूल परिस्थिति है? वह दीवानी है? इसलिये उसका स्वरूपसे त्याग किया जा सकता है। इससे यह सिद्ध हुआ कि मनुष्यके शुभअशुभकर्मोंका विभाग अलगअलग है। इसलिये शुभकर्मों (पुण्यों) और अशुभकर्मों(पापों)का अलगअलग संग्रह होता है। स्वभाविकरूपसे ये दोनों एकदूसरेसे कटते नहीं अर्थात् पापोंसे पुण्य नहीं कटते और पुण्योंसे पाप नहीं कटते। हाँ? अगर मनुष्य पाप काटनेके उद्देश्यसे (प्रायश्चित्तरूपसे) शुभकर्म करता है? तो उसके पाप कट सकते हैं।संसारमें एक आदमी पुण्यात्मा है? सदाचारी है और दुःख पा रहा है तथा एक आदमी पापात्मा है? दुराचारी है और सुख भोग रहा है -- इस बातको लेकर अच्छेअच्छे पुरुषोंके भीतर भी यह शङ्का हो जाया करती है कि इसमें ईश्वरका न्याय कहाँ है (टिप्पणी प0 890)। इसका समाधान यह है कि अभी पुण्यात्मा जो दुःख पा रहा है? यह पूर्वके किसी जन्ममें किये हुए पापका फल है? अभी किये हुए पुण्यका नहीं। ऐसे ही अभी पापात्मा जो सुख भोग रहा है? यह भी पूर्वके किसी जन्ममें किये हुए पुण्यका फल है? अभी किये हुए पापका नहीं।इसमें एक तात्त्विक बात और है। कर्मोंके फलरूपमें जो अनुकूल परिस्थिति आती है? उससे सुख ही होता है और प्रतिकूल परिस्थिति आती है? उससे दुःख ही होता है -- ऐसी बात है नहीं। जैसे? अनुकूल परिस्थिति आनेपर मनमें अभिमान होता है? छोटोंसे घृणा होती है? अपनेसे अधिक सम्पत्तिवालोंको देखकर उनसे ईर्ष्या होती है? असहिष्णुता होती है? अन्तःकरणमें जलन होती है और मनमें ऐसे दुर्भाव आते हैं कि उनकी सम्पत्ति कैसे नष्ट हो तथा वक्तपर उनको नीचा दिखानेकी चेष्टा भी होती है। इस तरह सुखसामग्री और धनसम्पत्ति पासमें रहनेपर भी वह सुखी नहीं हो सकता। परन्तु बाहरी सामग्रीको देखकर अन्य लोगोंको यह,भ्रम होता है कि वह बड़ा सुखी है। ऐसे ही किसी विरक्त और त्यागी मनुष्यको देखकर भोगसामग्रीवाले मनुष्यको उसपर दया आती है कि बेचारेके पास धनसम्पत्ति आदि सामग्री नहीं है? बेचारा बड़ा दुःखी है परन्तु वास्तवमें विरक्तके मनमें बड़ी शान्ति और बड़ी प्रसन्नता रहती है। वह शान्ति और प्रसन्नता धनके कारण किसी धनीमें नहीं रह सकती। इसलिये धनका होनामात्र सुख नहीं है और धनका अभावमात्र दुःख नहीं है। सुख नाम हृदयकी शान्ति और प्रसन्नताका है और दुःख नाम हृदयकी जलन और सन्तापका है।पुण्य और पापका फल भोगनेमें एक नियम नहीं है। पुण्य तो निष्कामभावसे भगवान्के अर्पण करनेसे समाप्त हो सकता है परन्तु पाप भगवान्के अर्पण करनेसे समाप्त नहीं होता। पापका फल तो भोगना ही पड़ता है क्योंकि भगवान्की आज्ञाके विरुद्ध किये हुए कर्म भगवान्के अर्पण कैसे हो सकते हैं और अर्पण करनेवाला भी भगवान्के विरुद्ध कर्मोंको भगवान्के अर्पण कैसे कर सकता है प्रत्युत भगवान्की आज्ञाके अनुसार किये हुए कर्म ही भगवान्के अर्पण होते हैं। इस विषयमें एक कहानी आती है।एक राजा अपनी प्रजासहित हरिद्वार गया। उसके साथमें सब तरहके लोग थे। उनमें एक चमार भी था। उस चमारने सोचा कि ये बनिये लोग बड़े चतुर होते हैं। ये अपनी बुद्धिमानीसे धनी बन गये हैं। अगर हम भी उनकी बुद्धिमानीके अनुसार चलें तो हम भी धनी बन जायँ ऐसा विचार करके वह एक चतुर बनियेकी क्रियाओंपर निगरानी रखकर चलने लगा। जब हरिद्वारके ब्रह्मकुण्डमें पण्डा दानपुण्यका संकल्प कराने लगा? तब उस बनियेने कहा -- मैंने अमुक ब्राह्मणको सौ रुपये उधार दिये थे? आज मैं उनको दानरूपमें श्रीकृष्णार्पण करता हूँ पण्डेने संकल्प भरवा दिया। चमारने देखा कि इसने एक कौड़ी भी नहीं दी और लोगोंमें प्रसिद्ध हो गया कि इसने सौ रुपयोंका दान कर दिया? कितना बुद्धिमान् है मैं भी इससे कम नहीं रहूँगा। जब पण्डेने चमारसे संकल्प भरवाना शुरू किया? तब चमारने कहा -- अमुक बनियेने मुझै सौ रुपये उधार दिये थे तो उन सौ रुपयोंको मैं श्रीकृष्णार्पण करता हूँ। उसकी ग्रामीण बोलीको पण्डा पूरी तरह समझा नहीं और संकल्प भरवा दिया। इससे चमार बड़ा खुश हो गया कि मैंने भी बनियेके समान सौ रुपयोंका दानपुण्य कर दियासब घर पहुँचे। समयपर खेती हुई। ब्राह्मण और चमारके खेतोंमें खूब अनाज पैदा हुआ। ब्राह्मण देवताने बनियेसे कहा -- सेठ आप चाहें तो सौ रुपयोंका अनाज ले लो? इससे आपको नफा भी हो सकता है। मुझे तो आपका कर्जा चुकाना है। बनियेने कहा -- ब्राह्मण देवता जब मैं हरिद्वार गया था? तब मैंने आपको उधार दिये हुए सौ रुपये दान कर दिये। ब्राह्मण बोला -- सेठ मैंने आपसे सौ रुपये उधार लिये हैं? दान नहीं लिये। इसलिये इन रुपयोंको मैं रखना नहीं चाहता? ब्याजसहित पूरा चुकाना चाहता हूँ। सेठने कहा -- आप देना ही चाहते हैं तो अपनी बहन अथवा कन्याको दे सकते हैं। मैंने सौ रुपये भगवान्के अर्पण कर दिये हैं? इसलिये मैं तू लूँगा नहीं। अब ब्राह्मण और क्या करता वह अपने घर लौट गया।अब जिस बनियेसे चमारने सौ रुपये लिये थे? वह बनिया चमारके खेतमें पहुँचा और बोला -- लाओ मेरे रुपये। तुम्हारा अनाज हुआ है? सौ रुपयोंका अनाज ही दे दो। चमारने सुन रखा था कि ब्राह्मणके देनेपर भी बनियेने उससे रुपये नहीं लिये। अतः उसने सोचा कि मैंने भी संकल्प कर रखा है तो मेरेको रुपये क्यों देने पड़ेंगे ऐसा सोचकर चमार बनियेसे बोला -- मैंने तो अमुक सेठकी तरह गङ्गाजीमें खड़े होकर सब रुपये श्रीकृष्णार्पण कर दिये? तो मेरेको रुपये क्यों देने पड़ेंगे बनिया बोला -- तेरे अर्पण कर देनेसे कर्जा नहीं छूट सकता क्योंकि तूने मेरेसे कर्जा लिया है तो तेरे छोड़नेसे कैसे छूट जायगा मैं तो अपने सौ रुपये ब्याजसहित पूरे लूँगा लाओ मेरे रुपये ऐसा कहकर उसने चमारसे अपने रुपयोंका अनाज ले लिया।इस कहानीसे यह सिद्ध होता है कि हमारेपर दूसरोंका जो कर्जा है? वह हमारे छोड़नेसे नहीं छूट सकता। ऐसे ही हम भगवदाज्ञानुसार शुभकर्मोंको तो भगवान्के अर्पण करके उनके बन्धनसे छूट सकते हैं? पर अशुभकर्मोंका फल तो हमारेको भोगना ही पड़ेगा। इसलिये शुभ और अशुभकर्मोंमें एक कायदा? कानून नहीं है। अगर ऐसा नियम बन जाय कि भगवान्के अर्पण करनेसे ऋण और पापकर्म छूट जायँ तो फिर सभी प्राणी मुक्त हो जायँ परन्तु ऐसा सम्भव नहीं है। हाँ? इसमें एक मार्मिक बात है कि अपनेआपको सर्वथा भगवान्के अर्पित कर देनेपर अर्थात् सर्वथा भगवान्के शरण हो जानेपर पापपुण्य सर्वथा नष्ट हो जाते हैं (गीता 18। 66)।दूसरी शङ्का यह होती है कि धन और भोगोंकी प्राप्ति प्रारब्ध कर्मके अनुसार होती है -- ऐसी बात समझमें नहीं आती क्योंकि हम देखते हैं कि इन्कमटैक्स? सेल्सटैक्स आदिकी चोरी करते हैं तो धन बच जाता है और टैक्स पूरा देते हैं तो धन चला जाता है तो धनका आनाजाना प्रारब्धके अधीन कहाँ हुआ यह तो चोरीके ही अधीन हुआइसका समाधान इस प्रकार है। वास्तवमें धन प्राप्त करना और भोग भोगना -- इन दोनोंमें ही प्रारब्धकी प्रधानता है। परन्तु इन दोनोंमें भी किसीका धनप्राप्तिका प्रारब्ध होता है? भोगका नहीं और किसीका भोगका प्रारब्ध होता है? धनप्राप्तिका नहीं तथा किसीका धन और भोग दोनोंका ही प्रारब्ध होता है। जिसका धनप्राप्तिका प्रारब्ध तो है? पर भोगका प्रारब्ध नहीं है? उसके पास लाखों रुपये रहनेपर भी बीमारीके कारण वैद्य? डॉक्टरके मना करनेपर वह भोगोंको भोग नहीं सकता? उसके खानेमें रूखासूखा ही मिलता है। जिसका भोगका प्रारब्ध तो है? पर धनका प्रारब्ध नहीं है? उसके पास धनका अभाव होनेपर भी उसके सुखआराममें किसी तरहकी कमी नहीं रहती (टिप्पणी प0 891)। उसको किसीकी दयासे? मित्रतासे? कामधंधा मिल जानेसे प्रारब्धके अनुसार जीवननिर्वाहकी सामग्री मिलती रहती है।अगर धनका प्रारब्ध नहीं है तो चोरी करनेपर भी धन नहीं मिलेगा? प्रत्युत चोरी किसी प्रकारसे प्रकट हो जायगी तो बचा हुआ धन भी चला जायगा तथा दण्ड और मिलेगा। यहाँ दण्ड मिले या न मिले? पर परलोकमें तो दण्ड जरूर मिलेगा। उससे वह बच नहीं सकेगा। अगर प्रारब्धवश चोरी करनेसे धन मिल भी जाय तो भी उस धनका उपभोग नहीं हो सकेगा। वह धन बीमारीमें? चोरीमें? डाकेमें? मुकदमेमें? ठगाईमें चला जायगा। तात्पर्य यह है कि वह धन जितने दिन टिकनेवाला है? उतने ही दिन टिकेगा और फिर नष्ट हो जायगा। इतना ही नहीं? इन्कमटैक्स आदिकी चोरी करनेके जो संस्कार भीतर पड़े हैं? वे संस्कार जन्मजन्मातरतक उसे चोरी करनेके लिये उकसाते रहेंगे और वह उनके कारण दण्ड पाता रहेगा।अगर धनका प्रारब्ध है तो कोई गोद ले लेगा अथवा मरता हुआ कोई व्यक्ति उसके नामसे वसीयतनामा लिख देगा अथवा मकान बनाते समय नींव खोदते ही जमीनमें गड़ा हुआ धन मिल जायगा? आदिआदि। इस प्रकार प्रारब्धके अनुसार जो धन मिलनेवाला है? वह किसीनकिसी कारणसे मिलेगा ही (टिप्पणी प0 892)। परन्तु मनुष्य प्रारब्धपर तो विश्वास करता नहीं? कमसेकम अपने पुरुषार्थपर भी विश्वास नहीं करता कि हम मेहनतसे कमाकर खा लेंगे। इसी कारण उसकी चोरी आदि दुष्कर्मोंमें प्रवृत्ति हो जाती है? जिससे हृदयमें जलन रहती है? दूसरोंसे छिपाव करना पड़ता है? पकड़े जानेपर दण्ड पाना पड़ता है? आदिआदि। अगर मनुष्य विश्वास और सन्तोष रखे तो हृदयमें महान् शान्ति? आनन्द? प्रसन्नता रहती है तथा आनेवाला धन भी आ जाता है और जितना जीनेका प्रारब्ध है? उतनी जीवननिर्वाहकी सामग्री भी किसीनकिसी तरह मिलती ही रहती है।जैसे व्यापारमें घाटा लगना? घरमें किसीकी मृत्यु होना? बिना कारण अपयश और अपमान होना आदि प्रतिकूल परिस्थितिको कोई भी नहीं चाहता? पर फिर भी वह आती ही है? ऐसे ही अनुकूल परिस्थिति भी आती ही है? उसको कोई रोक नहीं सकता। भागवतमें आया है -- सुखमैन्द्रियकं राजन् स्वर्गे नरक एव च। देहिनां यद् यथा दुःखं तस्मान्नेच्छेत तद् बुधः।।(श्रीमद्भा0 11। 8। 1)राजन् प्राणियोंको जैसे इच्छाके बिना प्रारब्धानुसार दुःख प्राप्त होते हैं? ऐसे ही इन्द्रियजन्य सुख स्वर्गमें और नरकमें भी प्राप्त होते हैं। अतः बुद्धिमान् पुरुषको चाहिये कि वह उन सुखोंकी इच्छा न करे। जैसे धन और भोगका प्रारब्ध अलगअलग होता है अर्थात् किसीका धनका प्रारब्ध होता है और किसीका भोगका प्रारब्ध होता है? ऐसे ही धर्म और मोक्षका पुरुषार्थ भी अलगअलग होता है अर्थात् कोई धर्मके लिये पुरुषार्थ करता है और कोई मोक्षके लिये पुरुषार्थ करता है। धर्मके अनुष्ठानमें शरीर? धन आदि वस्तुओँकी मुख्यता रहती है और मोक्षकी प्राप्तिमें भाव तथा विचारकी मुख्यता रहती है।एक करना होता है और एक होना होता है। दोनों विभाग अलगअलग हैं। करनेकी चीज है -- कर्तव्य और होनेकी चीज है -- फल। मनुष्यका कर्म करनेमें अधिकार है? फलमें नहीं -- कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन (गीता 2। 47)। तात्पर्य यह है कि होनेकी पूर्ति प्रारब्धके अनुसार अवश्य होती है? उसके लिये यह होना चाहिये और यह नहीं होना चाहिये -- ऐसी इच्छा नहीं करनी चाहिये और करनेमें शास्त्र तथा लोकमर्यादाके अनुसार कर्तव्यकर्म करना चाहिये। करना पुरुषार्थके अधीन है और होना प्रारब्धके अधीन है। इसलिये मनुष्य करनेमें स्वाधीन है और होनेमें पराधीन है। मनुष्यकी उन्नतिमें खास बात है -- करनेमें सावधान रहे और होनेमें प्रसन्न रहे। क्रियमाण? सञ्चित और प्रारब्ध -- तीनों कर्मोंसे मुक्त होनेका क्या उपाय हैप्रकृति और पुरुष -- ये दो हैं। प्रकृति सदा क्रियाशील है? पर पुरुषमें कभी परिवर्तनरूप क्रिया नहीं होती। प्रकृतिसे अपना सम्बन्ध माननेवाला प्रकृतिस्थ पुरुष ही कर्ताभोक्ता बनता है। जब वह प्रकृतिसे सम्बन्धविच्छेद कर लेता है अर्थात् अपने स्वरूपमें स्थित हो जाता है? तब उसपर कोई भी कर्म लागू नहीं होता।प्रारब्धसम्बन्धी अन्य बातें इस प्रकार हैं --(1) बोध हो जानेपर भी ज्ञानीका प्रारब्ध रहता है -- यह कथन केवल अज्ञानियोंको समझानेमात्रके लिये है। कारण कि अनुकूल या प्रतिकूल घटनाका घट जाना ही प्रारब्ध है। प्राणीको सुखी या दुःखी करना प्रारब्धका काम नहीं है? प्रत्युत अज्ञानका काम है। अज्ञान मिटनेपर मनुष्य सुखीदुःखी नहीं होता। उसे केवल अनुकूलताप्रतिकूलताका ज्ञान होता है। ज्ञान होना दोषी नहीं है? प्रत्युत सुखदुःखरूप विकार होना दोषी है। इसलिये वास्तवमें ज्ञानीका प्रारब्ध नहीं होता।(2) जैसा प्रारब्ध होता है? वैसी बुद्धि बन जाती है। जैसे? एक ही बाजारमें एक व्यापारी मालकी बिक्री कर देता है और एक व्यापारी माल खरीद लेता है। बादमें जब बाजारभाव तेज हो जाता है? तब बिक्री करनेवाले व्यापारीको नुकसान होता है तथा खरीदनेवाले व्यापारीको नफा होता है और जब बाजारभाव मन्दा हो जाता है? तब बिक्री करनेवाले व्यापारीको नफा होता है तथा खरीदनेवाले व्यापारीको नुकसान होता है। अतः खरीदने और बेचनेकी बुद्धि प्रारब्धसे बनती है अर्थात् नफा या नुकसानका जैसा प्रारब्ध होता है? उसीके अनुसार पहले बुद्धि बन जाती है? जिससे प्रारब्धके अनुसार फल भुगताया जा सके। परन्तु खरीदने और बेचनेकी क्रिया न्याययुक्त की जाय अथवा अन्याययुक्त की जाय -- इसमें मनुष्य स्वतन्त्र है क्योंकि यह क्रियमाण (नया कर्म) है? प्रारब्ध नहीं।(3) एक आदमीके हाथसे गिलास गिरकर टूट गया तो यह उसकी असावधानी है या प्रारब्धकर्म करते समय तो सावधान रहना चाहिये? पर जो (अच्छा या बुरा) हो गया? उसे पूरी तरहसे प्रारब्ध -- होनहार ही मानना चाहिये। उस समय जो यह कहते हैं कि यदि तू सावधानी रखता तो गिलास न टूटता -- इससे यह समझना चाहिये कि अब आगेसे मुझे सावधानी रखनी है कि दुबारा ऐसी गलती न हो जाय। वास्तवमें जो हो गया? उसे असावधानी न मानकर होनहार मानना चाहिये। इसलिये करनेमें सावधान और होनेमें प्रसन्न रहे। ,(4) प्रारब्धसे होनेवाले और कुपथ्यसे होनेवाले रागमें क्या फरक हैकुपथ्यजन्य रोग दवाईसे मिट सकता है परन्तु प्रारब्धजन्य रोग दवाईसे नहीं मिटता। महामृत्युञ्जय आदिका जप और यज्ञयागादि अनुष्ठान करनेसे प्रारब्धजन्य रोग भी कट सकता है? अगर अनुष्ठान प्रबल हो तो।रोगके दो प्रकार हैं -- आधि (मानसिक रोग) और व्याधि (शारीरिक रोग)। आधिके भी दो भेद हैं -- एक तो शोक? चिन्ता आदि और दूसरा पागलपन। चिन्ता? शोक आदि तो अज्ञानसे होते हैं और पागलपन प्रारब्धसे होता है। अतः ज्ञान होनेपर चिन्ताशोकादि तो मिट जाते हैं? पर प्रारब्धके अनुसार पागलपन हो सकता है। हाँ? पागलपन होनेपर भी ज्ञानीके द्वारा कोई अनुचित? शास्त्रनिषिद्ध क्रिया नहीं होती।(5) आकस्मिक मृत्यु और अकाल मृत्युमें क्या फरक है कोई व्यक्ति साँप काटनेसे मर जाय? अचानक ऊपरसे गिरकर मर जाय? पानीमें डूबकर मर जाय? हार्टफेल होनेसे मर जाय? किसी दुर्घटना आदिसे मर जाय? तो यह उसकी आकस्मिक मृत्यु है। स्वाभाविक मृत्युकी तरह आकस्मिक मृत्यु भी प्रारब्धके अनुसार (आयु पूरी होनेपर) होती है।कोई व्यक्ति जानकर आत्महत्या कर ले अर्थात् फाँसी लगाकर? कुएँमें कूदकर? गाड़ीके नीचे आकर? छतसे कूदकर? जहर खाकर? शरीरमें आग लगाकर मर जाय? तो यह उसकी अकाल मृत्यु है। यह मृत्यु आयुके रहते हुए ही होती है। आत्महत्या करनेवालेको मनुष्यकी हत्याका पाप लगता है। अतः यह नया पापकर्म है? प्रारब्ध नहीं। मनुष्यशरीर परमात्मप्राप्तिके लिये ही मिला है अतः उसको आत्महत्या करके नष्ट करना बड़ा भारी पाप है।कई बार आत्महत्या करनेकी चेष्टा करनेपर भी मनुष्य बच जाता है? मरता नहीं। इसका कारण यह है कि उसका दूसरे मनुष्यके प्रारब्धके साथ सम्बन्ध जुड़ा हुआ रहता है अतः उसके प्रारब्धके कारण वह बच जाता है। जैसे? भविष्यमें किसीका पुत्र होनेवाला है और वह आत्महत्या करनेका प्रयास करे तो उस (आगे होनेवाले) लड़केका प्रारब्ध उसको मरने नहीं देगा। अगर उस व्यक्तिके द्वारा भविष्यमें कोई विशेष अच्छा काम होनेवाला हो? लोगोंका उपकार होनेवाला हो अथवा इसी जन्ममें? इसी शरीरमें प्रारब्धका कोई उत्कट भोग (सुखदुःख) आनेवाला हो? तो आत्महत्याका प्रयास करनेपर भी वह मरेगा नहीं।(6) एक आदमीने दूसरे आदमीको मार दिया तो यह उसने पिछले जन्मके वैरका बदला लिया और मरनेवालेने पुराने कर्मोंका फल पाया? फिर मारनेवालेका क्या दोषमारनेवालेका दोष है। दण्ड देना शासकका काम है? सर्वसाधारणका नहीं। एक आदमीको दस बजे फाँसी मिलनी है। एकदूसरे आदमीने उस (फाँसीकी सजा पानेवाले) आदमीको जल्लादोंके हाथोंसे छुड़ा लिया और ठीक दस बजे उसे कत्ल कर दिया ऐसी हालतमें उस कत्ल करनेवाले आदमीको भी फाँसी होगी कि यह आज्ञा तो राज्यने जल्लादोंको दी थी? पर तुम्हें किसने आज्ञा दी थीमारनेवालेको यह याद नहीं है कि मैं पूर्वजन्मका बदला ले रहा हूँ? फिर भी मारता है तो यह उसका दोष है। दूसरेको मारनेका अधिकार किसीको भी नहीं है। मरना कोई भी नहीं चाहता। दूसरेको मारना अपने विवेकका अनादर है। मनुष्यमात्रको विवेकशक्ति प्राप्त है और उस विवेकके अनुसार अच्छे या बुरे कार्य करनेमें वह स्वतन्त्र है। अतः विवेकका अनादर करके दूसरेको मारना अथवा मारनेकी नीयत रखना दोष है।यदि पूर्वजन्मका बदला एकदूसरे ऐसे ही चुकाते रहें तो यह श्रृङ्खला कभी खत्म नहीं होगी और मनुष्य कभी मुक्त नहीं हो सकेगा। पिछले जन्मका बदला अन्य (साँप आदि) योनियोंमें लिया जा सकता है। मनुष्ययोनि बदला लेनेके लिये नहीं है। हाँ? यह हो सकता है कि पिछले जन्मका हत्यारा व्यक्ति हमें स्वाभाविक ही अच्छा नहीं लगेगा? बुरा लगेगा। परन्तु बुरे लगनेवाले व्यक्तिसे द्वेष करना या उसे कष्ट देना दोष है क्योंकि यह नया कर्म है।जैसा प्रारब्ध है? उसीके अनुसार उसकी बुद्धि बन गयी? फिर दोष किस बातकाबुद्धिमें जो द्वेष है? उसके वशमें हो गया -- यह दोष है। उसे चाहिये कि वह उसके वशमें न होकर विवेकका आदर करे। गीता भी कहती है कि बुद्धिमें जो रागद्वेष रहते हैं (3। 40)? उनके वशमें न हो -- तयोर्न वशमागच्छेत् (3। 34)।(7) प्रारब्ध और भगवत्कृपामें क्या अन्तर हैइस जीवको जो कुछ मिलता है? वह प्रारब्धके अनुसार मिलता है? पर प्रारब्धविधानके विधाता स्वयं भगवान् हैं। कारण कि कर्म जड होनेसे स्वतन्त्र फल नहीं दे सकते? वे तो भगवान्के विधानसे ही फल देते है। जैसे? एक आदमी किसीके खेतमें दिनभर काम करता है तो उसको शामके समय कामके अनुसार पैसे मिलते हैं? पर मिलते हैं खेतके मालिकसे।पैसे तो काम करनेसे ही मिलते हैं? बिना काम किये पैसे मिलते हैं क्यापैसे तो काम करनेसे ही मिलते हैं? बिना काम किये पैसे पैसा देगा कौन यदि कोई जंगलमें जाकर दिनभर मेहनत करे तो क्या उसको पैसे मिल जायँगे नहीं मिल सकते। उसमें यह देखा जायगा कि किसके कहनेसे काम किया और किसकी जिम्मेवारी रही।अगर कोई नौकर कामको बड़ी तत्परता? चतुरता और उत्साहसे करता है? पर करता है केवल मालिककी प्रसन्नताके लिये तो मालिक उसको मजदूरीसे अधिक पैसे भी दे देता है और तत्परता आदि गुणोंको देखकर उसको अपने खेतका हिस्सेदार भी बना देता है। ऐसे ही भगवान् मनुष्यको उसके कर्मोंके अनुसार फल देते हैं। अगर कोई मनुष्य भगवान्की आज्ञाके अनुसार? उन्हींकी प्रसन्नताके लिये सब कार्य करता है? उसे भगवान् दूसरोंकी अपेक्षा अधिक ही देते हैं परन्तु जो भगवान्के सर्वथा समर्पित होकर सब कार्य करता है? उस भक्तके भगवान् भी भक्त बन जाते हैं (टिप्पणी प0 894) संसारमें कोई भी नौकरको अपना मालिक नहीं बनाता परन्तु भगवान् शरणागत भक्तको अपना मालिक बना लेते हैं। ऐसी उदारता केवल प्रभुमें ही है। ऐसे प्रभुके चरणोंकी शरण न होकर जो मनुष्य प्राकृत -- उत्पत्तिविनाशशील पदार्थोंके पराधीन रहते हैं? उनकी बुद्धि सर्वथा ही भ्रष्ट हो चुकी है। वे इस बातको समझ ही नहीं सकते कि हमारे सामने प्रत्यक्ष उत्पन्न और नष्ट होनेवाले पदार्थ हमें कहाँतक सहारा दे सकते हैं। सम्बन्ध -- जिस प्रकार कर्मयोगमें कर्मोंका अपने साथ सम्बन्ध नहीं रहता? ऐसे ही सांख्यसिद्धान्तमें भी कर्मोंका अपने साथ किञ्चिन्मात्र भी सम्बन्ध नहीं रहता -- इसका विवेचन आगे करते हैं।
।।18.12।।कर्मफलका त्याग न करनेवाले मनुष्योंको कर्मोंका इष्ट, अनिष्ट और मिश्रित -- ऐसे तीन प्रकारका फल मरनेके बाद भी होता है; परन्तु कर्मफलका त्याग करनेवालोंको कहीं भी नहीं होता।
पञ्चैतानि महाबाहो कारणानि निबोध मे। साङ्ख्ये कृतान्ते प्रोक्तानि सिद्धये सर्वकर्मणाम् ॥
।।18.13।। व्याख्या -- पञ्चैतानि महाबाहो कारणानि -- हे महाबाहो जिसमें सम्पूर्ण कर्मोंका अन्त हो जाता है? ऐसे सांख्यसिद्धान्तमें सम्पूर्ण विहित और निषिद्ध कर्मोंके होनेमें पाँच हेतु बताये गये हैं। स्वयं (स्वरूप) उन कर्मोंमें हेतु नहीं है।निबोध मे -- इस अध्यायमें भगवान्ने जहाँ सांख्यसिद्धान्तका वर्णन आरम्भ किया है? वहाँ निबोध क्रियाका प्रयोग किया है (18। 13? 50)? जब कि दूसरी जगह श्रृणु क्रियाका प्रयोग किया है (18। 4? 19? 29? 36? 45? 64)। तात्पर्य यह है कि सांख्यसिद्धान्तमें तो निबोध पदसे अच्छी तरह समझनेकी बात कही है और दूसरी जगह श्रृणु पदसे सुननेकी बात कही है। अतः सांख्यसिद्धान्तको गहरी रीतिसे समझना चाहिये। अगर उसे अपनेआप (स्वयं) से गहरी रीतिसे समझा जाय? तो तत्काल तत्त्वका अनुभव हो जाता है।सांख्ये कृतान्ते प्रोक्तानि सिद्धये सर्वकर्मणाम् -- कर्म चाहे शास्त्रविहित हों? चाहे शास्त्रनिषिद्ध हों? चाहे शारीरिक हों? चाहे मानसिक हों? चाहे वाचिक हों? चाहे स्थूल हों और चाहे सूक्ष्म हों -- इन सम्पूर्ण कर्मोंकी सिद्धिके लिये पाँच हेतु कहे गये हैं। जब पुरुषका इन कर्मोंमें कर्तृत्व रहता है? तब कर्मसिद्धि और कर्मसंग्रह दोनों होते हैं? और जब पुरुषका इन कर्मोंके होनेमें कर्तृत्व नहीं रहता? तब कर्मसिद्धि तो होती है? पर कर्मसंग्रह नहीं होता? प्रत्युत क्रियामात्र होती है। जैसे? संसारमात्रमें परिवर्तन होता है अर्थात् नदियाँ बहती हैं? वायु चलती है? वृक्ष बढ़ते हैं? आदिआदि क्रियाएँ होती रहती है? परन्तु इन क्रियाओँसे कर्मसंग्रह नहीं होता अर्थात् ये क्रियाएँ पापपुण्यजनक अथवा बन्धनकारक नहीं होतीं। तात्पर्य यह हुआ कि कर्तृत्वाभिमानसे ही कर्मसिद्धि और कर्मसंग्रह होता है। कर्तृत्वाभिमान मिटनेपर क्रियामात्रमें अधिष्ठान? करण? चेष्टा और दैव -- ये चार हेतु ही होते हैं (गीता 18। 14)।यहाँ सांख्यसिद्धान्तका वर्णन हो रहा है। सांख्यसिद्धान्तमें विवेकविचारकी प्रधानता होती है? फिर भगवान्ने सर्वकर्मणां सिद्धये वाली कर्मोंकी बात यहाँ क्यों छेड़ी कारण कि अर्जुनके सामने युद्धका प्रसङ्ग है। क्षत्रिय होनेके नाते युद्ध उनका कर्तव्यकर्म है। इसलिये कर्मयोगसे अथवा सांख्ययोगसे ऐसे कर्म करने चाहिये? जिससे कर्म करते हुए भी कर्मोंसे सर्वथा निर्लिप्त रहे -- यह बात भगवान्को कहनी है। अर्जुनने सांख्यका तत्त्व पूछा है? इसलिये भगवान् सांख्यसिद्धान्तसे कर्म करनेकी बात कहना आरम्भ करते हैं।अर्जुन स्वरूपसे कर्मोंका त्याग करना चाहते थे अतः उनको यह समझाना था कि कर्मोंका ग्रहण और त्याग -- दोनों ही कल्याणमें हेतु नहीं हैं। कल्याणमें हेतु तो परिवर्तनशील नाशवान् प्रकृतिसे अपरिवर्तनशील अविनाशी अपने स्वरूपका सम्बन्धविच्छेद ही है। उस सम्बन्धविच्छेदकी दो प्रक्रियाएँ हैं -- कर्मयोग और सांख्ययोग। कर्मयोगमें तो फलका अर्थात् ममताका त्याग मुख्य है और सांख्ययोगमें अहंताका त्याग मुख्य है। परन्तु ममताके त्यागसे अहंताका और अहंताके त्यागसे ममताका त्याग स्वतः हो जाता है। कारण कि अहंतामें भी ममता होती है जैसे -- मेरी बात रहे? मेरी बात कट न जाय -- यह मैंपनके साथ भी मेरापन है। इसलिये ममता(मेरापन)को छोड़नेसे अहंता(मैंपन) छूट जाती है (टिप्पणी प0 895)। ऐसे ही पहले अहंता होती है? तब ममता होती है अर्थात् पहले मैं होता है? तब मेरापन होता है। परन्तु जहाँ अहंता(मैंपन)का ही त्याग कर दिया जायगा? वहाँ ममता (मेरापन) कैसे रहेगी वह भी छूट ही जायगी। सम्बन्ध -- सम्पूर्ण कर्मोंकी सिद्धिमें पाँच हेतु कौनसे हैं अब यह बताते हैं।
।।18.13।।हे महाबाहो ! कर्मोंका अन्त करनेवाले सांख्यसिद्धान्तमें सम्पूर्ण कर्मोंकी सिद्धिके लिये ये पाँच कारण बताये गये हैं, इनको तू मेरेसे समझ।
अधिष्ठानं तथा कर्ता करणं च पृथग्विधम्। विविधाश्च पृथक्चेष्टा दैवं चैवात्र पञ्चमम् ॥
।।18.14।। व्याख्या -- अधिष्ठानम् -- शरीर और जिस देशमें यह शरीर स्थित है? वह देश -- ये दोनों अधिष्ठान हैं।कर्ता -- सम्पूर्ण क्रियाएँ प्रकृति और प्रकृतिके कार्योंके द्वारा ही होती हैं। वे क्रियाएँ चाहे समष्टि हों? चाहे व्यष्टि हों परन्तु उन क्रियाओँका कर्ता स्वयं नहीं है। केवल अहंकारसे मोहित अन्तःकरणवाला अर्थात् जिसको चेतन और जडका ज्ञान नहीं है -- ऐसा अविवेककी पुरुष ही जब प्रकृतिसे होनेवाली क्रियाओंको अपनी मान लेता है? तब वह कर्ता बन जाता है (टिप्पणी प0 896)। ऐसा कर्ता ही कर्मोंकी सिद्धिमें हेतु बनता है।करणं च पृथग्विधम् -- कुल तेरह करण हैं। पाणि? पाद? वाक्? उपस्थ और पायु -- ये पाँच कर्मेन्द्रियाँ और श्रोत्र? चक्षु? त्वक्? रसना और घ्राण -- ये पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ -- ये दस बहिःकरण हैं तथा मन? बुद्धि और अहंकार -- ये तीन अन्तःकरण हैं।विविधाश्च पृथक्चेष्टाः -- उपर्युक्त तेरह करणोंकी अलगअलग चेष्टाएँ होती हैं जैसे -- पाणि (हाथ) -- आदानप्रदान करना? पाद (पैर) -- आनाजाना? चलनाफिरना? वाक् -- बोलना? उपस्थ -- मूत्रका त्याग करना? पायु (गुदा) -- मलका त्याग करना? श्रोत्र -- सुनना? चक्षु -- देखना? त्वक् -- स्पर्श करना? रसना -- चखना? घ्राण -- सूँघना? मन -- मनन करना? बुद्धि -- निश्चय करना और अहंकार -- मैं ऐसा हूँआदि अभिमान करना।दैवं चैवात्र पञ्चमम् -- कर्मोंकी सिद्धिमें पाँचवें हेतुका नाम दैव है। यहाँ दैव नाम संस्कारोंका है। मनुष्य जैसा कर्म करता है? वैसा ही संस्कार उसके अन्तःकरणपर पड़ता है। शुभकर्मका शुभ संस्कार पड़ता है और अशुभकर्मका अशुभ संस्कार पड़ता है। वे ही संस्कार आगे कर्म करनेकी स्फुरणा पैदा करते हैं। जिसमें जिस कर्मका संस्कार जितना अधिक होता है? उस कर्ममें वह उतनी ही सुगमतासे लग सकता है और जिस कर्मका विशेष संस्कार नहीं है? उसको करनेमें उसे कुछ परिश्रम पड़ सकता है। इसी प्रकार मनुष्य सुनता है? पुस्तकें पढ़ता है और विचार भी करता है तो वे भी अपनेअपने संस्कारोंके अनुसार ही करता है। तात्पर्य है कि मनुष्यके अन्तःकरणमें शुभ और अशुभ -- जैसे संस्कार होते हैं? उन्हींके अनुसार कर्म करनेकी स्फुरणा होती है।इस श्लोकमें कर्मोंकी सिद्धिमें पाँच हेतु बताये गये हैं -- अधिष्ठान? कर्ता? करण? चेष्टा और दैव। इसका कारण यह है कि आधारके बिना कोई भी काम कहाँ किया जायगा इसलिये अधिष्ठान पद आया है। कर्ताके बिना क्रिया कौन करेगा इसलिये कर्ता पद आया है। क्रिया करनेके साधन (करण) होनेसे ही तो कर्ता क्रिया करेगा? इसलिये करण पद आया है। करनेके साधन होनेपर भी क्रिया नहीं की जायगी तो कर्मसिद्धि कैसे होगी इसलिये चेष्टा पद आया है। कर्ता अपनेअपने संस्कारोंके अनुसार ही क्रिया करेगा? संस्कारोंके विरुद्ध अथवा संस्कारोंके बिना क्रिया नहीं कर सकेगा? इसलिये दैव पद आया है। इस प्रकार इन पाँचोंके होनेसे ही कर्मसिद्धि होती है।
।।18.14।।इसमें (कर्मोंकी सिद्धिमें) अधिष्ठान तथा कर्ता और अनेक प्रकारके करण एवं विविध प्रकारकी अलग-अलग चेष्टाएँ और वैसे ही पाँचवाँ कारण दैव (संस्कार) है।
शरीरवाङ्मनोभिर्यत्कर्म प्रारभते नरः। न्याय्यं वा विपरीतं वा पञ्चैते तस्य हेतवः ॥
।।18.15।। व्याख्या -- शरीरवाङ्मनोभिर्यत्कर्म ৷৷. पञ्चैते तस्य हेतवः -- पीछेके (चौदहवें) श्लोकमें कर्मोंके होनेमें जो अधिष्ठान आदि पाँच हेतु बताये गये हैं? वे पाँचों हेतु इन पदोंमें आ जाते हैं जैसे -- शरीर पदमें अधिष्ठान आ गया? वाक् पदमें बहिःकरण और मन पदमें अन्तःकरण आ गया? नरः पदमें कर्ता आ गया? और प्रारभते पदमें सम्पूर्ण इन्द्रियोंकी चेष्टा आ गयी। अब रही दैव की बात। यह दैव अर्थात् संस्कार अन्तःकरणमें ही रहता है परन्तु उसका स्पष्ट रीतिसे पता नहीं लगता। उसका पता तो उससे उत्पन्न हुई वृत्तियोंसे और उसके अनुसार किये हुए कर्मोंसे ही लगता है।मनुष्य शरीर? वाणी और मनसे जो कर्म आरम्भ करता है अर्थात् कहीं शरीरकी प्रधानतासे? कहीं वाणीकी प्रधानतासे और कहीं मनकी प्रधानतासे जो कर्म करता है? वह चाहे न्याय्य -- शास्त्रविहित हो? चाहे विपरीत, -- शास्त्रविरुद्ध हो? उसमें ये (पूर्वश्लोकमें आये) पाँच हेतु होते हैं।शरीर? वाणी और मन -- इन तीनोंके द्वारा ही सम्पूर्ण कर्म होते हैं। इनके द्वारा किये गये कर्मोंको ही कायिक? वाचिक और मानसिक कर्मकी संज्ञा दी जाती है। इन तीनोंमें अशुद्धि आनेसे ही बन्धन होता है। इसीलिये इन तीनों(शरीर? वाणी और मन) की शुद्धिके लिये सत्रहवें अध्यायके चौदहवें? पन्द्रहवें और सोलहवें श्लोकमें क्रमशः कायिक? वाचिक और मानसिक तपका वर्णन किया गया है। तात्पर्य यह है कि शरीर? वाणी और मनसे कोई भी शास्त्रनिषिद्ध कर्म न किया जाय? केवल शास्त्रविहित कर्म ही किये जायँ? तो वह तप हो जाता है। सत्रहवें अध्यायके ही सत्रहवें श्लोकमें अफलाकाङ्क्षिभिः पद देकर यह बताया है कि निष्कामभावसे किया हुआ तप सात्त्विक होता है। सात्त्विक तप बाँधनेवाला नहीं होता? प्रत्युत मुक्ति देनेवाला होता है। परन्तु राजसतामस तप बाँधनेवाले होते हैं।इन शरीर? वाणी आदिको अपना समझकर अपने लिये कर्म करनेसे ही इनमें अशुद्धि आती है? इसलिये इनको शुद्ध किये बिना केवल विचारसे बुद्धिके द्वारा सांख्यसिद्धान्तकी बातें तो समझमें आ सकती हैं परन्तु कर्मोंके साथ मेरा किञ्चिन्मात्र भी सम्बन्ध नहीं है -- ऐसा स्पष्ट बोध नहीं हो सकता। ऐसी हालतमें साधक शरीर आदिको अपना न समझे और अपने लिये कोई कर्म न करे तो वे शरीरादि बहुत जल्दी शुद्ध हो जायँगे अतः चाहे कर्मयोगकी दृष्टिसे इनको शुद्ध करके इनसे सम्बन्ध तोड़ ले? चाहे सांख्ययोगकी दृष्टिसे प्रबल विवेकके द्वारा इनसे सम्बन्ध तोड़ ले। दोनों ही साधनोंसे प्रकृति और प्रकृतिके कार्यके साथ अपने माने हुए सम्बन्धका विच्छेद हो जाता है और वास्तविक तत्त्वका अनुभव हो जाता है।जिस समष्टिशक्तिसे संसारमात्रकी क्रियाएँ होती हैं? उसी समष्टिशक्तिसे व्यष्टि शरीरकी क्रियाएँ भी स्वाभाविक होती हैं। विवेकको महत्त्व न देनेके कारण स्वयं उन क्रियाओंमेंसे खानापीना? उठनाबैठना? सोनाजगना आदि जिन क्रियाओंका कर्ता अपनेको मान लेता है? वहाँ कर्मसंग्रह होता है अर्थात् वे क्रियाएँ बाँधनेवाली हो जाती हैं। परन्तु जहाँ स्वयं अपनेको कर्ता नहीं मानता? वहाँ कर्मसंग्रह नहीं होता। वहाँ तो केवल क्रियामात्र होती है। इसलिये वे क्रियाएँ फलोत्पादक अर्थात् बाँधनेवाली नहीं होतीं। जैसे? बचपनसे जवान होना? श्वासका आनाजाना? भोजनका पाचन होना तथा रस आदि बन जाना आदि क्रियाएँ बिना कर्तृत्वाभिमानके प्रकृतिके द्वारा स्वतःस्वाभाविक होती हैं और उनका कोई कर्मसंग्रह अर्थात् पापपुण्य नहीं होता। ऐसे ही कर्तृत्वाभिमान न रहनेपर सभी क्रियाएँ प्रकृतिके द्वारा ही होती हैं -- ऐसा स्पष्ट अनुभव हो जाता है। सम्बन्ध -- भगवान्ने सांख्यसिद्धान्त बतानेके लिये जो उपक्रम किया है? उनमें कर्मोंके होनेमें पाँच हेतु बतानेका क्या आशय है -- इसका वर्णन आगेके श्लोकमें करते हैं।
।।18.15।।मनुष्य, शरीर वाणी और मनके द्वारा शास्त्रविहित अथवा शास्त्रविरुद्ध जो कुछ भी कर्म आरम्भ करता है, उसके ये (पूर्वोक्त) पाँचों हेतु होते हैं।
तत्रैवं सति कर्तारमात्मानं केवलं तु यः। पश्यत्यकृतबुद्धित्वान्न स पश्यति दुर्मतिः ॥
।।18.16।। व्याख्या -- तत्रैवं सति ৷৷. पश्यति दुर्मतिः -- जितने भी कर्म होते हैं? वे सब अधिष्ठान? कर्ता? करण? चेष्टा और दैव -- इन पाँच हेतुओंसे ही होते हैं? अपने स्वरूपसे नहीं। परन्तु ऐसा होनेपर भी जो पुरुष अपने स्वरूपको कर्ता मान लेता है? उसकी बुद्धि शुद्ध नहीं है -- अकृतबुद्धित्वात् अर्थात् उसने विवेकविचारको महत्त्व नहीं दिया है। जड और चेतनका? प्रकृति और पुरुषका जो वास्तविक विवेक है? अलगाव है? उसकी तरफ उसने ध्यान नहीं दिया है। इसलिये उसकी बुद्धिमें दोष आ गया है। उस दोषके कारण वह अपनेको कर्ता मान लेता है।यहाँ आये अकृतबुद्धित्वात् और दुर्मतिःपदोंका समान अर्थ दीखते हुए भी इनमें थोड़ा फरक है। अकृतबुद्धित्वात् पद हेतुके रूपमें आया है और दुर्मतिः पद कर्ताके विशेषणके रूपमें आया है अर्थात् कर्ताके दुर्मति होनेमें अकृतबुद्धि ही हेतु है। तात्पर्य है कि बुद्धिको शुद्ध न करनेसे अर्थात् बुद्धिमें विवेक जाग्रत् न करनेसे ही वह दुर्मति है। अगर वह विवेकको जाग्रत् करता? तो वह दुर्मति नहीं रहता।केवल (शुद्ध) आत्मा कुछ नहीं करता -- न करोति न लिप्यते (गीता 13। 31) परन्तु तादात्म्यके कारण मैं नहीं करता हूँ -- ऐसा बोध नहीं होता। बोध न होनेमें अकृतबुद्धि ही कारण है अर्थात् जिसने बुद्धिको शुद्ध नहीं किया है? वह दुर्मति ही अपनेको कर्ता मान लेता है जब कि शुद्ध आत्मामें कर्तृत्व नहीं है।केवलम् पद कर्मयोग और सांख्ययोग -- दोनोंमें ही आया है। प्रकृति और पुरुषके विवेकको लेकर कर्मयोग और सांख्ययोग चलते हैं। कर्मयोगमें सब क्रियाएँ शरीर? मन? बुद्धि और इन्द्रियोंके द्वारा ही होती हैं? पर उनके साथ सम्बन्ध नहीं जुड़ता अर्थात् उनमें ममता नहीं होती। ममता न होनेसे शरीर? मन आदिकी संसारके साथ जो एकता है? वह एकता अनुभवमें आ जाती है। एकताका अनुभव होते ही स्वरूपमें स्वतःसिद्ध स्थितिका अनुभव हो जाता है। इसलिये कर्मयोगमें केवलैः पद शरीर? मन? बुद्धि और इन्द्रियोंके साथ दिया गया है -- कायेन मनसा बुद्ध्या केवलैरिन्द्रियैरपि (गीता 5। 11)।सांख्ययोगमें विवेकविचारकी प्रधानता है। जितने भी कर्म होते हैं? वे सब पाँच हेतुओंसे ही होते हैं? अपने स्वरूपसे नहीं। परन्तु अहंकारसे मोहित अन्तःकरणवाला अपनेको कर्ता मान लेता है। विवेकसे मोह मिट जाता है। मोह मिटनेसे वह अपनेको कर्ता कैसे मान सकता है अर्थात् उसे अपने शुद्ध स्वरूपका अनुभव हो जाता है। इसलिये सांख्ययोगमें केवलम् पद स्वरूपके साथ दिया गया है -- केवलम् आत्मानम्।अब इसमें एक बात विशेष ध्यान देनेकी है कि कर्मयोगमें केवल शब्द शरीर? मन आदिके साथ रहनेसे शरीर? मन? बुद्धि आदिके साथ अहम् भी संसारकी सेवामें लग जायगा तथा स्वरूप ज्योंकात्यों रह जायगा और सांख्ययोगमें स्वरूपके साथ केवल रहनेसे मैं निर्लेप हूँ? मैं शुद्धबुद्धमुक्त हूँ इस प्रकार सूक्ष्मरीतिसे अहम् की गंध रह जायगी। मैं निर्लेप रहूँ मेरेमें कर्तृत्व नहीं है -- ऐसी स्थिति बहुत कालतक रहनेसे यह अहम् भी अपनेआप गल जायगा अर्थात् अपने कारण प्रकृतिमें लीन हो जायगा। सम्बन्ध -- पूर्वश्लोकमें यह बताया कि शुद्ध स्वरूपको कर्ता देखनेवाला दुर्मति ठीक नहीं देखता। तो ठीक देखनेवाला कौन है -- इसका वर्णन आगेके श्लोकमें करते हैं।
।।18.16।।परन्तु ऐसे पाँच हेतुओंके होनेपर भी जो उस (कर्मोंके) विषयमें केवल (शुद्ध) आत्माको कर्ता मानता है, वह दुर्मति ठीक नहीं समझता; क्योंकि उसकी बुद्धि शुद्ध नहीं है।
यस्य नाहंकृतो भावो बुद्धिर्यस्य न लिप्यते। हत्वाऽपि स इमाँल्लोकान्न हन्ति न निबध्यते ॥
।।18.17।। व्याख्या -- यस्य नाहंकृतो भावो बुद्धिर्यस्य न लिप्यते -- जिससे मैं करता हूँ -- ऐसा अहंकृतभाव नहीं है और जिसकी बुद्धिमें मेरको फल मिलेगा -- ऐसे स्वार्थभावका लेप नहीं है। इसको ऐसे समझना चाहिये -- जैसे शास्त्रविहित और शास्त्रनिषिद्ध -- ये सभी क्रियाएँ एक प्रकाशमें होती हैं और प्रकाशके ही आश्रित होती हैं परन्तु प्रकाश किसी भी क्रियाका कर्ता नहीं बनता अर्थात् प्रकाश उन क्रियाओँको न करनेवाला है और न करानेवाला है। ऐसे ही स्वरूपकी सत्ताके बिना विहित और निषिद्ध -- कोई भी क्रिया नहीं होती परन्तु वह सत्ता उन क्रियाओंको न करनेवाली है और न करानेवाली है -- ऐसा जिसको साक्षात् अनुभव हो जाता है? उसमें मैं क्रियाओंको करनेवाला हूँ -- ऐसा अहंकृतभाव नहीं रहता और अमुक चीज चाहिये? अमुक चीज नहीं चाहिये अमुक घटना होनी चाहिये? अमुक घटना नहीं होनी चाहिये -- ऐसा बुद्धिमें लेप (द्वन्द्वमोह) नहीं रहता। अहंकृतभाव और बुद्धिमें लेप न रहनेसे उसके कर्तृत्व और भोक्तृत्व -- दोनों नष्ट हो जाते हैं अर्थात् अपनेमें कर्तृत्व और भोक्तृत्व -- ये दोनों ही नहीं हैं? इसका वास्तविक अनुभव हो जाता है।प्रकृतिका कार्य स्वतःस्वाभाविक ही चल रहा है? परिवर्तित हो रहा है और अपना स्वरूप केवल उसका प्रकाशक है -- ऐसा समझकर जो अपने स्वरूपमें स्थित रहता है? उसमें मैं करता हूँ ऐसा अहंकृतभाव नहीं होता क्योंकि अंहकृतभाव प्रकृतिके कार्य शरीरको स्वीकार करनेसे ही होता है। अहंकृतभाव सर्वथा मिटनेपर उसकी बुद्धिमें फल मेरेको मिले ऐसा लेप भी नहीं होता अर्थात् फलकी कामना नहीं होती।अहंकृतभाव एक मनोवृत्ति है। मनोवृत्ति होते हुए भी यह भाव स्वयं(कर्ता)में रहता है क्योंकि कर्तृत्व और अकर्तृत्व भाव स्वयं ही स्वीकार करता है।हत्वापि स इमाँल्लोकान्न हन्ति न निबध्यते -- वह इन सम्पूर्ण प्राणियोंको एक साथ मार डाले? तो भी वह मारता नहीं क्योंकि उसमें कर्तृत्व नहीं है और वह बँधता भी नहीं क्योंकि उसमें भोक्तृत्व नहीं है। तात्पर्य यह है कि उसका न क्रियाओंके साथ सम्बन्ध है और न फलके साथ सम्बन्ध है।वास्तवमें प्रकृति ही क्रिया और फलमें परिणत होती है। परन्तु इस वास्तविकताका अनुभव न होनेसे ही पुरुष (चेतन) कर्ता और भोक्ता बनता है। कारण कि जब अहंकारपूर्वक क्रिया होती है? तब कर्ता? करण और कर्म -- तीनों मिलते हैं और तभी कर्मसंग्रह होता है। परन्तु जिसमें अहंकृतभाव नहीं रहा? केवल सबका प्रकाशक? आश्रय? सामान्य चेतन ही रहा? फिर वह कैसे किसको मारे और कैसे किससे बँधे उसका मारना और बँधना सम्भव ही नहीं है (गीता 2। 19)।सम्पूर्ण प्राणियोंको मारना क्या है जिसमें अहंकृतभाव नहीं है और जिसकी बुद्धिमें लेप नहीं है -- ऐसे मनुष्यका शरीर जिस वर्ण और आश्रममें रहता है? उसके अनुसार उसके सामने जो परिस्थिति आ जाती है? उसमें प्रवृत्त होनेपर उसे पाप नहीं लगता। जैसे? किसी जीवन्मुक्त क्षत्रियके लिये स्वतः युद्धकी परिस्थिति प्राप्त हो जाय तो वह उसके अनुसार सबको मारकर भी न तो मारता है और न बँधता है। कारण कि उसमें अभिमान और स्वार्थभाव नहीं है।यहाँ अर्जुनके सामने भी युद्धका प्रसङ्ग है। इसलिये भगवान्ने हत्वापि पदसे अर्जुनको युद्धके लिये प्रेरणा की है। अपि पदका भाव हैं -- कर्मण्यभिप्रवृत्तोऽपि नैव किञ्चित्करोति सः (गीता 4। 20) कर्मोंमें अच्छी तरह प्रवृत्त होनेपर भी वह कुछ नहीं करता। सर्वथा वर्तमानोऽपि स योगी मयि वर्तते (गीता 6। 31) सर्वथा बर्ताव करता हुआ भी वह योगी मेरेमें रहता है। शरीरस्थोऽपि कौन्तेय न करोति न लिप्यते (गीता 13। 31) शरीरमें स्थित होनेपर भी न करता है और न लिप्त होता है। तात्पर्य यह है कि कर्मोंमें साङ्गोपाङ्ग प्रवृत्त होनेके समय और जिस समय कर्मोंमें प्रवृत्त नहीं है? उस समय भी स्वरूपकी निर्विकल्पता ज्योंकीत्यों रहती है अर्थात् क्रिया करनेसे अथाव क्रिया न करनेसे स्वरूपमें कुछ भी फरक नहीं पड़ता। कारण कि क्रियाविभाग प्रकृतिमें है? स्वरूपमें नहीं।वास्तवमें यह अहंभाव (व्यक्तित्व) ही मनुष्यमें भिन्नता करनेवाला है। अहंभाव न रहनेसे परमात्माके साथ भिन्नताका कोई कारण ही नहीं है। फिर तो केवल सबका आश्रय? प्रकाशक सामान्य चेतन रहता है। वह न तो क्रियाका कर्ता बनता है? और न फलका भोक्ता ही बनता है। क्रियाओंका कर्ता और फलका भोक्ता तो वह पहले भी नहीं था। केवल नाशवान् शरीरके साथ सम्बन्ध मानकर जिस अहंभावको स्वीकार किया है? उसी अहंभावसे उसमें कर्तापन और भोक्तापन आया है।अहम् दो प्रकारका होता है -- अहंस्फूर्ति और अहंकृति। गाढ़ नींदसे उठते ही सबसे पहले मनुष्यको अपने होनेपन(सत्तामात्र) का भान होता है? इसको अहंस्फूर्ति कहते हैं। इसके बाद वह अपनेमें मैं अमुक नाम? वर्ण? आश्रम आदिका हूँ -- ऐसा आरोप करता है? यही असत्का सम्बन्ध है। असत्के सम्बन्धसे अर्थात् शरीरके साथ तादात्म्य माननेसे शरीरकी क्रियाको लेकर मैं करता हूँ -- ऐसा भाव उत्पन्न होता है? इसको अहंकृति कहते हैं।अहम् को लेकर ही अपनेमें परिच्छिन्नता आती है। इसलिये अहंस्फूर्तिमें भी किञ्चित् परिच्छिन्नता (व्यक्तित्व) रह सकती है। परन्तु यह परिच्छिन्नता बन्धनकारक नहीं होती अर्थात् परिच्छिन्नता रहनेपर भी अहंस्फूर्ति दोषी नहीं होती। कारण कि अहंकृति अर्थात् कर्तृत्वके बिना अपनेमें गुणदोषका आरोप नहीं होता।,अहंकृति आनेसे ही अपनेमें गुणदोषका आरोप होता है? जिससे शुभअशुभ कर्म बनते हैं। बोध होनेपर अहंस्फूर्तिमें जो परिच्छिन्नता है? वह जल जाती है और स्फूर्तिमात्र रह जाती है। ऐसी स्थितिमें मनुष्य न मारता है और न बँधता है।न हन्ति न निबध्यते (न मारता है और न बँधता है) का क्या भाव है एक निर्विकल्पअवस्था होती है और एक निर्विकल्पबोध होता है। निर्विकल्पअवस्था साधनसाध्य है और उसका उत्थान भी होता है अर्थात् वह एकरस नहीं रहती। इस निर्विकल्पअवस्थासे भी असङ्गता होनेपर स्वतःसिद्ध निर्विकल्पबोधका अनुभव होता है। निर्विकल्पबोध साधनसाध्य नहीं है और उसमें निर्विकल्पता किसी भी अवस्थामें किञ्चिन्मात्र भी भंग नहीं होती। निर्विकल्पबोधमें कभी परिवर्तन हुआ नहीं? होगा नहीं और होना सम्भव भी नहीं। तात्पर्य है कि उस निर्विकल्पबोधमें कभी हलचल आदि नहीं होते? यही न हन्ति न निबध्यते का भाव है।अहंकृतभाव और बुद्धिमें लेप न रहनेका उपाय क्या है क्रियारूपसे परिवर्तन केवल प्रकृतिमें ही होता है और उन क्रियाओंका भी आरम्भ और अन्त होता है तथा उन कर्मोंके फलरूपसे जो पदार्थ मिलते हैं? उनका भी संयोगवियोग होता है। इस प्रकार क्रिया और पदार्थ -- दोनोंके साथ संयोगवियोग होता रहता है। संयोगवियोग होनेपर भी स्वयं तो प्रकाशकरूपसे ज्योंकात्यों ही रहता है। विवेकविचारसे ऐसा अनुभव होनेपर अहंकृतभाव और बुद्धिमें लेप नहीं रहता। सम्बन्ध -- ज्ञान और प्रवृत्ति (क्रिया) दोषी नहीं होते? प्रत्युत कर्तृत्वाभिमान ही दोषी होता है क्योंकि कर्तृत्वाभिमानसे ही कर्मसंग्रह होता है -- यह बात आगेके श्लोकमें बताते हैं।
।।18.17।।जिसका अहंकृतभाव नहीं है और जिसकी बुद्धि लिप्त नहीं होती, वह इन सम्पूर्ण प्राणियोंको मारकर भी न मारता है और न बँधता है।
ज्ञानं ज्ञेयं परिज्ञाता त्रिविधा कर्मचोदना। करणं कर्म कर्तेति त्रिविधः कर्मसंग्रहः ॥
।।18.18।। व्याख्या -- [इसी अध्यायके चौदहवें श्लोकमें भगवान्ने कर्मोंके बननेमें पाँच हेतु बताये -- अधिष्ठान? कर्ता? करण? चेष्टा और दैव (संस्कार)। इन पाँचोंमें भी मूल हेतु है -- कर्ता। इसी मूल हेतुको मिटानेके लिये भगवान्ने सोलहवें श्लोकमें कर्तृत्वभाव रखनेवालेकी बड़ी निन्दा की और सत्रहवें श्लोकमें कर्तृत्वभाव न रखनेवालेकी बड़ी प्रशंसा की। कर्तृत्वभाव बिलकुल न रहे? यह साफसाफ समझानेके लिये ही अठारहवाँ श्लोक कहा गया है।]ज्ञानं ज्ञेयं परिज्ञाता त्रिविधा कर्मचोदना -- ज्ञान? ज्ञेय और परिज्ञाता -- इन तीनोंसे कर्मप्रेरणा होती है। ज्ञान को सबसे पहले कहनेमें यह भाव है कि हरेक मनुष्यकी कोई भी प्रवृत्ति होती है तो प्रवृत्तिसे पहले ज्ञान होता है। जैसे? जल पीनेकी प्रवृत्तिसे पहले प्यासका ज्ञान होता है? फिर वह जलसे प्यास बुझाता है। जल आदि जिस विषयका ज्ञान होता है? वह ज्ञेय कहलाता है और जिसको ज्ञान होता है? वह परिज्ञाता कहलाता है। ज्ञान? ज्ञेय और परिज्ञाता -- तीनों होनेसे ही कर्म करनेकी प्रेरणा होती है। यदि इन तीनोंमेंसे एक भी न हो तो कर्म करनेकी प्रेरणा नहीं होती।परिज्ञाता उसको कहते हैं? जो परितः ज्ञाता है अर्थात् जो सब तरहकी क्रियाओंकी स्फुरणाका ज्ञाता है। वह केवल ज्ञाता मात्र है अर्थात् उसे क्रियाओंकी स्फुरणामात्रका ज्ञान होता है? उसमें अपने लिये कुछ चाहनेका अथवा उस क्रियाको करनेका अभिमान आदि बिलकुल नहीं होता।कोई भी क्रिया करनेकी स्फुरणा एक व्यक्तिविशेषमें ही होती है। इसलिये शब्द? स्पर्श? रूप? रस और गन्ध -- इन विषयोंको लेकर सुननेवाला? स्पर्श करनेवाला? देखनेवाला? चखनेवाला और सूँघनेवाला -- इस तरह अनेक कर्ता हो सकते हैं परन्तु उन सबको जाननेवाला एक ही रहता है? उसे ही यहाँ,परिज्ञाता कहा है।करणं कर्म कर्तेति त्रिविधः कर्मसंग्रहः -- कर्मसंग्रहके तीन हेतु हैं -- करण? कर्म तथा कर्ता। इन तीनोंके,सहयोगसे कर्म पूरा होता है। जिन साधनोंसे कर्ता कर्म करता है? उन क्रिया करनेके साधनों(इन्द्रियों आदि)को करण कहते हैं। खानापीना? उठनाबैठना? चलनाफिरना? आनाजाना आदि जो चेष्टाएँ की जाती हैं? उनको कर्म कहते हैं। करण और क्रियासे अपना सम्बन्ध जोड़कर कर्म करनेवालेको कर्ता कहते हैं। इस प्रकार इन तीनोंके मिलनेसे ही कर्म बनता है।भगवान्को यहाँ खास बात यह बतानी है कि कर्मसंग्रह कैसे होता है अर्थात् कर्म बाँधनेवाला कैसे होता है कर्म बननेके तीन हेतु बताते हुए भगवान्का लक्ष्य मूल हेतु कर्ता को बतानेमें है क्योंकि कर्मसंग्रहका खास सम्बन्ध कर्तासे है। यदि कर्तापन न हो तो कर्मसंग्रह नहीं होता? केवल क्रियामात्र होती है।कर्मसंग्रहमें करण हेतु नहीं है क्योंकि करण कर्ताके अधीन होता है। कर्ता जैसा कर्म करना चाहता है? वैसा ही कर्म होता है? इसलिये कर्म भी कर्मसंग्रहमें खास हेतु नहीं है। सांख्यसिद्धान्तके अनुसार खास बाँधनेवाला है -- अहंकृतभाव और इसीसे कर्मसंग्रह होता है। अहंकृतभाव न रहनेसे कर्मसंग्रह नहीं होता अर्थात् कर्म फलजनक नहीं होता। इस मूलका ज्ञान करानेके लिये ही भगवान्ने करण और कर्मको पहले रखकर कर्ताको कर्मसंग्रहके पासमें रखा है? जिससे यह खयालमें आ जाय कि बाँधनेवाला कर्ता ही है। सम्बन्ध -- गुणातीत होनेके उद्देश्यसे अब आगेके श्लोकसे त्रिगुणात्मक पदार्थोंका प्रकरण आरम्भ करते हैं।
।।18.18।।ज्ञान, ज्ञेय और परिज्ञाता -- इन तीनोंसे कर्मप्रेरणा होती है तथा करण, कर्म और कर्ता -- इन तीनोंसे कर्मसंग्रह होता है।
ज्ञानं कर्म च कर्ताच त्रिधैव गुणभेदतः। प्रोच्यते गुणसङ्ख्याने यथावच्छृणु तान्यपि ॥
।।18.19।। व्याख्या -- प्रोच्यते गुणसंख्याने -- जिस शास्त्रमें गुणोंके सम्बन्धसे प्रत्येक पदार्थके भिन्नभिन्न भेदोंकी गणना की गयी है? उसी शास्त्रके अनुसार मैं तुम्हें ज्ञान? कर्म तथा कर्ताके भेद बता रहा हूँ।ज्ञानं कर्म च कर्ता च त्रिधैव गुणभेदतः -- पीछेके श्लोकमें भगवान्ने कर्मकी प्रेरणा होनेमें तीन हेतु बताये तथा तीन ही हेतु कर्मके बननेमें बताये। इस प्रकार कर्मसंग्रह होनेतकमें कुल छः बातें बतायीं (टिप्पणी प0 901)। अब इस श्लोकमें भगवान् ज्ञान? कर्म तथा कर्ता -- इन तीनोंका विवेचन करनेकी ही बात कहते हैं। कर्मप्रेरकविभागमेंसे विवेचन करनेके लिये केवल ज्ञान लिया गया है? क्योंकि किसी भी कर्मकी प्रेरणामें पहले ज्ञान ही होता है। ज्ञानके बाद ही कार्यका आरम्भ होता है। कर्मसंग्रहविभागमेंसे केवल कर्म और कर्ता लिये गये हैं। यद्यपि कर्मके होनेमें कर्ता मुख्य है? तथापि साथमें कर्मको भी लेनेका कारण यह है कि कर्ता जब कर्म करता है? तभी कर्मसंग्रह होता है। अगर कर्ता कर्म न करे तो कर्मसंग्रह होगा ही नहीं। तात्पर्य यह हुआ कि कर्मप्रेरणामें ज्ञान तथा कर्मसंग्रहमें कर्म और कर्ता मुख्य हैं। इन तीनों -- (ज्ञान? कर्म और कर्ता -- ) के सात्त्विक होनेसे ही मनुष्य निर्लिप्त हो सकता है? राजस और तामस होनेसे नहीं। अतः यहाँ कर्मप्रेरकविभागमें ज्ञाता और ज्ञेय को तथा कर्मसंग्रहविभागमें करण को नहीं लिया गया है।कर्मप्रेरकविभाग के ज्ञाता और ज्ञेय का विवेचन क्यों नहीं किया कारण कि ज्ञाता जब क्रियासे सम्बन्ध जोड़ता है? तब वह कर्ता कहलाता है और उस कर्ताके तीन (सात्त्विक? राजस और तामस) भेदोंके अन्तर्गत ही ज्ञाताके भी तीन भेद हो जाते हैं। परन्तु ज्ञाता जब ज्ञप्तिमात्र रहता है? तब उसके तीन भेद नहीं होते क्योंकि उसमें गुणोंका सङ्ग नहीं है। गुणोंका सङ्ग होनेसे ही उसके तीन भेद होते हैं। इसलिये वृत्तिज्ञान ही सात्त्विक? राजस तथा तामस होता है।जिसे जाना जाय? उस विषयको ज्ञेय कहते हैं। जाननेके विषय अनेक हैं? इसलिये इसके अलग भेद नहीं किये गये। परन्तु जाननेयोग्य सब विषयोंका एकमात्र लक्ष्य सुख प्राप्त करना ही रहता है। जैसे? कोई विद्या पढ़ता है? कोई धन कमाता है? कोई अधिकार पानेकी चेष्टा करता है तो इन सब विषयोंको जानने? पानेकी चेष्टाका लक्ष्य एकमात्र सुख ही रहता है। विद्या पढ़नेमें यही भाव रहता है कि ज्यादा पढ़कर ज्यादा धन कमाऊँगा? मान पाऊँगा और उनसे मैं सुखी होऊँगा। ऐसे ही हरेक कर्मका लक्ष्य परम्परासे सुख ही रहता है। इसलिये भगवान्ने ज्ञेयके तीन भेद सात्त्विक? राजस और तामस सुख के नामसे आगे (18 । 36 -- 39में) किये हैं।ऐसे ही भगवान्ने करणके भी तीन भेद नहीं किये क्योंकि इन्द्रियाँ आदि जितने भी करण हैं? वे सब साधनमात्र हैं। इसलिये उनके तीन भेद नहीं होते। परन्तु इन सभी करणोंमें बुद्धि की ही प्रधानता है क्योंकि मनुष्य करणोंसे जो कुछ भी काम करता है? उसको वह बुद्धिपूर्वक (विचारपूर्वक) ही करता है। इसलिये भगवान्ने करणके तीन भेद सात्त्विक? राजस और तामस बुद्धिके नामसे आगे (18। 30 -- 32 में) किये हैं।बुद्धिको दृढ़तासे रखनेमें धृति बुद्धिकी सहायक बनती है। ज्ञानयोगकी साधनामें भगवान्ने दो जगह (6। 25 में तथा 18। 51में) बुद्धिके साथ धृति पद भी दिया है। इससे यह मालूम देता है कि ज्ञानमार्गमें बुद्धिके साथ धृतिकी विशेष आवश्यकता है। इसलिये भगवान्ने धृतिके भी तीन भेद (18। 33 -- 35 में) बताये हैं।त्रिधैव पदमें यह भाव है कि ये भेद तीन (सात्त्विक? राजस और तामस) ही होते हैं? कम और ज्यादा नहीं होते अर्थात् न दो होते हैं और न चार होते हैं। कारण कि सत्त्व? रज और तम -- ये तीन गुण ही प्रकृतिसे उत्पन्न हैं -- सत्त्वं रजस्तम इति गुणाः प्रकृतिसम्भवाः (गीता 14। 5)। इसलिये इन तीनों गुणोंको लेकर तीन ही भेद होते हैं।यथावत् -- गुणसंख्यानशास्त्रमें इस विषयका जैसा वर्णन हुआ है? वैसाकावैसा तुम्हें सुना रहा हूँ अपनी तरफसे कुछ कम या अधिक करके नहीं सुना रहा हूँ।श्रृणु -- इस विषयको ध्यानसे सुनो। कारण कि सात्त्विक? राजस और तामस -- इन तीनोंमेंसे सात्त्विक चीजें तो कर्मोंसे सम्बन्धविच्छेद करके परमात्मतत्त्वका बोध करानेवाली हैं? राजस चीजें जन्ममरण देनेवाली हैं और तामस चीजें पतन करनेवाली अर्थात् नरकों और नीच योनियोंमें ले जानेवाली हैं। इसलिये इनका वर्णन सुनकर सात्त्विक चीजोंको ग्रहण तथा राजसतामस चीजोंका त्याग करना चाहिये।तानि -- इन ज्ञान आदिका तुम्हारे स्वरूपके साथ कोई सम्बन्ध नहीं है। तुम्हारा स्वरूप तो सदा निर्लेप है।अपि -- इनके भेदोंको जाननेकी भी बड़ी भारी आवश्यकता है क्योंकि इनको ठीक तरहसे जाननेपर यस्य नाहंकृतो भावो ৷৷. न हन्ति न निबध्यते (18। 17) -- इस श्लोकका ठीक अनुभव हो जायगा अर्थात् अपने स्वरूपका बोध हो जायगा। सम्बन्ध -- अब भगवान् सात्त्विक ज्ञानका वर्णन करते हैं।
।।18.19।।गुणसंख्यान (गुणोंके सम्बन्धसे प्रत्येक पदार्थके भिन्न-भिन्न भेदोंकी गणना करनेवाले) शास्त्रमें गुणोंके भेदसे ज्ञान और कर्म तथा कर्ता तीन-तीन प्रकारसे ही कहे जाते हैं, उनको भी तुम यथार्थरूपसे सुनो।
सर्वभूतेषु येनैकं भावमव्ययमीक्षते। अविभक्तं विभक्तेषु तज्ज्ञानं विद्धि सात्त्विकम् ॥
।।18.20।। व्याख्या -- सर्वभूतेषु येनैकं ৷৷. अविभक्तं विभक्तेषु -- व्यक्ति? वस्तु आदिमें जो है पन दीखता है? वह उन व्यक्ति? वस्तु आदिका नहीं है? प्रत्युत सबमें परिपूर्ण परमात्मका ही है। उन व्यक्ति? वस्तु आदिकी स्वतन्त्र सत्ता ही नहीं है क्योंकि उनमें प्रतिक्षण परिवर्तन हो रहा है। कोई भी व्यक्ति? वस्तु आदि ऐसी नहीं है? जिसमें परिवर्तन न होता हो परन्तु अपनी अज्ञता(बेसमझी)से उनकी सत्ता दीखती है। जब अज्ञता मिट जाती है? ज्ञान हो जाता है? तब साधककी दृष्टि उस अविनाशी तत्त्वकी तरफ ही जाती है? जिसकी सत्तासे यह सब सत्तावान् हो रहा है।ज्ञान होनेपर साधककी दृष्टि परिवर्तनशील वस्तुओंको भेदकर परिवर्तनरहित तत्त्वकी ओर ही जाती है (गीता 13। 27)। फिर वह विभक्त अर्थात् अलगअलग वस्तु? व्यक्ति? परिस्थिति? घटना आदिमें विभागरहित एक ही तत्त्वको देखता है (गीता 13। 16)। तात्पर्य यह है कि अलगअलग वस्तु? व्यक्ति आदिका अलगअलग ज्ञान और यथायोग्य अलगअलग व्यवहार होते हुए भी वह इन विकारी वस्तुओंमें उस स्वतःसिद्ध निर्विकार एक तत्त्वको देखता है। उसके देखनेकी यही पहचान है कि उसके अन्तःकरणमें रागद्वेष नहीं होते।तज्ज्ञानं विद्धि सात्त्विकम् -- उस ज्ञानको तू सात्त्विक जान। परिवर्तनशील वस्तुओं? वृत्तियोंके सम्बन्धसे ही इसे सात्त्विक ज्ञान कहते हैं। सम्बन्धरहित होनेपर यही ज्ञान वास्तविक बोध कहलाता है? जिसको भगवान्ने सब साधनोंसे जाननेयोग्य ज्ञेयतत्त्व बताया है -- ज्ञेयं यत्तत्प्रवक्ष्यामि यज्ज्ञात्वामृतमश्नुते (गीता 13। 12)।मार्मिक बातसंसारका ज्ञान इन्द्रियोंसे होता है? इन्द्रियोंका ज्ञान बुद्धिसे होता है और बुद्धिका ज्ञान मैंसे होता है। वह मैं बुद्धि? इन्द्रियाँ और विषय -- इन तीनोंको जानता है। परन्तु उस मैंका भी एक प्रकाशक है? जिसमें मैंका भी भान होता है। वह प्रकाश सर्वदेशीय और असीम है? जब कि मैं एकदेशीय और सीमित है। उस प्रकाशमें जैसे मैंका भान होता है? वैसे ही तू? यह और वह का भी भान होता है। वह प्रकाश किसीका भी विषय नहीं है। वास्तवमें वह प्रकाश निर्गुण ही है परन्तु व्यक्तिविशेषमें रहनेवाला होनेसे (वृत्तियोंके सम्बन्धसे) उसे सात्त्विक ज्ञान कहते हैं।इस सात्त्विक ज्ञानको दूसरे ढंगसे इस प्रकार समझना चाहिये -- मैं? तू? यह और वह -- ये चारों ही किसी प्रकाशमें काम करते हैं। इन चारोंके अन्तर्गत सम्पूर्ण प्राणी आ जाते हैं? जो विभक्त हैं परन्तु इनका जो प्रकाशक है? वह अवभिक्त (विभागरहित) है।बोलनेवाला? मैं? उसके सामने सुननेवाला तू और पासवाला यह तथा दूरवाला वह कहा जाता है अर्थात् बोलनेवाला अपनेको मैं कहता है? सामनेवालेको तू कहता है? पासवालेको यह कहता है और दूरवालेको वह कहता है। जो तू बना हुआ था? वह मैं हो जाय तो मैं बना हुआ तू हो जायगा और यह तथा वह वही रहेंगे। इसी प्रकार यह कहलानेवाला अगर मैं बन जाय तो तू कहलानेवाला यह बन जायगा और मैं कहलानेवाला तू बन जायगा। वह परोक्ष होनेसे अपनी जगह ही रहा। अब वह कहलानेवाला मैं बन जायगा तो उसकी दृष्टिमें मैं? तू और यह कहलानेवाले सब वह हो जायँगे (टिप्पणी प0 903)। इस प्रकाशमें मैं? तू? यह और वह का भान हो रहा है। दृष्टिमें चारों ही बन सकते हैं।इससे यह सिद्ध हुआ कि मैं? तू? यह और वह -- ये सब परिवर्तनशील हैं अर्थात् टिकनेवाले नहीं हैं? वास्तविक नहीं हैं। अगर वास्तविक होते तो एक ही रहते। वास्तविक तो इन सबका प्रकाशक और आश्रय है? जिसके प्रकार मैं? तू? यह और वह -- ये यारों ही एकदूसरेकी उस प्रकाशमें मैं? तू? यह और वह -- ये चारों ही नहीं हैं? प्रत्युत उसीसे इन चारोंको सत्ता मिलती है। अपनी मान्यताके कारण मैं? तू? यह? वह का तो भान होता है? पर प्रकाशकका भान नहीं होता। वह प्रकाशक सबको प्रकाशित करता है? स्वयंप्रकाशस्वरूप है और सदा ज्योंकात्यों रहता है। मैं? तू? यह और वह -- यह सब विभक्त प्राणियोंका स्वरूप है और जो वास्तविक प्रकाशक है? वह विभागरहित है। यही वास्तवमें सात्त्विक ज्ञान है।विभागवाली? परिवर्तनशील और नष्ट होनेवाली जितनी वस्तुएँ हैं? यह ज्ञान उन सबका प्रकाशक है और स्वयं भी निर्मल तथा विकाररहित है -- तत्र सत्त्वं निर्मलत्वात् प्रकाशकमनामयम् (गीता 14। 6)। इसलिये इस ज्ञानको सात्त्विक कहा जाता है।वास्तवमें यह सात्त्विक ज्ञान प्रकाश्यकी दृष्टि(सम्बन्ध)से प्रकाशक और विभक्तकी दृष्टिसे अविभक्त कहा जाता है। प्रकाश्य और विभक्तसे रहित होनेपर तो यह निर्गुण? निरपेक्ष वास्तविक ज्ञान ही है। सम्बन्ध -- अब राजस ज्ञानका वर्णन करते हैं।
।।18.20।।जिस ज्ञानके द्वारा साधक सम्पूर्ण विभक्त प्राणियोंमें विभागरहित एक अविनाशी भाव-(सत्ता-) को देखता है, उस ज्ञानको तुम सात्त्विक समझो।
पृथक्त्वेन तु यज्ज्ञानं नानाभावान्पृथग्विधान्। वेत्ति सर्वेषु भूतेषु तज्ज्ञानं विद्धि राजसम् ॥
।।18.21।। व्याख्या -- पृथक्त्वेन तु (टिप्पणी प0 904.1) यज्ज्ञानं नानाभावान् पृथग्विधान् -- राजस ज्ञानमें राग की मुख्यता होती है -- रजो रागात्मकं विद्धि (गीता 14। 7)। रागका यह नियम है कि वह जिसमें आ जाता है? उसमें किसीके प्रति आसक्ति? प्रियता पैदा करा देता है और किसीके प्रति द्वेष पैदा करा देता है। इस रागके कारण ही मनुष्य? देवता? यक्षराक्षस? पशुपक्षी? कीटपतङ्ग? वृक्षलता आदि जितने भी चरअचर प्राणी हैं? उन प्राणियोंकी विभिन्न आकृति? स्वभाव? नाम? रूप? गुण आदिको लेकर राजस ज्ञानवाला मनुष्य उनमें रहनेवाली एक ही अविनाशी आत्माको तत्त्वसे अलगअलग समझता है।वेत्ति सर्वेषु भूतेषु तज्ज्ञानं विद्धि राजसम् -- इसी तरह जिस ज्ञानसे मनुष्य अलगअलग शरीरोंमें अन्तःकरण? स्वभाव? इन्द्रियाँ? प्राण आदिके सम्बन्धसे प्राणियोंको भी अलगअलग मानता है? वह ज्ञान राजस कहलाता है। राजस ज्ञानमें जडचेतनका विवेक नहीं होता। सम्बन्ध -- अब तामस ज्ञानका वर्णन करते हैं।
।।18.21।।परन्तु जो ज्ञान अर्थात् जिस ज्ञानके द्वारा मनुष्य सम्पूर्ण प्राणियोंमें अलग-अलग अनेक भावोंको अलग-अलग रूपसे जानता है, उस ज्ञानको तुम राजस समझो।
यत्तु कृत्स्नवदेकस्मिन्कार्ये सक्तमहैतुकम्। अतत्त्वार्थवदल्पं च तत्तामसमुदाहृतम् ॥
।।18.22।। व्याख्या -- यत्तु (टिप्पणी प0 904.2) कृत्स्नवदेकस्मिन्कार्ये सक्तम् -- तामस मनुष्य एक ही शरीरमें सम्पूर्णकी तरह आसक्त रहता है अर्थात् उत्पन्न और नष्ट होनेवाले इस पाञ्चभौतिक शरीरको ही अपना स्वरूप मानता है। वह मानता है कि मैं ही छोटा बच्चा था? मैं ही जवान हूँ और मैं ही बूढ़ा हो जाऊँगा मैं भोगी? बलवान् और सुखी हूँ मैं धनी और बड़े कुटुम्बवाला हूँ मेरे समान दूसरा कौन है इत्यादि। ऐसी मान्यता मूढ़ताके कारण ही होती है -- इत्यज्ञानविमोहिताः (16। 15)।अहैतुकम् -- तामस मनुष्यकी मान्यता युक्ति और शास्त्रप्रमाणसे विरुद्ध होती है। यह शरीर हरदम बदल रहा है? शरीरादि वस्तुमात्र अभावमें परिवर्तित हो रही है? दृश्यमात्र अदृश्य हो रहा है और इनमें तू सदा ज्योंकात्यों रहता है अतः यह शरीर और तू एक कैसे हो सकते हैं -- इस प्रकारकी युक्तियोंको वह स्वीकार नहीं करता।अतत्त्वार्थवदल्पं च -- यह शरीर और मैं दोनों अलगअलग हैं -- इस वास्तविक ज्ञान(विवेक) से वह रहित है। उसकी समझ अत्यन्त तुच्छ है अर्थात् तुच्छताकी प्राप्ति करानेवाली है। इसलिये इसको ज्ञान कहनेमें भगवान्को संकोच हुआ है। कारण कि तामस पुरुषमें मूढ़ताकी प्रधानता होती है। मूढ़ता और ज्ञानका आपसमें विरोध है. अतः भगवान्ने ज्ञान पद न देकर यत् और तत् पदसे ही काम चलाया है।तत्तामसमुदाहृतम् -- युक्तिरहित? अल्प और अत्यन्त तुच्छ समझको ही महत्त्व देना तामस कहा गया है।जब तामस समझ ज्ञान है ही नहीं और भगवान्को भी इसको ज्ञान कहनेमें संकोच हुआ है? तो फिर इसका वर्णन ही क्यों किया गया कारण कि भगवान्ने उन्नीसवें श्लोकमें ज्ञानके त्रिविध भेद कहनेका उपक्रम किया है? इसलिये सात्त्विक और राजसज्ञानका वर्णन करनेके बाद तामस समझको भी कहनेकी आवश्यकता थी। सम्बन्ध -- अब भगवान् सात्त्विक कर्मका वर्णन करते हैं।
।।18.22।।किंतु जो (ज्ञान) एक कार्यरूप शरीरमें ही सम्पूर्णके तरह आसक्त है तथा जो युक्तिरहित, वास्तविक ज्ञानसे रहित और तुच्छ है, वह तामस कहा गया है।
नियतं सङ्गरहितमरागद्वेषतः कृतम्। अफलप्रेप्सुना कर्म यत्तत्सात्त्विकमुच्यते ॥
।।18.23।। व्याख्या -- नियतं सङ्गरहितम् ৷৷. सात्त्विकमुच्यते -- जिस व्यक्तिके लिये वर्ण और आश्रमके अनुसार जिस परिस्थितिमें और जिस समय शास्त्रोंने जैसा करनेके लिये कहा है? उसके लिये वह कर्म नियत हो जाता है।यहाँ नियतम् पदसे एक तो कर्मोंका स्वरूप बताया है और दूसरे? शास्त्रनिषिद्ध कर्मका निषेध किया है।सङ्गरहितम् पदका तात्पर्य है कि वह नियतकर्म कर्तृत्वाभिमानसे रहित होकर किया जाय। कर्तृत्वाभिमानसे रहित कहनेका भाव है कि जैसे वृक्ष आदिमें मूढ़ता होनेके कारण उनको कर्तृत्वका भान नहीं होता? पर उनकी भी ऋतु आनेपर पत्तोंका झड़ना? नये पत्तोंका निकलना? शाखा कटनेपर घावका मिल जाना? शाखाओंका बढ़ना? फलफूलका लगना आदि सभी क्रियाएँ समष्टि शक्तिके द्वारा अपनेआप ही होती हैं ऐसे ही इन सभी शरीरोंका बढ़नाघटना? खानापीना? चलनाफिरना आदि सभी क्रियाएँ भी समष्टि शक्तिके द्वारा अपनेआप हो रही हैं। इन क्रियाओँके साथ न अभी कोई सम्बन्ध है? न पहले कोई सम्बन्ध था और न आगे ही कोई सम्बन्ध होगा। इस प्रकार जब साधकको प्रत्यक्ष अनुभव हो जाता है? तो फिर उसमें कर्तृत्व नहीं रहता। कर्तृत्व न रहनेपर उसके द्वारा जो कर्म होता है? वह सङ्गरहित अर्थात् कर्तृत्वाभिमानरहित ही होता है। ,यहाँ सांख्यप्रकरणमें कर्तृत्वका त्याग मुख्य होनेसे और आगे अरागद्वेषतः कृतम् पदोंमें भी आसक्तिके त्यागकी बात आनेसे यहाँ सङ्गरहितम् पदका अर्थ कर्तृत्वअभिमानरहित लिया गया है (टिप्पणी प0 905)।अरागद्वेषतः कृतम् पदोंका तात्पर्य है कि रागद्वेषसे रहित हो करके कर्म किया जाय अर्थात् कर्मका ग्रहण रागपूर्वक न हो और कर्मका त्याग द्वेषपूर्वक न हो तथा कर्म करनेके जितने साधन (शरीर? इन्द्रियाँ? अन्तःकरण आदि) हैं? उनमें भी रागद्वेष न हो।अरागद्वेषतः पदसे वर्तमानमें रागका अभाव बताया है और अफलप्रेप्सुना पदसे भविष्यमें रागका अभाव बताया है। तात्पर्य यह है कि भविष्यमें मिलनेवाले फलकी इच्छासे रहित मनुष्यके द्वारा कर्म किया जाय अर्थात् क्रिया और पदार्थोंसे निर्लिप्त रहते हुए असङ्गतापूर्वक कर्म किया जाय तो वह सात्त्विक कहा जाता है।इस सात्त्विक कर्ममें सात्त्विकता तभीतक है? जबतक अत्यन्त सूक्ष्मरूपसे भी प्रकृतिके साथ सम्बन्ध है। जब प्रकृतिसे सर्वथा सम्बन्धविच्छेद हो जाता है? तब यह कर्म अकर्म हो जाता है। सम्बन्ध -- अब राजस कर्मका वर्णन करते हैं।
।।18.23।।जो कर्म शास्त्रविधिसे नियत किया हुआ और कर्तृत्वाभिमानसे रहित हो तथा फलेच्छारहित मनुष्यके द्वारा बिना राग-द्वेषके किया हुआ हो, वह सात्त्विक कहा जाता है।
यत्तु कामेप्सुना कर्म साहंकारेण वा पुनः। क्रियते बहुलायासं तद्राजसमुदाहृतम् ॥
।।18.24।। व्याख्या -- यत्तु (टिप्पणी प0 906) कामेप्सुना कर्म -- हम कर्म करेंगे तो हमें पदार्थ मिलेंगे? सुखआराम मिलेगा? भोग मिलेंगे? आदरसम्मानबड़ाई मिलेगी आदि फलकी इच्छावाले व्यक्तिके द्वारा कर्म किया जाय।साहंकारेण -- लोगोंके सामने कर्म करनेसे लोग देखते हैं और वाहवाह करते हैं तो अभिमान आता है और जहाँ लोग सामने नहीं होते? वहाँ (एकान्तमें) कर्म करनेसे दूसरोंकी अपेक्षा अपनेमें विलक्षणता? विशेषता देखकर अभिमान आता है। जैसे -- दूसरे आदमी हमारी तरह सुचारुरूपसे साङ्गोपाङ्ग कार्य नहीं कर सकते हमारेमें काम करनेकी जो योग्यता? विद्या? चतुरता आदि है? वह हरेक आदमीमें नहीं मिलेगी हम जो भी काम करते हैं? उसको बहुत ही ईमानदारीसे और जल्दी करते हैं? आदिआदि। इस प्रकार अहंकारपूर्वक किया गया कर्म राजस कहलाता है।वा पुनः -- आगे भविष्यमें मिलनेवाले फलको लेकर (फलेच्छापूर्वक) कर्म किया जाय अथवा वर्तमानमें अपनी विशेषताको लेकर (अहंकारपूर्वक) कर्म किया जाय -- इन दोनों भावोंमेंसे एक भाव होनेपर भी वह कर्म राजस हो जाता है? यह बतानेके लिये यहाँ वा पुनः पद आये हैं। तात्पर्य है कि फलेच्छा और अहंकार -- इन दोनोंमेंसे जब एक भाव होनेपर भी कर्म राजस हो जाता है? तब दोनों भाव होनेपर वह कर्म राजस हो ही जायगा। क्रियते बहुलायासम् -- कर्म करते समय हरेक व्यक्तिके शरीरमें परिश्रम तो होता ही है? पर जिस व्यक्तिमें शरीरके सुखआरामकी इच्छा मुख्य होती है? उसको कर्म करते समय शरीरमें ज्यादा परिश्रम मालूम देता है।जिस व्यक्तिमें कर्मफलकी इच्छा तो मुख्य है? पर शारीरिक सुखआरामकी इच्छा मुख्य नहीं है? अर्थात् सुखआराम लेनेकी स्वाभाविक ही प्रकृति नहीं है? उसको कर्म करते हुए भी शरीरमें परिश्रम नहीं मालूम देता। कारण कि भीतरमें भोगों और संग्रहकी जोरदार कामना होनेसे उसकी वृत्ति कामनापूर्तिकी तरफ ही लगी रहती है शरीरकी तरफ नहीं। तात्पर्य है कि शरीरके सुखआरामकी मुख्यता होनेसे फलेच्छाकी अवहेलना हो जाती है और फलेच्छाकी मुख्यता होनेसे शरीरके सुखआरामकी अवहेलना हो जाती है।लोगोंके सामने कर्म करते समय अहंकारजन्य सुखकी खुराक मिलनेसे और शरीरके सुखआरामकी मुख्यता न होनेसे राजस मनुष्यको कर्म करनेमें परिश्रम नहीं मालूम देता। परन्तु एकान्तमें कर्म करते समय अहंकारजन्य सुखकी खुराक न मिलनेसे और शरीरके सुखआरामकी मुख्यता होनेसे राजस मनुष्यको कर्म करनेमें ज्यादा परिश्रम मालूम देता है।तद्राजसमुदाहृतम् -- ऐसे फलकी इच्छावाले मनुष्यके द्वारा अहंकार और परिश्रमपूर्वक किया हुआ जो कर्म है? वह राजस कहा गया है। सम्बन्ध -- अब तामस कर्मका वर्णन करते हैं।
।।18.24।।परन्तु जो कर्म भोगोंको चाहनेवाले मनुष्यके द्वारा अहंकार अथवा परिश्रमपूर्वक किया जाता है, वह राजस कहा गया है।
अनुबन्धं क्षयं हिंसामनपेक्ष्य च पौरुषम्। मोहादारभ्यते कर्म यत्तत्तामसमुच्यते ॥
।।18.25।। व्याख्या -- अनुबन्धम् -- जिसको फलकी कामना होती है? वह मनुष्य तो फलप्राप्तिके लिये विचारपूर्वक कर्म करता है? परन्तु तामस मनुष्यमें मूढ़ताकी प्रधानता होनेसे वह कर्म करनेमें विचार करता ही नहीं। इस कार्यको करनेसे मेरा तथा दूसरे प्राणियोंका अभी और परिणाममें कितना नुकसान होगा? कितना अहित होगा -- इस अनुबन्ध अर्थात् परिणामको न देखकर वह कार्य आरम्भ कर देता है।क्षयम् -- इस कार्यको करनेसे अपने और दूसरोंके शरीरोंकी कितनी हानि होगी धन और समयका कितना खर्चा होगा इससे दुनियामें मेरा कितना अपमान? निन्दा? तिरस्कार आदि होगा? मेरा लोकपरलोक बिगड़ जायगा आदि नुकसानको न देखकर ही वह कार्य आरम्भ कर देता है।हिंसाम् -- इस कर्मसे कितने जीवोंकी हत्या होगी कितने श्रेष्ठ व्यक्तियोंके सिद्धान्तों और मान्यताओंकी हत्या हो जायगी दूसरे मनुष्योंकी मनुष्यताकी कितनी भारी हिंसा हो जायगी अभीके और भावी जीवोंके शुद्ध भाव? आचरण? वेशभूषा? खानपान आदिकी कितनी भारी हिंसा हो जायगी इससे मेरा और दुनियाका कितना अधःपतन होगा आदि हिंसाको न देखकर ही वह कार्य आरम्भ कर देता है।अनवेक्ष्य च पौरुषम् -- इस कामको करनेकी मेरेमें कितनी योग्यता है? कितना बल? सामर्थ्य है मेरे पास कितना समय है? कितनी बुद्धि है? कितनी कला है? कितना ज्ञान है आदि अपने पौरुष(पुरुषार्थ) को न,देखकर ही वह कार्य आरम्भ कर देता है।मोहादारभ्यते कर्म यत्तत्तामसमुच्यते -- तामस मनुष्य कर्म करते समय उसके परिणाम? उससे होनेवाले नुकसान? हिंसा और अपनी सामर्थ्यका कुछ भी विचार न करके? जब जैसा मनमें भाव आया? उसी समय बिना विवेकविचारके वैसा ही कर बैठता है। इस प्रकार किया गया कर्म तामस कहलाता है। सम्बन्ध -- अब भगवान् सात्त्विक कर्ताके लक्षण बताते हैं।
।।18.25।।जो कर्म परिणाम, हानि, हिंसा और सामर्थ्यको न देखकर मोहपूर्वक आरम्भ किया जाता है, वह तामस कहा जाता है।
मुक्तसङ्गोऽनहंवादी धृत्युत्साहसमन्वितः। सिद्ध्यसिद्ध्योर्निर्विकारः कर्ता सात्त्विक उच्यते ॥
।।18.26।। व्याख्या -- मुक्तसङ्गः -- जैसे सांख्ययोगीका कर्मोंके साथ राग नहीं होता? ऐसे सात्त्विक कर्ता भी रागरहित होता है।कामना? वासना? आसक्ति? स्पृहा? ममता आदिसे अपना सम्बन्ध जोड़नेके कारण ही वस्तु? व्यक्ति? पदार्थ? परिस्थिति? घटना आदिमें आसक्ति लिप्तता होती है। सात्त्विक कर्ता इस लिप्ततासे सर्वथा रहित होता है।अनहंवादी -- पदार्थ? वस्तु? परिस्थिति आदिको लेकर अपनेमें जो एक विशेषताका अनुभव करना है -- यह अहंवदनशीलता है। यह अहंवदनशीलता आसुरीसम्पत्ति होनेसे अत्यन्त निकृष्ट है। सात्त्विक कर्तामें यह अहंवदनशीलता? अभिमान तो रहता ही नहीं? प्रत्युत मैं इन चीजोंका त्यागी हूँ? मेरेमें यह अभिमान नहीं है? मैं निर्विकार हूँ? मैं सम हूँ? मैं सर्वथा निष्काम हूँ? मैं संसारके सम्बन्धसे रहित हूँ -- इस तरहके अहंभावका भी उसमें अभाव रहता है।धृत्युत्साहसमन्वितः -- कर्तव्यकर्म करते हुए विघ्नबाधाएँ आ जायँ? उस कर्मका परिणाम ठीक न निकले? लोगोंमें निन्दा हो जाय? तो भी विघ्नबाधा आदि न आनेपर जैसा धैर्य रहता है? वैसा ही धैर्य विघ्नबाधा आनेपर भी नित्यनिरन्तर बना रहे -- इसका नाम धृति है और सफलताहीसफलता मिलती चली जाय? उन्नति होती चली जाय? लोगोंमें मान? आदर? महिमा आदि बढ़ते चले जायँ -- ऐसी स्थितिमें मनुष्यके मनमें जैसी उम्मेदवारी? सफलताके प्रति उत्साह रहता है? वैसी ही उम्मेदवारी इससे विपरीत अर्थात् असफलता? अवनति? निन्दा आदि हो जानेपर भी बनी रहे -- इसका नाम उत्साह है। सात्त्विक कर्ता इस प्रकारकी धृति और उत्साहसे युक्त रहता है।सिद्ध्यसिद्ध्योर्निर्विकारः -- सिद्धि और असिद्धिमें अपनेमें कुछ भी विकार न आये? अपनेपर कुछ भी असर न पड़े अर्थात् कार्य ठीक तरहसे साङ्गोपाङ्ग पूर्ण हो जाय अथवा पूरा उद्योग करते हुए अपनी शक्ति? समझ? समय? सामर्थ्य आदिको पूरा लगाते हुए भी कार्य पूरा न हो फल प्राप्त हो अथवा न हो? तो भी अपने अन्तःकरणमें प्रसन्नता और खिन्नता? हर्ष और शोकका न होना ही सिद्धिअसिद्धिमें निर्विकार रहना है।कर्ता सात्त्विक उच्यते -- ऐसा आसक्ति तथा अहंकारसे रहित? धैर्य तथा उत्साहसे युक्त और सिद्धिअसिद्धिमें निर्विकार कर्ता सात्त्विक कहा जाता है।इस श्लोकमें छः बातें बतायी गयी हैं -- सङ्ग? अहंवदनशीलता? धृति? उत्साह? सिद्धि और असिद्धि। इनमेंसे पहली दो बातोंसे रहित? बीचकी दो बातोंसे युक्त और अन्तकी दो बातोंमें निर्विकार रहनेके लिये कहा गया है। सम्बन्ध -- अब राजस कर्ताके लक्षण बताते हैं।
।।18.26।।जो कर्ता रागरहित, अनहंवादी, धैर्य और उत्साहयुक्त तथा सिद्धि और असिद्धिमें निर्विकार है, वह सात्त्विक कहा जाता है।
रागी कर्मफलप्रेप्सुर्लुब्धो हिंसात्मकोऽशुचिः। हर्षशोकान्वितः कर्ता राजसः परिकीर्तितः ॥
।।18.27।। व्याख्या -- रागी -- रागका स्वरूप रजोगुण होनेके कारण भगवान्ने राजस कर्ताके लक्षणोंमें,सबसे पहले रागी पद दिया है। रागका अर्थ है -- कर्मोंमें? कर्मोंके फलोंमें तथा वस्तु? पदार्थ आदिमें मनका खिंचाव होना? मनकी प्रियता होना। इन चीजोंका जिसपर रंग चढ़ जाता है? वह रागी होता है।कर्मफलप्रेप्सुः -- राजस मनुष्य कोई भी काम करेगा तो वह किसी फलकी चाहनाको लेकर ही करेगा जैसे -- मैं ऐसाऐसा अनुष्ठान कर रहा हूँ? दान दे रहा हूँ? उससे यहाँ धन? मान? बड़ाई आदि मिलेंगे और परलोकमें स्वर्गादिके भोग? सुख आदि मिलेंगे मैं ऐसीऐसी दवाइयोंका सेवन कर रहा हूँ तो उनसे मेरा शरीर नीरोग रहेगा? आदि।लुब्धः -- राजस मनुष्यको जितना जो कुछ मिलता है? उसमें वह संतोष नहीं करता? प्रत्युत जिमि प्रतिलाभ लोभ अधिकाई की तरह और मिलता रहे? और मिलता रहे अर्थात् आदर? सत्कार? महिमा आदि अधिकसेअधिक होते रहें धन? पुत्र? परिवार आदि अधिकसेअधिक बढ़ते रहें -- इस प्रकारकी लाग लगी रहती है? लोभ लगा रहता है।हिंसात्मकः -- वह हिंसाके स्वभाववाला होता है। अपने स्वार्थके लिये वह दूसरोंके नुकसानकी? दुःखकी परवाह नहीं करता। वह ज्योंज्यों अधिक भोगसामग्री इकट्ठी करके भोग भोगता है? त्योंहीत्यों दूसरे अभावग्रस्त लोगोंके हृदयमें जलन पैदा होती है। अतः दूसरोंके दुःखकी परवाह न करना तथा भोग भोगना हिंसा ही है।तामस कर्म (18। 25) और राजस कर्ता -- दोनोंमें हिंसा बतानेका तात्पर्य यह है कि मूढ़ता रहनेके कारण तामस मनुष्यकी क्रियाएँ विवेकपूर्वक नहीं होतीं अतः चलनेफिरने? उठनेबैठने आदिमें उसके द्वारा हिंसा होती है। राजस मनुष्य अपने सुखके लिये बढ़ियाबढ़िया भोग भोगता है तो उसको देखकर जिनको वे भोग नहीं मिलते? उनके हृदयमें जलन होती है? यह हिंसा उस भोग भोगनेवालेको ही लगती है। कारण कि कोई भी भोग बिना हिंसाके होता ही नहीं। तात्पर्य है कि तामस मनुष्यके द्वारा तो कर्ममें हिंसा होती है और राजस मनुष्य स्वयं हिंसात्मक होता है।अशुचिः -- रागी पुरुष भोगबुद्धिसे जिन वस्तुओं? पदार्थों आदिका संग्रह करता है? वे सब चीजें अपवित्र हो जाती हैं। वह जहाँ रहता है? वहाँका वायुमण्डल अपवित्र हो जाता है। वह जिन कपड़ोंको पहनता है? उन कपड़ोंमें भी अपवित्रता आ जाती है। यही कारण है कि आसक्तिममतावाले मनुष्यके मरनेपर उसके कपड़े आदिको कोई रखना नहीं चाहता। जिस स्थानपर उसके शवको जलाया जाता है? वहाँ कोई भजनध्यान करना चाहे तो उसका मन नहीं लगेगा। वहाँ भूलसे कोई सो जायगा तो उसको प्रायः खराबखराब स्वप्न आयेंगे। तात्पर्य यह है कि उत्पत्तिविनाशशील पदार्थोंकी तरफ आकृष्ट होते ही आसक्तिममतारूप मलिनता आने लगती है? जिससे मनुष्यका शरीर और शरीरकी हड्डियाँतक अधिक अपवित्र हो जाती हैं।हर्षशोकान्वितः -- उसके सामने दिनमें कितनी बार सफलताविफलता? अनुकूलप्रतिकूल परिस्थिति? घटना आदि आते रहते हैं? उनको लेकर वह हर्षशोक? रागद्वेष? सुखदुःख आदिमें ही उलझा रहता है।कर्ता राजसः परिकीर्तितः -- उपर्युक्त लक्षणोंवाला कर्ता राजस कहा गया है। सम्बन्ध -- अब तामस कर्ताके लक्षण बताते हैं।
।।18.27।।जो कर्ता रागी, कर्मफलकी इच्छावाला, लोभी, हिंसाके स्वभाववाला, अशुद्ध और हर्षशोकसे युक्त है, वह राजस कहा गया है।
अयुक्तः प्राकृतः स्तब्धः शठो नैष्कृतिकोऽलसः। विषादी दीर्घसूत्री च कर्ता तामस उच्यते ॥
।।18.28।। व्याख्या -- अयुक्तः -- तमोगुण मनुष्यको मूढ़ बना देता है (गीता 14। 8)। इस कारण किस समयमें कौनसा काम करना चाहिये किस तरह करनेसे हमें लाभ है और किस तरह करनेसे हमें हानि है -- इस विषयमें तामस मनुष्य सावधान नहीं रहता अर्थात् वह कर्तव्य और अकर्तव्यके विषयमें सोचता ही,नहीं। इसलिये वह अयुक्त अर्थात् असावधान कहलाता है।प्राकृतः -- जिसने शास्त्र? सत्सङ्ग? अच्छी शिक्षा? उपदेश आदिसे न तो अपने जीवनको ठीक बनाया है और न अपने जीवनपर कुछ विचार ही किया है? माँबापसे जैसा पैदा हुआ है? वैसाकावैसा ही कोरा अर्थात् कर्तव्यअकर्तव्यकी शिक्षासे रहित रहा है? ऐसा मनुष्य प्राकृत अर्थात् अशिक्षित कहलाता है।स्तब्धः -- तमोगुणकी प्रधानताके कारण उसके मन? वाणी और शरीरमें अकड़ रहती है। इसलिये वह अपने वर्णआश्रममें बड़ेबूढ़े माता? पिता? गुरु? आचार्य आदिके सामने कभी झुकता नहीं। वह मन? वाणी और शरीरसे कभी सरलता और नम्रताका व्यवहार नहीं करता? प्रत्युत कठोर व्यवहार करता है। ऐसा मनुष्य स्तब्ध अर्थात् ऐंठअकड़वाला कहलाता है।शठः -- तामस मनुष्य अपनी एक जिद होनेके कारण दूसरोंकी दी हुई अच्छी शिक्षाको? अच्छे विचारोंको नहीं मानता। उसको तो मूढ़ताके कारण अपने ही विचार अच्छे लगते हैं। इसलिये वह शठ अर्थात् जिद्दी कहलाता है (टिप्पणी प0 909)।अनैष्कृतिकः -- जिनसे कुछ उपकार पाया है? उनका प्रत्युपकार करनेका जिसका स्वभाव होता है? वह नैष्कृतिक कहलाता है। परन्तु तामस मनुष्य दूसरोंसे उपकार पा करके भी उनका उपकार नहीं करता? प्रत्युत उनका अपकार करता है? इसलिये वह अनैष्कृतिक कहलाता है।अलसः -- अपने वर्णआश्रमके अनुसार आवश्यक कर्तव्यकर्म प्राप्त हो जानेपर भी तामस मनुष्यको मूढ़ताके कारण वह कर्म करना अच्छा नहीं लगता? प्रत्युत सांसारिक निरर्थक बातोंको पड़ेपड़े सोचते रहना अथवा नींदमें पड़े रहना अच्छा लगता है। इसलिये उसे आलसी कहा गया है।विषादी -- यद्यपि तामस मनुष्यमें यह विचार होता ही नहीं कि क्या कर्तव्य होता है और क्या अकर्तव्य होता है तथा निद्रा? आलस्य? प्रमाद आदिमें मेरी शक्तिका? मेरे जीवनके अमूल्य समयका कितना दुरुपयोग हो रहा है? तथापि अच्छे मार्गसे और कर्तव्यसे च्युत होनेसे उसके भीतर स्वाभाविक ही एक विषाद (दुःख? अशान्ति) होता रहता है। इसलिये उसे विषादी कहा गया है।दीर्घसूत्री -- अमुक काम किस तरीकेसे बढ़िया और जल्दी हो सकता है -- इस बातको वह सोचता ही नहीं। इसलिये वह किसी काममें अविवेकपूर्वक लग भी जाता है तो थोड़े समयमें होनेवाले काममें भी बहुत ज्यादा समय लगा देता है और उससे काम भी सुचारुरूपसे नहीं होता। ऐसा मनुष्य दीर्घसूत्री कहलाता है।कर्ता तामस उच्यते -- उपर्युक्त आठ लक्षणोंवाला कर्ता तामस कहलाता है।विशेष बातछब्बीसवें? सत्ताईसवें और अट्ठाईसवें श्लोकमें जितनी बातें आयीं हैं? वे सब कर्ताको लेकर ही कही गयी हैं। कर्ताके जैसे लक्षण होते हैं? उन्हींके अनुसार कर्म होते हैं। कर्ता जिन गुणोंको स्वीकार करता है? उन गुणोंके अनुसार ही कर्मोंका रूप होता है। कर्ता जिस साधनको करता है? वह साधन कर्ताका रूप हो जाता है। कर्ताके आगे जो करण होते हैं? वे भी कर्ताके अनुरूप होते हैं। तात्पर्य यह है कि जैसा कर्ता होता है? वैसे ही कर्म? करण आदि होते हैं। कर्ता सात्त्विक? राजस अथवा तामस होगा तो कर्म आदि भी सात्त्विक? राजस अथवा तामस होंगे।सात्त्विक कर्ता अपने कर्म? बुद्धि आदिको सात्त्विक बनाकर सात्त्विक सुखका अनुभव करते हुए असङ्गतापूर्वक परमात्मतत्त्वसे अभिन्न हो जाता है -- दुःखान्तं च निगच्छति (गीता 18। 36)। कारण कि सात्त्विक कर्ताका ध्येय परमात्मा होता है। इसलिये वह कर्तृत्वभोक्तृत्वसे रहित होकर चिन्मय तत्त्वसे अभिन्न हो जाता है क्योंकि वह तात्त्विक स्वरूपसे अभिन्न ही था। परन्तु राजसतामस कर्ता राजसतामस कर्म? बुद्धि आदिके साथ तन्मय होकर राजसतामस सुखमें लिप्त होता है। इसलिये वह परमात्मतत्त्वसे अभिन्न नहीं हो सकता। कारण कि राजसतामस कर्ताका उद्देश्य परमात्मा नहीं होता और उसमें जडताका बन्धन भी अधिक होता है।अब यहाँ शङ्का हो सकती है कि कर्ताका सात्त्विक होना तो ठीक है? पर कर्म सात्त्विक कैसे होते हैं इसका समाधान यह है कि जिस कर्मके साथ कर्ताका राग नहीं है? कर्तृत्वाभिमान नहीं है? लेप (फलेच्छा) नहीं है? वह कर्म सात्त्विक हो जाता है। ऐसे सात्त्विक कर्मसे अपना और दुनियाका बड़ा भला होता है। उस सात्त्विक कर्मका जिनजिन वस्तु? व्यक्ति? पदार्थ? वायुमण्डल आदिके साथ सम्बन्ध होता है? उन सबमें निर्मलता आ जाती है क्योंकि निर्मलता सत्त्वगुणका स्वभाव है -- तत्र सत्त्वं निर्मलत्वात् (गीता 14। 6)।दूसरी बात? पतञ्जलि महाराजने रजोगुणको क्रियात्मक ही माना है -- प्रकाशक्रियास्थितिशीलं भूतेन्द्रियात्मकं भोगापवर्गार्थं दृश्यम्। (योगदर्शन 2। 18)। परन्तु गीता रजोगुणको क्रियात्मक मानते हुए भी मुख्यरूपसे रागात्मक ही मानती है -- रजो रागात्मकं विद्धि (14। 7)। वास्तवमें देखा जाय तो राग ही बाँधनेवाला है? क्रिया नहीं।गीतामें कर्म तीन प्रकारके बताये गये हैं -- सात्त्विक? राजस और तामस (18। 23 -- 25)। कर्म करनेवालेका भाव सात्त्विक होगा तो वे कर्म सात्त्विक हो जायँगे? भाव राजस होगा तो वे कर्म राजस हो जायँगे और भाव तामस होगा तो वे कर्म तामस हो जायँगे। इसलिये भगवान्ने केवल क्रियाको रजोगुणी नहीं माना है। सम्बन्ध -- सभी कर्म विचारपूर्वक किये जाते हैं। उन कर्मोंके विचारमें बुद्धि और धृति -- इन कर्मसंग्राहक करणोंकी प्रधानता होनेसे अब आगे उनके भेद बताते हैं।
।।18.28।।जो कर्ता असावधान, अशिक्षित, ऐंठ-अकड़वाला, जिद्दी, उपकारीका अपकार करनेवाला, आलसी, विषादी और दीर्घसूत्री है, वह तामस कहा जाता है।
बुद्धेर्भेदं धृतेश्चैव गुणतस्त्रिविधं शृणु। प्रोच्यमानमशेषेण पृथक्त्वेन धनञ्जय ॥
।।18.29।। व्याख्या -- [इसी अध्यायके अठारहवें श्लोकमें कर्मसंग्रहके तीन हेतु बताये गये हैं -- करण? कर्म और कर्ता। इनमेंसे कर्म करनेके जो इन्द्रियाँ आदि करण हैं? उनके सात्त्विक? राजस और तामस -- ये तीन भेद नहीं होते। उन इन्द्रियोंमें बुद्धिकी ही प्रधानता रहती है और सभी इन्द्रियाँ बुद्धिके अनुसार ही काम करती हैं। इसलिये यहाँ बुद्धिके भेदसे करणोंके भेद बता रहे हैं।बुद्धिके निश्चयको? विचारको दृढ़तासे ठीक तरह रखनेवाली और अपने लक्ष्यसे विचलित न होने देनेवाली धारणशक्तिका नाम धृति है। धारणशक्ति अर्थात् धृतिके बिना बुद्धि अपने निश्चयपर दृढ़ नहीं रह सकती। इसलिये बुद्धिके साथहीसाथ धृतिके भी तीन भेद बताने आवश्यक हो गये (टिप्पणी प0 911.1)।मनुष्य जो कुछ भी करता है? बुद्धिपूर्वक ही करता है अर्थात् ठीक सोचसमझकर ही किसी कार्यमें प्रवृत्त होता है। उस कार्यमें प्रवृत्त होनेपर भी उसको धैर्यकी बड़ी भारी आवश्यकता होती है। उसकी बुद्धिमें विचारशक्ति तेज है और उसे धारण करनेवाली शक्ति -- धृति श्रेष्ठ है? तो उसकी बुद्धि अपने निश्चित किये हुए लक्ष्यसे विचलित नहीं होती। जब बुद्धि अपने लक्ष्यपर दृढ़ रहती है? तब मनुष्यका कार्य सिद्ध हो जाता है।अभी साधकोंके लिये कर्मप्रेरक और कर्मसंग्रहका जो प्रकरण चला है? उसमें ज्ञान? कर्म और कर्ताकी ही खास आवश्यकता है। ऐसे ही साधक अपनी साधनामें दृढ़तापूर्वक लगा रहे? इसके लिये बुद्धि और धृतिके भेदको जाननेकी विशेष आवश्यकता है क्योंकि उनके भेदको ठीक जानकर ही वह संसारसे ऊँचा उठ सकता है। किस प्रकारकी बुद्धि और धृतिको धारण करके साधक संसारसे ऊँचा उठ सकता है और किस प्रकारकी बुद्धि और धृतिके रहनेसे उसे ऊँचा उठनेमें बाधा लग सकती है -- यह जानना साधकके लिये बहुत जरूरी है। इसलिये भगवान्ने उन दोनोंके भेद बताये हैं। भेद बतानेमें भगवान्का भाव यह है कि सात्त्विकी बुद्धि और धृतिसे ही साधक ऊँचा उठ सकता है? राजसीतामसी बुद्धि और धृतिसे नहीं।]धनञ्जय -- जब पाण्डवोंने राजसूय यज्ञ किया था? तब अर्जुन अनेक राजाओंको जीतकर बहुतसा धन लेकर आये थे। इसीसे उनका नाम धनञ्जय पड़ा था। अब भगवान् अर्जुनसे कहते हैं कि अपनी साधनामें सात्त्विकी बुद्धि और धृतिको ग्रहण करके गुणातीत तत्त्वकी प्राप्ति करना ही वास्तविक धन है इसलिये तुम इस वास्तविक धनको धारण करो? इसीमें तुम्हारे धनञ्जय नामकी सार्थकता है।बुद्धेर्भेदं धृतेश्चैव गुणतस्त्रिविधं श्रृणु -- भगवान् कहते हैं कि बुद्धि भी एक है और धृति भी एक है परन्तु गुणोंकी प्रधानतासे उस बुद्धि और धृतिके भी सात्त्विक? राजस और तामस -- ये तीनतीन भेद हो जाते हैं। उनका मैं ठीकठीक विवेचन करूँगा और थोड़ेमें बहुत विशेष बात कहूँगा? उनको तुम मन लगाकर? ध्यान देकर ठीक तरहसे सुनो।धृति श्रोत्रादि करणोंमें नहीं आयी है। इसलिये भगवान् चैव पदका प्रयोग करके कह रहे हैं कि जैसे बुद्धिके तीन भेद बताऊँगा? ऐसे ही धृतिके भी तीन भेद बताऊँगा। साधारण दृष्टिसे देखनेपर तो धृति भी बुद्धिका ही एक गुण दीखती है। बुद्धिका एक गुण होते हुए भी धृति बुद्धिसे अलग और विलक्षण है क्योंकि धृति स्वयं अर्थात् कर्तामें रहती है। उस धृतिके कारण ही मनुष्य बुद्धिका ठीकठीक उपयोग कर सकता है। धृति जितनी श्रेष्ठ अर्थात् सात्त्विकी होगी? साधककी (साधनमें) बुद्धि उतनी ही स्थिर रहेगी। साधनमें बुद्धिकी स्थिरताकी जितनी आवश्यकता है? उतनी आवश्यकता मनकी स्थिरताकी नहीं है। हाँ? एक अंशमें अणिमा आदि सिद्धियोंकी प्राप्तिमें मनकी स्थिरताकी आवश्यकता है परन्तु पारमार्थिक उन्नतिमें तो बुद्धिके अपने उद्देश्यपर स्थिर रहनेकी ही ज्यादा आवश्यकता है (टिप्पणी प0 911.2)। साधककी बुद्धि भी सात्त्विकी हो और धृति भी सात्त्विकी हो? तभी साधक अपने साधनमें दृढ़तासे लगा रहेगा। इसलिये इन दोनोंके ही भेद जाननेकी आवश्यकता है।पृथक्त्वेन -- उनके भेद अलगअलग ठीक तरहसे कहूँगा अर्थात् बुद्धि और धृतिके विषयमें भी क्याक्या भेद होते हैं? उनको भी कहूँगा।प्रोच्यमानमशेषेण -- भगवान् कहते हैं कि बुद्धि और धृतिके विषयमें जाननेकी जोजो आवश्यक बाते हैं? उन सबको मैं पूरापूरा कहूँगा? जिसके बाद फिर जानना बाकी नहीं रहेगा।, सम्बन्ध -- अब भगवान् सात्त्विकी बुद्धिके लक्षण बताते हैं।
।।18.29।।हे धनञ्जय ! अब तू गुणोंके अनुसार बुद्धि और धृतिके भी तीन प्रकारके भेद अलग-अलगरूपसे सुन, जो कि मेरे द्वारा पूर्णरूपसे कहे जा रहे हैं।
प्रवृत्तिं च निवृत्तिं च कार्याकार्ये भयाभये। बन्धं मोक्षं च या वेत्ति बुद्धिः सा पार्थ सात्त्विकी ॥
।।18.30।। व्याख्या -- प्रवृत्तिं च निवृत्तिं च -- साधकमात्रकी प्रवृत्ति और निवृत्ति -- ये दो अवस्थाएँ होती हैं। कभी वह संसारका कामधंधा करता है? तो यह प्रवृत्तिअवस्था है और कभी संसारका कामधंधा छोड़कर एकान्तमें भजनध्यान करता है? तो यह निवृत्तिअवस्था है। परन्तु इन दोनोंमें सांसारिक कामनासहित प्रवृत्ति और वासनासहित निवृत्ति (टिप्पणी प0 912) -- ये दोनों ही अवस्थाएँ प्रवृत्ति हैं अर्थात् संसारमें लगानेवाली हैं? तथा सांसारिक कामनारहित प्रवृत्ति और वासनारहित निवृत्ति -- ये दोनों ही अवस्थाएँ निवृत्ति हैं अर्थात् परमात्माकी तरफ ले जानेवाली हैं। इसलिये साधक इनको ठीकठीक जानकर,कामनावासनारहित प्रवृत्ति और निवृत्तिको ही ग्रहण करें।वास्तवमें गहरी दृष्टिसे देखा जाय तो कामनावासनारहित प्रवृत्ति और निवृत्ति भी यदि अपने सुख? आराम आदिके लिये की जायँ तो वे दोनों ही प्रवृत्ति हैं क्योंकि वे दोनों ही बाँधनेवाली हैं अर्थात् उनसे अपना व्यक्तित्व नहीं मिटता। परन्तु यदि कामनावासनारहित प्रवृत्ति और निवृत्ति -- दोनों केवल दूसरोंके सुख? आराम और हितके लिये ही की जायँ? तो वे दोनों ही निवृत्ति हैं क्योंकि उन दोनोंसे ही अपना व्यक्तित्व नहीं रहता। वह अव्यक्तित्व कब नहीं रहता जब प्रवृत्ति और निवृत्ति जिसके प्रकाशसे प्रकाशित होती हैं तथा जो प्रवृत्ति और निवृत्तिसे रहित है? उस प्रकाशक अर्थात् तत्त्वकी प्राप्तिके उद्देश्यसे ही प्रवृत्ति और निवृत्ति की जाय। प्रवृत्ति तो की जाय प्राणिमात्रकी सेवाके लिये और निवृत्ति की जाय परम विश्राम अर्थात् स्वरूपस्थितिके लिये।कार्याकार्ये -- शास्त्र? वर्ण? आश्रमकी मर्यादाके अनुसार जो काम किया जाता है? वह कार्य है और शास्त्र आदिकी मर्यादासे विरुद्ध जो काम किया जाता है वह अकार्य है।जिसको हम कर सकते हैं? जिसको जरूर करना चाहिये और जिसको करनेसे जीवका जरूर कल्याण होता है? वह कार्य अर्थात् कर्तव्य कहलाता है और जिसको हमें नहीं करना चाहिये तथा जिससे जीवका बन्धन होता है? वह अकार्य अर्थात् अकर्तव्य कहलाता है। जिसको हम नहीं कर सकते? वह अकर्तव्य नहीं कहलाता? वह तो अपनी असामर्थ्य है।भयाभये -- भय और अभयके कारणको देखना चाहिये। जिस कर्मसे अभी और परिणाममें अपना और दुनियाका अनिष्ट होनेकी सम्भावना है? वह कर्म भय अर्थात् भयदायक है और जिस कर्मसे अभी और परिणाममें अपना और दुनियाका हित होनेकी सम्भावनना है? वह कर्म अभय अर्थात् सबको अभय करनेवाला है।मनुष्य जब करनेलायक कार्यसे च्युत होकर अकार्यमें प्रवृत्त होता है? तब उसके मनमें अपनी मनबड़ाईकी हानि और निन्दाअपमान होनेकी आशङ्कासे भय पैदा होता है। परन्तु जो अपनी मर्यादासे कभी विचलित नहीं होता? अपने मनसे किसीका भी अनिष्ट नहीं चाहता और केवल परमात्मामें ही लगा रहता है? उसके मनमें सदा अभय बना रहता है। यह अभय ही मनुष्यको सर्वथा अभयपद -- परमात्माको प्राप्त करा देता है।बन्धं मोक्षं च या वेत्ति -- जो बाहरसे तो यज्ञ? दान? तीर्थ? व्रत आदि उत्तमसेउत्तम कार्य करता है परन्तु भीतरसे असत् जड? नाशवान् पदार्थोंको और स्वर्ग आदि लोकोंको चाहता है? उसके लिये वे सभी कर्म बन्ध अर्थात् बन्धनकारक ही हैं। केवल परमात्मासे ही सम्बन्ध रखना? परमात्माके सिवाय कभी किसी अवस्थामें असत् संसारके साथ लेशमात्र भी सम्बन्ध न रखना मोक्ष अर्थात् मोक्षदायक है।अपनेको जो वस्तुएँ नहीं मिली हैं? उनकी कामना होनेसे मनुष्य उनके अभावका अनुभव करता है। वह अपनेको उन वस्तुओंके परतन्त्र मानता है और वस्तुओंके मिलनेपर अपनेको स्वतन्त्र मानता है। वह समझता तो यह है कि मेरे पास वस्तुएँ होनेसे मैं स्वतन्त्र हो गया हूँ? पर हो जाता है उन वस्तुओंके परतन्त्र वस्तुओंके अभाव और वस्तुओंके भाव -- इन दोनोंकी परतन्त्रतामें इतना ही फरक पड़ता है कि वस्तुओंके अभावमें परतन्त्रता दीखती है? खटकती है और वस्तुओंके होनेपर वस्तुओंकी परतन्त्रता परतन्त्रताके रूपमें दीखती ही नहीं क्योंकि उस समय मनुष्य अन्धा हो जाता है। परन्तु हैं ये दोनों ही परतन्त्रता? और परतन्त्रता ही बन्धन है। अभावकी परतन्त्रता प्रकट विष है और भावकी परतन्त्रता छिपा हुआ मीठा विष है? पर हैं दोनों ही विष। विष तो मारनेवाला ही होता है।निष्कर्ष यह निकला कि सांसारिक वस्तुओंकी कामनासे ही बन्धन होता है और परमात्माके सिवाय किसी वस्तु? व्यक्ति? घटना? परिस्थिति? देश? काल आदिकी कामना न होनेसे मुक्ति होती है (टिप्पणी प0 913)। यदि मनमें कामना है तो वस्तु पासमें हो तो बन्धन और पासमें न हो तो बन्धन यदि मनमें कामना नहीं है तो वस्तु पासमें हो तो मुक्त और पासमें न हो तो मुक्तिबुद्धिः सा पार्थ सात्त्विकी -- इस प्रकार जो प्रवृत्तिनिवृत्ति? कार्यअकार्य? भयअभय और बन्धमोक्षके वास्तविक तत्त्वको जानती है? वह बुद्धि सात्त्विकी है।इनके वास्तविक तत्त्वको जानना क्या है प्रवृत्तिनिवृत्ति? कार्यअकार्य? भयअभय और बन्धमोक्ष -- इनको गहरी रीतिसे समझकर? जिसके साथ वास्तवमें हमारा सम्बन्ध नहीं है? उस संसारके साथ सम्बन्ध न मानना और जिसके साथ हमारा स्वतःसिद्ध सम्बन्ध है? ऐसे (प्रवृत्तिनिवृत्ति आदिके आश्रय तथा प्रकाशक) परमात्माको तत्त्वसे ठीकठीक जानना -- यही सात्त्विकी बुद्धिके द्वारा वास्तविक तत्त्वको ठीकठीक जानना है। सम्बन्ध -- अब राजसी बुद्धिके लक्षण बताते हैं।
।।18.30।।हे पृथानन्दन ! जो बुद्धि प्रवृत्ति और निवृत्तिको, कर्तव्य और अकर्तव्यको, भय और अभयको तथा बन्धन और मोक्षको जानती है, वह बुद्धि सात्त्विकी है।
यया धर्ममधर्मं च कार्यं चाकार्यमेव च। अयथावत्प्रजानाति बुद्धिः सा पार्थ राजसी ॥
।।18.31।। व्याख्या -- यया धर्ममधर्मं च -- शास्त्रोंने जो कुछ भी विधान किया है? वह धर्म है अर्थात् शास्त्रोंने जिसकी आज्ञा दी है और जिससे परलोकमें सद्गति होती है? वह धर्म है। शास्त्रोंने जिसका निषेध किया है? वह अधर्म है अर्थात् शास्त्रोंने जिसकी आज्ञा नहीं दी है और जिससे परलोकमें दुर्गति होती है? वह अधर्म है। जैसे? अपने मातापिता? बड़ेबूढ़ोंकी सेवा करनेमें? दूसरोंको सुख पहुँचानेमें? दूसरोंका हित करनेकी चेष्टामें अपने तन? मन? धन? योग्यता? पद? अधिकार? सामर्थ्य आदिको लगा देना धर्म है। ऐसे ही कुआँबावड़ी खुदवाना? धर्मशालाऔषधालय बनवाना? प्याऊसदावर्त चलाना देश? ग्राम? मोहल्लेके अनाथ तथा गरीब बालकोंकी और समाजकी उन्नतिके लिये अपनी कहलानेवाली चीजोंको आवश्यकतानुसार उनकी ही समझकर निष्कामभावसे उदारतापूर्वक खर्च करना धर्म है। इसके विपरीत अपने स्वार्थ? सुख? आरामके लिये दूसरोंकी धनसम्पत्ति? हक? पद? अधिकार छीनना दूसरोंका अपकार? अहित? हत्या आदि करना अपने तन? मन? धन? योग्यता? पद? अधिकार आदिके द्वारा दूसरोंको दुःख देना अधर्म है।वास्तवमें धर्म वह है? जो जीवका कल्याण कर दे और अधर्म वह है? जो जीवको बन्धनमें डाल दे।कार्यं चाकार्यमेव च -- वर्ण? आश्रम? देश? काल? लोकमर्यादा? परिस्थिति आदिके अनुसार शास्त्रोंने हमारे लिये जिस कर्मको करनेकी आज्ञा दी है? वह कर्म हमारे लिये कर्तव्य है। अवसरपर प्राप्त हुए कर्तव्यका पालन न करना तथा न करनेलायक कामको करना अकर्तव्य है। जैसे? भिक्षा माँगना यज्ञ? विवाह आदि कराना और उनमें दानदक्षिणा लेना आदि कर्म ब्राह्मणके लिये तो कर्तव्य हैं? पर क्षत्रिय? वैश्य और शूद्रके लिये अकर्तव्य हैं। इसी प्रकार शास्त्रोंने जिनजिन वर्ण और आश्रमोंके लिये जोजो कर्म बताये हैं? वे सब उनउनके लिये कर्तव्य हैं और जिनके लिये निषेध किया है? उनके लिये वे सब अकर्तव्य हैं।जहाँ नौकरी करते हैं? वहाँ ईमानदारीसे अपना पूरा समय देना? कार्यको सुचारुरूपसे करना? जिस तरहसे मालिकका हित हो? ऐसा काम करना -- ये सब कर्मचारियोंके लिये कर्तव्य हैं। अपने स्वार्थ? सुख और आराममें फँसकर कार्यमें पूरा समय न लगाना? कार्यको तत्परतासे न करना? थोड़ीसी घूस (रिश्वत) मिलनेसे मालिकका बड़ा नुकसान कर देना? दसपाँच रुपयोंके लिये मालिकका अहित कर देना -- ये सब कर्मचारियोंके लिये अकर्तव्य हैं।राजकीय जितने अफसर हैं? उनको राज्यका प्रबन्ध करनके लिये? सबका हित करनेके लिये ही ऊँचे पदपर,रखा जाता है। इसीलिये अपने स्वार्थ और अभिमानका त्याग करके जिस प्रकार सब लोगोंका हित हो सकता है? सबको सुख? आराम? शान्ति मिल सकती है -- ऐसे कामोंको करना उनके लिये कर्तव्य है। अपने तुच्छ स्वार्थमें आकर राज्यका नुकसान कर देना? लोगोंको दुःख देना आदि उनके लिये अकर्तव्य है।सात्त्विकी बुद्धिमें कही हुई प्रवृत्तिनिवृत्ति? भयअभय और बन्धमोक्षको भी यहाँ एव च पदोंसे ले लेना चाहिये।अयथावत्प्रजानाति बुद्धिः सा पार्थ राजसी -- राग होनेसे राजसी बुद्धिमें स्वार्थ? पक्षपात? विषमता आदि दोष आ जाते हैं। इन दोषोंके रहते हुए बुद्धि धर्मअधर्म? कार्यअकार्य? भयअभय? बन्धमोक्ष आदिके वास्तविक तत्त्वको ठीकठीक नहीं जान सकती। अतः किसी वर्णआश्रमके लिये किस परिस्थितिमें कौनसा धर्म कहा जाता है और कौनसा अधर्म कहा जाता है वह धर्म किस वर्णआश्रमके लिये कर्तव्य हो जाता है और किसके लिये अकर्तव्य हो जाता है किससे भय होता है और किससे मनुष्य अभय हो जाता है इन बातोंको जो बुद्धि ठीकठीक नहीं जान सकती? वह बुद्धि राजसी है।जब सांसारिक वस्तु? व्यक्ति? घटना? परिस्थिति? क्रिया? पदार्थ आदिमें राग (आसक्ति) हो जाता है? तो वह राग दूसरोंके प्रति द्वेष पैदा करनेवाला हो जाता है। फिर जिसमें राग हो जाता है उसके दोषोंको और जिसमें द्वेष हो जाता है? उसके गुणोंको मनुष्य नहीं देख सकता। राग और द्वेष -- इन दोनोंमें संसारके साथ सम्बन्ध जुड़ता है। संसारके साथ सम्बन्ध जुड़नेपर मनुष्य संसारको नहीं जान सकता। ऐसे ही परमात्मासे अलग रहनेपर मनुष्य परमात्माको नहीं जान सकता। संसारसे अलग होकर ही संसारको जान सकता है और परमात्मासे अभिन्न होकर ही परमात्माको जान सकता है। वह अभिन्नता चाहे प्रेमसे हो? चाहे ज्ञानसे हो।परमात्मासे अभिन्न होनेमें सात्त्विकी बुद्धि ही काम करती है क्योंकि सात्त्विकी बुद्धिमें विवेकशक्ति जाग्रत् रहती है। परन्तु राजसी बुद्धिमें वह विवेकशक्ति रागके कारण धुँधलीसी रहती है। जैसे जलमें मिट्टी घुल जानेसे जलमें स्वच्छता? निर्मलता नहीं रहती? ऐसे ही बुद्धिमें रजोगुण आ जानेसे बुद्धिमें उतनी स्वच्छता? निर्मलता नहीं रहती। इसलिये धर्मअधर्म आदिको समझनेमें कठिनता पड़ती है। राजसी बुद्धि होनेपर मनुष्य जिसजिस विषयमें प्रवेश करता है? उसको उस विषयको समझनेमें कठिनता पड़ती है। उस विषयके गुणदोषोंको ठीकठीक समझे बिना वह ग्रहण और त्यागको अपने आचरणमें नहीं ला सकता अर्थात् वह ग्राह्य वस्तुका ग्रहण नहीं कर सकता और त्याज्य वस्तुका त्याग नहीं कर सकता। सम्बन्ध -- अब तामसी बुद्धिके लक्षण बताते हैं।
।।18.31।।हे पार्थ ! मनुष्य जिसके द्वारा धर्म और अधर्मको, कर्तव्य और अकर्तव्यको भी ठीक तरहसे नहीं जानता, वह बुद्धि राजसी है।
अधर्मं धर्ममिति या मन्यते तमसावृता। सर्वार्थान्विपरीतांश्च बुद्धिः सा पार्थ तामसी ॥
।।18.32।। व्याख्या -- अधर्मं धर्ममिति या मन्यते तमसावृता -- ईश्वरकी निन्दा करना शास्त्र? वर्ण? आश्रम और लोकमर्यादाके विपरीत काम करना मातापिताके साथ अच्छा बर्ताव न करना सन्तमहात्मा? गुरुआचार्य आदिका अपमान करना झूठ? कपट? बेईमानी? जालसाजी? अभक्ष्य भोजन? परस्त्रीगमन आदि शास्त्रनिषिद्ध पापकर्मोंको धर्म मानना -- यह सब अधर्मको धर्म मानना है।अपने शास्त्र? वर्ण? आश्रमकी मर्यादामें चलना मातापिताकी आज्ञाका पालन करना तथा उनकी तनमनधनसे सेवा करना संतमहात्माओंके उपदेशोंके अनुसार अपना जीवन बनाना धार्मिक ग्रन्थोंका पठनपाठन करना दूसरोंकी सेवाउपकार करना शुद्धपवित्र भोजन करना आदि शास्त्रविहित कर्मोंको उचित न मानना -- यह धर्मको अधर्म मानना है।तामसी बुद्धिवाले मनुष्योंके विचार होते हैं कि शास्त्रकारोंने? ब्राह्मणोंने अपनेको बड़ा बता दिया और,तरहतरहके नियम बनाकर लोगोंको बाँध दिया? जिससे भारत परतन्त्र हो गया जबतक ये शास्त्र रहेंगे? ये धार्मिक पुस्तकें रहेंगी? तबतक भारतका उत्थान नहीं होगा? भारत परतन्त्रताकी बेड़ीमें ही जकड़ा हुआ रहेगा? आदिआदि। इसलिये वे मर्यादाओंको तोड़नेमें ही धर्म मानते हैं।सर्वार्थान्विपरीतांश्च -- आत्माको स्वरूप न मानकर शरीरको ही स्वरूप मानना ईश्वरको न मान करके दृश्य जगत्को ही सच्चा मानना दूसरोंको तुच्छ समझकर अपनेको ही सबसे बड़ा मानना दूसरोंको मूर्ख समझकर अपनेको ही पढ़ालिखा? विद्वान् समझना जितने संतमहात्मा हो गये हैं? उनकी मान्यताओंसे अपनी मान्यताको श्रेष्ठ मानना सच्चे सुखकी तरफ ध्यान न देकर वर्तमानमें मिलनेवाले संयोगजन्य सुखको ही सच्चा मानना न करनेयोग्य कार्यको ही अपना कर्तव्य समझना अपवित्र वस्तुओंको ही पवित्र मानना -- यह सम्पूर्ण चीजोंको उलटा मानना है।बुद्धिः सा पार्थ तामसी -- तमोगुणसे आवृत जो बुद्धि अधर्मको धर्म? धर्मको अधर्म और अच्छेको बुरा? सुलटेको उलटा मानती है? वह बुद्धि तामसी है। यह तामसी बुद्धि ही मनुष्यको अधोगतिमें ले जानेवाली है -- अधो गच्छन्ति तामसाः (गीता 14। 18)। इसलिये अपना उद्धार चाहनेवालेको इसका सर्वथा त्याग कर देना चाहिये। सम्बन्ध -- अब भगवान् सात्त्विकी धृतिके लक्षण बताते हैं।
।।18.32।।हे पृथानन्दन ! तमोगुणसे घिरी हुई जो बुद्धि अधर्मको धर्म और सम्पूर्ण चीजोंको उलटा मान लेती है, वह तामसी है।
धृत्या यया धारयते मनःप्राणेन्द्रियक्रियाः। योगेनाव्यभिचारिण्या धृतिः सा पार्थ सात्त्विकी ॥
।।18.33।। व्याख्या -- धृत्या यया धारयते ৷৷. योगेनाव्यभिचारिण्या -- सांसारिक लाभहानि? जयपराजय? सुखदुःख? आदरनिरादर? सिद्धिअसिद्धिमें सम रहनेका नाम योग (समता) है।परमात्माको चाहनेके साथसाथ इस लोकमें सिद्धि? असिद्धि? वस्तु? पदार्थ? सत्कार? पूजा आदि और परलोकमें सुखभोगको चाहना व्यभिचार है और इस लोक तथा परलोकके सुख? भोग? वस्तु? पदार्थ आदिकी किञ्चिन्मात्र भी इच्छा न रखकर केवल परमात्माको चाहना अव्यभिचार है। यह अव्यभिचार जिसमें होता है? वह धृति अव्यभिचारिणी कहलाती है।अपनी मान्यता? सिद्धान्त? लक्ष्य? भाव? क्रिया? वृत्ति? विचार आदिको दृढ़? अटल रखनेकी शक्तिका नाम धृति है। योग अर्थात् समतासे युक्त इस अव्यभिचारिणी धृतिके द्वारा मनुष्य मन? प्राण और इन्द्रियोंकी क्रियाओँको धारण करता है।मनमें रागद्वेषको लेकर होनेवाले चिन्तनसे रहित होना? मनको जहाँ लगाना चाहें? वहाँ लग जाना और जहाँसे हटाना चाहें? वहाँसे हट जाना आदि मनकी क्रियाओंको धृतिके द्वारा धारण करना है।प्राणायाम करते हुए रेचकमें पूरक न होना? पूरकमें रेचक न होना और बाह्य कुम्भकमें पूरक न होना तथा आभ्यन्तर कुम्भकमें रेचक न होना अर्थात् प्राणायामके नियमसे विरुद्ध श्वासप्रश्वासोंका न होना ही धृतिके द्वारा प्राणोंकी क्रियाओँको धारण करना है।शब्द? स्पर्श? रूप? रस और गन्ध -- इन विषयोंको लेकर इन्द्रियोंका उच्छृङ्खल न होना? जिस विषयमें जैसे प्रवृत्त होना चाहें? उसमें प्रवृत्त होना और जिस विषयसे निवृत्त होना चाहें? उसमें निवृत्त होना ही धृतिके द्वारा इन्द्रियोंकी क्रियाओंको धारण करना है।धृतिः सा पार्थ सात्त्विकी -- जिस धृतिसे मन? प्राण और इन्द्रियोंकी क्रियाओँपर आधिपत्य हो जाता है? हे पार्थ वह धृति सात्त्विकी है। सम्बन्ध -- अब राजसी धृतिके लक्षण बताते हैं।
।।18.33।।हे पार्थ ! समतासे युक्त जिस अव्यभिचारिणी धृतिके द्वारा मनुष्य मन, प्राण और इन्द्रियोंकी क्रियाओंको धारण करता है, वह धृति सात्त्विकी है।
यया तु धर्मकामार्थान्धृत्या धारयतेऽर्जुन। प्रसङ्गेन फलाकाङ्क्षी धृतिः सा पार्थ राजसी ॥
।।18.34।। व्याख्या -- यया तु धर्मकामार्थान्धृत्या ৷৷. सा पार्थ राजसी -- राजसी धारणशक्तिसे मनुष्य अपनी कामनापूर्तिके लिये धर्मका अनुष्ठान करता है? काम अर्थात् भोगपदार्थोंको भोगता है और अर्थ अर्थात् धनका संग्रह करता है।अमावस्या? पूर्णिमा? व्यतिपात आदि अवसरोंपर दान करना? तीर्थोंमें अन्नदान करना पर्वोंपर उत्सव मनाना तीर्थयात्रा करना धार्मिक संस्थाओंमें चन्दाचिट्ठाके रूपमें कुछ चढ़ा देना कभी कथाकीर्तन? भगवतसप्ताह आदि करवा लेना -- यह सब केवल कामनापूर्तिके लिये करना ही धर्म को धारण करना है (टिप्पणी प0 916)।सांसारिक भोगपदार्थ तो प्राप्त होने ही चाहिये क्योंकि भोगपदार्थोंसे ही सुख मिलता है? संसारमें कोई भी प्राणी ऐसा नहीं है? जो भोगपदार्थोंकी कामना न करता हो यदि मनुष्य भोगोंकी कामना न करे तो उसका जीवन ही व्यर्थ है -- ऐसी धारणके साथ भोगपदार्थोंकी कामनापूर्तिमें ही लगे रहना काम को धारण करना है।धनके बिना दुनियामें किसीका भी काम नहीं चलता धनसे ही धर्म होता है यदि पासमें धन न हो तो आदमी धर्म कर ही नहीं सकता जितने आयोजन किये जाते हैं? वे सब धनसे ही तो होते हैं आज जितने आदमी बड़े कहलाते हैं? वे सब धनके कारण ही तो बड़े बने हैं धन होनेसे ही लोग आदरसम्मान करते हैं जिसके पास धन नहीं होता? उसको संसारमें कोई पूछता ही नहीं अतः धनका खूब संग्रह करना चाहिये -- इस प्रकार धनमें ही रचेपचे रहना अर्थ को धारण करना है। संसारमें अत्यन्त राग (आसक्ति) होनेके कारण राजस पुरुष शास्त्रकी मर्यादाके अनुसार जो कुछ भी शुभ काम करता है? उसमें उसकी यही कामना रहती है कि इस कर्मका मुझे इस लोकमें सुख? आराम? मान? सत्कार आदि मिले और परलोकमें सुखभोग? मिले। ऐसे फलकी कामनावाले तथा संसारमें अत्यन्त आसक्त मनुष्यकी धारणशक्ति राजसी होती है। सम्बन्ध -- अब तामसी धृतिके लक्षण बताते हैं।
।।18.34।।हे पृथानन्दन अर्जुन ! फलकी इच्छावाला मनुष्य जिस धृतिके द्वारा धर्म, काम (भोग) और अर्थको अत्यन्त आसक्तिपूर्वक धारण करता है, वह धृति राजसी है।
यया स्वप्नं भयं शोकं विषादं मदमेव च। न विमुञ्चति दुर्मेधा धृतिः सा पार्थ तामसी ॥
।।18.35।। व्याख्या -- यया स्वप्नं भयं ৷৷. सा पार्थ तामसी -- तामसी धारणशक्तिके द्वारा मनुष्य ज्यादा निद्रा? बाहर और भीतरका भय? चिन्ता? दुःख और घमण्ड -- इनका त्याग नहीं करता? प्रत्युत इन सबमें रचापचा रहता है। वह कभी ज्यादा नींदमें पड़ा रहता है? कभी मृत्यु? बीमारी? अपयश? अपमान? स्वास्थ्य? धन आदिके भयसे भयभीत होता रहता है? कभी शोकचिन्तामें डूबा रहता है? कभी दुःखमें मग्न रहता है और कभी अनुकूल पदार्थोंके मिलनेसे घमण्डमें चूर रहता है।निद्रा? भय? शोक आदिके सिवाय प्रमाद? अभिमान? दम्भ? द्वेष? ईर्ष्या आदि दुर्गुणोंको तथा हिंसा? दूसरोंका अपकार करना? उनको कष्ट देना? उनके धनका किसी तरहसे अपहरण करना आदि दुराचोंको भी एव च पदोंसे मान लेना चाहिये।इस प्रकार निद्रा? भय आदिको और दुर्गुणदुराचारोंको पकड़े रहनेवाली अर्थात् उनको न छोड़नेवाली धृति तामसी होती है।भगवान्ने तैंतीसवेंचौंतीसवें श्लोकोंमें धारयते पदसे सात्त्विक और राजस मनुष्यके द्वारा क्रमशः सात्त्विकी और राजसी धृतिको धारण करनेकी बात कही है परन्तु यहाँ तामस मनुष्यके द्वारा तामसी धृतिको धारण,करनेकी बात नहीं कही। कारण यह है कि जिसकी बुद्धि बहुत ही दुष्टा है? जिसकी बुद्धिमें अज्ञता? मूढता भरी हुई है? ऐसा मिलन अन्तःकरणवाला तामस मनुष्य निद्रा? भय? शोक आदि भावोंको छोड़ता ही नहीं। वह उनमें स्वाभाविक ही रचापचा रहता है।सात्त्विकी? राजसी और तामसी -- इन तीनों धृतियोंके वर्णनमें राजसी और तामसी धृतिमें तो क्रमशः फलाकाङ्क्षी और दुर्मेधाः पदसे कर्ताका उल्लेख किया है? पर सात्त्विकी धृतिमें कर्ताका उल्लेख किया ही नहीं। इसका कारण यह है कि सात्त्विकी धृतिमें कर्ता निर्लिप्त रहता है अर्थात् उसमें कर्तृत्वका लेप नहीं होता परन्तु राजसी और तामसी धृतिमें कर्ता लिप्त होता है।विशेष बातमानवशरीर विवेकप्रधान है। मनुष्य जो कुछ करता है? उसे वह विचारपूर्वक ही करता है। वह ज्यों ही विचारपूर्वक काम करता है? त्यों ही विवेक ज्यादा स्पष्ट प्रकट होता है। सात्त्विक मनुष्यकी धृति(धारणशक्ति) में यह विवेक साफसाफ प्रकट होता है कि मुझे तो केवल परमात्माकी तरफ ही चलना है। राजस मनुष्यकी धृतिमें संसारके पदार्थों और भोगोंमें रागकी प्रधानता होनेके कारण विवेक वैसा स्पष्ट नहीं होता फिर भी इस लोकमें सुखआराम? मानआदर मिले और परलोकमें अच्छी गति मिले? भोग मिले -- इस विषयमें विवेक काम करता है और आचरण भी मर्यादाके अनुसार ही होता है। परन्तु तामस मनुष्यकी धृतिमें विवेक बिलकुल ही दब जाता है। तामस भावोंमें उसकी इतनी दृढ़ता हो जाती है कि उसे उन भावोंको धारण करनेकी आवश्यकता ही नहीं रहती। वह तो निद्रा? भय आदि तामसभावोंमें ही रचापचा रहता है।पारमार्थिक मार्गमें क्रिया इतना काम नहीं करती जितना अपना उद्देश्य काम करता है। स्थूल क्रियाकी प्रधानता स्थूलशरीरमें? चिन्तनकी प्रधानता सूक्ष्मशरीरमें और स्थिरताकी प्रधानता कारणशरीरमें होती है? यह सब क्रिया ही है। क्रिया तो शरीरोंमें होती है? पर मेरेको तो केवल पारमार्थिक मार्गपर ही चलना है -- ऐसा उद्देश्य या लक्ष्य स्वयं(चेतनस्वरूप) में ही रहता है। स्वयंमें जैसा लक्ष्य होता है? उसके अनुसार स्वतः क्रियाएँ होती हैं। जो चीज स्वयंमें रहती है? वह कभी बदलती नहीं। उस लक्ष्यकी दृढ़ताके लिये सात्त्विकी बुद्धिकी आवश्यकता है और बुद्धिके निश्चयको अटल रखनेके लिये सात्त्विकी धृतिकी आवश्यकता है। इसलिये यहाँ तीसवेंसे पैंतीसवें श्लोकतक कुल छः श्लोकोंमें छः बार पार्थ सम्बोधनका प्रयोग करके भगवान् साधकमात्रके प्रतिनिधि अर्जुनको चेताते हैं कि पृथानन्दन लौकिक वस्तुओं और व्यक्तियोंके लिये चिन्ता न करके तुम अपने लक्ष्यको दृढ़तासे धारण किये रहो। अपनेमें कभी भी राजसतामसभाव न आने पायें -- इसके लिये निरन्तर सजग रहो, सम्बन्ध -- मनुष्योंकी कर्मोंमें प्रवृत्ति सुखके लोभसे ही होती है अर्थात् सुखकर्मसंग्रहमें हेतु है। अतः आगेके चार श्लोकोंमें सुखके भेद बताते हैं।
।।18.35।।हे पार्थ ! दुष्ट बुद्धिवाला मनुष्य जिस धृतिके द्वारा निद्रा, भय, चिन्ता, दुःख और घमण्डको भी नहीं छोड़ता, वह धृति तामसी है।
सुखं त्विदानीं त्रिविधं शृणु मे भरतर्षभ। अभ्यासाद्रमते यत्र दुःखान्तं च निगच्छति ॥
।।18.36।। व्याख्या -- भरतर्षभ -- इस सम्बोधनको देनेमें भगवान्का भाव यह है कि भरतवंशियोंमें श्रेष्ठ अर्जुन तुम राजसतामस सुखोंमें लुब्ध? मोहित होनेवाले नहीं हो क्योंकि तुम्हारे लिये राजस और तामस सुखपर विजय करना कोई बड़ी बात नहीं है। तुमने राजस सुखपर विजय भी कर ली है क्योंकि स्वर्गकी उर्वशीजैसी सुन्दरी अप्सराको भी तुमने ठुकरा दिया है। इसी प्रकार तुमने तामस सुखपर भी विजय कर ली है क्योंकि प्राणिमात्रके लिये आवश्यक जो निद्राका तामस सुख है? उसको तुमने जीत लिया है। इसीसे तुम्हारा नाम गुडाकेश हुआ है।सुखं तु इदानीम् -- ज्ञान? कर्म? कर्ता? बुद्धि और धृतिके तीनतीन भेद बतानेके बाद यहाँ तु पदका प्रयोग,करके भगवान् कहते हैं कि सुख भी तीन तरहका होता है। इसमें एक विशेष ध्यान देनेकी बात है कि आज पारमार्थिक मार्गपर चलनेवाले जितने भी साधक हैं? उन साधकोंकी ऊँची स्थिति न होनेमें अथवा उनको परमात्मतत्त्वका अनुभव न होनेमें अगर कोई विघ्नबाधा है? तो वह है -- सुखकी इच्छा।सात्त्विक सुख भी आसक्तिके कारण बन्धनकारक हो जाता है। तात्पर्य है कि अगर साधनजन्य -- ध्यान और एकाग्रताका सुख भी लिया जाय? तो वह भी बन्धनकारक हो जाता है। इतना ही नहीं? अगर समाधिका सुख भी लिया जाय? तो वह भी परमात्मतत्त्वकी प्राप्तिमें बाधक हो जाता है -- सुखसङ्गेन बध्नाति (गीता 14। 6)। इस विषयमें कोई कहे कि परमात्मतत्त्वका सुख आ जाय तो क्या उस सुखको भी हम न लें वास्तवमें परमात्मतत्त्वका सुख लिया नहीं जाता? प्रत्युत उस अक्षय सुखका स्वतः अनुभव होता है (गीता 5। 21 6। 21? 28)। साधनजन्य सुखका भोग न करनेसे वह अक्षय स्वतःस्वाभाविक प्राप्त हो जाता है। उस अक्षय सुखकी तरफ विशेष खयाल करानेके लिये भगवान् यहाँ तु पदका प्रयोग करते हैं।यहाँ इदानीम् कहनेका का तात्पर्य है कि अर्जुन संन्यास और त्यागके तत्त्वको जानना चाहते है अतः उनकी जिज्ञासाके उत्तरमें भगवान्ने त्याग? ज्ञान? कर्म? कर्ता? बुद्धि और धृतिके तीनतीन भेद बताये। परन्तु इन सबमें ध्येय तो सुखका ही होता है। अतः भगवान् कहते हैं कि तुम उसी ध्येयकी सिद्धिके लिये सुखके भेद सुनो।त्रिविधं श्रृणु मे -- लोग रातदिन राजस और तामस सुखमें लगे रहते हैं और उसीको वास्तविक सुख मानते हैं। इस कारण सांसारिक भोगोंसे ऊँचा उठकर भी कोई सुख मिल सकता है प्राणोंके मोहसे ऊँचा उठकर भी कोई सुख मिल सकता है राजस और तामस सुखसे आगे भी कोई सात्त्विक सुख है वे इन बातोंको समझ ही नहीं सकते। इसलिये भगवान् कहते हैं कि भैया वह सुख तीन प्रकारका होता है? उनको तुम सुनो और उनमेंसे सात्त्विक सुखको ग्रहण करो और राजसतामस सुखोंका त्याग करो। कारण कि सात्त्विक सुख परमात्माकी तरफ चलनेमें सहायता करनेवाला है और राजसतामस सुख संसारमें फँसाकर पतन करनेवाले हैं।अभ्यासाद्रमते यत्र -- सात्त्विक सुखमें अभ्याससे रमण होता है। साधारण मनुष्योंको अभ्यासके बिना इस सुखका अनुभव नहीं होता। राजस और तामस सुखमें अभ्यास नहीं करना पड़ता। उसमें तो प्राणिमात्रका स्वतःस्वाभाविक ही आकर्षण होता है।राजसतामस सुखमें इन्द्रियोंका विषयोंकी ओर? मनबुद्धिका भोगसंग्रहकी ओर तथा थकावट होनेपर निद्रा आदिकी ओर स्वतः आकर्षण होता है। विषयजन्य? अभिमानजन्य? प्रशंसाजन्य और निद्राजन्य सुख सभी प्राणियोंको स्वतः ही अच्छे लगते हैं। कुत्ते आदि जो नीच प्राणी हैं? उनका भी आदर करते हैं तो वे राजी होते हैं और निरादर करते हैं तो नाराज हो जाते हैं? दुःखी हो जाते हैं। तात्पर्य यह है कि राजस और तामस सुखमें अभ्यासकी जरूरत नहीं है क्योंकि इस सुखको सभी प्राणी अन्य योनियोंमें भी लेते आये हैं।इस सात्त्विक सुखमें अभ्यास क्या है श्रवणमनन भी अभ्यास है? शास्त्रोंको समझना भी अभ्यास है? और राजसीतामसी वृत्तियोंको हटाना भी अभ्यास है। जिस राजस और तामस सुखमें प्राणिमात्रकी स्वतःस्वाभाविक प्रवृत्ति हो रही है? उससे भिन्न नयी प्रवृत्ति करनेका नाम अभ्यास है। सात्त्विक सुखमें अभ्यास करना तो आवश्यक है? पर रमण करना बाधक है।यहाँ अभ्यासाद्रमते पदका यह भाव नहीं है कि सात्त्विक सुखका भोग किया जाय? प्रत्युत सात्त्विक सुखमें अभ्याससे ही रुचि? प्रियता? प्रवृत्ति आदिके होनेको ही यहाँ रमण करना कहा गया है।दुःखान्तं च निगच्छति -- उस सात्त्विक सुखमें अभ्याससे ज्योंज्यों रुचि? प्रियता बढ़ती जाती है? त्योंत्यों परिणाममें दुःखोंका नाश होता जाता है और प्रसन्नता? सुख तथा आनन्द बढ़ते जाते हैं (गीता 2। 65)।च अव्यय देनेका तात्पर्य है कि जबतक सात्त्विक सुखमें रमण होगा अर्थात् साधक सात्त्विक सुख लेता रहेगा? तबतक दुःखोंका अत्यन्त अभाव नहीं होगा। कारण कि सात्त्विक सुख भी परमात्मविषयक बुद्धिकी प्रसन्नतासे पैदा हुआ है -- आत्मबुद्धिप्रसादजम्। जो उत्पन्न होनेवाला होता है? वह जरूर नष्ट होता है। ऐसे सुखसे दुःखोंका अन्त कैसे होगा इसलिये सात्त्विक सुखमें भी आसक्ति नहीं होनी चाहिये। सात्त्विक सुखसे भी ऊँचा उठनेसे मनुष्य दुःखोंके अन्तको प्राप्त हो जाता है? गुणातीत हो जाता है।आत्मबुद्धिप्रसादजम् -- जिस बुद्धिमें सांसारिक मान? बड़ाई? आदर? धनसंग्रह? विषयजन्य सुख आदिका महत्त्व नहीं रहता? केवल परमात्मविषय विचार ही रहता है? उस बुद्धिकी प्रसन्नता (गीता 2। 64) अर्थात् स्वच्छतासे यह सात्त्विक सुख पैदा होता है। तात्पर्य है कि सांसारिक संयोगजन्य सुखसे सर्वथा उपरत होकर परमात्मामें बुद्धिके विलीन होनेपर जो सुख होता है? वह सुख सात्त्विक है।यत्तदग्रे विषमिव -- यहाँ यत्तत् कहनेका भाव यह है कि यत् -- जो सात्त्विक सुख है तत् -- वह परोक्ष है अर्थात् उसका अभी अनुभव नहीं हुआ है। अभी तो उस सुखका केवल उद्देश्य बनाया है? जबकि राजस और तामस सुखका अभी अनुभव होता है। इसलिये अनुभवजन्य राजस और तामस सुखका त्याग करनेमें कठिनता आती है और लक्ष्यरूपमें जो सात्त्विक सुख है? उसकी प्राप्तिके लिये किया हुआ रसहीन परिश्रम (अभ्यास) आरम्भमें जहरकी तरह लगता है -- अग्ने विषमिव। तात्पर्य यह है कि अनुभवजन्य राजस और तामस सुखका तो त्याग कर दिया और लक्ष्यवाला सात्त्विक सुख मिला नहीं -- उसका रस अभी मिला नहीं इसलिये वह सात्त्विक सुख आरम्भमें जहरकी तरह प्रतीत होता है।राजस और तामस सुखको अनेक योनियोंमें भोगते आये हैं और उसे इस जन्ममें भी भोगा है। उस भोगे हुए सुखकी स्मृति आनेसे राजस और तामस सुखमें स्वाभाविक ही मन लग जाता है। परन्तु सात्त्विक सुख उतना भोगा हुआ नहीं है इसलिये इसमें जल्दी मन नहीं लगता। इस कारण सात्त्विक सुख आरम्भमें विषकी तरह लगता है।वास्तवमें सात्त्विक सुख विषकी तरह नहीं है? प्रत्युत राजस और तामस सुखका त्याग विषकी तरह होता है। जैसे? बालकको खेलकूद छोड़कर पढ़ाईमें लगाया जाय तो उसको पढ़ाईमें कैदीकी तरह होकर अभ्यास करना पड़ता है। पढ़ाईमें मन नहीं लगता तथा इधर उच्छृङ्खलता? खेलकूद छूट जाता है? तो उसको पढ़ाई विषकी तरह मालूम देती है। परन्तु वही बालक पढ़ता रहे और एकदो परीक्षाओंमें पास हो जाय तो उसका पढ़ाईमें मन लग जाता है अर्थात् उसको पढ़ाई अच्छी लगने लग जाती है। तब उसकी पढ़ाईके अभ्याससे रुचि? प्रियता होने लगती है।वास्तवमें देखा जाय तो सात्त्विक सुख आरम्भमें विषकी तरह उन्हीं लोगोंके लिये होता है? जिनका राजस और तामस सुखमें राग है। परन्तु जिनको सांसारिक भोगोंसे स्वाभाविक वैराग्य है? जिनकी पारमार्थिक शास्त्राध्ययन? सत्सङ्ग? कथाकीर्तन? साधनभजन आदिमें स्वाभाविक रुचि है और जिनके ज्ञान? कर्म? बुद्धि और धृति सात्त्विक हैं? उन साधकोंको यह सात्त्विक सुख आरम्भसे ही अमृतकी तरह आनन्द देनेवाला होता है। उनको इसमें कष्ट? परिश्रम? कठिनता आदि मालूम ही नहीं देते।परिणामेऽमृतोपमम् -- साधन करनेसे साधकमें सत्त्वगुण आता है। सत्त्वगुणके आनेपर इन्द्रियों और अन्तःकरणमें स्वच्छता? निर्मलता? ज्ञानकी दीप्ति? शान्ति? निर्विकारता आदि सद्भावसद्गुण प्रकट हो जाते हैं (टिप्पणी प0 919)। इन सद्गुणोंका प्रकट होना ही सात्त्विक सुखका परिणाममें अमृतकी तरह होना है। इसका उपभोग न करनेसे अर्थात् इसमें रस न लेनेसे वास्तविक अक्षय सुखकी प्राप्ति हो जाती है (गीता 5। 21)।परिणाममें सात्त्विक सुख राजस और तामस सुखसे ऊँचा उठाकर जडतासे सम्बन्धविच्छेद करा देता है और इसमें आसक्ति न होनेसे अन्तमें परमात्माकी प्राप्ति करा देता है। इसलिये यह परिणाममें अमृतकी तरह है।तत्सुखं सात्त्विकं प्रोक्तम् -- सत्सङ्ग? स्वाध्याय? संकीर्तन? जप? ध्यान? चिन्तन आदिसे जो सुख होता है? वह मान? बड़ाई? आराम? रुपये? भोग आदि विषयेन्द्रियसम्बन्धका नहीं है और प्रमाद? आलस्य? निद्राका भी नहीं है। वह तो परमात्माके सम्बन्धका है। इसलिये वह सुख सात्त्विक कहा गया है। सम्बन्ध -- अब राजस सुखका वर्णन करते हैं।
।।18.36।।हे भरतवंशियोंमें श्रेष्ठ अर्जुन ! अब तीन प्रकारके सुखको भी तुम मेरेसे सुनो। जिसमें अभ्याससे रमण होता है और जिससे दुःखोंका अन्त हो जाता है, ऐसा वह परमात्मविषयक बुद्धिकी प्रसन्नतासे पैदा होनेवाला जो सुख (सांसारिक आसक्तिके कारण) आरम्भमें विषकी तरह और परिणाममें अमृतकी तरह होता है, वह सुख सात्त्विक कहा गया है।
यत्तदग्रे विषमिव परिणामेऽमृतोपमम्। तत्सुखं सात्त्विकं प्रोक्तमात्मबुद्धिप्रसादजम् ॥
।।18.37।। व्याख्या -- भरतर्षभ -- इस सम्बोधनको देनेमें भगवान्का भाव यह है कि भरतवंशियोंमें श्रेष्ठ अर्जुन तुम राजसतामस सुखोंमें लुब्ध? मोहित होनेवाले नहीं हो क्योंकि तुम्हारे लिये राजस और तामस सुखपर विजय करना कोई बड़ी बात नहीं है। तुमने राजस सुखपर विजय भी कर ली है क्योंकि स्वर्गकी उर्वशीजैसी सुन्दरी अप्सराको भी तुमने ठुकरा दिया है। इसी प्रकार तुमने तामस सुखपर भी विजय कर ली है क्योंकि प्राणिमात्रके लिये आवश्यक जो निद्राका तामस सुख है? उसको तुमने जीत लिया है। इसीसे तुम्हारा नाम गुडाकेश हुआ है।सुखं तु इदानीम् -- ज्ञान? कर्म? कर्ता? बुद्धि और धृतिके तीनतीन भेद बतानेके बाद यहाँ तु पदका प्रयोग,करके भगवान् कहते हैं कि सुख भी तीन तरहका होता है। इसमें एक विशेष ध्यान देनेकी बात है कि आज पारमार्थिक मार्गपर चलनेवाले जितने भी साधक हैं? उन साधकोंकी ऊँची स्थिति न होनेमें अथवा उनको परमात्मतत्त्वका अनुभव न होनेमें अगर कोई विघ्नबाधा है? तो वह है -- सुखकी इच्छा।सात्त्विक सुख भी आसक्तिके कारण बन्धनकारक हो जाता है। तात्पर्य है कि अगर साधनजन्य -- ध्यान और एकाग्रताका सुख भी लिया जाय? तो वह भी बन्धनकारक हो जाता है। इतना ही नहीं? अगर समाधिका सुख भी लिया जाय? तो वह भी परमात्मतत्त्वकी प्राप्तिमें बाधक हो जाता है -- सुखसङ्गेन बध्नाति (गीता 14। 6)। इस विषयमें कोई कहे कि परमात्मतत्त्वका सुख आ जाय तो क्या उस सुखको भी हम न लें वास्तवमें परमात्मतत्त्वका सुख लिया नहीं जाता? प्रत्युत उस अक्षय सुखका स्वतः अनुभव होता है (गीता 5। 21 6। 21? 28)। साधनजन्य सुखका भोग न करनेसे वह अक्षय स्वतःस्वाभाविक प्राप्त हो जाता है। उस अक्षय सुखकी तरफ विशेष खयाल करानेके लिये भगवान् यहाँ तु पदका प्रयोग करते हैं।यहाँ इदानीम् कहनेका का तात्पर्य है कि अर्जुन संन्यास और त्यागके तत्त्वको जानना चाहते है अतः उनकी जिज्ञासाके उत्तरमें भगवान्ने त्याग? ज्ञान? कर्म? कर्ता? बुद्धि और धृतिके तीनतीन भेद बताये। परन्तु इन सबमें ध्येय तो सुखका ही होता है। अतः भगवान् कहते हैं कि तुम उसी ध्येयकी सिद्धिके लिये सुखके भेद सुनो।त्रिविधं श्रृणु मे -- लोग रातदिन राजस और तामस सुखमें लगे रहते हैं और उसीको वास्तविक सुख मानते हैं। इस कारण सांसारिक भोगोंसे ऊँचा उठकर भी कोई सुख मिल सकता है प्राणोंके मोहसे ऊँचा उठकर भी कोई सुख मिल सकता है राजस और तामस सुखसे आगे भी कोई सात्त्विक सुख है वे इन बातोंको समझ ही नहीं सकते। इसलिये भगवान् कहते हैं कि भैया वह सुख तीन प्रकारका होता है? उनको तुम सुनो और उनमेंसे सात्त्विक सुखको ग्रहण करो और राजसतामस सुखोंका त्याग करो। कारण कि सात्त्विक सुख परमात्माकी तरफ चलनेमें सहायता करनेवाला है और राजसतामस सुख संसारमें फँसाकर पतन करनेवाले हैं।अभ्यासाद्रमते यत्र -- सात्त्विक सुखमें अभ्याससे रमण होता है। साधारण मनुष्योंको अभ्यासके बिना इस सुखका अनुभव नहीं होता। राजस और तामस सुखमें अभ्यास नहीं करना पड़ता। उसमें तो प्राणिमात्रका स्वतःस्वाभाविक ही आकर्षण होता है।राजसतामस सुखमें इन्द्रियोंका विषयोंकी ओर? मनबुद्धिका भोगसंग्रहकी ओर तथा थकावट होनेपर निद्रा आदिकी ओर स्वतः आकर्षण होता है। विषयजन्य? अभिमानजन्य? प्रशंसाजन्य और निद्राजन्य सुख सभी प्राणियोंको स्वतः ही अच्छे लगते हैं। कुत्ते आदि जो नीच प्राणी हैं? उनका भी आदर करते हैं तो वे राजी होते हैं और निरादर करते हैं तो नाराज हो जाते हैं? दुःखी हो जाते हैं। तात्पर्य यह है कि राजस और तामस सुखमें अभ्यासकी जरूरत नहीं है क्योंकि इस सुखको सभी प्राणी अन्य योनियोंमें भी लेते आये हैं।इस सात्त्विक सुखमें अभ्यास क्या है श्रवणमनन भी अभ्यास है? शास्त्रोंको समझना भी अभ्यास है? और राजसीतामसी वृत्तियोंको हटाना भी अभ्यास है। जिस राजस और तामस सुखमें प्राणिमात्रकी स्वतःस्वाभाविक प्रवृत्ति हो रही है? उससे भिन्न नयी प्रवृत्ति करनेका नाम अभ्यास है। सात्त्विक सुखमें अभ्यास करना तो आवश्यक है? पर रमण करना बाधक है।यहाँ अभ्यासाद्रमते पदका यह भाव नहीं है कि सात्त्विक सुखका भोग किया जाय? प्रत्युत सात्त्विक सुखमें अभ्याससे ही रुचि? प्रियता? प्रवृत्ति आदिके होनेको ही यहाँ रमण करना कहा गया है।दुःखान्तं च निगच्छति -- उस सात्त्विक सुखमें अभ्याससे ज्योंज्यों रुचि? प्रियता बढ़ती जाती है? त्योंत्यों परिणाममें दुःखोंका नाश होता जाता है और प्रसन्नता? सुख तथा आनन्द बढ़ते जाते हैं (गीता 2। 65)।च अव्यय देनेका तात्पर्य है कि जबतक सात्त्विक सुखमें रमण होगा अर्थात् साधक सात्त्विक सुख लेता रहेगा? तबतक दुःखोंका अत्यन्त अभाव नहीं होगा। कारण कि सात्त्विक सुख भी परमात्मविषयक बुद्धिकी प्रसन्नतासे पैदा हुआ है -- आत्मबुद्धिप्रसादजम्। जो उत्पन्न होनेवाला होता है? वह जरूर नष्ट होता है। ऐसे सुखसे दुःखोंका अन्त कैसे होगा इसलिये सात्त्विक सुखमें भी आसक्ति नहीं होनी चाहिये। सात्त्विक सुखसे भी ऊँचा उठनेसे मनुष्य दुःखोंके अन्तको प्राप्त हो जाता है? गुणातीत हो जाता है।आत्मबुद्धिप्रसादजम् -- जिस बुद्धिमें सांसारिक मान? बड़ाई? आदर? धनसंग्रह? विषयजन्य सुख आदिका महत्त्व नहीं रहता? केवल परमात्मविषय विचार ही रहता है? उस बुद्धिकी प्रसन्नता (गीता 2। 64) अर्थात् स्वच्छतासे यह सात्त्विक सुख पैदा होता है। तात्पर्य है कि सांसारिक संयोगजन्य सुखसे सर्वथा उपरत होकर परमात्मामें बुद्धिके विलीन होनेपर जो सुख होता है? वह सुख सात्त्विक है।यत्तदग्रे विषमिव -- यहाँ यत्तत् कहनेका भाव यह है कि यत् -- जो सात्त्विक सुख है तत् -- वह परोक्ष है अर्थात् उसका अभी अनुभव नहीं हुआ है। अभी तो उस सुखका केवल उद्देश्य बनाया है? जबकि राजस और तामस सुखका अभी अनुभव होता है। इसलिये अनुभवजन्य राजस और तामस सुखका त्याग करनेमें कठिनता आती है और लक्ष्यरूपमें जो सात्त्विक सुख है? उसकी प्राप्तिके लिये किया हुआ रसहीन परिश्रम (अभ्यास) आरम्भमें जहरकी तरह लगता है -- अग्ने विषमिव। तात्पर्य यह है कि अनुभवजन्य राजस और तामस सुखका तो त्याग कर दिया और लक्ष्यवाला सात्त्विक सुख मिला नहीं -- उसका रस अभी मिला नहीं इसलिये वह सात्त्विक सुख आरम्भमें जहरकी तरह प्रतीत होता है।राजस और तामस सुखको अनेक योनियोंमें भोगते आये हैं और उसे इस जन्ममें भी भोगा है। उस भोगे हुए सुखकी स्मृति आनेसे राजस और तामस सुखमें स्वाभाविक ही मन लग जाता है। परन्तु सात्त्विक सुख उतना भोगा हुआ नहीं है इसलिये इसमें जल्दी मन नहीं लगता। इस कारण सात्त्विक सुख आरम्भमें विषकी तरह लगता है।वास्तवमें सात्त्विक सुख विषकी तरह नहीं है? प्रत्युत राजस और तामस सुखका त्याग विषकी तरह होता है। जैसे? बालकको खेलकूद छोड़कर पढ़ाईमें लगाया जाय तो उसको पढ़ाईमें कैदीकी तरह होकर अभ्यास करना पड़ता है। पढ़ाईमें मन नहीं लगता तथा इधर उच्छृङ्खलता? खेलकूद छूट जाता है? तो उसको पढ़ाई विषकी तरह मालूम देती है। परन्तु वही बालक पढ़ता रहे और एकदो परीक्षाओंमें पास हो जाय तो उसका पढ़ाईमें मन लग जाता है अर्थात् उसको पढ़ाई अच्छी लगने लग जाती है। तब उसकी पढ़ाईके अभ्याससे रुचि? प्रियता होने लगती है।वास्तवमें देखा जाय तो सात्त्विक सुख आरम्भमें विषकी तरह उन्हीं लोगोंके लिये होता है? जिनका राजस और तामस सुखमें राग है। परन्तु जिनको सांसारिक भोगोंसे स्वाभाविक वैराग्य है? जिनकी पारमार्थिक शास्त्राध्ययन? सत्सङ्ग? कथाकीर्तन? साधनभजन आदिमें स्वाभाविक रुचि है और जिनके ज्ञान? कर्म? बुद्धि और धृति सात्त्विक हैं? उन साधकोंको यह सात्त्विक सुख आरम्भसे ही अमृतकी तरह आनन्द देनेवाला होता है। उनको इसमें कष्ट? परिश्रम? कठिनता आदि मालूम ही नहीं देते।परिणामेऽमृतोपमम् -- साधन करनेसे साधकमें सत्त्वगुण आता है। सत्त्वगुणके आनेपर इन्द्रियों और अन्तःकरणमें स्वच्छता? निर्मलता? ज्ञानकी दीप्ति? शान्ति? निर्विकारता आदि सद्भावसद्गुण प्रकट हो जाते हैं (टिप्पणी प0 919)। इन सद्गुणोंका प्रकट होना ही सात्त्विक सुखका परिणाममें अमृतकी तरह होना है। इसका उपभोग न करनेसे अर्थात् इसमें रस न लेनेसे वास्तविक अक्षय सुखकी प्राप्ति हो जाती है (गीता 5। 21)।परिणाममें सात्त्विक सुख राजस और तामस सुखसे ऊँचा उठाकर जडतासे सम्बन्धविच्छेद करा देता है और इसमें आसक्ति न होनेसे अन्तमें परमात्माकी प्राप्ति करा देता है। इसलिये यह परिणाममें अमृतकी तरह है।तत्सुखं सात्त्विकं प्रोक्तम् -- सत्सङ्ग? स्वाध्याय? संकीर्तन? जप? ध्यान? चिन्तन आदिसे जो सुख होता है? वह मान? बड़ाई? आराम? रुपये? भोग आदि विषयेन्द्रियसम्बन्धका नहीं है और प्रमाद? आलस्य? निद्राका भी नहीं है। वह तो परमात्माके सम्बन्धका है। इसलिये वह सुख सात्त्विक कहा गया है। सम्बन्ध -- अब राजस सुखका वर्णन करते हैं।
।।18.37।।हे भरतवंशियोंमें श्रेष्ठ अर्जुन ! अब तीन प्रकारके सुखको भी तुम मेरेसे सुनो। जिसमें अभ्याससे रमण होता है और जिससे दुःखोंका अन्त हो जाता है, ऐसा वह परमात्मविषयक बुद्धिकी प्रसन्नतासे पैदा होनेवाला जो सुख (सांसारिक आसक्तिके कारण) आरम्भमें विषकी तरह और परिणाममें अमृतकी तरह होता है, वह सुख सात्त्विक कहा गया है।
विषयेन्द्रियसंयोगाद्यत्तदग्रेऽमृतोपमम्। परिणामे विषमिव तत्सुखं राजसं स्मृतम् ॥
।।18.38।। व्याख्या -- विषयेन्द्रियसंयोगात् -- विषयों और इन्द्रियोंके संयोगसे होनेवाला जो सुख है? उसमें अभ्यास नहीं करना पड़ता। कारण कि यह प्राणी किसी भी योनिमें जाता है? वहाँ उसको विषयों और इन्द्रियोंके संयोगसे होनेवाला सुख मिलता ही है। शब्द? स्पर्श आदि पाँचों विषयोंका सुख पशुपक्षी? कीटपतङ्ग आदि सभी प्राणियोंको मिलता है। अतः उस सुखमें प्राणिमात्रका स्वाभाविक अभ्यास रहता है। मनुष्यजीवनमें भी बचपनसे देखा जाय तो अनुकूलतामें राजी होना और प्रतिकूलतामें नाराज होना स्वाभाविक ही होता आया है। इसलिये इस राजस सुखमें अभ्यासकी जरूरत नहीं है।यत्तदग्रेऽमृतोपमम् -- राजस सुखको आरम्भमें अमृतकी तरह कहनेका भाव यह है कि सांसारिक विषयोंकी प्राप्तिकी सम्भावनाके समय मनमें जितना सुख होता है? उतना सुख? मस्ती और राजीपन विषयोंके मिलनेपर नहीं रहता। मिलनेपर भी आरम्भमें (संयोग होते ही) जैसा सुख होता है? थोड़े समयेके बाद वैसा सुख नहीं रहता और उस विषयको भोगतेभोगते जब भोगनेकी शक्ति क्षीण हो जाती है? उस समय सुख नहीं होता? प्रत्युत विषयभोगसे अरुचि हो जाती है। भोग भोगनेकी शक्ति क्षीण होनेके बाद भी अगर विषयोंको भोगा जाय तो दुःख? जलन पैदा हो जाती है? चित्तमें सुख नहीं रहता? इसलिये यह राजस सुख आरम्भमें अमृतकी तरह दीखता है।अमृतकी तरह कहनेका दूसरा भाव यह है कि जब मन विषयोंमें खींचता है? तब मनको वे विषय बड़े प्यारे लगते हैं। विषयों और भोगोंकी बातें सुननेमें जितना रस आता है? उतना भोगोंमें नहीं आता। इसलिये गीतामें आया है -- यामिमां पुष्पितां वाचं प्रवदन्त्यविपश्चितः (2। 42) राजस पुरुष स्वर्गके भोगोंका सुख सुनते हैं तो उनको वह सुख बड़ा प्रिय लगता है और वे उसके लिये ललचा उठते हैं। तात्पर्य है कि वे स्वर्गके सुख दूरसे सुनकर ही बड़े प्रिय लगते हैं परन्तु स्वर्गमें जाकर सुख भोगनेसे उनको उतना सुख नहीं मिलता और वह उतना प्रिय भी नहीं लगता परिणामे विषमिव -- आरम्भमें विषय बड़े सुन्दर लगते हैं? उनमें बड़ा सुख मालूम देता है परन्तु उनको भोगतेभोगते जब परिणाममें वह सुख नीरसतामें परिणत हो जाता है? उस सुखमें बिलकुल अरुचि हो जाती है? तब वही सुख जहरकी तरह मालूम देता है।संसारमें जितने प्राणी कैदमें पड़े हैं? जितने चौरासी लाख योनियों और नरकोंमें पड़े हैं? उसका कारण देखा जाय तो उन्होंने विषयोंका भोग किया है? उनसे सुख लिया है? इसीसे वे कैद? नरक आदिमें दुःख पा रहे हैं क्योंकि राजस सुखका परिणाम दुःख होता ही है -- रजसस्तु फलं दुःखम् (गीता 14। 16)।आज भी जो लोग घबरा रहे हैं? दुःखी हो रहे हैं? वे सब पदार्थोंके रागके कारण ही दुःख पा रहे हैं। जो धनी होकर फिर निर्धन हो गया है? वह जितना दुःखी और संतप्त है? उतना दुःख और सन्ताप स्वाभाविक निर्धनको नहीं है क्योंकि उसके भीतर सुखके संस्कार अधिक नहीं पड़े हैं। परन्तु धनीने राजस सुख अधिक भोगा है? उसके भीतर सुखके संस्कार अधिक पड़े हैं? इसलिये उसको धनके अभावका दुःख ज्यादा है। जैसे? जो मनुष्य तरहतरहकी सामग्री भोजन करनेवाला है? उसके भोजनमें कभी थोड़ीसी भी कमी रह जाय तो उसको वह कमी बड़ी खटकती है कि आज भोजनमें चटनी नहीं है? खटाई नहीं है? मिठाई नहीं है? अमुकअमुक चीज नहीं है -- इस प्रकार नहींनहींका ही ताँता लगा रहता है। परन्तु साधारण आदमी बाजरेकी रूखीसूखी रोटी खाकर भी मौजसे रहता है? उसको भोजनमें किसी चीजकी कमी खटकती ही नहीं। तात्पर्य यह हुआ कि पदार्थोंके संयोगसे जितना ज्यादा सुख लिया है? उतना ही उसके अभावका अनुभव होता है। अभावके अनुभवमें दुःख ही होता है। जिस पदार्थकी कामना होती है? उसकी प्राप्तिके लिये मनुष्य उद्योग करते हैं। उद्योग करनेपर भी वस्तु मिलेगी या नहीं मिलेगी? इसमें संदेह रहता है। वस्तु न मिले तो उसके अभावका दुःख होता है? और वस्तु मिल जाय तो उस वस्तुको और भी अधिक प्राप्त करनेकी इच्छा हो जाती है। इस प्रकार इच्छापूर्ति नयी इच्छाका कारण बन जाती है और इच्छापूर्ति तथा फिर इच्छाकी उत्पत्ति -- यह चक्कर चलता ही रहता है? इसका कभी अन्त नहीं आता। तात्पर्य यह है कि इच्छा कभी मिटती नहीं और इच्छाके रहते हुए अभाव खटकता रहता है। यह अभाव ही विषकी तरह है अर्थात् दुःखदायी है।जब राजस सुख परिणाममें विषकी तरह है? तो फिर राजस सुख लेनेवाले जितने लोग हैं? उन सबको सुखभोगके अन्तमें मर जाना चाहिये परन्तु राजस सुख विषकी तरह मारता नहीं? प्रत्युत विषकी तरह अरुचिकारक हो जाता है। उसमें पहले जैसी रुचि होती है? वैसी रुचि अन्तमें नहीं रहती अर्थात् वह सुख विषकी तरह हो जाता है? साक्षात् विष नहीं होता।राजस सुख विषकी तरह क्यों होता है कारण कि विष तो एक जन्ममें ही मारता है? पर राजस सुख कई जन्मोंतक मारता है। राजस सुख लेनेवाला रागी पुरुष शुभ कर्म करके यदि स्वर्गमें भी चला जाता है? तो वहाँ भी उसको सुख? शान्ति नहीं मिलती। स्वर्गमें भी अपनेसे ऊँची श्रेणीवालोंको देखकर ईर्ष्या होती है कि ये हमारेसे ऊँचे क्यों हो गये समान पदवालोंको देखकर दुःख होता है कि ये हमारे समान पदपर आकर क्यों बैठ गये और नीची श्रेणीवालोंको देखकर अभिमान आता है कि हम इनसे ऊँचे हैं इस प्रकार उसके मनमें ईर्ष्या? दुःख और अभिमान होते ही रहते हैं? फिर उसके मनमें सुख कहाँ और शान्ति कहाँ इतना ही नहीं? पुण्योंके क्षीण हो जानेपर उसको पुनः मृत्युलोकमें आना पड़ता है -- क्षीणे पुण्ये मर्त्यलोकं विशन्ति (गीता 9। 21)। यहाँ आकर फिर शुभ कर्म करता है और फिर स्वर्गमें जाता है। इस प्रकार जन्ममरणके चक्करमें चढ़ा ही रहता है -- गतागतं कामकामा लभन्ते (9। 21)। यदि वह रागके कारण पापकर्मोंमें लग जाता है तो परिणाममें चौरासी लाख योनियों और नरकोंमें पड़ता हुआ न जाने कितने जन्मोंतक जन्मतामरता रहता है? जिसका कोई अन्त नहीं आता। इसलिये इस सुखको विषकी तरह कहा गया है।तत्सुखं राजसं स्मृतम् -- सात्त्विक सुखके लिये तो (सैंतीसवें श्लोकमें) प्रोक्तम् पद कहा है? पर राजस सुखके लिये यहाँ स्मृतम् पद कहनेका तात्पर्य है कि पहले भी मनुष्यने राजस सुखका फल दुःख पाया है परन्तु रागके कारण वह संयोगकी तरफ पुनः ललचा उठता है। कारण कि संयोगका प्रभाव उसपर पड़ा हुआ है और परिणामके प्रभावको वह स्वीकार नहीं करता। अगर वह परिणामके प्रभावको स्वीकार कर ले? तो फिर वह राजस सुखमें फँसेगा नहीं। स्मृति? शास्त्र? पुराण आदिमें ऐसे बहुतसे इतिहास आते हैं? जिनमें मनुष्योंके द्वारा राजस सुखके कारण बहुत दुःख पानेकी बात आयी है। इसी बातको स्मरण करानेके लिये यहाँ स्मृतम् पद आया है।जिसकी वृत्ति जितनी सात्त्विक होती है? वह उतना ही हरेक विषयके परिणामकी तरफ देखता है। अभीके तात्कालिक सुखकी तरफ वह ध्यान नहीं देता। परंतु राजसी वृत्तिवाला परिणामकी तरफ देखता ही नहीं? उसकी वृत्ति तात्कालिक सुखकी तरफ ही जाती है। इसलिये वह संसारमें फँसा रहता है। राजस पुरुषको संसारका सम्बन्ध वर्तमानमें तो अच्छा मालूम देता है परन्तु परिणाममें यह हानिकारक है -- ये हि संस्पर्शजा भोगा दुःखयोनय एव ते (गीता 5। 22)। इसलिये साधकको संसारसे विरक्त हो जाना चाहिये राजस सुखमें नहीं फँसना चाहिये।, सम्बन्ध -- अब तामस सुखका वर्णन करते हैं।
।।18.38।।जो सुख इन्द्रियों और विषयोंके संयोगसे आरम्भमें अमृतकी तरह और परिणाममें विषकी तरह होता है, वह सुख राजस कहा गया है।
यदग्रे चानुबन्धे च सुखं मोहनमात्मनः। निद्रालस्यप्रमादोत्थं तत्तामसमुदाहृतम् ॥
।।18.39।। व्याख्या -- निद्रालस्यप्रमादोत्थम् -- जब राग अत्यधिक बढ़ जाता है? तब वह तमोगुणका रूप धारण कर लेता है। इसीको मोह कहते हैं। इस मोह(मूढता)के कारण मनुष्यको अधिक सोना अच्छा लगता है। अधिक सोनेवाले मनुष्यको गाढ़ नींद नहीं आती। गाढ़ नींद न आनेसे तन्द्रा ज्यादा आती है और स्वप्न भी ज्यादा आते हैं। तन्द्रा और स्वप्नमें तामस मनुष्यका बहुत समय बरबाद हो जाता है। परन्तु तामस मनुष्यको इसीसे ही सुख मिलता है? इसलिये इस सुखको निद्रासे उत्पन्न बताया है।जब तमोगुण अधिक बढ़ जाता है? तब मनुष्यकी वृत्तियाँ भारी हो जाती हैं। फिर वह आलस्यमें समय बरबाद कर देता है। आवश्यक काम सामने आनेपर वह कह देता है कि फिर कर लेंगे? अभी तो आराम कर रहे हैं। इस प्रकार आलस्यअवस्थामें उसको सुख मालूम देता है। परन्तु निकम्मा रहनेके कारण उसकी इन्द्रियों और अन्तःकरणमें शिथिलता आ जाती है? मनमें संसारका फालतू चिन्तन होता रहता है और मनमें अशान्ति? शोक? विषाद? चिन्ता? दुःख होते रहते हैं।जब इससे भी अधिक तमोगुण बढ़ जाता है? तब मनुष्य प्रमाद करने लग जाता है। वह प्रमाद दो तरहका होता है -- अक्रिय प्रमाद और सक्रिय प्रमाद। घर? परिवार? शरीर आदिके आवश्यक कामोंको न करना और निठल्ले बैठे रहना अक्रिय प्रमाद (टिप्पणी प0 922) है। व्यर्थ क्रियाएँ (देखना? सुनना? सोचना आदि) करना बीड़ी? सिगरेट? शराब? भाँग? तम्बाकू? खेलतमाशा आदि दुर्व्यसनोंमें लगना और चोरी? डकैती? झूठ? कपट? बेईमानी? व्यभिचार? अभक्ष्यभक्षण आदि दुराचारोंमें लगना सक्रिय प्रमाद है।प्रमादके कारण तामस पुरुषोंको निरर्थक समय बरबाद करनेमें तथा झूठ? कपट? बेईमानी आदि करनेमें सुख मिलता है। जैसे कामधंधा करनेवाले पैसे (मजदूरी या वेतन) तो पूरे ले लेते हैं? पर काम पूरा और ठीक ढंगसे नहीं करते। चिकित्सकलोग रोगियोंका ठीक ढंगसे इलाज नहीं करते? जिससे रोगीलोग बारबार आते रहें और पैसे देते रहें। दूध बेचनेवाले पैंसोंके लोभमें दूधमें पानी मिलाकर बेचते हैं। पैसे अधिक देनेपर भी वे पानी मिलाना नहीं छोड़ते। ऐसे पापरूप प्रमादसे उनको घोर नरकोंकी प्राप्ति होती है।जब तमोगुणी प्रमादवृत्ति आती है? तब वह सत्त्वगुणके विवेकज्ञानको ढक देती है और जब तमोगुणी निद्राआलस्यवृत्ति आती है? तब वह सत्त्वगुणके प्रकाशको ढक देती है। विवेकज्ञानके ढकनेपर प्रमाद होता है तथा प्रकाशके ढकनेपर आलस्य और निद्रा आती है। तामस पुरुषको निद्रा? आलस्य और प्रमाद -- तीनोंसे सुख मिलता है? इसलिये तामस सुखको इन तीनोंसे उत्पन्न बताया गया है।विशेष बातनिद्रा दो प्रकारकी होती है -- युक्तनिद्रा और अतिनिद्रा।,(1) युक्तनिद्रा -- निद्रामें एक विश्राम मिलता है। विश्रामसे शरीर? मन? बुद्धि? अन्तःकरणमें नीरोगता? स्फूर्ति? स्वच्छता? निर्मलता और ताजगी आती है। ताजगी आनेसे साधनभजन करनेमें और सांसारिक काम करनेमें भी शक्ति मिलती है और उत्साह रहता है। इसलिये युक्तनिद्रा दोषी नहीं है? प्रत्युत सबके लिये आवश्यक है। भगवान्ने भी युक्तनिद्राको आवश्यक बताया है -- युक्तस्वप्नावबोधस्य योगो भवति दुःखहा (गीता 6। 17)।ताजगीमात्रके लिये निद्रा साधकके लिये आवश्यक है। जिस साधकके रागपूर्वक सांसारिक संकल्प नहीं होते? उसको नींद बहुत जल्दी आ जाती है और जो ज्यादा संकल्पशील है? उसको नींद जल्दी नहीं आती। इससे यह सिद्ध हुआ कि संसारका जो सम्बन्ध है? वह निद्राका सुख भी नहीं लेने देता। निद्रा आवश्यक क्यों है कारण कि निद्रामें जो स्थिर तत्त्व है? वह साधकको साधनमें प्रवृत्त करनेमें और सांसारिक कार्य करनेमें बल देता है? इसलिये निद्रा आवश्यक है।यद्यपि नींद तामसी है? तथापि नींदका जो बेहोशीपना है? वह त्याज्य है और जो विश्रामपना है? वह ग्राह्य है। परन्तु हरेक आदमी बेहोशीके बिना विश्रामपना ग्रहण नहीं कर सकता अतः उनके लिये नींदका बेहोशीभाग भी ग्राह्य है। हाँ? जो साधना करके ऊँचे उठ गये हैं? उनको नींदके बेहोशीभागके बिना भी जाग्रत्सुषुप्तिमें विश्राम मिल जाता है। कारण कि जाग्रत्अवस्थामें संसारके चिन्तनका सर्वथा त्याग होकर परमात्मतत्त्वमें स्थिति हो जाती है तो महान् विश्राम? सुख मिलता है इस स्थितिसे भी असङ्ग होनेपर वास्तविक तत्त्वकी प्राप्ति हो जाती है।जो साधक हैं? उनको विश्रामके लिये नहीं सोना चाहिये। उनका तो यही भाव होना चाहिये कि पहले कामधंधा करते हुए भगवान्का भजन करते थे? अब लेटेलेटे भजन करना है।(2) अतिनिद्रा -- समयपर सोना और समयपर जागना युक्तनिद्रा है और अधिक सोना अतिनिद्रा है। अतिनिद्राके आदि और अन्तमें शरीरमें आलस्य भरा रहता है। शरीरमें भारीपन रहता है। अधिक नींद लेनेका स्वभाव होनेसे हरेक कार्यमें नींद आती रहती है।चौदहवें अध्यायके आठवें श्लोकमें भगवान्ने पहले प्रमादको? दूसरे नम्बरमें आलस्यको और तीसरे नम्बरमें निद्राको रखा है -- प्रमादालस्यनिद्राभिस्तन्निबध्नाति भारत। परन्तु यहाँ पहले निद्राको? दूसरे नम्बरमें आलस्यको और तीसरे नम्बरमें प्रमादको रखा है -- निद्रालस्यप्रमादोत्थम्। इस व्यतिक्रमका कारण यह है कि वहाँ इन तीनोंके द्वारा मनुष्यको बाँधनेका प्रसङ्ग है और यहाँ मनुष्यका पतन करनेका प्रसङ्ग है। बाँधनेके विषयमें प्रमाद सबसे अधिक बन्धनकारक है अतः इसको सबसे पहले रखा है। कारण कि प्रमाद निषिद्ध आचरणोंमें प्रवृत्त करता है? जिससे अधोगति होती है। आलस्य केवल अच्छी प्रवृत्तिको रोकनेवाला होनेसे इसको दो नम्बरमें रखा है। निद्रा आवश्यक होनेसे बन्धनकारक नहीं है? प्रत्युत अतिनिद्रा ही बन्धनकारक है अतः इसको तीसरे नम्बरमें रखा है। यहाँ उससे उलटा क्रम रखनेका अभिप्राय है कि सबके लिये आवश्यक होनेसे निद्रा इतना पतन करनेवाली नहीं है। निद्रासे अधिक आलस्य पतन करता है और आलस्यसे भी अधिक प्रमाद पतन करता है। कारण कि मनुष्य ज्यादा नींद लेगा तो वृक्ष आदि मूढ़ योनियोंकी प्राप्ति होगी परन्तु आलस्य और प्रमाद करेगा तो कर्तव्यच्युत होकर दुराचार करनेसे नरकमें जाना पड़ेगा (टिप्पणी प0 923.1)।यदग्रे चानुबन्धे च सुखं मोहनमात्मनः -- निद्रा? आलस्य और प्रमादसे उत्पन्न हुआ सुख आरम्भमें और परिणाममें अपनेको मोहित करनेवाला है। इस सुखमें न तो आरम्भमें विवेक रहता है और न परिणाममें विवेक रहता है अर्थात् यह सुख विवेकको जाग्रत् नहीं होने देता। पशुपक्षी? कीटपतंग आदिमें भी विवेकशक्ति जाग्रत् न रहनेसे वे क्रियाके आरम्भ और परिणामको सोच नहीं पाते। ऐसे ही जिस सुखके कारण मनुष्य यह सोच ही नहीं सकता कि इस निद्रा आदिसे उत्पन्न हुए सुखका परिणाम हमारे लिये क्या होगा उससे क्या लाभ होगा क्या हानि होगी क्या हित होगा क्या अहित होगा उस सुखको तामस कहा गया है -- ,तत्तामसमुदाहृतम्।विशेष बात(1) प्रकृति और पुरुष -- दोनों अनादि हैं? और ये दो हैं इस प्रकार इनकी पृथक्ताका विवेक भी अनादि है। यह विवेक पुरुषमें ही रहता है? प्रकृतिमें नहीं। जब यह पुरुष इस विवेकका अनादर करके अविवेकके कारण प्रकृतिके साथ सम्बन्ध जोड़ लेता है? तब इस सम्बन्धके कारण पुरुषमें राग पैदा हो जाता है (टिप्पणी प0 923.2)।जब राग बहुत सूक्ष्म रहता है? तब विवेक प्रबल रहता है। जब राग बढ़ जाता है? तब विवेक दब जाता है? मिटता नहीं। पर विवेक ठीक तरहसे जाग्रत् हो जाय तो फिर राग टिकता नहीं अर्थात् रागका अभाव हो जाता है और उस समय पुरुष मुक्त कहलाता है।उस रागके कारण मनुष्यकी प्रकृतिजन्य सुखमें आसक्ति हो जाती है। उस आसक्तिके रहते हुए जब मनुष्य किसी कारणवश सात्त्विक सुखको प्राप्त करना चाहता है? तब राजस और तामस सुखका त्याग करनेमें उसे कठिनता मालूम देती है -- यत्तदग्रे विषमिव। परन्तु जब राग मिट जाता है? तब वह सुख अमृतकी तरह हो जाता है -- परिणामेऽमृतोऽपमम्।रागके कारण ही रजोगुणी सुख आरम्भमें अमृतकी तरह दीखता है। पर वह सुख परिणाममें प्राणीके लिये जहरकी तरह अनिष्टकारक अर्थात् महान् दुःखरूप हो जाता है। प्रकृतिजन्य सुखकी आसक्ति होनेपर दुःखी परम्पराका कोई अन्त नहीं आता।जब वही राग तमोगुणका रूप धारण कर लेता है? तब मनुष्यकी वृत्तियाँ भारी हो जाती हैं। फिर मनुष्य नींद और आलस्यमें समय बरबाद कर देता है तथा आवश्यक कर्तव्यसे विमुख होकर अकर्तव्यमें लग जाता है। परन्तु तामस पुरुषको इन्हींमें सुख मालूम देता है। इसलिये यह तामस सुख आदि और अन्तमें मोहित करनेवाला है।(2) जो प्रतिक्षण अभावमें जा रहा है? वह वास्तवमें नहीं है। पर जो नहीं को प्रकाशित करनेवाला तथा उसका आधार है? वह वास्तवमें है तत्त्व है। उसी तत्त्वको सच्चिदानन्द कहते हैं। निरन्तर सत्तारूपसे रहनेके कारण उसे सत् कहते हैं? ज्ञानस्वरूप होनेके कारण उसे चित् कहते हैं और आनन्दस्वरूप होनेके कारण उसे आनन्द कहते हैं। उस सच्चिदानन्द परमात्माका ही अंश होनेसे यह प्राणी भी सच्चिदानन्दस्वरूप है। परन्तु जब प्राणी असत् वस्तुकी इच्छा करता है कि अमुक वस्तु मुझे मिले? तब उस इच्छासे स्वतःस्वाभाविक आनन्द -- सुख ढक जाता है। जब असत् वस्तुकी इच्छा मिट जाती है? तब उस इच्छाके मिटते ही वह स्वतःस्वाभाविक सुख प्रकट हो जाता है।नित्यनिरन्तर रहनेवाला जो सुखरूप तत्त्व है? उसमें जब सात्त्विकी बुद्धि तल्लीन हो जाती है? तब बुद्धिमें स्वच्छता? निर्मलता आ जाती है। उस स्वच्छ और निर्मल बुद्धिसे अनुभवमें आनेवाला यह स्वाभाविक सुख ही सात्त्विक कहलाता है। बुद्धिसे भी जब सम्बन्ध छूट जाता है? तब वास्तविक सुख रह जाता है। सात्त्विकी बुद्धिके सम्बन्धसे ही उस सुखकी सात्त्विक संज्ञा होती है। बुद्धिसे सम्बन्ध छूटते ही उसकी सात्त्विक संज्ञा नहीं रहती।मनमें जब किसी वस्तुको प्राप्त करनेकी इच्छा होती है? तब वह वस्तु मनमें बस जाती है अर्थात् मन और बुद्धिका उसके साथ सम्बन्ध हो जाता है। जब वह मनोवाञ्छित वस्तु मिल जाती है? तब वह वस्तु मनसे,निकल जाती है अर्थात् वस्तुका मनमें जो खिंचाव था? वह निकल जाता है। उसके निकलते ही अर्थात् वस्तुसे सम्बन्धविच्छेद होते ही वस्तुके अभावका जो दुःख था? वह निवृत्त हो जाता है और नित्य रहनेवाले स्वतःसिद्ध सुखका तात्कालिक अनुभव हो जाता है। वास्तवमें यह सुख वस्तुके मिलनेसे नहीं हुआ है? प्रत्युत रागके तात्कालिक मिटनेसे हुआ है? पर राजस पुरुष भूलसे उस सुखको वस्तुके मिलनेसे होनेवाला मान लेता है। वास्तवमें देखा जाय तो वस्तुका संयोग बाहरसे होता है और प्रसन्नता भीतरसे होती है। भीतरसे जो प्रसन्नता होती है? वह बाहरके संयोगसे पैदा नहीं होती? प्रत्युत भीतर (मनमें) बसी हुई वस्तुके साथ जो सम्बन्ध था? उस वस्तुसे सम्बन्धविच्छेद होनेपर पैदा होती है। तात्पर्य यह है कि वस्तुके मिलते ही अर्थात् बाहरसे वस्तुका संयोग होते ही भीतरसे उस वस्तुसे सम्बन्धविच्छेद हो जाता है और सम्बन्धविच्छेद होते ही नित्य रहनेवाले स्वाभाविक सुखका आभास हो जाता है।जब नींदमें बुद्धि तमोगुणमें लीन हो जाती है? तब बुद्धिकी स्थिरताको लेकर वह सुख प्रकट हो जाता है। कारण कि तमोगुणके प्रभावसे नींदमें जाग्रत् और स्वप्नके पदार्थोंकी विस्मृति हो जाती है। पदार्थोंकी स्मृति दुःखोंका कारण है। पदार्थोंकी विस्मृति होनेसे निद्रावस्थामें पदार्थोंका वियोग हो जाता है तो उस वियोगके कारण स्वाभाविक सुखका आभास होता है? इसीको निद्राका सुख कहते हैं। परन्तु बुद्धिकी मलिनतासे वह स्वाभाविक सुख जैसा है? वैसा अनुभवमें नहीं आता। तात्पर्य है कि बुद्धिके तमोगुणी होनेसे बुद्धिमें स्वच्छता नहीं रहती और स्वच्छता न रहनेसे वह सुख स्पष्ट अनुभवमें नहीं आता। इसलिये निद्राके सुखको तामस कहा गया है (टिप्पणी प0 924)।इन सबका तात्पर्य यह है कि सात्त्विक मनुष्यको संसारसे विमुख होकर तत्त्वमें बुद्धिके तल्लीन होनेसे सुख होता है राजस मनुष्यको रागके कारण अन्तःकरणमें बसी हुई वस्तुके बाहर निकलनेसे सुख होता है और तामस मनुष्यको वस्तुओंके लिये किये जानेवाले कर्तव्यकर्मोंकी विस्मृतिसे और निरर्थक क्रियाओंमें लगनेसे सुख होता है। इससे यह सिद्ध हुआ कि जो नित्यनिरन्तर रहनेवाला सुखरूप तत्त्व है? वह असत्के सम्बन्धसे आच्छादित रहता है। विवेकपूर्वक असत्से सम्बन्धविच्छेद हो जानेपर? रागवाली वस्तुओंके मनसे निकल जानेपर और बुद्धिके तमोगुणमें लीन हो जानेपर जो सुख होता है? वह उसी सुखका आभास है। तात्पर्य यह हुआ कि संसारसे विवेकपूर्वक विमुख होनेपर सात्त्विक सुख? भीतरसे वस्तुओंके निकलनेपर राजस सुख और मूढ़तासे निद्राआलस्यमें संसारको भूलनेपर तामस सुख होता है परन्तु वास्तविक सुख तो प्रकृतिजन्य पदार्थोंसे सर्वथा सम्बन्धविच्छेदसे ही होता है। इन सुखोंमें जो प्रियता? आकर्षण और (सुखका) भोग है? वही पारमार्थिक उन्नतिमें बाधा देनेवाला और पतन करनेवाला है। इसलिये पारमार्थिक उन्नति चाहनेवाले साधकोंको इन तीनों सुखोंसे सम्बन्धविच्छेद करना अत्यन्त आवश्यक है। सम्बन्ध -- बीसवेंसे उन्तालीसवें श्लोकतक भगवान्ने गुणोंकी मुख्यताको लेकर ज्ञान? कर्म आदिके तीनतीन भेद बताये। अब इनके सिवाय गुणोंको लेकर सृष्टिकी सम्पूर्ण वस्तुओंके भी तीनतीन भेद होते हैं -- इसका लक्ष्य कराते हुए भगवान् आगेके श्लोकमें प्रकरणका उपसंहार करते हैं।
।।18.39।।निद्रा, आलस्य और प्रमादसे उत्पन्न होनेवाला जो सुख आरम्भमें और परिणाममें अपनेको मोहित करनेवाला है, वह सुख तामस कहा गया है।
न तदस्ति पृथिव्यां वा दिवि देवेषु वा पुनः। सत्त्वं प्रकृतिजैर्मुक्तं यदेभिः स्यात्त्रिभिर्गुणैः ॥
।।18.40।। व्याख्या -- [इस अध्यायके आरम्भमें अर्जुनने संन्यास और त्यागका तत्त्व जानना चाहा तो भगवान्ने पहले त्याग -- कर्मयोगका वर्णन किया। उस प्रकरणका उपसंहार करते हुए भगवान्ने कहा कि जो त्यागी नहीं हैं? उनको अनिष्ट? इष्ट और मिश्र -- यह तीन प्रकारका कर्मोंका फल मिलता है और जो संन्यासी हैं? उनको कभी नहीं मिलता। ऐसा कहकर तेरहवें श्लोकसे संन्यास -- सांख्ययोगका प्रकरण आरम्भ करके पहले कर्मोंके होनेमें अधिष्ठानादि पाँच हेतु बताये। सोलहवेंसत्रहवें श्लोकोंमें कर्तृत्व माननेवालोंकी निन्दा और कर्तृत्वका त्याग करनेवालोंकी प्रशंसा की। अठारहवें श्लोकमें कर्मप्रेरणा और कर्मसंग्रहका वर्णन किया। परन्तु जो वास्तविक तत्त्व है? वह न कर्मप्रेरक है और न कर्मसंग्राहक। कर्मप्रेरणा और कर्मसंग्रह तो प्रकृतिके गुणोंके साथ सम्बन्ध रखनेसे ही होते हैं। फिर गुणोंके अनुसार ज्ञान? कर्म? कर्ता? बुद्धि? धृति और सुखके तीनतीन भेदोंका वर्णन किया। सुखका वर्णन करते हुए यह बताया कि प्रकृतिके साथ यत्किञ्चित् सम्बन्ध रखते हुए ऊँचासेऊँचा जो सुख होता है? वह सात्त्विक होता है। परंतु जो स्वरूपका वास्तविक सुख है? वह गुणातीत है? विलक्षण है? अलौकिक है (गीता 6। 21)।सात्त्विक सुखको आत्मबुद्धिप्रसादजम् कहकर भगवान्ने उसको जन्य (उत्पन्न होनेवाला) बताया। जन्य वस्तु नित्य नहीं होती। इसलिये उसको जन्य बतानेका तात्पर्य है कि उस जन्य सुखसे भी ऊपर उठना है अर्थात् प्रकृति और प्रकृतिके तीनों गुणोंसे रहित होकर उस परमात्मतत्त्वको प्राप्त करना है? जो कि सबका अपना स्वाभाविक स्वरूप है। इसलिये कहते हैं -- ]न तदस्ति पृथिव्यां वा दिवि देवेषु वा पुनः -- यहाँ पृथिव्याम् पदसे मृत्युलोक और पृथ्वीके नीचेके अतल? वितल आदि सभी लोकोंका? दिवि पदसे स्वर्ग आदि लोकोंका? देवेषु पदको प्राणिमात्रके उपलक्षणके रूपमें उनउन स्थानोंमें रहनेवाले मनुष्य? देवता? असुर? राक्षस? नाग? पशु? पक्षी? कीट? पतंग? वृक्ष आदि सभी चरअचर प्राणियोंका? और वा पुनः पदोंसे अनन्त ब्रह्माण्डोंका संकेत किया गया है। तात्पर्य यह हुआ कि त्रिलोकी और अनन्त ब्रह्माण्ड तथा उनमें रहनेवाली कोई भी वस्तु ऐसी नहीं है? जो प्रकृतिसे उत्पन्न इन तीनों गुणोंसे रहित हो अर्थात् सबकेसब त्रिगुणात्मक हैं -- सत्त्वं प्रकृतिजैर्मुक्तं यदेभिः स्यात्ित्रभिर्गुणैः।प्रकृति और प्रकृतिका कार्य -- यह सबकासब ही त्रिगुणात्मक और परिवर्तनशील है। इनसे सम्बन्ध जोड़नेसे ही बन्धन होता है और इनसे सम्बन्धविच्छेद करनेसे ही मुक्ति होती है क्योंकि स्वरूप असङ्ग है। स्वरूप स्व है और प्रकृति पर है। प्रकृतिसे सम्बन्ध जुड़ते ही अहंकार पैदा हो जाता है? जो कि पराधीनताको पैदा करनेवाला है। यह एक विचित्र बात है कि अहंकारमें स्वाधीनता मालूम देती है? पर है वास्तवमें पराधीनता कारण कि अहंकारसे प्रकृतिजन्य पदार्थोंमें आसक्ति? कामना आदि पैदा हो जाती है? जिससे पराधीनतामें भी स्वाधीनता दीखने लग जाती है। इसलिये प्रकृतिजन्य गुणोंसे रहित होना आवश्यक है।प्रकृतिजन्य गुणोंमें रजोगुण और तमोगुणका त्याग करके सत्त्वगुण बढ़ानेकी आवश्यकता है। सत्त्वगुणमें भी प्रसन्नता और विवेक तो आवश्यक है परन्तु सात्त्विक सुख और ज्ञानकी आसक्ति नहीं होनी चाहिये क्योंकि सुख और ज्ञानकी आसक्ति बाँधनेवाली है। इसलिये इनकी आसक्तिका त्याग करके सत्त्वगुणसे ऊँचा उठे। इससे ऊँचा उठनेके लिये ही यहाँ गुणोंका प्रकरण आया है।साधकको तो सात्त्विक ज्ञान? कर्म? कर्ता? बुद्धि? धृति और सुख -- इनपर ध्यान देकर इनके अनुरूप अपना जीवन बनाना चाहिये और सावधानीसे राजसतामसका त्याग करना चाहिये। इनका त्याग करनेमें सावधानी ही साधन है। सावधानीसे सब साधन स्वतः प्रकट होते हैं। प्रकृतिसे सम्बन्धविच्छेद करनेमें सात्त्विकता बहुत आवश्यक है। कारण कि इसमें प्रकाश अर्थात् विवेक जाग्रत् रहता है? जिससे प्रकृतिसे मुक्त होनेमें बड़ी सहायता मिलती है। वास्तवमें तो इससे भी असङ्ग होना है। सम्बन्ध -- त्यागके प्रकरणमें भगवान्ने यह बताया कि नियत कर्मोंका त्याग करना उचित नहीं है। उनका मूढ़तापूर्वक त्याग करनेसे वह त्याग तामस हो जाता है शारीरिक क्लेशके भयसे नियत कर्मोंका त्याग करनेसे वह त्याग राजस हो जाता है और फल एवं आसक्तिका त्याग करके नियत कर्मोंको करनेसे वह त्याग सात्त्विक हो जाता है (18। 7 -- 9)। सांख्ययोगकी दृष्टिसे सम्पूर्ण कर्मोंकी सिद्धिमें पाँच हेतु बताते हुए जहाँ सात्त्विक कर्मका वर्णन हुआ है? वहाँ नियत कर्मको कर्तृत्वाभिमानसे रहित? रागद्वेषसे रहित और फलेच्छासे रहित मनुष्यके द्वारा किये जानेका उल्लेख किया है (18। 23)। उन कर्मोंमें किस वर्णके लिये कौनसे कर्म नियत कर्म हैं और उन नियत कर्मोंको कैसे किया जाय -- इसको बतानेके लिये और साथ ही भक्तियोगकी बात बतानेके लिये भगवान् आगेका प्रकरण आरम्भ करते हैं।
।।18.40।।पृथ्वीमें या स्वर्गमें अथवा देवताओंमें तथा इनके सिवाय और कहीं भी वह ऐसी कोई वस्तु नहीं है, जो प्रकृतिसे उत्पन्न इन तीनों गुणोंसे रहित हो।
ब्राह्मणक्षत्रियविशां शूद्राणां च परन्तप। कर्माणि प्रविभक्तानि स्वभावप्रभवैर्गुणैः ॥
।।18.41।। व्याख्या -- ब्राह्मणक्षत्रियविशां शूद्राणां च परंतप -- यहाँ ब्राह्मण? क्षत्रिय और वैश्य -- इन तीनोंके लिये एक पद और शूद्रोंके लिये अलग एक पद देनेका तात्पर्य यह है कि ब्राह्मण? क्षत्रिय और वैश्य -- ये द्विजाति हैं और शूद्र द्विजाति नहीं है। इसलिये इनके कर्मोंका विभाग अलगअलग है और कर्मोंके अनुसार शास्त्रीय अधिकार भी अलगअलग है।कर्माणि प्रविभक्तानि स्वभावप्रभवैर्गुणैः -- मनुष्य जो कुछ भी कर्म करता है? उसके अन्तःकरणमें उस कर्मके संस्कार पड़ते हैं और उन संस्कारोंके अनुसार उसका स्वभाव बनता है। इस प्रकार पहलेके अनेक जन्मोंमें किये हुए कर्मोंके संस्कारोंके अनुसार मनुष्यका जैसा स्वभाव होता है? उसीके अनुसार उसमें सत्त्व? रज और तम -- तीनों गुणोंकी वृत्तियाँ उत्पन्न होती है। इन गुणवृत्तियोंके तारतम्यके अनुसार ही ब्राह्मण? क्षत्रिय? वैश्य और शूद्रके कर्मोंका विभाग किया गया है (गीता 4। 13)। कारण कि मनुष्यमें जैसी गुणवृत्तियाँ होती हैं? वैसा ही वह कर्म करता है।विशेष बात(1) कर्म दो तरहके होते हैं -- (1) जन्मारम्भक कर्म और (2) भोगदायक कर्म। जिन कर्मोंसे ऊँचनीच योनियोंमें जन्म होता है? वे जन्मारम्भक कर्म कहलाते हैं और जिन कर्मोंसे सुखदुःखका भोग होता है? वे भोगदायक कर्म कहलाते हैं। भोगदायक कर्म अनुकूलप्रतिकूल परिस्थितिको पैदा करते हैं? जिसको गीतामें अनिष्ट? इष्ट और मिश्र नामसे कहा गया है (18। 12)।गहरी दृष्टिसे देखा जाय तो मात्र कर्म भोगदायक होते हैं अर्थात् जन्मारम्भक कर्मोंसे भी भोग होता है और भोगदायक कर्मोंसे भी भोग होता है। जैसे? जिसका उत्तम कुलमें जन्म होता है? उसका आदर होता है? सत्कार होता है और जिसका नीच कुलमें जन्म होता है? उसका निरादर होता है? तिरस्कार होता है। ऐसे ही अनुकूल परिस्थितिवालेका आदर होता है और प्रतिकूल परिस्थितिवालेका निरादर होता है। तात्पर्य है कि आदर और निरादररूपसे भोग तो जन्मारम्भक और भोगदायक -- दोनों कर्मोंका होता है। परन्तु जन्मारम्भक कर्मोंसे जो जन्म होता है? उसमें आदरनिरादररूप भोग गौण होता है क्योंकि आदरनिरादर कभीकभी हुआ करते हैं? हरदम नहीं हुआ करते और भोगदायक कर्मोंसे जो अनुकूलप्रतिकूल परिस्थिति आती है? उसमें परिस्थितिका भोग मुख्य होता है क्योंकि परिस्थिति हरदम आती रहती है।भोगदायक कर्मोंका सदुपयोगदुरुपयोग करनेमें मनुष्यमात्र स्वतन्त्र है अर्थात् वह अनुकूलप्रतिकूल परिस्थितिसे सुखीदुःखी भी हो सकता है और उसको साधनसामग्री भी बना सकता है। जो अनुकूलप्रतिकूल परिस्थितिसे सुखीदुःखी होते हैं? वे मूर्ख होते हैं और जो उसको साधनसामग्री बनाते हैं? वे बुद्धिमान् साधक होते हैं। कारण कि मनुष्यजन्म परमात्माकी प्राप्तिके लिये ही मिला है अतः इसमें जो भी अनुकूल या प्रतिकूल परिस्थिति आती है? वह सब साधनसामग्री ही है।अनुकूलप्रतिकूल परिस्थितिको साधनसामग्री बनाना क्या है अनुकूल परिस्थिति आ जाय तो उसको दूसरोंकी सेवामें? दूसरोंके सुखआराममें लगा दे? और प्रतिकूल परिस्थिति आ जाय तो सुखकी इच्छाका त्याग कर दे। दूसरोंकी सेवा करना और सुखेच्छाका त्याग करना -- ये दोनों साधन हैं।(2) शास्त्रोंमें आता है कि पुण्योंकी अधिकता होनेसे जीव स्वर्गमें जाता है और पापोंकी अधिकता होनेसे नरकोंमें जाता है तथा पुण्यपाप समान होनेसे मनुष्य बनता है। इस दृष्टिसे किसी भी वर्ण? आश्रम? देश? वेश आदिका कोई भी मनुष्य सर्वथा पुण्यात्मा या पापात्मा नहीं हो सकता।पुण्यपाप समान होनेपर जो मनुष्य बनता है? उसमें भी अगर देखा जाय तो पुण्यपापोंका तारतम्य रहता है अर्थात् किसीके पुण्य अधिक होते हैं और किसीके पाप अधिक होते हैं (टिप्पणी प0 927)। ऐसे ही गुणोंका विभाग भी है। कुल मिलाकर सत्त्वगुणकी प्रधानतावाले ऊर्ध्वलोकमें जाते हैं? रजोगुणकी प्रधानतावाले मध्यलोक अर्थात् मनुष्यलोकमें आते हैं? और तमोगुणकी प्रधानतावाले अधोगतिमें जाते हैं। इन तीनोंमें भी गुणोंके तारतम्यसे अनेक तरहके भेद होते हैं।सत्त्वगुणकी प्रधानतासे ब्राह्मण? रजोगुणकी प्रधानता और सत्त्वगुणकी गौणतासे क्षत्रिय? रजोगुणकी प्रधानता और तमोगुणकी गौणतासे वैश्य तथा तमोगुणकी प्रधानतासे शूद्र होता है। यह तो सामान्य रीतिसे गुणोंकी बात बतायी। अब इनके अवान्तर तारतम्यका विचार करते हैं -- रजोगुणप्रधान मनुष्योंमें सत्त्वगुणकी प्रधानतावाले ब्राह्मण हुए। इन ब्राह्मणोंमें भी जन्मके भेदसे ऊँचनीच ब्राह्मण माने जाते हैं और परिस्थितिरूपसे कर्मोंका फल भी कई तरहका आता है अर्थात् सब ब्राह्मणोंकी एक समान अनुकूलप्रतिकूल परिस्थिति नहीं आती। इस दृष्टिसे ब्राह्मणयोनिमें भी तीनों गुण मानने पड़ेंगे। ऐसे ही क्षत्रिय? वैश्य और शूद्र भी जन्मसे ऊँचनीच माने जाते हैं और अनुकूलप्रतिकूल परिस्थिति भी कई तरहकी आती है। इसलिये गीतामें कहा गया है कि तीनों लोकोंमें ऐसी कोई भी वस्तु नहीं है? जो तीनों गुणोंसे रहित हो (18। 40)।अब जो मनुष्येतर योनिवाले पशुपक्षी आदि हैं? उनमें भी ऊँचनीच माने जाते हैं जैसे गाय आदि श्रेष्ठ माने जाते हैं और कुत्ता? गधा? सूअर आदि नीच माने जाते हैं। कबूतर आदि श्रेष्ठ माने जाते हैं और कौआ? चील आदि नीच माने जाते हैं। इन सबको अनुकूलप्रतिकूल परिस्थिति भी एक समान नहीं मिलती। तात्पर्य है कि ऊर्ध्वगति? मध्यगति और अधोगतिवालोंमें भी कई तरहके जातिभेद और परिस्थितिभेद होते हैं। सम्बन्ध -- अब भगवान् ब्राह्मणके स्वाभाविक कर्म बताते हैं।
।।18.41।।हे परंतप ! ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्रोंके कर्म स्वभावसे उत्पन्न हुए तीनों गुणोंके द्वारा विभक्त किये गये हैं।
शमो दमस्तपः शौचं क्षान्तिरार्जवमेव च। ज्ञानं विज्ञानमास्तिक्यं ब्रह्मकर्म स्वभावजम् ॥
।।18.42।। व्याख्या -- शमः -- मनको जहाँ लगाना चाहें? वहाँ लग जाय और जहाँसे हटाना चाहें? वहाँसे हट जाय -- इस प्रकार मनके निग्रहको शम कहते हैं।दमः -- जिस इन्द्रियसे जब जो काम करना चाहें? तब वह काम कर लें और जिस इन्द्रियको जब जहाँसे हटाना चाहें? तब वहाँसे हटा लें -- इसी प्रकार इन्द्रियोंको वशमें करना दम है।तपः -- गीतामें शरीर? वाणी और मनके तपका वर्णन आता है (17। 14 -- 16)? उस तपको लेते हुए भी यहाँ वास्तवमें तप का अर्थ है -- अपने धर्मका पालन करते हुए जो कष्ट हो अथवा कष्ट आ जाय? उसको प्रसन्नतापूर्वक सहना अर्थात् कष्टके आनेपर चित्तमें प्रसन्नताका होना।शौचम् -- अपने मन? बुद्धि? इन्द्रियाँ? शरीर आदिको पवित्र रखना तथा अपने खानपान? व्यवहार आदिकी पवित्रता रखना -- इस प्रकार शौचाचारसदाचारका ठीक पालन करनेका नाम शौच है।क्षान्तिः -- कोई कितना ही अपमान करे? निन्दा करे? दुःख दे और अपनेमें उसको दण्ड देनेकी योग्यता? बल? अधिकार भी हो? फिर भी उसको दण्ड न देकर उसके क्षमा माँगे बिना ही उसको प्रसन्नतापूर्वक क्षमा कर देनेका नाम क्षान्ति है।आर्जवम् -- शरीर? वाणी आदिके व्यवहारमें सरलता हो और मनमें छल? कपट? छिपाव आदि दुर्भाव न हों अर्थात् सीधासादापन हो? उसका नाम आर्जव है।ज्ञानम् -- वेद? शास्त्र? पुराण? इतिहास आदिका अच्छी तरह अध्ययन होना और उनके भावोंका ठीक तरहसे बोध होना तथा कर्तव्यअकर्तव्यका बोध होना ज्ञान है। विज्ञानम् -- यज्ञमें स्रुक्? स्रुवा आदि वस्तुओंका किस अवसरपर किस विधिसे प्रयोग करना चाहिये -- इसका अर्थात् यज्ञविधिका तथा अनुष्ठान आदिकी विधिका अनुभव कर लेने (अच्छी तरह करके देख लेने) का नाम विज्ञान है।आस्तिक्यम् -- परमात्मा? वेदादि शास्त्र? परलोक आदिका हृदयमें आदर हो? श्रद्धा हो और उनकी सत्यतामें कभी सन्देह न हो तथा उनके अनुसार अपना आचरण हो? इसका नाम आस्तिक्य है।ब्रह्मकर्म स्वभावजम् -- ये शम? दम आदि ब्राह्मणके स्वाभाविक कर्म (गुण) हैं अर्थात् इन कर्मों(गुणों)को धारण करनेमें ब्राह्मणको परिश्रम नहीं पड़ता।जिन ब्राह्मणोंमें सत्त्वगुणकी प्रधानता है? जिनकी वंशपरम्परा परम शुद्ध है और जिनके पूर्वजन्मकृत कर्म भी शुद्ध हैं? ऐसे ब्राह्मणोंके लिये ही शम? दम आदि गुण स्वाभाविक होते हैं और उनमें किसी गुणके न होनेपर अथवा किसी गुणमें कमी होनेपर भी उसकी पूर्ति करना उन ब्राह्मणोंके लिये सहज होता है।चारों वर्णोंकी रचना गुणोंके तारतम्यसे की गयी है? इसलिये गुणोंके अनुसार उसउस वर्णमें वेवे कर्म स्वाभाविक प्रकट हो जाते हैं और दूसरे कर्म गौण हो जाते हैं। जैसे ब्राह्मणमें सत्त्वगुणकी प्रधानता होनेसे उसमें शम? दम आदि कर्म (गुण) स्वाभाविक आते हैं तथा जीविकाके कर्म गौण हो जाते हैं और दूसरे वर्णोंमें रजोगुण तथा तमोगुणकी प्रधानता होनेसे उन वर्णोंके जीविकाके कर्म भी स्वाभाविक कर्मोंमें सम्मिलित हो जाते हैं। इसी दृष्टिसे गीतामें ब्राह्मणके स्वभावज कर्मोंमें जीविकाके कर्म न कह करके शम? दम आदि कर्म (गुण) ही कहे गये हैं। सम्बन्ध -- अब क्षत्रियके स्वाभाविक कर्म बताते हैं।
।।18.42।।मनका निग्रह करना इन्द्रियोंको वशमें करना; धर्मपालनके लिये कष्ट सहना; बाहर-भीतरसे शुद्ध रहना; दूसरोंके अपराधको क्षमा करना; शरीर, मन आदिमें सरलता रखना; वेद, शास्त्र आदिका ज्ञान होना; यज्ञविधिको अनुभवमें लाना; और परमात्मा, वेद आदिमें आस्तिक भाव रखना -- ये सब-के-सब ब्राह्मणके स्वाभाविक कर्म हैं।
शौर्यं तेजो धृतिर्दाक्ष्यं युद्धे चाप्यपलायनम्। दानमीश्वरभावश्च क्षात्रं कर्म स्वभावजम् ॥
।।18.43।। व्याख्या -- शौर्यम् -- मनमें अपने धर्मका पालन करनेकी तत्परता हो? धर्ममय युद्ध (टिप्पणी प0 928) प्राप्त होनेपर युद्धमें चोट लगने? अङ्ग कट जाने? मर जाने आदिका किञ्चिन्मात्र भी भय न हो? घाव होनेपर भी मनमें प्रसन्नता और उत्साह रहे तथा सिर कटनेपर भी पहलेजैसे ही अस्त्रशस्त्र चलाता रहे? इसका नाम शौर्य है।तेजः -- जिस प्रभाव या शक्तिके सामने पापीदुराचारी मनुष्य भी पाप? दुराचार करनेमें हिचकते हैं? जिसके सामने लोगोंकी मर्यादाविरुद्ध चलनेकी हिम्मत नहीं होती अर्थात् लोग स्वाभाविक ही मर्यादामें चलते हैं? उसका नाम तेज है।धृतिः -- विपरीतसेविपरीत अवस्थामें भी अपने धर्मसे विचलित न होने और शत्रुओंके द्वारा धर्म तथा नीतिसे विरुद्ध अनुचित व्यवहारसे सताये जानेपर भी धर्म तथा नीतिविरुद्ध कार्य न करके धैर्यपूर्वक उसी मर्यादामें चलनेका नाम धृति है।दाक्ष्यम् -- प्रजापर शासन करनेकी? प्रजाको यथायोग्य व्यवस्थित रखनेकी और उसका संचालन करनेकी विशेष योग्यता? चतुराईका नाम दाक्ष्य है।युद्धे चाप्यपलायनम् -- युद्धमें कभी पीठ न दिखाना? मनमें कभी हार स्वीकार न करना? युद्ध छोड़कर कभी,न भागना -- यह युद्धमें अपलायन है।दानम् -- क्षत्रियलोग दान करते हैं तो देनेमें कमी नहीं रखते? बड़ी उदारतापूर्वक देते हैं। वर्तमानमें दानपुण्य करनेका स्वभाव वैश्योंमें देखनेमें आता है परन्तु वैश्य लोग देनेमें कसाकसी करते हैं अर्थात् इतनेसे ही काम चल जाय तो अधिक क्यों दिया जाय -- ऐसा द्रव्यका लोभ उनमें रहता है। द्रव्यका लोभ रहनेसे धर्मका पालन करनेमें बाधा आ जाती है? कमी आ जाती है? जिससे सात्त्विक दान (गीता 17। 20) देनेमें कठिनता पड़ती है। परन्तु क्षत्रियोंमें दानवीरता होती है। इसलिये यहाँ दान शब्द क्षत्रियोंके स्वभावमें आया है।ईश्वरभावश्च -- क्षत्रियोंमें स्वाभाविक ही शासन करनेकी प्रवृत्ति होती है। लोगोंके नीति? धर्म और मर्यादाविरुद्ध आचरण देखनेपर उनके मनमें स्वाभाविक ही ऐसी बात आती है कि ये लोग ऐसा क्यों कर रहें हैं और उनको नीति? धर्मके अनुसार चलानेकी इच्छा होती है। अपने शासनद्वारा सबको अपनीअपनी मर्यादाके अनुसार चलानेका भाव रहता है। इस ईश्वरभावमें अभिमान नहीं होता क्योंकि क्षत्रियजातिमें नम्रता? सरलता आदि गुण देखनेमें आते हैं। क्षात्रं कर्म स्वभावजम् -- जो मात्र प्रजाकी दुःखोंसे रक्षा करे? उसका नाम क्षत्रिय है -- क्षतात् त्रायत इति क्षत्रियः। उस क्षत्रियके जो स्वाभाविक कर्म हैं? वे क्षात्रकर्म कहलाते हैं। सम्बन्ध -- अब वैश्य और शूद्रके स्वाभाविक कर्म बताते हैं।
।।18.43।।शूरवीरता, तेज, धैर्य, प्रजाके संचालन आदिकी विशेष चतुरता, युद्धमें कभी पीठ न दिखाना, दान करना और शासन करनेका भाव -- ये सबकेसब क्षत्रियके स्वाभाविक कर्म हैं।
कृषिगौरक्ष्यवाणिज्यं वैश्यकर्म स्वभावजम्। परिचर्यात्मकं कर्म शूद्रस्यापि स्वभावजम् ॥
।।18.44।। व्याख्या -- कृषिगौरक्ष्यवाणिज्यं वैश्यकर्म स्वभावजम् -- खेती करना? गायोंकी रक्षा करना? उनकी वंशवृद्धि करना और शुद्ध व्यापार करना -- ये कर्म वैश्यमें स्वाभाविक होते हैं।शुद्ध व्यापार करनेका तात्पर्य है -- जिस देशमें? जिस समय? जिस वस्तुकी आवश्यकता हो? लोगोंके हितकी भावनासे उस वस्तुको (जहाँ वह मिलती हो? वहाँसे ला करके) उसी देशमें पहुँचाना प्रजाकी आवश्यक वस्तुओंके अभावकी पूर्ति कैसे हो? वस्तुओंके अभावमें कोई कष्ट न पाये -- इस भावसे सच्चाईके साथ वस्तुओंका वितरण करना।,भगवान् श्रीकृष्ण (नन्दबाबाको लेकर) अपनेको वैश्य ही मानते हैं (टिप्पणी प0 929)। इसलिये उन्होंने स्वयं गायों और बछड़ोंको चराया। मनु महाराजने वैश्यवृत्तिमें पशूनां रक्षणम् (मनुस्मृति 1। 90) (पशुओंकी रक्षा करना) कहा है? पर यहाँ भगवान् (उपर्युक्त पदोंसे) अपने जातिभाईयोंसे मानो यह कहते हैं कि तुम लोग सब पशुओंका पालन? उनकी रक्षा न कर सको तो कमसेकम गायोंका पालन और उनकी रक्षा जरूर करना। गायोंकी वृद्धि न कर सको तो कोई बात नहीं परन्तु उनकी रक्षा जरूर करना? जिससे हमारा गोधन घट न जाय। इसलिये वैश्यसमाजको चाहिये कि वह गायोंकी रक्षामें अपना तनमनधन लगा दे? उनकी रक्षा करनेमें अपनी शक्ति बचाकर न रखे।गोरक्षासम्बन्धी विशेष बातमनुष्योंके लिये गाय सब दृष्टियोंमें पालनीय है। गायसे अर्थ? धर्म? काम और मोक्ष -- इन चारों पुरुषार्थोंकी सिद्धि होती है। आजके अर्थप्रधान युगमें तो गाय अत्यन्त ही उपयोगी है। गोपालनसे? गायके दूध? घी? गोबर आदिसे धनकी वृद्धि होती है। हमारा देश कृषिप्रधान है। अतः यहाँ खेतीमें जितनी प्रधानता बैलोंकी है? उतनी प्रधानता अन्य किसीकी भी नहीं है। भैंसेके द्वारा भी खेती की जाती है? पर खेतींमें जितना काम बैल कर सकता है? उतना भैंसा नहीं कर सकता। भैंसा बलवान् तो होता है? पर वह धूप सहन नहीं कर सकता। धूपमें,चलनेसे वह जीभ निकाल देता है? जब कि बैल धूपमें भी चलता रहता है। कारण कि भैंसेमें सात्त्विक बल नहीं होता? जबकि बैलमें सात्त्विक बल होता है। बैलोंकी अपेक्षा भैंसे कम भी होते हैं। ऐसे ही ऊँटसे भी खेती की जाती है? पर ऊँट भैंसेसे भी कम होते हैं और बहुत महँगे होते हैं। खेती करनेवाला हरेक आदमी ऊँट नहीं खरीद सकता। आजकल अच्छेअच्छे जवान बैल मारे जानेके कारण बैल भी महँगे हो गये हैं? तो भी वे ऊँटजितने महँगे नहीं हैं। यदि घरोंमें गायें रखी जायँ तो बैल घरोंमें ही पैदा हो जाते हैं? खरीदने नहीं पड़ते। विदेशी गायोंके जो बैल होते हैं? वे खेतीमें काम नहीं आ सकते क्योंकि उनके कन्धे न होनेसे उनपर जुआ नहीं रखा जा सकता।गाय पवित्र होती है। उसके शरीरका स्पर्श करनेवाली हवा भी पवित्र होती है। गायके गोबरगोमूत्र भी पवित्र होते हैं। गोबरसे लिपे हुए घरोंमें प्लेग? हैजा आदि भयंकर बीमारियाँ नहीं आतीं। इसके सिवाय युद्धके समय गोबरसे लिपे हुए मकानोंपर बमका उतना असर नहीं होता? जितना सीमेण्ट आदिसे बने हुए मकानोंपर होता है। गोबरमें जहर खींचनेकी विशेष शक्ति होती है। काशीमें कोई व्यक्ति साँप काटनेसे मर गया। लोग उसकी दाहक्रिया करनेके लिये उसको गङ्गाके किनारे ले गये। वहाँपर एक साधु रहते थे। उन्होंने पूछा कि इस व्यक्तिको क्या हुआ लोगोंने कहा कि यह साँप काटनेसे मरा है।साधुने कहा कि यह मरा नहीं है? तुमलोग गायका गोबर ले आओ। गोबर लाया गया। साधुने उस व्यक्तिकी नासिकाको छोड़कर उसके पूरे शरीरमें (नीचेऊपर) गोबरका लेप कर दिया। आधे घण्टेके बाद गोबरका फिर दूसरा लेप किया। इससे उस व्यक्तिके श्वास चलने लगे और वह जी उठा। हृदयके रोगोंको दूर करनेके लिये गोमूत्र बहुत उपयोगी है। छोटी बछड़ीका गोमूत्र रोज तोलादोतोला पीनेसे पेटके रोग दूर हो जाते हैं। एक सन्तको दमाकी शिकायत थी? उनको गोमूत्रसेवनसे बहुत फायदा हुआ है। आजकल तो गोबर और गोमूत्रसे अनेक रोगोंकी दवाइयाँ बनायी जा रही हैं। गोबरसे गैस भी बनने लगी है।खेतोंमें गोबरगोमूत्रकी खादसे जो अन्न पैदा होता है? वह भी पवित्र होता है। खेतोंमें गायोंके रहनेसे? गोबर और गोमूत्रसे जमीनकी जैसी पुष्टि होती है? वैसी पुष्टि विदेशी रासायनिक खादोंसे नहीं होती। जैसे? एक बार अंगूरकी खेती करनेवालेने बताया कि गोबरकी खाद डालनेसे अंगूरके गुच्छे जितने बड़ेबड़े होते हैं? उतने विदेशी खाद डालनेसे नहीं होते। विदेशी खाद डालनेसे कुछ ही वर्षोंमें जमीन खराब हो जाती है अर्थात् उसकी उपजाऊशक्ति नष्ट हो जाती है। परन्तु गोबरगोमूत्रसे जमीनकी उपजाऊशक्ति ज्योंकीत्यों बनी रहती है। विदेशोंमें रासायनिक खादसे बहुतसे खेत खराब हो गये हैं? जिन्हें उपजाऊ बनानेके लिये वे लोग भारतसे गोबर मँगवा रहे हैं और भारतसे गोबरके जहाज भरकर विदेशोंमें जा रहे हैं।हमारे देशकी गायें सौम्य और सात्त्विक होती हैं। अतः उनका दूध भी सात्त्विक होता है? जिसको पीनेसे बुद्धि तीक्ष्ण होती है और स्वभाव शान्ति? सौम्य होता है। विदेशी गायोंका दूध तो ज्यादा होता है? पर उन गायोंमें गुस्सा बहुत होता है। अतः उनका दूध पीनेसे मनुष्यका स्वभाव क्रूर होता है। भैंसका दूध भी ज्यादा होता है? पर वह दूध सात्त्विक नहीं होता। उससे सात्त्विक बल नहीं आता। सैनिकोंके घोड़ोंको गायका दूध पिलाया जाता है? जिससे वे घोड़े बहुत तेज होते हैं। एक बार सैनिकोंने परीक्षाके लिये कुछ घोड़ोंको भैंसका दूध पिलाया? जिससे घोड़े खूब मोटे हो गये। परन्तु जब नदी पार करनेका काम पड़ा तो वे घोड़े पानीमें बैठ गये। भैंस पानीमें बैठा करती है अतः वही स्वभाव घोड़ोंमें भी आ गया। ऊँटनीका दूध भी निकलता है? पर उस दूधका दही? मक्खन होता ही नहीं। उसका दूध तामसी होनेसे दुर्गति देनेवाला होता है। स्मृतियोंमें ऊँट? कुत्ता? गधा आदिको अस्पृश्य बताया गया है।सम्पूर्ण धार्मिक कार्योंमें गायकी मुख्यता है। जातकर्म? चूड़ाकर्म? उपनयन आदि सोलह संस्कारोंमें गायका? उसके दूध? घी? गोबर आदिका विशेष सम्बन्ध रहता है। गायके घीसे ही यज्ञ किया जाता है। स्थानशुद्धिके लिये गोबर का ही चौका लगाया जाता है। श्राद्धकर्ममें गायके दूधकी खीर बनायी जाती है। नरकोंसे,बचनेके लिये गोदान किया जाता है। धार्मिक कृत्योंमें पञ्चगव्य काममें लाया जाता है? जो गायके दूध? दही? घी? गोबर और गोमूत्र -- इन पाँचोंसे बनता है।कामनापूर्तिके लिये किये जानेवाले यज्ञोंमें गायका घी आदि काममें आता है। रघुवंशके चलनेमें गायकी ही प्रधानता थी। पौष्टिक? वीर्यवर्धक चीजोंमें भी गायके दूध और घीका मुख्य स्थान है।निष्कामभावसे गायकी सेवा करनेसे मुक्ति होती है। गायकी सेवा करनेमात्रसे अन्तःकरण निर्मल होता है। भगवान् श्रीकृष्णने भी बिना जूतीके गोचारणकी लीला की थी? इसलिये उनका नाम गोपाल पड़ा। प्राचीनकालमें ऋषिलोग वनमें रहते हुए अपने पास गाय रखा करते थे। गायके दूध? घीसे उनकी बुद्धि प्रखर? विलक्षण होती थी? जिससे वे बड़ेबड़े ग्रन्थोंकी रचना किया करते थे। आजकल तो उन ग्रन्थोंको ठीकठीक समझनेवाले भी कम हैं। गायके दूधघीसे वे दीर्घायु होते थे। इसलिये गायके घीका एक नाम आयु भी है। बड़ेबड़े राजालोग भी उन ऋषियोंके पास आते थे और उनकी सलाहसे राज्य चलाते थे।गोरक्षाके लिये बलिदान करनेवालोंकी कथाओंसे इतिहास? पुराण भरे पड़े हैं। बड़े भारी दुःखकी बात है कि आज हमारे देशमें पैसोंके लोभसे रोजाना हजारोंकी संख्यामें गायोंकी हत्या की जा रही है अगर इसी तरह गोहत्या चलती रही तो एक समय गोवंश समाप्त हो जायगा। जब गायें नहीं रहेंगी? तब क्या दशा होगी? कितनी आफतें आयेंगी -- इसका अन्दाजा नहीं लगाया जा सकता। जब गायें खत्म हो जायेंगी? तब गोबर नहीं रहेगा और गोबरकी खाद न रहनेसे जमीन भी उपजाऊ नहीं रहेगी। जमीनके उपजाऊ न रहनेसे खेती कैसे होगी खेती न होनेसे अन्न तथा वस्त्र (कपास) कैसे मिलेगा लोगोंको शरीरनिर्वाहके लिये अन्नजल और वस्त्र भी मिलना मुश्किल हो जायगा। गाय और उसके दूध? घी? गोबर आदिके न रहनेसे प्रजा बहुत दुःखी हो जायगी। गोधनके अभावमें देश पराधीन और दुर्बल हो जायगा। वर्तमानमें भी अकाल? अनावृष्टि? भूकम्प? आपसी कलह आदिके होनेमें गायोंकी हत्या मुख्य कारण है। अतः अपनी पूरी शक्ति लगाकर हर हालतमें गायोंकी रक्षा करना? उनको कत्लखानोंमें जानेसे रोकना हमारा परम कर्तव्य है।गायोंकी रक्षाके लिये भाईबहनोंको चाहिये कि वे गायोंका पालन करें? उनको अपने घरोंमें रखें। गायका ही दूधघी खायें? भैंस आदिका नहीं। घरोंमें गोबरगैसका प्रयोग किया जाय। गायोंकी रक्षाके उद्देश्यसे ही गोशालाएँ बनायी जाएँ? दूधके उद्देश्यसे नहीं। जितनी गोचरभूमियाँ हैं? उनकी रक्षा की जाय तथा सरकारसे और गोचरभूमियाँ छुड़ाई जायँ। सरकारकी गोहत्यानितिका विरोध किया जाय और सरकारसे अनुरोध किया जाय कि वह देशकी रक्षाके लिये पूरे देशमें तत्काल पूर्णरूपसे गोहत्या बन्द करे।परिचर्यात्मकं कर्म शूद्रस्यापि स्वभावजम् -- चारों वर्णोंकी सेवा करना? सेवाकी सामग्री तैयार करना और चारों वर्णोंके कार्योंमें कोई बाधा? अड़चन न आये? सबको सुखआराम हो -- इस भावसे अपनी बुद्धि? योग्यता? बलके द्वारा सबकी सेवा करना शूद्रका स्वाभाविक कर्म है।यहाँ एक शङ्का पैदा होती है कि भगवान्ने चारों वर्णोंकी उत्पत्तिमें सत्त्व? रज और तम -- इन तीन गुणोंको कारण बताया। उसमें तमोगुणकी प्रधानतासे शूद्रकी उत्पत्ति बतायी और गीतामें जहाँ तमोगुणका वर्णन हुआ है? वहाँपर उसके अज्ञान? प्रमाद? आलस्य? निद्रा? अप्रकाश? अप्रवृत्ति और मोह -- ये सात अवगुण बताये हैं (गीता 14। 8 13। 17)। अतः ऐसे तमोगुणकी प्रधानतावाले शूद्रसे सेवा कैसे होगी क्योंकि वह आलस्य? प्रमाद आदिमें पड़ा रहेगा तो सेवा कैसे कर सकेगा सेवा बहुत ऊँचे दर्जेकी चीज है। ऐसे ऊँचे कर्मका भगवान्ने शूद्रके लिये कैसे विधान कियायदि इस शङ्कापर गुणोंकी दृष्टिसे विचार किया जाय तो गीतामें आया है कि सत्त्वगुणवाले ऊँचे लोकोंमें जाते हैं? रजोगुणवाले मरकर पीछे मध्यलोक अर्थात् मृत्युलोकमें जाते हैं और तमोगुणवाले अधोगतिमें जाते हैं (गीता 14। 18)। इसमें भी वास्तवमें न देखा जाय तो रजोगुणके बढ़नेपर जो मरता है? वह कर्मप्रधान मनुष्ययोनिमें जन्म लेता है -- रजसि प्रलयं गत्वा कर्मसङ्गिषु जायते (गीता 14। 15)। इन सबका तात्पर्य यह हुआ कि मनुष्यमात्र रजःप्रधान (रजोगुणकी प्रधानतावाला) है। रजःप्रधानवालोंमें जो सात्त्विक? राजस और तामस -- तीन गुण होते हैं? उन तीनों गुणोंसे ही चारों वर्णोंकी रचना की गयी है। इसलिये कर्म करना सबमें मुख्य होता है और इसीको लेकर मनुष्योंको कर्मयोनि कहा गया है तथा गीतामें भी चारों वर्णोंके कर्मोंके लिये स्वभावज कर्म? स्वभावनियत कर्म आदि पद आये हैं। अतः शूद्रका परिचर्या अर्थात् सेवा करना स्वभावज कर्म है? जिसमें उसे परिश्रम नहीं होता।मनुष्यमात्र कर्मयोनि होनेपर भी ब्राह्मण? क्षत्रिय और वैश्यमें विवेकविचारका विशेष तारतम्य रहता है और शुद्धि भी रहती है परन्तु शूद्रमें मोहकी प्रधानता रहनेसे उसमें विवेक बहुत दब जाता है। इस दृष्टिसे शूद्रके सेवाकर्ममें विवेककी प्रधानता न होकर आज्ञापालनकी प्रधानता रहती है -- अग्या सम न सुसाहिब सेवा (मानस 2। 301। 2)। इसलिये चारों वर्णोंकी आज्ञाके अनुसार सेवा करना? सुखसुविधा जुटा देना शूद्रके लिये स्वाभाविक होता है।शुद्रोंके कर्म परिचर्यात्मक अर्थात् सेवास्वरूप होते हैं। उनके शारीरिक? सामाजिक? नागरिक? ग्रामणिक आदि सबकेसब कर्म ठीक तरहसे सम्पन्न होते हैं? जिनसे चारों ही वर्णोंके जीवननिर्वाहके लिये सुखसुविधा? अनुकूलता और आवश्यकताकी पूर्ति होती है।स्वाभाविक कर्मोंका तात्पर्यचेतन जीवात्मा और जड प्रकृति -- दोनोंका स्वभाव भिन्नभिन्न है। चेतन स्वाभाविक ही निर्विकार अर्थात् परिवर्तनरहित है और प्रकृति स्वाभाविक ही विकारी अर्थात् परिवर्तनशील है। अतः इन दोनोंका स्वभाव भिन्नभिन्न होनेसे इनका सम्बन्ध स्वाभाविक नहीं है किंतु चेतनने प्रकृतिके साथ अपना सम्बन्ध मानकर उस सम्बन्धकी सद्भावना कर ली है अर्थात् सम्बन्ध है ऐसा मान लिया है। इसीको गुणोंका सङ्ग कहते हैं? जो जीवात्माके अच्छीबुरी योनियोंमें जन्म लेनेका कारण है -- कारणं गुणसङ्गोस्य सदसद्योनिजन्मसु (गीता 13। 21)। इस सङ्गके कारण? गुणोंके तारतम्यसे जीवका ब्राह्मणादि वर्णमें जन्म होता है। गुणोंके तारतम्यसे जिस वर्णमें जन्म होता है? उन गुणोंके अनुसार ही उस वर्णके कर्म स्वाभाविक? सहज होते हैं जैसे -- ब्राह्मणके लिये शम? दम आदि क्षत्रियके लिये शौर्य? तेज आदि वैश्यके लिये खेती? गौरक्षा आदि और शूद्रके लिये सेवा -- ये कर्म स्वतःस्वाभाविक होते हैं। तात्पर्य है कि चारों वर्णोंको इन कर्मोंको करनेमें परिश्रम नहीं होता क्योंकि गुणोंके अनुसार स्वभाव और स्वभावके अनुसार उनके लिये कर्मोंका विधान है। इसलिये इन कर्मोंमें उनकी स्वाभाविक ही रुचि होती है। मनुष्य इन स्वाभाविक कर्मोंको जब अपने लिये अर्थात् अपने स्वार्थ? भोग और आरामके लिये करता है? तब वह उन कर्मोंसे बँध जाता है। जब उन्हीं कर्मोंको स्वार्थ और अभिमानका त्याग करके निष्कामभावपूर्वक संसारके हितके लिये करता है? तब कर्मयोग हो जाता है? और उन्हीं कर्मोंसे सब संसारमें व्यापक परमात्माका पूजन करता है अथवा भगवत्परायण होकर केवल भगवत्सम्बन्धी कर्म (जप? ध्यान? सत्सङ्ग? स्वाध्याय आदि) करता है? तब वह भक्तियोग हो जाता है। फिर प्रकृतिके गुणोंका सर्वथा सम्बन्धविच्छेद हो जानेपर केवल एक परमात्मतत्त्व ही रह जाता है? जिसमें सिद्ध महापुरुषके स्वरूपकी स्वतःसिद्ध स्वतन्त्रता? अखण्डता? निर्विकारताकी अनुभूति रह जाती है। ऐसा होनेपर भी उसके शरीर? मन? बुद्धि और इन्द्रियोंके द्वारा अपनेअपने वर्ण? आश्रमकी मर्यादाके अनुसार निर्लिप्ततापूर्वक शास्त्रविहित कर्म स्वाभाविक होते हैं? जो कि संसारमात्रके लिये आदर्श होते हैं। प्रभुकी तरफ आकृष्ट होनेसे प्रतिक्षण प्रेम बढ़ता रहता है? जो अनन्त आनन्दस्वरूप है।जाति जन्मसे मानी जाय या कर्मसे ऊँचनीच योनियोंमें जितने भी शरीर मिलते हैं? वे सब गुण और कर्मके अनुसार ही मिलते हैं। गुण और कर्मके अनुसार ही मनुष्यका जन्म होता है इसलिये मनुष्यकी जाति जन्मसे ही मानी जाती है। अतः स्थूलशरीरकी दृष्टिसे विवाह? भोजन आदि कर्म जन्मकी प्रधानतासे ही करने चाहिये अर्थात् अपनी जाति या वर्णके अनुसार ही भोजन? विवाह आदि कर्म होने चाहिये।दूसरी बात? जिस प्राणीका सांसारिक भोग? धन? मान? आराम? सुख आदिका उद्देश्य रहता है? उसके लिये वर्णके अनुसार कर्तव्यकर्म करना और वर्णकी मर्यादामें चलना आवश्यक हो जाता है। यदि वह वर्णकी मर्यादामें नहीं चलता? तो उसका पतन हो जाता है (टिप्पणी प0 932)। परन्तु जिसका उद्देश्य केवल परमात्मा ही है? संसारके भोग आदि नहीं? उसके लिये सत्सङ्ग? स्वाध्याय? जप? ध्यान? कथा? कीर्तन? परस्पर विचारविनिमय आदि भगवत्सम्बन्धी काम मुख्य होते हैं। तात्पर्य है कि परमात्माकी प्राप्तिमें प्राणीके पारमार्थिक भाव? आचरण आदिकी मुख्यता है? जाति या वर्णकी नहीं।तीसरी बात? जिसका उद्देश्य परमात्माकी प्राप्तिका है? वह भगवत्सम्बन्धी कार्योंको मुख्यतासे करते हुए भी वर्णआश्रमके अनुसार अपने कर्तव्यकर्मोंको पूजनबुद्धिसे केवल भगवत्प्रीत्यर्थ ही करता है।आगे छियालीसवें श्लोकमें भगवान्ने बड़ी श्रेष्ठ बात बतायी है कि जिससे सम्पूर्ण संसार पैदा हुआ है और जिससे सम्पूर्ण संसार व्याप्त है? उस परमात्माका ही लक्ष्य रखकर? उसके प्रीत्यर्थ ही पूजनरूपसे अपनेअपने वर्णके अनुसार कर्म किये जायँ। इसमें मनुष्यमात्रका अधिकार है। देवता? असुर? पशु? पक्षी आदिका स्वतः अधिकार नहीं है परन्तु उनके लिये भी परमात्माकी तरफसे निषेध नहीं है। कारण कि सभी परमात्माका अंश होनेसे परमात्माकी प्राप्तिके सभी अधिकारी हैं। प्राणिमात्रका भगवान्पर पूरा अधिकार है। इससे भी यह सिद्ध होता है कि आपसके व्यवहारमें अर्थात् रोटी? बेटी और शरीर आदिके साथ बर्ताव करनेमें तो जन्म की प्रधानता है और परमात्माकी प्राप्तिमें भाव? विवेक और कर्म की प्रधानता है। इसी आशयको लेकर भागवतकारने कहा है कि जिस मनुष्यके वर्णको बतानेवाला जो लक्षण कहा गया है? वह यदि दूसरे वर्णवालेमें भी मिले तो उसे भी उसी वर्णका समझ लेना चाहिये (टिप्पणी प0 933.1)। अभिप्राय यह है कि ब्राह्मणके शमदम आदि जितने लक्षण हैं? वे लक्षण या गुण स्वाभाविक ही किसीमें हों तो जन्ममात्रसे नीचा होनेपर भी उसको नीचा नहीं मानना चाहिये। ऐसे ही महाभारतमें युधिष्ठिर और नहुषके संवादमें आया है कि जो शूद्र आचरणोंमें श्रेष्ठ है? उस शूद्रको शूद्र नहीं मानना चाहिये और जो ब्राह्मण ब्राह्मणोचित कर्मोंसे रहित है? उस ब्राह्मणको ब्राह्मण नहीं मानना चाहिये (टिप्पणी प0 933.2) अर्थात् वहाँ कर्मोंकी ही प्रधानता ली गयी है? जन्मकी नहीं।शास्त्रोंमें जो ऐसे वचन आते हैं? उन सबका तात्पर्य है कि कोई भी नीच वर्णवाला साधारणसेसाधारण मनुष्य अपनी पारमार्थिक उन्नति कर सकता है? इसमें संदेहकी कोई बात नहीं है। इतना ही नहीं? वह उसी वर्णमें रहता हुआ शम? दम आदि जो सामान्य धर्म हैं? उनका साङ्गोपाङ्ग पालन करता हुआ अपनी श्रेष्ठताको प्रकट कर सकता है। जन्म तो पूर्वकर्मोंके अनुसार हुआ है? इसमें वह बेचारा क्या कर सकता है परन्तु वहीं (नीच वर्णमें) रहकर भी वह अपनी नयी उन्नति कर सकता है। उस नयी उन्नतिमें प्रोत्साहित करनेके लिये ही शास्त्रवचनोंका आशय मालूम देता है कि नीच वर्णवाला भी नयी उन्नति करनेमें हिम्मत न हारे। जो ऊँचे वर्णवाला होकर भी वर्णोचित काम नहीं करता? उसको भी अपने वर्णोचित काम करनेके लिये शास्त्रोंमें प्रोत्साहित किया है जैसे -- ब्राह्मणस्य हि देहोऽयं क्षुद्रकामाय नेष्यते।(श्रीमद्भा0 11। 17। 42) जिन ब्राह्मणोंका खानपान? आचरण सर्वथा भ्रष्ट है? उन ब्राह्मणोंका वचनमात्रसे भी आदर नहीं करना चाहिये -- ऐसा स्मृतिमें आया है (मनु0 4। 30। 192)। परन्तु जिनके आचरण श्रेष्ठ हैं? जो भगवान्के भक्त हैं? उन ब्राह्मणोंकी भागवत आदि पुराणोंमें और महाभारत? रामायण आदि इतिहासग्रन्थोंमें बहुत महिमा गायी गयी है।भगवान्का भक्त चाहे कितनी ही नीची जातिका क्यों न हो? वह भक्तिहीन विद्वान् ब्राह्मणसे श्रेष्ठ है (टिप्पणी प0 933.3)।ब्राह्मणको विराट्रूप भगवान्का मुख? क्षत्रियको हाथ? वैश्यको ऊरु (मध्यभाग) और शूद्रको पैर बताया गया है। ब्राह्मणको मुख बतानेका तात्पर्य है कि उनके पास ज्ञानका संग्रह है? इसलिये चारों वर्णोंको पढ़ाना? अच्छी शिक्षा देना और उपदेश सुनाना -- यह मुखका ही काम है। इस दृष्टिसे ब्राह्मण ऊँचे माने गये।क्षत्रियको हाथ बतानेका तात्पर्य है कि वे चारों वर्णोंकी शत्रुओंसे रक्षा करते हैं। रक्षा करना मुख्यरूपसे हाथोंका ही काम है जैसे -- शरीरमें फोड़ाफुंसी आदि हो जाय तो हाथोंसे ही रक्षा की जाती है शरीरपर चोट आती हो तो रक्षाके लिये हाथ ही आड़ देते हैं? और अपनी रक्षाके लिये दूसरोंपर हाथोंसे ही चोट पहुँचायी जाती है आदमी कहीं गिरता है तो पहले हाथ ही टिकते हैं। इसलिये क्षत्रिय हाथ हो गये। अराजकता फैल जानेपर तो जन? धन? आदिकी रक्षा करना चारों वर्णोंका धर्म हो जाता है।वैश्यको मध्यभाग कहनेका तात्पर्य है कि जैसे पेटमें अन्न? जल? औषध आदि डाले जाते हैं तो उनसे शरीरके सम्पूर्ण अवयवोंको खुराक मिलती है और सभी अवयव पुष्ट होते हैं? ऐसे ही वस्तुओंका संग्रह करना? उनका यातायात करना? जहाँ जिस चीजकी कमी हो वहाँ पहुँचाना? प्रजाको किसी चीजका अभाव न होने देना वैश्यका काम है। पेटमें अन्नजलका संग्रह सब शरीरके लिये होता है और साथमें पेटको भी पुष्टि मिल जाती है क्योंकि मनुष्य केवल पेटके लिये पेट नहीं भरता। ऐसे ही वैश्य केवल दूसरोंके लिये ही संग्रह करे? केवल अपने लिये नहीं। वह ब्राह्मण आदिको दान देता है? क्षत्रियोंको टैक्स देता है? अपना पालन करता है और शूद्रोंको मेहनताना देता है। इस प्रकार वह सबका पालन करता है। यदि वह संग्रह नहीं करेगा? कृषि? गौरक्ष्य और वाणिज्य नहीं करेगा तो क्या देगाशूद्रको चरण बतानेका तात्पर्य है कि जैसे चरण सारे शरीरको उठाये फिरते हैं और पूरे शरीरकी सेवा चरणोंसे ही होती है? ऐसे ही सेवाके आधारपर ही चारों वर्ण चलते हैं। शूद्र अपने सेवाकर्मके द्वारा सबके आवश्यक कार्योंकी पूर्ति करता है।उपर्युक्त विवेचनमें एक ध्यान देनेकी बात है कि गीतामें चारों वर्णोंके उन स्वाभाविक कर्मोंका वर्णन है? जो कर्म स्वतः होते हैं अर्थात् उनको करनेमें अधिक परिश्रम नहीं पड़ता। चारों वर्णोंके लिये और भी दूसरे कर्मंका विधान है? उनको स्मृतिग्रन्थोंमें देखना चाहिये और उनके अनुसार अपने आचरण बनाने चाहिये (गीता 16। 24)।वर्तमानमें चारों वर्णोंमें गड़बड़ी आ जानेपर भी यदि चारों वर्णोंके समुदायोंको इकट्ठा करके अलगअलग समुदायमें देखा जाय तो ब्राह्मणसमुदायमें शम? दम आदि गुण जितने अधिक मिलेंगे? उतने क्षत्रिय? वैश्य और शूद्रसमुदायमें नहीं मिलेंगे। क्षत्रियसमुदायमें शौर्य? तेज आदि गुण जितने अधिक मिलेंगे? उतने ब्राह्मण? वैश्य और शूद्रसमुदायमें नहीं मिलेंगे। वैश्यसमुदायमें व्यापार करना? धनका उपार्जन करना? धनको पचाना (धनका भभका ऊपरसे न दीखने देना) आदि गुण जितने अधिक मिलेंगे? उतने ब्राह्मण? क्षत्रिय और शूद्रसमुदायमें नहीं मिलेंगे। शूद्रसमुदायमें सेवा करनेकी प्रवृत्ति जितनी अधिक मिलेगी? उतनी ब्राह्मण? क्षत्रिय और वैश्यसमुदायमें नहीं मिलेगी। तात्पर्य यह है कि आज सभी वर्ण मर्यादारहित और उच्छृङ्खल होनेपर भी उनके स्वभावज कर्म उनके समुदायोंमें विशेषतासे देखनेमें आते हैं अर्थात् यह चीज व्यक्तिगत न,दीखकर समुदायगत देखनेमें आती है।जो लोग शास्त्रके गहरे रहस्यको नहीं जानते? वे कह देते हैं कि ब्राह्मणोंके हाथमें कलम रही? इसलिये उन्होंने ब्राह्मण सबसे श्रेष्ठ है ऐसा लिखकर ब्राह्मणोंको सर्वोच्च कह दिया। जिनके पास राज्य था? उन्होंने ब्राह्मणोंसे कहा -- क्यों महाराज हमलोग कुछ नहीं हैं क्या तो ब्राह्मणोंने कह दिया -- नहींनहीं? ऐसी बात नहीं। आपलोग भी हैं? आपलोग दो नम्बरमें हैं। वैश्योंने ब्राह्मणोंसे कहा -- क्यों महाराज हमारे बिना कैसे जीविका चलेगी आपकी ब्राह्मणोंने कहा -- हाँ? हाँ? आपलोग तीसरे नम्बरमें हैं। जिनके पास न राज्य था? न धन था? वे ऊँचे उठने लगे तो ब्राह्मणोंने कह दिया -- आपके भाग्यमें राज्य और धन लिखा नहीं है। आपलोग तो इन ब्राह्मणों? क्षत्रियों और वैश्योंकी सेवा करो। इसलिये चौथे नम्बरमें आप लोग हैं। इस तरह सबको भुलावेमें डालकर विद्या? राज्य और धनके प्रभावसे अपनी एकता करके चौथे वर्णको पददलित कर दिया -- यह लिखनेवालोंका अपना स्वार्थ और अभिमान ही है।इसका समाधान यह है कि ब्राह्मणोंने कहीं भी अपने ब्राह्मणधर्मके लिये ऐसा नहीं लिखा है कि ब्राह्मण सर्वोपरि हैं? इसलिये उनको बड़े आरामसे रहना चाहिये? धनसम्पत्तिसे युक्त होकर मौज करनी चाहिये इत्यादि? प्रत्युत ब्राह्मणोंके लिये ऐसा लिखा है कि उनको त्याग करना चाहिये? कष्ट सहना चाहिये तपश्चर्या करनी चाहिये। गृहस्थमें रहते हुए भी उनको धनसंग्रह नहीं करना चाहिये? अन्नका संग्रह भी थोड़ा ही होना चाहिये -- कुम्भीधान्य अर्थात् एक घड़ा भरा हुआ अनाज हो? लौकिक भोगोंमें आसक्ति नहीं होनी चाहिये? और जीवननिर्वाहके लिये किसीसे दान भी लिया जाय तो उसका काम करके अर्थात् यज्ञ? होम? जप? पाठ आदि करके ही लेना चाहिये। गोदान आदि लिया जाय तो उसका प्रायश्चित्त करना चाहिये।यदि कोई ब्राह्मणको श्राद्धका निमन्त्रण देना चाहे तो वह श्राद्धके पहले दिन दे? जिससे ब्राह्मण उसके पितरोंका अपनेमें आवाहन करके रात्रिमें ब्रह्मचर्य और संयमपूर्वक रह सके। दूसरे दिन वह यजमानके पितरोंका पिण्डदान? तर्पण ठीक विधिविधानसे करवाये। उसके बाद वहाँ भोजन करे। निमन्त्रण भी एक ही यजमानका स्वीकार करे और भोजन भी एक ही घरका करे। श्राद्धका अन्न खानेके बाद गायत्रीजप आदि करके शुद्ध होना चाहिये। दान लेना? श्राद्धका भोजन करना ब्राह्मणके लिये ऊँचा दर्जा नहीं है। ब्राह्मणका ऊँचा दर्जा त्यागमें है। वे केवल यजमानके पितरोंका कल्याण भावनासे ही श्राद्धका भोजन और दक्षिणा स्वीकार करते हैं? स्वार्थकी भावनासे नहीं अतः यह भी उनका त्याग ही है।ब्राह्मणोंने अपनी जीविकाके लिये ऋत? अमृत? मृत? सत्यानृत और प्रमृत -- ये पाँच वृत्तियाँ बतायी हैं (टिप्पणी प0 935.1) --,(1) ऋतवृत्ति सर्वोच्च वृत्ति मानी गयी है। इसको शिलोञ्छ या कपोतवृत्ति भी कहते हैं। खेती करनेवाले खेतमेंसे धान काटकर ले जायँ? उसके बाद वहाँ जो अन्न (ऊमी? सिट्टा आदि) पृथ्वीपर गिरा पड़ा हो? वह भूदेवों (ब्राह्मणों) का होता है अतः उनको चुनकर अपना निर्वाह करना शिलोञ्छवृत्ति है अथवा धान्यमण्डीमें जहाँ धान्य तौला जाता है? वहाँ पृथ्वीपर गिरे हुए दाने भूदेवोंके होते हैं अतः उनको चुनकर जीवननिर्वाह करना कपोतवृत्ति है।(2) बिना याचना किये और बिना इशारा किये कोई यजमान आकर देता है तो निर्वाहमात्रकी वस्तु लेना अमृतवृत्ति है। इसको अयाचितवृत्ति भी कहते हैं।(3) सुबह भिक्षाके लिये गाँवमें जाना और लोगोंको वार? तिथि? मुहूर्त आदि बताकर (इस रूपमें काम करके) भिक्षामें जो कुछ मिल जाय? उसीसे अपना जीवननिर्वाह करना मृतवृत्ति है।(4) व्यापार करके जीवननिर्वाह करना सत्यानृतवृत्ति है।(5) उपर्युक्त चारों वृत्तियोंसे जीवननिर्वाह न हो तो खेती करे? पर वह भी कठोर विधिविधानसे करे जैसे -- एक बैलसे हल न चलाये? धूपके समय हल न चलाये आदि? यह प्रमृतवृत्ति है।उपर्युक्त वृत्तियोंमेंसे किसी भी वृत्तिसे निर्वाह किया जाय? उसमें पञ्चमहायज्ञ? अतिथिसेवा करके यज्ञशेष भोजन करना चाहिये (टिप्पणी प0 935.2)।श्रीमद्भगवद्गीतापर विचार करते हैं तो ब्राह्मणके लिये पालनीय जो नौ स्वाभाविक धर्म बताये गये हैं? उनमें जीविका पैदा करनेवाला एक भी धर्म नहीं है। क्षत्रियके लिये सात स्वाभाविक धर्म बताये हैं। उनमें युद्ध करना और शासन करना -- ये दो धर्म कुछ जीविका पैदा करनेवाले हैं। वैश्यके लिये तीन धर्म बताये हैं -- खेती? गोरक्षा और व्यापार ये तीनों ही जीविका पैदा करनेवाले हैं। शूद्रके लिये एक सेवा ही धर्म बताया है? जिसमें पैदाहीपैदा होती है। शूद्रके लिये खानपान? जीवननिर्वाह आदिमें भी बहुत छूट दी गयी है।भगवान्ने स्वे स्वे कर्मण्यभिरतः संसिद्धिं लभते नरः (गीता 18। 45) पदोंसे कितनी विचित्र बात बतायी है कि शम? दम आदि नौ धर्मोंके पालनसे ब्राह्मणका जो कल्याण होता है? वही कल्याण शौर्य? तेज आदि सात धर्मोंके पालनसे क्षत्रियका होता है? वही कल्याण खेती? गोरक्षा और व्यापारके पालनसे वैश्य होता है और वही कल्याण केवल सेवा करनेसे शूद्रका हो जाता है।आगे भगवान्ने एक विलक्षण बात बतायी है कि ब्राह्मण? क्षत्रिय? वैश्य और शूद्र अपनेअपने वर्णोचित कर्मोंके द्वारा उस परमात्माका पूजन करके परम सिद्धिको प्राप्त हो जाते हैं -- स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य सिद्धिं विन्दति मानवः (18। 46)। वास्तवमें कल्याण वर्णोचित कर्मोंसे नहीं होता? प्रत्युत निष्कामभावपूर्वक पूजनसे ही होता है। शूद्रका तो स्वाभाविक कर्म ही परिचर्यात्मक अर्थात् पूजनरूप है अतः उसका पूजनके द्वारा पूजन होता है अर्थात् उसके द्वारा दुगुनी पूजा होती है इसलिये उसका कल्याण जितनी जल्दी होगा? उतनी जल्दी ब्राह्मण आदिका नहीं होगा।शास्त्रकारोंने उद्धार करनेमें छोटेको ज्यादा प्यार दिया है क्योंकि छोटा प्यारका पात्र होता है और बड़ा अधिकारका पात्र होता है। बड़ेपर चिन्ताफिक्र ज्यादा रहती है? छोटेपर कुछ भी भार नहीं रहता। शूद्रको भाररहित करके उसकी जीविका बतायी गयी है और प्यार भी दिया गया है।वास्तवमें देखा जाय तो जो वर्णआश्रममें जितना ऊँचा होता है? उसके लिये शास्त्रोंके अनुसार उतने ही कठिन नियम होते हैं। उन नियमोंका साङ्गोपाङ्ग पालन करनेमें कठिनता अधिक मालूम देती है। परन्तु जो वर्णआश्रममें नीचा होता है? उसका कल्याण सुगमतासे हो जाता है। इस विषयमें विष्णुपुराणमें एक कथा आती है -- एक बार बहुतसे ऋषिमुनि मिलकर श्रेष्ठताका निर्णय करनेके लिये भगवान् वेदव्यासजीके पास गये। व्यासजीने सबको आदरपूर्वक बिठाया और स्वयं गङ्गामें स्नान करने चले गये। गङ्गामें स्नान करते हुए उन्होंने कहा -- कलियुग? तुम धन्य हो स्त्रियों? तुम धन्य हो शूद्रों? तुम धन्य हो जब व्यासजी स्नान करके ऋषियोंके पास आये तो ऋषियोंने कहा -- महाराज आपने कलियुग? स्त्रियों और शूद्रोंको धन्यवाद कैसे दिया तो उन्होंने कहा कि कलियुगमें अपने धर्मका पालन करनेसे स्त्रियाँ और शूद्रोंका कल्याण जल्दी और सुगमतापूर्वक हो जाता है।यहाँ एक और बात सोचनेकी है कि जो अपने स्वार्थका काम करता है? वह समाजमें और संसारमें आदरका पात्र नहीं होता। समाजमें ही नहीं? घरमें भी जो व्यक्ति पेटू और चट्टू होता है? उसकी दूसरे निन्दा करते हैं। ब्राह्मणोंने स्वार्थदृष्टिसे अपने ही मुँहसे अपनी (ब्राह्मणोंकी) प्रशंसा? श्रेष्ठताकी बात नहीं कही है। उन्होंने,ब्राह्मणोंके लिये त्याग ही बताया है। सात्त्विक मनुष्य अपनी प्रशंसा नहीं करते? प्रत्युत दूसरोंकी प्रशंसा? दूसरोंका आदर करते हैं। तात्पर्य है कि ब्राह्मणोंने कभी अपने स्वार्थ और अभिमानकी बात नहीं कही। यदि वे स्वार्थ और अभिमानकी बात कहते तो वे इतने आदरणीय नहीं होते? संसारमें और शास्त्रोंमें आदर न पाते। वे जो आदर पाते हैं? वह त्यागसे ही पाते हैं।इस प्रकार मनुष्यको शास्त्रोंका गहरा अध्ययन करके उपर्युक्त सभी बातोंको समझना चाहिये और ऋषिमुनियोंपर? शास्त्रकारोंपर झूठा आक्षेप नहीं करना चाहिये।ऊँचनीच वर्णोंमें प्राणियोंका जन्म मुख्यरूपसे गुणों और कर्मोंके अनुसार होता है -- चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टं गुणकर्मविभागशः (गीता 4। 13) परन्तु ऋणानुबन्ध? शाप? वरदान? सङ्ग आदि किसी कारणविशेषसे भी ऊँचनीच वर्णोंमें जन्म हो जाता है। उन वर्णोंमें जन्म होनेपर भी वे अपने पूर्वस्वभावके अनुसार ही आचरण करते हैं। यही कारण है कि ऊँचे वर्णमें उत्पन्न होनेपर भी उनके नीच आचरण देखे जाते हैं? जैसे धुन्धुकारी आदि और नीच वर्णमें उत्पन्न होनेपर भी वे महापुरुष होते हैं? जैसे विदुर? कबीर? रैदास आदि।आज जिस समुदायमें जातिगत? कुलपरम्परागत? समाजगत और व्यक्तिगत जो भी शास्त्रविपरीत दोष आये हैं? उनको अपने विवेकविचार? सत्सङ्ग? स्वाध्याय आदिके द्वारा दूर करके अपनेमें स्वच्छता? निर्मलता? पवित्रता लानी चाहिये? जिससे अपने मनुष्यजन्मका ध्येय सिद्ध हो सके। सम्बन्ध -- स्वभावज कर्मोंका वर्णन करनेका प्रयोजन क्या है -- इसको अब आगेके दो श्लोकोंमें बताते हैं।
।।18.44।।खेती करना, गायोंकी रक्षा करना और शुद्ध व्यापार करना -- ये सब-के-सब वैश्यके स्वाभाविक कर्म हैं, तथा चारों वर्णोंकी सेवा करना शूद्रका भी स्वाभाविक कर्म है।
स्वे स्वे कर्मण्यभिरतः संसिद्धिं लभते नरः। स्वकर्मनिरतः सिद्धिं यथा विन्दति तच्छृणु ॥
5.10।। व्याख्या--'ब्रह्मण्याधाय कर्माणि'--शरीर, इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि, प्राण आदि सब भगवान्के ही हैं, अपने हैं ही नहीं; अतः इनके द्वारा होनेवाली क्रियाओँको भक्तियोगी अपनी कैसे मान सकता है? इसलिये उसका यह भाव रहता है कि मात्र क्रियाएँ भगवान्के द्वारा ही हो रही हैं और भगवान्के लिये ही हो रही हैं; मैं तो निमित्तमात्र हूँ।भगवान् ही अपनी इन्द्रियोंके द्वारा आप ही सम्पूर्ण क्रियाएँ करते हैं--इस बातको ठीक-ठीक धारण करके सम्पूर्ण क्रियाओंके कर्तापनको भगवान्में ही मानना, यही उपर्युक्त पदोंका अर्थ है।शरीरादि वस्तुएँ अपनी हैं ही नहीं, प्रत्युत मिली हुई हैं और बिछुड़ रही हैं। ये केवल भगवान्के नाते, भगवत्प्रीत्यर्थ दूसरोंकी सेवा करनेके लिये मिली हैं। इन वस्तुओँपर हमारा स्वतन्त्र अधिकार नहीं है अर्थात् इनको अपने इच्छानुसार न तो रख सकते हैं, न बदल सकते हैं और न मरनेपर साथ ही ले जा सकते हैं। इसलिये इन शरीरादिको तथा इनसे होनेवाली क्रियाओँको अपनी मानना ईमानदारी नहीं है। अतः मनुष्यको ईमानदारीके साथ जिसकी ये वस्तुएँ हैं ,उसीकी अर्थात् भगवान्की मान लेनी चाहिये।सम्पूर्ण क्रियाओँ और पदार्थोंको कर्मयोगी 'संसार' के, ज्ञानयोगी 'प्रकृति' के और भक्तियोगी 'भगवान्' के अर्पण करता है। प्रकृति और संसार--दोनोंके ही स्वामी भगवान् हैं। अतः क्रियाओँ और पदार्थोंको भगवान्के अर्पण करना ही श्रेष्ठ है।'सङ्गं त्यक्त्वा करोति यः'--किसी भी प्राणी, पदार्थ, शरीर, इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि, प्राण, क्रिया आदिमें किञ्चिन्मात्र भी राग, खिंचाव, आकर्षण, लगाव, महत्त्व, ममता, कामना आदिका न रहना ही आसक्तिका सर्वथा त्याग करना है। शास्त्रीय दृष्टिसे 'अज्ञान' जन्म-मरणका हेतु होते हुए भी साधनकी दृष्टिसे 'राग' ही जन्म-मरणका मुख्य हेतु है 'कारणं गुणसङ्गोऽस्य सदसद्योनिजन्मसु' (गीता 13। 21)। रागपर ही अज्ञान टिका हुआ है, इसलिये राग मिटनेपर अज्ञान भी मिट जाता है। इस राग या आसक्तिसे ही कामना पैदा होती है--'सङ्गात्संजायते कामः' (गीता 2। 62)। कामना ही सम्पूर्ण पापोंकी जड़ है (गीता 3। 37)। इसलिये यहाँ पापोंके मूल कारण आसक्तिका त्याग करनेकी बात आयी है; क्योंकि इसके रहते मनुष्य पापोंसे बच नहीं सकता और इसके न रहनेसे मनुष्य पापोंसे लिप्त नहीं होता।किसी भी क्रियाको करते समय क्रियाजन्य सुख लेनेसे तथा उसके फलमें आसक्त रहनेसे उस क्रियाका सम्बन्ध छूटता नहीं, प्रत्युत छूटनेकी अपेक्षा और बढ़ता है। किसी भी छोटी या बड़ी क्रियाके फलरूपमें कोई वस्तु चाहना ही आसक्ति नहीं है ,प्रत्युत क्रिया करते समय भी अपनेमें महत्त्वका, अच्छेपनका आरोप करना और दूसरोंसे अच्छा कहलवानेका भाव रखना भी आसक्ति ही है। इसलिये अपने लिये कुछ भी नहीं करना है। जिस कर्मसे अपने लिये किसी प्रकारका किञ्चिन्मात्र भी सुख पानेकी इच्छा है, वह कर्म अपने लिये हो जाता है। अपनी सुख-सुविधा और सम्मानकी इच्छाका सर्वथा त्याग करके कर्म करना ही उपर्युक्त पदोंका अभिप्राय है।'लिप्यते न स पापेन पद्मपत्रमिवाम्भसा'--यह कितनी विशेष बात है कि भगवान्के सम्मुख होकर भक्ति-योगी संसारमें रहकर सम्पूर्ण भगवदर्थ कर्म करते हुए भी कर्मोंसे नहीं बँधता! जैसे कमलका पत्ता जलमें उत्पन्न होकर और जलमें रहकर भी जलसे निर्लिप्त रहता है, ऐसे ही भक्तियोगी संसारमें रहकर सम्पूर्ण क्रियाएँ करनेपर भी भगवान्के सम्मुख होनेके कारण संसारमें सर्वदा-सर्वथा निर्लिप्त रहता है।भगवान्से विमुख होकर संसारकी कामना करना ही सब पापोंका मुख्य हेतु है। कामना आसक्तिसे उत्पन्न होती है। आसक्तिका सर्वथा अभाव होनेसे कामना नहीं रह सकती, इसलिये पाप होनेकी सम्भावना ही नहीं रहती। धुएँसे अग्निकी तरह सभी कर्म किसी-न-किसी दोषसे युक्त होते हैं (गीता 18। 48)। परन्तु जिसने आशा, कामना, आसक्तिका त्याग कर दिया है, उसे ये दोष नहीं लगते। आसक्तिरहित होकर भगवदर्थ कर्म करनेके प्रभावसे सम्पूर्ण संचित पाप विलीन हो जाते हैं (गीता 9। 27 28)। अतः भक्तियोगीका किसी प्रकारसे भी पापसे सम्बन्ध नहीं रहता।यहाँ 'पापेन' पद कर्मोंसे होनेवाले उस पाप-पुण्यरूप फलका वाचक है, जो आगामी जन्मारम्भमें कारण होता है। भक्तियोगी उस पाप-पुण्यरूप फलसे कभी लिप्त नहीं होता अर्थात् बँधता नहीं। इसी बातको नवें अध्यायके अट्ठाईसवें श्लोकमें 'शुभाशुभफलैरेवं मोक्ष्यसे कर्मबन्धनैः' पदोंसे कहा गया है। सम्बन्ध--अब भगवान् कर्मयोगीके कर्म करनेकी शैली बताते हैं।
।।5.10।। जो (भक्तियोगी) सम्पूर्ण कर्मोंको भगवान् में अर्पण करके और आसक्तिका त्याग करके कर्म करता है, वह जलसे कमलके पत्तेकी तरह पापसे लिप्त नहीं होता।
यतः प्रवृत्तिर्भूतानां येन सर्वमिदं ततम्। स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य सिद्धिं विन्दति मानवः ॥
।।18.46।। व्याख्या -- यतः प्रवृत्तिर्भूतानां येन सर्वमिदं ततम् -- जिस परमात्मासे संसार पैदा हुआ है? जिससे सम्पूर्ण संसारका संचालन होता है? जो सबका उत्पादक? आधार और प्रकाशक है और जो सबमें परिपूर्ण है अर्थात् जो परमात्मा अनन्त ब्रह्माण्डोंकी उत्पत्तिसे पहले भी था? जो अनन्त ब्रह्माण्डोंके लीन होनेपर भी रहेगा और अनन्त ब्रह्माण्डोंके रहते हुए भी जो रहता है तथा जो अनन्त ब्रह्माण्डोंमें व्याप्त है? उसी परमात्माका अपनेअपने स्वभावज (वर्णोचित स्वाभाविक) कर्मोंके द्वारा पूजन करना चाहिये।स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य -- मनुस्मृतिमें ब्राह्मणोंके लिये छः कर्म बताये गये हैं -- स्वयं पढ़ना और दूसरोंको पढ़ाना? स्वयं यज्ञ करना और दूसरोंसे यज्ञ कराना तथा स्वयं दान लेना और दूसरोंको दान देना (टिप्पणी प0 938.1) (इनमें पढ़ाना? यज्ञ कराना और दान लेना -- ये तीन कर्म जीविकाके हैं और पढ़ना? यज्ञ करना और दान देना -- ये तीन कर्तव्यकर्म हैं)। उपर्युक्त शास्त्रनियत छः कर्म और शमदम आदि नौ स्वभावज कर्म तथा इनके अतिरिक्त खानापीना? उठनाबैठना आदि जितने भी कर्म हैं? उन कर्मोंके द्वारा ब्राह्मण चारों वर्णोंमें व्याप्त परमात्माका पूजन करें। तात्पर्य है कि परमात्माकी आज्ञासे? उनकी प्रसन्नताके लिये ही भगवद्बुद्धिसे निष्कामभावपूर्वक सबकी सेवा करें।ऐसे ही क्षत्रियोंके लिये पाँच कर्म बताये गये हैं -- प्रजाकी रक्षा करना? दान देना? यज्ञ करना? अध्ययन करना और विषयोंमें आसक्त न होना (टिप्पणी प0 938.2)। इन पाँच कर्मों तथा शौर्य? तेज आदि सात स्वभावज कर्मोंके द्वारा और खानापीना आदि सभी कर्मोंके द्वारा क्षत्रिय सर्वत्र व्यापक परमात्माका पूजन करें।वैश्य यज्ञ करना? अध्ययन करना? दान देना और ब्याज लेना तथा कृषि? गौरक्ष्य और वाणिज्य (टिप्पणी प0 939.1) -- इन शास्त्रनियत और स्वभावज कर्मोंके द्वारा और शूद्र शास्त्रविहित तथा स्वभावज कर्म सेवा (टिप्पणी प0 939.2) के द्वारा सर्वत्र व्यापक परमात्माका पूजन करें अर्थात् अपने शास्त्रविहित? स्वभावज और खानापीना? सोनाजागना आदि सभी कर्मोंके द्वारा भगवान्की आज्ञासे? भगवान्की प्रसन्नताके लिये भगवद्बुद्धिसे निष्कामभावपूर्वक सबकी सेवा करें।शास्त्रोंमें मनुष्यके लिये अपने वर्ण और आश्रमके अनुसार जोजो कर्तव्यकर्म बताये गये हैं? वे सब संसाररूप परमात्माकी पूजाके लिये ही हैं। अगर साधक अपने कर्मोंके द्वारा भावसे उस परमात्माका पूजन करता है? तो उसकी मात्र क्रियाएँ परमात्माकी पूजा हो जाती है। जैसे? पितामह भीष्मने (अर्जुनके साथ युद्ध करते हुए) अर्जुनके सारथि बने हुए भगवान्की अपने युद्धरूप कर्मके द्वारा (बाणोंसे) पूजा की। भीष्मके बाणोंसे भगवान्का कवच टूट गया? जिससे भगवान्के शरीरमें घाव हो गये और हाथकी अंगुलियोंमें छोटेछोटे बाण लगनेसे अंगुलियोंसे लगाम पकड़ना कठिन हो गया। ऐसी पूजा करके अन्तसमयमें शरशय्यापर पड़े हुए पितामह भीष्म अपने बाणोंद्वारा पूजित भगवान्का ध्यान करते हैं -- युद्धमें मेरे तीखे बाणोंसे जिनका कवच टूट गया है? जिनकी त्वचा विच्छिन्न हो गयी है? परिश्रमके कारण जिनके मुखपर स्वेदकण सुशोभित हो रहे हैं? घोड़ोंकी टापोंसे उड़ी हुई रज जिनकी सुन्दर अलकावलिमें लगी हुई है? इस प्रकार बाणोंसे अलंकृत भगवान् कृष्णमें मेरे मनबुद्धि लग जायँ (टिप्पणी प0 939.3)।,लौकिक और पारमार्थिक कर्मोंके द्वारा उस परमात्माका पूजन तो करना चाहिये? पर उन कर्मोंमें और उनको करनेके करणोंउपकरणोंमें ममता नहीं रखनी चाहिये। कारण कि जिन वस्तुओं? क्रियाओँ आदिमें ममता हो जाती है? वे सभी चीजें अपवित्र हो जानेसे (टिप्पणी प0 939.4) पूजासामग्री नहीं रहतीं (अपवित्र फल? फूर आदि भगवान्पर नहीं चढ़ते)। इसलिये मेरे पास जो कुछ है? वह सब उस सर्वव्यापक परमात्माका ही है?,मुझे तो केवल निमित्त बनकर उनकी दी हुई शक्तिसे उनका पूजन करना है -- इस भावसे जो कुछ किया जाय? वह सबकासब परमात्माका पूजन हो जाता है। इसके विपरीत उन क्रियाओँ? वस्तुओँ आदिको मनुष्य जितनी अपनी मान लेता है? उतनी ही वे (अपनी मानी हुई) क्रियाएँ? वस्तुएँ (अपवित्र होनेसे) परमात्माके पूजनसे वञ्चित रह जाती हैं।सिद्धिं विन्दति मानवः -- सिद्धिको प्राप्त होनेका तात्पर्य है कि अपने कर्मोंसे परमात्माका पूजन करनेवाला मनुष्य प्रकृतिके सम्बन्धसे रहित होकर स्वतः अपने स्वरूपमें स्थित हो जाता है। स्वरूपमें स्थित होनेपर पहले जो परमात्माके समर्पण किया था? उस संस्कारके कारण उसका प्रभुमें अनन्यप्रेम जाग्रत् हो जाता है। फिर उसके लिये कुछ भी पाना बाकी नहीं रहता।यहाँ मानवः पदका तात्पर्य केवल ब्राह्मण? क्षत्रिय? वैश्य? शूद्र और ब्रह्मचारी? गृहस्थ? वानप्रस्थ? संन्यास -- इन वर्णों और आश्रमों आदिसे ही नहीं है? प्रत्युत हिन्दू? मुसलमान? ईसाई? बौद्ध? पारसी? यहूदी आदि सभी जातियों और सम्प्रदायोंसे है। किसी भी जाति? सम्प्रदाय आदिके कोई भी व्यक्ति क्यों न हों? सबकेसब ही परमात्माके पूजनके अधिकारी हैं क्योंकि सभी परमात्माके अपने हैं। जैसे घरमें स्वभाव आदिके भेदसे अनेक तरहके बालक होते हैं? पर उन सबकी माँ एक ही होती है और उन बालकोंकी तरहतरहकी जितनी भी क्रियाएँ होती हैं? उन सब क्रियाओंसे माँ प्रसन्न होती रहती है क्योंकि उन बालकोंमें माँका अपनापन होता है। ऐसे ही भगवान्के सम्मुख हुए मनुष्योंकी सभी क्रियाओँको भगवान् अपना पूजन मान लेते हैं और प्रसन्न होते हैं।इसी अध्यायके सत्तरवें श्लोकमें भगवान्ने अर्जुनसे कहा है कि कोई भी मनुष्य हम दोनोंके संवादका अध्ययन करेगा? उसके द्वारा मैं ज्ञानयज्ञसे पूजित हो जाऊँगा। इससे यह सिद्ध होता है कि कोई गीताका पाठ करे? अध्ययन करे तो उसको भगवान् अपना पूजन मान लेते हैं। ऐसे ही जो उत्पत्तिविनाशशील वस्तुओँसे विमुख होकर भगवान्के सम्मुख हो जाता है? उसकी क्रियाओँको भगवान् अपना पूजन मान लेते हैं।विशेष बातकर्मयोगमें कर्मोंके द्वारा जडतासे असङ्गता होती है और भक्तियोगमें संसारसे असङ्गतापूर्वक परमात्माके प्रति पूज्यभाव होनेसे परमात्माकी सम्मुखता रहती है।कर्मयोगी तो अपने पास शरीर? इन्द्रियाँ? मन? बुद्धि आदि जो कुछ संसारका जडअंश है? उसको स्वार्थ? अभिमान? कामनाका त्याग करके संसारकी सेवामें लगा देता है। इससे अपनी मानी हुई चीजोंसे अपनापन छूटकर उनसे सर्वथा सम्बन्धविच्छेद हो जाता है? और जो स्वतःस्वाभाविक असङ्गता है? वह प्रकट हो जाती है।भक्त अपने वर्णोचित स्वाभाविक कर्मों और समयसमयपर किये गये पारमार्थिक कर्मों(जप? ध्यान आदि) के द्वारा सम्पूर्ण संसारमें व्याप्त परमात्माका पूजन करता है।इन दोनोंमें भावकी भिन्नता होनेसे इतना ही अन्तर हुआ कि कर्मयोगीकी सम्पूर्ण क्रियाओंका प्रवाह सबको सुख पहुँचानेमें लग जाता है? तो क्रियाओँको करनेका वेग मिटकर स्वयंमें असङ्गता आ जाती है और भक्तकी सम्पूर्ण क्रियाएँ परमात्माकी पूजनसामग्री बन जानेसे जडतासे विमुखता होकर भगवान्की सम्मुखता आ जाती है और प्रेम बढ़ जाता है।भक्त तो पहलेसे ही भगवान्के सम्मुख होकर अपनेआपको भगवान्के अर्पित कर देता है। स्वयंके,अनन्यतापूर्वक भगवान्के समर्पित हो जानेसे खानापीना? कामधंधा आदि लौकिक और जप? ध्यान? सत्सङ्ग? स्वाध्याय आदि पारमार्थिक क्रियाएँ भी भगवान्के अर्पण हो जाती हैं। उसकी लौकिकपारमार्थिक क्रियाओंमें केवल बाहरसे भेद देखनेमें आता है परन्तु वास्तवमें कोई भेद नहीं रहता।कर्मयोगी और ज्ञानयोगी -- ये दोनों अन्तमें एक हो जाते हैं। जैसे? कर्मयोगी कर्मोंके द्वारा जडताका त्याग करता है अर्थात् सेवाके द्वारा उसकी सभी क्रियाएँ संसारके अर्पण हो जाती हैं और स्वयं असङ्ग हो जाता है और ज्ञानयोगी विचारके द्वारा जडताका त्याग करता है अर्थात् विचारके द्वारा उसकी सभी क्रियाएँ प्रकृतिके अर्पण हो जाती हैं और स्वयं असङ्ग हो जाता है। तात्पर्य है कि दोनोंके अर्पण करनेके प्रकारमें अन्तर है? पर असङ्गतामें दोनों एक हो जाते हैं (टिप्पणी प0 940)। इस असङ्गतामें कर्मयोगी और ज्ञानयोगी -- दोनों स्वतन्त्र हो जाते हैं। उनके लिये किञ्चिन्मात्र भी कर्मोंका बन्धन नहीं रहता। केवल कर्तव्यपालनके लिये ही कर्तव्यकर्म करनेसे कर्मयोगीके सम्पूर्ण कर्म लीन हो जाते हैं (गीता 4। 23)? और ज्ञानरूप अग्निसे ज्ञानयोगीके सम्पूर्ण कर्म भस्म हो जाते हैं (गीता 4। 37)। परन्तु इस स्वतन्त्रतामें भी जिसको संतोष नहीं होता अर्थात् स्वतन्त्रतासे जिसको उपरति हो जाती है? उसमें भगवत्कृपासे प्रेम प्रकट हो सकता है। , सम्बन्ध -- स्वभावज (सहज) कर्मोंको निष्कामभावपूर्वक और पूजाबुद्धिसे करते हुए उसमें कोई कमी रह भी जाय? तो भी उसमें साधकको हताश नहीं होना चाहिये -- इसको आगेके दो श्लोकोंमें बताते हैं।
।।18.46।।जिस परमात्मासे सम्पूर्ण प्राणियोंकी उत्पत्ति होती है और जिससे यह सम्पूर्ण संसार व्याप्त है, उस परमात्माका अपने कर्मके द्वारा पूजन करके मनुष्य सिद्धिको प्राप्त हो जाता है।
श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात्। स्वभावनियतं कर्म कुर्वन्नाप्नोति किल्बिषम् ॥
।।18.47।। व्याख्या -- श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात् -- यहाँ स्वधर्म शब्दसे वर्णधर्म ही मुख्यतासे लिया गया है।परमात्मप्राप्तिके उद्देश्यवाला मनुष्य स्व को अर्थात् अपनेको जा मानता है? उसका धर्म (कर्तव्य) स्वधर्म है। जैसे कोई अपनेको मनुष्य मानता है? तो मनुष्यताका पालन करना उसके लिये स्वधर्म है। ऐसे ही कर्मोंके अनुसार अपनेको कोई विद्यार्थी या अध्यापक मानता है तो पढ़ना या पढ़ाना उसका स्वधर्म हो जायगा। कोई अपनेको साधक मानता है? तो साधन करना उसका स्वधर्म हो जायगा। कोई अपनेको भक्त? जिज्ञासु और सेवक मानता है तो भक्ति? जिज्ञासा और सेवा उसका स्वधर्म हो जायगा। इस प्रकार जिसकी जिस कार्यमें नियुक्ति हुई है और जिसने जिस कार्यको स्वीकार किया है? उसके लिये उस कार्यको साङ्गोपाङ्ग करना स्वधर्म है।ऐसे ही मनुष्य जन्म और कर्मके अनुसार अपनेको जिस वर्ण और आश्रमका मानता है? उसके लिये उसी वर्ण और आश्रमका धर्म स्वधर्म हो जायगा। ब्राह्मणवर्णमें उत्पन्न हुआ अपनेको ब्राह्मण मानता है तो यज्ञ कराना? दान लेना? पढ़ाना आदि जीविकासम्बन्धी कर्म उसके लिये स्वधर्म हैं। क्षत्रियके लिये युद्ध करना? ईश्वरभाव आदि वैश्यके लिये कृषि? गौरक्षा? व्यापार आदि और शूद्रके लिये सेवा -- ये जीविकासम्बन्धी कर्म स्वधर्म हैं। ऐसा अपना स्वधर्म अगर दूसरोंके धर्मकी अपेक्षा गुणरहित है अर्थात् अपने स्वधर्ममें गुणोंकी कमी है? उसका अनुष्ठान करनेमें कमी रहती है तथा उसको कठिनतासे किया जाता है परन्तु दूसरेका धर्म गुणोंसे परिपूर्ण है? दूसरेके धर्मका अनुष्ठान साङ्गोपाङ्ग है और करनेमें बहुत सुगम है तो भी अपने स्वधर्मका पालन करना ही सर्वश्रेष्ठ है।शास्त्रने जिस वर्णके लिये जिन कर्मोंका विधान किया है? उस वर्णके लिये वे कर्म स्वधर्म हैं और उन्हीं कर्मोंका जिस वर्णके लिये निषेध किया है? उस वर्णके लिये वे कर्म परधर्म हैं। जैसे यज्ञ कराना? दान लेना आदि कर्म ब्राह्मणके लिये शास्त्रकी आज्ञा होनेमें स्वधर्म हैं परन्तु वे ही कर्म क्षत्रिय? वैश्य और शूद्रके लिये शास्त्रका निषेध होनेसे परधर्म हैं। परन्तु आपत्कालको लेकर शास्त्रोंने जीविकासम्बन्धी जिन कर्मोंका निषेध नहीं किया है? वे कर्म सभी वर्णोंके लिये स्वधर्म हो जाते हैं। जैसे आपत्कालमें अर्थात् आपत्तिके समय वैश्यके खेती? व्यापार आदि जीविकासम्बन्धी कर्म ब्राह्मणके लिये भी स्वधर्म हो जाते हैं (टिप्पणी प0 941)।ब्राह्मणके शम? दम आदि जितने भी स्वभावज कर्म हैं? वे सामान्य धर्म होनेसे चारों वर्णोंके लिये स्वधर्म हैं। कारण कि उनका पालन करनेके लिये सभीको शास्त्रकी आज्ञा है। उनका किसीके लिये भी निषेध नहीं है।मनुष्यशरीर केवल परमात्मप्राप्तिके लिये ही मिला है। इस दृष्टिसे मनुष्यमात्र साधक है। अतः दैवीसम्पत्तिके जितने भी सद्गुणसदाचार हैं? वे सभीके अपने होनेसे मनुष्यमात्रके लिये स्वधर्म हैं। परन्तु आसुरीसम्पत्तिके जितने भी दुर्गुणदुराचार हैं? वे मनुष्यमात्रके लिये न तो स्वधर्म हैं और न परधर्म ही हैं वे तो सभीके लिये निषिद्ध हैं? त्याज्य हैं क्योंकि वे अधर्म हैं। दैवीसम्पत्तिके गुणोंको धारण करनेमें और आसुरीसम्पत्तिके पापकर्मोंका त्याग करनेमें सभी स्वतन्त्र हैं? सभी सबल हैं? सभी अधिकारी हैं कोई भी परतन्त्र? निर्बल तथा अनधिकारी नहीं है। हाँ? यह बात अलग है कि कोई सद्गुण किसीके स्वभावके अनुकूल पड़ता है और कोई सद्गुण किसीके स्वभावके अनुकूल पड़ता है। जैसे? किसीके स्वभावमें दया मुख्य होती है और किसीके स्वभावमें उपेक्षा मुख्य होती है? किसीका स्वभाव स्वतः क्षमा करनेका होता है और किसीका स्वभाव माँगनेपर क्षमा करनेका होता है? किसीके स्वभावमें उदारता स्वाभाविक होती है और किसीके स्वभावमें उदारता विचारपूर्वक होती है? आदि। ऐसा भेद रह सकता है।स्वभावनियतं कर्म कुर्वन्नाप्नोति किल्बिषम् -- शास्त्रोंमें विहित और निषिद्ध -- दो तरहके वचन आते हैं। उनमें विहित कर्म करनेकी आज्ञा है और निषिद्ध कर्म करनेका निषेध है। उन विहित कर्मोंमें भी शास्त्रोंने जिस वर्ण? आश्रम? देश? काल? घटना? परिस्थिति? वस्तु? संयोग? वियोग आदिको लेकर अलगअलग जो कर्म नियुक्त किये हैं? उस वर्ण? आश्रम आदिके लिये वे नियत कर्म कहलाते हैं।सत्त्व? रज और तम -- इन तीनों गुणोंको लेकर जो स्वभाव बनता है? उस स्वभावके अनुसार जो कर्म नियत किये जाते हैं? वे स्वभावनियत कर्म कहलाते हैं। उन्हींको स्वभावप्रभव? स्वभावज? स्वधर्म? स्वकर्म और सहज कर्म कहा है।तात्पर्य यह है कि जिस वर्ण? जातिमें जन्म लेनेसे पहले इस जीवके जैसे गुण और कर्म रहे हैं? उन्हीं गुणों और कर्मोंके अनुसार उस वर्णमें उसका जन्म हुआ है। कर्म तो करनेपर समाप्त हो जाते हैं? पर गुणरूपसे उनके संस्कार रहते हैं। जन्म होनेपर उन गुणोंके अनुसार ही उसमें गुण और पालनीय आचरण स्वाभाविक ही उत्पन्न होते हैं अर्थात् उनको न तो कहींसे लाना पड़ता है और न उनके लिये परिश्रम ही करना पड़ता है। इसलिये उनको स्वभावज और स्वभावनियत कहा है।यद्यपि सर्वारम्भा ही दोषेण धूमेनाग्निरिवावृताः (गीता 18। 48) के अनुसार कर्ममात्रमें दोष आता ही है? तथापि स्वभावके अनुसार शास्त्रने जिस वर्णके लिये जिन कर्मोंकी आज्ञा दी है? उन कर्मोंको अपने स्वार्थ और अभिमानका त्याग करके केवल दूसरोंके हितकी दृष्टिसे किया जाय? तो उस वर्णके व्यक्तिको उन कर्मोंका दोष (पाप) नहीं लगता। ऐसे ही जो केवल शरीरनिर्वाहके लिये कर्म करता है? उसको भी पाप नहीं लगता -- शारीरं केवलं कर्म कुर्वन्नाप्नोति किल्बिषम् (गीता 4। 21)।विशेष बातयहाँ एक बड़ी भारी शङ्का पैदा होती है कि एक आदमी कसाईके घर पैदा होता है तो उसके लिये कसाईका कर्म सहज (साथ ही पैदा हुआ) है? स्वाभाविक है। स्वभावनियत कर्म करता हुआ मनुष्य पापको नहीं प्राप्त होता? तो क्या कसाईके कर्मका त्याग नहीं करना चाहिये अगर उसको कसाईके कर्मका त्याग नहीं करना चाहिये? तो फिर निषिद्ध आचरण कैसे छूटेगा कल्याण कैसे होगाइसका समाधान है कि स्वभावनियत कर्म वह होता है? जो विहित हो? किसी रीतिसे निषिद्ध नहीं हो अर्थात् उससे किसीका भी अहित न होता हो। जो कर्म किसीके लिये भी अहितकारक होते हैं? वे सहज कर्ममें नहीं लिये जाते। वे कर्म आसक्ति? कामनाके कारण पैदा होते हैं। निषिद्ध कर्म चाहे इस जन्ममें बना हो? चाहे पूर्वजन्ममें बना हो? है वह दोषवाला ही। दोषभाग त्याज्य होता है क्योंकि दोष आसुरीसम्पत्ति है और गुण दैवीसम्पत्ति है। पहले जन्मके संस्कारोंसे भी दुर्गुणदुराचोंमें रुचि हो सकती है? पर वह रुचि दुर्गुणदुराचार करनेमें बाध्य नहीं करती। विवेक? सद्विचार? सत्सङ्ग? शास्त्र आदिके द्वारा उस रुचिको मिटाया जा सकता है।युक्तिसे भी देखा जाय तो कोई भी प्राणी अपना अहित नहीं चाहता? अपनी हत्या नहीं चाहता। अतः किसीका अहित करनेका? हत्या करनेका अधिकार किसीको भी नहीं है। मनुष्य अपने लिये अच्छा काम चाहता है तो उसे दूसरोंके लिये भी अच्छा काम करना चाहिये। शास्त्रोंमें भी देखा जाय तो यही बात है कि जिसमें दोष होते हैं? पाप होते हैं? अन्याय होते हैं? वे कर्म वैकृत हैं? प्राकृत नहीं हैं अर्थात् वे विकारसे पैदा हुए हैं? स्वभावसे नहीं। तीसरे अध्यायमें अर्जुनने पूछा कि मनुष्य न चाहता हुआ भी किससे प्रेरित होकर पापकर्म करता है तो भगवान्ने कहा कि कामनाके वशमें होकर भी मनुष्य पाप करता है (3। 36 -- 37)। कामनाको लेकर? क्रोधको लेकर? स्वार्थ और अभिमानको लेकर जो कर्म किये जाते हैं? वे कर्म शुद्ध नहीं होते? अशुद्ध होते हैं।परमात्मप्राप्तिके उद्देश्यसे जो कर्म किये जाते हैं? उन कर्मोंमें भिन्नता तो रहती है? पर वे दोषी नहीं होते। ब्राह्मणके घर जन्म होगा तो ब्राह्मणोचित कर्म होंगे? शूद्रके घर जन्म होगा तो शूद्रोचित कर्म होंगे? पर दोषीभाग किसीमें भी नहीं होगा। दोषीभाग सहज नहीं है? स्वभावनियत नहीं है। दोषयुक्त कर्म स्वाभाविक हो सकते हैं? पर स्वभावनियत नहीं हो सकते। एक ब्राह्मणको परमात्मतत्त्वकी प्राप्ति हो जाय तो प्राप्ति होनेके बाद भी वह वैसी ही पवित्रतासे भोजन बनायेगा जैसी पवित्रतासे ब्राह्मणको रहना चाहिये? वैसी ही पवित्रतासे रहेगा। ऐसे ही एक अन्त्यजको परमात्माकी प्राप्ति हो जाय तो वह जूठन भी खा लेगा जैसे पहले रहता था? वैसे ही रहेगा। परन्तु ब्राह्मण ऐसा नहीं करेगा क्योंकि पवित्रतासे भोजन करना उसका स्वभावनियत कर्म है? जबकि अन्त्यजके लिये जूठन खाना दोषी नहीं बताया गया है। इसलिये सिद्ध महापुरुषोंमें एकएकसे विचित्र कर्म होते हैं? पर वे दोषी नहीं होते। उनका स्वभाव रागद्वेषसे रहित होनेके कारण शुद्ध होता है।पहलेके किसी पापकर्मसे कसाईके घर जन्म हो गया तो वह जन्म पापका फल भोगनेके लिये हुआ है? पाप करनेके लिये नहीं। पापका फल जाति? आयु और भोग बताया गया है? नया कर्म नहीं बताया गया -- सति मूले तद्विपाको जात्यायुर्भोगाः। (योगदर्शन 2। 13)। कर्म करनेमें वह स्वतन्त्र है। यदि उसका चित्त शुद्ध हो जाय तो वह कसाई आदिका कर्म कर नहीं सकेगा। एक सन्तसे किसीने कहा कि अगर कोई अपना धर्म पशुओंको मारना ही मानता है तो वह क्या करे तो उन सन्तने बड़ी दृढ़तासे कहा कि यदि वह अपने धर्मके अनुसार ही लगातार तीन वर्षतक पवित्रतापूर्वक भगवान्के नामका? अपने इष्टके नामका जप करे? तो फिर वह मार नहीं सकेगा। कारण कि उसका पूर्वजन्मका अथवा यहाँका जो स्वभाव पड़ा हुआ है? वह स्वभाव दोषी है। यदि सच्चे हृदयसे ठीक परमात्मतत्त्वकी प्राप्ति चाहेगा तो वह कसाईका काम नहीं कर सकेगा। उससे अपनेआप ग्लानि होगी? उपरति होगी। बिना कहेसुने उसमें सद्गुण स्वाभाविक आयेंगे।रामचरितमानसमें शबरीके प्रसङ्गमें आता है -- भगवान् रामने शबरीसे कहा -- नवधा भगति कहउँ तोहि पाहीं। सावधान सुनु धरु मन माहीं।। (3। 35। 4)। फिर नौ प्रकारकी भक्ति कहकर अन्तमें भगवान्ने कहा -- सकल प्रकार भगति दृढ़ तोरें (3। 36। 4)। तात्पर्य यह है कि भक्ति नौ प्रकारकी होती है? इसका शबरीको पता ही नहीं है परन्तु शबरीमें सब प्रकारकी भक्ति स्वाभाविक ही थी। सत्सङ्ग? भजन? ध्यान आदि,करनेसे जिन गुणोंका हमें ज्ञान नहीं है? वे गुण भी आ जाते हैं। जो केवल दूसरोंको सुनानेके लिये याद करते हैं? वे दूसरोंको तो बता देंगे? पर आचरणमें वे गुण तभी आयेंगे? जब अपना स्वभाव शुद्ध करके परमात्माकी तरफ चलेंगे। इसलिये मनुष्यको अपना स्वभाव और अपने कर्म शुद्ध? निर्मल बनाने चाहिये। इसमें कोई परतन्त्र नहीं है? कोई निर्बल नहीं है? कोई अयोग्य नहीं है? कोई अपात्र नहीं है। मनुष्यके मनमें ऐसा आता है कि मैं कर्तव्यका पालन करनेमें और सद्गुणोंको लानेमें असमर्थ हूँ। परन्तु वास्तवमें वह असमर्थ नहीं है। सांसारिक भोगोंकी आदत और पदार्थोंके संग्रहकी रुचि होनेसे ही असमर्थताका अनुभव होता है।उद्धारके योग्य समझकर ही भगवान्ने मनुष्यशरीर दिया है। इसलिये अपने स्वभावका सुधार करके अपना उद्धार करनेमें प्रत्येक मनुष्य स्वतन्त्र है? सबल है? योग्य है? समर्थ है। स्वभावका सुधार करना असम्भव तो है ही नहीं? कठिन भी नहीं है। मनुष्यको मुक्तिका द्वार कहा गया है -- साधन धाम मोच्छ कर द्वारा (मानस 7। 43। 4)। यदि स्वभावका सुधार करना असम्भव होता तो इसे मुक्तिका द्वार कैसे कहा जा सकता अगर मनुष्य अपने स्वभावका सुधार न कर सके? तो फिर मनुष्यजीवनकी सार्थकता क्या हुई
।।18.47।।अच्छी तरहसे अनुष्ठान किये हुए परधर्मसे गुणरहित अपना धर्म श्रेष्ठ है। कारण कि स्वभावसे नियत किये हुए स्वधर्मरूप कर्मको करता हुआ मनुष्य पापको प्राप्त नहीं होता।
सहजं कर्म कौन्तेय सदोषमपि न त्यजेत्। सर्वारम्भा हि दोषेण धूमेनाग्निरिवावृताः ॥
।।18.48।। व्याख्या -- [पूर्वश्लोकमें यह कहा गया कि स्वभावके अनुसार शास्त्रोंने जो कर्म नियत किये हैं? उन कर्मोंको करता हुआ मनुष्य पापको प्राप्त नहीं होता। इससे सिद्ध होता है कि स्वभावनियत कर्मोंमें भी पापक्रिया होती है। अगर पापक्रिया न होती तो पापको प्राप्त नहीं होता यह कहना नहीं बनता। अतः यहाँ भगवान् कहते हैं कि जो सहज कर्म हैं? उनमें कोई दोष भी आ जाय तो भी उनका त्याग नहीं करना चाहिये क्योंकि सबकेसब कर्म धुएँसे अग्निकी तरह दोषसे आवृत हैं। ]सहजं कर्म कौन्तेय सदोषमपि न त्यजेत् -- स्वभावनियतकर्म सहजकर्म कहलाते हैं जैसे -- ब्राह्मणके शम? दम आदि क्षत्रियके शौर्य? तेज आदि वैश्यके कृषि? गौरक्ष्य आदि और शूद्रके सेवाकर्म -- ये सभी सहजकर्म हैं। जन्मके बाद शास्त्रोंने पूर्वके गुण और कर्मोंके अनुसार जिस वर्णके लिये जिन कर्मोंकी आज्ञा दी है? वे शास्त्रनियत कर्म भी सहजकर्म कहलाते हैं जैसे ब्राह्मणके लिये यज्ञ करना और कराना? पढ़ना और पढ़ाना आदि क्षत्रियके लिये यज्ञ करना? दान करना आदि वैश्यके लिये यज्ञ करना आदि और शूद्रके लिये सेवा।सहज कर्ममें ये दोष हैं --,(1) परमात्मा और परमात्माका अंश -- ये दोनों ही स्व हैं तथा प्रकृति और प्रकृतिका कार्य शरीर आदि -- ये दोनों ही पर हैं। परन्तु परमात्माका अंश स्वयं प्रकृतिके वश होकर परतन्त्र हो जाता है अर्थात् क्रियामात्र प्रकृतिमें होती है और उस क्रियाको यह अपनेमें मान लेता है तो परतन्त्र हो जाता है। यह प्रकृतिके परतन्त्र होना ही महान् दोष है।(2) प्रत्येक कर्ममें कुछनकुछ आनुषङ्गिक अनिवार्य हिंसा आदि दोष होते ही हैं।(3) कोई भी कर्म किया जाय? वह कर्म किसीके अनुकूल और किसीके प्रतिकूल होता ही है। किसीके प्रतिकूल होना भी दोष है।(4) प्रमाद आदि दोषोंके कारण कर्मके करनेमें कमी रह जाना अथवा करनेकी विधिमें भूल हो जाना भी दोष है।अपने सहजकर्ममें दोष भी हो? तो भी उसको नहीं छोड़ना चाहिये। इसका तात्पर्य है कि जैसे ब्राह्मणके कर्म जितने सौम्य हैं? उतने ब्राह्मणेतर वर्णोंके कर्म सौम्य नहीं हैं। परन्तु सौम्य न होनेपर भी वे कर्म दोषी नहीं,माने जाते अर्थात् ब्राह्मणके सहज कर्मोंकी अपेक्षा क्षत्रिय? वैश्य आदिके सहज कर्मोंमें गुणोंकी कमी होनेपर भी उस कमीका दोष नहीं लगता और अनिवार्य हिंसा आदि भी नहीं लगते? प्रत्युत उनका पालन करनेसे लाभ होता है। कारण कि वे कर्म उनके स्वभावके अनुकूल होनेसे करनेमें सुगम हैं और शास्त्रविहित हैं।ब्राह्मणके लिये भिक्षा बतायी गयी है। देखनेमें भिक्षा निर्दोष दीखती है? पर उसमें भी दोष आ जाते हैं। जैसे किसी गृहस्थके घरपर कोई भिक्षुक खड़ा है और उसी समय दूसरा भिक्षुक वहाँ आ जाता है तो गृहस्थको भार लगता है। भिक्षुकोंमें परस्पर ईर्ष्या होनेकी सम्भावना रहती है। भिक्षा देनेवालेके घरमें पूरी तैयारी नहीं है तो उसको भी दुःख होता है। यदि कोई गृहस्थ भिक्षा देना नहीं चाहता और उसके घरपर भिक्षुक चला जाय तो उसको बड़ा कष्ट होता है। अगर वह भिक्षा देता है तो खर्चा होता है और नहीं देता है तो भिक्षुक निराश होकर चला जाता है। इससे उस गृहस्थको पाप लगता है और बेचारा उसमें फँस जाता है। इस प्रकार यद्यपि भिक्षामें भी दोष होते हैं? तथापि ब्राह्मणको उसे छोड़ना नहीं चाहिये।क्षत्रियके लिये न्याययुक्त युद्ध प्राप्त हो जाय तो उसको करनेसे क्षत्रियको पाप नहीं लगता। यद्यपि युद्धरूप कर्ममें दोष हैं क्योंकि उसमें मनुष्योंको मारना पड़ता है? तथापि क्षत्रियके लिये सहज और शास्त्रविहित होनेसे दोष नहीं लगता। ऐसे ही वैश्यके लिये खेती करना बताया गया है। खेती करनेमें बहुतसे जन्तुओंकी हिंसा होती है। परन्तु वैश्यके लिये सहज और शास्त्रविहित होनेसे हिंसाका इतना दोष नहीं लगता। इसलिये सहज कर्मोंको छोड़ना नहीं चाहिये।सहज कर्मोंको करनेमें दोष (पाप) नहीं लगता -- यह बात ठीक है परन्तु इन साधारण सहज कर्मोंसे मुक्ति कैसे हो जायगी वास्तवमें मुक्ति होनेमें सहज कर्म बाधक नहीं हैं। कामना? आसक्ति? स्वार्थ? अभिमान आदिसे ही बन्धन होता है और पाप भी इन कामना आदिके कारणसे ही होते हैं। इसलिये मनुष्यको निष्कामभावपूर्वक भगवत्प्रीत्यर्थ सहज कर्मोंको करना चाहिये? तभी बन्धन छूटेगा।सर्वारम्भा हि दोषेण धूमेनाग्निरिवावृताः -- जितने भी कर्म हैं? वे सबकेसब सदोष ही हैं जैसे -- आग सुलगायी जाय तो आरम्भमें धुआँ होता ही है। कर्म करनेमें देश? काल? घटना? परिस्थिति आदिकी परतन्त्रता और दूसरोंकी प्रतिकूलता भी दोष है? परन्तु स्वभावके अनुसार शास्त्रोंने आज्ञा दी है। उस आज्ञाके अनुसार निष्कामभावपूर्वक कर्म करता हुआ मनुष्य पापका भागी नहीं होता। इसीसे भगवान् अर्जुनसे मानो यह कह रहे हैं कि भैया तू जिस युद्धरूप क्रियाको घोर कर्म मान रहा है? वह तेरा धर्म है क्योंकि न्यायसे प्राप्त हुए युद्धको करना क्षत्रियोंका धर्म है? इसके सिवाय क्षत्रियके लिये दूसरा कोई श्रेयका साधन नहीं है (गीता 2। 31)। सम्बन्ध -- अब भगवान् सांख्ययोगका प्रकरण आरम्भ करते हुए पहले सांख्ययोगके अधिकारीका वर्णन करते हैं।
।।18.48।।हे कुन्तीनन्दन ! दोषयुक्त होनेपर भी सहज कर्मका त्याग नहीं करना चाहिये; क्योंकि सम्पूर्ण कर्म धुएँसे अग्निकी तरह किसी-न-किसी दोषसे युक्त हैं।
असक्तबुद्धिः सर्वत्र जितात्मा विगतस्पृहः। नैष्कर्म्यसिद्धिं परमां संन्यासेनाधिगच्छति ॥
।।18.49।। व्याख्या -- संन्यास(सांख्य) योगका अधिकारी होनेसे ही सिद्धि होती है। अतः उसका अधिकारी कैसा होना चाहिये -- यह बतानेके लिये श्लोकके पूर्वार्द्धमें तीन बातें बतायी हैं --,(1) असक्तबुद्धिः सर्वत्र -- जिसकी बुद्धि सब जगह आसक्तिरहित है अर्थात् देश? काल? घटना? परिस्थिति? वस्तु? व्यक्ति? क्रिया? पदार्थ आदि किसीमें भी जिसकी बुद्धि लिप्त नहीं होती।(2) जितात्मा -- जिसने शरीरपर अधिकार कर लिया है अर्थात् जो आलस्य? प्रमाद आदिसे शरीरके वशीभूत नहीं होता? प्रत्युत इसको अपने वशीभूत रखता है। तात्पर्य है कि वह किसी कार्यको अपने सिद्धान्तपूर्वक करना चाहता है तो उस कार्यमें शरीर तत्परतासे लग जाता है और किसी क्रिया? घटना? आदिसे हटना,चाहता है तो वह वहाँसे हट जाता है। इस प्रकार जिसने शरीरपर विजय कर ली है? वह जितात्मा कहलाता है।(3) विगतस्पृहः -- जीवनधारणमात्रके लिये जिनकी विशेष जरूरत होती है? उन चीजोंकी सूक्ष्म इच्छाका नाम स्पृहा है जैसे -- सागपत्ती कुछ मिल जाय? रूखीसूखी रोटी ही मिल जाय? कुछनकुछ खाये बिना हम कैसे जी सकते हैं जल पीये बिना हम कैसे रह सकते हैं ठण्डीके दिनोंमें कपड़े बिलकुल न हों तो हम कैसे जी सकते हैं सांख्ययोगका साधक इन जीवननिर्वाहसम्बन्धी आवश्यकताओंकी भी परवाह नहीं करता।तात्पर्य यह हुआ कि सांख्ययोगमें चलनेवालेको जडताका त्याग करना पड़ता है। उस जडताका त्याग करनेमें उपर्युक्त तीन बातें आयी हैं। असक्तबुद्धि होनेसे वह जितात्मा हो जाता है? और जितात्मा होनेसे वह विगतस्पृह हो जाता है? तब वह सांख्ययोगका अधिकारी हो जाता है।नैष्कर्म्यसिद्धिं परमां संन्यासेनाधिगच्छति -- ऐसा असक्तबुद्धि? जितात्मा और विगतस्पृह पुरुष सांख्ययोगके द्वारा परम नैष्कर्म्यसिद्धिको अर्थात् नैष्कर्म्यरूप परमात्मतत्त्वको प्राप्त हो जाता है। कारण कि क्रियामात्र प्रकृतिमें होती है और जब स्वयंका उस क्रियाके साथ लेशमात्र भी सम्बन्ध नहीं रहता? तब कोई भी क्रिया और उसका फल उसपर किञ्चिन्मात्र भी लागू नहीं होता। अतः उसमें जो स्वाभाविक? स्वतःसिद्ध निष्कर्मता -- निर्लिप्तता है? वह प्रकट हो जाती है। सम्बन्ध -- अब उस परम सिद्धिको प्राप्त करनेकी विधि बतानेकी प्रतिज्ञा करते हैं।
।।18.49।।जिसकी बुद्धि सब जगह आसक्तिरहित है, जिसने शरीरको वशमें कर रखा है, जो स्पृहारहित है, वह मनुष्य सांख्ययोगके द्वारा नैष्कर्म्य-सिद्धिको प्राप्त हो जाता है।
सिद्धिं प्राप्तो यथा ब्रह्म तथाप्नोति निबोध मे। समासेनैव कौन्तेय निष्ठा ज्ञानस्य या परा ॥
।।18.50।। व्याख्या -- सिद्धिं प्राप्तो यथा ब्रह्म तथाप्नोति निबोध मे -- यहाँ सिद्धि नाम अन्तःकरणकी शुद्धिका है? जिसका वर्णन पूर्वश्लोकमें आये असक्तबुद्धिः? जितात्मा और विगतस्पृहः पदोंसे हुआ है। जिसका अन्तःकरण इतना शुद्ध हो गया है कि उसमें किञ्चिन्मात्र भी किसी प्रकारकी कामना? ममता और आसक्ति नहीं रही? उसके लिये कभी किञ्चिन्मात्र भी किसी वस्तु? व्यक्ति? परिस्थिति आदिकी जरूरत नहीं पड़ती अर्थात् उसके लिये कुछ भी प्राप्त करना बाकी नहीं रहता। इसलिये इसको सिद्धि कहा है।लोकमें तो ऐसा कहा जाता है कि मनचाही चीज मिल गयी तो सिद्धि हो गयी? अणिमादि सिद्धियाँ मिल गयीं तो सिद्धि हो गयी। पर वास्तवमें यह सिद्धि नहीं है क्योंकि इसमें पराधीनता होती है? किसी बातकी कमी रहती है? और किसी वस्तु? परिस्थिति आदिकी जरूरत पड़ती है। अतः जिस सिद्धिमें किञ्चिन्मात्र भी कामना पैदा न हो? वही वास्तवमें सिद्धि है। जिस सिद्धिके मिलनेपर कामना बढ़ती रहे? वह सिद्धि वास्तवमें सिद्धि नहीं है? प्रत्युत एक बन्धन ही है।अन्तःकरणकी शुद्धिरूप सिद्धिको प्राप्त हुआ साधक ही ब्रह्मको प्राप्त होता है। वह जिस क्रमसे ब्रह्मको प्राप्त होता है? उसको मुझसे समझ -- निबोध मे। कारण कि सांख्ययोगकी जो सारसार बातें हैं? वे सांख्ययोगीके लिये अत्यन्त आवश्यक हैं और उन बातोंको समझनेकी बहुत जरूरत है।निबोध पदका तात्पर्य है कि सांख्ययोगमें क्रिया और सामग्रीकी प्रधानता नहीं है। किन्तु उस तत्त्वको समझनेकी प्रधानता है। इसी अध्यायके तेरहवें श्लोकमें भी सांख्ययोगीके विषयमें निबोध पद आया है।समासेनैव कौन्तेय निष्ठा ज्ञानस्य या परा -- सांख्ययोगीकी जो आखिरी स्थिति है? जिससे बढ़कर साधककी कोई स्थिति नहीं हो सकती? वही ज्ञानकी परा निष्ठा कही जाती है। उस परा निष्ठाको अर्थात् ब्रह्मको सांख्ययोगका साधक जिस प्रकारसे प्राप्त होता है? उसको मैं संक्षेपसे कहूँगा अर्थात् उसकी सारसार बातें,कहूँगा। सम्बन्ध -- ज्ञानकी परा निष्ठा प्राप्त करनेके लिये साधनसामग्रीकी आवश्यकता है? उसको आगेके तीन श्लोकोंमें बताते हैं।
।।18.50।।हे कौन्तेय ! सिद्धि-(अन्तःकरणकी शुद्धि-) को प्राप्त हुआ साधक ब्रह्मको, जो कि ज्ञानकी परा निष्ठा है, जिस प्रकारसे प्राप्त होता है, उस प्रकारको तुम मुझसे संक्षेपमें ही समझो।
बुद्ध्या विशुद्धया युक्तो धृत्यात्मानं नियम्य च। शब्दादीन्विषयांस्त्यक्त्वा रागद्वेषौ व्युदस्य च ॥
।।18.51।। व्याख्या -- बुद्ध्या विशुद्धया युक्तः -- जो सांख्ययोगी साधक परमात्मतत्त्वको प्राप्त करना चाहता है? उसकी बुद्धि विशुद्ध अर्थात् सात्त्विकी (गीता 18। 30) हो। उसकी बुद्धिका विवेक साफसाफ हो? उसमें किञ्चिन्मात्र भी सन्देह न हो।इस सांख्ययोगके प्रकरणमें सबसे पहले बुद्धिका नाम आया है। इसका तात्पर्य है कि सांख्ययोगीके लिये जिस विवेककी आवश्यकता है? वह विवेक बुद्धिमें ही प्रकट होता है। उस विवेकसे वह जडताका त्याग करता है।वैराग्यं समुपाश्रितः -- जैसे संसारी लोग रागपूर्वक वस्तु? व्यक्ति आदिके आश्रित रहते हैं? उनको अपना आश्रय? सहारा मानते हैं? ऐसे ही सांख्ययोगका साधक वैराग्यके आश्रित रहता है अर्थात् जनसमुदाय? स्थान आदिसे उसकी स्वाभाविक ही निर्लिप्तता बनी रहती है। लौकिक और पारलौकिक सम्पूर्ण भोगोंसे उसका दृढ़ वैराग्य होता है।विविक्तसेवी -- सांख्ययोगके साधकका स्वभाव? उसकी रुचि स्वतःस्वाभाविक एकान्तमें रहनेकी होती है। एकान्तसेवनकी रुचि होनी तो बढ़िया है? पर उसका आग्रह नहीं होना चाहिये अर्थात् एकान्त न मिलनेपर मनमें विक्षेप? हलचल नहीं होनी चाहिये। आग्रह न होनेसे रुचि होनेपर भी एकान्त न मिले? प्रत्युत समुदाय मिले? खूब हल्लागुल्ला हो? तो भी साधक उकतायेगा नहीं अर्थात् सिद्धिअसिद्धिमें सम रहेगा। परन्तु आग्रह होगा तो वह उकता जायगा? उससे समुदाय सहा नहीं जायगा। अतः साधकका स्वभाव तो एकान्तमें रहनेका ही होना चाहिये? पर एकान्त न मिले तो उसके अन्तःकरणमें हलचल नहीं होनी चाहिये। कारण कि हलचल होनेसे अन्तःकरणमें संसारकी महत्ता आती है और संसारकी महत्ता आनेपर हलचल होती है? जो कि ध्यानयोगमें बाधक है।एकान्तमें रहनेसे साधन अधिक होगा? मन भगवान्में अच्छी तरह लगेगा अन्तःकरण निर्मल बनेगा -- इन बातोंको लेकर मनमें जो प्रसन्नता होती है? वह साधनमें सहायक होती है। परन्तु एकान्तमें हल्लागुल्ला करनेवाला कोई नहीं होगा अतः वहाँ नींद अच्छी आयेगी? वहाँ किसी भी प्रकारसे बैठ जायँ तो कोई देखनेवाला नहीं होगा? वहाँ सब प्रकारसे आराम रहेगा? एकान्तमें रहनेसे लोग भी ज्यादा मानबड़ाई? आदर करेंगे -- इन बातोंको लेकर मनमें जो प्रसन्नता होती है? वह साधनमें बाधक होती है क्योंकि यह सब भोग है। साधकको इन सुखसुविधाओंमें फँसना नहीं चाहिये? प्रत्युत इनसे सदा सावधान रहना चाहिये।लघ्वाशी -- साधकका स्वभाव स्वल्प अर्थात् नियमित और सात्त्विक भोजन करनेका हो। भोजनके विषयमें हित? मित और मेध्य -- ये तीन बातें बतायी गयी हैं। हित का तात्पर्य है -- भोजन शरीरके अनुकूल हो। मितका तात्पर्य है -- भोजन न तो अधिक करे और न कम करे? प्रत्युत जितने भोजनसे शरीरनिर्वाह की जाय? उतना भोजन करे (गीता 6। 16)। भोजनसे शरीर पुष्ट हो जायगा -- ऐसे भावसे भोजन न करे? प्रत्युत केवल औषधकी तरह क्षुधानिवृत्तिके लिये ही भोजन करे? जिससे साधनमें विघ्न न पड़े। मेध्यका तात्पर्य है -- भोजन पवित्र हो।धृत्यात्मानं नियम्य च -- सांसारिक कितने ही प्रलोभन सामने आनेपर भी बुद्धिको अपने ध्येय परमात्मतत्त्वसे विचलित न होने देना -- ऐसी दृढ़ सात्त्विकी धृति (गीता 18। 33) के द्वारा इन्द्रियोंका नियमन करे अर्थात् उनको मर्यादामें रखे। आठों पहर यह जागृति रहे कि इन्द्रियोंके द्वारा साधनके विरुद्ध कोई भी चेष्टा न हो।यतवाक्कायमानसः -- शरीर? वाणी और मनको संयत (वशमें) करना भी साधकके लिये बहुत जरूरी है (गीता 17। 14 -- 16)। अतः वह शरीरसे वृथा न घूमे? देखनेसुननेके शौकसे कोई यात्रा न करे। वाणीसे वृथा बातचीत न करे? आवश्यक होनेपर ही बोले? असत्य न बोले? निन्दाचुगली न करे। मनसे रागपूर्वक संसारका चिन्तन न करे? प्रत्युत परमात्माका चिन्तन करे।शब्दादीन्विषयांस्त्यक्त्वा -- ध्यानके समय बाहरके जितने सम्बन्ध हैं? जो कि विषयरूपसे आते हैं और जिनसे संयोगजन्य सुख होता है? उन शब्द? स्पर्श? रूप? रस और गन्ध -- पाँचों विषयोंका स्वरूपसे ही त्याग कर देना चाहिये। कारण कि विषयोंका रागपूर्वक सेवन करनेवाला ध्यानयोगका साधन नहीं कर सकता। अगर विषयोंका रागपूर्वक सेवन करेगा तो ध्यानमें वृत्तियाँ (बहिर्मुख होनेसे) नहीं लगेंगी और विषयोंका चिन्तन होगा।रागद्वेषौ व्युदस्य च -- सांसारिक वस्तु महत्त्वशाली है? अपने काममें आनेवाली है? उपयोगी है -- ऐसा जो भाव है? उसका नाम राग है। तात्पर्य है कि अन्तःकरणमें असत् वस्तुका जो रंग चढ़ा हुआ है? वह राग है। असत् वस्तु आदिमें राग रहते हुए कोई उनकी प्राप्तिमें बाधा डालता है? उसके प्रति द्वेष हो जाता है।असत् संसारके किसी अंशमें राग हो जाय तो दूसरे अंशमें द्वेष हो जाता है -- यह नियम है। जैसे? शरीरमें राग हो जाय तो शरीरके अनुकूल वस्तुमात्रमें राग हो जाता है और प्रतिकूल वस्तुमात्रमें द्वेष हो जाता है।संसारके साथ रागसे भी सम्बन्ध जुड़ता है और द्वेषसे भी सम्बन्ध जुड़ता है। रागवाली बातका भी चिन्तन होता है और द्वेषवाली बातका भी चिन्तन होता है। इसलिये साधक न राग करे और न द्वेष करे।ध्यानयोगपरो नित्यम् -- साधक नित्य ही ध्यानयोगके परायण रहे अर्थात् ध्यानके सिवाय दूसरा कोई साधन न करे। ध्यानके समय तो ध्यान करे ही? व्यवहारके समय अर्थात् चलतेफिरते? खातेपीते? कामधंधा करते समय भी यह ध्यान (भाव) सदा बना रहे कि वास्तवमें एक परमात्माके सिवाय संसारकी स्वतन्त्र सत्ता है ही नहीं (गीता 18। 20)।अहंकारं बलं दर्पं ৷৷. विमुच्य -- गुणोंको लेकर अपनेमें जो एक विशेषता दीखती है? उसे अहंकार कहते हैं। जबर्दस्ती करके? विशेषतासे मनमानी करनेका जो आग्रह (हठ) होता है? उसे बल कहते हैं। जमीनजायदाद आदि बाह्य चीजोंकी विशेषताको लेकर जो घमंड होता है? उसे दर्प कहते हैं। भोग? पदार्थ तथा अनुकूल परिस्थिति मिल जाय? इस इच्छाका नाम काम है। अपने स्वार्थ और अभिमानमें ठेस लगनेपर दूसरोंका अनिष्ट करनेके लिये जो जलनात्मक वृत्ति पैदा होती है? उसको क्रोध कहते हैं। भोगबुद्धिसे? सुखआरामबुद्धिसे चीजोंका जो संग्रह किया जाता है? उसे परिग्रह (टिप्पणी प0 947.1) कहते हैं।साधक उपर्युक्त अहंकार? बल? दर्प? काम? क्रोध और परिग्रह -- इन सबका त्याग कर देता है।निर्ममः -- अपने पास निर्वाहमात्रकी जो वस्तुएँ हैं और कर्म करनेके शरीर? इन्द्रियाँ आदि जो साधन हैं? उनमें ममता अर्थात् अपनापन न हो (टिप्पणी प0 947.2)। अपना शरीर? वस्तु आदि जो हमें प्रिय लगते हैं? उनके बने रहनेकी इच्छा न होना निर्मम होना है।जिन व्यक्तियों और वस्तुओंको हम अपनी मानते हैं? वे आजसे सौ वर्ष पहले भी अपनी नहीं थीं और सौ वर्षके बाद भी अपनी नहीं रहेंगी। अतः जो अपनी नहीं रहेंगी? उनका उपयोग या सेवा तो कर सकते हैं? पर उनको,अपनी मानकर अपने पास नहीं रख सकते। अगर उनको अपने पास नहीं रख सकते तो वे अपने नहीं हैं ऐसा माननेमें क्या बाधा है उनको अपनी न माननेसे अधिक निर्मम हो जाता है।शान्तः -- असत् संसारके साथ सम्बन्ध रखनेसे ही अन्तःकरणमें अशान्ति? हलचल आदि पैदा होते हैं। जडतासे सर्वथा सम्बन्धविच्छेद होनेपर अशान्ति कभी पासमें आती ही नहीं। फिर रागद्वेष न रहनेसे साधक हरदम शान्त रहता है।ब्रह्मभूयाय कल्पते -- ममतारहित और शान्त मनुष्य (सांख्ययोगका साधक) परमात्मप्राप्तिका अधिकारी बन जाता है अर्थात् असत्का सर्वथा सम्बन्ध छूटते ही उसमें ब्रह्मप्राप्तिकी योग्यता? सामर्थ्य आ जाती है। कारण कि जबतक असत् पदार्थोंके साथ सम्बन्ध रहता है? तबतक परमात्मप्राप्तिकी सामर्थ्य नहीं आती। सम्बन्ध -- उपर्युक्त साधनसामग्रीसे निष्ठा प्राप्त हो जानेपर क्या होता है -- इसको आगेके श्लोकमें बताते हैं।
।।18.51।।जो विशुद्ध (सात्त्विकी) बुद्धिसे युक्त, वैराग्यके आश्रित, एकान्तका सेवन करनेवाला और नियमित भोजन करनेवाला साधक धैर्यपूर्वक इन्द्रियोंका नियमन करके, शरीर-वाणी-मनको वशमें करके, शब्दादि विषयोंका त्याग करके और राग-द्वेषको छोड़कर निरन्तर ध्यानयोगके परायण हो जाता है, वह अहंकार, बल, दर्प, काम, क्रोध और परिग्रहका त्याग करके एवं निर्मम तथा शान्त होकर ब्रह्मप्राप्तिका पात्र हो जाता है।
विविक्तसेवी लघ्वाशी यतवाक्कायमानसः। ध्यानयोगपरो नित्यं वैराग्यं समुपाश्रितः ॥
।।18.52।। व्याख्या -- बुद्ध्या विशुद्धया युक्तः -- जो सांख्ययोगी साधक परमात्मतत्त्वको प्राप्त करना चाहता है? उसकी बुद्धि विशुद्ध अर्थात् सात्त्विकी (गीता 18। 30) हो। उसकी बुद्धिका विवेक साफसाफ हो? उसमें किञ्चिन्मात्र भी सन्देह न हो।इस सांख्ययोगके प्रकरणमें सबसे पहले बुद्धिका नाम आया है। इसका तात्पर्य है कि सांख्ययोगीके लिये जिस विवेककी आवश्यकता है? वह विवेक बुद्धिमें ही प्रकट होता है। उस विवेकसे वह जडताका त्याग करता है।वैराग्यं समुपाश्रितः -- जैसे संसारी लोग रागपूर्वक वस्तु? व्यक्ति आदिके आश्रित रहते हैं? उनको अपना आश्रय? सहारा मानते हैं? ऐसे ही सांख्ययोगका साधक वैराग्यके आश्रित रहता है अर्थात् जनसमुदाय? स्थान आदिसे उसकी स्वाभाविक ही निर्लिप्तता बनी रहती है। लौकिक और पारलौकिक सम्पूर्ण भोगोंसे उसका दृढ़ वैराग्य होता है।विविक्तसेवी -- सांख्ययोगके साधकका स्वभाव? उसकी रुचि स्वतःस्वाभाविक एकान्तमें रहनेकी होती है। एकान्तसेवनकी रुचि होनी तो बढ़िया है? पर उसका आग्रह नहीं होना चाहिये अर्थात् एकान्त न मिलनेपर मनमें विक्षेप? हलचल नहीं होनी चाहिये। आग्रह न होनेसे रुचि होनेपर भी एकान्त न मिले? प्रत्युत समुदाय मिले? खूब हल्लागुल्ला हो? तो भी साधक उकतायेगा नहीं अर्थात् सिद्धिअसिद्धिमें सम रहेगा। परन्तु आग्रह होगा तो वह उकता जायगा? उससे समुदाय सहा नहीं जायगा। अतः साधकका स्वभाव तो एकान्तमें रहनेका ही होना चाहिये? पर एकान्त न मिले तो उसके अन्तःकरणमें हलचल नहीं होनी चाहिये। कारण कि हलचल होनेसे अन्तःकरणमें संसारकी महत्ता आती है और संसारकी महत्ता आनेपर हलचल होती है? जो कि ध्यानयोगमें बाधक है।एकान्तमें रहनेसे साधन अधिक होगा? मन भगवान्में अच्छी तरह लगेगा अन्तःकरण निर्मल बनेगा -- इन बातोंको लेकर मनमें जो प्रसन्नता होती है? वह साधनमें सहायक होती है। परन्तु एकान्तमें हल्लागुल्ला करनेवाला कोई नहीं होगा अतः वहाँ नींद अच्छी आयेगी? वहाँ किसी भी प्रकारसे बैठ जायँ तो कोई देखनेवाला नहीं होगा? वहाँ सब प्रकारसे आराम रहेगा? एकान्तमें रहनेसे लोग भी ज्यादा मानबड़ाई? आदर करेंगे -- इन बातोंको लेकर मनमें जो प्रसन्नता होती है? वह साधनमें बाधक होती है क्योंकि यह सब भोग है। साधकको इन सुखसुविधाओंमें फँसना नहीं चाहिये? प्रत्युत इनसे सदा सावधान रहना चाहिये।लघ्वाशी -- साधकका स्वभाव स्वल्प अर्थात् नियमित और सात्त्विक भोजन करनेका हो। भोजनके विषयमें हित? मित और मेध्य -- ये तीन बातें बतायी गयी हैं। हित का तात्पर्य है -- भोजन शरीरके अनुकूल हो। मितका तात्पर्य है -- भोजन न तो अधिक करे और न कम करे? प्रत्युत जितने भोजनसे शरीरनिर्वाह की जाय? उतना भोजन करे (गीता 6। 16)। भोजनसे शरीर पुष्ट हो जायगा -- ऐसे भावसे भोजन न करे? प्रत्युत केवल औषधकी तरह क्षुधानिवृत्तिके लिये ही भोजन करे? जिससे साधनमें विघ्न न पड़े। मेध्यका तात्पर्य है -- भोजन पवित्र हो।धृत्यात्मानं नियम्य च -- सांसारिक कितने ही प्रलोभन सामने आनेपर भी बुद्धिको अपने ध्येय परमात्मतत्त्वसे विचलित न होने देना -- ऐसी दृढ़ सात्त्विकी धृति (गीता 18। 33) के द्वारा इन्द्रियोंका नियमन करे अर्थात् उनको मर्यादामें रखे। आठों पहर यह जागृति रहे कि इन्द्रियोंके द्वारा साधनके विरुद्ध कोई भी चेष्टा न हो।यतवाक्कायमानसः -- शरीर? वाणी और मनको संयत (वशमें) करना भी साधकके लिये बहुत जरूरी है (गीता 17। 14 -- 16)। अतः वह शरीरसे वृथा न घूमे? देखनेसुननेके शौकसे कोई यात्रा न करे। वाणीसे वृथा बातचीत न करे? आवश्यक होनेपर ही बोले? असत्य न बोले? निन्दाचुगली न करे। मनसे रागपूर्वक संसारका चिन्तन न करे? प्रत्युत परमात्माका चिन्तन करे।शब्दादीन्विषयांस्त्यक्त्वा -- ध्यानके समय बाहरके जितने सम्बन्ध हैं? जो कि विषयरूपसे आते हैं और जिनसे संयोगजन्य सुख होता है? उन शब्द? स्पर्श? रूप? रस और गन्ध -- पाँचों विषयोंका स्वरूपसे ही त्याग कर देना चाहिये। कारण कि विषयोंका रागपूर्वक सेवन करनेवाला ध्यानयोगका साधन नहीं कर सकता। अगर विषयोंका रागपूर्वक सेवन करेगा तो ध्यानमें वृत्तियाँ (बहिर्मुख होनेसे) नहीं लगेंगी और विषयोंका चिन्तन होगा।रागद्वेषौ व्युदस्य च -- सांसारिक वस्तु महत्त्वशाली है? अपने काममें आनेवाली है? उपयोगी है -- ऐसा जो भाव है? उसका नाम राग है। तात्पर्य है कि अन्तःकरणमें असत् वस्तुका जो रंग चढ़ा हुआ है? वह राग है। असत् वस्तु आदिमें राग रहते हुए कोई उनकी प्राप्तिमें बाधा डालता है? उसके प्रति द्वेष हो जाता है।असत् संसारके किसी अंशमें राग हो जाय तो दूसरे अंशमें द्वेष हो जाता है -- यह नियम है। जैसे? शरीरमें राग हो जाय तो शरीरके अनुकूल वस्तुमात्रमें राग हो जाता है और प्रतिकूल वस्तुमात्रमें द्वेष हो जाता है।संसारके साथ रागसे भी सम्बन्ध जुड़ता है और द्वेषसे भी सम्बन्ध जुड़ता है। रागवाली बातका भी चिन्तन होता है और द्वेषवाली बातका भी चिन्तन होता है। इसलिये साधक न राग करे और न द्वेष करे।ध्यानयोगपरो नित्यम् -- साधक नित्य ही ध्यानयोगके परायण रहे अर्थात् ध्यानके सिवाय दूसरा कोई साधन न करे। ध्यानके समय तो ध्यान करे ही? व्यवहारके समय अर्थात् चलतेफिरते? खातेपीते? कामधंधा करते समय भी यह ध्यान (भाव) सदा बना रहे कि वास्तवमें एक परमात्माके सिवाय संसारकी स्वतन्त्र सत्ता है ही नहीं (गीता 18। 20)।अहंकारं बलं दर्पं ৷৷. विमुच्य -- गुणोंको लेकर अपनेमें जो एक विशेषता दीखती है? उसे अहंकार कहते हैं। जबर्दस्ती करके? विशेषतासे मनमानी करनेका जो आग्रह (हठ) होता है? उसे बल कहते हैं। जमीनजायदाद आदि बाह्य चीजोंकी विशेषताको लेकर जो घमंड होता है? उसे दर्प कहते हैं। भोग? पदार्थ तथा अनुकूल परिस्थिति मिल जाय? इस इच्छाका नाम काम है। अपने स्वार्थ और अभिमानमें ठेस लगनेपर दूसरोंका अनिष्ट करनेके लिये जो जलनात्मक वृत्ति पैदा होती है? उसको क्रोध कहते हैं। भोगबुद्धिसे? सुखआरामबुद्धिसे चीजोंका जो संग्रह किया जाता है? उसे परिग्रह (टिप्पणी प0 947.1) कहते हैं।साधक उपर्युक्त अहंकार? बल? दर्प? काम? क्रोध और परिग्रह -- इन सबका त्याग कर देता है।निर्ममः -- अपने पास निर्वाहमात्रकी जो वस्तुएँ हैं और कर्म करनेके शरीर? इन्द्रियाँ आदि जो साधन हैं? उनमें ममता अर्थात् अपनापन न हो (टिप्पणी प0 947.2)। अपना शरीर? वस्तु आदि जो हमें प्रिय लगते हैं? उनके बने रहनेकी इच्छा न होना निर्मम होना है।जिन व्यक्तियों और वस्तुओंको हम अपनी मानते हैं? वे आजसे सौ वर्ष पहले भी अपनी नहीं थीं और सौ वर्षके बाद भी अपनी नहीं रहेंगी। अतः जो अपनी नहीं रहेंगी? उनका उपयोग या सेवा तो कर सकते हैं? पर उनको,अपनी मानकर अपने पास नहीं रख सकते। अगर उनको अपने पास नहीं रख सकते तो वे अपने नहीं हैं ऐसा माननेमें क्या बाधा है उनको अपनी न माननेसे अधिक निर्मम हो जाता है।शान्तः -- असत् संसारके साथ सम्बन्ध रखनेसे ही अन्तःकरणमें अशान्ति? हलचल आदि पैदा होते हैं। जडतासे सर्वथा सम्बन्धविच्छेद होनेपर अशान्ति कभी पासमें आती ही नहीं। फिर रागद्वेष न रहनेसे साधक हरदम शान्त रहता है।ब्रह्मभूयाय कल्पते -- ममतारहित और शान्त मनुष्य (सांख्ययोगका साधक) परमात्मप्राप्तिका अधिकारी बन जाता है अर्थात् असत्का सर्वथा सम्बन्ध छूटते ही उसमें ब्रह्मप्राप्तिकी योग्यता? सामर्थ्य आ जाती है। कारण कि जबतक असत् पदार्थोंके साथ सम्बन्ध रहता है? तबतक परमात्मप्राप्तिकी सामर्थ्य नहीं आती। सम्बन्ध -- उपर्युक्त साधनसामग्रीसे निष्ठा प्राप्त हो जानेपर क्या होता है -- इसको आगेके श्लोकमें बताते हैं।
।।18.52।।जो विशुद्ध (सात्त्विकी) बुद्धिसे युक्त, वैराग्यके आश्रित, एकान्तका सेवन करनेवाला और नियमित भोजन करनेवाला साधक धैर्यपूर्वक इन्द्रियोंका नियमन करके, शरीर-वाणी-मनको वशमें करके, शब्दादि विषयोंका त्याग करके और राग-द्वेषको छोड़कर निरन्तर ध्यानयोगके परायण हो जाता है, वह अहंकार, बल, दर्प, काम, क्रोध और परिग्रहका त्याग करके एवं निर्मम तथा शान्त होकर ब्रह्मप्राप्तिका पात्र हो जाता है।
अहंकारं बलं दर्पं कामं क्रोधं परिग्रहम्। विमुच्य निर्ममः शान्तो ब्रह्मभूयाय कल्पते ॥
।।18.53।। व्याख्या -- बुद्ध्या विशुद्धया युक्तः -- जो सांख्ययोगी साधक परमात्मतत्त्वको प्राप्त करना चाहता है? उसकी बुद्धि विशुद्ध अर्थात् सात्त्विकी (गीता 18। 30) हो। उसकी बुद्धिका विवेक साफसाफ हो? उसमें किञ्चिन्मात्र भी सन्देह न हो।इस सांख्ययोगके प्रकरणमें सबसे पहले बुद्धिका नाम आया है। इसका तात्पर्य है कि सांख्ययोगीके लिये जिस विवेककी आवश्यकता है? वह विवेक बुद्धिमें ही प्रकट होता है। उस विवेकसे वह जडताका त्याग करता है।वैराग्यं समुपाश्रितः -- जैसे संसारी लोग रागपूर्वक वस्तु? व्यक्ति आदिके आश्रित रहते हैं? उनको अपना आश्रय? सहारा मानते हैं? ऐसे ही सांख्ययोगका साधक वैराग्यके आश्रित रहता है अर्थात् जनसमुदाय? स्थान आदिसे उसकी स्वाभाविक ही निर्लिप्तता बनी रहती है। लौकिक और पारलौकिक सम्पूर्ण भोगोंसे उसका दृढ़ वैराग्य होता है।विविक्तसेवी -- सांख्ययोगके साधकका स्वभाव? उसकी रुचि स्वतःस्वाभाविक एकान्तमें रहनेकी होती है। एकान्तसेवनकी रुचि होनी तो बढ़िया है? पर उसका आग्रह नहीं होना चाहिये अर्थात् एकान्त न मिलनेपर मनमें विक्षेप? हलचल नहीं होनी चाहिये। आग्रह न होनेसे रुचि होनेपर भी एकान्त न मिले? प्रत्युत समुदाय मिले? खूब हल्लागुल्ला हो? तो भी साधक उकतायेगा नहीं अर्थात् सिद्धिअसिद्धिमें सम रहेगा। परन्तु आग्रह होगा तो वह उकता जायगा? उससे समुदाय सहा नहीं जायगा। अतः साधकका स्वभाव तो एकान्तमें रहनेका ही होना चाहिये? पर एकान्त न मिले तो उसके अन्तःकरणमें हलचल नहीं होनी चाहिये। कारण कि हलचल होनेसे अन्तःकरणमें संसारकी महत्ता आती है और संसारकी महत्ता आनेपर हलचल होती है? जो कि ध्यानयोगमें बाधक है।एकान्तमें रहनेसे साधन अधिक होगा? मन भगवान्में अच्छी तरह लगेगा अन्तःकरण निर्मल बनेगा -- इन बातोंको लेकर मनमें जो प्रसन्नता होती है? वह साधनमें सहायक होती है। परन्तु एकान्तमें हल्लागुल्ला करनेवाला कोई नहीं होगा अतः वहाँ नींद अच्छी आयेगी? वहाँ किसी भी प्रकारसे बैठ जायँ तो कोई देखनेवाला नहीं होगा? वहाँ सब प्रकारसे आराम रहेगा? एकान्तमें रहनेसे लोग भी ज्यादा मानबड़ाई? आदर करेंगे -- इन बातोंको लेकर मनमें जो प्रसन्नता होती है? वह साधनमें बाधक होती है क्योंकि यह सब भोग है। साधकको इन सुखसुविधाओंमें फँसना नहीं चाहिये? प्रत्युत इनसे सदा सावधान रहना चाहिये।लघ्वाशी -- साधकका स्वभाव स्वल्प अर्थात् नियमित और सात्त्विक भोजन करनेका हो। भोजनके विषयमें हित? मित और मेध्य -- ये तीन बातें बतायी गयी हैं। हित का तात्पर्य है -- भोजन शरीरके अनुकूल हो। मितका तात्पर्य है -- भोजन न तो अधिक करे और न कम करे? प्रत्युत जितने भोजनसे शरीरनिर्वाह की जाय? उतना भोजन करे (गीता 6। 16)। भोजनसे शरीर पुष्ट हो जायगा -- ऐसे भावसे भोजन न करे? प्रत्युत केवल औषधकी तरह क्षुधानिवृत्तिके लिये ही भोजन करे? जिससे साधनमें विघ्न न पड़े। मेध्यका तात्पर्य है -- भोजन पवित्र हो।धृत्यात्मानं नियम्य च -- सांसारिक कितने ही प्रलोभन सामने आनेपर भी बुद्धिको अपने ध्येय परमात्मतत्त्वसे विचलित न होने देना -- ऐसी दृढ़ सात्त्विकी धृति (गीता 18। 33) के द्वारा इन्द्रियोंका नियमन करे अर्थात् उनको मर्यादामें रखे। आठों पहर यह जागृति रहे कि इन्द्रियोंके द्वारा साधनके विरुद्ध कोई भी चेष्टा न हो।यतवाक्कायमानसः -- शरीर? वाणी और मनको संयत (वशमें) करना भी साधकके लिये बहुत जरूरी है (गीता 17। 14 -- 16)। अतः वह शरीरसे वृथा न घूमे? देखनेसुननेके शौकसे कोई यात्रा न करे। वाणीसे वृथा बातचीत न करे? आवश्यक होनेपर ही बोले? असत्य न बोले? निन्दाचुगली न करे। मनसे रागपूर्वक संसारका चिन्तन न करे? प्रत्युत परमात्माका चिन्तन करे।शब्दादीन्विषयांस्त्यक्त्वा -- ध्यानके समय बाहरके जितने सम्बन्ध हैं? जो कि विषयरूपसे आते हैं और जिनसे संयोगजन्य सुख होता है? उन शब्द? स्पर्श? रूप? रस और गन्ध -- पाँचों विषयोंका स्वरूपसे ही त्याग कर देना चाहिये। कारण कि विषयोंका रागपूर्वक सेवन करनेवाला ध्यानयोगका साधन नहीं कर सकता। अगर विषयोंका रागपूर्वक सेवन करेगा तो ध्यानमें वृत्तियाँ (बहिर्मुख होनेसे) नहीं लगेंगी और विषयोंका चिन्तन होगा।रागद्वेषौ व्युदस्य च -- सांसारिक वस्तु महत्त्वशाली है? अपने काममें आनेवाली है? उपयोगी है -- ऐसा जो भाव है? उसका नाम राग है। तात्पर्य है कि अन्तःकरणमें असत् वस्तुका जो रंग चढ़ा हुआ है? वह राग है। असत् वस्तु आदिमें राग रहते हुए कोई उनकी प्राप्तिमें बाधा डालता है? उसके प्रति द्वेष हो जाता है।असत् संसारके किसी अंशमें राग हो जाय तो दूसरे अंशमें द्वेष हो जाता है -- यह नियम है। जैसे? शरीरमें राग हो जाय तो शरीरके अनुकूल वस्तुमात्रमें राग हो जाता है और प्रतिकूल वस्तुमात्रमें द्वेष हो जाता है।संसारके साथ रागसे भी सम्बन्ध जुड़ता है और द्वेषसे भी सम्बन्ध जुड़ता है। रागवाली बातका भी चिन्तन होता है और द्वेषवाली बातका भी चिन्तन होता है। इसलिये साधक न राग करे और न द्वेष करे।ध्यानयोगपरो नित्यम् -- साधक नित्य ही ध्यानयोगके परायण रहे अर्थात् ध्यानके सिवाय दूसरा कोई साधन न करे। ध्यानके समय तो ध्यान करे ही? व्यवहारके समय अर्थात् चलतेफिरते? खातेपीते? कामधंधा करते समय भी यह ध्यान (भाव) सदा बना रहे कि वास्तवमें एक परमात्माके सिवाय संसारकी स्वतन्त्र सत्ता है ही नहीं (गीता 18। 20)।अहंकारं बलं दर्पं ৷৷. विमुच्य -- गुणोंको लेकर अपनेमें जो एक विशेषता दीखती है? उसे अहंकार कहते हैं। जबर्दस्ती करके? विशेषतासे मनमानी करनेका जो आग्रह (हठ) होता है? उसे बल कहते हैं। जमीनजायदाद आदि बाह्य चीजोंकी विशेषताको लेकर जो घमंड होता है? उसे दर्प कहते हैं। भोग? पदार्थ तथा अनुकूल परिस्थिति मिल जाय? इस इच्छाका नाम काम है। अपने स्वार्थ और अभिमानमें ठेस लगनेपर दूसरोंका अनिष्ट करनेके लिये जो जलनात्मक वृत्ति पैदा होती है? उसको क्रोध कहते हैं। भोगबुद्धिसे? सुखआरामबुद्धिसे चीजोंका जो संग्रह किया जाता है? उसे परिग्रह (टिप्पणी प0 947.1) कहते हैं।साधक उपर्युक्त अहंकार? बल? दर्प? काम? क्रोध और परिग्रह -- इन सबका त्याग कर देता है।निर्ममः -- अपने पास निर्वाहमात्रकी जो वस्तुएँ हैं और कर्म करनेके शरीर? इन्द्रियाँ आदि जो साधन हैं? उनमें ममता अर्थात् अपनापन न हो (टिप्पणी प0 947.2)। अपना शरीर? वस्तु आदि जो हमें प्रिय लगते हैं? उनके बने रहनेकी इच्छा न होना निर्मम होना है।जिन व्यक्तियों और वस्तुओंको हम अपनी मानते हैं? वे आजसे सौ वर्ष पहले भी अपनी नहीं थीं और सौ वर्षके बाद भी अपनी नहीं रहेंगी। अतः जो अपनी नहीं रहेंगी? उनका उपयोग या सेवा तो कर सकते हैं? पर उनको,अपनी मानकर अपने पास नहीं रख सकते। अगर उनको अपने पास नहीं रख सकते तो वे अपने नहीं हैं ऐसा माननेमें क्या बाधा है उनको अपनी न माननेसे अधिक निर्मम हो जाता है।शान्तः -- असत् संसारके साथ सम्बन्ध रखनेसे ही अन्तःकरणमें अशान्ति? हलचल आदि पैदा होते हैं। जडतासे सर्वथा सम्बन्धविच्छेद होनेपर अशान्ति कभी पासमें आती ही नहीं। फिर रागद्वेष न रहनेसे साधक हरदम शान्त रहता है।ब्रह्मभूयाय कल्पते -- ममतारहित और शान्त मनुष्य (सांख्ययोगका साधक) परमात्मप्राप्तिका अधिकारी बन जाता है अर्थात् असत्का सर्वथा सम्बन्ध छूटते ही उसमें ब्रह्मप्राप्तिकी योग्यता? सामर्थ्य आ जाती है। कारण कि जबतक असत् पदार्थोंके साथ सम्बन्ध रहता है? तबतक परमात्मप्राप्तिकी सामर्थ्य नहीं आती। सम्बन्ध -- उपर्युक्त साधनसामग्रीसे निष्ठा प्राप्त हो जानेपर क्या होता है -- इसको आगेके श्लोकमें बताते हैं।
।।18.53।।जो विशुद्ध (सात्त्विकी) बुद्धिसे युक्त, वैराग्यके आश्रित, एकान्तका सेवन करनेवाला और नियमित भोजन करनेवाला साधक धैर्यपूर्वक इन्द्रियोंका नियमन करके, शरीर-वाणी-मनको वशमें करके, शब्दादि विषयोंका त्याग करके और राग-द्वेषको छोड़कर निरन्तर ध्यानयोगके परायण हो जाता है, वह अहंकार, बल, दर्प, काम, क्रोध और परिग्रहका त्याग करके एवं निर्मम तथा शान्त होकर ब्रह्मप्राप्तिका पात्र हो जाता है।
ब्रह्मभूतः प्रसन्नात्मा न शोचति न काङ्क्षति। समः सर्वेषु भूतेषु मद्भक्तिं लभते पराम् ॥
।।18.54।। व्याख्या -- ब्रह्मभूतः -- जब अन्तःकरणमें विनाशशील वस्तुओंका महत्त्व मिट जाता है? तब अन्तःकरणकी अहंकार? घमंड आदि वृत्तियाँ शान्त हो जाती हैं अर्थात् उनका त्याग हो जाता है। फिर अपने पास जो वस्तुएँ हैं? उनमें भी ममता नहीं रहती। ममता न रहनेसे सुख और भोगबुद्धिसे वस्तुओंका संग्रह नहीं होता। जब सुख और भोगबुद्धि मिट जाती है? तब अन्तःकरणमें स्वतःस्वाभाविक ही शान्ति आ जाती है।इस प्रकार साधक जब असत्से ऊपर उठ जाता है? तब वह ब्रह्मप्राप्तिका पात्र बन जाता है। पात्र बननेपर उसकी ब्रह्मभूतअवस्था अपनेआप हो जाती है। इसके लिये उसको कुछ करना नहीं पड़ता। इस अवस्थामें मैं ब्रह्मस्वरूप हूँ और ब्रह्म मेरा स्वरूप है ऐसा उसको अपनी दृष्टिसे अनुभव हो जाता है। इसी अवस्थाको यहाँ (और गीता 5। 24 में भी) ब्रह्मभूतः पदसे कहा गया है।प्रसन्नात्मा -- जब अन्तःकरणमें असत् वस्तुओंका महत्त्व हो जाता है? तब उन वस्तुओंको प्राप्त करनेकी कामना पैदा हो जाती है और अशान्ति (हलचल) पैदा हो जाती है। परन्तु जब असत् वस्तुओंका महत्त्व मिट जाता है? तब साधकके चित्तमें स्वाभाविक ही प्रसन्नता रहती है। अप्रसन्नताका कारण मिट जानेसे फिर कभी अप्रसन्नता होती ही नहीं। कारण कि सांख्ययोगी साधकके अन्तःकरणमें अपनेसहित संसारका अभाव और परमात्मतत्त्वका भाव अटल रहता है।न शोचति न काङ्क्षति -- उस प्रसन्नताकी पहचान यह है कि वह शोकचिन्ता नहीं करता। सांसारिक कितनी ही बड़ी हानि हो जाय? तो भी वह शोक नहीं करता और अमुक परिस्थिति प्राप्त हो जाय -- ऐसी इच्छा भी नहीं करता। तात्पर्य है कि उत्पन्न और नष्ट होनेवाली तथा आनेजानेवाली परिवर्तनशील परिस्थिति? वस्तु? व्यक्ति? पदार्थ आदिके बननेबिगड़नेसे उसपर कोई असर ही नहीं पड़ता। जो परमात्मामें अटलरूपसे स्थित है? उसपर आनेजानेवाली परिस्थितियोंका असर हो ही कैसे सकता हैसमः सर्वेषु भूतेषु -- जबतक साधकमें किञ्चिन्मात्र भी हर्षशोक? रागद्वेष आदि द्वन्द्व रहते हैं? तबतक वह सर्वत्र व्याप्त परमात्माके साथ अभिन्नताका अनुभव नहीं कर सकता। अभिन्नताका अनुभव न होनेसे वह अपनेको सम्पूर्ण भूतोंमें सम नहीं देख सकता। परन्तु जब साधक हर्षशोकादि द्वन्द्वोंसे सर्वथा रहित हो जाता है? तब परमात्माके साथ स्वतःस्वाभाविक अभिन्नता (जो कि सदासे ही थी) का अनुभव हो जाता है। परमात्माके साथ अभिन्नता होनेसे? अपना कोई व्यक्तित्व (टिप्पणी प0 948) (व्यक्तित्व उसे कहते हैं? जिसमें मनुष्य अपनी सत्ता अलग मानता है और जिससे बन्धन होता है) न रहनेसे अर्थात् मैं हूँ इस रूपसे अपनी कोई अलग सत्ता न रहनेसे वह सम्पूर्ण प्राणियोंमें सम है -- समोऽहं सर्वभूतेषु (गीता 9। 29)? ऐसे ही वह भी सम्पूर्ण प्राणियोंमें सम हो जाता है।वह सम्पूर्ण प्राणियोंमें सम किस प्रकार होता है जैसे -- मनोराज्य और स्वप्नमें जो नाना सृष्टि होती है? उसमें मन ही अनेक रूप धारण करता है अर्थात् वह सृष्टि मनोमयी होती है। मनोमयी होनेसे जैसे सब सृष्टिमें मन है और मनमें सब सृष्टि है? ऐसे ही सब प्राणियोंमें (आत्मरूपसे) वह है और उसमें सम्पूर्ण प्राणी हैं (गीता 6। 29)। इसीको यहाँ समः सर्वेषु भूतेषु कहा है।मद्भक्तिं लभते पराम् -- जब समरूप परमात्माके साथ अभिन्नताका अनुभव होनेसे साधकका सर्वत्र समभाव हो जाता है? तब उसका परमात्मामें प्रतिक्षण वर्धमान एक विलक्षण आकर्षण? खिंचाव? अनुराग हो जाता है। उसीको यहाँ पराभक्ति कहा है।पाँचवें अध्यायके चौबीसवें श्लोकमें जैसे ब्रह्मभूतअवस्थाके बाद ब्रह्मनिर्वाणकी प्राप्ति बतायी है -- स योगी ब्रह्मनिर्वाणं ब्रह्मभूतोऽधिगच्छति? ऐसे ही यहाँ ब्रह्मभूतअवस्थाके बाद पराभक्तिकी प्राप्ति बतायी है। सम्बन्ध -- अब आगेके श्लोकमें पराभक्तिका फल बताते हैं।
।।18.54।।वह ब्रह्मभूत-अवस्थाको प्राप्त प्रसन्न मनवाला साधक न तो किसीके लिये शोक करता है और न किसीकी इच्छा करता है। ऐसा सम्पूर्ण प्राणियोंमें समभाववाला साधक मेरी पराभक्तिको प्राप्त हो जाता है।
भक्त्या मामभिजानाति यावान्यश्चास्मि तत्त्वतः। ततो मां तत्त्वतो ज्ञात्वा विशते तदनन्तरम् ॥
।।18.55।। व्याख्या -- भक्त्या मामभिजानाति -- जब परमात्मतत्त्वमें आकर्षण? अनुराग हो जाता है? तब साधक स्वयं उस परमात्माके सर्वथा समर्पित हो जाता है? उस तत्त्वसे अभिन्न हो जाता है। फिर उसका अलग कोई (स्वतन्त्र) अस्तित्व नहीं रहता अर्थात् उसके अहंभावका अतिसूक्ष्म अंश भी नहीं रहता। इसलिये उसको प्रेमस्वरूपा प्रेमाभक्ति प्राप्त हो जाती है। उस भक्तिसे परमात्मतत्त्वका वास्तविक बोध हो जाता है।,ब्रह्मभूतअवस्था हो जानेपर संसारके सम्बन्धका तो सर्वथा त्याग हो जाता है? पर मैं ब्रह्म हूँ? मैं शान्त हूँ? मैं निर्विकार हूँ? ऐसा सूक्ष्म अहंभाव रह जाता है। यह अहंभाव जबतक रहता है? तबतक परिच्छिन्नता और पराधीनता रहती है। कारण कि यह अहंभाव प्रकृतिका कार्य है और प्रकृति पर है इसलिये पराधीनता रहती है। परमात्माकी तरफ आकृष्ट होनेसे? पराभक्ति होनेसे ही यह अहंभाव मिटता है (टिप्पणी प0 949.1)। इस अहंभावके सर्वथा मिटनेसे ही तत्त्वका वास्तविक बोध होता है।यावान् -- सातवें अध्यायके आरम्भमें भगवान्ने अर्जुनको समग्ररूप सुननेकी आज्ञा दी कि मेरेमें जिसका मन आसक्त हो गया है? जिसको मेरा ही आश्रय है? वह अनन्यभावसे मेरे साथ दृढ़तापूर्वक सम्बन्ध रखते हुए मेरे जिस समग्ररूपको जान लेता है? उसको तुम सुनो। यही बात भगवान्ने सातवें अध्यायके अन्तमें कही कि जरामरणसे मुक्ति पानके लिये जो मेरा आश्रय लेकर यत्न करते हैं? वे ब्रह्म? सम्पूर्ण अध्यात्म और सम्पूर्ण कर्मको अर्थात् सम्पूर्ण निर्गुणविषयको जान लेते हैं और अधिभूत? अधिदैव और अधियज्ञके सहित मुझको अर्थात् सम्पूर्ण सगुणविषयको जान लेते हैं।इस प्रकार निर्गुण और सगुणके सिवाय राम? कृष्ण? शिव? गणेश? शक्ति? सूर्य आदि अनेक रूपोंमें प्रकट होकर परमात्मा लीला करते हैं? उनको भी जान लेना -- यही पराभक्तिसे यावान् अर्थात् समग्ररूपको जानना है।यश्चास्मि तत्त्वतः -- वे ही परमात्मा अनेक रूपोंमें? अनेक आकृतियोंमें? अनेक शक्तियोंको साथ लेकर? अनेक कार्य करनेके लिये बारबार प्रकट होते हैं? और वे ही परमात्मा अनेक सम्प्रदायोंमें अपनीअपनी भावनाके अनुसार अनेक इष्टदेवोंके रूपमें कहे जाते हैं। वास्तवमें परमात्मा एक ही हैं। इस प्रकार मैं जो हूँ -- इसे तत्त्वसे जान लेता है।ततो मां तत्त्वतो ज्ञात्वा विशते तदनन्तरम् -- ऐसा मुझे तत्त्वसे जानकर तत्काल (टिप्पणी प0 949.2) मेरेमें प्रविष्ट हो जाता है अर्थात् मेरे साथ भिन्नताका जो भाव था? वह सर्वथा मिट जाता है।तत्त्वसे जाननेपर उसमें जो अनजानपना था? वह सर्वथा मिट जाता है और वह उस तत्त्वमें प्रविष्ट हो जाता है। यही पूर्णता है और इसीमें मनुष्यजन्मकी सार्थकता है।विशेष बातजीवका परमात्मामें प्रेम (रति? प्रीति या आकर्षण) स्वतः है। परन्तु जब यह जीव प्रकृतिके साथ सम्बन्ध जोड़ लेता है? तब वह परमात्मासे विमुख हो जाता है और उसका संसारमें आकर्षण हो जाता है। यह आकर्षण ही वासना? स्पृहा? कामना? आशा? तृष्णा आदि नामोंसे कहा जाता है।इस वासना आदिका जो विषय (प्रकृतिजन्य पदार्थ) है? वह क्षणभङ्गुर और परिवर्तनशील है तथा यह जीवात्मा स्वयं? नित्य और अपरिवर्तनशील है। परन्तु ऐसा होते हुए भी प्रकृतिके साथ तादात्म्य होनेसे यह परिवर्तनशीलमें आकृष्ट हो जाता है। इससे इसको मिलता तो कुछ नहीं? पर कुछ मिलेगा -- इस भ्रम? वासनाके कारण यह जन्ममरणके चक्करमें पड़ा हुआ महान् दुःख पाता रहता है। इससे छूटनेके लिये भगवान्ने योग बताया है। वह योग जडतासे सम्बन्धविच्छेद करके परमात्माके साथ नित्ययोगका अनुभव करा देता है।गीतामें मुख्यरूपसे तीन योग कहे हैं -- कर्मयोग? ज्ञानयोग और भक्तियोग। इन तीनोंपर विचार किया जाय तो भगवान्का प्रेम तीनों ही योगोंमें है। कर्मयोगमें उसको कर्तव्यरति कहते हैं अर्थात् वह रति कर्तव्य होती है -- स्वे स्वे कर्मण्यभिरतः (18। 45)। [कर्मयोगकी यह रति अन्तमें आत्मरतिमें परिणत हो जाती है (गीता 2। 55 3। 17) और जिस कर्मयोगीमें भक्तिके संस्कार हैं? उसकी यह रति भगवद्रतिमें परिणत हो जाती है।] ज्ञानयोगमें उसी प्रेमको आत्मरति कहते हैं अर्थात् वह रति स्वरूपमें होती है -- योऽन्तःसुखोऽन्तरारामः (5। 24)। और भक्तियोगमें उसी प्रेमको भगवद्रति कहते हैं अर्थात् वह रति भगवान्में होती है (टिप्पणी प0 950.1) -- तुष्यन्ति च रमन्ति च (10। 9)। इस प्रकार इन तीनों योगोंमें रति होनेपर भी गीतामें भगवद्रति की विशेषरूपसे महिमा गायी गयी है।तपस्वी? ज्ञानी और कर्मी -- इन तीनोंसे भी योगी (समतावाला) श्रेष्ठ है (गीता 6। 46)। तात्पर्य यह है कि जडतासे सम्बन्ध रखते हुए बड़ा भारी तप करनेपर? बहुतसे शास्त्रोंका (अनेक प्रकारका) ज्ञानसम्पादन करनेपर और यज्ञ? दान? तीर्थ आदिके बड़ेबड़े अनुष्ठान करनेपर जो कुछ प्राप्त होता है? वह सब अनित्य ही होता है? पर योगीको नित्यतत्त्वकी प्राप्ति होती है। अतः तपस्वी? ज्ञानी और कर्मी -- इन तीनोंसे योगी श्रेष्ठ है। इस प्रकारके कर्मयोगी? ज्ञानयोगी? हठयोगी? लययोगी आदि सब योगियोंमें भी भगवान्ने भक्तियोगी को सर्वश्रेष्ठ बताया है (गीता 6। 47)। यही भक्तियोगी भगवान्के समग्ररूपको जान लेता है। सांख्ययोगी भी पराभक्तिके द्वारा उस समग्ररूपको जान लेता है। उसी समग्ररूपका वर्णन यहाँ यावान् पदसे हुआ है (टिप्पणी प0 950.2)।इस प्रकरणके आरम्भमें अन्तःकरणकी शुद्धिरूप सिद्धिको प्राप्त हुआ साधक जिस प्रकार ब्रह्मको प्राप्त होता है -- यह कहनेकी प्रतिज्ञा की और बताया कि ध्यानयोगके परायण होनेसे वह वैराग्यको प्राप्त होता है। वैराग्यसे अहंकार आदिका त्याग करके ममतारहित होकर शान्त होता है। तब वह ब्रह्मप्राप्तिका पात्र होता है। पात्र होते ही उसकी ब्रह्मभूतअवस्था हो जाती है। ब्रह्मभूतअवस्था होनेपर संसारके सम्बन्धसे जो रागद्वेष? हर्षशोक आदि द्वन्द्व होते थे? वे सर्वथा मिट जाते हैं तो वह सम्पूर्ण प्राणियोंमें सम हो जाता है। सम होनेपर,पराभक्ति प्राप्त हो जाती है। वह पराभक्ति ही वास्तविक प्रीति है। उस प्रीतिसे परमात्माके समग्ररूपका बोध हो जाता है। बोध होते ही उस तत्त्वमें प्रवेश हो जाता है -- विशते तदनन्तरम्।अनन्यभक्तिसे तो मनुष्य भगवान्को तत्त्वसे जान सकता है? उनमें प्रविष्ट हो सकता है और उनके दर्शन भी कर सकता है (गीता 11। 54) परन्तु सांख्ययोगी भगवान्को तत्त्वसे जानकर उनमें प्रविष्ट तो होता है? पर भगवान् उसको दर्शन देनेमें बाध्य नहीं होते। कारण कि उसकी साधना पहलेसे ही विवेकप्रधान रही है? इसलिये उसको दर्शनकी इच्छा नहीं होती। दर्शन न होनेपर भी उसमें कोई कमी नहीं रहती अतः कमी माननी नहीं चाहिये।यहाँ उस तत्त्वमें प्रविष्ट हो जाना ही अनिर्वचनीय प्रेमकी प्राप्ति है। इसी प्रेमको नारदभक्तिसूत्रमें प्रतिक्षण वर्धमान कहा है (टिप्पणी प0 951)। इस प्रेममें सर्वथा पूर्णता हो जाती है अर्थात् उसके लिये करना? जानना और पाना कुछ भी बाकी नहीं रहता। इसलिये न करनेका राग रहता है? न जाननेकी जिज्ञासा रहती है? न जीनेकी आशा रहती है? न मरनेका भय रहता है और न पानेका लालच ही रहता है।जबतक भगवान्में पराभक्ति अर्थात् परम प्रेम नहीं होता? तबतक ब्रह्मभूतअवस्थामें भी मैं ब्रह्म हूँ यह सूक्ष्म अहंकार रहता है। जबतक लेशमात्र भी अहंकार रहता है? तबतक परिच्छिन्नताका अत्यन्त अभाव नहीं होता। परन्तु मैं ब्रह्म हूँ यह सूक्ष्म अहंभाव तबतक जन्ममरणका कारण नहीं बनता? जबतक उसमें प्रकृतिजन्य गुणोंका सङ्ग नहीं होता क्योंकि गुणोंका सङ्ग होनेसे ही बन्धन होता है -- कारणं गुणसङ्गोऽस्य सदसद्योनिजन्मसु (गीता 13। 21)। उदाहरणार्थ -- गाढ़ नींदसे जगनेपर साधारण मनुष्यमात्रको सबसे पहले यह अनुभव होता है कि मैं हूँ। ऐसा अनुभव होते ही जब नाम? रूप? देश? काल जाति आदिके साथ स्वयंका सम्बन्ध जुड़ जाता है? तब मैं हूँ यह अहंभाव शुभअशुभ कर्मोंका कारण बन जाता है? जिससे जन्ममरणका चक्कर चल पड़ता है। परन्तु जो ऊँचे दर्जेका साधक होता है अर्थात् जिसकी निरन्तर ब्रह्मभूतअवस्था रहती है? उसके सात्त्विक ज्ञान (18। 20) में सब जगह ही अपने स्वरूपका बोध रहता है। परन्तु जबतक साधकका सत्त्वगुणके साथ सम्बन्ध रहता है? तबतक नींदसे जगनेपर तत्काल मैं ब्रह्म हूँ अथवा सब कुछ एक परमात्मा ही है -- ऐसी वृत्ति पकड़ी जाती है और मालूम होता है कि नींदमें यह वृत्ति छूट गयी थी? मानो उसकी भूल हो गयी थी और अब पीछे उस तत्त्वकी जागृति हो गयी है? स्मृति आ गयी है। गुणातीत हो जानेपर अर्थात् गुणोंसे सर्वथा सम्बन्धविच्छेद होनेपर विस्मृति और स्मृति -- ऐसी दो अवस्थाएँ नहीं होतीं अर्थात् नींदमें भूल हो गयी और अब स्मृति आ गयी -- ऐसा अनुभव नहीं होता? प्रत्युत नींद तो केवल अन्तःकरणमें आयी थी? अपनेमें नहीं? अपना स्वरूप तो ज्योंकात्यों रहा -- ऐसा अनुभव रहता है। तात्पर्य यह है कि निद्राका आना और उससे जगना -- ये दोनों प्रकृतिमें ही हैं? ऐसा उसका स्पष्ट अनुभव रहता है। इसी अवस्थाको चौदहवें अध्यायके बाईसवें श्लोकमें कहा है कि प्रकाश अर्थात् नींदसे जगना और मोह अर्थात् नींदका आना -- इन दोनोंमें गुणातीत पुरुषके किञ्चिन्मात्र भी रागद्वेष नहीं होते। सम्बन्ध -- पहले श्लोकमें अर्जुनने संन्यास और त्यागके तत्त्वके विषयमें पूछा तो उसके उत्तरमें भगवान्ने चौथेसे बारहवें श्लोकतक कर्मयोगका और इकतालीसवेंसे अड़तालीसवें श्लोकतक कर्मयोगका तथा संक्षेपमें भक्तियोगका वर्णन किया और तेरहवेंसे चालीसवें श्लोकतक विचारप्रधान सांख्ययोगका तथा उन्चासवेंसे पचपनवें श्लोकतक ध्यानप्रधान सांख्ययोगका एवं संक्षेपमें पराभक्तिकी प्राप्तिका वर्णन किया। अब भगवान् शरणागतिकी प्रधानतावाले भक्तियोगका वर्णन आरम्भ करते हैं।
।।18.55।।उस पराभक्तिसे मेरेको, मैं जितना हूँ और जो हूँ -- इसको तत्त्वसे जान लेता है तथा मेरेको तत्त्वसे जानकर फिर तत्काल मेरेमें प्रविष्ट हो जाता है।
सर्वकर्माण्यपि सदा कुर्वाणो मद्व्यपाश्रयः। मत्प्रसादादवाप्नोति शाश्वतं पदमव्ययम् ॥
।।18.56।। व्याख्या -- मद्व्यपाश्रयः -- कर्मोंका? कर्मोंके फलका? कर्मोंके पूरा होने अथवा न होनेका? किसी घटना? परिस्थिति? वस्तु? व्यक्ति आदिका आश्रय न हो। केवल मेरा ही आश्रय (सहारा) हो। इस तरह जो सर्वथा मेरे ही परायण हो जाता है? अपना स्वतन्त्र कुछ नहीं समझता? किसी भी वस्तुको अपनी नहीं मानता? सर्वथा मेरे आश्रित रहता है? ऐसे भक्तको अपने उद्धारके लिये कुछ करना नहीं पड़ता। उसका उद्धार मैं कर देता हूँ (गीता 12। 7) उसको अपने जीवननिर्वाह या साधनसम्बन्धी किसी बातकी कमी नहीं रहती सबकी मैं पूर्ति कर देता हूँ (गीता 9। 22) -- यह मेरा सदाका एक विधान है? नियम है? जो कि सर्वथा शरण हो जानेवाले हरेक प्राणीको प्राप्त हो सकता है (गीता 9। 30 -- 32)।सर्वकर्माण्यपि सदा कुर्वाणः -- यहाँ कर्माणि पदके साथ सर्व और कुर्वाणः पदके साथ सदा पद देनेका तात्पर्य है कि जिस ध्यानपरायण सांख्ययोगीने शरीर? वाणी और मनका संयमन कर लिया है अर्थात् जिसने शरीर आदिकी क्रियाओंको संकुचित कर लिया है और एकान्तमें रहकर सदा ध्यानयोगमें लगा रहता है? उसको जिस पदकी प्राप्ति होती है? उसी पदको लौकिक? पारलौकिक? सामाजिक? शारीरिक आदि सम्पूर्ण कर्तव्यकर्मोंको हमेशा करते हुए भी मेरा आश्रय लेनेवाला भक्त मेरी कृपासे प्राप्त कर लेता है।हरेक व्यक्तिको यह बात तो समझमें आ जाती है कि जो एकान्तमें रहता है और साधनभजन करता है? उसका कल्याण हो जाता है परन्तु यह बात समझमें नहीं आती कि जो सदा मशीनकी तरह संसारका सब काम करता है? उसका कल्याण कैसे होगा उसका कल्याण हो जाय? ऐसी कोई युक्ति नहीं दीखती क्योंकि ऐसे तो सब लोग कर्म करते ही रहते हैं। इतना ही नहीं? मात्र जीव कर्म करते ही रहते हैं? पर उन सबका कल्याण होता हुआ दीखता नहीं और शास्त्र भी ऐसा कहता नहीं इसके उत्तरमें भगवान् कहते हैं -- मत्प्रसादात्। तात्पर्य यह है कि जिसने केवल मेरा ही आश्रय ले लिया है? उसका कल्याण मेरी कृपासे हो जायगा? कौन है मना करनेवालायद्यपि प्राणिमात्रपर भगवान्का अपनापन और कृपा सदासर्वदा स्वतःसिद्ध है? तथापि यह मनुष्य जबतक असत् संसारका आश्रय लेकर भगवान्से विमुख रहता है? तबतक भगवत्कृपा उसके लिये फलीभूत नहीं होती अर्थात् उसके काममें नहीं आती। परन्तु यह मनुष्य भगवान्का आश्रय लेकर ज्योंज्यों दूसरा आश्रय छोड़ता जाता है? त्योंहीत्यों भगवान्का आश्रय दृढ़ होता चला जाता है? और ज्योंज्यों भगवान्का आश्रय दृढ़ होता जाता है? त्योंहीत्यों भगवत्कृपाका अनुभव होता जाता है। जब सर्वथा भगवान्का आश्रय ले लेता है? तब उसे भगवान्की कृपाका पूर्ण अनुभव हो जाता है।अवाप्नोति शाश्वतं पदमव्ययम् -- स्वतःसिद्ध परमपदकी प्राप्ति अपने कर्मोंसे? अपने पुरुषार्थसे अथवा अपने साधनसे नहीं होती। यह तो केवल भगवत्कृपासे ही होती है। शाश्वत अव्ययपद सर्वोत्कृष्ट है। उसी परमपदको भक्तिमार्गमें परमधाम? सत्यलोक? वैकुण्ठलोक? गोलोक? साकेतलोक आदि कहते हैं और ज्ञानमार्गमें विदेहकैवल्य? मुक्ति? स्वरूपस्थिति आदि कहते हैं। वह परमपद तत्त्वसे एक होते हुए भी मार्गों और उपासनाओंका भेद होनेसे उपासकोंकी दृष्टिसे भिन्नभिन्न कहा जाता है (गीता 8। 21 14। 27)। भगवान्का चिन्मय लोक एक देशविशेषमें होते हुए भी सब जगह व्यापकरूपसे परिपूर्ण है। जहाँ भगवान् हैं? वहीं उनका लोक भी है क्योंकि भगवान् और उनका लोक तत्त्वसे एक ही हैं। भगवान् सर्वत्र विराजमान हैं अतः उनका लोक भी सर्वत्र विराजमान (सर्वव्यापी) है। जब भक्तकी अनन्य निष्ठा सिद्ध हो जाती है? तब परिच्छिन्नताका अत्यन्त अभाव हो जाता है और वही लोक उसके सामने प्रकट हो जाता है अर्थात् उसे यहाँ जीतेजी ही उस लोककी दिव्य लीलाओंका अनुभव होने लगता है। परन्तु जिस भक्तकी ऐसी धारणा रहती है कि वह दिव्य लोक एक देशविशेषमें ही है? तो उसे उस लोककी प्राप्ति शरीर छोड़नेपर ही होती है। उसे लेनेके लिये भगवान्के पार्षद आते हैं और कहींकहीं स्वयं भगवान् भी आते हैं। सम्बन्ध -- पूर्वश्लोकमें अपना सामान्य विधान (नियम) बताकर अब भगवान् आगेके श्लोकमें अर्जुनके लिये विशेषरूपसे आज्ञा देते हैं।
।।18.56।।मेरा आश्रय लेनेवाला भक्त सदा सब कर्म करता हुआ भी मेरी कृपासे शाश्वत अविनाशी पदको प्राप्त हो जाता है।
चेतसा सर्वकर्माणि मयि संन्यस्य मत्परः। बुद्धियोगमुपाश्रित्य मच्चित्तः सततं भव ॥
।।18.57।। व्याख्या -- [इस श्लोकमें भगवान्ने चार बातें बतायी हैं --,(1) चेतसा सर्वकर्माणि मयि संन्यस्य -- सम्पूर्ण कर्मोंको चित्तसे मेरे अर्पण कर दे।(2) मत्परः -- स्वयंको मेरे अर्पित कर दे।(3) बुद्धियोगमुपाश्रित्य -- समताका आश्रय लेकर संसारसे सम्बन्धविच्छेद कर ले।(4) मच्चितः सततं भव -- निरन्तर मेरेमें चित्तवाला हो जा अर्थात् मेरे साथ अटल सम्बन्ध कर ले।]चेतसा सर्वकर्माणि मयि संन्यस्य -- चित्तसे कर्मोंको अर्पित करनेका तात्पर्य है कि मनुष्य चित्तसे यह दृढ़तासे मान ले कि मन? बुद्धि? इन्द्रियाँ? शरीर आदि और संसारके व्यक्ति? पदार्थ? घटना? परिस्थिति आदि सब भगवान्के ही हैं। भगवान् ही इन सबके मालिक हैं। इनमेंसे कोई भी चीज किसीकी व्यक्तिगत नहीं है। केवल इन वस्तुओंका सदुपयोग करनेके लिये ही भगवान्ने व्यक्तिगत अधिकार दिया है। इस दिये हुए अधिकारको भी भगवान्के अर्पण कर देना है।शरीर? इन्द्रियाँ? मन आदिसे जो कुछ शास्त्रविहित सांसारिक या पारमार्थिक क्रियाएँ होती हैं? वे सब भगवान्की मरजीसे ही होती हैं। मनुष्य तो केवल अहंकारके कारण उनको अपनी मान लेता है। उन क्रियाओँमें जो अपनापन है? उसे भी भगवान्के अर्पण कर देना है क्योंकि वह अपनापन केवल मूर्खतासे माना हुआ है? वास्तवमें है नहीं। इसलिये उनमें अपनेपनका भाव बिलकुल उठा देना चाहिये और उन सबपर भगवान्की मुहर लगा देनी चाहिये।मत्परः -- भगवान् ही मेरे परम आश्रय हैं? उनके सिवाय मेरा कुछ नहीं है? मेरेको करना भी कुछ नहीं है? पाना भी कुछ नहीं है? किसीसे लेना भी कुछ नहीं है अर्थात् देश? काल? वस्तु? व्यक्ति? घटना? परिस्थिति आदिसे मेरा किञ्चिन्मात्र कोई प्रयोजन नहीं है -- ऐसा अनन्यभाव हो जाना ही भगवान्के परायण होना है।एक बात खास ध्यान देनेकी है -- रुपयेपैसे? कुटुम्ब? शरीर आदिको मनुष्य अपना मानते हैं और मनमें यह समझते हैं कि हम इनके मालिक बन गये? हमारा इनपर आधिपत्य है परन्तु वास्तवमें यह बात बिलकुल झूठी है? कोरा वहम है और बड़ा भारी धोखा है। जो किसी चीजको अपनी मान लेता है? वह उस चीजका गुलाम बन जाता है और वह चीज उसका मालिक बन जाती है। फिर उस चीजके बिना वह रह नहीं सकता। अतः जिन चीजोंको मनुष्य अपनी मान लेता है? वे सब उसपर चढ़ जाती हैं और वह तुच्छ हो जाता है। वह चीज चाहे रुपया हो? चाहे कुटुम्बी हो? चाहे शरीर हो? चाहे विद्याबुद्धि आदि हो। ये सब चीजें प्राकृत हैं और अपनेसे भिन्न हैं? पर हैं। इनके अधीन होना ही पराधीन होना है।भगवान् स्वकीय हैं? अपने हैं। उनको मनुष्य अपना मानेगा? तो वे मनुष्यके वशमें हो जायँगे। भगवान्के हृदयमें भक्तका जितना आदर है? उतना आदर करनेवाला संसारमें दूसरा कोई नहीं है। भगवान् भक्तके दास हो जाते हैं और उसे अपना मुकुटमणि बना लेते हैं -- मैं तो हूँ भगतनका दास भगत मेरे मुकुटमणि? परन्तु संसार मनुष्यका दास बनकर उसे अपना मुकुटमणि नहीं बनायेगा। वह तो उसे अपना दास बनाकर पददलित ही करेगा। इसलिये केवल भगवान्के शरण होकर सर्वथा उन्हींके परायण हो जाना चाहिये।बुद्धियोगमुपाश्रित्य -- गीताभरमें देखा जाय तो समताकी बड़ी भारी महिमा है। मनुष्यमें एक समता आ गयी तो वह ज्ञानी? ध्यानी? योगी? भक्त आदि सब कुछ बन गया। परन्तु यदि उसमें समता नहीं आयी तो अच्छेअच्छे लक्षण आनेपर भी भगवान् उसको पूर्णता नहीं मानते। वह समता मनुष्यमें स्वाभाविक रहती है। केवल आनेजानेवाली परिस्थितियोंके साथ मिलकर वह सुखीदुःखी हो जाता है। इसलिये उनमें मनुष्य सावधान रहे कि आनेजानेवाली परिस्थितिके साथ मैं नहीं हूँ। सुख आया? अनुकूल परिस्थिति आयी तो भी मैं हूँ और सुख चला गया? अनुकूल परिस्थिति चली गयी तो भी मैं हूँ। ऐसे ही दुःख आया? प्रतिकूल परिस्थिति आयी तो भी मैं हूँ और दुःख चला गया? प्रतिकूल परिस्थिति चली गयी तो भी मैं हूँ। अतः सुखदुःखमें? अनुकूलताप्रतिकूलतामें? हानिलाभमें मैं सदैव ज्योंकात्यों रहता हूँ। परिस्थितियोंके बदलनेपर भी मैं नहीं बदलता? सदा वही रहता हूँ। इस तरह अपनेआपमें स्थित रहे। अपनेआपमें स्थित रहनेसे सुखदुःख आदिमें समता हो जायगी। यह समता ही भगवान्की आराधना है -- समत्वमाराधनमच्युतस्य (विष्णुपुराण 1। 17। 90)। इसीलिये यहाँ भगवान् बुद्धियोग अर्थात् समताका आश्रय लेनेके लिये कहते हैं।मच्चित्तः सततं भव -- जो अपनेको सर्वथा भगवान्के समर्पित कर देता है? उसका चित्त भी सर्वथा भगवान्के चरणोंमें समर्पित हो जाता है। फिर उसपर भगवान्का जो स्वतःस्वाभाविक अधिकार है? वह प्रकट हो जाता है और उसके चित्तमें स्वयं भगवान् आकर विराजमान हो जाते हैं। यही मच्चित्तः होना है।मच्चित्तः पदके साथ सततम् पद देनेका अर्थ है कि निरन्तर मेरेमें (भगवान्में) चित्तवाला हो जा। भगवान्का निरन्तर चिन्तन तभी होगा? जब मैं भगवान्का हूँ इस प्रकार अहंता भगवान्में लग जायगी। अहंता भगवान्में लग जानेपर चित्त स्वतःस्वाभाविक भगवान्में लग जाता है। जैसे? शिष्य बननेपर मैं गुरुका हूँ इस प्रकार अहंता गुरुमें लग जानेपर गुरुकी याद निरन्तर बनी रहती है। गुरुका सम्बन्ध अहंतामें बैठ जानेके कारण इस सम्बन्धकी याद आये तो भी याद है और याद न आये तो भी याद है क्योंकि स्वयं निरन्तर रहता है। इसमें भी देखा जाय तो गुरुके साथ उसने खुद सम्बन्ध जोड़ा है परन्तु भगवान्के साथ इस जीवका स्वतःसिद्ध नित्य सम्बन्ध है। केवल संसारके साथ सम्बन्ध जोड़नेसे ही नित्य सम्बन्धकी विस्मृति हुई है। उस विस्मृतिको मिटानेके लिये भगवान् कहते हैं कि निरन्तर मेरेमें चित्तवाला हो जा।,साधक कोई भी सांसारिक कामधंधा करे? तो उसमें यह एक सावधानी रखे कि अपने चित्तको उस कामधंधेमें द्रवित न होने दे? चित्तको संसारके साथ घुलनेमिलने न दे अर्थात् तदाकार न होने दे? प्रत्युत उसमें अपने चित्तको कठोर रखे। परन्तु भगवन्नामका जप? कीर्तन? भगवत्कथा? भगवच्चिन्तन आदि भगवत्सम्बन्धी कार्योंमें चित्तको द्रवित करता रहे? तल्लीन करता रहे? उस रसमें चित्तको तरान्तर करता रहे (टिप्पणी प0 954.1)। इस प्रकार करते रहनेसे साधक बहुत जल्दी भगवान्में चित्तवाला हो जायगा।प्रेमसम्बन्धी विशेष बातचित्तसे सब कर्म भगवान्के अर्पण करनेसे संसारसे नित्यवियोग हो जाता है (टिप्पणी प0 954.2) और भगवान्के परायण होनेसे नित्ययोग (प्रेम) हो जाता है। नित्ययोगमें योग? नित्ययोगमें वियोग? वियोगमें नित्ययोग और वियोगमें वियोग -- ये चार अवस्थाएँ चित्तकी वृत्तियोंको लेकर होती हैं। इन चारों अवस्थाओंको इस प्रकार समझना चाहिये -- जैसे? श्रीराधा और श्रीकृष्णका परस्पर मिलन होता है? तो यह नित्ययोगमें योग है। मिलन होनेपर भी श्रीजीमें ऐसा भाव आ जाता है कि प्रियतम कहीं चले गये हैं और वे एकदम कह उठती हैं कि प्यारे तुम कहाँ चले गये तो यह नित्ययोगमें वियोग है। श्यामसुन्दर सामने नहीं हैं? पर मनसे उन्हींका गाढ़ चिन्तन हो रहा है और वे मनसे प्रत्यक्ष मिलते हुए दीख रहे हैं? तो यह वियोगमें नित्ययोग है। श्यामसुन्दर थोड़े समयके लिये सामने नहीं आये? पर मनमें ऐसा भाव है कि बहुत समय बीत गया? श्यामसुन्दर मिले नहीं? क्या करूँ कहाँ जाऊँ श्यामसुन्दर कैसे मिलें तो यह वियोगमें वियोग है। वास्तवमें इन चारों अवस्थाओंमें भगवान्के साथ नित्ययोग ज्योंकात्यों बना रहता है? वियोग कभी होता ही नहीं? हो सकता ही नहीं और होनेकी संभावना भी नहीं। इसी नित्ययोगको प्रेम कहते हैं क्योंकि प्रेममें प्रेमी और प्रेमास्पद दोनों अभिन्न रहते हैं। वहाँ भिन्नता कभी हो ही नहीं सकती। प्रेमका आदानप्रदान,करनेके लिये ही भक्त और भगवान्में संयोगवियोगकी लीला हुआ करती है।यह प्रेम प्रतिक्षण वर्धमान किस प्रकार है जब प्रेमी और प्रेमास्पद परस्पर मिलते हैं? तब प्रियतम पहले चले गये थे? उनसे वियोग हो गया था अब कहीं ये फिर न चले जायँ (टिप्पणी प0 954.3) इस भावके कारण प्रेमास्पदके मिलनेमें तृप्ति नहीं होती? सन्तोष नहीं होता। वे चले जायँगे -- इस बातको लेकर मन ज्यादा खिंचता है। इसलिये इस प्रेमको प्रतिक्षण वर्धमान बताया है।प्रेम(भक्ति)में चार प्रकारका रस अथवा रति होती है -- दास्य? सख्य? वात्सल्य और माधुर्य। इन रसोंमें दास्यसे सख्य? सख्यसे वात्सल्य और वात्सल्यसे माधुर्यरस श्रेष्ठ है क्योंकि इनमें क्रमशः भगवान्के ऐश्वर्यकी विस्मृति ज्यादा होती चली जाती है। परन्तु जब इन चारोंमेंसे कोई एक भी रस पूर्णतामें पहुँच जाता है? तब उसमें दूसरे रसोंकी कमी नहीं रहती अर्थात् उसमें सभी रस आ जाते हैं। जैसे? दास्यरस पूर्णतामें पहुँच जाता है तो उसमें सख्य? वात्सल्य और माधुर्य -- तीनों रस आ जाते हैं। यही बात अन्य रसोंके विषयमें भी समझनी चाहिये। कारण यह है कि भगवान् पूर्ण हैं? उनका प्रेम भी पूर्ण है और परमात्माका अंश होनेसे जीव स्वयं भी पूर्ण है। अपूर्णता तो केवल संसारके सम्बन्धसे ही आती है। इसलिये भगवान्के साथ किसी भी रीतिसे रति हो जायगी तो वह पूर्ण हो जायगी? उसमें कोई कमी नहीं रहेगी।दास्य रतिमें भक्तका भगवान्के प्रति यह भाव रहता है कि भगवान् मेरे स्वामी हैं और मैं उनका सेवक हूँ। मेरेपर उनका पूरा अधिकार है। वे चाहे जो करें? चाहे जैसी परिस्थितिमें रखें और मेरेसे चाहे जैसा काम लें। मेरेपर अत्यधिक अपनापन होनेसे ही वे बिना मेरी सम्मति लिये ही मेरे लिये सब विधान करते हैं।सख्य रतिमें भक्तका भगवान्के प्रति यह भाव रहता है कि भगवान् मेरे सखा हैं और मैं उनका सखा हूँ। वे मेरे प्यारे हैं और मैं उनका प्यारा हूँ। उनका मेरेपर पूरा अधिकार है और मेरा उनपर पूरा अधिकार है। इसलिये मैं उनकी बात मानता हूँ? तो मेरी भी बात उनको माननी पड़ेगी।वात्सल्य रतिमें भक्तका अपनेमें स्वामिभाव रहता है कि मैं भगवान्की माता हूँ या उनका पिता हूँ अथवा उनका गुरु हूँ और वह तो हमारा बच्चा है अथवा शिष्य है इसलिये उसका पालनपोषण करना है। उसकी निगरानी भी रखनी है कि कहीं वह अपना नुकसान न कर ले जैसे -- नन्दबाबा और यशोदा मैया कन्हैयाका खयाल रखते हैं और कन्हैया वनमें जाता है तो उसकी निगरानी रखनेके लिये दाऊजीको साथमें भेजते हैंमाधुर्य (टिप्पणी प0 955) रतिमें भक्तको भगवान्के ऐश्वर्यकी विशेष विस्मृति रहती है अतः इस रतिमें भक्त भगवान्के साथ अपनी अभिन्नता (घनिष्ठ अपनापन) मानता है। अभिन्नता माननेसे उनके लिये सुखदायी सामग्री जुटानी है? उन्हें सुखआराम पहुँचाना है? उनको किसी तरहकी कोई तकलीफ न हो -- ऐसा भाव बना रहता है।प्रेमरस अलौकिक है? चिन्मय है। इसका आस्वादन करनेवाले केवल भगवान् ही हैं। प्रेममें प्रेमी और प्रेमास्पद दोनों ही चिन्मयतत्त्व होते हैं। कभी प्रेमी प्रेमास्पद बन जाता है और कभी प्रेमास्पद प्रेमी हो जाता है। अतः एक चिन्मयतत्त्व ही प्रेमका आस्वादन करनेके लिये दो रूपोंमें हो जाता है।प्रेमके तत्त्वको न समझनेके कारण कुछ लोग सांसारिक कामको ही प्रेम कह देते हैं। उनका यह कहना बिलकुल गलत है क्योंकि काम तो चौरासी लाख योनियोंके सम्पूर्ण जीवोंमें रहता है और उन जीवोंमें भी जो भूत? प्रेत? पिशाच होते हैं? उनमें काम (सुखभोगकी इच्छा) अत्यधिक होता है। परन्तु प्रेमके अधिकारी जीवन्मुक्त महापुरुष ही होते हैं।काममें लेनेहीलेनेकी भावना होती है और प्रेममें देनेहीदेनेकी भावना होती है। काममें अपनी इन्द्रियोंको तृप्त करने -- उनसे सुख भोगनेका भाव रहता है और प्रेममें अपने प्रेमास्पदको सुख पहुँचाने तथा सेवापरायण रहनेका भाव रहता है। काम केवल शरीरको लेकर ही होता है और प्रेम स्थूलदृष्टिसे शरीरमें दीखते हुए भी वास्तवमें चिन्मयतत्त्वसे ही होता है। काममें मोह (मूढ़भाव) रहता है और प्रेममें मोहकी गन्ध भी नहीं रहती। काममें संसार तथा संसारका दुःख भरा रहता है और प्रेममें मुक्ति तथा मुक्तिसे भी विलक्षण आनन्द रहता है। काममें जडता(शरीर? इन्द्रियाँ? आदि) की मुख्यता रहती है और प्रेममें चिन्मयता(चेतन स्वरूप) की मुख्यता रहती है। काममें राग होता है और प्रेममें त्याग होता है। काममें परतन्त्रता होती है और प्रेममें परतन्त्रताका लेश भी नहीं होता अर्थात् सर्वथा स्वतन्त्रता होती है। काममें वह मेरे काममें आ जाय ऐसा भाव रहता है और प्रेममें मैं उसके काममें आ जाऊँ ऐसा भाव रहता है। काममें कामी भोग्य वस्तुका गुलाम बन जाता है और प्रेममें स्वयं भगवान् प्रेमीके गुलाम बन जाते हैं। कामका रस नीरसतामें बदलता है और प्रेमका रस आनन्दरूपसे प्रतिक्षण बढ़ता ही रहता है। काम खिन्नतासे पैदा होता है और प्रेम प्रेमास्पदकी प्रसन्तासे प्रकट होता है। काममें अपनी प्रसन्नताका ही उद्देश्य रहता है। और प्रेममें प्रेमास्पदकी प्रसन्नताका ही उद्देश्य रहता है। काममार्ग नरकोंकी तरफ ले जाता है और प्रेममार्ग भगवान्की तरफ ले जाता है। काममें दो होकर दो ही रहते हैं अर्थात् द्वैधीभाव (भिन्नता या भेद) कभी मिटता नहीं और प्रेममें एक होकर दो होते हैं अर्थात् अभिन्नता कभी मिटती नहीं (टिप्पणी प0 956)। सम्बन्ध -- पूर्वश्लोकमें दी हुई आज्ञाको अब भगवान् आगेके दो श्लोकोंमें क्रमशः अन्वय और व्यतिरेकरीतिसे दृढ़ करते हैं।
।।18.57।।चित्तसे सम्पूर्ण कर्म मुझमें अर्पण करके, मेरे परायण होकर तथा समताका आश्रय लेकर निरन्तर मुझमें चित्तवाला हो जा।
मच्चित्तः सर्वदुर्गाणि मत्प्रसादात्तरिष्यसि। अथ चेत्त्वमहंकारान्न श्रोष्यसि विनङ्क्ष्यसि ॥
।।18.58।। व्याख्या -- मच्चित्तः सर्वदुर्गाणि मत्प्रसादात्तरिष्यसि -- भगवान् कहते हैं कि मेरेमें चित्तवाला होनेसे तू मेरी कृपासे सम्पूर्ण विघ्न? बाधा? शोक? दुःख आदिको तर जायगा अर्थात् उनको दूर करनेके लिये तुझे कुछ भी प्रयास नहीं करना पड़ेगा।भगवद्भक्तने अपनी तरफसे सब कर्म भगवान्के अर्पण कर दिये? स्वयं भगवान्के अर्पित हो गया? समताके आश्रयसे संसारकी संयोगजन्य लोलुपतासे सर्वथा विमुख हो गया और भगवान्के साथ अटल सम्बन्ध जोड़ लिया। यह सब कुछ हो जानेपर भी वास्तविक तत्त्वकी प्राप्तिमें यदि कुछ कमी रह जाय या सांसारिक लोगोंकी अपेक्षा अपनेमें कुछ विशेषता देखकर अभिमान आ जाय अथवा इस प्रकारके कोई सूक्ष्म दोष रह जायँ? तो उन दोषोंको दूर करनेकी साधकपर कोई जिम्मेवारी नहीं रहती? प्रत्युत उन दोषोंको? विघ्नबाधाओंको दूर करनेकी पूरी जिम्मेवारी भगवान्की हो जाती है। इसलिये भगवान् कहते हैं -- मत्प्रसादात्तरिष्यसि अर्थात् मेरी कृपासे सम्पूर्ण विघ्नबाधाओँको तर जायगा। इसका तात्पर्य यह निकला कि भक्त अपनी तरफसे? उसको जितना समझमें आ जाय? उतना पूरी सावधानीके साथ कर ले? उसके बाद जो कुछ कमी रह जायगी? वह भगवान्की कृपासे पूरी हो जायगी।मनुष्यका अगर कुछ अपराध हुआ है तो वह यही हुआ है कि उसने संसारके साथ अपना सम्बन्ध मान लिया और भगवान्से विमुख हो गया। अब उस अपराधको दूर करनेके लिये वह अपनी ओरसे संसारका सम्बन्ध तोड़कर भगवान्के सम्मुख हो जाय। सम्मुख हो जानेपर जो कुछ कमी रह जायगी? वह भगवान्की कृपासे पूरी हो जायगी। अब आगेका सब काम भगवान् कर लेंगे। तात्पर्य यह हुआ कि भगवत्कृपा प्राप्त करनेमें संसारके साथ किञ्चित् भी सम्बन्ध मानना और भगवान्से विमुख हो जाना -- यही बाधा थी। वह बाधा उसने मिटा दी तो अब पूर्णताकी प्राप्ति भगवत्कृपा अपनेआप करा देगी।जिसका प्रकृति और प्रकृतिके कार्य शरीरादिके साथ सम्बन्ध है? उसपर ही शास्त्रोंका विधिनिषेध? अपने वर्णआश्रमके अनुसार कर्तव्यका पालन आदि नियम लागू होते हैं और उसको उनउन नियमोंका पालन,जरूर करना चाहिये। कारण कि प्रकृति और प्रकृतिके कार्य शरीरादिके सम्बन्धको लेकर ही पापपुण्य होते हैं और उनका फल सुखदुःख भी भोगना पड़ता है। इसलिये उसपर शास्त्रीय मर्यादा और नियम विशेषतासे लागू होते हैं। परन्तु जो प्रकृति और प्रकृतिके कार्यसे सर्वथा ही विमुख होकर भगवान्के सम्मुख हो जाता है? वह शास्त्रीय विधिनिषेध और वर्णआश्रमोंकी मर्यादाका दास नहीं रहता। वह विधिनिषेधसे भी ऊँचा उठ जाता है अर्थात् उसपर विधिनिषेध लागू नहीं होते क्योंकि विधिनिषेधकी मुख्यता प्रकृतिके राज्यमें ही रहती है। प्रभुके राज्यमें तो शरणागतिकी ही मुख्यता रहती है।जीव साक्षात् परमात्माका अंश है (गीता 15। 7)। यदि वह केवल अपने अंशी परमात्माकी ही तरफ चलता है तो उसपर देव? ऋषि? प्राणी? मातापिता आदि आप्तजन और दादापरदादा आदि पितरोंका भी कोई ऋण नहीं रहता (टिप्पणी प0 957) क्योंकि शुद्ध चेतन अंशने इनसे कभी कुछ लिया ही नहीं। लेना तभी बनता है? जब वह जड शरीरके साथ अपना सम्बन्ध जोड़ लेता है और सम्बन्ध जोड़नेसे ही कमी आती है नहीं तो उसमें कभी कमी आती ही नहीं -- नाभावो विद्यते सतः (गीता 2। 16)। जब उसमें कभी कमी आती ही नहीं? तो फिर वह उनका ऋणी कैसे बन सकता है यही सम्पूर्ण विघ्नोंको तरना हैसाधनकालमें जीवननिर्वाहकी समस्या? शरीरमें रोग आदि अनेक विघ्नबाधाएँ आती हैं परन्तु उनके आनेपर भी भगवान्की कृपाका सहारा रहनेसे साधक विचलित नहीं होता। उसे तो उन विघ्नबाधाओंमें भगवान्की विशेष कृपा ही दीखती है। इसलिये उसे विघ्नबाधाएँ बाधारूपसे दीखती ही नहीं? प्रत्युत कृपारूपसे ही दीखती हैं।पारमार्थिक साधनमें विघ्नबाधाओंके आनेकी तथा भगवत्प्राप्तिमें आड़ लगनेकी सम्भावना रहती है। इसके लिये भगवान् कहते हैं कि मेरा आश्रय लेनेवालेके दोनों काम मैं कर दूँगा अर्थात् अपनी कृपासे साधनकी सम्पूर्ण विघ्नबाधाओंको भी दूर कर दूँगा और उस साधनके द्वारा अपनी प्राप्ति भी करा दूँगा।अथ चेत्त्वमहंकारान्न श्रोष्यसि विनङ्क्ष्यसि -- भगवान् अत्यधिक कृपालुताके कारण आत्मीयतापूर्वक अर्जुनसे कह रहे हैं कि अथ -- पक्षान्तरमें मैंने जो कुछ कहा है? उसे न मानकर अगर अहंकारके कारण अर्थात् मैं भी कुछ जानता हूँ? करता हूँ तथा मैं कुछ समझ सकता हूँ? कुछ कर सकता हूँ आदि भावोंके कारण तू मेरी बात नहीं सुनेगा? मेरे इशारेके अनुसार नहीं चलेगा? मेरा कहना नहीं मानेगा? तो तेरा पतन हो जायगा -- विनङ्क्ष्यसि।यद्यपि अर्जुनके लिये यह किञ्चिन्मात्र भी सम्भव नहीं है कि वह भगवान्की बात न सुने अथवा न माने? तथापि भगवान् कहते हैं कि चेत् -- अगर तू मेरी बात नहीं सुनेगा तो तेरा पतन हो जायगा। तात्पर्य यह है कि अगर तू अज्ञता अर्थात् अनजानपनेसे मेरी बात न सुने अथवा किसी भूलके कारण न सुने? तो यह सब क्षम्य है परन्तु यदि तू अहंकारसे मेरी बात नहीं सुनेगा तो तेरा पतन हो जायगा क्योंकि अहंकारसे मेरी बात न सुननेसे तेरा अभिमान बढ़ जायगा? जो सम्पूर्ण आसुरी सम्पत्तिका मूल है।पहले चौथे अध्यायमें भगवान् स्वयं अपने श्रीमुखसे कहकर आये हैं कि तू मेरा भक्त और प्रिय सखा है -- भक्तोऽसि मे सखा चेति (4। 3) और फिर नवें अध्यायमें उन्होंने कहा है कि हे अर्जुन तू प्रतिज्ञा कर कि मेरे भक्तका पतन नहीं होता -- कौन्तेय प्रतिजानीहि न मे भक्तः प्रणश्यति (9। 31)। इससे सिद्ध हुआ कि अर्जुन भगवान्के भक्त हैं अतः वे कभी भगवान्से विमुख नहीं हो सकते और उनका पतन भी कभी नहीं हो सकता। परन्तु वे अर्जुन भी यदि भगवान्की बात नहीं सुनेंगे तो भगवान्से विमुख हो जायँगे और भगवान्से विमुख होनेके कारण उनका भी पतन हो जायगा। तात्पर्य यह है कि भगवान्से विमुख होनेके कारण ही प्राणिका पतन होता है अर्थात् वह जन्ममरणके चक्करमें पड़ता है (गीता 9। 3 16। 20)।विशेष बातइसी अध्यायके छप्पनवें श्लोकमें भगवान्ने प्रथम पुरुष अवाप्नोति का प्रयोग करके सामान्य रीतिसे सबके लिये कहा कि मेरी कृपासे परमपदकी प्राप्ति हो जाती है? और यहाँ मध्यम पुरुष तरिष्यसि का प्रयोग करके अर्जुनके लिये कहते हैं कि मेरी कृपासे तू विघ्नबाधाओंको तर जायगा। इन दोनों बातोंका तात्पर्य यह है कि भगवान्की कृपामें जो शक्ति है? वह शक्ति किसी साधनमें नहीं है। इसका अर्थ यह नहीं कि साधन न करें? प्रत्युत परमात्मप्राप्तिके लिये साधन करना मनुष्यका स्वाभाविक धर्म होना चाहिये क्योंकि मनुष्यजन्म केवल परमात्मप्राप्तिके लिये ही मिला है। मनुष्यजन्मको प्राप्त करके भी जो परमात्माको प्राप्त नहीं करता? वह यदि ऊँचेसेऊँचे लोकोंमें भी चला जाय? तो भी उसे लौटकर संसार(जन्ममरण)में आना ही पड़ेगा (टिप्पणी प0 958) (गीता 8। 16)। इसलिये जब यह मनुष्यशरीर प्राप्त हुआ है? तो फिर मनुष्यको जीतेजी ही भगवत्प्राप्ति कर लेनी चाहिये और जन्ममरणसे रहित हो जाना चाहिये। कर्मयोगीके लिये भी भगवान्ने कहा है कि समतायुक्त पुरुष इस जीवितअवस्थामें ही पुण्य और पाप -- दोनोंसे रहित हो जाता है (गीता 2। 50)। तात्पर्य यह हुआ कि कर्मबन्धनसे सर्वथा रहित होना अर्थात् जन्ममरणसे रहित होना मनुष्यमात्रका परम ध्येय है।दसवें अध्यायके ग्यारहवें श्लोकमें भगवान्ने कहा है कि मैं अपनी कृपासे भक्तोंके अन्तःकरणमें ज्ञान प्रकाशित कर देता हूँ? और ग्यारहवें अध्यायके सैंतालीसवें श्लोकमें भगवान्ने कहा कि मैंने अपनी कृपासे ही विराट्रूप दिखाया है। उसी कृपाको लेकर भगवान् यहाँ कहते हैं कि मेरी कृपासे परमपदकी प्राप्ति हो जायगी (18। 56) और मेरी कृपासे ही सम्पूर्ण विघ्नोंको तर जायगा (18। 58)। परमपदको प्राप्त होनेपर किसी प्रकारकी विघ्नबाधा सामने आनेकी सम्भावना ही नहीं रहती। फिर भी सम्पूर्ण विघ्नबाधाओंको तरनेकी बात कहनेका तात्पर्य यह है कि अर्जुनके मनमें यह भय बैठा था कि युद्ध करनेसे मुझे पाप लगेगा युद्धके कारण कुलपरम्पराके नष्ट होनेसे पितरोंका पतन हो जायगा और इस प्रकार अनर्थपरम्परा बढ़ती ही जायगी हमलोग राज्यके लोभमें आकर इस महान् पापको करनेके लिये तैयार हो गये हैं? इसलिये मैं शस्त्र छोड़कर बैठ जाऊँ और धृतराष्ट्रके पक्षके लोग मेरेको मार भी दें? तो भी मेरा कल्याण ही होगा (गीता 1। 36 -- 46)। इन सभी बातोंको लेकर और अनेक जन्मोंके दोषोंको भी लेकर भगवान् अर्जुनसे कहते हैं कि मेरी कृपासे तू सब विघ्नोंको? पापोंको तर जायगा -- सर्वदुर्गाणि मत्प्रसादात्तरिष्यसि। भगवान्ने बहुवचनमें दुर्गाणि पद देकर भी उसके साथ सर्व शब्द और जोड़ दिया है। इसका तात्पर्य यह है कि मेरी कृपासे तेरा किञ्चिन्मात्र भी पाप नहीं रहेगा कोई भी बन्धन नहीं रहेगा और मेरी कृपासे सर्वथा शुद्ध होकर तू परमपदको प्राप्त हो जायगा।
।।18.58।।मेरेमें चित्तवाला होकर तू मेरी कृपासे सम्पूर्ण विघ्नोंको तर जायगा और यदि तू अहंकारके कारण मेरी बात नहीं सुनेगा तो तेरा पतन हो जायगा।
यदहंकारमाश्रित्य न योत्स्य इति मन्यसे। मिथ्यैष व्यवसायस्ते प्रकृतिस्त्वां नियोक्ष्यति ॥
।।18.59।। व्याख्या -- यदहंकारमाश्रित्य -- प्रकृतिसे ही महत्तत्त्व और महत्तत्त्वसे अहंकार पैदा हुआ है। उस अहंकारका ही एक विकृत अंश है -- मैं शरीर हूँ। इस विकृत अहंकारका आश्रय लेनेवाला पुरुष कभी भी क्रियारहित नहीं हो सकता। कारण कि प्रकृति हरदम क्रियाशील है? बदलनेवाली है? इसलिये उसके आश्रित रहनेवाला कोई भी मनुष्य कर्म किये बिना नहीं रह सकता (गीता 3। 5)।जब मनुष्य अहंकारपूर्वक क्रियाशील प्रकृतिके वशमें हो जाता है? तो फिर वह यह कैसे रह सकता है कि मैं अमक कर्म करूँगा और अमुक कर्म नहीं करूँगा अर्थात् प्रकृतिके परवश हुआ मनुष्य करना और न करना -- इन दोनोंसे छूटेगा नहीं। कारण कि प्रकृतिके परवश हुए मनुष्यका तो करना भी कर्म है और न करना भी कर्म है। परन्तु जब मनुष्य प्रकृतिके परवश नहीं रहता? उससे निर्लिप्त हो जाता है (जो कि इसका वास्तविक स्वरूप है)? तो फिर उसके लिये करना और न करना -- ऐसा कहना ही नहीं बनता। तात्पर्य यह है कि जो प्रकृतिके साथ सम्बन्ध रखे और कर्म न करना चाहे? ऐसा उसके लिये सम्भव नहीं है। परन्तु जिसने प्रकृतिसे सम्बन्धविच्छेद कर लिया है अथवा जो सर्वथा भगवान्के शरण हो गया है? उसको कर्म करनेके लिये बाध्य नहीं होना पड़ता।न योत्स्य इति मन्यसे -- दूसरे अध्यायमें अर्जुनने भगवान्के शरण होकर शिक्षाकी प्रार्थना की -- शिष्यस्तेऽहं शाधि मां त्वां प्रपन्नम् (2। 7) और उसके बाद अर्जुनने साफसाफ कह दिया कि मैं युद्ध नहीं करूँगा -- न योत्स्ये (2। 9)। यह बात भगवानको अच्छी नहीं लगी। भगवान् मनमें सोचते हैं कि यह पहले तो मेरे शरण हो गया और फिर इसने मेरे कुछ कहे बिना ही अपनी तरफसे साफसाफ कह दिया कि मैं युद्ध नहीं करूँगा? तो फिर यह मेरी शरणागति कहाँ रही यह तो अहंकारकी शरणागति हो गयी कारण कि वास्तविक शरणागत होनेपर मैं यह करूँगा? यह नहीं करूँगा ऐसा कहना ही नहीं बनता। भगवान्के शरणागत होनेपर तो भगवान् जैसा करायेंगे? वैसा ही करना होगा। इसी बातको लेकर भगवान्को हँसी आ गयी (2। 10)। परन्तु अर्जुनपर अत्यधिक कृपा और स्नेह होनेके कारण भगवान्ने उपदेश देना आरम्भ कर दिया? नहीं तो भगवान् वहींपर यह कह देते कि जैसा चाहता है? वैसा कर -- यथेच्छसि तथा कुरु (18। 63) परन्तु अर्जुनकी यह बात कि मैं युद्ध नहीं करूँगा भगवान्के भीतर खटक गयी। इसलिये भगवान्ने यहाँ अर्जुनके उन्हीं शब्दों -- न योत्स्ये का प्रयोग करके यह कहा है कि तू अहंकारके ही शरण है? मेरे शरण नहीं। अगर तू मेरे शरण हो गया होता तो युद्ध नहीं करूँगा ऐसा कहना बन ही नहीं सकता था। मेरे शरण होता तो मैं क्या करूँगा और क्या नहीं करूँगा इसकी जिम्मेवारी मेरेपर होती। इसके अलावा मेरे शरणागत होनेपर यह प्रकृति भी तुझे बाध्य नहीं कर पाती (गीता 7। 14)। यह त्रिगुणमयी माया अर्थात् प्रकृति उसीको बाध्य करती है? जो मेरे शरण नहीं हुआ है (गीता 7। 13) क्योंकि यह नियम है कि प्रकृतिके प्रवाहमें पड़ा हुआ प्राणी प्रकृतिके गुणोंके द्वारा सदा ही परवश होता है।यह एक बड़ी मार्मिक बात है कि मनुष्य जिन प्राकृत पदार्थोंको अपना मान लेते हैं? उन पदार्थोंके सदा ही परवश (पराधीन) हो जाते हैं। वे वहम तो यह रखते हैं कि हम इन पदार्थोंके मालिक हैं? पर हो जाते हैं उनके गुलाम परन्तु जिन पदार्थोंको अपना नहीं मानते? उन पदार्थोंके परवश नहीं होते। इसलिये मनुष्यको किसी भी प्राकृत पदार्थको अपना नहीं मानना चाहिये क्योंकि वे वास्तवमें अपने हैं ही नहीं। अपने तो वास्तवमें केवल भगवान् ही हैं। उन भगवान्को अपना माननेसे मनुष्यकी परवशता सदाके लिये समाप्त हो जाती है। तात्पर्य यह हुआ कि मनुष्य पदार्थों और क्रियाओँको अपनी मान्यता है तो सर्वथा परतन्त्र हो जाता है? और भगवान्को अपना मानता है और उनके अनन्य शरण होता है तो सर्वथा स्वतन्त्र हो जाता है। प्रभुके शरणागत होनेपर परतन्त्रता लेशमात्र भी नहीं रहती -- यह शरणागतिकी महिमा है। परन्तु जो प्रभुकी शरण न लेकर अहंकारकी शरण लेते हैं? वे मौतके मार्ग(संसार)में बह जाते हैं -- निवर्तन्ते मृत्युसंसारवर्त्मनि (9। 3)। इसी बातकी चेतावनी देते हुए भगवान् अर्जुनसे कह रहे हैं कि तू जो यह कहता है कि मैं युद्ध नहीं करूँगा? तो तेरा यह कहना? तेरी यह हेकड़ी चलेगी नहीं। तुझे क्षात्रप्रकृतिके परवश होकर युद्ध करना ही पड़ेगा।मिथ्यैष व्यवसायस्ते -- व्यवसाय अर्थात् निश्चय दो तरहका होता है -- वास्तविक और अवास्तविक। परमात्माके साथ अपना जो नित्य सम्बन्ध है? उसका निश्चय करना तो वास्तविक है और प्रकृतिके साथ मिलकर प्राकृत पदार्थोंका निश्चय करना अवास्तविक है। जो निश्चय परमात्माको लेकर होता है? उसमें स्वयंकी प्रधानता रहती है? और जो निश्चय प्रकृतिको लेकर होता है? उसमें अन्तःकरणकी प्रधानता रहती है। इसलिये भगवान् यहाँ अर्जुनसे कहते हैं कि अहंकारका अर्थात् प्रकृतिका आश्रय लेकर तू जो यह कह रहा है कि मैं युद्ध नहीं करूँगा? ऐसा तेरा (क्षात्रप्रकृतिके विरुद्ध) निश्चय अवास्तविक अर्थात् मिथ्या है? झूठा है। आश्रय परमात्माका ही होना चाहिये? प्रकृति और प्रकृतिके कार्य संसारका नहीं।यदि प्राणी यह निश्चय कर लेता है कि मैं परमात्माका ही हूँ और मुझे केवल परमात्माकी तरफ ही चलना है? तो उसका यह निश्चय वास्तविक अर्थात् सत्य है? नित्य है। इस निश्चयकी महिमा भगवान्ने नवें अध्यायके तीसवें श्लोकमें की है कि अगर दुराचारीसेदुराचारी मनुष्य भी अनन्यभावसे मेरा भजन करता है तो उसको दुराचारी नहीं मानना चाहिये प्रत्युत साधु ही मानना चाहिये क्योंकि वह वास्तविक निश्चय कर चुका है कि,मैं भगवान्का ही हूँ और भगवान्का ही भजन करूँगा।प्रकृतिस्त्वां नियोक्ष्यति -- इन पदोंसे भगवान् कहते हैं कि तेरा क्षात्रस्वभाव तुझे जबर्दस्ती युद्धमें लगा देगा। क्षत्रियका स्वभाव है -- शूरवीरता? युद्धमें पीठ न दिखाना (गीता 18। 43)। अतः धर्ममय युद्धका अवसर सामने आनेपर तू युद्ध किये बिना रह नहीं सकेगा। सम्बन्ध -- पूर्वश्लोकमें भगवान्ने अर्जुनसे कहा कि प्रकृति तुझे कर्ममें लगा देगी? अब आगेके श्लोकमें उसीका विवेचन करते हैं।
।।18.59।।अहंकारका आश्रय लेकर तू जो ऐसा मान रहा है कि मैं युद्ध नहीं करूँगा, तेरा यह निश्चय मिथ्या (झूठा) है; क्योंकि तेरी क्षात्र-प्रकृति तेरेको युद्धमें लगा देगी।
स्वभावजेन कौन्तेय निबद्धः स्वेन कर्मणा। कर्तुं नेच्छसि यन्मोहात्करिष्यस्यवशोपि तत् ॥
।।18.60।। व्याख्या -- स्वभावजेन कौन्तेय निबद्धः स्वेन कर्मणा -- पूर्वजन्ममें जैसे कर्म और गुणोंकी वृत्तियाँ रही हैं? इस जन्ममें जैसे मातापितासे पैदा हुए हैं अर्थात् मातापिताके जैसे संस्कार रहे हैं? जन्मके बाद जैसा देखासुना है? जैसी शिक्षा प्राप्त हुई है और जैसे कर्म किये हैं -- उन सबके मिलनेसे अपनी जो कर्म करनेकी एक आदत बनी है? उसका नाम स्वभाव है। इसको भगवान्ने स्वभावजन्य स्वकीय कर्म कहा है। इसीको स्वधर्म भी कहते हैं -- स्वधर्ममपि चावेक्ष्य न विकम्पितुमर्हसि (गीता 2। 31)।कर्तुं नेच्छसि यन्मोहात् करिष्यस्यवशोऽपि तत् -- स्वभावजन्य क्षात्रप्रकृतिसे बँधा हुआ तू मोहके कारण जो नहीं करना चाहता? उसको तू परवश होकर करेगा। स्वभावके अनुसार ही शास्त्रोंने कर्तव्यपालनकी आज्ञा दी है। उस आज्ञामें यदि दूसरोंके कर्मोंकी अपेक्षा अपने कर्मोंमें कमियाँ अथवा दोष दीखते हों? तो भी वे दोष बाधक (पापजनक) नहीं होते -- श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात्। (गीता 3। 35 18। 47)। उस स्वभावज कर्म (क्षात्रधर्म)के अनुसार तू युद्ध करनेके लिये परवश है। युद्धरूप कर्तव्यको न करनेका तेरा विचार मूढ़तापूर्वक किया गया है।जो जीवन्मुक्त महापुरुष होते हैं? उनका स्वभाव सर्वथा शुद्ध होता है। अतः उनपर स्वभावका आधिपत्य नहीं रहता अर्थात् वे स्वभावके परवश नहीं होते फिर भी वे किसी काममें प्रवृत्त होते हैं? तो अपनी प्रकृति(स्वभाव) के अनुसार ही काम करते हैं। परन्तु साधारण मनुष्य प्रकृतिके परवश होते हैं? इसलिये उनका स्वभाव उनको जबर्दस्ती कर्ममें लगा देता है (गीता 3। 33)। भगवान् अर्जुनसे कहते हैं कि तेरा क्षात्रस्वभाव भी तुझे जबर्दस्ती युद्धमें लगा देगा परन्तु उसका फल तेरे लिये बढ़िया नहीं होगा। यदि तू शास्त्र या सन्तमहापुरुषोंकी आज्ञासे अथवा मेरी आज्ञासे युद्धरूप कर्म करेगा? तो वही कर्म तेरे लिये कल्याणकारी हो जायगा। कारण कि शास्त्र अथवा मेरी आज्ञासे कर्मोंको करनेसे? उन कर्मोंमें जो रागद्वेष हैं? वे स्वाभाविक ही मिटते चले जायँगे क्योंकि तेरी दृष्टि आज्ञाकी तरफ रहेगी? रागद्वेषकी तरफ नहीं। अतः वे कर्म बन्धनकारक न होकर कल्याणकारक ही होंगे।विशेष बातगीतामें प्रकृतिकी परवशताकी बात सामान्यरूपसे कई जगह आयी है (जैसे -- 3। 5 8। 19 9। 8 आदि) परन्तु दो जगह प्रकृतिकी परवशताकी बात विशेषरूपसे आयी है -- प्रकृतिं यान्ति भूतानि (3। 33) और यहाँ प्रकृतिस्त्वां नियोक्ष्यति (18। 59) (टिप्पणी प0 960)। इससे स्वभावकी प्रबलता ही सिद्ध होती है क्योंकि कोई भी प्राणी जिसकिसी योनिमें भी जन्म लेता है? उसकी प्रकृति अर्थात् स्वभाव उसके साथमें रहता है। अगर उसका स्वभाव परम शुद्ध हो अर्थात् स्वभावमें सर्वथा असङ्गता हो तो उसका जन्म ही क्यों होगा यदि उसका जन्म होगा तो उसमें स्वभावकी मुख्यता रहेगी -- कारणं गुणसङ्गोऽस्य सदसद्योनिजन्मसु (गीता 13। 21)। जब स्वभावकी ही मुख्यता अथवा परवशता रहेगी और प्रत्येक क्रिया स्वभावके अनुसार ही होगी? तो फिर शास्त्रोंका विधिनिषेध किसपर लागू होगा गुरुजनोंकी शिक्षा किसके काम आयेगी और मनुष्य दुर्गुणदुराचारोंका त्याग करके सद्गुणसदाचारोंमें कैसे प्रवृत्त होगाउपर्युक्त प्रश्नोंका उत्तर यह है कि जैसे मनुष्य गङ्गाजीके उपर्युक्त प्रश्नोंका उत्तर यह है कि जैसे मनुष्य गङ्गाजीके प्रवाहको रोक तो नहीं सकता? पर उसके प्रवाहको मोड़ सकता है? घुमा सकता है। ऐसे ही मनुष्य अपने वर्णोचित स्वभावको छोड़ तो नहीं सकता? पर भगवत्प्राप्तिका उद्देश्य रखकर उसको रागद्वेषसे रहित परम शुद्ध? निर्मल बना सकता है। तात्पर्य यह हुआ कि स्वभावको शुद्ध बनानेमें मनुष्यमात्र सर्वथा सबल और स्वतन्त्र है? निर्बल और परतन्त्र नहीं है। निर्बलता और परतन्त्रता तो केवल रागद्वेष होनेसे प्रतीत होती है।अब इस स्वभावको सुधारनेके लिये भगवान्ने गीतामें कर्मयोग और भक्तियोगकी दृष्टिसे दो उपाय बताये हैं --,(1) कर्मयोगकी दृष्टिसे -- तीसरे अध्यायके चौंतीसवें श्लोकमें भगवान्ने बताया है कि मनुष्यके खास शत्रु रागद्वेष ही हैं। अतः रागद्वेषके वशमें नहीं होना चाहिये अर्थात् रागद्वेषको लेकर कोई भी कर्म नहीं करना चाहिये? प्रत्युत शास्त्रकी आज्ञाके अनुसार ही प्रत्येक कर्म करना चाहिये। शास्त्रके आज्ञानुसार अर्थात् शिष्य गुरुकी? पुत्र मातापिताकी? पत्नी पतिकी और नौकर मालिककी आज्ञाके अनुसार प्रसन्नतापूर्वक सब कर्म करता है तो उसमें रागद्वेष नहीं रहते। कारण कि अपने मनके अनुसार कर्म करनेसे ही रागद्वेष पुष्ट होते हैं। शास्त्र आदिकी आज्ञाके अनुसार कार्य करनेसे और कभी दूसरा नया कार्य करनेकी मनमें आ जानेपर भी शास्त्रकी आज्ञा न होनेसे हम वह कार्य नहीं करते तो उससे हमारा राग मिट जायगा और कभी कार्यको न करनेकी मनमें आ जानेपर भी शास्त्रकी आज्ञा होनेसे हम वह कार्य प्रसन्नतापूर्वक करते हैं तो उससे हमारा द्वेष मिट जाता है।(2) भक्तियोगकी दृष्टिसे -- जब मनुष्य ममतावाली वस्तुओंके सहित स्वयं भगवान्के शरण हो जाता है? तब उसके पास अपना करके कुछ नहीं रहता। वह भगवान्के हाथकी कठपुतली बन जाता है। फिर भगवान्की आज्ञाके अनुसार? उनकी इच्छाके अनुसार ही उसके द्वारा सब कार्य होते हैं? जिससे उसके स्वभावमें रहनेवाले रागद्वेष मिट जाते हैं।तात्पर्य यह हुआ कि कर्मयोगमें रागद्वेषके वशीभूत न होकर कार्य करनेसे स्वभाव शुद्ध हो जाता है (गीता 3। 34) और भक्तियोगमें भगवान्के सर्वथा अर्पित होनेसे स्वभाव शुद्ध हो जाता है (गीता 18। 62)। स्वभाव शुद्ध होनेसे बन्धनका कोई प्रश्न ही नहीं रहता।मनुष्य जो कुछ कर्म करता है? वह कभी रागद्वेषके वशीभूत होकर करता है और कभी सिद्धान्तके अनुसार करता है। रागद्वेषपूर्वक कर्म करनेसे रागद्वेष दृढ़ हो जाते हैं और फिर मनुष्यका वैसा ही स्वभाव बन जाता है। सिद्धान्तके अनुसार कर्म करनेसे उसका सिद्धान्तके अनुसार ही करनेका स्वभाव बन जाता है। जो मनुष्य परमात्मप्राप्तिका उद्देश्य रखकर शास्त्र और महापुरुषोंके सिद्धान्तके अनुसार कर्म करते हैं और जो परमात्माको प्राप्त हो गये हैं -- उन दोनों(साधकों और सिद्ध महापुरुषों) के कर्म दुनियाके लिये आदर्श होते हैं? अनुकरणीय होते हैं (गीता 3। 21)। सम्बन्ध -- जीव स्वयं परमात्माका अंश है और स्वभाव अंश है स्वयं स्वतःसिद्ध है और स्वभाव खुदका बनाया हुआ है स्वयं चेतन है और स्वभाव जड है -- ऐसा होनेपर भी जीव स्वभावके परवश कैसे हो जाता है इस प्रश्नके उत्तरमें भगवान् आगेका श्लोक कहते हैं।
।।18.60।।हे कुन्तीनन्दन ! अपने स्वभावजन्य कर्मसे बँधा हुआ तू मोहके कारण जो नहीं करना चाहता, उसको तू (क्षात्र-प्रकृतिके) परवश होकर करेगा।
ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति। भ्रामयन्सर्वभूतानि यन्त्रारूढानि मायया ॥
।।18.61।। व्याख्या -- ईश्वरः सर्वभूतानां ৷৷. यन्त्रारूढानि मायया -- इसका तात्पर्य यह है कि जो ईश्वर सबका शासक? नियामक? सबका भरणपोषण करनेवाला और निरपेक्षरूपसे सबका संचालक है? वह अपनी,शक्तिसे उन प्राणियोंको घुमाता है? जिन्होंने शरीरको मैं औरमेरा मान रखा है।जैसे? विद्युत्शक्तिसे संचालित यन्त्र -- रेलपर कोई आरूढ़ हो जाता है? चढ़ जाता है तो उसको परवशतासे रेलके अनुसार ही जाना पड़ता है। परन्तु जब वह रेलपर आरूढ़ नहीं रहता? नीचे उतर जाता है? तब उसको रेलके अनुसार नहीं जाना पड़ता। ऐसे ही जबतक मनुष्य शरीररूपी यन्त्रके साथ मैं और मेरेपनका समबन्ध रखता है? तबतक ईश्वर उसको उसके स्वभाव (टिप्पणी प0 962) के अनुसार संचालित करता रहता है और वह मनुष्य जन्ममरणरूप संसारके चक्रमें घूमता रहता है।शरीरके साथ मैंमेरेपनका सम्बन्ध होनेसे ही रागद्वेष पैदा होते हैं? जिससे स्वभाव अशुद्ध हो जाता है। स्वभावके अशुद्ध होनेपर मनुष्य प्रकृति अर्थात् स्वभावके परवश हो जाता है। परन्तु शरीरसे सर्वथा सम्बन्धविच्छेद होनेपर जब स्वभाव रागद्वेषसे रहित अर्थात् शुद्ध हो जाता है? तब प्रकृतिकी परवशता नहीं रहती। प्रकृति(स्वभाव)की परवशता न रहनेसे ईश्वरकी माया उसको संचालित नहीं करती।अब यहाँ यह शङ्का होती है कि जब ईश्वर ही हमारेको भ्रमण करवाता है? क्रिया करवाता है? तब यह काम करना चाहिये और यह काम नहीं करना चाहिये -- ऐसी स्वतंन्त्रता कहाँ रही क्योंकि यन्त्रारूढ़ होनेके कारण हम यन्त्रके और यन्त्रके संचालक ईश्वरके अधीन हो गये? परतन्त्र हो गये? फिर यन्त्रका संचालक (प्रेरक) जैसा करायेगा? वैसा ही होगा इसका समाधान इस प्रकार इस प्रकार है -- जैसे? बिजलीसे संचालित होनेवाले यन्त्र अनेक तरहके होते हैं। एक ही बिजलीसे संचालित होनेपर भी किसी यन्त्रमें बर्फ जम जाती है और किसी यन्त्रमें अग्नि जल जाती है अर्थात् उनमें एकदूसरेसे बिलकुल विरुद्ध काम होता है। परन्तु बिजलीका यह आग्रह नहीं रहता कि मैं तो केवल बर्फ ही जमाऊँगी अथवा केवल अग्नि ही जलाऊँगी। यन्त्रोंका भी ऐसा आग्रह नहीं रहता कि हम तो केवल बर्फ ही जमायेंगे अथवा केवल अग्नि ही जलायेंगे? प्रत्युत यन्त्र बनानेवाले कारीगरने यन्त्रोंको जैसा बना दिया है? उसके अनुसार उनमें स्वाभाविक ही बर्फ जमती है और अग्नि जलती है। ऐसे ही मनुष्य? पशु? पक्षी? देवता? यक्ष राक्षस आदि जितने भी प्राणी हैं? सब शरीररूपी यन्त्रोंपर चढ़े हुए हैं और उन सभी यन्त्रोंको ईश्वर संचालित करता है। उन अलगअलग शरीरोँमें भी जिस शरीरमें जैसा स्वभाव है? उस स्वभावके अनुसार वे ईश्वरसे प्रेरणा पाते हैं और कार्य करते हैं। तात्पर्य यह है कि उन शरीरोंसे मैंमेरेपनका सम्बन्ध माननेवालेका जैसा (अच्छा या मन्दा) स्वभाव होता है? उससे वैसी ही क्रियाएँ होती हैं। अच्छे स्वभाववाले (सज्जन) मनुष्यके द्वारा श्रेष्ठ क्रियाएँ होती हैं और मन्दे स्वभाववाले (दुष्ट) मनुष्यके द्वारा खराब क्रियाएँ होती हैं। इसलिये अच्छी या मन्दी क्रियाओंको करानेमें ईश्वरका हाथ नहीं है? प्रत्युत खुदके बनाये हुए अच्छे या मन्दे स्वभावका ही हाथ है।जैसे बिजली यन्त्रके स्वभावके अनुसार ही उसका संचालन करती है? ऐसे ही ईश्वर प्राणीके (शरीरमें स्थित) स्वभावके अनुसार उसका संचालन करते हैं। जैसा स्वभाव होगा? वैसे ही कर्म होंगे। इसमें एक बात विशेष ध्यान देनेकी है कि स्वभावको सुधारनेमें और बिगाड़नेमें सभी मनुष्य स्वतन्त्र हैं? कोई भी परतन्त्र नहीं है। परन्तु पशु? पक्षी? देवता आदि जितने भी मनुष्येतर प्राणी हैं? उनमें अपने स्वभावको सुधारनेका न अधिकार है और न स्वतन्त्रता ही है। मनुष्यशरीर अपना उद्धार करनेके लिये ही मिला है? इसलिये इसमें अपने स्वभावको सुधारनेका पूरा अधिकार? पूरी स्वतन्त्रता है। उस स्वतन्त्रताका सदुपयोग करके स्वभाव सुधारनेमें और स्वतन्त्रताका दुरुपयोग करके स्वभाव बिगाड़नेमें मनुष्य स्वयं ही हेतु है। ईश्वर सम्पूर्ण प्राणियोंके हृदयदेशमें रहता है -- यह कहनेका तात्पर्य है कि जैसे पृथ्वीमें सब जगह जल रहनेपर भी जहाँ कुआँ होता है? वहींसे जल प्राप्त होता है ऐसे ही परमात्मा सब जगह समान रीतिसे परिपूर्ण होते हुए भी हृदयमें प्राप्त होते हैं अर्थात् हृदय सर्वव्यापी परमात्माकी प्राप्तिका विशेष स्थान है। ऐसे ही तीसरे अध्यायमें सर्वव्यापी परमात्माको यज्ञ(निष्कामकर्म) में स्थित बताया गया है तस्मात्सर्वगतं ब्रह्म नित्यं यज्ञे प्रतिष्ठितम् (गीता 3। 15)।विशेष बातसाधककी प्रायः यह भूल होती है कि वह भजन? कीर्तन? ध्यान आदि करते हुए भी भगवान् दूर हैं वे अभी नहीं मिलेंगे यहाँ नहीं मिलेंगे अभी मैं योग्य नहीं हूँ भगवान्की कृपा नहीं है आदि भावनाएँ बनाकर भगवान्की दूरीकी मान्यता ही दृढ़ करता रहता है। इस जगह साधकको यह सावधानी रखनी चाहिये कि जब भगवान् सभी प्राणियोंमें मौजूद हैं तो मेरेमें भी हैं। वे सर्वत्र व्यापक हैं तो मैं जो जप करता हूँ उस जपमें भी भगवान् हैं मैं श्वास लेता हूँ तो उस श्वासमें भी भगवान् हैं मेरे मनमें भी भगवान् हैं? बुद्धिमें भी भगवान् हैं मैं जो मैंमैं कहता हूँ? उस मैं में भी भगवान् हैं। उस मैं का जो आधार है? वह अपना स्वरूप भगवान्से अभिन्न है अर्थात् मैंपन तो दूर है? पर भगवान् मैंपनसे भी नजदीक हैं। इस प्रकार अपनेमें भगवान्को मानते हुए ही भजन? जप? ध्यान आदि करने चाहिये।अब शङ्का यह होती है कि अपनेमें परमात्माको माननेसे मैं और परमात्मा दो (अलगअलग) हैं -- यह द्वैतापत्ति होगी। इसका समाधान यह है कि परमात्माको अपनेमें माननेसे द्वैतापत्ति नहीं होती? प्रत्युत अहंकार(मैंपन) को स्वीकार करनेसे जो अपनी अलग सत्ता प्रतीत होती है? उसीसे द्वैतापत्ति होती है। परमात्माको अपना और और अपनेमें माननेसे तो परमात्मासे अभिन्नता होती है? जिससे प्रेम प्रकट होता है।जैसे? गङ्गाजीमें बाढ़ आ जानेसे उसका जल बहुत बढ़ जाता है और फिर पीछे वर्षा न होनेसे उसका जल पुनः कम हो जाता है परन्तु उसका जो जल गड्ढेमें रह जाता है अर्थात् गङ्गाजीसे अलग हो जाता है? उसकोगङ्गोज्झ कहते हैं। उस गङ्गोज्झको मदिराके समान महान् अपवित्र माना गया है। गङ्गाजीसे अलग होनेके कारण वह गंदा हो जाता है और उसमें अनेक कीटाणु पैदा हो जाते हैं? जो कि रोगोंके कारण हैं। परन्तु फिर कभी जोरकी बाढ़ आ जाती है? तो वह गङ्गोज्झ वापस गङ्गाजीमें मिल जाता है। गङ्गाजीमें मिलते ही उसकी एकदेशीयता? अपवित्रता? अशुद्धि आदि सभी दोष जाते हैं और वह पुनः महान् पवित्र गङ्गाजल बन जाता है।ऐसे ही यह मनुष्य जब अहंकारको स्वीकार करके परमात्मासे विमुख हो जाता है? तब इसमें परिच्छिन्नता? पराधीनता? जडता? विषमता? अभाव? अशान्ति? अपवित्रता आदि सभी दोष (विकार) आ जाते हैं। परन्तु जब यह अपने अंशी परमात्माके सम्मुख हो जाता है? उन्हींकी शरणमें चला जाता है अर्थात् अपना अलग कोई व्यक्तित्व नहीं रखता? तब उसमें आये हुए भिन्नता? पराधीनता आदि सभी दोष मिट जाते हैं। कारण कि स्वयं (चेतन स्वरूप) में दोष नहीं हैं दोष तो अहंता(मैंपन) को स्वीकार करनेसे ही आते हैं। सम्बन्ध -- अब भगवान् यन्त्रारूढ़ हुए प्राणियोंकी परवशताको मिटानेका उपाय बताते हैं।
।।18.61।।हे अर्जुन ! ईश्वर सम्पूर्ण प्राणियोंके हृदयमें रहता है और अपनी मायासे शरीररूपी यन्त्रपर आरूढ़ हुए सम्पूर्ण प्राणियोंको (उनके स्वभावके अनुसार) भ्रमण कराता रहता है।
तमेव शरणं गच्छ सर्वभावेन भारत। तत्प्रसादात्परां शान्तिं स्थानं प्राप्स्यसि शाश्वतम् ॥
।।18.62।। व्याख्या -- [मनुष्यमें प्रायः यह एक कमजोरी रहती है कि जब उसके सामने संतमहापुरुष विद्यमान रहते हैं? तब उसका उनपर श्रद्धाविश्वास एवं महत्त्वबुद्धि नहीं होती (टिप्पणी प0 963) परन्तु जब वे चले जाते हैं? तब पीछे वह रोता है? पश्चात्ताप करता है। ऐसे ही भगवान् अर्जुनके रथके घोड़े हाँकते हैं और उनकी आज्ञाका पालन करते हैं। वे ही भगवान् जब अर्जुनसे कहते हैं कि शरणागत भक्त मेरी कृपासे शाश्वत पदको प्राप्त हो जाता है और तू भी मेरेमें चित्तवाला होकर मेरी कृपासे सम्पूर्ण विघ्नोंको तर जायगा? तब अर्जुन कुछ बोले ही नहीं। इससे यह सम्भावना भी हो सकती है कि भगवान्के वचनोंपर अर्जुनको पूरा विश्वास न हुआ हो। इसी दृष्टिसे भगवान्को यहाँ अर्जुनके लिये अन्तर्यामी ईश्वरकी शरणमें जानेकी बात कहनी पड़ी।]तमेव शरणं गच्छ -- भगवान् कहते हैं कि जो सर्वव्यापक ईश्वर सबके हृदयमें विराजमान है और सबका संचालक है? तू उसीकी शरणमें चला जा। तात्पर्य है कि सांसारिक उत्पत्तिविनाशशील पदार्थ? वस्तु? व्यक्ति? घटना परिस्थिति आदि किसीका किञ्चिन्मात्र भी आश्रय न लेकर केवल अविनाशी परमात्माका ही आश्रय ले ले।पूर्वश्लोकमें यह कहा गया कि मनुष्य जबतक शरीररूपी यन्त्रके साथ मैंमेरापनका सम्बन्ध रखता है तबतक ईश्वर अपनी मायासे उसको घुमाता रहता है। अब यहाँ एव पदसे उसका निषेध करते हुए भगवान् अर्जुनसे कहते हैं कि शरीररूपी यन्त्रके साथ किञ्चिन्मात्र भी मैंमेरापनका सम्बन्ध न रखकर तू केवल उस ईश्वरकी शरणमें चला जा।सर्वभावेन -- सर्वभावसे शरणमें जानेका तात्पर्य यह हुआ कि मनसे उसी परमात्माका चिन्तन हो? शारीरिक क्रियाओंसे उसीका पूजन हो? उसीका प्रेमपूर्वक भजन हो और उसके प्रत्येक विधानमें परम प्रसन्नता हो। वह विधान चाहे शरीर? इन्द्रियाँ? मन आदिके अनुकूल हो? चाहे प्रतिकूल हो? उसे भगवान्का ही किया हुआ मानकर खूब प्रसन्न हो जाय कि अहो भगवान्की मेरेपर कितनी कृपा है कि मेरेसे बिना पूछे ही? मेरे मन? बुद्धि आदिके विपरीत जानते हुए भी केवल मेरे हितकी भावनासे? मेरा परम कल्याण करनेके लिये उन्होंने ऐसा विधान किया हैतत्प्रसादात्परां शान्तिं स्थानं प्राप्स्यसि शाश्वतम् -- भगवान्ने पहले यह कह दिया था कि मेरी कृपासे शाश्वत पदकी प्राप्ति हो जाती है (18। 56) और मेरी कृपासे तू सम्पूर्ण विघ्नोंसे तर जायगा (18। 58)। वही बात यहाँ कहते हैं कि उस अन्तर्यामी परमात्माकी कृपासे तू परमशान्ति और शाश्वत स्थान(पद)को प्राप्त कर लेगा।गीतामें अविनाशी परमपदको हीपरा शान्ति नामसे कहा गया है। परन्तु यहाँ भवगान्नेपरा शान्ति औरशाश्वत स्थान (परमपद) -- दोनोंका प्रयोग एक साथ किया है। अतः यहाँपरा शान्ति का अर्थ संसारसे सर्वथा उपरति औरशाश्वत स्थान का अर्थ परमपद लेना चाहिये।भगवान्ने तमेव शरणं गच्छ पदोंसे अर्जुनको सर्वव्यापी ईश्वरकी शरणमें जानेके लिये कहा है। इससे यह शङ्का हो सकती है कि क्या भगवान् श्रीकृष्ण ईश्वर नहीं हैं क्योंकि अगर भगवान् श्रीकृष्ण ईश्वर होते? तो अर्जुनकोउसीकी शरणमें जा -- ऐसा (परोक्ष रीतिसे) नहीं कहते।इसका समाधान यह है कि भगवान्ने सर्वव्यापक ईश्वरकी शरणागतिको तो गुह्याद्गुह्यतरम् (18। 63) अर्थात् गुह्यसे गुह्यतर कहा है? पर अपनी शरणागतिको सर्वगुह्यतमम् (18। 64) अर्थात् सबसे गुह्यतम कहा है। इससे सर्वव्यापक ईश्वरकी अपेक्षा भगवान् श्रीकृष्ण बड़े ही सिद्ध हुए।भगवान्ने पहले कहा है कि मैं अजन्मा? अविनाशी और सम्पूर्ण प्राणियोंका ईश्वर होते हुए भी अपनी प्रकृतिको अधीन करके अपनी योगमायासे प्रकट होता हूँ (4। 6) मैं सम्पूर्ण यज्ञों और तपोंका भोक्ता हूँ? सम्पूर्ण लोकोंका महान् ईश्वर हूँ और सम्पूर्ण प्राणियोंका सुहृद हूँ -- ऐसा मुझे माननेसे शान्तिकी प्राप्ति होती है (5। 29) परन्तु जो मुझे सम्पूर्ण यज्ञोंका भोक्ता और सबका मालिक नहीं मानते? उनका पतन होता है (9। 24)। इस प्रकार अन्वयव्यतिरेकसे भी भगवान् श्रीकृष्णका ईश्वरत्व सिद्धि हो जाता है।इस अध्यायमें ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति (18। 61) पदोंसे अन्तर्यामी ईश्वरको सब प्राणियोंके हृदयमें स्थित बताया है और पंद्रहवें अध्यायमें सर्वस्य चाहं हृदि संनिविष्टः (15। 15) पदोंसे अपनेको सबके हृदयमें स्थित बताया है। इसका तात्पर्य यह हुआ कि अन्तर्यामी परमात्मा और भगवान् श्रीकृष्ण दो नहीं हैं?,एक ही हैं।जब अन्तर्यामी परमात्मा और भगवान् श्रीकृष्ण एक ही हैं? तो फिर भगवान् श्रीकृष्णने अर्जुनको तमेंव शरणं गच्छ क्यों कहा इसका कारण यह है कि पहले छप्पनवें श्लोकमें भगवान्ने अपनी कृपासे शाश्वत अविनाशी पदकी प्राप्ति होनेकी बात कही और सत्तावनवेंअट्ठावनवें श्लोकोंमें अर्जुनको अपने परायण होनेकी आज्ञा देकरमेरी कृपासे सम्पूर्ण विघ्नोंको तर जायगा -- यह बात कही। परन्तु अर्जुन कुछ बोले नहीं अर्थात् उन्होंने कुछ भी स्वीकार नहीं किया। इसपर भगवान्ने अर्जुनको धमकाया कि यदि अहंकारके कारण तू मेरी बात नहीं सुनेगा तो तेरा पतन हो जायगा। उनसठवें और साठवें श्लोकमें कहा कि मैं युद्ध नहीं करूँगा -- इस प्रकार अहंकारका आश्रय लेकर किया हुआ तेरा निश्चय भी नहीं टिकेगा और तुझे स्वभावज कर्मोंके परवश होकर युद्ध करना ही पड़ेगा। भगवान्के इतना कहनेपर भी अर्जुन कुछ बोले नहीं। अतः अन्तमें भगवान्को यह कहना पड़ा कि यदि तू मेरी शरणमें नहीं आना चाहता तो सबके हृदयमें स्थित जो अन्तर्यामी परमात्मा हैं? उसीकी शरणमें तू चला जा।वास्तवमें अन्तर्यामी ईश्वर और भगवान् श्रीकृष्ण सर्वथा अभिन्न हैं अर्थात् सबके हृदयमें अन्तर्यामीरूपसे विराजमान ईश्वर ही भगवान् श्रीकृष्ण हैं और भगवान् श्रीकृष्ण ही सबके हृदयमें अन्तर्यामीरूपसे विराजमान ईश्वर हैं। सम्बन्ध -- पूर्वश्लोकमें भगवान्ने अर्जुनसे कहा कि तू उस अन्तर्यामी ईश्वरकी शरणमें चला जा। ऐसा कहनेपर भी अर्जुन कुछ नहीं बोले। इसलिये भगवान् आगेके श्लोकमें अर्जुनको चेतानेके लिये उन्हें स्वतन्त्रता प्रदान करते हैं।
।।18.62।।हे भरतवंशोद्भव अर्जुन ! तू सर्वभावसे उस ईश्वरकी ही शरणमें चला जा। उसकी कृपासे तू परमशान्ति-(संसारसे सर्वथा उपरति-) को और अविनाशी परमपदको प्राप्त हो जायगा।
इति ते ज्ञानमाख्यातं गुह्याद्गुह्यतरं मया। विमृश्यैतदशेषेण यथेच्छसि तथा कुरु ॥
।।18.63।। व्याख्या -- इति ते ज्ञानमाख्यातं गुह्याद्गुह्यतरं मया -- पूर्वश्लोकमें सर्वव्यापक अन्तर्यामी परमात्माकी जो शरणागति बतायी गयी है? उसीका लक्ष्य यहाँ इति पदसे कराया गया है। भगवान् कहते हैं कि यह गुह्यसे भी गुह्यतर शरणागतिरूप ज्ञान मैंने तेरे लिये कह दिया है। कर्मयोग गुह्य है और अन्तर्यामी निराकार परमात्माकी शरणागतिगुह्यतर है (टिप्पणी प0 965.1)।विमृश्यैतदशेषेण -- गुह्यसेगुह्यतर शरणागतिरूप ज्ञान बताकर भगवान् अर्जुनसे कहते हैं कि मैंने पहले जो भक्तिकी बातें कही हैं? उनपर तुम अच्छी तरहसे विचार कर लेना। भगवान्ने इसी अध्यायके सत्तावनवेंअट्ठावनवें श्लोकोंमें अपनी भक्ति(शरणागति) की जो बातें कही हैं? उन्हें एतत् पदसे लेना चाहिये। गीतामें जहाँजहाँ भक्तिकी बातें आयी हैं? उन्हें अशेषेण पदसे लेना चाहिये (टिप्पणी प0 965.2)।विमृश्यैतदशेषेण कहनेमें भगवान्की अत्यधिक कृपालुताकी एक गुढ़ाभिसन्धि है कि कहीं अर्जुन मेरेसे विमुख न हो जाय? इसलिये यदि यह मेरी कही हुई बातोंकी तरफ विशेषतासे खयाल करेगा तो असली बात अवश्य ही इसकी समझमें आ जायगी और फिर यह मेरेसे विमुख नहीं होगा।यथेच्छसि तथा कुरु -- पहले कही सब बातोंपर पूरापूरा विचार करके फिर तेरी जैसी मरजी आये? वैसा कर। तू जैसा करना चाहता है? वैसा कर -- ऐसा कहनेमें भी भगवान्की आत्मीयता? कृपालुता और हितैषिता ही प्रत्यक्ष दीख रही है।पहले वक्ष्याम्यशेषतः (7। 2)? इदं तु ते गुह्यतमं प्रवक्ष्याम्यनसूयवे (9। 1) वक्ष्यामि हितकाम्यया (10। 1) आदि श्लोकोंमें भगवान् अर्जुनके हितकी बात कहते आये हैं? पर इन वाक्योंमें भगवान्की अर्जुनपर सामान्य कृपा है।न श्रोष्यति विनङ्क्ष्यसि (18। 58) -- इस श्लोकमें अर्जुनको धमकानेमें भगवान्की विशेष कृपा और अपनेपनका भाव टपकता है।यहाँ यथेच्छसि तथा कुरु कहकर भगवान् जो अपनेपनका त्याग कर रहे हैं? इसमें तो भगवान्कीअध्यधिक कृपा और आत्मीयता भरी हुई है। कारण कि भक्त भगवान्का धमकाया जाना तो सह सकता है? पर भगवान्का त्याग नहीं सह सकता। इसलिये न श्रोष्यसि विनङ्क्ष्यसि आदि कहनेपर भी अर्जुनपर इतना असर नहीं पड़ा जितना यथेच्छसि तथा कुरु कहनेपर पड़ा। इसे सुनकर अर्जुन घबरा गये कि भगवान् तो मेरा त्याग कर रहे हैं क्योंकि मैंने यह बड़ी भारी गलती की कि भगवान्के द्वारा प्यारसे समझाने? अपनेपनसे धमकाने और अन्तर्यामीकी शरणागतिकी बात कहनेपर भी मैं कुछ बोला नहीं? जिससे भगवान्कोजैसी मरजी आये? वैसा कर -- यह कहना पड़ा। अब तो मैं कुछ भी कहनेके लायक नहीं हूँ ऐसा सोचकर अर्जुन बड़े दुःखी हो जाते हैं? तब भगवान् अर्जुनके बिना पूछे ही सर्वगुह्यतम वचनोंको कहते हैं? जिसका वर्णन आगेके श्लोकमें है। सम्बन्ध -- पूर्वश्लोकमें भगवान् विमृश्यैतदेषेण पदसे अर्जुनको कहा कि मेरे इस पूरे उपदेशका सार निकाल लेना। परन्तु भगवान्के सम्पूर्ण उपदेशका सार निकाल लेना अर्जुनके वशकी बात नहीं थी क्योंकि अपने उपदेशका सार निकालना जितना वक्ता जानता है? उतना श्रोता नहीं जानता दूसरी बात? जैसी मरजी आये? वैसा कर -- इस प्रकार भगवान्के मुखसे अपने त्यागकी बात सुनकर अर्जुन बहुत डर गये? इसलिये आगेके दो श्लोकोंमें भगवान् अपने प्रिय सखा अर्जुनको आश्वासन देते हैं।
।।18.63।।यह गुह्यसे भी गुह्यतर (शरणागतिरूप) ज्ञान मैंने तुझे कह दिया। अब तू इसपर अच्छी तरहसे विचार करके जैसा चाहता है, वैसा कर।
सर्वगुह्यतमं भूयः शृणु मे परमं वचः। इष्टोऽसि मे दृढमिति ततो वक्ष्यामि ते हितम् ॥
।।18.64।। व्याख्या -- सर्वगुह्यतमं भूयः श्रुणु मे परमं वचः -- पहले तिरसठवें श्लोकमें भगवान्ने गुह्य (कर्मयोगकी) और गुह्यतर (अन्तर्यामी निराकारकी शरणागतिकी) बात कही और इदं तु ते गुह्यतमम् (9। 1) तथा इति गुह्यतमं शास्त्रम् (15। 20) -- इन पदोंसे गुह्यतम (अपने प्रभावकी) बात कह दी? पर सर्वगुह्यतम बात गीतामें पहले कहीं नहीं कही। अब यहाँ अर्जुनकी घबराहटको देखकर भगवान् कहते हैं कि मैं सर्वगुह्यतम अर्थात् सबसे अत्यन्त गोपनीय बात फिर कहूँगा? तू मेरे परम? सर्वश्रेष्ठ वचनोंको सुन।इस श्लोकमें सर्वगुह्यतमम् पदसे भगवान्ने बताया कि यह हरेकके सामने प्रकट करनेकी बात नहीं है और सड़सठवें श्लोकमें इदं ते नातपस्काय नाभक्ताय कदाचन पदसे भगवान्ने बताया कि इस बातको असहिष्णु और अभक्तसे कभी मत कहना। इस प्रकार दोनों तरफसे निषेध करके बीचमें (छियासठवें श्लोकमें) सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज -- इस सर्वगुह्यतम बातको रखा है। दोनों तरफसे निषेध करनेका तात्पर्य है कि यह गीताभरमें अत्यन्त रहस्यमय खास उपदेश है। (टिप्पणी प0 966)दूसरे अध्यायके सातवें श्लोकमें धर्मसम्मूढचेताः कहकर अर्जुन अपनेको धर्मका निर्णय करनेमें अयोग्य समझते हुए भगवान्से पूछते हैं? उसके शिष्य बनते हैं और शिक्षा देनेके लिये कहते हैं। अतः भगवान् यहाँ (18। 66 में) कहते हैं कि तू धर्मके निर्णयका भार अपने ऊपर मत ले? वह भार मेरेपर छोड़ दे -- मेरे ही अर्पण कर दे और अनन्यभावसे केवल मेरी शरणमें आ जा। फिर तेरेको जो पाप आदिका डर है? उन सब पापोंसे मैं तुझे मुक्त कर दूँगा। तू सब चिन्ताओंको छोड़ दे। यही भगवान्का सर्वगुह्यतम परम वचन है।भूयः श्रृणु का तात्पर्य है कि मैंने यही बात दूसरे शब्दोंमें पहले भी कही थी? पर तुमने ध्यान नहीं दिया। अतः मैं फिर वही बात कहता हूँ। अब इस बातपर तुम विशेषरूपसे ध्यान दो।यह सर्वगुह्यतमवाली बात भगवान्ने पहले मत्परः ৷৷. मच्चित्तः सततं भव (18। 57) और मच्चित्तः सर्वदुर्गाणि मत्प्रसादत्तरिष्यसि (18। 58) पदोंसे कह दी थी परन्तु सर्वगुह्यतमम् पद पहले नहीं कहा? और अर्जुनका भी उस बातपर लक्ष्य नहीं गया। इसलिये अब फिर उस बातपर अर्जुनका लक्ष्य करानेके लिये और,उस बातका महत्त्व बतानेके लिये भगवान् यहाँ सर्वगुह्यतमम् पद देते हैं।इष्टोऽसि मे दृढमिति -- इससे पहले भगवान्ने कहा था कि जैसी मरजी आये? वैसा कर। जो अनुयायी है? आज्ञापालक है? शरणागत है? उसके लिये ऐसी बात कहनेके समान दूसरा क्या दण्ड दिया जा सकता है अतः इस बातको सुनकर अर्जुनके मनमें भय पैदा हो गया कि भगवान् मेरा त्याग कर रहे हैं। उस भयको दूर करनेके लिये भगवान् यहाँ कहते हैं कि तुम मेरे अत्यन्त प्यारे मित्र हो (टिप्पणी प0 967.1)।यदि अर्जुनके मनमें भय या संदेह न होता? तो भगवान्कोतुम मेरे अत्यन्त प्यारे मित्र हो -- यह कहकर सफाई देनेकी क्या जरूरत थी सफाई देना तभी बनता है? जब दूसरेके मनमें भय हो? सन्देह हो? हलचल हो। इष्टः कहनेका दूसरा भाव यह है कि भगवान् अपने शरणागत भक्तको अपना ईष्टदेव मान लेते हैं। भक्त सब कुछ छोड़कर केवल भगवान्को अपना इष्ट मानता है? तो भगवान् भी उसको अपना इष्ट मान लेते हैं क्योंकि भक्तिके विषयमें भगवान्का यह कानून है -- ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम् (गीता 4। 11) अर्थात् जो भक्त जैसे मेरे शरण होते हैं? मैं भी उनको वैसे ही आश्रय देता हूँ। भगवान्की दृष्टिमें भक्तके समान और कोई श्रेष्ठ नहीं है। भागवतमें भगवान् उद्धवजीसे कहते हैं -- तुम्हारेजैसे प्रेमी भक्त मुझे जितने प्यारे हैं? उतने प्यारे न ब्रह्माजी हैं? न शंकरजी हैं? न बलरामजी हैं और तो क्या? मेरे शरीरमें निवास करनेवाली लक्ष्मीजी और मेरी आत्मा भी उतनी प्यारी नहीं है (टिप्पणी प0 967.2)।दृढम् कहनेका तात्पर्य है कि जब तुमने एक बार कह दिया कि मैं आपके शरण हूँ (2। 7) तो अब तुम्हें बिलकुल भी भय नहीं करना चाहिये। कारण कि जो मेरी शरणमें आकर एक बार भी सच्चे हृदयसे कह देता है कि मैं आपका ही हूँ ? उसको मैं सम्पूर्ण प्राणियोंसे अभय (सुरक्षित) कर देता हूँ -- यह मेरा व्रत है (टिप्पणी प0 967.3)। ततो वक्ष्यामि ते हितम् -- तू मेरा अत्यन्त प्यारा मित्र है? इसलिये अपने हृदयकी अत्यन्त गोपनीय और अपने दरबारकी श्रेष्ठसेश्रेष्ठ बात तुझे कहूँगा। दूसरी बात? मैं जो आगे शरणागतिकी बात कहूँगा? उसका यह तात्पर्य नहीं है कि मेरी शरणमें आनेसे मुझे कोई लाभ हो जायगा? प्रत्युत इसमें केवल तेरा ही हित होगा। इससे सिद्ध होता है कि प्राणिमात्रका हित केवल इसी बातमें है कि वह किसी दूसरेका सहारा न लेकर केवल भगवान्की ही शरण ले।भगवान्की शरण होनेके सिवाय जीवका कहीं भी? किञ्चन्मात्र भी हित नहीं है। कारण यह है कि जीव साक्षात् परमात्माका अंश है। इसलिये वह परमात्माको छोड़कर किसीका भी सहारा लेगा तो वह सहारा टिकेगा नहीं। जब संसारकी कोई भी वस्तु? व्यक्ति? घटना? परिस्थिति? अवस्था आदि स्थिर नहीं है? तो फिर उनका सहारा कैसे स्थिर रह सकता है उनका सहारा तो रहेगा नहीं? पर चिन्ता? शोक? दुःख आदि रह जायँगे जैसे? अग्निसे अङ्गार दूर हो जाता है तो वह काला कोयला बन जाता है -- कोयला होय नहीं उजला? सौ मन साबुन लगाय। पर वही कोयला जब पुनः अग्निसे मिल जाता है? तब वह अङ्गार (अग्निरूप) बन जाता है और चमक उठता है। ऐसे ही यह जीव भगवान्से विमुख हो जाता है तो बारबार जन्मतामरता और दुःख पाता रहता है? पर जब यह भगवान्के सम्मुख हो जाता है अर्थात् अनन्यभावसे भगवान्की शरणमें हो जाता है? तब यह भगवत्स्वरूप बन जाता है और चमक उठता है? तथा संसारमात्रका कल्याण करनेवाला हो जाता है।
।।18.64।।सबसे अत्यन्त गोपनीय वचन तू फिर मेरेसे सुन। तू मेरा अत्यन्त प्रिय है, इसलिये मैं तेरे हितकी बात कहूँगा।
मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु। मामेवैष्यसि सत्यं ते प्रतिजाने प्रियोऽसि मे ॥
।।18.65।। व्याख्या -- मद्भक्तः -- साधकको सबसे पहले मैं भगवान्का हूँ इस प्रकार अपनी अहंता(मैंपन) को बदल देना चाहिये। कारण कि बिना अहंताके बदले साधन सुगमतासे नहीं होता।,अहंताके बदलनेपर साधन सुगमतासे? स्वाभाविक ही होने लगता है। अतः साधकको सबसे पहले मद्भक्तः होना चाहिये।किसीका शिष्य बननेपर व्यक्ति अपनी अहंताको बदल देता है कि मैं तो गुरु महाराजका ही हूँ। विवाह हो जानेपर कन्या अपनी अहंताको बदल देती है कि मैं तो ससुरालकी ही हूँ ? और पिताके कुलका सम्बन्ध बिलकुल छूट जाता है। ऐसे ही साधकको अपनी अहंता बदल देनी चाहिये कि मैं तो भगवान्का ही हूँ और भगवान् ही मेरे हैं मैं संसारका नहीं हूँ और संसार मेरा नहीं है। [अहंताके बदलनेपर ममता भी अपनेआप बदल जाती है।]मन्मना भव -- उपर्युक्त प्रकारसे अपनेको भगवान्का मान लेनेपर भगवान्में स्वाभाविक ही मन लगने लगता है। कारण कि जो अपना होता है? वह स्वाभाविक ही प्रिय लगता है और जहाँ प्रियता होती है? वहाँ स्वाभाविक ही मन लगता है। अतः भगवान्को अपना माननेसे भगवान् स्वाभाविक ही प्रिय लगते हैं। फिर मनसे स्वाभाविक ही भगवान्के नाम? गुण? प्रभाव? लीला आदिका चिन्तन होता है। भगवान्के नामका जप और स्वरूपका ध्यान बड़ी तत्परतासे और लगनपूर्वक होता है।मद्याजी -- अहंता बदल जानेपर अर्थात् अपनेआपको भगवान्का मान लेनेपर संसारका सब काम भगवान्की सेवाके रूपमें बदल जाता है अर्थात् साधक पहले जो संसारका काम करता था? वही काम अब भगवान्का,काम हो जाता है। भगवान्का सम्बन्ध ज्योंज्यों दृढ़ होता जाता है? त्योंहीत्यों उसका सेवाभाव पूजाभावमें परिणत होता जाता है। फिर वह चाहे संसारका काम करे? चाहे घरका काम करे? चाहे शरीरका काम करे? चाहे ऊँचानीचा कोई भी काम करे? उसमें भगवान्की पूजाका ही भाव बना रहता है। उसकी यह दृढ़ धारणा हो जाती है कि भगवान्की पूजाके सिवाय मेरा कुछ भी काम नहीं है।मां नमस्कुरु -- भगवान्के चरणोंमें साष्टाङ्ग प्रणाम करके सर्वथा भगवान्के समर्पित हो जाय। मैं प्रभुके चरणोंमें ही पड़ा हुआ हूँ -- ऐसा मनमें भाव रखते हुए जो कुछ अनुकूल या प्रतिकूल परिस्थिति सामने आ जाय? उसमें भगवान्का मङ्गलमय विधान मानकर परम प्रसन्न रहे।भगवान्के द्वारा मेरे लिये जो कुछ भी विधान होगा? वह मङ्गलमय ही होगा। पूरी परिस्थिति मेरी समझमें आये या न आये -- यह बात दूसरी है? पर भगवान्का विधान तो मेरे लिये कल्याणकारी ही है? इसमें कोई सन्देह नहीं। अतः जो कुछ होता है? वह मेरे कर्मोंका फल नहीं है? प्रत्युत भगवान्के द्वारा कृपा करके केवल मेरे हितके लिये भेजा हुआ विधान है। कारण कि भगवान् प्राणिमात्रके परम सुहृद होनेसे जो कुछ विधान करते हैं? वह जीवोंके कल्याणके लिये ही करते हैं। इसलिये भगवान् अनुकूल या प्रतिकूल परिस्थिति भेजकर प्राणियोंके पुण्यपापोंका नाश करके? उन्हें परम शुद्ध बनाकर अपने चरणोंमें खींच रहे हैं -- इस प्रकार दृढ़तासे भाव होना ही भगवान्के चरणोंमें नमस्कार करना है।मामेवैष्यसि सत्यं ते प्रतिजाने प्रियोऽसि मे -- भगवान् कहते हैं कि इस प्रकार मेरा भक्त होनेसे? मेरेमें मनवाला होनेसे? मेरा पूजन करनेवाला होनेसे और मुझे नमस्कार करनेसे तू मेरेको ही प्राप्त होगा अर्थात् मेरेमें ही निवास करेगा (टिप्पणी प0 969) -- ऐसी मैं सत्य प्रतिज्ञा करता हूँ क्योंकि तू मेरा प्यारा है।प्रियोऽसि मे कहनेका तात्पर्य है कि भगवान्का जीवमात्रपर अत्यधिक स्नेह है। अपना ही अंश होनेसे कोई भी जीव भगवान्को अप्रिय नहीं है। भगवान् जीवोंको चाहे चौरासी लाख योनियोंमें भेंजें? चाहे नरकोंमें भेजें? उनका उद्देश्य जीवोंको पवित्र करनेका ही होता है। जीवोंके प्रति भगवान्का जो यह कृपापूर्ण विधान है? यह भगवान्के प्यारका ही द्योतक है। इसी बातको प्रकट करनेके लिये भगवान् अर्जुनको जीवमात्रका प्रतिनिधि बनाकर प्रियोऽसि मे वचन कहते हैं।जीवमात्र भगवान्को अत्यन्त प्रिय है। केवल जीव ही भगवान्से विमुख होकर प्रतिक्षण वियुक्त होनेवाले संसार(धनसम्पत्ति? कुटुम्बी? शरीर? इन्द्रियाँ? मन? बुद्धि? प्राण आदि) को अपना मानने लगता है? जबकि संसारने कभी जीवको अपना नहीं माना है। जीव ही अपनी तरफसे संसारसे सम्बन्ध जोड़ता है। संसार प्रतिक्षण परिवर्तनशील है और जीव नित्य अपरिवर्तनशील है। जीवसे यही गलती होती है कि वह प्रतिक्षण बदलनेवाले संसारके सम्बन्धको नित्य मान लेता है। यही कारण है कि सम्बन्धीके न रहनेपर भी उससे माना हुआ सम्बन्ध रहता है। यह मान हुआ सम्बन्ध ही अनर्थका हेतु है। इस सम्बन्धको मानने अथवा न माननेमें सभी स्वतन्त्र हैं। अतः इस माने हुए सम्बन्धका त्याग करके? जिनसे हमारा वास्तविक और नित्यसम्बन्ध है? उन भगवान्की शरणमें चले जाना चाहिये। सम्बन्ध -- पीछेके दो श्लोकोंमें अर्जुनको आश्वासन देकर अब भगवान् आगेके श्लोकमें अपने उपदेशकी अत्यन्त गोपनीय सार बात बताते हैं।
।।18.65।।तू मेरा भक्त हो जा, मेरेमें मनवाला हो जा, मेरा पूजन करनेवाला हो जा और मेरेको नमस्कार कर। ऐसा करनेसे तू मेरेको ही प्राप्त हो जायगा -- यह मैं तेरे सामने सत्य प्रतिज्ञा करता हूँ; क्योंकि तू मेरा अत्यन्त प्रिय है।
सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज। अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः ॥
।।18.66।। व्याख्या -- सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज -- भगवान् कहते हैं कि सम्पूर्ण धर्मोंका आश्रय? धर्मके निर्णयका विचार छोड़कर अर्थात् क्या करना है और क्या नहीं करना है -- इसको छोड़कर केवल एक मेरी ही शरणमें आ जा।स्वयं भगवान्के शरणागत हो जाना -- यह सम्पूर्ण साधनोंका सार है। इसमें शरणागत भक्तको अपने लिये कुछ भी करना शेष नहीं रहता जैसे -- पतिव्रताका अपना कोई काम नहीं रहता। वह अपने शरीरकी सारसँभाल भी पतिके नाते? पतिके लिये ही करती है। वह घर? कुटुम्ब? वस्तु? पुत्रपुत्री और अपने कहलानेवाले शरीरको भी अपना नहीं मानती? प्रत्युत पतिदेवका ही मानती है। तात्पर्य यह हुआ कि जिस प्रकार पतिव्रता पतिके परायण होकर पतिके गोत्रमें ही अपना गोत्र मिला देती है और पतिके ही घरपर रहती है? उसी प्रकार शरणागत भक्त भी शरीरको लेकर माने जानेवाले गोत्र? जाति? नाम आदिको भगवान्के चरणोंमें अर्पण करके निर्भय? निःशोक? निश्चिन्त और निःशङ्क हो जाता है।गीताके अनुसार यहाँ धर्म शब्द कर्तव्यकर्मका वाचक है। कारण कि इसी अध्यायके इकतालीसवेंसे चौवालीसवें श्लोकतक स्वभावज कर्म शब्द आये हैं? फिर सैंतीलीसवें श्लोकके पूर्वार्धमें स्वधर्म शब्द आया है। उसके बाद? सैंतालीसवें श्लोकके ही उत्तरार्धमें तथा (प्रकरणके अन्तमें) अड़तालीसवें श्लोकमें कर्म शब्द आया है। तात्पर्य यह हुआ कि आदि और अन्तमें कर्म शब्द आया है और बीचमें स्वधर्म शब्द आया है तो इससे स्वतः ही धर्म शब्द कर्तव्यकर्मका वाचक सिद्ध हो जाता है।अब यहाँ प्रश्न यह होता है कि सर्वधर्मान्परित्यज्य पदसे क्या धर्म अर्थात् कर्तव्यकर्मका स्वरूपसे त्याग माना जाय इसका उत्तर यह है कि धर्मका स्वरूपसे त्याग करना न तो गीताके अनुसार ठीक है और न यहाँके प्रसङ्गके अनुसार ही ठीक है क्योंकि भगवान्की यह बात सुनकर अर्जुनने कर्तव्यकर्मका त्याग नहीं किया है? प्रत्युत करिष्ये वचनं तव (18। 73) कहकर भगवान्की आज्ञाके अनुसार कर्तव्यकर्मका पालन करना स्वीकार किया है। केवल स्वीकार ही नहीं किया है? प्रत्युत अपने क्षात्रधर्मके अनुसार युद्धि भी किया है। अतः उपर्युक्त पदमें धर्म अर्थात् कर्तव्यका त्याग करनेकी बात नहीं है। भगवान् भी कर्तव्यके त्यागकी बात कैसे कह सकते हैं भगवान्ने इसी अध्यायके छठे श्लोकमें कहा है कि यज्ञ? दान? तप और अपनेअपने वर्णआश्रमोंके जो कर्तव्य हैं? उनका कभी त्याग नहीं करना चाहिये? प्रत्युत उनको जरूर करना चाहिये (टिप्पणी प0 970.1)।गीताका पूरा अध्ययन करनेसे यह मालूम होता है कि मनुष्यको किसी भी हालतमें कर्तव्यकर्मका त्याग नहीं करना चाहिये। अर्जुन तो युद्धरूप कर्तव्यकर्म छोड़कर भिक्षा माँगना श्रेष्ठ समझते थे (2। 5) परन्तु भगवान्ने इसका निषेध किया (2। 3138)। इससे भी यही सिद्ध होता है कि यहाँ स्वरूपसे धर्मोंका त्याग नहीं है।अब विचार यह करना है कि यहाँ सम्पूर्ण धर्मोंके त्यागसे क्या लेना चाहिये गीताके अनुसार सम्पूर्ण धर्मों अर्थात् कर्मोंको भगवान्के अर्पण करना ही सर्वश्रेष्ठ धर्म है। इसमें सम्पूर्ण धर्मोंके आश्रयका त्याग करना और केवल भगवान्का आश्रय लेना -- दोनों बातें सिद्ध हो जाती हैं। धर्मका आश्रय लेनेवाले बारबार जन्ममरणको प्राप्त होते हैं -- एवं त्रयीधर्ममनुप्रपन्ना गतागतं कामकामा लभन्ते (गीता 9। 21)। इसलिये धर्मका आश्रय छोड़कर भगवान्का ही आश्रय लेनेपर फिर अपने धर्मका निर्णय करनेकी जरूरत नहीं रहती। आगे अर्जुनके जीवनमें ऐसा हुआ भी है।अर्जुनका कर्णके साथ युद्ध हो रहा था। इस बीच कर्णके रथका चक्का पृथ्वीमें धँस गया। कर्ण रथसे नीचे उतरकर रथके चक्केको निकालनेका उद्योग करने लगा और अर्जुनसे बोला कि जबतक मैं यह चक्का निकाल न लूँ? तबतक तुम ठहर जाओ क्योंकि तुम रथपर हो और मैं रथसे रहित हूँ और दूसरे कार्यमें लगा हूआ हूँ। ऐसे समय रथीको उचित है कि उसपर बाण न छोड़े। तुम सहस्रार्जुनके समान शस्त्र और शास्त्रके ज्ञाता हो और धर्मको जाननेवाले हो? इसलिये मेरे ऊपर प्रहार करना उचित नहीं है। कर्णकी बात सुनकर अर्जुनने बाण नहीं चलाया। तब भगवान्ने कर्णसे कहा कितुम्हारेजैसे आततायीको किसी तरहसे मार देना धर्म ही है पाप नहीं (टिप्पणी प0 970.2) और अभीअभी तुम छः महारथियोंने मिलकर अकेले अभिमन्युको घेरकर उसे मार डाला। अतः धर्मकी दुहाई देनेसे कोई लाभ नहीं है। हाँ? यह सौभाग्यकी बात है कि इस समय तुम्हें धर्मकी बात याद आ रही है? पर जो स्वयं धर्मका पालन नहीं करता? उसे धर्मकी दुहाई देनेका कोई अधिकार नहीं है। ऐसा कहकर भगवान्ने अर्जुनको बाण चलानेकी आज्ञा दी तो अर्जुनने बाण चलाना आरम्भ कर दिया।इस प्रकार यदि अर्जुन अपनी बुद्धिसे धर्मका निर्णय करते तो भूल कर बैठते अतः उन्होंने धर्मका निर्णय भगवान्पर ही रखा और भगवान्ने धर्मका निर्णय किया भी।अर्जुनके मनमें सन्देह था कि हमलोगोंके लिये युद्ध करना श्रेष्ठ है अथवा युद्ध न करना श्रेष्ठ है (2। 6)। यदि हम युद्ध करते हैं तो अपने कुटुम्बका नाश होता है और अपने कुटुम्बका नाश करना बड़ा भारी पाप है। इससे तो अनर्थपरम्परा ही बढ़ेगी (2। 40 -- 44)। दूसरी तरफ हमलोग देखते हैं तो क्षत्रियके लिये युद्धसे बढ़कर श्रेयका कोई साधन नहीं है। अतः भगवान् कहते हैं कि क्या करना है और क्या नहीं करना है? क्या धर्म है और क्या अधर्म है? इस पचड़ेमें तू क्यों पड़ता है तू धर्मके निर्णयका भार मेरेपर छोड़ दे। यही सर्वधर्मान्परित्यज्य का तात्पर्य है।मामेकं शरणं व्रज -- इन पदोंमें एकम् पद माम् का विशेषण नहीं हो सकता माम् (भगवान्) एक ही हैं? अनेक नहीं। इसलिये एकम् पदका अर्थ अनन्य लेना ही ठीक बैठता है। दूसरी बात? अर्जुनने तदेकं वद निश्चित्य (3। 2) और यच्छ्रेय एतयोरेकम् (5। 1) पदोंमें भी एकम् पदसे सांख्य और कर्मयोगके विषयमें एक निश्चित श्रेयका साधन पूछा है। उसी एकम् पदको लेकर भगवान् यहाँ यह बताना चाहते हैं कि सांख्ययोग? कर्मयोग आदि जितने भी भगवत्प्राप्तिके साधन हैं? उन सम्पूर्ण साधनोंमें मुख्य साधन एक अनन्य शरणागति ही है।गीतामें अर्जुनने अपने कल्याणके साधनके विषयमें कई तरहके प्रश्न किये और भगवान्ने उनके उत्तर भी दिये। वे सब साधन होते हुए भी गीताके पूर्वापरको देखनेसे यह बात स्पष्ट दीखती है कि सम्पूर्ण साधनोंका सार और शिरोमणि साधन भगवान्के अनन्यशरण होना ही है।भगवान्ने गीतामें जगहजगह अनन्यभक्तिकी बहुत महिमा गायी है। जैसे? दुस्तर मायाको सुगमतासे तरनेका उपाय अनन्य शरणागति ही है (टिप्पणी प0 971.1) (7। 14) अनन्यचेताके लिये मैं सुलभ हूँ (टिप्पणी प0 971.2) (8। 14) परम पुरुषकी प्राप्ति अनन्य भक्तिसे ही होती है (8। 22) अनन्य भक्तोंका योगक्षेम मैं वहन करता हूँ (9। 22) अनन्य भक्तिसे ही भगवान्को जाना? देखा तथा प्राप्त किया जा सकता है (11। 54) अनन्य भक्तोंका मैं बहुत जल्दी उद्धार करता हूँ (12। 37) गुणातीत होनेका उपाय अनन्यभक्ति ही है (14। 26)। इस प्रकार अनन्य भक्तिकी महिमा गाकर भगवान् यहाँ पूरी गीताका सार बताते हैं -- मामेकं शरणं व्रज। तात्पर्य है कि उपाय और उपेय? साधन और साध्य मैं ही हूँ।मामेकं शरणं व्रज का तात्पर्य मनबुद्धिके द्वारा शरणागतिको स्वीकार करना नहीं है? प्रत्युत स्वयंको भगवान्की शरणमें जाना है। कारण कि स्वयंके शरण होनेपर मन? बुद्धि? इन्द्रियाँ? शरीर आदि भी उसीमें आ जाते हैं? अलग नहीं रहते।अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः -- यहाँ कोई ऐसा मान सकता है कि पहले अध्यायमें अर्जुनने जो युद्धसे पाप होनेकी बातें कही थीं? उन पापोंसे छुटकारा दिलानेका प्रलोभन भगवान्ने दिया है। परन्तु यह मान्यता यक्तिसंगत नहीं है क्योंकि जब अर्जुन सर्वथा भगवान्के शरण हो गये हैं? तब उनके पाप कैसे रह सकते हैं (टिप्पणी प0 971.3) और उनके लिये प्रलोभन कैसे दिया जा सकता है अर्थात् उनके लिये,प्रलोभन देना बनता ही नहीं। हाँ? पापोंसे मुक्त करनेका प्रलोभन देना हो तो वह शरणागत होनेके पहले ही दिया जा सकता है? शरणागत होनेके बाद नहीं। मैं तुझे सम्पूर्ण पापोंसे मुक्त कर दूँगा -- इसका भाव यह है कि जब तू सम्पूर्ण धर्मोंका आश्रय छोड़कर मेरी शरणमें आ गया और शरण होनेके बाद भी तुम्हारे भावों? वृत्तियों? आचरणों आदिमें फरक नहीं पड़ा अर्थात् उनमें सुधार नहीं हुआ भगवत्प्रेम? भगवद्दर्शन आदि नहीं हुए और अपनेमें अयोग्यता? अनधिकारिता? निर्बलता आदि मालूम होती है? तो भी उनको लेकर तुम चिन्ता या भय मत करो। कारण कि जब तुम मेरी अनन्यशरण हो गये तो वह कमी तुम्हारी कमी कैसे रही उसका सुधार करना तुम्हारा काम कैसे रहा वह कमी मेरी कमी है। अब उस कमीको दूर करना? उसका सुधार करना मेरा काम रहा। तुम्हारा तो बस? एक ही काम है वह काम है -- निर्भय? निःशोक? निश्चिन्त और निःशङ्क होकर मेरे चरणोंमें पड़े रहना (टिप्पणी प0 972.1) परन्तु अगर तेरेमें भय? चिन्ता? वहम आदि दोष आ जायँगे तो वे शरणागतिमें बाधक हो जायँगे और सब भार तेरेपर आ जायगा। शरण होकर अपनेपर भार लेना शरणागतिमें कलङ्क है।जैसे? विभीषण भगवान् रामके चरणोंकी शरण हो जाते हैं? तो फिर विभीषणके दोषको भगवान् अपना ही दोष मानते हैं। एक समय विभीषणजी समुद्रके इस पार आये। वहाँ विप्रघोष नामक गाँवमें उनसे एक अज्ञात ब्रह्महत्या हो गयी। इसपर वहाँके ब्राह्मणोंने इकट्ठे होकर विभीषणको खूब मारापीटा? पर वे मरे नहीं। फिर ब्राह्मणोंने उन्हें जंजीरोंसे बाँधकर जमीनके भीतर एक गुफामें ले जाकर बंद कर दिया। रामजीको विभीषणके कैद होनेका पता लगा तो वे पुष्पकविमानके द्वारा तत्काल विप्रघोष नामक गाँवमें पहुँच गये और वहाँ विभीषणका पता लगाकर उनके पास गये। ब्राह्मणोंने रामजीका बहुत आदरसत्कार किया और कहा कि महाराज इसने ब्रह्महत्या कर दी है। इसको हमने बहुत मारा? पर यह मरा नहीं। भगवान् रामने कहा कि हे ब्राह्मणों विभीषणको मैंने कल्पतककी आयु और राज्य दे रखा है? वह कैसे मारा जा सकता है और उसको मारनेकी जरूरत ही क्या है वह तो मेरा भक्त है। भक्तके लिये मैं स्वयं मरनेको तैयार हूँ। दासके अपराधकी जिम्मेवारी वास्तवमें उसके मालिकपर ही होती है अर्थात् मालिक ही उसके दण्डका पात्र होता है। अतः विभीषणके बदलेमें आपलोग मेरेको ही दण्ड दें (टिप्पणी प0 972.2)। भगवान्की यह शरणागतवत्सलता देखकर सब ब्राह्मण आश्यर्य करने लगे और उन सबने भगवान्की शरण ले ली।तात्पर्य यह हुआ कि मैं भगवान्का हूँ और भगवान् मेरे हैं -- इस अपनेपनके समान योग्यता? पात्रता?,अधिकारिता आदि कुछ भी नहीं है। यह सम्पूर्ण साधनोंका सार है। छोटासा बच्चा भी अपनेपनके बलपर ही आधी रातमें सारे घरको नचाता है अर्थात् जब वह रातमें रोता है तो सारे घरवाले उठ जाते हैं और उसे राजी करते हैं। इसलिये शरणागत भक्तको अपनी योग्यता आदिकी तरफ न देखकर भगवान्के साथ अपनेपनकी तरफ ही देखते रहना चाहिये।, मा शुचः का तात्पर्य है -- (1) मेरे शरण होकर तू चिन्ता करता है? यह मेरे प्रति अपराध है? तेरा अभिमान है और शरणागतिमें कलङ्क है।मेरे शरण होकर भी मेरा पूरा विश्वास? भरोसा न रखना ही मेरे प्रति अपराध है। अपने दोषोंको लेकर चिन्ता करना वास्तवमें अपने बलका अभिमान है क्योंकि दोषोंको मिटानेमें अपनी सामर्थ्य मालूम देनेसे ही उनको मिटानेकी चिन्ता होती है। हाँ? अगर दोषोंको मिटानेमें चिन्ता न होकर दुःख होता है तो दुःख होना इतना दोषी नहीं है। जैसे? छोटे बालकके पास कुत्ता आता है तो वह कुत्तेको देखकर रोता है? चिन्ता नहीं करता। ऐसे ही दोषोंका न सुहाना दोष नहीं है? प्रत्युत चिन्ता करना दोष है। चिन्ता करनेका अर्थ यही होता है कि भीतरमें अपने छिपे हुए बलका आश्रय है (टिप्पणी प0 972.3) और यही तेरा अभिमान है। मेरा भक्त होकर भी तू चिन्ता करता है तो तेरी चिन्ता दूर कहाँ होगी लोग भी देखेंगे तो यही कहेंगे कि यह भगवान्का भक्त,है और चिन्ता करता है भगवान् इसकी चिन्ता नहीं मिटाते तू मेरा विश्वास न करके चिन्ता करता है तो विश्वासकी कमी तो है तेरी और कलङ्क आता है मेरेपर? मेरी शरणागतिपर। इसको तू छोड़ दे।(2) तेरे भाव? वृत्तियाँ? आचरण शुद्ध नहीं हुए हैं तो भी तू इनकी चिन्ता मत कर। इनकी चिन्ता मैं करूँगा।(3) दूसरे अध्यायके सातवें श्लोकमें अर्जुन भगवान्के शरण हो जाते हैं और फिर आठवें श्लोकमें कहते हैं कि इस भूमण्डलका धनधान्यसे सम्पन्न निष्कण्टक राज्य मिलनेपर अथवा देवताओंका आधिपत्य मिलनेपर भी इन्द्रियोंको सुखानेवाला मेरा शोक दूर नहीं हो सकता। भगवान् मानो कह रहे हैं कि तेरा कहना ठीक ही है क्योंकि भौतिक नाशवान् पदार्थोंके सम्बन्धसे किसीका शोक कभी दूर हुआ नहीं? हो सकता नहीं और होनेकी सम्भावना भी नहीं। परन्तु मेरे शरण होकर जो तू शोक करता है? यह तेरी बड़ी भारी गलती है। तू मेरे शरण होकर भी भार अपने सिरपर ले रहा है(4) शरणागत होनेके बाद भक्तको लोकपरलोक? सद्गतिदुर्गति आदि किसी भी बातकी चिन्ता नहीं करनी चाहिये। इस विषयमें किसी भक्तने कहा है --, दिवि वा भुवि वा ममास्तु वासो नरके वा नरकान्तक प्रकामम्। अवधीरितशारदारविन्दौ चरणौ ते मरणेऽपि चिन्तयामि।। हे नरकासुरका अन्त करनेवाले प्रभो आप मेरेको चाहे स्वर्गमें रखें? चाहे भूमण्डलपर रखें और चाहे यथेच्छ नरकमें रखें अर्थात् आप जहाँ रखना चाहें? वहाँ रखें। जो कुछ करना चाहें? वह करें। इस विषयमें मेरा कुछ भी कहना नहीं है। मेरी तो एक यही माँग है कि शरद् ऋतुके कमलकी शोभाको तिरस्कृत करनेवाले आपके अति सुन्दर चरणोंका मृत्युजैसी भयंकर अवस्थामें भी चिन्तन करता रहूँ आपके चरणोंको भूलूँ नहीं।,शरणागतिसम्बन्धी विशेष बातशरणागत भक्त मैं भगवान्का हूँ और भगवान् मेरे हैं इस भावको दृढ़तासे पकड़ लेता है? स्वीकार कर,लेता है तो उसके भय? शोक? चिन्ता? शङ्का आदि दोषोंकी जड़ कट जाती अर्थात् दोषोंका आधार मिट जाता है। कारण कि भक्तिकी दृष्टिसे सभी दोष भगवान्की विमुखतापर ही टिके रहते हैं।भगवान्के सम्मुख होनेपर भी संसार और शरीरके आश्रयके संस्कार रहते हैं? जो भगवान्के सम्बन्धकी दृढ़ता होनेपर मिट जाते हैं (टिप्पणी 973.1)। उनके मिटनेपर सब दोष भी मिट जाते हैं।सम्बन्धका दृढ़ होना क्या है भय? शोक? चिन्ता? शङ्का? परीक्षा ओर विपरीत भावनाका न होना ही सम्बन्धका दृढ़ होना है। अब इनपर विचार करें।(1) निर्भय होना -- आचरणोंकी कमी होनेसे भीतरसे भय पैदा होता है और साँप? बिच्छू? बाघ आदिसे बाहरसे भय पैदा होता है। शरणागत भक्तके ये दोनों ही प्रकारके भय मिट जाते हैं। इतना ही नहीं? पतञ्जलि महाराजने जिस मृत्युके भयको पाँचवाँ क्लेश माना है (टिप्पणी प0 973.2) और जो बड़ेबड़े विद्वानोंको भी होता है (टिप्पणी प0 973.3) वह भय भी सर्वथा मिट जाता है (टिप्पणी प0 973.4)।अब मेरी वृत्तियाँ खराब हो जायँगी -- ऐसा भयका भाव भी साधकको भीतरसे ही निकाल देना चाहिये क्योंकि मैं भगवान्की कृपामें तरान्तर हो गया हूँ? अब मेरेको किसी बातका भय नहीं है। इन वृत्तियोंको मेरी माननेसे ही मैं इनको शुद्ध नहीं कर सका क्योंकि इनको मेरी मानना ही मलिनता है -- ममता मल जरि जाइ (मानस 7। 117क)। अतः अब मैं कभी भी इनको मेरी नहीं मानूँगा। जब वृत्तियाँ मेरी हैं ही नहीं तो मेरेको भय किस बातका अब तो केवल भगवान्की कृपाहीकृपा है भगवान्की कृपा ही सर्वत्र परिपूर्ण हो रही है यह बड़ी खुशीकी? बड़ी प्रसन्नताकी बात है,कई ऐसी शङ्का करते हैं कि भगवान्के शरण होकर उनका भजन करनेसे तो द्वैत हो जायगा अर्थात् भगवान् और भक्त -- ये दो हो जायँगे और दूसरेसे भय होता है -- द्वितीयाद्वै भयं भवति (बृहदारण्यक0 1। 4। 2)। पर यह शङ्का निराधार है। भय द्वितीयसे तो होता है? पर आत्मीय से भय नहीं होता अर्थात भय दूसरेसे होता है? अपनेसे नहीं। प्रकृति और प्रकृतिका कार्य शरीरसंसार द्वितीय है? इसलिये इनसे सम्बन्ध रखनेपर ही भय होता है क्योंकि इनके साथ सदा सम्बन्ध रह ही नहीं सकता। कारण यह है कि प्रकृति और पुरुषका स्वभाव सर्वथा भिन्नभिन्न है जैसे एक जड है और एक चेतन? एक विकारी है और एक निर्विकारी? एक परिवर्तनशील है और एक अपरिवर्तनशील? एक प्रकाश्य है और एक प्रकाशक? इत्यादि।भगवान् द्वितीय नहीं हैं। वे तो आत्मीय हैं क्योंकि जीव उनका सनातन अंश है? उनका स्वरूप है। अतः भगवान्के शरण होनेपर उनसे भय कैसे हो सकता है प्रत्युत उनके शरण होनेपर मनुष्य सदाके लिये अभय हो जाता है। स्थूल दृष्टिसे देखा जाय तो बच्चेको माँसे दूर रहनेपर भय होता है? पर माँकी गोदमें चले जानेपर उसका भय मिट जाता है क्योंकि माँ उसकी अपनी है। भगवान्का भक्त इससे विलक्षण होता है। कारण कि बच्चे और माँमें तो भेदभाव दीखता है? पर भक्त और भगवान्में भेदभाव सम्भव ही नहीं।(2) निःशोक होना -- जो बात बीत चुकी है? उसको लेकर शोक होता है। बीती हुई बातको लेकर शोक करना बड़ी भारी भूल है क्योंकि जो हुआ है? वह अवश्यम्भावी था और जो नहीं होनेवाला है? वह कभी हो ही नहीं सकता तथा अभी जो हो रहा है? वह ठीकठीक (वास्तविक) होनेवाला ही हो रहा है? फिर उसमें शोक करनेकी कोई बात ही नहीं है (टिप्पणी प0 974.1)। प्रभुके इस मङ्गलमय विधानको जानकर शरणागत भक्त सदा निःशोक रहता है शोक उसके पास कभी आता ही नहीं।(3) निश्चिन्त होना -- जब भक्त अपनी मानी हुई वस्तुओंसहित अपनेआपको भगवान्के समर्पित कर देता है? तब उसको लौकिकपारलौकिक किञ्चिन्मात्र भी चिन्ता नहीं होती अर्थात् अभी जीवननिर्वाह कैसे होगा कहाँ रहना होगा मेरी क्या दशा होगी क्या गति होगी आदि चिन्ताएँ बिलकुल नहीं रहतीं (टिप्पणी प0 974.2)। भगवान्के शरण होनेपर शरणागत भक्तमें यह एक बात आती है कि अगर मेरा जीवन प्रभुके लायक सुन्दर और शुद्ध नहीं बना तो भक्तोंकी बात मेरे आचरणमें कहाँ आयी अर्थात् नहीं आयी क्योंकि मेरी वृत्तियाँ ठीक नहीं रहतीं। वास्तवमें मेरी वृत्तियाँ है ऐसा मानना ही दोष है? वृत्तियाँ उतनी दोषी नहीं हैं। मन? बुद्धि? इन्द्रियाँ? शरीर आदिमें जो मेरापन है -- यही गलती है क्योंकि जब मैं भगवान्के शरण हो गया और जब सब कुछ उनके अर्पण कर दिया? तो फिर मन? बुद्धि आदिकी अशुद्धिकी चिन्ता कभी नहीं करनी चाहिये अर्थात् मेरी वृत्तियाँ ठीक नहीं हैं -- ऐसा भाव कभी नहीं लाना चाहिये। किसी कारणवश अचानक ऐसी वृत्तियाँ आ भी जायँ तो आर्तभावसेहे मेरे नाथ हे मेरे प्रभो बचाओ बचाओ बचाओ ऐसे प्रभुको पुकारना चाहिये क्योंकि वे मेरे स्वामी हैं? मेरे सर्वप्रथम प्रभु हैं तो अब मैं चिन्ता क्यों करूँ और भगवान्ने भी कह दिया है कितू चिन्ता मत कर (मा शुचः)। अतः निश्चिन्त होकर मनसे भगवान्के चरणोंमें गिर जाय और भगवान्से कह दे -- हे नाथ यह सब आपके हाथकी बात है? आप जानें।सर्वप्रथम प्रभुके शरण भी हो गये और चिन्ता भी करें -- ये दोनों बातें बड़ी विरोधी हैं क्योंकि शरण हो गये तो चिन्ता कैसी और चिन्ता होती है तो शरणागति कैसी इसलिये शरणागतको ऐसा सोचना चाहिये कि जब,भगवान् यह कहते हैं किमैं सम्पूर्ण पापोंसे छुड़ा दूँगा? तो क्या ऐसी वृत्तियोंसे छूटनेके लिये मेरेको कुछ करना पड़ेगा मैं तो बस? आपका हूँ। हे भगवन् मेरेमें वृत्तियोंको अपना माननेका भाव कभी आये ही नहीं। हे नाथ शरीर? इन्द्रियाँ? प्राण? मन? बुद्धि -- ये कभी मेरे दीखें ही नहीं परन्तु हे नाथ सब कुछ आपको देनेपर भी ये शरीर आदि कभीकभी मेरे दीख जाते हैं अब इस अपराधसे मेरेको आप ही छुड़ाइये -- ऐसा कहकर निश्चिन्त हो जाय।(4) निःशङ्क होना -- भगवान्के सम्बन्धमें कभी यह सन्देह न करे कि मैं भगवान्का हुआ या नहीं भगवान्ने मुझे स्वीकार किया या नहीं प्रत्युत इस बातको देखे किमैं तो अनादिकालसे भगवान्का ही रहूँगा। मैंने ही अपनी मूर्खतासे अपनेको भगवान्से अलग -- विमुख मान लिया था। परन्तु मैं अपनेको भगवान्से कितना ही अलग मान लूँ तो भी उनसे अलग हो सकता ही नहीं और होना सम्भव भी नहीं। अगर मैं भगवान्से अलग होना भी चाहूँ? तो भी अलग कैसे हो सकता हूँ क्योंकि भगवान्ने कहा है कि यह जीव मेरा ही अंश है -- मम एव अंशः (गीता 15। 7)। इस प्रकारमैं भगवान्का हूँ और भगवान् मेरे हैं -- इस वास्तविकताकी स्मृति आते ही शङ्काएँ -- सन्देह मिट जाते हैं? शङ्काओं -- सन्देहोंके लिये किञ्चिन्मात्र भी गुंजाइश नहीं रहती।(5) परीक्षा न करना -- भगवान्के शरण होकर ऐसी परीक्षा न करे किजब मैं भगवान्के शरण हो गया हूँ तो मेरेमें ऐसेऐसे लक्षण घटने चाहिये। यदि ऐसेऐसे लक्षण मेरेमें नहीं हैं तो मैं भगवान्के शरण कहाँ हुआ प्रत्युतअद्वेष्टा आदि (गीता 12। 13 -- 19) गुणोंकी अपनेमें कमी दीखे तो आश्चर्य करे कि मेरेमें यह कमी कैसे रह गयी। (टिप्पणी प0 975) ऐसा भाव आते ही यह कमी नहीं रहेगी? मिट जायगी। कारण कि यह उसका प्रत्यक्ष अनुभव है कि पहले अद्वेष्टा आदि गुण जितने कम थे? उतने कम अब नहीं हैं। शरणागत होनेपर भक्तोंके जितने भी लक्षण हैं? वे सब बिना प्रयत्न किये जाते हैं।(6) विपरीत धारणा न करना -- भगवान्के शरणागत भक्तमें यह विपरीत धारणा भी कैसे हो सकती है किमैं भगवान्का नहीं हूँ क्योंकि यह मेरे मानने अथवा न माननेपर निर्भर नहीं है। भगवान्का और मेरा परस्पर जो सम्बन्ध है? वह अटूट है? अखण्ड है? नित्य है। मैंने इस सम्बन्धकी तरफ खयाल नहीं किया? यह मेरी गलती थी। अब वह गलती मिट गयी? तो फिर विपरीत धारणा हो ही कैसे सकती हैजो मनुष्य सच्चे हृदयसे प्रभुकी शरणागतिको स्वीकार कर लेता है? उसमें भय? शोक? चिन्ता आदि दोष नहीं रहते। उसका शरणभाव स्वतः ही दृढ़ होता चला जाता है जैसेविवाह होनेके बाद कन्याका अपने पिताके घरसे सम्बन्धविच्छेद और पतिके घरसे सम्बन्ध स्वतः ही दृढ़ होता चला जाता है। वह सम्बन्ध यहाँतक दृढ़ हो जाता है कि जब वह कन्या दादीपरदादी बन जाती है? तब उसको स्वप्नमें भी यह भाव नहीं आता कि मैं यहाँकी नहीं हूँ। उसके मनमें यह भाव दृढ़ हो जाता है कि मैं तो यहाँकी ही हूँ और ये सब मेरे ही हैं। जब उसके पौत्रकी स्त्री आती है और घरमें उद्दण्डता करती है? खटपट मचाती है तो वह (दादी) कहती है कि इस परायी जायी छोकरीने मेरा घर बिगाड़ दिया पर उस बूढ़ी दादीको यह बात याद ही नहीं आती कि मैं भी तो परायी जायी (पराये घरमें जन्मी) हूँ। तात्पर्य यह हुआ कि जब बनावटी सम्बन्धमें भी इतनी दृढ़ता हो सकती है? तब भगवान्के ही अंश इस प्राणीका भगवान्के साथ जो नित्य सम्बन्ध है? वह दृढ़ हो जाय -- इसमें आश्चर्य ही क्या है वास्तवमें भगवान्के सम्बन्धकी दृढ़ताके लिये केवल संसारके माने हुए सम्बन्धों का त्याग करनेकी ही आवश्यकता है।सच्चे हृदयसे प्रभुके चरणोंकी शरण होनेपर उस शरणागत भक्तमें यदि किसी भाव? आचरण आदिकी किञ्चित कमी रह जाय? कभी विपरीत वृत्ति पैदा हो जाय अथवा किसी परिस्थितिमें पड़कर (परवशतासे) कभी किञ्चित् कोई दुष्कर्म हो जाय? तो उसके हृदयमें जलन पैदा हो जायगी। इसलिये उसके लिये अन्य कोई प्रायश्चित्त करनेकी आवश्यकता नहीं है। भगवान् कृपा करके उसके उस पापको सर्वथा नष्ट कर देते हैं (टिप्पणी प0 976.1)।भगवान् भक्तके अपनेपनको ही देखते हैं? गुणों और अवगुणोंको नहीं (टिप्पणी प0 976.2) अर्थात् भगवान्को भक्तके दोष दीखते ही नहीं? उनको तो केवल भक्तके साथ जो अपनापन है? वही दीखता है। कारण कि स्वरूपसे भक्त सदासे ही भगवान्का है। दोष आगन्तुक होनेसे आतेजाते रहते हैं और वह नित्य निरन्तर ज्योंकात्यों ही रहता है। इसलिये भगवान्की दृष्टि सदा इस वास्तविकतापर ही जमी रहती है। जैसे? कीचड़ आदिसे सना हुआ बच्चा जब माँके सामने आता है? तब माँकी दृष्टि केवल अपने बच्चेकी तरफ जाती है बच्चेकी मैलेकी तरफ नहीं जाती। बच्चेकी दृष्टि भी मैलेकी तरफ नहीं जाती। माँ साफ करे या न करे? पर बच्चेकी दृष्टिमें तो मैला है ही नहीं? उसकी दृष्टिमें तो केवल माँ ही है। द्रौपदीके मनमें कितना द्वेष और क्रोध भरा हुआ था कि जब दुःशासनके खूनसे अपने केश धोऊँगी? तभी केशोंको बाँधूँगी परन्तु द्रौपदी जब भी भगवान्को पुकारती है? भगवान् चट आ चाते हैं क्योंकि भगवान्के साथ द्रौपदीका गाढ़ अपनापन था।भगवान्के साथ अपनापन होनेमें दो भाव रहते हैं -- (1) भगवान् मेरे हैं और (2) मैं भगवान् का हूँ। इन दोनोंमें भगवान्का सम्बन्ध समान रीतिसे रहते हुए भीभगवान् मेरे हैं -- इस भावमें भगवान्से अपनी अनुकूलताकी इच्छा है किभगवान् मेरे हैं तो मेरी इच्छाकी पूर्ति क्यों नहीं करते परन्तुमैं भगवान्का हूँ इस भावमें भगवान्से अपनी अनुकूलता की इच्छा नहीं हो सकती क्योंकिमैं भगवान्का हूँ तो भगवान् मेरे लिये जैसा ठीक समझें? वैसा ही निःसंकोच होकर करें। इसलिये साधकको चाहिये कि वह भगवान्की ही मरजीमें सर्वथा अपनी मरजी मिला दे? भगवान्पर अपना किञ्चित भी आधिपत्य न माने? प्रत्युत अपनेपर उनका पूरा आधिपत्य माने। कहीँ भी भगवान् हमारे मनकी करें तो उसमें संकोच हो कि मेरे लिये भगवान्को ऐसा करना पड़ा यदि अपने मनकी बात पूरी होनेसे संकोच नहीं होता? प्रत्युत संतोष होता है तो यह शरणागति नहीं है। शरणागत भक्त शरीर? इन्द्रियाँ? मन? बुद्धिके प्रतिकूल परिस्थितिमें भी भगवान्की मरजी समझकर प्रसन्न रहता है।शरणागत भक्तको अपने लिये कभी किञ्चिन्मात्र भी कुछ करना शेष नहीं रहता क्योंकि उसने सम्पूर्ण ममतावाली वस्तुओंसहित अपनेआपको भगवान्के समर्पित कर दिया जो वास्तवमें प्रभुका ही था। अब करने? कराने आदिका सब काम भगवान्का ही रह गया। ऐसी अवस्थामें वह कठिनसेकठिन और भयंकरसेभंयकर घटना? परिस्थितिमें भी अपनेपर प्रभुकी महान् कृपा देखकर सदा प्रसन्न रहता है मस्त रहता है। जैसे? गरुडजीके पूछनेपर काकभुशुण्डिजीने अपने पूर्वजन्मके ब्राह्मणशरीरकी कथा सुनायी? जिसमें लोमश ऋषिने शाप देकर उन्हें (ब्राह्मणको) पक्षियोंमें नीच चाण्डाल पक्षी (कौआ) बना दिया परन्तु काकभुशुण्डिजीके मनमें न कुछ भय हुआ और न कुछ दीनता ही आयी। उन्होंने उसमें भगवान्का शुद्ध विधान ही समझा। केवल समझा ही नहीं? प्रत्युत मनहीमन बोल उठे -- उर प्रेरक रघुबंस बिभूषन (मानस 7। 113। 1)। ऐसा भयंकर शाप मिलनेपर भी जब काकभुशुण्डिजीकी प्रसन्नतामें कोई कमी नहीं आयी? तब लोमश ऋषिने उनको भगवान्का प्यारा भक्त समझकर अपने पास बुलाया और बालक रामजीका ध्यान बताया। फिर भगवान्की कथा सुनायी और अत्यन्त प्रसन्न होकर काकभुशुण्डिजीके सिरपर हाथ रखकर आशीर्वाद दिया -- मेरी कृपासे तुम्हारे हृदयमें अबाध? अखण्ड रामभक्ति रहेगी। तुम रामजीके प्यारे हो जाओगे। तुम सम्पूर्ण गुणोंकी खान बन जाओगे। जिस रूपकी इच्छा करोगे? वह रूप धारण कर लोगे। जिस स्थानपर तुम रहोगे? उसमें एक योजनापर्यन्त मायाका कण्टक किञ्चिन्मात्र भी नहीं आयेगा आदिआदि। इस प्रकार बहुतसे आशीर्वाद देते ही आकाशवाणी हुई किहे ऋषे तुमने जो कुछ कहा? वह सब सच्चा होगा? यह मन? वाणी? कर्मसे मेरा भक्त है। इन्हीं बातोंको लेकर भगवान्के विधानमें सदा प्रसन्न रहनेवाले काकभुशुण्डिजीने कहा है --, भगति पच्छ हठ करि रहेउँ दीन्हि महा रिषि साप। मुनि दुर्लभ बर पायउँ देखहु भजन प्रताप।। (मानस 7। 114 ख)यहाँभजन प्रताप शब्दोंका अर्थ है -- भगवान्के विधानमें हर समय प्रसन्न रहना। विपरीतसेविपरीत अवस्थामें भी प्रेमी भक्तकी प्रसन्नता अधिकसेअधिक बढ़ती रहती है क्योंकि प्रेमका स्वरूप ही प्रतिक्षण वर्धमान है।यह नियम है कि जो चीज अपनी होती है? सदा ही अपनेको प्यारी लगती है। भगवान् सम्पूर्ण जीवोंको अपना प्रिय मानते हैं -- सब मम प्रिय सब मम उपजाए (मानस 7। 86। 2) और इस जीवको भी प्रभु स्वतः ही प्रिय लगते हैं। हाँ? यह बात दूसरी है कि यह जीव परिवर्तनशील संसार और शरीरको भूलसे अपना मानकर अपने प्यारे प्रभुसे विमुख हो जाता है। इसके विमुख होनेपर भी भगवान्ने अपनी तरफसे किसी भी जीवका त्याग नहीं किया है और न कभी त्याग कर ही सकते हैं। कारण कि जीव सदासे साक्षात् भगवान्का ही अंश है। इसलिये सम्पूर्ण जीवोंके साथ भगवान्की आत्मीयता अक्षुण्ण? अखणडितरूपसे स्वाभाविक ही बनी हुई है। इसीसे वे मात्र जीवोंपर कृपा करनेके लिये अर्थात् भक्तोंकी रक्षा? दुष्टोंका विनाश और धर्मकी स्थापना -- इन तीन बातोंके लिये समयसमयपर अवतार लेते हैं (गीता 4। 8)। इन तीनों बातोंमें केवल भगवान्की आत्मीयता ही टपक रही है? नहीं तो भक्तोंकी रक्षा? दुष्टोंका विनाश और धर्मकी स्थापनासे भगवान्का क्या प्रयोजन सिद्ध होता है अर्थात् कुछ भी प्रयोजन सिद्ध नहीं होता। भगवान् तो ये तीनों ही काम केवल प्राणिमात्रके कल्याणके लिये ही करते हैं। इससे भी प्राणिमात्रके साथ भगवान्की स्वाभाविक आत्मीयता? कृपालुता? प्रियता? हितैषिता? सुहृत्ता और निरपेक्ष उदारता ही सिद्ध होती है? और यहाँ भी इसी दृष्टिसे अर्जुनसे कहते हैं -- मद्भक्तो भव? मन्मना भव? मद्याजी भव? मां नमस्कुरु। इन चारों बातोंमें भगवान्का तात्पर्य केवल जीवको अपने सम्मुख करानेमें ही है? जिससे सम्पूर्ण जीव असत् पदार्थोंसे विमुख हो जायँ क्योंकि दुःख? संताप? बारबार जन्मनामरना? मात्र विपत्ति आदिमें मुख्य हेतु भगवान्से विमुख होना ही है।भगवान् जो कुछ भी विधान करते हैं? वह संसारमात्रके सम्पूर्ण जीवोंके कल्याणके लिये ही करते हैं -- बस? भगवान्की इस कृपाकी तरफ जीवकी दृष्टि हो जाय? तो फिर उसके लिये क्या करना बाकी रहा जीवोंके हितके लिये भगवान्के हृदयमें एक तड़पन है? इसीलिये भगवान् सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज वाली अत्यन्त गोपनीय बात कह देते हैं। कारण कि भगवान् जीवमात्रको अपना मित्र मानते हैं -- सुहृदं सर्वभूतानाम् (5। 29) और उन्हें यह स्वतन्त्रता देते हैं कि वे कर्मयोग? ज्ञानयोग? भक्तियोग आदि जितने भी साधन हैं? उनमेंसे किसी भी साधनके द्वारा सुगमतापूर्वक मेरी प्राप्ति कर सकते हैं और दुःख? संताप,आदिको सदाके लिये समूल नष्ट कर सकते हैं।वास्तवमें जीवका उद्धार केवल भगवत्कृपासे ही होता है। कर्मयोग? ज्ञानयोग? भक्तियोग? अष्टाङ्गयोग? लययोग? हठयोग? राजयोग? मन्त्रयोग आदि जितने भी साधन हैं? वे सबकेसब भगवान्के द्वारा और भगवत्तत्त्वको जाननेवाले महापुरुषोंके द्वारा ही प्रकट किये गये हैं (टिप्पणी प0 977.1)। अतः इन सब साधनोंमें भगवत्कृपा ही ओतप्रोत है। साधन करनेमें तो साधक निमित्तमात्र होता है? पर साधनकी सिद्धिमें भगवत्कृपा ही मुख्य है।शरणागत भक्तको तो ऐसी चिन्ता भी कभी नहीं करनी चाहिये कि अभी भगवान्के दर्शन नहीं हुए? भगवान्के चरणोंमें प्रेम नहीं हुआ? अभी वृत्तियाँ शुद्ध नहीं हुईँ? आदि। इस प्रकारकी चिन्ताएँ करना मानो बँदरीका बच्चा बनना है। बँदरीका बच्चा स्वयं ही बँदरीको पकड़े रहता है। बँदरी कूदेफाँदे? किधर भी जाय? बच्चा स्वयं बँदरीसे चिपका रहता है।भक्तको तो अपनी सब चिन्ताएँ भगवान्पर ही छोड़ देनी चाहिये अर्थात् भगवान् दर्शन दें या न दें? प्रेम दें या न दें? वृत्तियोंको ठीक करें या न करें? हमें शुद्ध बनायें या न बनायें -- यह सब भगवान्की मरजीपर छोड़ देना चाहिये। उसे तो बिल्लीका बच्चा बनना चाहिये। बिल्लीका बच्चा अपनी माँपर निर्भर रहता है। बिल्ली चाहे जहाँ रखे? चाहे जहाँ ले जाय। बिल्ली अपनी मरजीसे बच्चेको उठाकर ले जाती है तो वह पैर समेट लेता है। ऐसे ही शरणागत भक्त संसारकी तरफसे अपने हाथपैर समेटकर (टिप्पणी प0 977.2) केवल भगवान्का चिन्तन? नामजप आदि करते हुए भगवान्की तरफ ही देखता रहता है। भगवान्का जो विधान है? उसमें परम प्रसन्न रहता है? अपने मनकी कुछ भी नहीं लगाता।जैसे? कुम्हार पहले मिट्टीको सिरपर उठाकर लाता है तो कुम्हारकी मरजी? फिर उस मिट्टीको गीला करके उसे रौंदता है तो कुम्हारकी मरजी? फिर चक्केपर चढ़ाकर घुमाता है तो कुम्हारकी मरजी। मिट्टी कभी कुछ नहीं कहती कि तुम घड़ा बनाओ? सकोरा? मटकी बनाओ। कुम्हार चाहे जो बनाये? उसकी मरजी है। ऐसे ही शरणागत भक्त अपनी कुछ भी मरजी? मनकी बात नहीं रखता। वह जितना अधिक निश्चिन्त और निर्भय होता है? भगवत्कृपा उसको अपनेआप उतना ही अधिक अपने अनुकूल बना लेती है और जितनी वह चिन्ता करता है? अपना बल मानता है? उतना ही वह आती हुई भगवत्कृपामें बाधा लगाता है अर्थात् शरणागत होनेपर भगवान्की ओरसे जो विलक्षण? विचित्र? अखण्ड? अटूट कृपा आती है? अपनी चिन्ता करनेसे उस कृपामें बाधा लग जाती है।जैसे धीवर (मछुआ) मछलियोंको पकड़नेके लिये नदीमें जाल डालता है तो जालके भीतर आनेवाली सब मछलियाँ पकड़ी जाती हैं परन्तु जो मछली जाल डालनेवाले मछुएके चरणोंके पास आ जाती है? वह नहीं पकड़ी जाती। ऐसे ही भगवान्की माया(संसार) में ममता करके जीव फँस जाते हैं और जन्मतेमरते रहते हैं परन्तु जो जीव मायापति भगवान्के चरणोंकी शरण हो जाते हैं? वे मायाको तर जाते हैं -- मामेव ये प्रपद्यन्ते मायामेतां तरन्ति ते (गीता 7। 14)। इस दृष्टान्तका एक ही अंश ग्रहण करना चाहिये क्योंकि धीवरका तो मछलियोंको जालमें फँसानेका भाव होता है परन्तु भगवान्का जीवोंको मायामें फँसानेका किञ्चिन्मात्र भी भाव नहीं होता। भगवान्का भाव तो जीवोंको मायाजालसे मुक्त करके अपने शरण लेनेका होता है? तभी तो वे कहते हैं -- मामेकं शरणं व्रज। जीव संयोगजन्य सुखकी लोलुपतासे खुद ही मायासे फँस जाते हैं।जैसे चलती हुई चक्कीके भीतर आनेवाले सभी दाने पिस जाते हैं (टिप्पणी प0 978) परन्तु जिसके आधारपर चक्की चलती है? उस कीलके आसपास रहनेवाले दाने ज्योंकेत्यों साबूत रह जाते हैं। ऐसे ही जन्ममरणरूप संसारकी चलती हुई चक्कीमें पड़े हुए सबकेसब जीव पिस जाते हैं अर्थात् दुःख पाते हैं,परन्तु जिसके आधारपर संसारचक्र चलता है? उन भगवान्के चरणोंका सहारा लेनेवाला जीव पिसनेसे बच जाता है -- कोई हरिजन ऊबरे? कील माकड़ी पास। परन्तु यह दृष्टान्त भी पूरा नहीं घटता क्योंकि दाने तो स्वाभाविक ही कीलके पास रह जाते हैं। वे बचनेका कोई उपाय नहीं करते। परन्तु भगवान्के भक्त संसारसे विमुख होकर प्रभुके चरणोंका आश्रय लेते हैं। तात्पर्य यह है कि जो भगवान्का अंश होकर भी संसारको अपना मानता है अथवा संसारसे कुछ चाहता है? वही जन्ममरणरूप चक्रमें पड़कर दुःख भोगता है।संसार और भगवान् -- इन दोनोंका सम्बन्ध दो तरहका होता है। संसारका सम्बन्ध केवल माना हुआ है और भगवान्का सम्बन्ध वास्तविक है। संसारका सम्बन्ध तो मनुष्यको पराधीन बनाता है? गुलाम बनाता है? पर भगवान्का सम्बन्ध मनुष्यको स्वाधीन बनाता है? चिन्मय बनाता है और बनाता है भगवान्का भी मालिककिसी बातको लेकर अपनेमें कुछ भी विशेषता दीखती है? यही वास्तवमें पराधीनता है। यदि मनुष्य विद्या? बुद्धि? धनसम्पत्ति? त्याग? वैराग्य आदि किसी बातको लेकर अपनी विशेषता मानता है तो यह उस विद्या आदिकी पराधीनता? दासता ही है। जैसे? कोई धनको लेकर अपनेमें विशेषता मानता है तो यह विशेषता वास्तवमें धनकी ही हुई? खुदकी नहीं। वह अपनेको धनका मालिक मानता है? पर वास्तवमें वह धनका गुलाम है।संसारका यह कायदा है कि सांसारिक पदार्थोंको लेकर जो अपनेमें कुछ विशेषता मानता है? उसको ये सांसारिक पदार्थ तुच्छ बना देते हैं? पददलित कर देते हैं। परन्तु जो भगवान्के आश्रित होकर सदा भगवान्पर ही निर्भर रहता है? उसको अपनी कुछ विशेषता दीखती ही नहीं? प्रत्युत भगवान्की ही अलौकिकता? विलक्षणता? विचित्रता दीखती है। भगवान् चाहे उसको अपना मुकुटमणि बना लें और चाहे अपना मालिक बना लें? तो भी उसको अपनेमें कुछ भी विशेषता नहीं दीखती। प्रभुका यह कायदा है कि जिस भक्तको अपनेमें कुछ भी विशेषता नहीं दीखती? अपनेमें किसी बातका अभिमान नहीं होता? उस भक्तमें भगवान्की विलक्षणता उतर आती है। किसीकिसीमें यहाँ तक विलक्षणता उतर आती है कि उसके शरीर? इन्द्रियाँ? मन? बुद्धि आदि प्राकृत पदार्थ भी चिन्मय बन जाते हैं। उनमें जडताका अत्यन्त अभाव हो जाता है। ऐसे भगवान्के कई प्रेमी भक्त भगवान्में ही समा गये? अन्तमें उनके शरीर नहीं मिले। जैसे मीराबाई शरीरसहित भगवान्के श्रीविग्रहमें लीन हो गयीं। केवल पहचानके लिये उनकी साड़ीका छोटासा छोर श्रीविग्रहके मुखमें रह गया और कुछ नहीं बचा। ऐसे ही सन्त श्रीतुकारामजी शरीरसहित वैकुण्ठ चले गये।ज्ञानमार्गमें शरीर चिन्मय नहीं होता क्योंकि ज्ञानी असत्से सम्बन्धविच्छेद करके? असत्से अलग होकर स्वयं चिन्मय तत्त्वमें स्थित हो जाता है। परन्तु जब भक्त भगवान्के सम्मुख होता है? तब उसके शरीर? इन्द्रियाँ? मन? प्राण आदि सभी भगवान्के सम्मुख हो जाते हैं। तात्पर्य यह हुआ कि जिनकी दृष्टि केवल चिन्मय तत्त्वपर ही है अर्थात् जिनकी दृष्टिमें चिन्मय तत्त्वसे भिन्न जडताकी स्वतन्त्र सत्ता ही नहीं होती? तो वह चिन्मयता उनके शरीर आदिमें भी उतर आती है और वे शरीर आदि चिन्मय हो जाते हैं। हाँ? लोगोंकी दृष्टिमें तो उनके शरीरमें जडता दीखती है? पर वास्तवमें उनके शरीर चिन्मय ही होते हैं।भगवान्के सर्वथा शरण हो जानेपर शरणागतके लिये भगवान्की कृपा तो विशेषतासे प्रकट होती ही है? पर मात्र संसारका स्नेहपूर्वक पालन करनेवाली और भगवान्से अभिन्न रहनेवाली वात्सल्यमयी माता लक्ष्मीका प्रभुशरणागतपर कितना अधिक स्नेह होता है वे कितना अधिक प्यार करती हैं? इसका कोई भी वर्णन नहीं कर सकता। लौकिक व्यवहारमें भी देखनेमें आता है कि पतिव्रता स्त्रीको पितृभक्त पुत्र बहुत प्यारा लगता है।दूसरी बात? प्रेमभावसे परिपूरित प्रभु जब अपने भक्तको देखनेके लिये गरुडपर बैठकर पधारते हैं? तब माता लक्ष्मी भी प्रभुके साथ गरुडपर बैठकर आती हैं? जिस गरुडकी पाँखोंसे सामवेदके मन्त्रोंका गान होता रहता,है परन्तु कोई भगवान्को न चाहकर केवल माता लक्ष्मीको ही चाहता है? तो उसके स्नेहके कारण माता लक्ष्मी आ तो जाती हैं? पर उनका वाहन दिवान्ध उल्लू होता है। ऐसे वाहनवाली लक्ष्मीको प्राप्त करके मनुष्य भी मदान्ध हो जाता है। अगर उस माँको कोई भोग्या समझ लेता है तो उनका बड़ा भारी पतन हो जाता है क्योंकि वह तो अपनी माँको ही कुदृष्टिसे देखता है? इसलिये वह महान् अधम है।तीसरी बात? जहाँ केवल भगवान्का प्रेम होता है? वहाँ तो भगवान्से अभिन्न रहनेवाली लक्ष्मी भगवान्के साथ आ ही जाती हैं? पर जहाँ केवल लक्ष्मीकी चाहना है? वहाँ लक्ष्मीके साथ भगवान् भी आ जायँ -- यह नियम नहीं है।शरणागतिके विषयमें एक कथा आती है। सीताजी? रामजी और हनुमान्जी जंगलमें एक वृक्षके नीचे बैठे थे। उस वृक्षकी शाखाओं और टहनियोंपर एक लता छायी हुई थी। लताके कोमलकोमल तन्तु फैल रहे थे। उन तन्तुओंमें कहींपर नयीनयी कोपलें निकल रही थीं और कहींपर ताम्रवर्णके पत्ते निकल रहे थे। पुष्प और पत्तोंसे लता छायी हुई थी। उससे वृक्षकी सुन्दर शोभा हो रही थी। वृक्ष बहुत ही सुहावना लग रहा था। उस वृक्षकी शोभाको देखकर भगवान् श्रीराम हनुमान्जीसे बोले -- देखो हनुमान् यह लता कितनी सुन्दर है वृक्षके चारों ओर कैसी छायी हुई है यह लता अपने सुन्दरसुन्दर फल? सुगन्धित फूल और हरीभरी पत्तियोंसे इस वृक्षकी कैसी शोभा बढ़ा रही है इससे जंगलके अन्य सब वृक्षोंसे यह वृक्ष कितना सुन्दर दीख,रहा है इतना ही नहीं? इस वृक्षके कारण ही सारे जंगलकी शोभा हो रही है। इस लताके कारण ही पशुपक्षी इस वृक्षका आश्रय लेते हैं। धन्य है यह लताभगवान् श्रीरामके मुखसे लताकी प्रसंशा सुनकर सीताजी हनुमान्जीसे बोलीं -- देखो बेटा हनुमान् तुमने खयाल किया कि नहीं देखो? इस लताका ऊपर चढ़ जाना? फूलपत्तोंसे छा जाना? तन्तुओंका फैल जाना -- ये सब वृक्षके आश्रित हैं? वृक्षके कारण ही हैं। इस लताकी शोभा भी वृक्षके ही कारण हैं। इसलिये मूलमें महिमा तो वृक्षकी ही है। आधार तो वृक्ष ही है। वृक्षके सहारे बिना लता स्वयं क्या कर सकती है कैसे छा सकती है अब बोलो हनुमान् तुम्हीं बातओ? महिमा वृक्षकी ही हुई न रामजीने कहा -- क्यों हनुमान् यह महिमा तो लताकी ही हुई न, हनुमान्जी बोले -- हमें तीसरी ही बात सूझती है। सीताजीने पूछा -- वह क्या है बेटा हनुमान्जीने कहा -- माँ वृक्ष और लताकी छाया बड़ी सुन्दर है। इसलिये हमें तो इन दोनोंकी छायामें रहना ही अच्छा लगता है अर्थात् हमें तो आप दोनोंकी छाया(चरणोंके आश्रय) में रहना ही अच्छा लगता हैसेवक सुत पति मातु भरोसें। रहइ असोच बनइ प्रभु पोसें।। (मानस 4। 3। 2)ऐसे ही भगवान् और उनकी दिव्य आह्लादिनी शक्ति -- दोनों ही एकदूसरेकी शोभा बढ़ाते हैं। परन्तु कोई तो उन दोनोंको श्रेष्ठ बताता है? कोई केवल भगवान्को श्रेष्ठ बताता है और कोई केवल उनकी आह्लादिनी शक्तिको श्रेष्ठ बताता है। शरणागत भक्तके लिये तो प्रभु और उनकी आह्लादिनी शक्ति -- दोनोंका आश्रय ही श्रेष्ठ है।एक बार एक प्रज्ञाचक्षु (नेत्रहीन) संत हाथमें लाठी पकड़े हुए यमुनाके किनारेकिनारे चले जा रहे थे। नदीमें बाढ़ आयी हुई थी। उससे एक जगह यमुनाका किनारा पानीमें गिर पड़ा तो बाबाजी भी पानीमे गिर पड़े।,हाथसे लाठी छूट गयी थी। दीखता तो था ही नहीं? अब तैरें तो किधर तैरें भगवान्की शरणागतिकी बात याद आते ही प्रयासरहित होकर शरीरको ढीला छोड़ दिया तो उनको ऐसा लगा कि किसीने हाथ पकड़कर किनारेपर डाल दिया। वहाँ दूसरी कोई लाठी हाथमें आ गयी और उसके सहारे वे चले पड़े। तात्पर्य यह है कि जो भगवान्के शरण होकर भगवान्पर निर्भर रहता है? उसको अपने लिये करना कुछ नहीं रहता। भगवान्के विधानसे जो हो जाय? उसीमें वह प्रसन्न रहता है।बहुतसी भेड़बकरियाँ जंगलमें चरने गयीं। उनमेंसे एक बकरी चरतेचरते एक लतामें उलझ गयी। उसको उस लतामें निकलनेमें बहुत देर लगी? तबतक अन्य सब भेड़बकरियाँ अपने घर पहुँच गयीं। अँधेरा भी हो रहा था। वह बकरी घूमतेघूमते एक सरोवरके किनारे पहुँची। वहाँ किनारेकी गीली जमीनपर सिंहका एक चरणचिन्ह अङ्कित था। वह उस चरणचिन्हके शरण होकर उसके पास बैठ गयी। रातमें जंगली सियार? भेड़िया? बाघ आदि प्राणी बकरीको खानेके लिये पासमें आये तो उस बकरीने बता दिया किपहले देख लेना कि मैं किसके शरणमें हूँ? तब मुझे खाना वे चिन्हको देखकर कहने लगे -- अरे? यह तो सिंहके चरणचिन्हके शरण है? जल्दी भागो यहाँसे सिंह आ जायगा तो हमको मार डालेगा। इस प्रकार सभी प्राणी भयभीत होकर भाग गये। अन्तमें जिसका चरणचिन्ह था? वह सिंह स्वयं आया और बकरीसे बोला -- तू जंगलमें अकेली कैसे बैठी है बकरीने कहा -- यह चरणचिन्ह देख लेना? फिर बात करना। जिसका यह चरणचिन्ह है? उसीके मैं शरण हुए बैठी हूँ। सिंहने देखा किओह यह तो मेरा ही चरण चिन्ह है? यह,बकरी तो मेरे ही शरण हुई सिंहने बकरीको आश्वासन दिया कि अब तुम डरो मत? निर्भय होकर रहो।रातमें जब जल पीनेके लिये हाथी आया तो सिंहने हाथीसे कहा -- तू इस बकरीको पीठपर चढ़ा ले इसको जंगलमें चराकर लाया कर और हरदम अपनी पीठपर ही रखा कर? नहीं तो तू जानता नहीं कि मैं कौन हूँ मार डालूँगा सिंहकी बात सुनकर हाथी थरथर काँपने लगा उसने अपनी सूँडसे झट बकरीको पीठपर चढ़ा लिया। अब वह बकरी निर्भय होकर हाथीकी पीठपर बैठेबैठे ही वृक्षोंकी ऊपरकी कोंपलें खाया करती और मस्त रहती। खोज पकड़ सैंठे रहो? धणी मिलेंगे आय। अजया गज मस्तक चढ़े? निर्भय कोंपल खाय।।ऐसे ही जब मनुष्य भगवान्के शरण हो जाता है? उनके चरणोंका सहारा ले लेता है? तब वह सम्पूर्ण प्राणियोंसे? विघ्नबाधाओंसे निर्भय हो जाता है। उसको कोई भी भयभीत नहीं कर सकता? उसका कोई भी कुछ बिगाड़ नहीं सकता। जो जाको शरणो गहै? ताकहँ ताकी लाज। उलटे जल मछली चले? बह्यो जात गजराज।।भगवान्के साथ काम? भय? द्वेष? क्रोध? स्नेह आदिसे भी सम्बन्ध क्यों न जोड़ा जाय? वह भी जीवका कल्याण करनेवाला ही होता है (टिप्पणी प0 980)। तात्पर्य यह हुआ कि काम? भय? द्वेष आदि किसी तरहसे भी जिनका भगवान्के साथ सम्बन्ध जुड़ गया? उनका तो उद्धार हो ही गया? पर जिन्होंने किसी तरहसे भी भगवान्के साथ सम्बन्ध नहीं जोड़ा? उदासीन ही रहे? वे भगवत्प्राप्तिसे वञ्चित रह गये भगवान्के अनन्य भक्तोंके लिये नारदजीने कहा --, नास्ति तेषु जातिविद्यारूपकुलधनक्रियादिभेदः। (नारदभक्तिसूत्र 72)उन भक्तोंमें जाति? विद्या? रूप? कुल? धन? क्रिया आदिका भेद नहीं है।तात्पर्य यह है कि स्थूल? सूक्ष्म और कारणशरीरको लेकर सांसारिक जितने भी जाति? विद्या आदि भेद हो सकते हैं? वे सब उनपर लागू नहीं होते जो सर्वथा भगवान्के अर्पित हो गये हैं (टिप्पणी प0 981.1)। कारण कि वे अच्युत भगवान्के ही हैं -- यतस्तदीयाः (नारदभक्तिसूत्र 73)? संसारके नहीं। अच्युत भगवान्के होनेसे वेअच्युत गोत्र के ही कहलाते हैं (टिप्पणी प0 981.2)।शरणागतिका रहस्यशरणागतिका रहस्य क्या है -- इसको वास्तवमें भगवान् ही जानते हैं। फिर भी अपनी समझमें आयी बात कहनेकी चेष्टा की जाती है क्योंकि हरेक आदमी जो बात कहता है? उससे वह अपनी बुद्धिका ही परिचय देता है। पाठकोंसे प्रार्थना है कि वे यहाँ आयी बातोंका उलटा अर्थ न निकालें क्योंकि प्रायः लोग किसी तात्त्विक रहस्यवाली बातको गहराईसे समझे बिना उसका उलटा अर्थ जल्दी निकाल लेते हैं? इसलिये ऐसी बातको कहनेसुननेके पात्र बहुत कम होते हैं।भगवान्ने गीतामें शरणागतिके विषयमें दो बातें बतायी हैं --, (1) मामेकं शरणं व्रज (18। 66)अनन्यभावसे केवल मेरी शरणमें आ जा। (2) स सर्वविद्भजति मां सर्वभावेन भारत (15। 19)वह सर्वज्ञ पुरुष सर्वभावसे मेरा भजन करता है? तमेव शरणं गच्छ सर्वभावेन भारत (18। 62)तू सर्वभावसे उस परमात्माकी शरणमें जा।हम भगवान्के शरण कैसे हो जायँ केवल एक भगवान्के शरण हो जायँ अर्थात् भगवान्के गुण? ऐश्वर्य आदिकी तरफ दृष्टि न रखें और सर्वभावसे भगवान्के शरण हो जायँ अर्थात् साथमें अपनी कोई सांसारिक कामना न रखें।केवल एक भगवान्के शरण होनेका रहस्य यह है कि भगवान्के अनन्त गुण हैं? प्रभाव हैं? तत्त्व हैं? रहस्य हैं? महिमा है? लीलाएँ हैं? नाम हैं? धाम हैं भगवान्का अनन्त ऐश्वर्य है? माधुर्य है? सौन्दर्य है -- इन विभूतियोंकी तरफ शरणागत भक्त देखता ही नहीं। उसका यही एक भाव रहता है किमैं केवल भगवान्का हूँ और केवल भगवान् ही मेरे हैं। अगर वह गुण? प्रभाव आदिकी तरफ देखकर भगवान्की शरण लेता है? तो वास्तवमें वह गुण? प्रभाव आदिके ही शरण हुआ? भगवान्के शरण नहीं हुआ। परन्तु इन बातोंका उलटा अर्थ न लगा लें।उलटा अर्थ लगाना क्या है भगवान्के गुण? प्रभाव? नाम? धाम? ऐश्वर्य? माधुर्य? सौन्दर्य आदिको मानना ही नहीं है? इनकी तरफ जाना ही नहीं है। अब कुछ करना है ही नहीं? न भजन करना है? न भगवान्के गुण? प्रभाव? लीला आदि सुननी है? न भगवान्के धाममें जाना है -- यह उलटा अर्थ लगाना है। इनका ऐसा अर्थ लगाना महान् अनर्थ करना है।केवल एक भगवान्के शरण होनेका तात्पर्य है -- केवल भगवान् मेरे हैं। अब वे ऐश्वर्यसम्पन्न हैं तो बड़ी अच्छी बात और उनमें कुछ भी ऐश्वर्य नहीं है तो बड़ी अच्छी बात। वे बड़े दयालु हैं तो बड़ी अच्छी बात और इतने निष्ठुर? कठोर हैं कि उनके समान दुनियामें कोई कठोर है ही नहीं? तो बड़ी अच्छी बात। उनका बड़ा भारी प्रभाव है तो बड़ी अच्छी बात और उनमें कोई प्रभाव नहीं है तो बड़ी अच्छी बात। शरणागतमें इन बातोंकी कोई परवाह नहीं होती। उसका तो एक ही भाव रहता है कि भगवान् जैसे भी हैं? मेरे हैं (टिप्पणी प0 982.1)। भगवान् की इन बातोंकी परवाह न होनेसे भगवान्का ऐश्वर्य? माधुर्य? सौन्दर्य? गुण? प्रभाव आदि चले जायँगे? ऐसी बात नहीं है। पर हम उनकी परवाह नहीं करेंगे? तो हमारी असली शरणागति होगी।जहाँ गुण? प्रभाव आदिको लेकर भगवान्के शरण होते हैं? वहाँ केवल भगवान्के शरण नहीं होते? प्रत्युत गुण? प्रभाव आदिके ही शरण होते हैं जैसे -- कोई रुपयोंवाले आदमीका आदर करे तो वास्तवमें वह आदर उस आदमीका नहीं? रुपयोंका है। किसी मिनिस्टरका कितना ही आदर किया जाय तो वह आदर उसका नहीं? मिनिस्टरी(पद) का है। किसी बलवान् व्यक्तिका आदर किया जाय तो वह उसके बलका आदर है? उसका खुदका आदर नहीं है। परन्तु अगर कोई केवल व्यक्ति(धनी आदि) का आदर करे तो इससे धनीका धन या मिनिस्टरकी मिनिस्टरी चली जायगी -- यह बात नहीं है। वह तो रहेगी ही। ऐसे ही केवल भगवान्के शरण होनेसे भगवान्के गुण? प्रभाव आदि चले जायँगे -- ऐसी बात नहीं है। परन्तु हमारी दृष्टि तो केवल भगवान्पर ही रहनी चाहिये? उनके गुणों आदिपर नहीं।सप्तर्षियोंने जब पार्वतीजीके सामने शिवजीके अनेक अवगुणोंका और विष्णुके अनेक सद्गुणोंका वर्णन करते हुए उनको शिवजीका त्याग करनेके लिये कहा? तब पार्वतीजीने उनको यही उत्तर दिया -- महादेव अवगुन भवन विष्नु सकल गुन धाम। जेहि कर मनु रम जाहि सन तेहि तेही सन काम।। (मानस 1। 80)ऐसी ही बात गोपियोंने भी उद्धवजीसे कही थी --, ऊधौ मन माने की बात। दाख छोहारा छाड़ि अमृतफल? बिषकीरा बिष खात।। जो चकोर को दै कपूर कोउ?, तजि अंगार अघात। मधुप करत घर कोरे काठमें?, बँधत कमल के पात।। ज्यों पतंग हित जान आपनो?, दीपक सों लपटात। सूरदास जाको मन जासों? ताको सोइ सुहात।।भगवान्के प्रभाव आदिकी तरफ देखनेवालेको? उससे प्रेम करनेवालेको मुक्ति? ऐश्वर्य आदि तो मिल सकता है? पर भगवान् नहीं मिल सकते। भगवान्के प्रभावकी तरफ न देखनेवाला भगवत्प्रेमी भक्त ही भगवान्को पा सकता है। इतना ही नहीं? वह प्रेमीभक्त भगवान्को बाँध भी सकता है? उनकी बिक्री भी कर सकता है भगवान् देखते हैं कि वह मेरेसे प्रेम करता है? मेरे प्रभावकी तरफ देखतातक नहीं? तो भगवान्के मनमें उसका बड़ा आदर होता है।प्रभावकी तरफ देखना यह सिद्ध करता है कि हमारेमें कुछ पानेकी कामना है। हमारे मनमें उन कामनावाले पदार्थका आदर है। जबतक हमारे मनमें उस कामनावाले पदार्थका आदर है। जबतक हमारे मनमें कामना है? तबतक हम प्रभावको देखते हैं। अगर हमारे मनमें कोई कामना न रहे तो भगवान्के प्रभाव? ऐश्वर्यकी तरफ हमारी दृष्टि नहीं जायगी। केवल भगवान्की तरफ दृष्टि होगी तो हम भगवान्के शरण हो जायँगे? भगवान्के अपने हो जायँगे।पूतना राक्षसीने जहर लगाकर स्तन मुखमें दिया तो उसको भगवान्ने माताकी गति दे दी (टिप्पणी प0 982.2) अर्थात् जो मुक्ति यशोदा मैयाको मिले? वह मुक्ति पूतनाको मिल गयी। जो मुखमें जहर देती है? उसे,तो भगवान्ने मुक्ति दे दी। अब जो रोजाना दूध पिलाती है? उस मैयाको भगवान् क्या दें तो अनन्त जीवोंको मुक्ति देनेवाले भगवान् मैयाके अधीन हो गये? उन्हें अपनेआपको ही दे दिया मैयाके इतने वशीभूत हो गये कि मैया छड़ी दिखाती है तो वे डरकर रोने रग जाते हैं कारण कि मैयाकी भगवान्के प्रभाव? ऐश्वर्यकी तरफ दृष्टि ही नहीं है। इस प्रकार जो भगवान्से मुक्ति चाहता है? उसे भगवान् मुक्ति दे देते हैं? पर जो कुछ भी नहीं चाहता? उसे भगवान् अपनेआपको ही दे देते हैं।सर्वभावसे भगवान्के शरण होनेका रहस्य यह है कि हमारा शरीर अच्छा है? इन्द्रियाँ वशमें हैं? मन शुद्धनिर्मल है? बुद्धिसे हम ठीक जानते हैं? हम पढ़ेलिखे हैं? हम यशस्वी हैं? हमारा संसारमें मान है -- इस प्रकारहम भी कुछ हैं ऐसा मानकर भगवान्के शरण होना शरणागति नहीं है। भगवान्के शरण होनेके बाद शरणागतको ऐसा विचार भी नहीं करना चाहिये कि हमारा शरीर ऐसा होना चाहिये हमारी बुद्धि ऐसी होनी चाहिये हमारा मन ऐसा होना चाहिये हमारा ऐसा ध्यान लगना चाहिये हमारी ऐसी भावना होनी चाहिये हमारे जीवनमें ऐसे लक्षण आने चाहिये हमारे ऐसे आचरण होने चाहिये हमारेमें ऐसा प्रेम होना चाहिये कि कथाकीर्तन सुननेपर आँसू बहने लगें? कण्ठ गद्गद हो जाय पर ऐसा हमारे जीवनमें हुआ ही नहीं तो हम भगवान्के शरण कैसे हुए आदिआदि। ये बातें अनन्य शरणागतिकी कसौटी नहीं हैं। जो अनन्य शरण हो जाता है? वह यह देखता ही नहीं कि शरीर बीमार है कि स्वस्थ है मन चञ्चल है कि स्थिर है बुद्धिमें जानकारी है कि अनजानपना है अपनेमें मूर्खता है कि विद्वत्ता है योग्यता है कि अयोग्यता है आदि। इन सबकी तरफ वह स्वप्नमें भी नहीं देखता क्योंकि उसकी दृष्टिमें ये सब चीजें कूड़ाकरकट हैं? जिन्हें अपने साथ नहीं लेना है। यदि इन चीजोंकी तरफ देखेगा तो अभिमान ही बढ़ेगा कि मैं भगवान्का शरणागत भक्त हूँ अथवा निराश होना पड़ेगा कि मैं भगवान्के शरण तो हो गया? पर भक्तोंके गुण (गीता 12। 13 -- 19) तो मेरेमें आये ही नहीं। तात्पर्य यह हुआ कि अगर अपनेमें भक्तोंके गुण दिखायी देंगे तो उनका अभिमान हो जायगा और अगर नहीं दिखायी देंगे तो निराशा हो जायगी। इसलिये यही अच्छा है कि भगवान्के शरण होनेके बाद इन गुणोंकी तरफ भूलकर भी नहीं देखें। इसका यह उलटा अर्थ न लगा लें कि हम चाहे वैरविरोध करें? चाहे द्वेष करें? चाहे ममता करें? चाहे जो कुछ करें यह अर्थ बिलकुल नहीं है। तात्पर्य है कि इन गुणोंकी तरफ खयाल ही नहीं होना चाहिये। भगवान्के शरण होनेवाले भक्तमें ये सबकेसब गुण अपनेआप ही आयेंगे? पर इनके आने या न आनेसे उसको कोई मतलब नहीं रखना चाहिये। अपनेमें ऐसी कसौटी नहीं लगानी चाहिये कि अपनेमें ये गुण या लक्षण हैं या नहीं।सच्चा शरणागत भक्त तो भगवान्के गुणोंकी तरफ भी नहीं देखता और अपने गुणोंकी तरफ भी नहीं देखता। वह भगवान्के ऊँचेऊँचे प्रेमियोंकी तरफ भी नहीं देखता कि ऊँचे प्रेमी ऐसेऐसे होते हैं? तत्त्वको जाननेवाले जीवन्मुक्त ऐसेऐसे होते हैं।प्रायः लोग ऐसी कसौटी लगाते हैं कि यह भगवान्का भजन करता है तो बीमार कैसे हो गया भगवान्का भक्त हो गया तो उसको बुखार क्यों आ गया उसपर दुःख क्यों आ गया उसका बेटा क्यों मर गया उसका धन क्यों चला गया उसका संसारमें अपयश क्यों हो गया उसका निरादर क्यों हो गया आदिआदि। ऐसी कसौटी लगाना बिलकुल फालतू बात है? बड़े नीचे दर्जेकी बात है। ऐसे लोगोंको क्या समझायें वे सत्सङ्गके नजदीक ही नहीं आये? इसीलिये उनको इस बातका पता ही नहीं है कि भक्ति क्या होती है शरणागति क्या होती है वे इन बातोंको समझ ही नहीं सकते। परन्तु इसका अर्थ यह भी नहीं है कि भगवान्का भक्त दरिद्र होता ही है? उसका संसारमें अपमान होती ही है? उसकी निन्दा होती ही है। शरणागत भक्तको तो निन्दाप्रशंसा? रोगनिरोगअवस्था आदिसे कोई मतलब ही नहीं होता। इनकी तरफ वह देखता ही नहीं। वह यही देखता है कि मैं हूँ और भगवान् हैं? बस। अब संसारमें क्या है? क्या नहीं है? त्रिलोकीमें क्या है? क्या नहीं है? प्रभु ऐसे हैं? वे उत्पत्ति? स्थिति और प्रलय करनेवाले हैं -- इन बातोंकी तरफ उसकी दृष्टि जाती ही नहीं।किसीने एक सन्त से पूछा -- आप किस भगवान्के भक्त हैं जो उत्पत्ति? स्थिति? प्रलय करते हैं? उनके भक्त हैं क्या तो उस सन्तने उत्तर दिया -- हमारे भगवान्का तो उत्पत्ति? स्थिति? प्रलयके साथ कोई सम्बन्ध है ही नहीं। यह तो हमारे प्रभुका ऐश्वर्य है। यह कोई विशेष बात नहीं है। शरणागत भक्तको ऐसा होना चाहिये। ऐश्वर्य आदिकी तरफ उसकी दृष्टि ही नहीं होनी चाहिये।ऋषिकेशमें गङ्गाजीके किनारे शामको सत्सङ्ग हो रहा था। गरमी पड़ रही थी। उधरसे गङ्गाजीकी ठण्डी हवाकी लहर आयी तो एक सज्जनने कहा -- कैसी ठण्डी हवाकी लहर आ रही है पास बैठे दूसरे सज्जनने उनसे कहा -- हवाको देखनेके लिये तुम्हें समय कैसे मिल गया यह ठण्डी हवा आयी? यह गरम हवा आयी -- इस तरफ तुम्हारा खयाल कैसे चला गया भगवान्के भजनमें लगे हो तो हवा ठण्डा आयी या गरम आयी? सुख आया या दुःख आया -- इस तरफ जब तक खयाल है? तबतक भगवान्की तरफ खयाल कहाँ इसी विषयमें हमने एक कहानी सुनी है। कहानी तो नीचे दर्जेकी है पर उसका निष्कर्ष बड़ा अच्छा है।एक कुलटा स्त्री थी। उसको किसी पुरुषसे संकेत मिला कि इस समय अमुक स्थानपर तुम आ जाना। अतः वह समयपर अपने प्रेमीके पास जा रही थी। रास्तेमें एक मस्जिद पड़ती थी। मस्जिदकी दीवारें छोटीछोटी थीं। दीवारके पास ही वहाँका मौलवी झुककर नमाज पढ़ रहा था। वह कुलटा अनजानेमें उसके ऊपर पैर,रखकर निकल गयी। मौलवीको बड़ा गुस्सा आया कि कैसी औरत है यह इसने मेरेपर जूतीसहित पैर रखकर मेरेको नापाक (अशुद्ध) बना दिया वह वहीं बैठकर उसको देखता रहा कि कब आयेगी। जब वह कुलटा पीछे लौटकर आयी? तब मौलवीने उसको धमकाया किकैसी बेअक्ल हो तुम हम परवरदिगारकी बंदगीमें बैठे थे? नमाज पढ़ रहे थे और तुम हमारेपर पैर रखकर चली गयी तब वह बोली -- मैं नरराची ना लखी? तुम कस लख्यो सुजान। पढ़ि कुरान बौरा भया? राच्यो नहिं रहमान।।अर्थात् एक पुरुषके ध्यानमें रहनेके कारण मेरेको इसका पता ही नहीं लगा कि सामने दीवार है या कोई मनुष्य है? पर तू तो भगवान्के ध्यानमें था? फिर तूने मेरेको कैसे पहचान लिया कि वह यही थी तू केवल कुरान पढ़पढ़कर बावला हो गया है। अगर तू भगवान्के ध्यानमें रचा हुआ होता तो क्या मुझे पहचान लेता कौन आया? कैसे आया? मनुष्य था कि पशुपक्षी था? क्या था? क्या नहीं था? कौन ऊपर आया? कौन नीचे आया? किसने पैर रखा -- इधर तेरा खयाल ही क्यों जाता तात्पर्य है कि एक भगवान्को छोड़कर किसीकी तरफ ध्यान ही कैसे जाय दूसरी बातोंका पता ही कैसे लगे जबतक दूसरी बातोंका पता लगता है? तबतक वह शरण कहाँ हुआकौरवपाण्डव जब बालक थे? तब वे अस्त्रशस्त्र सीख रहे थे। सीखकर जब तैयार हो गये? तब उनकी परीक्षा ली गयी। एक वृक्षपर एक बनावटी चिड़िया बैठा दी गयी और सबसे कहा गया कि उस चिड़ियाके कण्ठपर तीर मारकर दिखाओ। एकएक करके सभी आने लगे। गुरुजी पहले सबसे अलगअलग पूछते कि बताओ? तुम्हें वहाँ क्या दीख रहा है कोई कहता कि हमें तो वृक्ष दीखता है? कोई कहता कि हमें तो टहनी दीखती है? कोई कहता है हमें तो चिड़िया दीखती है? चोंच भी दीखती है? पंख भी दीखते हैं। ऐसा कहनेवालोंको वहाँसे हटा दिया गया। जब अर्जुनकी बारी आयी? तब उनसे पूछा गया कि तुमको क्या दीखता है? तो अर्जुनने कहा कि मेरेको तो केवल कण्ठ ही दीखता है और कुछ भी नहीं दीखता। तब अर्जुनसे बाण मारनेके लिये कहा गया। अर्जुनने अपने बाणसे उस चिड़ियाका कण्ठ वेध दिया क्योंकि उनकी लक्ष्यपर दृष्टि ठीक थी। अगर चिड़िया दीखती है? वृक्ष? टहनी आदि दीखते हैं तो लक्ष्य कहाँ सधा है अभी तो दृष्टि फैली हुई है। लक्ष्य होनेपर तो वही दीखेगा? जो लक्ष्य होगा। लक्ष्यके सिवाय दूसरा कुछ दीखेगा ही नहीं। इसी प्रकार जबतक मनुष्यका लक्ष्य एक नहीं हुआ है? तबतक वह अनन्य कैसे हुआ अव्यभीचारीअनन्ययोग होना चाहिये -- मयि चानन्ययोगेन भक्तिरव्यभिचारिणी (गीता 13। 10)।अन्ययोग,नहीं होना चाहिये अर्थात् शरीर? मन? बुद्धि? अहम् आदिकी सहायता नहीं होनी चाहिये। वहाँ तो केवल एक भगवान् ही होने चाहिये।गोस्वामी तुलसीदासजी महाराजसे किसीने कहा -- आप जिन रामललाकी भक्ति करते हैं? वे तो बारह कलाके अवतार हैं? पर सूरदासजी जिन भगवान् कृष्णकी भक्ति करते हैं? सोलह कलाके अवतार हैं। यह सुनते ही गोस्वामीजी महाराज उसके चरणोंमें गिर पड़े और बोले -- ओह आपने बड़ी भारी कृपा कर दी मैं तो रामको दशरथजीके लाड़ले कुँवर समझकर ही भक्ति करता था। अब पता लगा कि वे बारह कलाके अवतार हैं इतने बड़े हैं वे आपने आज नयी बात बताकर बड़ा उपकार किया। अब कृष्ण सोलह कलाके अवतार हैं -- यह बात उन्होंने सुनी ही नहीं? इस तरफ उनका ध्यान ही नहीं गया।भगवान्के प्रति भक्तोंके अलगअलग भाव होते हैं। कोई कहता है कि दशरथजीकी गोदमें खेलनेवाले जो रामलला हैं? वे ही हमारे इष्ट हैं -- इष्टदेव मम बालक रामा (मानस 7। 75। 3) राजाधिराज रामचन्द्रजी नहीं? छोटासा रामलला। कोई भक्त कहता है कि हमारे इष्ट तो लड्डूगोपाल हैं? नन्दके लाला हैं। वे भक्त अपने रामललाको? नन्दललाको सन्तोंसे आशीर्वाद दिलाते हैं? तो भगवान्को वह बहुत प्यारा लगता है।,तात्पर्य है कि भक्तोंकी दृष्टि भगवान्के ऐश्वर्यकी तरफ जाती ही नहीं। या ब्रजरज की परस से? मुकति मिलत है चार। वा रज को नित गोपिका? डारत डगर बुहार।।आँगनकी जिस रजमें कन्हैया खेलते हैं? वह रज कोई ले ले तो उसको चारों प्रकारकी मुक्ति मिल जाय। पर यशोदा मैया उसी रजको बुहारकर बाहर फेंक देती हैं। मैयाके लिये तो वह कूड़ाकरकट है। अब मुक्ति किसको चाहिये मैयाकी केवल कन्हैयाकी तरफ ही दृष्टि है। न तो कन्हैयाके ऐश्वर्यकी तरफ दृष्टि है और न योग्यताकी तरफ ही दृष्टि है।सन्तोंने कहा है कि अगर भगवान्से मिलना हो तो साथमें साथी भी नहीं होना चाहिये और सामान भी नहीं होना चाहिये अर्थात् साथी और सामानके बिना उनसे मिलो। जब साथी? सहारा साथमें है? तो तुम क्या मिले भगवान्से और मन? बुद्धि? विद्या? धन आदि सामान साथमें बँधा रहेगा तो उसका परदा (व्यवधान) रहेगा। परदेमें मिलन थोड़े ही होता है वहाँ तो कपड़ेका भी व्यवधान होता है। कपड़ा ही नहीं? माला भी आड़में आ जाय तो मिलन क्या हुआ इसलिये साथमें कोई साथी और सामान न हो फिर भगवान्से जो मिलन होगा? वह बड़ा विलक्षण और दिव्य होगा।एक महात्माजीको खेतमें काम करनेवाला एक व्रजवासी ग्वाला मिल गया। वह भगवान्का भक्त था। महात्माजीने उससे पूछा -- तुम क्या करते हो उसने कहा -- हम तो अपने लाला कन्हैयाका काम करते हैं। महात्माजीने कहा -- हम भगवान्के अनन्य भक्त हैं? तुम क्या हो उसने कहा -- हम फनन्य भक्त हैं। महात्माजीने पूछा -- फनन्य भक्त क्या होता है तो उसने भी पूछा -- अनन्य भक्त क्या होता है महात्माजीने कहा -- अनन्य भक्त वह होता है जो सूर्य? शक्ति? गणेश? ब्रह्मा आदि किसीको भी न माने? केवल हमारे कन्हैयाको ही माने। उसने कहा -- बाबाजी? हम तो इन ससुरोंका नाम भी नहीं जानते कि ये क्या होते हैं? क्या नहीं होते हमें इनका पता ही नहीं है तो हम फनन्य हो गये कि नहीं इस प्रकार ब्रह्म क्या होता है आत्मा क्या होती है सगुण और निर्गुण क्या होता है साकार और निराकार क्या होता है आदि बातोंकी तरफ शरणागत भक्तकी दृष्टि ही नहीं जानी चाहिये।व्रजकी एक बात है। एक सन्त कुएँपर किसीसे बात कर रहे थे कि ब्रह्म है? परमात्मा है? जीवात्मा है आदि। वहाँ एक गोपी जल भरने आयी। उसने कान लगाया कि बाबाजी क्या बात कर रहे हैं। जब वह गोपी दूसरी,गोपीसे मिली तो उससे पूछा -- अरी सखी यह ब्रह्म क्या होता है उसने कहा -- हमारे लालाका ही कोई अड़ोसीपड़ोसी? सगासम्बन्धी होगा हमलोग तो जानती नहीं सखी ये लोग उसीकी धुनमें लगे हैं न इसलिये सब जानते हैं। हमारे तो एक नन्दके लाला ही हैं। कोई काम हो तो नन्दबाबासे कह देंगी? गिरिराजसे कह देंगी कि महाराज आप कृपा करो। कन्हैया तो भोलाभाला है? वह क्या समझेगा और क्या करेगा कन्हैयासे क्या मिलेगा अरी सखी वह कन्हैया हमारा है? और क्या मिलेगा हम भी अकेली हैं और वह कन्हैया भी अकेला है। हमारे पास भी कुछ समान नहीं? और उसके पास भी कुछ सामान नहीं? बिलकुल नंगधड़ंग बाबा -- नगन मूरतिबाल गुपालकी? कतरनी बरनी जगजालकी। अब ऐसे कन्हैयासे क्या मिलेगायशोदा मैया दाऊजीसे कहती हैं -- देख दाऊ यह कन्हैया बहुत भोलाभाला है? तू इसका खयाल रखा कर कि कहीं यह जंगलमें दूर न चला जाय। जंगलमें मेले साथ चलतेचलते कोई साँपका बिन देखता है तो उसमें हाथ डाल देता है? अब इसे कोई साँप काट ले तो मैया कहती है -- बेटा अभी वह छोटासा अबोध बालक है? तू बड़ा है? इसलिये इसकी निगाह रखा कर। ग्वालबालोंसे कोई कहे कि कन्हैया तो सब दुनियाका पालन करता है? तो वे यही कहेंगे कि तुम्हारा ऐसा भगवान् होगा? जो सब दुनियाका पालन करता होगा। हमारा तो ऐसा नहीं है। हमारा छोटासा कन्हैया दुनियाका क्या पालन करेगाएक बाबाजीकी गोपियोंसे बातचीत चली। वे बाबाजी बात करतेकरते कहने लगे कि कृष्ण इतने ऐश्वर्यशाली हैं? उनका इतना माधुर्य है? उनके पास ऐश्वर्यका इतना खजाना है? आदि। तो गोपियाँ कहने लगीं -- महाराज उस खजानेकी चाबी तो हमारे पास है कन्हैयाके पास क्या है उसके पास तो कुछ भी नहीं है। कोई उससे माँगेगा तो वह कहाँसे देगा इसलिये किसीको कुछ चाहिये तो वह कन्हैया पास न जाये। कन्हैयाके पास? उसकी शरणमें तो वही जाये? जिसको कभी कुछ नहीं चाहिये। किसी भी अवस्थामें कुछ भी चाहनेका भाव न हो अर्थात् विपत्ति? मौत आदिकी अवस्थामें भीमेरी थोड़ी सहायता कर दो? रक्षा कर दोऐसा भाव भी नहीं होभगवान् श्रीरामसे वाल्मीकिजी कहते हैं --, जाहि न चाहिअ कबहुँ कछु तुम्ह सन सहज सनेहु। बसहु निरंतर तासु मन सो राउर निज गेहु।। (मानस 2। 131)कुछ भी चाहनेका भाव न होनेसे भगवान् स्वाभाविक ही प्यारे लगते हैं? मीठे लगते हैं -- तुम्ह सन सहज सनेहु। जिसमें चाह नहीं है? वह भगवान्का खास घर है -- सो राउर निज गेहु। यदि चाहना भी साथमें रखें और भगवान्को भी साथमें रखें तो वह भगवान्का खास घर नहीं है। भगवान्के साथसहज स्नेह हो? स्नेहमें कोई मिलावट न हो अर्थात् कुछ भी चाहना न हो। वहाँ तो आसक्ति? वासना? मोह? ममता ही होते हैं। इसलिये गोपियाँ सावधान करती हुई कहती हैं --, मा यात पान्थाः पथिभीमरथ्यां दिगम्बरः कोऽपि तमालनीलः। विन्यस्तहस्तोऽपि नितम्बबिम्बे धूतः समाकर्षति चित्तवित्तम्।।अरे पथिको उस गलीसे मत जाना? वह बड़ी भयावनी है। वहाँ अपने नितम्बविम्बपर दोनों हाथ रखे जो तमालके समान नीले रंग का एक नंगधड़ंग बालक खड़ा है? वह केवल देखनेमात्रका अवधूत है। वास्तवमें तो वह अपने पासमें होकर निकलनेवाले किसी भी पथिकके चित्तरूपी धनको लूटे बिना नहीं रहता।वह जो कालाकाला नंगधड़ंग बालक खड़ा है न उससे तुम लुट जाओगे? रीते रह जाओगे वह ऐसा चोर है कि सब खत्म कर देगा। उधर जाना ही मत? पहले ही खयाल रखना। अगर चले गये तो फिर सदाके,लिये ही चले गये इसलिये कोई अच्छी तरहसे जीना चाहे तो उधर मत जाय। उसका नाम कृष्ण है न कृष्ण कहते हैं खींचनेवालेको। एक बार खींच ले तो फिर छोड़े ही नहीं। उससे पहचान न हो? तबतक तो ठीक है। अगर उससे पहचान हो गयी तो फिर मामला खत्म। फिर किसी कामको नहीं रहोगे? त्रिलोकीभरमें निकम्मे हो जाओगे नारायन बौरी भई डोलै? रही न काहू काम की।। जाहि लगन लगी घनस्याम की।हाँ? जो किसी कामका नहीं होता? वह सबके लिये सब कामका होता है। परन्तु उनको उसी कामसे कोई मतलब नहीं होता।शरणागत भक्तको भजन भी करना नहीं पड़ता। उसके द्वारा स्वतःस्वाभाविक भजन होता है। भगवान्का नाम उसे स्वाभाविक ही बड़ा मीठा? प्यारा लगता है। अगर कोई पूछे कि तुम श्वास क्यों लेते हो यह हवाको भीतरबाहर करनेका क्या धंधा शुरू कर रखा है तो यही कहेंगे कि भाई यह धंधा नहीं है? इसके बिना हम जी ही नहीं सकते। ऐसे ही शरणागत भक्त भजनके बिना रह ही नहीं सकता। जिसको सब कुछ अर्पण कर दिया? उसके विस्मरणमें परम व्याकुलता? महान् छटपटाहट होने लगती है -- तद्विस्मरणे परमव्याकुलतेति (नारदभक्तिसूत्र 19)। ऐसे भक्तसे अगर कोई कहे कि आधे क्षणके लिये भगवान्को भूल जानेसे त्रिलोकीका राज्य मिलेगा? तो वह इसे भी ठुकरा देगा। भागवतमें आया है -- त्रिभुवनविभवहेतवेऽप्यकुण्ठ स्मृतिरजितात्मसुरादिभिर्विमृग्यात्। न चलति भगवत्पदारविन्दा ल्लवनिमिषार्धमपि यः स वैष्णवाग्र्यः।। (श्रीमद्भा0 11। 2। 53)तीनों लोकोंके समस्त ऐश्वर्यके लिये भी उन देवदुर्लभ भगवच्चारणकमलोंका जो आधे निमेषके लिये भी त्याग नहीं कर सकते? वे ही श्रेष्ठ भगवद्भक्त हैं। न पारमेष्ठ्यं न महेन्द्रधिष्ण्यं न सार्वभौमं न रसाधिपत्यम्। न योगसिद्धीरपुनर्भवं वा मय्यार्पितात्मेच्छति मद् विनान्यत्।। (श्रीमद्भा0 11। 14। 14)भगवान् कहते हैं किस्वयंको मेरे अर्पित करनेवाला भक्त मुझे छोड़कर ब्रह्माका पद? इन्द्रका पद? सम्पूर्ण पृथ्वीका राज्य? पातालादि लोकोंका राज्य? योगकी समस्त सिद्धियाँ और मोक्षको भी नहीं चाहता।भरतजी कहते हैं -- अरथ न धरम न काम रुचि गति न चहउँ निरबान। जनम जनम रति राम पद यह बरदानु न आन।। (मानस 2। 204) सम्बन्ध -- अब पूर्वश्लोकमें कहे अत्यन्त गोपनीय वचनको अनाधिकारियोंके सामने कहनेका निषेध करत हैं।
।।18.66।।सम्पूर्ण धर्मोंका आश्रय छोड़कर तू केवल मेरी शरणमें आ जा। मैं तुझे सम्पूर्ण पापोंसे मुक्त कर दूँगा, चिन्ता मत कर।
इदं ते नातपस्काय नाभक्ताय कदाचन। न चाशुश्रूषवे वाच्यं न च मां योऽभ्यसूयति ॥
।।18.67।। व्याख्या -- इदं ते नातपस्काय -- पूर्वश्लोकमें आये सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज -- इस सर्वगुह्यतम वचनके लिये यहाँ इदम् पद आया है।अपने कर्तव्यका पालन करते हुए स्वाभाविक जो कष्ट आ जाय? विपरीत परिस्थिति आ जाय? उसको प्रसन्नतापूर्वक सहनेका नामतप है। तपके बिना अन्तःकरणमें पवित्रता नहीं आती? और पवित्रता आये बिना अच्छी बातें धारण नहीं होतीं। इसलिये भगवान् कहते हैं कि जो तपस्वी नहीं है? उसको यह सर्वगुह्यतम रहस्य नहीं कहना चाहिये।जो सहिष्णु अर्थात् सहनशील नहीं है? वह भी अतपस्वी है। अतः उसको भी यह सर्वगुह्यतम रहस्य नहीं कहना चाहिये। यह सहिष्णुता चार प्रकारकी होती है --,(1) द्वन्द्वसहिष्णुता -- रागद्वेष? हर्षशोक? सुखदुःख? मानअपमान? निन्दास्तुति आदि द्वन्द्वोंसे रहित हो जाना -- ते द्वन्द्वमोहनिर्मुक्ताः (गीता 7। 28) द्वन्द्वैर्विमुक्ताः सुखदुःखसंज्ञैः गीता (15। 5)।(2) वेगसहिष्णुता -- काम? क्रोध? लोभ? द्वेष आदिके वेगोंको उत्पन्न न होने देना -- कामक्रोधोद्भवं वेगम् (गीता 5। 23)।(3) परमतसहिष्णुता -- दूसरोंके मतकी महिमा सुनकर अपने मतमें सन्देह न होना और उनके मतसे उद्विग्न न होना (टिप्पणी प0 987.1) -- एकं सांख्यं च योगं च यः पश्यति स पश्यति (गीता 5। 5)।(4) परोत्कर्षसहिष्णुता -- अपनेमें योग्यता? अधिकार? पद? त्याग? तपस्या आदिकी कमी है? तो भी दूसरोंकी योग्यता? अधिकार आदिकी प्रसंशा सुनकर अपनेमें कुछ भी विकार न होना -- विमत्सरः (गीता 4। 22) हर्षामर्षभयोद्वेगैर्मुक्तः (गीता 12। 15)।ये चारों सहिष्णुताएँ सिद्धोंकी हैं। ये सहिष्णुताएँ जिसका लक्ष्य हों? वही तपस्वी है और जिसका लक्ष्य न हों? वही अतपस्वी है।ऐसे अतपस्वी अर्थात् असहिष्णु (टिप्पणी प0 987.2) को सर्वगुह्यतम रहस्य न सुनानेका मतलब है किसम्पूर्ण धर्मोंको मेरेमें अर्पण करके तू अनन्यभावसे मेरी शरण आ जा -- इस बात को सुनकर उसके मनमें कोई विपरीत भावना या दोष आ जाय? तो वह मेरी इस सर्वगुह्यतम बातको सह नहीं सकेगा और इसका निरादर करेगा? जिससे उसका पतन हो जायगा।दूसरा भाव यह है कि जिसका अपनी वृत्तियों? आचरणों? भावों आदिको शुद्ध करनेका उद्देश्य नहीं है? वह यदि मेरीतू मेरी शरणमें आ जा? तो मैं तुझे सम्पूर्ण पापोंसे मुक्त कर दूँगा? तू चिन्ता मत कर -- इन बातोंको सुनेगा तोमैं चिन्ता क्यों करूँ चिन्ता भगवान् करेंगे ऐसा उल्टा समझकर दुर्गणदुराचारोंमें लग जायगा और अपना अहित कर लेगा। इससे मेरी सर्वगुह्यतम् बातका दुरुपयोग होगा। अतः इसे कुपात्रको कभी मत सुनाना।नाभक्ताय कदाचन -- जो भक्तिसे रहित है? जिसका भगवान्पर भरोसा? श्रद्धाविश्वास और भक्ति न होनेसे उसकी यह विपरीत धारणा हो सकती है किभगवान् जो आत्मश्लाघी हैं? स्वार्थी हैं और दूसरोंको वशमें करना चाहते हैं। जो दूसरोंको अपनी आज्ञामें चलाना चाहता है? वह दूसरोंको क्या निहाल करेगा उसके शरण होनेसे क्या लाभ आदिआदि। इस प्रकार दुर्भाव करके वह अपना पतन कर लेगा। इसलिये ऐसे,अभक्तको कभी मत कहना।न चाशुश्रूषवे वाच्यम् -- जो इस रहस्यको सुनना नहीं चाहता? इसकी उपेक्षा करता है? उसको भी कभी मत सुनाना क्योंकि बिना रुचिके? जबर्दस्ती सुनानेसे वह इस बातका तिरस्कार करेगा? उसको सुनना अच्छा नहीं लगेगा? उसका मन इस बातको फेंकेगा। यह भी उसके द्वारा एक अपराध होगा। अपराध करनेवालेका भला नहीं होता। अतः जो सुनना नहीं चाहता? उसको मत सुनाना।न च मां योऽभ्यसूयति -- जो गुणोंमें दोषारोपण करता है? उसको भी मत सुनाना क्योंकि उसका अन्तःकरण अत्यधिक मलिन होनेके कारण वह भगवान्की बात सुनकर उलटे उनमें दोषारोपण ही करेगा।दोषदृष्टि रहनेसे मनुष्य महान् लाभसे वञ्चित हो जाता है और अपना पतन कर लेता है। अतः दोषदृष्टि करना बड़ा भारी दोष है। यह दोष श्रद्धालुओंमें भी रहता है। इसलिये साधकको सावधान होकर इस भयंकर दोषसे बचते रहना चाहिये। भगवान्ने भी (गीता 3। 31में) जहाँ अपना मत बताया? वहाँ श्रद्धावन्तः अनसूयन्तः पदोंसे यह बात कही कि श्रद्धायुक्त और दोषदृष्टिसे रहित मनुष्य कर्मोंसे छूट जाता है। ऐसे ही गीताके माहात्म्य (गीता 18। 71) में भी श्रद्धावाननसूयश्च पदोंसे यह बताया कि श्रद्धावान् और दोषदृष्टिसे रहित मनुष्य केवल गीताको सुननेमात्रसे वैकुण्ठ आदि लोकोंको चला जाता है।इस गोपनीय रहस्यको दूसरोंसे मत कहना -- यह कहनेका तात्पर्य दूसरोंको इस गोपनीय तत्त्वसे वञ्चित रखना नहीं है? प्रत्युत जिसकी भगवान् और उनके वचनोंपर श्रद्धाभक्ति नहीं है? वह भगवान्को स्वार्थी समझकर (जैसे साधारण मनुष्य अपने स्वार्थके लिये ही किसीको स्वीकार करते हैं)? भगवान्पर दोषारोपण करके महान् पतनकी तरफ न चला जाय? इसलिये उसको कहनेका निषेध किया है। सम्बन्ध -- गीताजीका यह प्रभाव है कि जो प्रचार करेगा? उससे बढ़कर मेरा प्यारा कोई नहीं होगा -- यह बात भगवान् आगेको दो श्लोकोंमें बताते हैं।
।।18.67।।यह सर्वगुह्यतम वचन अतपस्वीको मत कहना; अभक्तको कभी मत कहना; जो सुनना नहीं चाहता, उसको मत कहना; और जो मेरेमें दोषदृष्टि करता है, उससे भी मत कहना।
य इदं परमं गुह्यं मद्भक्तेष्वभिधास्यति। भक्तिं मयि परां कृत्वा मामेवैष्यत्यसंशयः ॥
।।18.68।। व्याख्या -- भक्तिं मयि परां कृत्वा -- जो मेरेमें पराभक्ति करके इस गीताको कहता है। इसका तात्पर्य है कि जो रुपये? मानबड़ाई? भेंटपूजा? आदरसत्कार आदि किसी भी वस्तुके लिये नहीं कहता? प्रत्युत भगवान्में भक्ति हो जाय? भगवद्भावोंका मनन हो जाय? इन भावोंका प्रचार हो जाय? इनकी आवृत्ति हो जाय? सुनकर लोगोंका दुःख? जलन? सन्ताप आदि दूर हो जाय? सन्ताप आदि दूर हो जाय? सबका कल्याण हो जाय -- ऐसे उद्देश्यसे कहता है। इस प्रकार भगवान्की भक्तिका उद्देश्य रखकर कहना ही परमभक्ति करते कहना है।इसी अध्यायके चौवनवें श्लोकमें कही गयी पराभक्तिमें अन्तर है। वहाँ मदभक्तिं लभते पराम् पदोंसे कहा गया है कि ब्रह्मभूत होनेके बाद सांख्ययोगी पराभक्तिको प्राप्त हो जाता है अर्थात् भगवान्से जो अनादिकालका सम्बन्ध है? उसकी स्मृति हो जाती है। परन्तु यहाँ सांसारिक मानबड़ाई आदि किसीकी भी किञ्चिन्मात्र कामना न रखकर केवल भगवद्भक्तिकी? भगवत्प्रेमकी अभिलाषा रखना पराभक्ति है? इसलिये यहाँ भक्तिं मयि परां कृत्वामेरेमें पराभक्ति करके -- ऐसा कहा गया है।य इदं परमं गुह्यम् -- इन पदोंसे पूरी गीताका परमगुह्य संवाद लेना चाहिये? जो कि गीताग्रन्थ कहलाता है। परमं गुह्यम् पदोंमें ही गुह्य? गुह्यतर? गुह्यतम और सर्वगुह्यतम -- ये सब बातें आ जाती हैं।मद्भक्तेष्वभिधास्यति -- जिसकी भगवान् और उनके वचनोंमें पूज्यबुद्धि है? आदरबुद्धि है? श्रद्धाविश्वास है और सुनना चाहता है? वह भक्त हो गया। ऐसे मेरे भक्तोंमें जो इस संवादको कहेगा? वह मेरेको प्राप्त होगा।पीछेके श्लोकमें नाभक्ताय पदमें एकवचन दिया और यहाँ भद्भक्तेषु पदमें बहुवचन दिया। इसका तात्पर्य है कि जहाँ बहुतसेश्रोता सुनते हों? वहाँ पहले बताये दोषोंवाला कोई व्यक्ति बैठा हो तो वक्ताके लिये पहले कहा निषेध लागू नहीं पड़ेगा क्योंकि वक्ता केवल उस (दोषी) व्यक्तिको गीता सुनाता ही नहीं। जैसे कोई कबूतरोंको अनाजके दाने डालता है और कबूतर दाने चुगते हैं। यदि उनमें कोई कौआ आकर दाने चुगने लग जाय तो उसको उड़ाया थोड़े ही जा सकता है क्योंकि दाना डालनेवालेका लक्ष्य कबूतरोंको दाना डालना ही रहता है? कौओंको नहीं ऐसे ही कोई गीताका प्रवचन कर रहा है और उस प्रवचनको सुननेके लिये बीचमें कोई नया व्यक्ति आ जाय अथवा कोई उठकर चल दे तो वक्ताका ध्यान उसकी तरफ नहीं रहता। वक्ताका ध्यान तो सुननेवाले लोगोंकी तरफ होता है और उन्हींको वह सुनाता है।मामेवैष्यत्यसंशयः -- अगर गीता सुनानेवालेका केवल मेरा ही उद्देश्य होगा तो वह मेरेको प्राप्त हो जायगा? इसमें कोई सन्देहकी बात नहीं है। कारण कि गीताकी यह एक विचित्र कला है कि मनुष्य अपने स्वाभाविक कर्मोंसे भी परमात्माका निष्कामभावपूर्वक पूजन करता हुआ परमात्माको प्राप्त हो जाता है (18। 46)? और जो खानापीना? शौचस्नान आदि शारीरिक कार्योंको भी भगवान्के अर्पण कर देता है? वह भी शुभअशुभ फलरूप कर्मबन्धनसे मुक्त होकर भगवान्को प्राप्त हो जाता है (9। 2728)। तो फिर जो केवल भगवान्की भक्तिका लक्ष्य करके गीताका प्रचार करता है? वह भगवान्को प्राप्त हो जाय? इसमें कहना ही क्या है
।।18.68।।मेरेमें पराभक्ति करके जो इस परम गोपनीय संवाद-(गीता-ग्रन्थ) को मेरे भक्तोंमें कहेगा, वह मुझे ही प्राप्त होगा -- इसमें कोई सन्देह नहीं है।
न च तस्मान्मनुष्येषु कश्चिन्मे प्रियकृत्तमः। भविता न च मे तस्मादन्यः प्रियतरो भुवि ॥
।।18.69।। व्याख्या -- न च तस्मान्मनुष्येषु कश्चिन्मे प्रियकृत्तमः -- जो अपनेमें लौकिकपारलौकिक प्राकृत पदार्थोंकी महत्ता? लिप्सा? आवश्यकता रखता है और रखना चाहता है? वह पराभक्ति ( 18। 68) के अन्तर्गत नहीं आ सकता। पराभक्तिके अन्तर्गत नहीं आ सकता है? जिसका प्राकृत पदार्थोंको प्राप्त करनेका किञ्चिन्मात्र भी उद्देश्य नहीं है और जो भगवत्प्राप्ति? भगवद्दर्शन? भगवत्प्रेम आदि पारमार्थिक उद्देश्य रखकर गीताके अनुसार ही अपना जीवन बनाना चाहता है। ऐसा पुरुष ही भगवद्गीताके प्रचारका अधिकारी होता है। यदि उसमें कभी मानबड़ाई आदिकी इच्छा आ भी जाय तो वह टिकेगी नहीं क्योंकि मानबड़ाई आदि प्राप्त करना उसका उद्देश्य नहीं है।भगवान्के भक्तोंमें गीताका प्रचार करनेवाले उपर्युक्त अधिकारी मनुष्यके लिये ही तस्मात् पद देकर भगवान् कहते हैं कि मनुष्योंमें उसके समान मेरा प्रियकृत्तम अर्थात् अत्यन्त प्रिय कार्य करनेवाला कोई भी नहीं है क्योंकि गीताप्रचारके समान दूसरा मेरा कोई प्रिय कार्य है ही नहीं।प्रियकृत्तमः पदमें जो कृत् पद आया है? उसका तात्पर्य है कि गीताका प्रचार करनेमें उसका अपना कोई स्वार्थ नहीं है? मानबड़ाई? आदरसत्कार आदिकी कोई कामना नहीं है केवल भगवत्प्रीत्यर्थ गीताके भावोंका प्रचार करता है। इसलिये वह प्रियकृत्तम -- भगवान्का अत्यन्त प्रिय कार्य करनेवाला है।मनुष्योंमें प्रियकृत्तम कहनेका तात्पर्य है कि भगवान्का अत्यन्त प्यारा बननेके लिये मनुष्योंको ही अधिकार है। संसारमें कामनाओंकी पूर्ति कर लेना कोई महत्त्वकी? बहादुरीकी बात नहीं है। देवता? पशुपक्षी? नारकीय जीव? कीटपतङ्ग? वृक्षलता आदि सभी योनियोंमें कामनाकी पूर्ति करनेका अवसर मिलता है परन्तु कामनाका त्याग करके परमात्माकी प्राप्ति करनेका अवसर तो केवल मनुष्ययोनिमें ही मिलता है। इस मनुष्ययोनिको प्राप्त करके परमात्माकी प्राप्ति करनेमें? परमात्माका अत्यन्त प्यारा बननेमें ही मनुष्यजन्मकी सफलता है।भविता न च मे तस्मादन्यः प्रियतरो भुवि -- जिसमें अपनी मानबड़ाईकी वासना है? कुछ स्वार्थभाव भी है और जिसका अपना उद्धार करनेका तथा गीताके अनुसार जीवन बनानेका उद्देश्य वैसा (प्रियकृत्तमके समान) नहीं बना है परन्तु जिसके हृदयमें गीताका विशेष आदर है और गीताका पाठ करवाना? गीता कण्ठस्थ,करवाना? गीता मुद्रित करवाकर उसकी सस्ती बिक्री करना आदि किसी तरहसे गीताका प्रचार करता है और लोगोंको गीतामें लगाता है? उसके समान पृथ्वीमण्डलपर मेरा दूसरा कोई प्रियतर नहीं होगा।अपने धर्म? सम्प्रदाय? सिद्धान्त आदिका प्रचार करनेवाला व्यक्ति भगवान्का प्रिय तो हो सकता है? पर प्रियतर नहीं होगा। प्रियतर तो किसी तरहसे गीताका प्रचार करनेवाला ही होगा।भगवद्गीतामें अपना उद्धार करनेकी ऐसीऐसी विलक्षण? सुगम और सरल युक्तियाँ बतायी गयी हैं? जिनको मनुष्यमात्र अपने आचरणोंमें ला सकता है। तात्पर्य यह है कि जो गीताका आदर करता है? ऐसा मनुष्य हिंदू? मुसलमान? ईसाई? यहूदी? पारसी? बौद्ध आदि किसी भी धर्मको माननेवाला क्यों न हो किसी भी देश? वेश? वर्ण? आश्रम? सम्प्रदाय आदिका क्यों न हो अपनी रुचिके अनुसार किसी भी शैली? उपाय? सिद्धान्त? साधनको माननेवाला क्यों न हो? वह यदि अपना किसी तरहका आग्रह न रखकर? पक्षपातविषमताको छोड़कर? किसी भी प्राणीको दुःख पहुँचानेवाली चेष्टाका त्याग करके? मनमें किसी भी लौकिकपारलौकिक उत्पन्न और नष्ट होनेवाली वस्तुकी कामना न रखकर? अपना सम्प्रदाय? अपनी टोनी बनानेका उद्देश्य न रखकर? केवल अपने कल्याणका उद्देश्य रखकर गीताके अनुसार चलता है (अकर्तव्यका सर्वथा त्याग करके प्राप्त परिस्थितिके अनुसार अपने कर्तव्यका लोकहितार्थ? निष्कामभावपूर्वक पालन करता है)? तो वह भी जीविकासम्बन्धी और खानापीना? सोनाजागना आदि शरीरसम्बन्धी सब काम करते हुए परमात्माकी प्राप्ति कर सकता है? महान् आनन्द? महान् सुखको (गीता 6। 22) प्राप्त कर सकता है।गीता वेश? आश्रम? अवस्था? क्रिया आदिका परिवर्तन करनेके लिये नहीं कहती? प्रत्युत परिमार्जन करनेके लिये कहती है अर्थात् केवल अपने भाव और उद्देश्यको शुद्ध बनानेके लिये कहती है। गीताकी ऐसी युक्तियोंको जो भगवान्की तरफ चलनेवाले भक्तोंमें कहेगा? उससे उन भक्तोंको पारमार्थिक मार्गमें बढ़नेकी युक्तियाँ मिलेंगी? शंकाओंका समाधान होगा? साधनकी उलझनें सुलझेंगी? पारमार्थिक मार्गकी बाधाएँ दूर होंगी? जिससे वे उत्साहसे सुगमतापूर्वक बहुत ही जल्दी अपने लक्ष्यको प्राप्त कर सकेंगे। इसलिये वह भगवान्को सबसे अधिक प्यारा होगा क्योंकि भगवान् जीवके उद्धारसे बड़े राजी होते हैं? प्रसन्न होते हैं। सम्बन्ध -- जिसमें गीताका प्रचार करनेकी योग्यता नहीं है? वह क्या करे इसको भगवान् आगे के श्लोकमें बताते हैं।
।।18.69।।उसके समान मेरा अत्यन्त प्रिय कार्य करनेवाला मनुष्योंमें कोई भी नहीं है और इस भूमण्डलपर उसके समान मेरा दूसरा कोई प्रियतर होगा भी नहीं।
अध्येष्यते च य इमं धर्म्यं संवादमावयोः। ज्ञानयज्ञेन तेनाहमिष्टः स्यामिति मे मतिः ॥
।।18.70।। व्याख्या -- अध्येष्यते च य इमं धर्म्यं संवादमावयोः -- तुम्हारा और हमारा यह संवाद शास्त्रों? सिद्धान्तोंके साररूप धर्मसे युक्त है। यह बहुत विचित्र बात है कि परस्पर साथ रहते हुए तुम्हारेहमारे बहुत वर्ष बीत गये परन्तु हम दोनोंका ऐसा संवाद कभी नहीं हुआ ऐसा धर्ममय संवाद तो कोई विलक्षण? अलौकिक अवसर आनेपर ही होता है।जबतक मनुष्यकी संसारसे उकताहट न हो? वैराग्य या उपरति न हो और हृदयमें जोरदार हलचल न मची हो? तबतक उसकी असली जिज्ञासा जाग्रत् नहीं होती। किसी कारणवश जब यह मनुष्य अपने कर्तव्यका निर्णय करनेके लिये व्याकुल हो जाता है? जब अपने कल्याणके लिये कोई रास्ता नहीं दीखता? बिना समाधानके और कोई सांसारिक वस्तु? व्यक्ति? घटना? परिस्थिति आदि किञ्चिन्मात्र भी अच्छी नहीं लगती? एकमात्र हृदयका सन्देह दूर करनेकी धुन (चटपटी) लग जाती है? एक ही जोरदार जिज्ञासा होती है और दूसरी तरफसे मन सर्वथा हट जाता है? तब यह मनुष्य जहाँसे प्रकाश और समाधान मिलनेकी सम्भावना होती है? वहाँ अपना हृदय खोलकर बात पूछता है? प्रार्थना करता है? शरण हो जाता है? शिष्य हो जाता है।पूछनेवालेके मनमें जैसीजैसी उत्कण्ठा बढ़ती है? कहनेवालेके मनमें वैसीवैसी बड़ी विचित्रता और विलक्षणतासे समाधान करनेवाली बातें पैदा होती हैं। जैसे दूध पीनेके समय बछड़ा जब गायके थनोंपर मुहँसे,बारबार धक्का मारता है और थनोंसे दूध खींचता है? तब गायके शरीरमें रहनेवाला दूध थनोंमें एकदम उतर आता है। ऐसे ही मनमें जोरदार दूध थनोंमें एकदम उतर आता है। ऐसे ही मनमें जोरदार जिज्ञासा होनेसे जब जिज्ञासु बारबार प्रश्न करता है? तब कहनेवालेके मनमें नयेनये उत्तर पैदा होते हैं। सुननेवालेको ज्योंज्यों नयी बातें मिलती हैं? त्योंत्यों उसमें सुननेकी नयीनयी उत्कण्ठा पैदा होती रहती है। ऐसा होनेपर ही वक्ता और श्रोता -- इन दोनोंका संवाद बढ़िया होता है।अर्जुनने ऐसी उत्कण्ठासे पहले कभी बात नहीं पूछी और भगवान्के मनमें भी ऐसी बातें कहनेकी कभी नहीं आयी। परन्तु जब अर्जुनने जिज्ञासापूर्वक स्थितप्रज्ञस्य का भाषा ৷৷. (2। 54) -- यहाँसे पूछना प्रारम्भ किया? वहींसे उन दोनोंका प्रश्नोत्तररूपसे संवाद प्रारम्भ हुआ है। इसमें वेदों तथा उपनिषदोंका सार और भगवान्के हृदयका असली भाव है? जिसको धारण करनेसे मनुष्य भयंकरसेभयंकर परिस्थितिमें भी अपने मनुष्यजन्मके ध्येयको सुगमतापूर्वक सिद्ध कर सकता है। प्रतिकूलसेप्रतिकूल परिस्थिति आनेपर भी घबराये नहीं? प्रत्युत प्रतिकूल परिस्थितिका आदर करते हुए उसका सदुपयोग करे अर्थात् अनुकूलताकी इच्छाका त्याग करे क्योंकि प्रतिकूलता पहले किये पापोंका नाश करने और आगे अनुकूलताकी इच्छाका त्याग करनेके लिये ही आती है। अनुकूलताकी इच्छा जितनी ज्यादा होगी? उतनी ही प्रतिकूल अवस्था भयंकर होगी। अनुकूलताकी इच्छाका ज्योंज्यों त्याग होता जायगा? त्योंत्यों अनुकूलताका राग और प्रतिकूलताका भय मिटता जायगा। राग और भय -- दोनोंके मिटनेसे समता आ जायगी। समता परमात्माका साक्षात् स्वरूप है। गीतामें समताकी बात विशेषतासे बतायी गयी और गीताने इसीको योग कहा है। इस प्रकार कर्मयोग? ज्ञानयोग? भक्तियोग? ध्यानयोग? प्राणायाम आदिकी विलक्षणविलक्षण बातोंका इसमें वर्णन हुआ है।अध्येष्यते का तात्पर्य है कि इस संवादको कोई ज्योंज्यों पढ़ेगा? पाठ करेगा? याद करेगा? उसके भावोंको समझनेका प्रयास करेगा? त्योंहीत्यों उसके हृदयमें उत्कण्ठा बढ़ेगी। वह ज्योंज्यों समझेगा? त्योंत्यों उसकी शङ्काका समाधान होगा। ज्योंज्यों समाधान होगा? त्योंत्यों इसमें अधिक रुचि पैदा होगी। ज्योंज्यो रुचि अधिक पैदा होगी? त्योंत्यों गहरे भाव उसकी समझमें आयेंगे और फिर वे भाव उसके आचरणोंमें? क्रियाओंमें? बर्तावमें आने लगेंगे। आदरपूर्वक आचरण करनेसे वह गीताकी मूर्ति बन जायगा? उसका जीवन गीतारूपी साँचेमें ढल जायगा अर्थात् वह चलतीफिरती भगवद्गीता हो जायगी। उसको देखकर लोगोंको गीताकी याद आने लगेगी जैसे निषादराज गुहको देखकर माताओंको और दूसरे लोगोंको लखनलालकी याद आती है (टिप्पणी प0 991)।ज्ञानयज्ञेन तेनाहमिष्टः स्याम -- यज्ञ दो प्रकारके होते हैं -- द्रव्ययज्ञ और ज्ञानयज्ञ। जो यज्ञ पदार्थों और क्रियाओंकी प्रधानतासे किया जाता है? वहद्रव्ययज्ञ कहलाता है और उत्कण्ठासे केवल अपनी आवश्यक वास्तविकताको जाननेके लिये जो प्रश्न किये जाते हैं? विज्ञ पुरुषोंद्वारा उनका समाधान किया जाता है? उनका गहरा विचार किया जाता है? विचारके अनुसार अपनी वास्तविक स्थितिका अनुभव किया जाता है तथा वास्तविक तत्त्वको जानकर ज्ञातज्ञातव्य हो जाता है? वहज्ञानयज्ञ कहलाता है। परन्तु यहाँ भगवान् अर्जुनसे कहते हैं कि तुम्हारेहमारे संवादका कोई पाठ करेगा तो मैं उसके द्वारा भी ज्ञानयज्ञसे पूजित हो जाऊँगा। इसमें कारण यह है कि जैसे प्रेमी भक्तको कोई भगवान्की बात सुनाये? उसकी याद दिलाये तो वह बड़ा प्रसन्न होता है? ऐसे ही कोई गीताका पाठ करे? अभ्यास करे तो भगवान्को अपने अनन्य भक्तकी? उसकी उत्कण्ठापूर्वक जिज्ञासाकी और उसे दिये हुए उपदेशकी याद आ जाती है और वे बड़े प्रसन्न होते हैं एवं उस पाठ? अभ्यास आदिको ज्ञानयज्ञ मानकर उससे पूजित होते हैं। कारण कि पाठ? अभ्यास आदि करनेवालेके हृदयमें उसके भावोंके अनुसार भगवान्का नित्यज्ञान विशेषतासे स्फुरित होने लगता है।इति मे मतिः -- ऐसा कहनेका तात्पर्य है कि जब कोई गीताका पाठ करता है तो मैं उसको सुनता हूँ क्योंकि मैं सब जगह रहता हूँ -- मया ततमिदं सर्वम् (गीता 9। 4) और सब जगह ही मेरे कान हैं -- सर्वतःश्रुतिमल्लोके (गीता 13। 13)। अतः उस पाठको सुनते ही मेरे हृदयमें विशेषतासे ज्ञान? प्रेम? दया,आदिका समुद्र लहराने लगता है और गीतोपदेशकी यादमें मेरी बुद्धि सराबोर हो जाती है। वह पूजन करता है -- ऐसी बात नहीं है? वह तो पाठ करता है परन्तु मैं उससे पूजित हो जाता हूँ अर्थात् उसको ज्ञानयज्ञका फल मिल जाता है।दूसरा भाव यह है कि पाठ करनेवाला यदि उतने गहरे भावोंमें नहीं उतरता? केवल पाठमात्र या यादमात्र करता है तो भी उससे मेरे हृदयमें तेरे और मेरे सारे संवादकी (उत्कण्ठापूर्वक किये गये तेरे प्रश्नोंकी और मेरे दिये हुये गहरे वास्तविक उत्तरोंकी) एक गहरी मीठीमीठी स्मृति बारबार आने लगती है। इस प्रकार गीताका अध्ययन करनेवाला मेरी बड़ी भारी सेवा करता है? ऐसा मैं मान लेता हूँ।विदेशमें किसी जगह एक जलसा हो रहा था। उसमें बहुतसे लोग इकट्ठे हुए थे। एक पादरी उस जलसेमें एक लड़केको ले आया। वह लड़का पहले नाटकमें काम किया करता था। पादरीने उस लड़केको दसपन्द्रह मिनटका एक बहुत बढ़िया व्याख्यान सिखाया। साथ ही ढंगसे उठना? बैठना? खड़े होना? इधरउधर ऐसाऐसा देखना आदि व्याख्यानकी कला भी सिखायी। व्याख्यानमें बड़े ऊँचे दर्जेकी अंग्रेजीका प्रयोग किया गया था। व्याख्यानका विषय भी बहुत गहरा था। पादरीने व्याख्यान देनेके लिये उस बालकको मेजपर खड़ा कर दिया। बच्चा खड़ा हो गया और बड़े मिजाजसे दायेंबायें देखने लगा और बोलनेकी जैसीजैसी रिवाज है? वैसेवैसे सम्बोधन देकर बोलने लगा। वह नाटकमें रहा हुआ था? उसको बोलना आता ही था अतः वह गंभीरतासे? मानो अर्थोंको समझते हुएकी मुद्रामें ऐसा विलक्षण बोला कि जितने सदस्य बैठे थे? वे सब अपनीअपनी कुर्सियोंपर उछलने लगे। सदस्य इतने प्रसन्न हुए कि व्याख्यान पूरा होते ही वे रुपयोंकी बौछार करने लगे। अब वह बालक सभाके ऊपरहीऊपर घुमाया जाने लगा। उसको सब लोग अपनेअपने कन्धोंपर लेने लगे। परन्तु उस बालकको यह पता ही नहीं था कि मैंने क्या कहा है वह तो बेचारा ज्यादा पढ़ालिखा न होनेसे अंग्रेजीके भावोंको भी पूरा नहीं समझता था? पर सभावाले सभी लोग समझते थे। इसी प्रकार कोई गीताका अध्ययन करता है? पाठ करता है तो वह भले ही उसके अर्थको? भावोंको न समझे? पर भगवान् तो उसके अर्थको? भावोंको समझते हैं। इसलिये भगवान् कहते हैं कि मैं उसके अध्ययनरूप? पाठरूप ज्ञानयज्ञसे पूजित हो जाता हूँ। सभामें जैसे बालकके व्याख्यानसे सभापति तो खुश हुआ ही? पर उसके साथसाथ सभासद् भी बड़े खुश हुए और उत्साहपूर्वक बच्चेका आदर करने लगे? ऐसे ही गीता पाठ करनेवालेसे भगवान् ज्ञानयज्ञसे पूजित होते हैं तथा स्वयं वहाँ निवास करते हैं? साथहीसाथ प्रयोग आदि तीर्थ? देवता? ऋषि? योगी? दिव्य नाग? गोपाल? गोपिकाएँ? नारद? उद्धव आदि भी वहाँ निवास करते हैं (टिप्पणी प0 992.1)। सम्बन्ध -- जो गीताका प्रचार और अध्ययन भी न कर सके? इसके लिये आगेके श्लोकमें उपाय बताते हैं।
।।18.70।।जो मनुष्य हम दोनोंके इस धर्ममय संवादका अध्ययन करेगा, उसके द्वारा भी मैं ज्ञानयज्ञसे पूजित होऊँगा -- ऐसा मेरा मत है।
श्रद्धावाननसूयश्च शृणुयादपि यो नरः। सोऽपि मुक्तः शुभाँल्लोकान्प्राप्नुयात्पुण्यकर्मणाम् ॥
।।18.71।।व्याख्या -- श्रद्धावाननसूयश्च৷৷. पुण्यकर्मणाम् -- गीताकी बातोंको जैसा सुन ले? उसको प्रत्यक्षसे भी बढ़कर पूज्यभावसहित वैसाकावैसा माननेवालेका नाम श्रद्धावान् है? और उन बातोंमें कहीं भी? किसी भी विषयमें किञ्चिन्मात्र भी कमी न देखनेवालेका नाम अनसूयः है। ऐसा श्रद्धावान् और दोषदृष्टिसे रहित मनुष्य गीताको केवल सुन भी ले? तो वह भी सम्पूर्ण पापोंसे मुक्त होकर पुण्यकारियोंके शुभ लोकोंको प्राप्त कर लेता है।यहाँ दो बार अपि पद देनेका तात्पर्य है कि जो गीताका प्रचार करता है? अध्ययन करता है? उसके लिये तो कहना ही क्या है पर जो सुन भी लेता है? वह मनुष्य भी पापोंसे छूटकर शुभ लोकोंको प्राप्त हो जाता है।मनुष्यकी वाणीमें प्रायः भ्रम? प्रमाद? लिप्सा और कारणापाटव -- ये चार दोष होते हैं (टिप्पणी प0 992.2)। अतः मनुष्यकी वाणी सर्वथा निर्दोष नहीं हो सकती। परन्तु भगवान्की दिव्य वाणीमें इन चारोंमेंसे कोई भी दोष नहीं रह सकता क्योंकि भगवान् निर्दोषताकी परावधि हैं अर्थात् भगवान्से बढ़कर निर्दोषता किसीमें,कभी होती ही नहीं। इसलिये भगवान्के वचनोंमें किसी प्रकारके संशयकी सम्भावना ही नहीं है। अतः गीता सुननेवालेको कोई विषय समझमें कम आये? विचारद्वारा कोई बात न जँचे? तो समझना चाहिये कि इस विषयको समझनेमें मेरी बुद्धिकी कमी है? मैं समझ नहीं पा रहा हूँ -- इस भावको दृढ़तासे धारण करनेपर असूयादोष मिट जाता है। भगवान्में अत्यधिक श्रद्धाविश्वासपूर्वक भक्ति होनेपर भी असूयादोष नहीं रहता।चैतन्य महाप्रभुका एक भक्त था। वह रोज गीताका पाठ करते हुए मस्त हो जाता था? गद्गद हो जाता था और रोने लगता था। वह शुद्ध पाठ नहीं करता था। उसके पाठमें अशुद्धियाँ आती थीं। उसके विषयमें किसीने चैतन्य महाप्रभुसे शिकायत कर दी किदेखिये प्रभु वह बड़ा पाखण्ड करता है पाठ तो शुद्ध करता नहीं और रोता रहता है। चैतन्य महाप्रभुने उसको अपने पास बुलाकर पूछा -- तुम गीताका पाठ करते हो? तो क्या उसका अर्थ जानते हो उसने कहा -- नहीं प्रभु फिर पूछा -- तो फिर तुम रोते क्यों हो उसने कहा -- मैं जब अर्जुन उवाच पढ़ता हूँ तो अर्जुन भगवान्से पूछ रहे हैं -- ऐसा मेरेको प्रत्यक्ष दीखता है और जब मैं श्रीभगवानुवाच पढ़ता हूँ? तो भगवान् अर्जुनके प्रश्नोंका उत्तर दे रहे हैं -- ऐसा मेरेको प्रत्यक्ष,दीखता है। इस प्रकार भगवान् श्रीकृष्ण और अर्जुनका आपसमें संवाद हो रहा है -- ऐसा प्रत्यक्ष दीखता है परन्तु अर्जुन क्या पूछते हैं और भगवान् क्या उत्तर देते हैं? यह मेरी समझमें नहीं आता। मैं तो उन दोनोंके दर्शन करकरके राजी होता हूँ। उसकी ऐसी श्रद्धाभक्ति देखकर चैतन्य महाप्रभु बहुत प्रसन्न हुए। इस प्रकारकी श्रद्धाभक्तिवाला मनुष्य गीताको केवल सुन भी ले? तो उसकी मुक्तिमें कोई सन्देह नहीं रहता। वह सम्पूर्ण पापोंसे मुक्त होकर पुण्यकारियोंके शुभ लोकोंको प्राप्त हो जाता है।यहाँ पुण्यकर्मणाम् पदसे सकामभावपूर्वक यज्ञ? अनुष्ठान आदि पुण्यकर्म करनेवालोंको नहीं लेना चाहिये क्योंकि भगवान्ने उनको ऊँचा नहीं माना है? प्रत्युत उनके बारेमें कहा है कि वे बारबार आवागमनको प्राप्त होते हैं (गीता 9। 21)। यहाँ उन पुण्यकर्मा भक्तोंको लेना चाहिये? जिनको भगवान्का प्रेमदर्शन आदिकी प्राप्ति होती है। ऐसे पुण्यकर्मा भक्तोंको अपनेअपने इष्टके अनुसार वैकुण्ठ? साकेत? गोलोक? कैलास आदि जिन दिव्य लोकोंकी प्राप्ति होती है? असूयादोषरहित श्रद्धावान् पुरुषको गीता सुननेमात्रसे उन लोकोंकी प्राप्ति हो जाती है। सम्बन्ध -- पूर्वश्लोकमें गीता सुननेका माहात्म्य बताकर अब अर्जुनकी क्या स्थिति है? क्या दशा है? आदि सब कुछ जानते हुए भी भगवान् भगवद्गीताश्रवणके माहात्म्यको सबके सामने प्रकट करनेके उद्देश्यसे आगेके श्लोकमें अर्जुनसे प्रश्न करते हैं।
।।18.71।।श्रद्धावान् और दोषदृष्टिसे रहित जो मनुष्य इस गीता-ग्रन्थको सुन भी लेगा, वह भी सम्पूर्ण पापोंसे मुक्त होकर पुण्यकारियोंके शुभ लोकोंको प्राप्त हो जायगा।
कच्चिदेतच्छ्रुतं पार्थ त्वयैकाग्रेण चेतसा। कच्चिदज्ञानसम्मोहः प्रनष्टस्ते धनञ्जय ॥
।।18.72।। व्याख्या -- कच्चिदेतच्छ्रुतं पार्थ त्वयैकाग्रेण चेतसा -- एतत् शब्द अत्यन्त समीपका वाचक होता है और यहाँ अत्यन्त समीप इकहत्तरवाँ श्लोक है। उनहत्तरवेंसत्तरवें श्लोकोंमें जो गीताका प्रचार और अध्ययन करनेवालेकी महिमा कही है? उस प्रचार और अध्ययनका तो अर्जुनके सामने कोई प्रश्न ही नहीं था। इसलिये पीछेके (इकहत्तरवें) श्लोकका लक्ष्य करके भगवान् अर्जुनसे कहते हैं किमनुष्य श्रद्धापूर्वक और दोषदृष्टिरहित होकर गीता सुने -- यह बात तुमने ध्यानपूर्वक सुनी कि नहीं अर्थात् तुमने श्रद्धापूर्वक और दोषदृष्टिरहित होकर गीता सुनी कि नहींएकाग्रेण चेतसा कहनेका तात्पर्य है कि गीतामें भी जिस अत्यन्त गोपनीय रहस्यको अभी पहले चौंसठवें श्लोकमें कहनेकी प्रतिज्ञा की? सड़सठवें श्लोकमें इदं ते नातपस्काय कहकर निषेध किया और मेरे वचनोंमें जिसको मैंने परम वचन कहा? उस सर्वगुह्यतम शरणागतिकी बात (18। 66) को तुमने ध्यानपूर्वक सुना कि नहीं उसपर खयाल किया कि नहींकच्चिदज्ञानसंमोहः प्रनष्टस्ते धनञ्जय -- भगवान् दूसरा प्रश्न करते हैं कि तुम्हारा अज्ञानसे उत्पन्न हुआ मोह नष्ट हुआ कि नहीं अगर मोह नष्ट हो गया तो तुमने मेरा उपदेश सुन लिया और अगर मोह नष्ट नहीं हुआ,तो तुमने मेरा यह रहस्यमय उपदेश एकाग्रतासे सुना ही नहीं क्योंकि यह एकदम पक्का नियम है कि जो दोषदृष्टिसे रहित होकर श्रद्धापूर्वक गीताके उपदेशको सुनता है? उसका मोह नष्ट हो ही जाता है।पार्थ सम्बोधन देकर भगवान् अपनेपनसे? बहुत प्यारसे पूछ रहे हैं कि तुम्हारा मोह नष्ट हुआ कि नहीं पहले अध्यायके पचीसवें श्लोकमें भी भगवान्ने अर्जुनको सुननेके उन्मुख करनेके लिये पार्थ सम्बोधन देकर सबसे प्रथम बोलना आरम्भ किया और कहा कि हे पार्थ युद्धके लिये इक्ट्ठे हुए इन कुटुम्बियोंको देखो। ऐसा कहनेका तात्पर्य यह था कि अर्जुनके अन्तःकरणमें छिपा हुआ जो कौटुम्बिक मोह है? वह जाग्रत् हो जाय और उस मोहसे छूटनेके लिये उनको चटपटी लग जाय? जिससे वे केवल मेरे सम्मुख होकर सुननेके लिये तत्पर हो जायँ। अब यहाँ उसी मोहके दूर होनेकी बातका उपसंहार करते हुए भगवान् पार्थ सम्बोधन देते हैं।धनञ्जय सम्बोधन देकर भगवान् कहते हैं कि तुम लौकिक धनको लेकर धनञ्जय (राजाओंके धनको जीतनेवाले) बने हो। अब इस वास्तविक तत्त्वरूप धनको प्राप्त करके अपने मोहका नाश कर लो और सच्चे अर्थोंमेंधनञ्जय बन जाओ। सम्बन्ध -- पूर्वश्लोकमें भगवान्ने जो प्रश्न किया था? उसका उत्तर अर्जुन आगेके श्लोकमें देते हैं।
।।18.72।।हे पृथानन्दन ! क्या तुमने एकाग्र-चित्तसे इसको सुना ?और हे धनञ्जय ! क्या तुम्हारा अज्ञानसे उत्पन्न मोह नष्ट हुआ ?
अर्जुन उवाच। नष्टो मोहः स्मृतिर्लब्धा त्वत्प्रसादान्मयाच्युत। स्थितोऽस्मि गतसन्देहः करिष्ये वचनं तव ॥
।।18.73।। व्याख्या -- नष्टो मोहः स्मृतिर्लब्धा त्वत्प्रसादान्मयाच्युत -- अर्जुनने यहाँ भगवान्के लिये अच्युत सम्बोधनका प्रयोग किया है। इसका तात्पर्य है कि जीव तो च्युत हो जाता है अर्थात् अपने स्वरूपसे विमुख हो जाता है तथा पतनकी तरफ चला जाता है परन्तु भगवान् कभी भी च्युत नहीं होते। वे सदा एकरस रहते हैं। इसी बातका द्योतन करनेके लिये गीतामें अर्जुनने कुल तीन बार अच्युत सम्बोधन दिया है। पहली बार (गीता 1। 21 में) अच्युत सम्बोधनसे अर्जुनने भगवान्से कहा कि दोनों सेनाओंके बीचमें मेरा रथ खड़ा करो। ऐसी आज्ञा देनेपर भी भगवान्में कोई फरक नहीं पड़ा। दूसरी बार (11। 42 में) इस सम्बोधनसे अर्जुन्ने भगवान्के विश्वरूपकी स्तुतिप्रार्थना की? तो भगवान्में कोई फरक नहीं पड़ा। अन्तिम बार यहाँ (18। 73 में) इस सम्बोधनसे अर्जुन संदेहरहित होकर कहते हैं कि अब मैं आपकी आज्ञाका पालन करूँगा? तो भगवान्में कोई फरक नहीं पड़ा। तात्पर्य यह हुआ कि अर्जुनकी तो आदि? मध्य और अन्तमें तीन प्रकारकी अवस्थाएँ हुईँ? पर भगवान्की आदि? मध्य और अन्तमें एक ही अवस्था रही अर्थात् वे एकरस ही बने रहे।दूसरे अध्यायमें अर्जुनने शिष्यस्तेऽहं शाधि मां त्वां प्रपन्नम् (2। 7) कहकर भगवान्की शरणागति स्वीकार की थी। इस श्लोकमें उस शरणागतिकी पूर्णता होती है।दसवें अध्यायके अन्तमें भगवान्ने अर्जुनसे यह कहा कितेरेको बहुत जाननेकी क्या जरूरत है? मैं सम्पूर्ण संसारको एक अंशमें व्याप्त करके स्थित हूँ इस बातको सुनते ही अर्जुनके मनमें एक विशेष भाव पैदा हुआ कि भगवान् कितने विलक्षण हैं भगवान्की विलक्षणताकी ओर लक्ष्य जानेसे अर्जुनको एक प्रकाश मिला। उस प्रकाशकी प्रसन्नतामें अर्जुनके मुखसे यह बात निकल पड़ी किमेरा मोह चला गया -- मोहोऽयं विगतो मम (11। 1)। परन्तु भगवान्के विराट्रूपको देखकर जब अर्जुनके हृदयमें भयके कारण हलचल पैदा हो गयी? तब भगवान्ने कहा कि यह तुम्हारा मूढ़भाव है? तुम व्यथित और मोहित मत होओ -- मा ते व्यथा मा च विमूढभावः (11। 49)। इससे सिद्ध होता है कि अर्जुनका मोह तब नष्ट नहीं हुआ था। अब यहाँ सर्वज्ञ भगवान्के पूछनेपर अर्जुन कह रहे हैं कि मेरा मोह नष्ट हो गया है और मुझे तत्त्वकी अनादि स्मृति प्राप्त हो गयी -- नष्टो मोहः स्मृतिर्लब्धा (टिप्पणी प0 995.1)।अन्तःकरणकी स्मृति और तत्त्वकी स्मृतिमें बड़ा अन्तर है। प्रमाणसे प्रमेयका ज्ञान होता है (टिप्पणी प0 995.2) परन्तु परमात्मतत्त्व अप्रमेय है। अतः परमात्मा प्रमाणसे व्याप्य नहीं हो सकता अर्थात् परमात्मा प्रमाणके अन्तर्गत आनेवाला तत्त्व नहीं है। परन्तु संसार सबकासब प्रमाणके अन्तर्गत आनेवाला है और प्रमाण प्रमाताके अन्तर्गत आनेवाला है (टिप्पणी प0 995.3)।प्रमाता एक होता है और प्रमाण अनेक होते हैं। प्रमाणोंके बारेमें कई प्रत्यक्ष? अनुमान? आगम -- ये तीन मुख्य प्रमाण मानते हैं कई प्रत्यक्ष? अनुमान? उपमान और शब्द -- ये चार प्रमाण मानते हैं और कई इन चारोंके सिवाय अर्थापत्ति? अनुपलब्धि और ऐतिह्य -- ये तीन प्रमाण और भी मानते हैं। इस प्रकार प्रमाणोंके माननेमें अनेक मतभेद हैं परन्तु प्रमाताके विषयमें किसीका कोई मतभेद नहीं है। ये प्रत्यक्ष? अनुमान आदि प्रमाण वृत्तिरूप होते हैं परन्तु प्रमाता वृत्तिरूप नहीं होता? वह तो स्वयं अनुभवरूप होता है।अब इसस्मृति शब्दकी जहाँ व्याख्या की गयी है? वहाँ उसके ये लक्षण बताये हैं -- (1) अनुभूतविषयासम्प्रमोषः स्मृतिः। (योगदर्शन 1। 11), अनुभूत विषयका न छिपाना अर्थात् प्रकट हो जाना स्मृति है। (2) संस्कारमात्रजन्यं ज्ञानं स्मृतिः। (तर्कसंग्रह)संस्कारमात्रसे जन्य हो और ज्ञान हो? उसको स्मृति कहते हैं।यह स्मृति अन्तःकरणकी एकवृति है। यह वृत्ति प्रमाण? विपर्यय? विकल्प? निद्रा और स्मृति -- पाँच प्रकारकी होती है तथा हर प्रकारकी वृत्तिके दो भेद होते हैं -- क्लिष्ट और अक्लिष्ट। संसारकी वृत्तिरूप स्मृतिक्लिष्ट होती है अर्थात् बाँधनेवाली होती है? और भगवत्सम्बन्धी वृत्तिरूप स्मृतिअक्लिष्ट होती है अर्थात् क्लेशको दूर करनेवाली होती है। इन सब वृत्तियोंका कारणअविद्या है। परन्तु परमात्मा अविद्यासे रहित है। इसलिये परमात्माकी स्मृतिस्वयंसे ही होती है? वृत्ति या करणसे नहीं। जब परमात्माकी स्मृति जाग्रत् होती है तो फिर उसकी कभी विस्मृति नहीं होती? जबकि अन्तःकरणकी वृत्तिमें स्मृति और विस्मृति -- दोनों होती हैं।परमात्मतत्त्वकी विस्मृति या भूल तो असत् संसारको सत्ता और महत्ता देनेसे ही हुई है। यह विस्मृति अनादिकालसे है। अनादिकालसे होनेपर भी इसका अन्त हो जाता है। जब इसका अन्त हो जाता है और अपने स्वरूपकी स्मृति जाग्रत् होती है? तब इसको स्मृतिर्लब्धा कहते हैं अर्थात् असत्के सम्बन्धके कारण जो स्मृति सुषुप्तिरूपसे थी? वह जाग्रत् हो गयी। जैसे एक आदमी सोया हुआ है और एक मुर्दा पड़ा हुआ है -- इन दोनोंमें महान् अन्तर है? ऐसे ही अन्तःकरणकी स्मृतिविस्मृति दोनों ही मुर्देकी तरह जड हैं? पर स्वरूपकी स्मृति सुप्त है? जड नहीं। केवल जडका आदर करनेसे सोये हुएकी तरह ऊपरसे वह स्मृति लुप्त रहती है अर्थात् आवृत रहती है। उस आवरणके न रहनेपर उस स्मृतिका प्राकट्य हो जाता है तो उसे स्मृतिर्लब्धा कहते हैं अर्थात् पहलेसे जो तत्त्व मौजूद है? उसका प्रकट होना स्मृति है? और आवरण हटनेका नाम लब्धा है।साधकोंकी रुचिके अनुसार उसी स्मृतिके तीन भेद हो जाते हैं -- (1) कर्मयोग अर्थात् निष्कामभावकी स्मृति? (2) ज्ञानयोग अर्थात् अपने स्वरूपकी स्मृति और (3) भक्तियोग अर्थात् भगवान्के सम्बन्धकी स्मृति। इस प्रकार इन तीनों योगोंकी स्मृति जाग्रत् हो जाती है क्योंकि ये तीनों योग स्वतःसिद्ध और नित्य हैं। ये तीनों योग जब वृत्तिके विषय होते हैं? तब ये साधन कहलाते हैं परन्तु स्वरूपसे ये तीनों नित्य हैं। इसलिये नित्यकी प्राप्तिको स्मृति कहते हैं। तात्पर्य यह हुआ कि इन साधनोंकी विस्मृति हुई है? अभाव नहीं हुआ है।असत् संसारके पदार्थोंको आदर देनेसे अर्थात् उनको सत्ता और महत्ता देनेसे राग पैदा हुआ -- यहकर्मयोग की विस्मृति (आवरण) है। असत् पदार्थोंके सम्बन्धसे अपने स्वरूपकी विमुखता हुई अर्थात् अज्ञान हुआ -- यहज्ञानयोग की विस्मृति है। अपना स्वरूप साक्षात् परमात्माका अंश है। इस परमात्मासे विमुख होकर,संसारके सम्मुख होनेसे संसारमें आसक्ति हो गयी। उस आसक्तिसे प्रेम ढक गया -- यहभक्तियोग की विस्मृति है।स्वरूपकी विस्मृति अर्थात् विमुखताका नाश होना यहाँस्मृति है। उस स्मृतिका प्राप्त होना अप्राप्तका प्राप्त होना नहीं है? प्रत्युत नित्यप्राप्तका प्राप्त होना है। नित्य स्वरूपकी प्राप्ति होनेपर फिर उसकी विस्मृति होना सम्भव नहीं है क्योंकि स्वरूपमें कभी परिवर्तन हुआ नहीं। वह सदा निर्विकार और एकरस रहता है। परन्तु वृत्तिरूप स्मृतिकी विस्मृति हो सकती है क्योंकि वह प्रकृतिका कार्य होनेसे परिवर्तनशील है।इन सबका तात्पर्य यह हुआ कि संसार तथा शरीरके साथ अपने स्वरूपको मिला हुआ समझनाविस्मृति है और संसार तथा शरीरसे अलग होकर अपने स्वरूपका अनुभव करनास्मृति है। अपने स्वरूपकी स्मृति स्वयंसे होती है। इसमें करण आदिकी अपेक्षा नहीं होती जैसे -- मनुष्यको अपने होनेपनका जो ज्ञान,होता है? उसमें किसी प्रमाणकी आवश्यकता नहीं होती। जिसमें करण आदिकी अपेक्षा होती है? वह स्मृति अन्तःकरणकी एक वृत्ति ही है।स्मृति तत्काल प्राप्त होती है। इसकी प्राप्तिमें देरी अथवा परिश्रम नहीं है। कर्ण कुन्तीके पुत्र थे। परन्तु जन्मके बाद जब कुन्तीने उनका त्याग कर दिया? तब अधिरथ नामक सूतकी पत्नी राधाने उनका पालनपोषण किया। इससे वे राधाको ही अपनी माँ मानने लगे। जब सूर्यदेवसे उनको यह पता लगा कि वास्तवमें मेरी माँ कुन्ती है? तब उनको स्मृति प्राप्त हो गयी। अबमैं कुन्तीका पुत्र हूँ -- ऐसी स्मृति प्राप्त होनेमें कितना समय लगा कितना परिश्रम या अभ्यास करना पड़ा कितना जोर आया पहले उधर लक्ष्य नहीं था? अब उधर लक्ष्य हो गया -- केवल इतनी ही बात है।स्वरूप निष्काम है? शुद्धबुद्धमुक्त है और भगवान्का है। स्वरूपकी विस्मृति अर्थात् विमुखतासे ही जीव सकाम? बद्ध और सांसारिक होता है। ऐसे स्वरूपकी स्मृति वृत्तिकी अपेक्षा नहीं रखती अर्थात् अन्तःकरणकी वृत्तिसे स्वरूपकी स्मृति जाग्रत् होना सम्भव नहीं है। स्मृति तभी जाग्रत् होगी? जब अन्तःकरणसे सर्वथा सम्बन्धविच्छेद होगा। स्मृति अपने ही द्वारा अपनेआपमें जाग्रत् होती है। अतः स्मृतिकी प्राप्तिके लिये किसीके सहयोगकी या अभ्यासकी जरूरत नहीं है। कारण कि जडताकी सहायताके बिना अभ्यास नहीं होता? जबकि स्वरूपके साथ जडताका लेशमात्र भी सम्बन्ध नहीं है। स्मृति अनुभवसिद्ध है? अभ्याससाध्य नहीं है। इसलिये एक बार स्मृति जाग्रत् होनेपर फिर उसकी पुनरावृत्ति नहीं करनी पड़ती।स्मृति भगवान्की कृपासे जाग्रत् होती है। कृपा होती है भगवान्के सम्मुख होनेपर और भगवान्की सम्मुखता होती है संसारमात्रसे विमुख होनेपर। जैसे अर्जुनने कहा कि मैं केवल आपकी आज्ञाका ही पालन करूँगा -- करिष्ये वचनं तव? ऐसे ही संसारका आश्रय छोड़कर केवल भगवान्के शरण होकर कह दे किहे नाथ अब मैं केवल आपकी आज्ञाका ही पालन करूँगा।तात्पर्य है कि इस स्मृतिकी लब्धिमें साधककी सम्मुखता और भगवान्की कृपा ही कारण है। इसलिये अर्जुनने स्मृतिके प्राप्त होनेमें केवल भगवान्की कृपाको ही माना है। भगवान्की कृपा तो मात्र प्राणियोंपर अपारअटूटअखण्डरूपसे है। जब मनुष्य भगवान्के सम्मुख हो जाता है? तब उसको उस कृपाका अनुभव हो जाता है।त्वत्प्रसादात् मयाच्युत पदोंसे अर्जुन कह रहे हैं कि आपने विशेषतासे जो सर्वगुह्यतम तत्त्व बताया? उसकी मुझे विशेषतासे स्मृति आ गयी कि मैं आपका ही था? आपका ही हूँ और आपका ही रहूँगा। यह जो स्मृति आ गयी है? यह मेरी एकाग्रतासे सुननेकी प्रवृत्तिसे नहीं आयी है अर्थात् यह मेरे एकाग्रतासे सुननेका फल नहीं है? प्रत्युत यह स्मृति तो आपकी कृपासे ही आयी है। पहले मैंने शरण होकर शिक्षा देनेकी प्रार्थना की थी और फिर यह कहा था कि मैं युद्ध नहीं करूँगा परन्तु मेरेको जबतक वास्तविकताका बोध नहीं हुआ? तबतक आप मेरे पीछे पड़े ही रहे। इसमें तो आपकी कृपा ही कारण है। मेरेको जैसा सम्मुख होना चाहिये? वैसा मैं सम्मुख नहीं हुआ हूँ परन्तु आपने बिना कारण मेरेपर कृपा की अर्थात् मेरेपर कृपा करनेके लिये आप अपनी कृपाके परवश हो गये? वशीभूत हो गये और बिना पूछे ही आपने शरणागतिकी सर्वगुह्यतम बात कह दी (18। 64 -- 66)। उसी अहैतुकी कृपासे मेरा मोह नष्ट हुआ है।स्थितोऽस्मि गतसन्देहः करिष्ये वचनं तव -- अर्जुन कहते हैं कि मूलमें मेरा जो यह सन्देह था कि युद्ध करूँ या न करूँ (न चैतद्विद्मः कतरन्नो गरीयः 2। 6)? वह मेरा सन्देह सर्वथा नष्ट हो गया है और मैं अपनी वास्तविकतामें स्थित हो गया हूँ। वह संदेह ऐसा नष्ट हो गया है कि न तो युद्ध करनेकी मनमें रही और न युद्ध न करनेकी ही मनमें रही। अब तो यही एक मनमें रही है कि आप जैसा कहें? वैसा मैं करूँ अर्थात् अब,तो बस? आपकी आज्ञाका ही पालन करूँगा -- करिष्ये वचनं तव। अब मेरेको युद्ध करने अथवा न करनेसे किसी तरहका किञ्चिन्मात्र भी प्रयोजन नहीं है। अब तो आपकी आज्ञाके अनुसार लोकसंग्रहार्थ युद्ध आदि जो कर्तव्यकर्म होगा? वह करूँगा।अब एक ध्यान देनेकी बात है कि पहले कुटुम्बका स्मरण होनेसे अर्जुनको मोह हुआ था। उस मोहके वर्णनमें भगवान्ने यह प्रक्रिया बतायी थी कि विषयोंके चिन्तनसे आसक्ति? आसक्तिसे कामना? कामनासे क्रोध? क्रोधसे मोह? मोहसे स्मृतिभ्रंश? स्मृतिभ्रंशसे बुद्धिनाश और बुद्धिनाशसे पतन होता है (गीता 2। 6263)। अर्जुन भी यहाँ उसी प्रक्रियाको याद दिलाते हुए कहते हैं कि मेरा मोह नष्ट हो गया है और मोहसे जो स्मृति भ्रष्ट होती है? वह स्मृति मिल गयी है -- नष्टो मोहः स्मृतिर्लब्धा। स्मृति नष्ट होनेसे बुद्धिनाश हो जाता है? इसके उत्तरमें अर्जुन कहते हैं कि मेरा सन्देह चला गया है -- गतसन्देहः। बुद्धिनाशसे पतन होता है? उसके उत्तरमें कहते हैं कि मैं अपनी स्वाभाविक स्थितिमें स्थित हूँ -- स्थितोऽस्मि। इस प्रकार उस प्रक्रियाको बतानेमें अर्जुनका तात्पर्य है कि मैंने आपके मुखसे ध्यानपूर्वक गीता सुनी है? तभी तो आपने सम्मोहका कहाँ प्रयोग किया है और सम्मोहकी परम्परा कहाँ कही है? वह भी मेरेको याद है। परन्तु मेरे मोहका नाश होनेमें तो आपकी कृपा ही कारण है।यद्यपि वहाँका और यहाँका -- दोनोंका विषय भिन्नभिन्न प्रतीत होता है क्योंकि वहाँ विषयोंके चिन्तन करने आदि क्रमसे सम्मोह होनेकी बात है और यहाँ सम्मोह मूल अज्ञानका वाचक है? फिर भी गहरा विचार किया जाय तो भिन्नता नहीं दीखेगी। वहाँका विषय ही यहाँ आया है।दूसरे अध्यायके इकसठवेंसे तिरसठवें श्लोकतक भगवान्ने यह बात बतायी कि इन्द्रियोंको वशमें करके अर्थात् संसारसे सर्वथा विमुख होकर केवल मेरे परायण होनेसे बुद्धि स्थिर हो जाती है। परन्तु मेरे परायण न होनेसे मनमें स्वाभाविक ही विषयोंका चिन्तन होता है। विषयोंका चिन्तन होनेसे पतन ही होता है क्योंकि यह आसुरीसम्पत्ति है। परन्तु यहाँ उत्थानकी बात बतायी है कि संसारसे विमुख होकर भगवान्के सम्मुख होनेसे मोह नष्ट हो जाता है क्योंकि यह दैवीसम्पत्ति है। तात्पर्य यह हुआ कि वहाँ भगवान्से विमुख होकर इन्द्रियों और विषयोंके परायण होना पतनमें हेतु है और यहाँ भगवान्के सम्मुख होनेपर भगवान्के साथ वास्तविक सम्बन्धकी स्मृति आनेमें भगवत्कृपा ही हेतु है।भगवत्कृपासे जो काम होता है? वह श्रवण? मनन? निदिध्यासन? ध्यान? समाधि आदि साधनोंसे नहीं होता। कारण कि अपना पुरुषार्थ मानकर जो भी साधनोंसे नहीं होता। कारण कि अपना पुरुषार्थ मानकर जो भी साधन किया जाता है? उस साधनमें अपना सूक्ष्म व्यक्तित्व अर्थात् अहंभाव रहता है। वह व्यक्तित्व साधनमें अपना पुरुषार्थ न मानकर केवल भगवत्कृपा माननेसे ही मिटता है।मार्मिक बातअर्जुनने कहा कि मुझे स्मृति मिल गयी -- स्मृतिर्लब्धा। तो विस्मृति किसी कारणसे हुई जीवने असत्के साथ तादात्म्य मानकर असत्की मुख्यता मान ली? इसीसे अपने सत्स्वरूपकी विस्मृति हो गयी। विस्मृति होनेसे इसने असत्की कमीको अपनी कमी मान ली? अपनेको शरीर मानने (मैंपन) तथा शरीरको अपना मानने (मेरापन) के कारण इसने असत् शरीरकी उत्पत्ति और विनाशको अपनी उत्पत्ति और विनाश मान लिया एवं जिससे शरीर पैदा हुआ? उसीको अपनी उत्पादक मान लियाअब कोई प्रश्न करे कि भूल पहले हुई कि असत्का सम्बन्ध पहले हुआ अर्थात् भूलसे असत्का सम्बन्ध हुआ कि असत्के सम्बन्धसे भूल हुई तो इसका उत्तर है कि अनादिकालसे जन्ममरणके चक्करमें पड़े हुए जीवको जन्ममरणसे छुड़ाकर सदाके लिये महान् सुखी करनेके लिये अर्थात् केवल अपनी प्राप्ति करानेके लिये भगवान्ने जीवको मनुष्यशरीर दिया। भगवान्का अकेलेमें मन नहीं लगा -- एकाकी न रमते (बृहदारण्यक 1। 4। 3)? इसलिये उन्होंने अपने साथ खेलनेके लिये मनुष्यशरीरकी रचना की। खेल तभी होता है? जब दोनों तरफके खिलाड़ी स्वतन्त्र होते हैं। अतः भगवान्ने मनुष्यशरीर देनेके साथसाथ इसे स्वतन्त्रता भी दी और विवेक (सत्असत्का ज्ञान) भी दिया। दूसरी बात? अगर इसे स्वतन्त्रता और विवेक न मिलाता? तो यह पशुकी तरह ही होता? इसमें मनुष्यताकी किञ्चिन्मात्र भी कोई विशेषता नहीं होती। इस विवेकके कारण असत्को असत् जानकर भी मनुष्यने मिली हुई स्वतन्त्रताका दुरुपयोग किया और असत्में (संसारके भोग और संग्रहके सुखमें) आसक्त हो गया। असत्में आसक्त होनेसे ही भूल हुई है।असत्को असत् जानकर भी यह उसमें आसक्त क्यों होता है कारण कि असत्के सम्बन्धसे प्रतीत होनेवाले तात्कालिक सुखकी तरफ तो यह दृष्टि रखता है? पर उसका परिणाम क्या होगा? उस तरफ अपनी दृष्टि रखता ही नहीं। (जो परिणामकी तरफ दृष्टि रखते हैं? वे संसारी होते हैं।) इसलिये असत्के सम्बन्धसे ही भूल पैदा हुई है। इसका पता कैसे लगता है जब यह अपने अनुभवमें आनेवाले असत्की आसक्तिका त्याग करके परमात्माके सम्मुख हो जाता है? इससे सिद्ध हुआ कि परमात्मासे विमुख होकर जाने हुए असत्में आसक्ति होनेसे ही यह भूल हुई है।असत्को महत्त्व देनेसे होनेवाली भूल स्वाभाविक नहीं है। इसको मनुष्यने खुद पैद किया है। जो चीज स्वाभाविक होती है? उसमें परिवर्तन भले ही हो? पर उसका अत्यन्त अभाव नहीं होता। परन्तु भूलका अत्यन्त अभाव होता है। इससे यह सिद्ध होता है कि इस भूलको मनुष्यने खुद उत्पन्न किया है क्योंकि जो वस्तु मिटनेवाली होती है? वह उत्पन्न होनेवाली ही होती है। इसलिये इस भूलको मिटानेका दायित्व भी मनुष्यपर ही है? जिसको वह सुगमतापूर्वक मिटा सकता है। तात्पर्य है कि अपने ही द्वारा उत्पन्न की हुई इस भूलको मिटानेमें मनुष्यमात्र समर्थ और सबल है। भूलको मिटानेकी सामर्थ्य भगवान्ने पूरी दे रखी है। भूल मिटते ही अपने वास्तविक स्वरूपकी स्मृति अपनेआपमें ही जाग्रत् हो जाती है और मनुष्य सदाके लिये कृतकृत्य? ज्ञातज्ञातव्य और प्राप्तप्राप्तव्य हो जाता है।अबतक मनुष्यने अनेक बार जन्म लिया है और अनेक बार कई वस्तुओं? व्यक्तियों? परिस्थितियों? अवस्थाओं? घटनाओं आदिका मनुष्यको संयोग हुआ है परन्तु उन सभीका उससे वियोग हो गया और वह स्वयं वही रहा। कारण कि वियोगका संयोग अवश्यम्भावी नहीं है? पर संयोगका वियोग अवश्यम्भावी है। इससे सिद्ध हुआ कि संसारसे वियोगहीवियोग है? संयोग है ही नहीं। अनादिकालसे वस्तुओं आदिका निरन्तर वियोग ही होता चला आ रहा है? इसलिये वियोग ही सच्चा है। इस प्रकार संसारसे सर्वथा वियोगका अनुभव हो जाना हीयोग है -- तं विद्याद् दुःखसंयोगवियोगं योगसंज्ञितम् (गीता 6। 23)। यह योग नित्यसिद्ध है। स्वरूप अथवा परमात्माके साथ हमारा नित्ययोग है (टिप्पणी प0 998) और शरीरसंसारके साथ नित्यवियोग है। संसारके संयोगकी सद्भावना होनेसे ही वास्तवमें नित्ययोग अनुभवमें नहीं आता। सद्भावना मिटते ही नित्ययोगका अनुभव हो जाता है? जिसका कभी वियोग हुआ ही नहीं।संसारसे संयोग मानना हीविस्मृति है और संसारसे नित्यवियोगका अनुभव होना अर्थात् वास्तवमें संसारके साथ मेरा संयोग था नहीं? होगा नहीं और हो सकता भी नहीं -- ऐसा अनुभव होना हीस्मृति है। सम्बन्ध -- पहले अध्यायके बीसवें श्लोकमें अर्थ पदसे श्रीकृष्णार्जुनसंवादके रूपमें गीताका आरम्भ हुआ था? अब आगेके श्लोकमें इति पदसे उसकी समाप्ति करते हुए सञ्जय इस संवादकी महिमा गाते हैं।
।।18.73।।अर्जुन बोले -- हे अच्युत ! आपकी कृपासे मेरा मोह नष्ट हो गया है और स्मृति प्राप्त हो गयी है। मैं सन्देहरहित होकर स्थित हूँ। अब मैं आपकी आज्ञाका पालन करूँगा।
सञ्जय उवाच। इत्यहं वासुदेवस्य पार्थस्य च महात्मनः। संवादमिममश्रौषमद्भुतं रोमहर्षणम् ॥
।।18.74।। व्याख्या -- इत्यहं वासुदेवस्य पार्थस्य च महात्मनः -- सञ्जय कहते हैं कि इस तरह मैंने भगवान् वासुदेव और महात्मा पृथानन्दन अर्जुनका यह संवाद सुना? जो कि अत्यन्त अद्भुत? विलक्षण है और इसकी यादमात्र हर्षके मारे रोमाञ्चित करनेवाली है।यहाँ इति पदका तात्पर्य है कि पहले अध्यायके बीसवें श्लोकमें अथ व्यवस्थितान्दृष्ट्वा धार्तराष्ट्रान् कपिध्वजः पदोंसे सञ्जय श्रीकृष्ण और अर्जुनके संवादरूप गीताका आरम्भ करते हैं और यहाँ इति पदसे उस संवादकी समाप्ति करते हैं।अर्जुनके लिये महात्मनः विशेषण देनेका तात्पर्य है कि अर्जुन कितने महान् विलक्षण पुरुष हैं? जिनकी आज्ञाका पालन स्वयं भगवान् करते हैं अर्जुन कहते हैं कि हे अच्युत मेरे रथको दोनों सेनाओंके बीचमें खड़ा कर दो (गीता 1। 21)? तो भगवान् दोनों सेनाओंके बीचमें रथको खड़ा कर देते हैं (गीता 1। 24)। गीतामें अर्जुन जहाँजहाँ प्रश्न करते हैं? वहाँवहाँ भगवान् बड़े प्यारसे और बड़ी विलक्षण रीतिसे प्रायः विस्तारपूर्वक उत्तर देते हैं। इस प्रकार महात्मा अर्जुनके और भगवान् वासुदेवके संवादको मैंने सुना है।संवादमिममश्रौषमद्भुतं रोमहर्षणम् -- इस संवादमें अद्भुत और रोमहर्षणपना क्या है शास्त्रोंमें प्रायः ऐसी बात आती है कि संसारकी निवृत्ति करनेसे ही मनुष्य पारमार्थिक मार्गपर चल सकता है और उसका कल्याण हो सकता है। मनुष्योंमें भी प्रायः ऐसी ही धारण बैठी हुई है कि घर? कुटुम्ब आदिको छोड़कर साधुसंन्यासी होनेसे ही कल्याण होता है। परन्तु गीता कहती है कि कोई भी परिस्थिति? अवस्था? घटना? काल आदि क्यों न हो? उसीके सदुपयोगसे मनुष्यका कल्याण हो सकता है। इतना ही नहीं? वह परिस्थिति बढ़ियासेबढ़िया हो या घटियासेघटिया? सौम्यसेसौम्य हो या घोरसेघोर विहित युद्धजैसी प्रवृत्ति हो? जिसमें दिनभर मनुष्योंका गला काटना पड़ता है? उसमें भी मनुष्यका कल्याण हो सकता है? मुक्ति हो सकती है (टिप्पणी प0 999)। कारण कि जन्ममरणरूप बन्धनमें संसारका राग ही कारण है (गीता 13। 21)। उस रागको मिटानेमें परिस्थितिका सदुपयोग करना ही हेतु है अर्थात् जो पुरुष परिस्थितिमें रागद्वेष न करके अपने कर्तव्यका पालन करता है? वह सुखपूर्वक मुक्त हो जाता है (गीता 5। 3)। यही इस संवादमें अद्भुतपना है।भगवान्का स्वयं अवतार लेकर मनुष्यजैसा काम करते हुए अपनेआपको प्रकट कर देना औरमेरी शरणमें आ जा यह अत्यन्त गोपनीय रहस्यकी बात कह देना -- यही संवादमें रोमहर्षण करनेवाला? प्रसन्न करनेवाला? आनन्द देनेवाला है। सम्बन्ध -- पारमार्थिक मार्गमें सच्चे साधकको जिसकिसीसे लाभ होता है? उसकी वहि कृतज्ञता प्रकट करता ही है। अतः सञ्जय भी आगेके तीन श्लोकोंमें व्यासजीकी कृतज्ञता प्रकट करते हैं।
।।18.74।।सञ्जय बोले -- इस प्रकार मैंने भगवान् वासुदेव और महात्मा पृथानन्दन अर्जुनका यह रोमाञ्चित करनेवाला अद्भुत संवाद सुना।
व्यासप्रसादाच्छ्रुतवानेतद्गुह्यमहं परम्। योगं योगेश्वरात्कृष्णात्साक्षात्कथयतः स्वयम् ॥
।।18.75।। व्याख्या -- व्यासप्रसादात् श्रुतवान् -- सञ्जयने जब भगवान् श्रीकृष्ण और महात्मा अर्जुनका पूरा संवाद सुना? तब वे बड़े प्रसन्न हुए। अब उसी प्रसन्नतामें वे कह रहे हैं कि ऐसा परम गोपनीय योग मैंने भगवान् व्यासजीकी कृपासे सुना व्यासजीकी कृपासे सुननेका तात्पर्य यह है कि भगवान्ने यत्तेऽहं प्रीयमाणाय वक्ष्यामि हितकाम्यया (10। 1)? इष्टोऽसि मे दृढमिति ततो वक्ष्यामि ते हितम् (18। 64)? मामेवैष्यसि सत्यं ते प्रतिजाने प्रियोऽसि मे (18। 65)? अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः (18। 66) आदिआदि प्यारे वचनोंसे अपना हृदय खोलकर अर्जुनसे जो बातें कही हैं? उन बातोंको सुननेमें केवल व्यासदेवजीकी कृपा ही है अर्थात् सब बातें मैंने व्यासजीकी कृपासे ही सुनी हैं।एतद् गुह्यं परं योगम् -- समस्त योगोंके महान् ईश्वरके द्वारा कहा जानेसे यह गीताशास्त्रयोग अर्थात् योगशास्त्र है। यह गीताशास्त्र अत्यन्त श्रेष्ठ और गोपनीय है। इसके समान श्रेष्ठ और गोपनीय दूसरा कोई संवाद देखनेसुननेमें नहीं आता।जीवका भगवान्के साथ जो नित्यसम्बन्ध है? उसका नामयोग है। उस नित्ययोगकी पहचान करानेके लिये कर्मयोग? ज्ञानयोग आदि योग कहे गये हैं। उन योगोंके समुदायका वर्णन गीतामें होनेसे गीता भीयोग,अर्थात् योगशास्त्र है।योगेश्वरात्कृष्णात्साक्षात्कथयतः स्वयम् -- सञ्जयके आनन्दकी कोई सीमा नहीं रही है। इसलिये वे हर्षोल्लासमें भरकर कह रहे हैं कि इस योगमें मैंने समस्त योगोंके महान् ईश्वर साक्षात् भगवान् श्रीकृष्णके मुखसे सुना है। सञ्जयको योगेश्वरात्? कृष्णात्? साक्षात्? कथयतः? स्वयम् -- ये पाँच शब्द कहनेकी क्या आवश्यकता थी सञ्जय इन शब्दोंका प्रयोग करके यह कहना चाहते हैं कि मैंने यह संवाद परम्परामें नहीं सुना है और किसीने मुझे सुनाया हैऐसी बात भी नहीं इसको तो मैंने खुद भगवान्के कहतेकहते सुना है
।।18.75।।व्यासजीकी कृपासे मैंने स्वयं इस परम गोपनीय योग (गीता-ग्रन्थ) को कहते हुए साक्षात् योगेश्वर भगवान् श्रीकृष्णसे सुना है।
राजन्संस्मृत्य संस्मृत्य संवादमिममद्भुतम्। केशवार्जुनयोः पुण्यं हृष्यामि च मुहुर्मुहुः ॥
।।18.76।। व्याख्या -- राजन्संस्मृत्य ৷৷. मुहुर्मुहुः -- सञ्जय कहते हैं कि हे महाराज भगवान् श्रीकृष्ण और अर्जुनका यह बहुत अलौकिक? विलक्षण संवाद हुआ है। इसमें कितना रहस्य भरा हुआ है कि घोरसेघोर युद्धरूप क्रिया करते हुए भी ऊँचीसेऊँची पारमार्थिक सिद्धि हो सकती है मनुष्यमात्र हरेक परिस्थितिमें अपना उद्धार कर सकता है। इस प्रकारके संवादको याद करकरके मैं बड़ा हर्षित हो रहा हूँ? प्रसन्न हो रहा हूँ।श्रीभगवान् और अर्जुनके इस अद्भुत संवादकी महिमा भी बहुत विलक्षण है। भगवान् श्रीकृष्ण और अर्जुन सदा साथमें रहनेपर भी इन दोनोंका ऐसा संवाद कभी नहीं हुआ। युद्धके समय अर्जुन घबरा गये क्योंकि एक तरफ तो उनको कुटुम्बका मोह तंग कर रहा था और दूसरी तरफ वे क्षात्रधर्मकी दृष्टिसे युद्ध करना अवश्य कर्तव्य समझते थे। मनुष्यकी जब किसी एक सिद्धान्तपर? एक मतपर स्थिति नहीं होती? तब उसकी व्याकुलता बड़ी विचित्र होती है (टिप्पणी प0 1000)। अर्जुन भीयुद्ध करना श्रेष्ठ है या युद्ध न करना श्रेष्ठ है -- इन दोनोंमेंसे एक निश्चित निर्णय नहीं कर सके। इसी व्याकुलताके कारण अर्जुन भगवान्की तरफ खिंच गये? उनके सम्मुख हो गये। सम्मुख होनेसे भगवान्की कृपा उनको विशेषतासे प्राप्त हुई। अर्जुनकी अनन्य भावना? उत्कण्ठाके कारण भगवान् योगमें स्थित हो गये अर्थात् ऐश्वर्य आदिमें स्थित न रहकर केवल अपने प्रेमतत्त्वमें सराबोर हो गये और उसी स्थितिमें अर्जुनको समझाया। इस प्रकार उत्कट अभिलषासम्पन्न अर्जुन और अलौकिक अटलयोगमें स्थित भगवान्के संवादका क्या महिमा कहें उसकी महिमाको कहनेमें कोई भी समर्थ नहीं है।
।।18.76।।हे राजन् ! भगवान् श्रीकृष्ण और अर्जुनके इस पवित्र और अद्भुत संवादको याद कर-करके मैं बार-बार हर्षित हो रहा हूँ।
तच्च संस्मृत्य संस्मृत्य रूपमत्यद्भुतं हरेः। विस्मयो मे महान् राजन्हृष्यामि च पुनः पुनः ॥
।।18.77।। व्याख्या -- तच्च संस्मृत्य ৷৷. पुनः पुनः -- सञ्जयने पीछेके श्लोकमें भगवान् श्रीकृष्ण और अर्जुनके संवादको तोअद्भुत बताया? पर यहाँ भगवान्के विराट्रूपकोअत्यन्त अद्भुत बताते हैं। इसका तात्पर्य है कि संवादको तो अब भी पढ़ सकते हैं? उसपर विचार कर सकते हैं? पर उस विराट्रूपके दर्शन अब नहीं हो सकते। अतः वह रूप अत्यन्त अद्भुत है।ग्यारहवें अध्यायके नवें श्लोकमें सञ्जयने भगवान्को महायोगेश्वरः कहा था। यहाँ विस्मयो मे महान् पदोंसे कहते हैं कि ऐसे महायोगेश्वर भगवान्के रूपको याद करनेसे महान् विस्मय होगा ही। दूसरी बात? अर्जुनको,तो भगवान्ने कृपासे द्रवित होकर विश्वरूप दिखाया? पर मेरेको तो व्यासजीकी कृपासे देखनेको मिल गयायद्यपि भगवान्ने रामावतारमें कौसल्या अम्बाको विराट्रूप दिखाया और कृष्णावतारमें यशोदा मैयाको तथा कौरवसभामें दुर्योधन आदिको विराट्रूप दिखाया तथापि वह रूप ऐसा अद्भुत नहीं था कि जिसकी दाढ़ोंमें बड़ेबड़े योद्धालोग फँसे हुए हैं और दोनों सेनाओँका महान् संहार हो रहा है। इस प्रकारके अत्यन्त अद्भुत रूपको याद करके सञ्जय कहते हैं कि राजन् यह सब जो व्यासजी महाराजकी कृपासे ही मेरेको देखनेको मिला है। नहीं तो ऐसा रूप मेरेजैसेको कहाँ देखनेको मिलता सम्बन्ध -- गीताके आरम्भमें धृतराष्ट्रका गूढ़ाभिसन्धिरूप प्रश्न था कि युद्धका परिणआम क्या होगा अर्थात् मेरे पुत्रोंकी विजय होगी या पाण्डुपुत्रोंकी आगेके श्लोकमें सञ्जय धृतराष्ट्रके उसी प्रश्नका उत्तर देते हैं।
।।18.77।।हे राजन् ! भगवान् श्रीकृष्णके उस अत्यन्त अद्भुत विराट्रूपको याद कर-करके मेरेको बड़ा भारी आश्चर्य हो रहा है और मैं बार-बार हर्षित हो रहा हूँ।
यत्र योगेश्वरः कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धरः। तत्र श्रीर्विजयो भूतिर्ध्रुवा नीतिर्मतिर्मम ॥
।।18.78।। व्याख्या -- यत्र योगेश्वरः कृष्णो पार्थो धनुर्धरः -- सञ्जय कहते हैं कि राजन जहाँ अर्जुनका संरक्षण करनेवाले? उनको सम्मति देनेवाले? सम्पूर्ण योगोंके महान् ईश्वर? महान् बलशाली? महान् ऐश्वर्यवान्? महान् विद्यावान्? महान् चतुर भगवान् श्रीकृष्ण हैं और जहाँ भगवान्की आज्ञाका पालन करनेवाले? भगवान्के प्रिय सखा तथा भक्तगाण्डीवधनुर्धारी अर्जुन हैं? उसी पक्षमें श्री? विजय? विभूति और अचल नीति -- ये सभी हैं और मेरी सम्मति भी उधर ही है। भगवान्ने जब अर्जुनको दिव्य दृष्टि दी? उस समय सञ्जयने भगवान्को महायोगेश्वरः (टिप्पणी प0 1001) कहा था? अब उसी महायोगेश्वरकी याद दिलाते हुए यहाँ योगेश्वरः कहते हैं। वे सम्पूर्ण योगोंके ईश्वर (मालिक) भगवान् कृष्ण तो प्रेरक हैं और उनकी आज्ञाका पालन करनेवाले धनुर्धारी अर्जुन प्रेर्य हैं। गीतामें भगवान्के लियेमहायोगेश्वर?योगेश्वर आदि शब्दोंका प्रयोग हुआ है। इनका तात्पर्य है कि भगवान् सब योगियोंको सिखानेवाले हैं। भगवान्को खुद सीखना नहीं पड़ता क्योंकि उनका योग स्वतःसिद्ध है। सर्वज्ञता? ऐश्वर्य? सौन्दर्य? माधुर्य आदि जितने भी वैभवशाली गुण हैं? वे सबकेसब भगवान्में स्वतः रहते हैं? वे गुण भगवान्में नित्य रहते हैं? असीम रहते हैं। ऐसे पिताका पिता? फिर पिताका पिता -- यह परम्परा अन्तमें जाकर परमपिता परमात्मामें समाप्त होती है? ऐसे ही जितने भी गुण हैं? उन सबकी समाप्ति परमात्मामें ही होती है।पहले अध्यायमें जब युद्धकी घोषणाका प्रसङ्ग आया? तब कौरवपक्षमें सबसे पहले भीष्मजीने शङ्ख बजाया। भीष्मजी कौरवसेनाके अधिपति थे? इसलिये उनका शङ्ख बजाना उचित ही था। परन्तु भगवान् श्रीकृष्ण तो पाण्डवसेनामें सारथि बने हुए हैं और सबसे पहले शङ्ख बजाकर युद्धकी घोषणा करते हैं लौकिक दृष्टिसे देखा जाय तो सबसे पहले शङ्ख बजानेका भगवान्का कोई अधिकार नहीं दीखता। फिर भी वे शङ्ख बजाते हैं तो इससे सिद्ध होता है कि पाण्डवसेनामें सबसे मुख्य भगवान् श्रीकृष्ण ही हैं और दूसरे नम्बरमें अर्जुन हैं। इसलिये इन दोनोंने पाण्डवसेनामें सबसे पहले शङ्ख बजाये। तात्पर्य यह हुआ कि सञ्जयने जैसे आरम्भमें (शङ्खवादनक्रियामें) दोनोंकी मुख्यता प्रकट की? ऐसे ही यहाँ अन्तमें इन दोनोंका नाम लेकर दोनोंकी मुख्यता प्रकट करते हैं।गीताभरमें पार्थ सम्बोधनकी अड़तीस बार आवृत्ति हुई है। अर्जुनके लिये इतनी संख्यामें और कोई सम्बोधन नहीं आया है। इससे मालूम होता है कि भगवान्को पार्थ सम्बोधन ज्यादा प्रिय लगता है। इसी रीतिसे अर्जुनको भी कृष्ण सम्बोधन ज्यादा प्रिय लगता है। इसलिये गीतामें कृष्ण सम्बोधनकी आवृत्ति नौ बार हुई है। भगवान्के सम्बोधनोंमें इतनी संख्यामें दूसरे किसी भी सम्बोधनकी आवृत्ति नहीं हुई। अन्तमें गीताका उपसंहार करते हुए सञ्जयने भी कृष्ण और पार्थ ये दोनों नाम लिये हैं।तत्र श्रीर्विजयो भूतिर्ध्रुवा नीतिर्मतिर्मम -- लक्ष्मी? शोभा? सम्पत्ति -- ये सब श्री शब्दके अन्तर्गत हैं। जहाँ श्रीपति भगवान् कृष्ण हैं? वहाँ श्री रहेगी ही।विजय नाम अर्जुनका भी है और शूरवीरता आदिका भी। जहाँ विजयरूप अर्जुन होंगे? वहाँ शूरवीरता? उत्साह आदि क्षात्रऐश्वर्य रहेंगे ही।ऐसे ही जहाँ योगेश्वर भगवान् श्रीकृष्ण होंगे? वहाँ विभूति -- ऐश्वर्य? महत्ता? प्रभाव? सामर्थ्य आदि सबकेसब भगवद्गुण रहेंगे ही और जहाँ धर्मात्मा अर्जुन होंगे? वहाँ ध्रुवा नीति -- अटल नीति? न्याय? धर्म आदि रहेंगे ही।वास्तवमें श्री? विजय? विभूति और ध्रुवा नीति -- ये सब गुण भगवान्में और अर्जुनमें हरदम विद्यमान रहते हैं। उपर्युक्त दो विभाग तो मुख्यताको लेकर किये गये हैं। योगेश्वर श्रीकृष्ण और धनुर्धारी अर्जुन -- ये दोनों जहाँ रहेंगे? वहाँ अनन्त ऐश्वर्य? अनन्त माधुर्य? अनन्त सौशील्य? अनन्त सौजन्य? अनन्त सौन्दर्य आदि दिव्य गुण रहेंगे ही।धृतराष्ट्रका विजयकी गूढ़ाभिसन्धिरूप जो प्रश्न है? उसका उत्तर सञ्जय यहाँ सम्यक् रीतिसे दे रहे हैं। तात्पर्य है कि पाण्डुपुत्रोंकी विजय निश्चित है? इसमें कोई सन्देह नहीं है। ज्ञानयज्ञः सुसम्पन्नः प्रीतये पार्थसारथेः। अङ्गीकरोतु तत्सर्वं मुकुन्दो भक्तवत्सलः।। नेत्रवेदखयुग्मे हि बहुधान्ये च वत्सरे (टिप्पणी प0 1002) संजीवनी मुमुक्षूणां माधवे पूर्णतामियात्।। इस प्रकार ? तत्? सत् -- इन भगवन्नामोंके उच्चारणपूर्वक ब्रह्मविद्या और योगशास्त्रमय श्रीमद्भगवद्गीतोपनिषद्रूप श्रीकृष्णार्जुनसंवादमें मोक्षसंन्यासयोग नामक अठारहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ।।18।।
।।18.78।।जहाँ योगेश्वर भगवान् श्रीकृष्ण हैं और जहाँ गाण्डीवधनुषधारी अर्जुन हैं, वहाँ ही श्री, विजय, विभूति और अचल नीति है -- ऐसा मेरा मत है।